Monday, March 30, 2015

कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है


सरकार से यह उम्मीद कतई न थी विदेश में काला धन रखने वालों के लिए बचने की खिड़की खोल दी जाएगी और इंस्पेक्टर राज से लैस एक कानून थोप दिया जाएगा.
खिर सरकार की नीयत पर लोग शक क्यों न करें? देश जब काले धन पर कुढ़ रहा हो तब ऐसा विधेयक लोकसभा में पेश किया गया है जो विदेश में अवैध पैसा रखने वालों को कानूनी सख्ती से पहले टैक्स और पेनाल्टी देकर बच निकलने का मौका देने जा रहा है. माना कि विदेश से काला धन लाने में विफलता, मोदी सरकार की किरकिरी करा रही है लेकिन इतनी भी क्या बेताबी कि काला धन रोकने की कोशिशों पर संसद में पर्याप्त चर्चा भी न हो सके. विदेश में जमा काला धन पर सख्ती के लिए बीते सप्ताह लोकसभा में पेश विधेयक (अनडिस्क्लोज्ड फॉरेन इनकम ऐंड एसेट्स बिल 2015) दरअसल मनी बिल है, जिस पर देश में तो छोडिय़े, संसद में भी पर्याप्त बहस नहीं होगी, क्योंकि इसे संसदीय समितियों को भी नहीं दिया जा सकता. इतनी जल्दबाजी और पर्दादारी का मकसद क्या हो सकता है?
अनडिस्क्लोज्ड फॉरेन इनकम ऐंड एसेट्स (यूएफआइए) बिल 2015 को पढऩे के बाद टैक्स का कोई सामान्य विशेषज्ञ भी बता देगा कि यह दूरदर्शी या नायाब कानून नहीं है. अगर विदेश में जमा अघोषित संपत्ति पर सख्ती करनी थी तो इसके लिए नया कानून लादने की जरूरत शायद नहीं थी. नए कानून मैक्सिमम गवर्नेंस की पहचान हैं जो दुरुपयोग का खतरा बढ़ाते हैं.
विदेश में जमा काले धन पर शिकंजे के लिए मौजूदा आयकर कानून में कुछ संशोधन हो सकते थे क्योंकि विदेशी संपत्ति सहित कर योग्य संपत्ति छिपाने पर सात साल की सजा का प्रावधान पहले से मौजूद है. नया विधेयक विदेश में धन छिपाने का दोषी पाए जाने पर भारत में संपत्ति जब्त करने, सख्त सजा और कानूनी बचाव के रास्ते सीमित करने से लैस है. ये प्रावधान मौजूदा आयकर कानून में जोड़े जा सकते थे. सिर्फ इतने के लिए आनन-फानन में नया कानून लाने की भला क्या जरूरत आन पड़ी थी?
इस विधेयक के प्रावधानों पर अचरज से ज्यादा शक इसे लाने के तरीके और पारित कराने की रणनीति पर है. यह विधेयक एक मनी बिल है जिसे संविधान की धारा117 और 274 के तहत पेश किया गया है. धारा 117 के तहत, राष्ट्रपति को पूर्व सूचना देकर खास तरह के मनी बिल पेश किए जाते हैं. यह राज्यसभा भी नहीं जाएगा,जहां सरकार अल्पमत में है. मनी बिल होने के नाते इसे संसदीय समितियों के पास भेजने की जरूरत भी नहीं बल्कि लोकसभा को 75 दिन में इसे पारित करना होगा. विदेश में काले धन के खातों पर सख्ती के कानून को लेकर यह पेशबंदी बताती है कि इस पर बहस को सीमित रखने की कोशिश की जा रही है.
इस विधेयक का छठा खंड विवादित होगा और इसे बहस को रोकने की रोशनी में देखा जाएगा. इस खंड के तहत व्यवस्था दी गई है कि इस नए कानून के प्रभावी होने से पहले अगर विदेश में छिपाया धन घोषित करते हुए टैक्स (30 फीसद) और पेनाल्टी (टैक्स का शत प्रतिशत) चुकाई जाती है तो कार्रवाई नहीं होगी. वकीलों से मिलें तो वे 1997 की वीडीआइएस स्कीम के तजुर्बे को आधार बनाकर माफी के प्रावधान पर भी शक करते हुए बताएंगे कि कंपनियां शायद ही इस कानून के तहत काला धन घोषित करने आएं. वजह? वीडीआइएस में गोपनीयता के वादे के बावजूद कई मामलों में कर जांच शुरू हुई थी. यह नया कानून इस तथ्य को भी स्पष्ट नहीं करता कि अगर काली कमाई जरायम से निकली है तो संपत्ति घोषित करने वाले पर कार्रवाई होगी या नहीं.
फिर भी विदेश में जमा काला धन धोने के लिए यह लांड्री नुकसान का सौदा नहीं है. टैक्स हैवेन में पैसा रखने पर एक या दो फीसद का ब्याज मिलता है, दर्जनों जोखिम अलग से. इस नई व्यवस्था में कर और पेनाल्टी चुकाने के बाद भी 100 रु. में से 40 रु. बचेंगे जो साफ-सुथरे होंगे. माफी देने पर विवाद होना तय है क्योंकि कर चोरों को बच निकलने का मौका मिलना ईमानदार करदाताओं के साथ अन्याय है. शायद यही वजह है कि सरकार इस विधेयक पर बड़ी बहस नहीं चाहती, बस किसी तरह संसद की दहलीज पार करा देना चाहती है ताकि कुछ काला धन वापस लाकर दिखाया जा सके और एक अतार्किक चुनावी वादे से मुकरने की कालिख कम की जा सके.
जिस देश में सख्त कानून के बावजूद बलात्कारियों को सजा न हो पाती हो वहां विदेश में जमा काले धन पर आधे-अधूरे कानून के असरदार होने की कोई गारंटी नहीं है. आयकर, सीमा और उत्पाद शुल्क के लंबित अभियोजनों का इतिहास बताता है कि टैक्स प्रशासन कितना बोदा है. कहने को तो प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉड्रिंग कानून2012 भी सख्त है लेकिन अब तक इसमें न तो कोई बड़ा मामला बना और न ही बड़ी रिकवरी हुई. इसलिए नया कथित सख्त कानून सिर्फ एक नए इंस्पेक्टर राज का खतरा पैदा करता है जैसा कि इस प्रजाति के दूसरे कानूनों में है जो सजा तो नहीं दिला पाते अलबत्ता भ्रष्टाचार के नाखून पैने कर देते हैं. कानून को गौर से पढऩे पर इसमें कई और तकनीकी कमजोरियां निकलती हैं जो इसे उदार अर्थव्यवस्था और पारदर्शिता के माफिक साबित नहीं करतीं. इसे व्यावहारिक बनाने के लिए देश और संसद में इस पर पर्याप्त बहस हर तरह से जरूरी है.
विदेश में जमा काला धन काली अर्थव्यवस्था का आधा फीसद भी नहीं है. इस मुद्दे पर चुनावी और न्यायिक सक्रियता के बाद काले धन की पैदावार को सीमित करने,खपत के तौर-तरीकों को रोकने, देश से बाहर लाने-ले जाने के रास्तों और राजनीतिक चंदे सहित विभिन्न आयामों पर समग्र प्रयासों की अपेक्षा की गई थी. सरकार से यह उम्मीद कतई न थी कि काला धन रोकने के उपायों को विदेशी खातों तक सीमित करते हुए विदेश में काला धन रखने वालों के लिए बचने की खिड़की खोल दी जाएगी और इंस्पेक्टर राज से लैस एक कानून थोप दिया जाएगा.
सरकारें अक्सर यह भूल जाती हैं कि आम लोग नीयत पढऩे में चूक नहीं करते. विदेश में जमा कितनी काली कमाई इस कानून के जरिए आएगी, यह तय नहीं है. अलबत्ता इसमें कोई शक नहीं कि इसके प्रावधान और इसे लाने का तरीका, काले धन को लेकर सरकार की नीयत पर उठने वाले सवालों को बड़ा और पैना जरूर कर देंगे.


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