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Sunday, March 19, 2023

ढोल में पोल


 


 

बीते पंद्रह साल में दुनिया में कहीं भी किसी जगह कंप्‍यूटर की पढ़ाई कर रहा कोई छात्र छात्रा अगर थक कर सो जाता था  तो उसका अवचेतन उसके जगा कर कहता था आराम मत करपढ़ क्‍यों कि गूगलफेसबुकट‍ि्वटरअमेजनमाइक्रोसॉफ्ट की नौकरी तेरा इंतजार कर रही है  और वह फिर उठ कर कोडिंग के मंत्र रटने लगता था.

यह करोड़ों उम्‍मीदें अब माकायोशी सनोंसैम बैंकमैन फ्रायड (एफटीएक्‍स क्रिप्‍टो एक्‍सचेंज वाले) मार्क ज़कबरर्गोंजेफ बेजोसोंइलॉन मस्‍कोंसत्‍या नाडेलासुंदर पि‍चाइयोंबायजू रविद्रन आदि को किस नाम से बुलाना चाहेंगी...जिन्‍होंने मिलकर हजारों नौकर‍ियां खत्‍म कर दीं. इनके भारतीय सहोदर यानी चमकदार स्‍टार्ट अप सैंकडों कर्मचारियों का काम से निकाल चुके हैं र पठा चुके हैं. और उस पर तुर्रा यह कि बेरोजगारी की यह हैलोवीन पार्टी तो अभी शुरु हुई है

न्‍यू इकोनॉमी के यह  सितारे और दूरदर्श‍िता प्रेरणा पुंज इन निवेशकों के बीच किस नाम इन्‍हें पुकारेंगे जाएंगे ज‍िनकी भारी पूंजी इनमें से कई कंपनियों के शेयर खरीदकर स्‍वाहा हो गई.

क्‍या आप इन सब कीर्त‍ि कहानियों के नायकों को ठग कहना चाहेंगे

क्‍या आपने कारोबारों को विराट तमाशा कहना चाहेंगे जो दरअसल एक फर्जीवाड़ा है

ठह‍िरये

गुस्‍सा मत करिये

हम आपकी भावनायें समझते हैं

जॉन केनेथ गॉलब्रेथ नाम के बड़े अर्थशास्‍त्री गुज़रे हैं यह ठगी या फर्जीवाड़े  वाली थ्‍योरी हमें उन्‍हीं ने बताई थी

गॉलब्रेथ 1940 के दशक में फॉरच्‍यून पत्रि‍का के संपादक थे. वह  हार्वर्ड के प्रोफेसर थे. जॉन एफ केनेडी के एडवाइजर थे. उनका भारत से करीबी रिश्‍ता था. वह 1960 के दशक में भारत में अमेरिका राजदूत रहे थे

गॉलब्रेथ ने एक किताब ल‍िखी थी.  नाम है द ग्रेट क्रैश1929

गॉलब्रेथ ने इस किताब में बताया था कि कुछ ऐसे कारोबार हैं जिनकी एक कृत्रिम वैल्‍यू बनाई जाती है और लंबे वक्‍त तक लाखों लोग उसमें भरोसा करते रहे हैं. गॉलब्रेथ ने इस कारोबारी मॉडल के लिए ‘बेजल’ शब्‍द का प्रयोग किया . बेजल अंग्रेजी के ‘इंबेजलमेंट’ से बना है जिसका मतलब है ठगीगबन या पैसों का चोरी. अंग्रेजी शब्‍दकोषों में बेज़ल का भी अर्थ कुछ ठगी लूट जैसा ही मिलता है

क्‍या दुनिया की सबसे प्रख्‍यातसंभावनामय कंपरियां गॉलब्रेथ की बेजल थ्‍योरी को सच साबित कर रही हैं. ? मांग में जरा गिरावटआर्थ‍िक उठापटक का एक छोटा सा दौर या पूंजी की जरा सी महंगाई से इनकी चूलें क्‍यों हिल गईंक्‍या हमारी सदी के सबसे चमकदार कारोबार भीतर से इतने खोखले हैं कि हजारों की संख्‍या में नौकर‍ियां खत्‍म करने लगे?  क्‍या दरअसल इनके बिजनेस मॉडल दुनिया का सबसे दिलचस्‍प आर्थि‍क अपराध हैं जैसा कि बेजल ने कहा था ?

युद्ध और महंगाई के बीच अचानक फट पड़ी बेरोजगारी से बदहवास दुनिया समझने की कोशि‍श कर रही है उसे बताया गया है वह सच है या फिर जो छ‍िपाया गया था वही सच था.

आइये समझते हैं कि दुनिया को गॉलब्रेथ ही नहीं  वॉरेन बफे के साथी और बर्कशायर हैथवे  वाली चार्ली मुंगेर के भी कुछ सूत्र याद आ रहे है जो सामूहिक भ्रम में भुला दिये गए थे.

 

सबसे बड़ी उलटबांसी 

दुनिया को आर्थ‍िक संकटों का इतिहास भर तजुर्बा है. इन संकटों के दो परिवार हैं. पहला काल्‍पनिक मांग या कमॉड‍िटी की कीमतें चढ़ जाने से फूले गुब्‍बारे जैसे कि  17 वीं नीदरलैंड में ट्यूलिप खरीदने दौड़ पड़े कारोबारी हों या फिर  ब्रिटेन में साउथ सी कंपनी के शेयरों की तेजी या फिर असंख्‍य पोंजी स्‍कीमें या दूसरा जरुरत से कहीं ज्‍यादा निवेश जैसे 18 वीं सदी के यूरोप में रेलवे और कैनाल बबल से लेकर 1980 में जापान और 2006 में अमेरिका का रियल इस्‍टेट बबल और 2002 का डॉट कॉम बबल.. दोनों किस्‍म के संकटों के पीछे पूंजी बैंकों से या शेयर बाजार से आती है तो यही डूबते हैं

इस बार कुछ एसा हो रहा है जिसकी प्रकृति और तरीका देखकर सर चकरा जाता है. महामारी के दो साल के दौरान दुनिया इस बात मुतमइन पर हो चुकी थी कि टेकएज आ गई है. यानी तकनीकों का स्‍वर्ण युग शुरु हो गया है. यह युग तो महामारी से पहले से ही तैयार था लेक‍िन घरों में बंद लोगों के आर्थ‍िक और सामाजिक व्‍यवहार  बाद बीते साल तक अगर होई यह कहता कि स्‍टार्ट अप डूब जाएंगे या फेसबुक छंटनी करेगी तो शायद उसे सोशल मीडिया पर शहीद कर‍ दिया जाता

लेक‍िन 2022 के आख‍िरी महीने तरफ बढ़ रही दुनिया यह मान रही है कि तकनीकी उद्योग में डॉटकॉम बबल से बड़ा गुब्‍बारा फूट गया है. चौतरफा हाय तोबा मची है. कहीं क्रिप्‍टो एक्‍सचेंज डूब रहे हैं ड‍ि फाई यानी ड‍िसेंट्रालाइज फाइनेंस की मय्यत उठाई जा रही है तो कहीं ई वाहन वाली कंपनियों के माल‍िक फ्रॉड में पकड़े जा रहे हैं तो कहीं सॉफ्टवेयर क्‍या हार्डवेयर तक बनाने वाली कंपनियां नया निवेश बंद कर रही हैं. भारत के मशहूर यूनीकॉर्न पूंजी की कमी से कॉक्रोच में बदल रहे हैं.

कम से कम यह टेकएज तो नहीं जिसका सपना देखते हुए दुनिया महामारी का भवसागर पार कर आई है.

टेक एज की नई सुर्ख‍ियां

दुनिया में बहुत से लोग यह मानते थे कार कंपनियां बंद हो सकती हैं , सिनेमाघरों का वक्‍त खत्‍म हो सकता हैकिसी मौसम की फसल कहीं भी उगाई जा सकती है लेक‍िन तकनीकों की दुनिया में कभी मंदी नहीं आएगी. यह उद्योग फ्यूचर प्रूफ है यानी भविष्‍य की गारंटी है. अब यहां कुछ एसी सुर्ख‍ियां बन रही हैं

-    अमेरिका की हर बड़ी तकनीक कंपनी या तो रोजगार में छंटनी कर रही है या नही भर्त‍ियां बंद कर चुकी है.  केवल अक्‍टूबर महीने‍ में अमेरिका को आईटी उद्योग में करीब 50000 नौकर‍ियां गईं है. इनमें से कई लोग एसे हैं जिन्‍हें दो महीने पहले ही नौकरी में रखा गया था. फेसबुक टि‍्टवरअमेजनटेस्‍लानेटफ‍ि्लक्‍स , कई क्रिप्‍टो एक्‍चेंजईवेहक‍िन कंपनियां नौकर‍ियां खत्‍म कर रही हैं भारत में भी सभी बड़े स्‍टार्ट अप छंटनी कर रही हैं. अब तक  20000 लोगों को गुलाबी पर्ची थमाई जा चुकी है

-    क्रिप्‍टो की दुनिया डूब रही है. वॉयजल और सेल्‍स‍ियस के बाद तीसरा बडा एक्‍सचेंज एफटीएक्‍स दीवालिया हो गया है. इसके मालिक सैम बैंकमैन फ्रायड को पत्र‍िकाओं ने नए युग का जे पी मोर्गन कहा था. जिन्‍होंने 1907 अमेरिका की सरकार को कर्ज देकर संकट से उबारा था.  

-    मासायोशी सन के सॉफबैंक को इस साल अप्रैल जून की त‍िमाही में 913 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है. मासायोशी सन ने स्‍टार्ट अप निवेश से तौबा कर ली है. कई कंपनियों में वह अपनी हिस्‍सेदारी बेचना चाहते हैं. सन का सॉफ्बैंक वेंचर कैपिटल बाजार के आव‍िष्‍कारक था. उसने सिल‍िकॉन वैली स्‍टार्ट अपर 100 अरब डॉलर के साथ  स्‍टार्ट अप इन्‍वेस्‍ट‍िंग का नया युगशुरु कर दिया था.  बहुतों ने सन को वन मैन बबल मेकर की उपाध‍ि से नवाजा था. यह उपाध‍ि अब सही साबित हो रही है.  

-    2022 की तीसरी तिमाही में वेंचर कैपिटल फंड‍िंग बीते साल के मुकाबले 53 फीसदी और पिछली त‍िमाही से 33 फीसदी घटी है. इस सितंबर तक भारत में स्‍टार्ट अप फंडिंग बीते साल की तुलना में 80 फीसदी कम हो गई है

 

-    पूरी दुनिया में यूनीकॉर्न की संख्‍या कम हो रही है. जो मौजूद हैं वह बुरी तरह लहूलुआन हैं. भारत में ओयो प्रति मिनट 76000 रुपयेपेटीएम 60000 रुपयेस्‍व‍िगी करीब 25000 रुपयेपीबी फिनटेक करीब 22000 रुपये और जोमाकोकार ट्रेड नायकमोबीक्‍व‍िक 2000 से 5000 रुपये प्रति म‍िनट का नुकसान उठा रहे हैं.

-    तकनीकी शेयरों का प्रतिनिध‍ि अमेरिकी सूचकांक नैसडैक गहरी मंदी में है. यह बीते बरस से 35 फीसदी टूट चुका है. बीते साल दस साल में यह सबेस तेज गिरावट है.  

क्‍या बदल गया अचानक?

बीते दो साल में दो बड़े बदलाव हुए और आश्‍चर्य है कि इनका सबसे ज्‍यादा असर उस क्षेत्र पर हो रहा है जो शायद मंदी की संभावना से परे था

पहला - अब तक यह रहस्‍य नहीं रह गया है कि दुनिया में कर्ज महंगा होने से पूंजी की आपूर्ति कम हुई है.  2010 के बाद आमतौर पर कर्ज दरें न्‍यूनतम रहीं. बीच एक बार कुछ बढ़त आई तो प्राइवेट फंड आना शुरु हो गए. सस्‍ती पूंजी अब लौटने के साथ प्राइवेट फंड भी लौटने लगे हैं

 

 

 

दूसरा -  ऑनलाइन कारोबारों को नियम बदल रहे हैं या नियामकों की सख्‍ती कर रहे हैं. क्र‍िप्‍टो फिनटेक इसकी नजीर हैं. अमेर‍िका से लेकर भारत तक अमेजनगूगलफेसबुक आदि के बाजार एकाध‍िकार पर निर्णायक कार्रवाई शुरु हो गइ है. यूरोपीय जीडीपीडीआर उपभोक्‍ताओं को राइट टू बी फॉरगॉटेन दे रहा है यानी उसकी सूचना सिस्‍टम में नहीं रहनी चाहिए.    सूचना तकनीक कंपन‍ियों को इस बात के लिए बाध्‍य किया जा रहा है वह उपभोक्‍ताओं को इस बात का अध‍िकार दें कि उन्‍हें ट्रैक किया जा या नहीं

इसका नतीजा यह है कि  न्‍यू इकोनॉमी दुनिया बदल रही है. टारगेटेड विज्ञापन जो डाटा मार्केटिंग की बुनियाद है अब वही डगमगा गई है. मेकेंजी का मानना है कि  कुकीज और  आइडेंट‍िफायर फॉर एडवरटाइजर्स (आईडीएफ) के बंद होने के बादइस सेवाओं का इस्‍तेमाल करने वाली कंपनियों को मार्केट‍िंग पर 10 से 20 फीसदी ज्‍यादा खर्च करना होगा.

बस इतने से हिल गया सब ?

कुछ परेशान करने वाले सवाल हैं      

पहला - क्‍या ब्‍याज दर बढ़ना इतना बड़ा बदलाव था जिससे फेसबुक जैसों का पूरा कारोबार ही लडखड़ा जाए. इन कंपन‍ियों को प्रति कर्मचारी राजस्‍व और मुनाफे में अग्रणी माना जाता है. जैसे कि 2021 में फेसबुक का प्रति कर्मचारी मुनाफा पांच लाख डॉलर था और राजस्‍व करीब 16 लाख डॉलर.

 

  

दूसरा – कंपनियों को पहले से पता था कानून बदलेंगे. पूरी दुनिया के नियामक बीते एक पांच छह साल से सूचना तकनीक कंपन‍ियों को  निजता के अधकिारों की सुरक्षा से लैस करने की कोशि‍श कर रहे हैं. भविष्‍य की तैयारी करने वाली कंपनियों के लिए नियमों का बदलाव इतना बड़ा झटका था कि सब बिखर जाए

यहां हम वापस जॉन केनेथ गॉलब्रेथ की तरफ लौटते हैं. उनकी बेजेल थ्‍योरी कहती है कि किसी संपत्‍त‍ि कारोबार का संभावना या कृत्रि‍म कीमत को बढ़ाने का फर्जीवाड़ा लंबा चल सकता है. क्‍यों कि इससे यह कारोबारी मॉडल इसके नियंता को मुनाफा देता है जबक‍ि गंवाने वाले नुकसान को महसूस नहीं कर पाते.  यही बेजल है. यानी इंबेजलमेंट.

यह सबको पता था है कि बीते एक दशक में  65 फीसदी वेंचर कैपिटल निवेश डूब गए (कोर‍िलेशन वेंचर्स का अध्‍ययन) डूब गए. केवल 2 से 3 फीसदी निवेश पर दस से बीस गुना रिटर्न दियाकेवल एक फीसदी से 20 फीसदी से ज्‍यादा और आधा फीसदी ने 50 गुना या अध‍िक रिटर्न दिया है. 2014 तक कुल वेंचर कैपिटल फाइनेंस 482 अरब डॉलर था जिसमें केवल दस कंपनियों के पास का वैल्‍यूएशन 213 अरब डॉलर था यानी कुल निवेश का आधा.

बाकी केवल बेजल है ?

तकनीकी शेयरों के सूचकांक नैसडक का करीब 51 फीसदी रिटर्न केवल पांच कंपनियों से आता है. जबकि केवल 25 कंपनियां इस सूचकांक के कुल 75 फीसदी रिटर्न की जिम्‍मेदार हैं.

बाकी स‍ब क्‍या बेजल है ?

गालब्रेथ कहते थे कि इस पूरे प्रपंच कुछ बडे संकट छिपे रहते हैं जो बाद में फटते हैं जैसे कि  क्रिप्‍टो कंपनियों और एक्‍सचेंज के एदीवालिया होने का अंदाज नहीं है जब दिन अच्‍छे होते हैंकारोबारों का सही मूल्‍य छ‍िपा रहता है. प्राइस डिस्‍कवरी नहीं होती. लोग समझते हैं कि पूंजी तो आ‍ती रहेगी. जब वक्‍त का पह‍िया दूसरी तरफ जाता है तो सच उभरते हैं. जांच पड़ताल होती है कारोबारी नैतिकता के सवाल उठते हैं.

बेजल का गुब्‍बारा फूट जाता है.

अदर पीपुल्‍स मनी के लेखक जॉन के कहते हैं यह बेजल बड़ा मजेदार है इसमें कई लोग एक साथ एक ही संपत्‍त‍ि का इस्‍तेमाल करते रहते हैं. उन्‍हे पता भी नहीं होता कोई दूसरा भी यही कर रहा है.

क्‍या पूरे सूचना तकनीक कारोबार में यही होता रहा है

किसे नहीं पता था कि

क्‍यों कि चैनलों चर्चाओं में सुर्ख‍ियों में रहने वाले सभी आईटी सूरमाओं को  पता था कि डिज‍टिल अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा तो हमारे खाने-पीनेपहनने-ओढ़नेखरीदने-बेचनेतलाशने-मिटानेसुनने कहने की खरबों की सूचनाओं पर केंद्रित हैइन्‍हीं की वजह से यह सेवायें मुफ्त थीं मगर हम बेचे जा रहे थे और इस कारोबार के आकाश छूते वैल्‍यूएशन बताये जा रहे थे.

यह पूरा आभासी कारोबार वास्‍तव‍िक खरीद को बढ़ाने पर केंद्र‍ित था. ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग खरीद कर सकें. अब मांग ही नहीं होगी यात्रा ही घट जाएगीाहोटल ही नहीं बुक होंगे तो इन्‍हे इन्‍हें लेकर हमारी  सूचनाओं का क्‍या होगा.

सन 2000 में चार्ली मुंगेर ने कहा था कि अगर किसी संपत्‍ति‍ का कृत्रि‍म बाजार मूल्‍य उसके वास्‍तविक आर्थ‍िक मूल्‍य से ज्‍यादा बढाते हुए इस सीमा तक ले जाया जाता है जहां उसे रखने वाले खुद को अमीर मानने लगे. स्‍टार्ट अप में यही हुआ है. मुंगेर इसे ‘फेबजल’ कहा था है. किसी कारोबार की संभावनाओं का एक मूल्‍य हो सकता है लेक‍िन जब वास्‍तविक अर्थव्‍यवस्‍था से यह पूरी तरह कट जाता है तो फिर यह पोंजी में बदल जाता है. क्र‍िप्‍टो इसका उदाहरण बन रहा है

 

सूचना तकनीक बाजार में नौक‍र‍ियों का जो कत्‍ले आम मचा है. कंपनियां जिस तरह अपने कारोबारी विस्‍तार रोक रही हैं उसके बाद असल‍ियत से बाबस्‍ता होने का वक्‍त आ गया है. देा बडे बदलाव सामने दिख रहे हैं

एक – सूचना तकनीक सेवाओं के मुफ्त का युग खत्‍म होगा. इलॉन मस्‍क यही करने जा रहे हैं. महंगाई के बीच कौन कौन ई मेल या सोशल मीड‍िया सेवाओं को पैसा देगा इससे इन कारोबारों की वास्‍तविक वैल्‍यू तय होगी. यानी गालब्रेथ और मुंगेर इनकी कारेाबारे में जमीनी आर्थि‍क सच का असर दिखेगा

दूसरा- दुनिया को बहुत जल्‍दी इस सवाल का जवाब तलाशना होगा कि क्‍या कारोबार के इस तौर तरीके और कृत्र‍िम वैल्‍यूएशन से जीडीपी को बढ़ाकर दिखाया गया. अब अगर स्‍टार्ट डूबेंगे तो क्‍या दुनिया की आर्थ‍िक विकास दर और गिरेगी?

 

तकनीकी कारोबारों की दुनिया का नया युग शुरु होता है अब ..  

 

 


Friday, December 25, 2020

हंगामा है यूं बरपा

 


अब से दो साल पहले दिसंबर 2018 में जब गूगल प्रमुख सुंदर पिचाई एकाधिकार के मामले में अमेरिकी कानून निर्माताओं के कठघरे में थे उस दौरान जारी हुए फोटो और वीडियो ने लोगों को चौंका दिया. कांग्रेस की सुनवाई के दौरान पिचाई के पीछे तीसरी पंक्ति में काली टोपी वाले मुच्छड़ रिच अंकल पेनीबैग्स नजर आ रहे थे जो मशहूर मोनोपली गेम के प्रतीक पुरुष हैं. उनकी मौजूदगी किसी फोटोशापीय कला का नमूना नहीं था. अमेरिका के एक वकील ग्रीडी मोनोपली मैन की वेशभूषा में, इस मामले की प्रत्येक सुनवाई में बाकायदा ठीक उस जगह मौजूद रहे थे जहां से वह तस्वीरों का हिस्सा बन सकें और लोगों को बाजार का विद्रूप और एकाधि‍कारवादी चेहरा नजर आता रहे. 

संयोग ही है कि बीते सप्ताह जब विश्व की सबसे बड़ी तकनीकी मोनोपली यानी गूगल और फेसबुक पर अमेरिका में ऐंटीट्रस्ट (प्रतिस्पर्धा खत्म करने) कानून की कार्रवाई शुरू हुई तब उसी दौरान भारत में भी बहुत से लोग सुधारों के फैसलों के पीछे किसी कॉर्पोरेट मुच्छड़ मैन का अक्स देख रहे थे. 

उदारीकरण और मुक्त बाजार ने भारत में सबसे कम समय में सर्वाधि‍क आबादी की गरीबी दूर की है, इसलिए इस पर उठते शक-शुबहे गहरी पड़ताल की मांग करते हैं. 

निजीकरण, निजी भागीदारी, मुक्त बाजार पर शक बेवजह नहीं है. बाजार पर भरोसा दो ही वजह से बनता है. एक, रोजगार यानी कमाई या आय बढ़ने से और दूसरा, उत्पादन का सही मूल्य मिलने से. इन्हीं दोनों वजह से पूंजीवाद को सबसे अधिक सफलता मिली है, इस व््यवस्था में बाजार सबको अवसर देता है और सरकार संकटों के समाधान करती है. बाजार इसके बदले कीमत वसूलता है और सरकार टैक्स. 

बाजारों के सबसे बुरे दिनों का नाम ही मंदी है. नौकरियां खत्म होती हैं. कर्ज डूबने लगते हैं और सरकार से राहत मांगी जाने लगती है. और तब बाजार लोगों का तात्कालिक शत्रु बन जाता है. भारत में भी बाजार इस समय खलनायक है लेकिन दंभ और आत्ममुग्धता में सरकार उसे संकटमोचक बनाकर पेश कर रही है. लोग बुरी तह चिढ़ रहे हैं.

भारत में कंपनियों के रिकॉर्ड मुनाफों के बीच रिकॉर्ड बेरोजगारी है. इसी बीच सरकार ने कंपनियों को नौकरियां लेने की ताकत से (श्रम सुधार) से लैस कर दिया. 

किसानों को आय में बढ़ोतरी के लिए सीधी मदद चाहिए न कि उन्हें उस बाजार के हवाले कर दिया जाए तो खुद मंदी का मारा है.

निजीकरण में कोई खोट नहीं लेकिन चौतरफा बेकारी के बीच जीविका को लेकर डर लाजिमी है. खासतौर पर जब लोग देख रहे हैं कि कुछ निजी कंपनियां बाजारों  पर कब्जा कर रही हैं.

महामंदी और महामारी एक साथ सबसे बड़ी मुसीबत है. महामारी सरकारों की साख पर भारी पड़ती है क्योंकि दुनिया की कोई सरकार महामारियों से निबट नहीं सकती. महामंदी बाजार की साख तोड़ देती है इसलिए दुनिया की तमाम सरकारें कंपनियों को रोजगार बचाने के लिए बजट से पैसे दे रही हैं ताकि बाजार और लोगों के बीच विश्वास को बना रहे. 

मशहूर अर्थविद् जॉन मेनार्ड केंज ने 1930 की महामंदी के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट को लिखा थाःआपकी चुनौती दोहरी है. मंदी से भी उबारना है और सुधार भी होने हैं जो अर्से से लंबित हैं. मंदी से मुक्ति के लिए तेज और तत्काल नतीजे चाहिए. सुधारों में जल्दबाजी मंदी से उबरने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती, जिससे सरकार की नीयत पर शक बढ़ेगा और लोगों का भरोसा टूटेगा.’

सरकार के सलाहकारों पता चले कि प्रत्येक सुधार 1991 वाला नहीं होता. बीते ढाई दशक में लोगों में आर्थिक सुधारों के फायदों और नुक्सानों की समझ बनी है. मंदी की चोट खाए लोग आय और जीवन स्तर में ठोस बेहतरी समझ कर सुधार स्वीकार कर पाएंगे. इसके लिए सुधारों का क्रम ठीक करना होगा.

भारत में बाजार और लोगों के रिश्ते बीते दो-तीन साल से काफी बदले हैं. जनवरी 2020 में एडलमैन के मशहूर ग्लोबल ट्रस्ट बैरोमीटर सर्वे ने बताया था कि भारत, दुनिया के उन 28 प्रमुख बाजारों में पहले नंबर पर था जहां सबसे बड़ी संख्या में (74 फीसद) लोग बाजार और पूंजीवाद से निराश हैं. यानी कि कोरोना की विपत्तिसे पहले ही बाजार से लोगों का भरोसा उठने लगा था जिसकी बड़ी वजह आय में कमी और बेकारी थी.

सनद रहे कि अच्छे सुधार बाजार को ताकत देते हैं जबकि खराब सुधार बाजार की पूरी ताकत कुछ हाथों में थमा देते हैं. यह सुनिश्चित करना होगा कि सुधारों के पीछे वाल स्ट्रीट मूवी का प्रसिद्ध गॉर्डन गीको नजर न आए जो कहता था कि लालच के लिए कोई दूसरा बेहतर शब्द नहीं है इसलिए लालच अच्छा है.

भारत के आर्थिक सुधार संवेदनशील मोड़ पर हैं. 2020 बाजार के प्रति गुस्से के साथ बिदा हो रहा है. मुक्त बाजार को खलनायक बनने से रोकना होगा. गुस्साए लोग सरकार तो बदल सकते हैं, बाजार नहीं. मुक्त बाजार पर विश्वास टूटा तो सब बिखर जाएगा क्योंकि कोई सरकार कितनी भी बड़ी हो, वह बाजार से मिल रहे अवसरों का विकल्प नहीं हो सकती.

 

Saturday, August 29, 2020

ये रिश्ता क्या कहलाता है !

 

 


मि. जकरबर्ग (फेसबुक) आप अपनी डेटा ताकत से प्रतिस्पर्धियों की जासूसी करते हैं. उनका अधिग्रहण करते हैं या उन्हें मिटा देते हैं

मि. पिचाई (गूगल) विशेष सेवाओं वाले सर्च इंजन आपको फूटी आंख नहीं भाते. अपनी अकूत ताकत से आप तय करते हैं कि उनको ट्रैफिक मिल पाए.

और मि. बेजोस (अमेजन) आपके प्लेटफॉर्म से जो कारोबारी सामान बेचते हैं क्या उनके डेटा का इस्तेमाल अमेजन कर रही है

बीते हफ्तों में जब फेसबुक और भाजपा के रिश्तों को समझने की कोशि हो रही थी और रिलायंस के डिजिटल कारोबार (सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी) में फेसबुक, गूगल, क्वालकॉम (सबसे बड़े सोशल नेटवर्क, ऑपरेटिंग प्लेटफॉर्म सर्च इंजन और तकनीक कंपनी) के निवेश और माइक्रोसॉफ्ट से करार परजि-जिओहो रहा था, ठीक उस समय फेसबुक, एपल, गूगल और अमेजन के नेतृत्व अमेरिकी कांग्रेस (संसद) की समिति के कठघरे में थे. इन पर कंपीटिशन खत्म कर गलत तरीके से कारोबार करने गंभीर आरोप हैं.

राष्ट्रपतिचुनाव के शोर और कोविड के जोर के बीच अमेरिका की कारोबारी दुनिया नब्बे का दशक याद कर रही है जब उसके आखिरी वर्षों में अमेरिका के कानून निर्माताओं ने बिल गेट्स की कंपनी को इंटरनेट ब्राउजर बाजार में प्रतिस्पर्धा रोकने का दोषी पाया था. यह अभियान उससे कहीं ज्यादा बड़ा और रोमांचक है.

मोनोपली, मुक्त बाजार की पैदाइशी दुश्मन है इसलिए अमेरिका के कानून निर्माता फेसबुक, गूगल, अमेजन और एपल पर ऐंटी ट्रस्ट कानून (बाजार में मोनोपली तोड़ने वाला) के तहत कार्रवाई की पेशबंदी कर रहे हैं. कांग्रेस की समिति इन कंपनियों के अंदरूनी संवादों के आधार पर यह सनसनीखेज मामले बनाए हैं.

फेसबुक ने व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम को निगल कर कैसे कंपीिटशन खत्म किया, इसका खुलासा अब हो रहा है. आपसी खतो-किताबत में कंपनी के अधिकारी यह कहते पाए कि गए प्रतिस्पर्धा खत्म करने के लि कर्मचारी तोड़ने, कंपनी खरीदने और फिर खत्म कर देने में कोई हर्ज नहीं है.

यूट्यूब अधिग्रहण के पुराने दस्तावेजों के आधार पर गूगल कठघरे में है. कंपनी के गोपनीय संवाद दिखाकर सुंदर पिचाई से पूछा गया कि अगर गूगल के पास रोजगार सर्च आदि के लिए अच्छे रिजल्ट नहीं हैं तो क्या आप अन्य सर्च इंजन को ट्रैफिक नहीं देंगे. क्यों ग्राहक सभी सेवाओं के लिए सिर्फ गूगल के मोहताज रहें?

अमेजन तो फेडरल ट्रेड कमिशन और जस्टिस डिपार्टमेंट की जांच में फंस ही गई है. दुनिया के सबसे बड़े रिटेलर पर आरोप है कि उसने अपने प्लेटफॉर्म से सामान बेचने वालों और स्टार्ट-अप का डेटा चुराकर अपने उत्पाद विकसित किए. अमेजन ने थर्ड पार्टी डेटा के दुरुपयोग से इनकार नहीं किया. अभी तक की सुनवाई में एपल पर ज्यादा आरोप नहीं लगे हैं

ऐंटी ट्रस्ट का हथौड़ा चला तो फेसबुक, गूगल, अमेजन को दो-तीन हिस्सों में तोड़ने की नौबत सकती है. और पूरी दुनिया में इन पर कार्रवाई जुर्माना लगाया जा सकता है.

हैरत की बात है कि जिन कंपनियों को मोनोपली के लिए उनके जन्मस्थान पर सजा देने की तैयारी चल रही है, उन्होंने सिर्फ चार माह में भारतीय बाजार की सूरत ही बदल दी और कंपीटिशन कमिशन ने कुछ भी नहीं किया

जिओ-फेसबुक-गूगल-माइक्रोसॉफ्ट-क्वालकॉम के एक साथ आने का बाजार के लिए मतलब हैः

भारत के मोबाइल सेवा बाजार में जिओ की हिस्सेदारी 33 फीसद है. दुनिया की सबसे बड़ी तकनीक कंपनी माइक्रोसॉफ्ट क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर ले कर आई है. गूगल के पास मोबाइल डिवाइस, एंड्राएड ऑरेटिंग सिस्टम और पेमेंट सर्विस, फेसबुक के पास डेटा, चैट सोशल नेटवर्क है. क्वालकॉम 5जी की तकनीक से लैस है.

 

ये सब जिओ को एक सुपर ऐप बनाने की तरफ ले जाएगा. वह 2025 तक भारत में इंटरनेट के जरिए बिकने वाले सामान का 35 फीसद और डिजिटल पेमेंट का 50 फीसदी बाजार कब्जा सकती है. 

 

इसके एकाधिकार को ऐसे समझिए कि जैसे पेट्रोल-डीजल उत्पादन करने बेचने वाली कंपनी पूरे एकाधिकार के साथ इंजन, पुर्जों, टायर, बॉडी, बाहरी भीतरी सुविधाओं सहित पूरी कार बनाए, बेचे, सर्विस दे. उन कारों के लि हाइवे-सड़कें-गलियां भी बनाए उस पर टोल भी वसूले, उस सड़क के किनारे मकान, मॉल, मल्टीप्लेक्स, बनाए जहां उसी का सामान बेचा जाए. वह कंपनी इन्हें बनाने की तकनीक भी बनाए और यह सब कैसे बनेगा या चलेगा, इसके पैमाने भी तय करे. 


कोविड के बाद दुनिया तकनीक केंद्रित होगी लेकिन इसे एकतरफा नहीं होना चाहिए, इसलिए अमेरिकी कानून निर्माता अपनी ही यश कथाओं को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. यह जानते हुए भी कि एकाधिकार, अवसरों के लुटेरे हैं, उपभोक्ताओं को ठगते हैं और ताकत केंद्रीकरण करते हैं. हमारे नेताओं, नियामकों और आत्मनिर्भरतावादियों ने भारत का उभरता बाजार प्लेट में सजाकर दुनिया का सबसे बड़ी मोनोपली को सौंप दिया है.