Showing posts with label prices. Show all posts
Showing posts with label prices. Show all posts

Thursday, March 4, 2010

बुरा न मानो बजट है!!

कंपकंपा दिया वित्त मंत्री ने... पता नहीं किस फ्रिज में घोल कर रखा बजट का यह रंग जो पड़ते ही छील गया। दादा की बजट होली झटका जरूर देगी यह तो पता था, लेकिन उनके गुलाल में इतने कांटे होंगे इसका अंदाज नहीं था। तेल वालों से लेकर बाजार वाले तक सब कीमतें बढ़ाने दौड़ पड़े। महंगाई के मौसम और मंदी की कमजोरी के बीच दादा ने अपने खजाने की सेहत सुधारने का बोझ भी हम पर ही रख दिया। उपभोक्ता, उद्योग और आर्थिक विश्लेषक व निवेशक। हर बजट के यही तीन बड़े ग्राहक होते हैं। उपभोक्ता और उद्योग बजट का तात्कालिक असर देखते हैं, क्योंकि यह उनके जीवन या कारोबार पर असर डालता है, जबकि विश्लेषक और निवेशक इसकी बारीकी पढ़ते हैं और भविष्य की गणित लगाते हैं। तीनों के लिए यह बजट दिलचस्प ढंग से रहस्यमय है। महंगाई से बीमार उपभोक्ताओं को इस बजट में नए करों का ठंडा निर्मम रंग डरा रहा है, जबकि उद्योगों को इस बजट में रखे गए विकास के ऊंचे लक्ष्यों पर भरोसा नहीं (चालू साल की तीसरी तिमाही में विकास दर लुढ़क गई है) हो पा रहा है। लेकिन विश्लेषकों और निवेशकों को इसमें राजकोषीय सुधार का एक नक्शा नजर आ रहा है। पर इन सुधारों को लेकर सरकारों का रिकार्ड जरा ऐसा वैसा ही है। यानी कि सबकी मुद्रा, पता नहीं या वक्त बताएगा.. वाली है।
पक्का रंग महंगाई का
यह बजट के पहले ग्राहक की बात है अर्थात उपभोक्ता की। महंगाई के रंग पर बजट वह रसायन डाल रहा है, जिससे खतरा महंगाई के पक्के होने का है। इस बजट में कई ऐसे काम हुए हैं जो प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर महंगाई में ईधन बनेंगे। उत्पाद शुल्क की बढ़ोतरी को सिर्फ दो फीसदी मत मानिए। कंपनियां इसमें अपना मार्जिन जोड़ कर इसे उपभोक्ताओं को सौंपेंगी। इसके बाद फिर इसमें पेट्रो उत्पादों की मूल्य वृद्घि से बढ़ी हुई लागत मिल जाएगी। ब्याज दर में बढ़ोतरी की लागत और बुनियादी ढांचे से जुड़ी सेवाओं की महंगाई भी इसमें शामिल होगी। सिर्फ इतना ही नहीं तमाम तरह की नई सेवाएं जिन पर कर लगा है या कर का दायरा बढ़ा है, उनका असर भी कीमतों पर नजर आएगा। सरकार के भीतरी आंकड़े रबी की फसल से बहुत उम्मीद नहीं जगाते और अगर बजट उसी सख्त रास्ते पर चला जो प्रणब दा ने बनाया है तो साल के बीच में कुछ और सरकारी सेवाएं महंगी हो सकती हैं। ध्यान रखिए यह सब उस 18 फीसदी की महंगाई के ऊपर होगा जो कि पहले मौजूद है। देश के करोड़ों उपभोक्ताओं में आयकर रियायत पाने वाले भाग्यशाली वेतनभोगी बहुत कम हैं और उनमें औसत को होने वाला फायदा 1000 से 1500 रुपये प्रति माह का है। महंगाई का पक्का रंग इस रियायत की रगड़ से नहीं धुलेगा। ..महंगाई से ज्यादा खतरनाक होता है महंगाई बढ़ने का माहौल। क्योंकि ज्यादातर महंगाई माहौल बनने से बढ़ती है। उपभोक्ताओं के मामले में यह बजट महंगाई की अंतरधारणा को तोड़ नहीं पाया है।
तरक्की का त्योहार
बजट के दूसरे ग्राहक यानी उद्योग, दादा के रंग से बाल-बाल बच गए यानी उन पर कुछ ही छींटे आए हैं। दादा उतने सख्त नहीं दिखे जितनी उम्मीद थी। मगर उद्योग इससे बहुत खुश नहीं हो सकते क्योंकि बजट तेज विकास से रिश्ता बनाता नहीं दिखता। महंगाई के कारण मांग घटने का खतरा पहले से है। ऊपर से सरकार के खर्च में जबर्दस्त कटौती बड़ी परियोजनाओं के लिए मांग घटाएगी। दिलचस्प है कि जब वित्त मंत्री बजट भाषण पढ़ रहे थे, ठीक उसी समय इस वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में आर्थिक विकास दर के आंकड़े सरकार की फाइलों से निकल रहे थे। तीसरी तिमाही में जीडीपी की दर घटकर छह फीसदी रह गई है। यानी कि अब अगर सरकार को मौजूदा वित्त वर्ष में 7.2 फीसदी की विकास दर फीसदी का लक्ष्य हासिल करना है तो फिर साल की चौथी तिमाही 8.8 फीसदी की विकास दर वाली होनी चाहिए। यह कुछ मुश्किल दिखता है। अर्थात बजट और तरक्की की गणित गड़बड़ा गई है। उद्योगों का पूरा ताम झाम सिर्फ इस उम्मीद पर कायम है कि अगर अर्थव्यवस्था तेज गति से दौड़ी तो उन्हें खड़े होने का मौका मिल जाएगा। वरना तो फिलहाल मांग, बाजार और माहौल तेज विकास के बहुत माफिक नहीं है। ध्यान रहे जीडीपी के अनुपात में प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च पिछले एक साल में 5.4 से घटकर 2.7 फीसदी रह गया है, जबकि निजी निवेश पिछले दो साल में 16.1 से घटकर 12.7 फीसदी पर आ गया है। इसमें से एक मांग और दूसरा निवेश का पैमाना है। क्या बजट से मांग और निवेश के उत्साह को मजबूती मिलेगी यानी कि नौ फीसदी की तरक्की का त्योहार जल्द मनाया जाएगा? फिलहाल इसका जवाब नहीं है।
उड़ न जाए रंग?
खर्चे में कटौती और सख्त राजकोषीय सुधार इस बजट का सबसे साफ दिखने वाला रंग है। उम्मीद कम थी कि वित्त मंत्री इतनी हिम्मत दिखाएंगे, लेकिन वित्त आयोग की कैंची के सहारे खर्चो को छोटा कर दिया गया। दरअसल यह इसलिए भी हुआ क्योंकि नए वित्त वर्ष से केंद्रीय करों में राज्यों को ज्यादा हिस्सा मिलेगा और इससे केंद्र के खजाने का खेल बिगड़ेगा। लेकिन राजकोषीय सुधारों का अतीत भरोसेमंद नहीं है। बजट आकलन और संशोधित अनुमानों में बहुत फर्क होता है। जब-जब करों से लैस सख्त बजट आए हैं, घाटे ने कम होने में और नखरे दिखाए हैं। दादा के इस दावे पर भरोसा मुश्किल है कि अगले साल सरकार का गैर योजना खर्च केवल चार फीसदी बढ़ेगा जो कि इस साल 16 फीसदी बढ़ा है। वित्त मंत्री सरकार के राजस्व में 15 फीसदी की बढ़ोतरी आंकते हैं जो इस साल केवल 5 फीसदी रही है। खर्च में कम और कमाई में ज्यादा वृद्घि??? भारतीय बजटों को यह गणित कभी रास नहीं आई है। साल के बीच में खर्च बढ़ता है और सारा सुधार हवा हो जाता है। इसलिए घाटे को एक फीसदी से ज्यादा घटाने और कर्ज में बढ़ोतरी रोकने पर तत्काल कोई निष्कर्ष उचित नहीं है। सुधारों के इस रंग का पक्कापन तो वक्त के साथ ही पता चलेगा।
इस बजट के तीन अलग-अलग रंग हैं और तीनों गड्डमड्ड भी हो गए हैं। महंगाई-मांग या खर्च-कमाई, निवेश-विकास या घाटा-सुधार .. एक सूत्र तलाशना मुश्किल है। दरअसल यह कई रंगों से सराबोर पूरी तरह होलियाना बजट है। होली खत्म होने और नहाने धोने के बाद पता चलता है कि कौन सा रंग कितना पक्का था? हम तो चाहेंगे इसका महंगाई वाला रंग जल्दी से जल्दी उतर जाए, जबकि विकास व सुधार वाला रंग और पक्का हो जाए? मगर हमारे आपके चाहने से क्या होता है.. वक्त के पानी में धुलने के बाद ही पता चलेगा है कि कौन सा रंग बचा और कौन सा उड़ गया? अगर अच्छा रंग बचे तो किस्मत और महंगाई बचे तो भी किस्मत। बजट और होली में सब जायज है। ..बुरा न मानो बजट है।
------------------
अन्‍यर्थ के लिए
http://jagranjunction.com/ (बिजनेस कोच)

Monday, February 8, 2010

बजट की बर्छियां

मंदी के जख्म भरने लगे हैं न? तो आइए कुछ नई चोट खाने की तैयारी करें। बजट तो यूं भी स्पंज में छिपी पिनों की तरह होते हैं, ऊपर से गुदगुदे व मुलायम और भीतर से नुकीले, छेद देने वाले। मगर इस बजट के मुलायम स्पंज में तो नश्तर छिपे हो सकते हैं। पिछले एक माह के भीतर बजट की तैयारियों के तेवर चौंकाने वाले ढंग से बदल गए हैं। बात तो यहां से शुरू हुई थी कि मंदी से मुकाबले का साहस दिखाने वाली अर्थव्यवस्था की पीठ पर शाबासी की थपकियां दी जाएंगी, पर अब तो कुछ डरावना होता दिख रहा है। मौका भी है दस्तूर भी और तर्क भी। पांच साल तक राज करने के जनादेश को माथे पर चिपकाए वित्त मंत्री को फिलहाल किसी राजनीतिक नुकसान की फिक्र नहीं करनी है। दूसरी तरफ घाटे के घातक आंकड़े उन्हें सख्त होने का आधार दे रहे हैं। यानी कि इशारे अच्छे नहीं हैं। ऐसा लगता है मानो वित्त मंत्री बर्छियों पर धार रख रहे हैं। दस के बरस का बजट करों के नए बोझ वाला, तेल की जलन वाला और महंगाई के नए नाखूनों वाला बजट हो सकता है यानी कि ऊह, आह, आउच! !.. वाला बजट।
करों की कटार
कमजोर याददाश्त जरूरी है, नहीं तो बहुत मुश्किल हो सकती है। जरा याद तो करिए कि कौन सा बजट करों की कील चुभाए बिना गुजरा है? बजट हमेशा नए करों की कटारों से भरे रहे हैं। यह बात अलग है कि वित्त मंत्रियों ने कभी उन्हें दिखाकर चुभाया है तो कभी छिपाकर। यकीन नहीं होता तो यह आंकड़ा देखिए इस दशक के पहले बजट यानी 1999-2000 के बजट से लेकर दशक 2009-10 तक के बजट तक कुल 55,694 करोड़ रुपये के नए कर लगाए गए हैं। यहां तक कि चुनाव के वर्षो में भी करों में ऐसे बदलाव किए गए हैं जो बाद में चुभे हैं। पिछले दस सालों का हर बजट (08-09 के बजट को छोड़कर) कम से कम 2,000 करोड़ रुपये और अधिकतम 12,000 करोड़ रुपये तक का कर लगाता रहा है। इस तथ्य के बाद सपनीले बनाम डरावने बजटों की बहस बेमानी हो जाती है। इन करों के तुक पर तर्क वितर्क हो सकता है, लेकिन करों की कटार बजट की म्यान में हमेशा छिपी रही है। जो कंपनियों से लेकर कंज्यूमर तक और उद्योगपतियों से लेकर आम करदाताओं तक को काटती रही है। यह बजट कुछ ज्यादा ही पैनी कटार लेकर आ सकता है। बजट को करीब से देख रहे लोग बीते साल से सूंघ रहे थे कि दस का बजट सताने वाला होगा, ताजी सूचनाओं के बाद ये आशंकाएं मजबूत हो चली हैं। वित्त मंत्री को न तो दूरसंचार कंपनियों से राजस्व मिला और न सरकारी कंपनियों में सरकार का हिस्सा बेचकर। घाटा ऐतिहासिक शिखर पर पहुंचने वाला है। दादा कितने उदार कांग्रेसी क्यों न हों, लेकिन आखिर राजकोषीय जिम्मेदारी भी तो कोई चीज है? आने वाले बजट में वह इस जिम्मेदारी को हमारे साथ कायदे से बांट सकते हैं। आने वाला बजट न केवल मंदी के दौरान दी गई कर रियायतें वापस लेगा यानी कि करों का बोझ बढ़ाएगा, बल्कि नए करों के सहारे खजाने की सूरत ठीक करने की जुगत भी तलाशेगा। ऐसी स्थितियों में वित्त मंत्रियों ने अक्सर सरचार्ज, सेस और अतिरिक्त उत्पाद शुल्क या अतिरिक्त सीमा शुल्क की अदृश्य कटारें चलाई हैं और काफी खून बहाया है। संभल कर रहिएगा, वित्त मंत्री इन कटारों की धार कोर दुरुस्त कर रहे हैं।
तेल बुझे तीर
कभी आपने यह सोचा है कि आखिर पेट्रो उत्पादों की कीमतें बढ़ने के तीर बजट के साथ ही क्यों चलते हैं? बजट से ठीक पहले ही तेल कंपनियां क्यों रोती हैं, पेट्रोलियम मंत्रालय उनके स्यापे पर मुहर क्यों लगाता है और क्यों बजट की चुभन के साथ तेल की जलन बोनस में मिल जाती है? दरअसल यह एक रहस्यमय सरकारी दांव है। बजट से ठीक पहले तेल कीमतों का मुद्दा उठाना सबके माफिक बैठता है। सरकार के सामने दो विकल्प होते हैं या तो कीमतें बढ़ाएं या फिर तेल कंपनियों के लिए आयात व उत्पाद शुल्क घटाएं। अगर उदारता दिखाने का मौका हुआ तो शुल्क दरें घट जाती हैं और अगर खजाने की हालत खराब हुई तो कीमतें बढ़ जाती हैं। पेट्रो कीमतों के मामले में बरसों बरस से यही होता आया है। तेल कंपनियां व उनके रहनुमा पेट्रोलियम मंत्रालय को अब यह मालूम हो गया है कि उनका मनचाहा सिर्फ फरवरी में हो सकता है। यह महीना वित्त मंत्रियों के लिए भी माफिक बैठता है, क्योंकि वह भारी खर्च वाली स्कीमों के जयगान के बीच सफाई से यह काम कर जाते हैं और कुछ वक्त बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। रही बात तेल मूल्य निर्धारण की नीति ठीक करने की तो उस पर बहस व कमेटियों के लिए पूरा साल पड़ा है। यह तो वक्त बताएगा कि तेल बुझे तीर बजट से पहले छूटेंगे, बजट में या बजट के बाद, लेकिन दर्द का पूरा पैकेज एक साथ अगले कुछ हफ्तों में आने वाला है।
महंगाई का मूसल
इससे पहले तक हम अक्सर बजट के बाद ही यह जान पाते थे कि बजट महंगाई की कीलें कम करेगा या बढ़ाएगा, लेकिन यह बजट तो आने से पहले ही यह संकेत दे रहा है कि इससे महंगाई की आग को हवा और घी दोनों मिलेंगे। कैसे? इशारे इस बात के हैं कि वित्त मंत्री पिछले साल दी गई कर रियायतें वापस लेने वाले हैं। यह सभी रियायतें अप्रत्यक्ष करों यानी उत्पाद व सीमा शुल्कों से संबंधित थीं। मतलब यह कि आने वाले बजट में कई महत्वपूर्ण उत्पादों पर अप्रत्यक्ष कर बढेंगे। अप्रत्यक्ष कर का बढ़ना हमेशा महंगाई बढ़ाता है, क्योंकि कंपनियां बढ़े हुए बोझ को उपभोक्ताओं के साथ बांटती हैं। यानी कि महंगाई को पहला प्रोत्साहन तो दरअसल प्रोत्साहन पैकेज की वापसी से ही मिल जाएगा। साथ ही महंगाई की आग में पेट्रोल भी पड़ने वाला है यानी कि पेट्रो उत्पादों की कीमतें बढ़ने वाली हैं। यह महंगाई की कीलों को आग में तपाने जैसा है। इसके बाद बची खुची कसर सरकार का घाटा पूरा कर देगा। सरकार को अगले साल बाजार से अभूतपूर्व कर्ज लेना होगा। जो कि बाजार में मुद्रा आपूर्ति बढ़ाएगा और महंगाई के कंधे से अपना कंधा मिलाएगा।
करों की कटार के साथ तेल बुझे तीर और ऊपर से महंगाई.. लगता है कि जैसे बजट घायल करने के सभी इंतजामों से लैस होकर आ रहा है। दरअसल मंदी के होम में सरकार ने अपने हाथ बुरी तरह जला लिये हैं। वह अब आपके मलहम नहीं लगाएगी, बल्कि आपसे मलहम लेकर अपनी चोटों का इलाज करेगी। लगता नहीं कि यह बजट अर्थव्यवस्था की समस्याओं के इलाज का बजट होगा, बल्कि ज्यादा संभावना इस बात की है कि इस बजट से सरकार अपने खजाने का इलाज करेगी। जब-जब सरकारों के खजाने बिगड़े हैं तो लोगों ने अपनी बचत और कमाई की कुर्बानी दी है, यह कुर्बानी इस बार भी मांगी जा सकती है अर्थात नया बजट तोहफे देने वाला नहीं, बल्कि तकलीफ देने वाला हो सकता है।

अन्‍यर्थ
http://jagranjunction.com/ (बिजनेस कोच) SATORI

Tuesday, January 5, 2010

बस इतना सा ख्वाेब है

नया साल बहत्तर घंटे बूढ़ा हो चुका है, यानी कि उम्मीदों का टोकरा उतारने में अब कोई हर्ज नहीं हैं। कामनायें और आशायें सर माथे. लेकिन हमारी बात तो अनिवार्यताओं, अपरिहार्यताओं और आकस्मिकताओं से जुड़ी है। यह चर्चा उन उपायों की है जिनके बिना नए साल में काम नहीं चलने वाला, क्यों कि कई क्षेत्रों में समस्यायें, संकट में बदल रही हैं। अगले साल की सुहानी उम्मीदों पर चर्चा फिर करेंगे पहले तो सुरक्षित, शांत और संकट मुक्त रहने के लिए इन उलझनों को सुलझाना जरुरी है। .. दरअसल यह 'दस के बरस' का संकटमोचन या आपत्ति निवारण एजेंडा है। कभी, ताकि सुरक्षा, शांति और संकटों से मुक्ति सुनिश्चित हो सके।

तो खायेंगे क्या ?

कभी आपने कल्पना भी की थी कि आपको सौ रुपये किलो की दाल खानी पड़ेगी। यानी कि उस खाद्य तेल से भी महंगी, जो गरीब की थाली में अब तक सबसे महंगा होता था। भूल जाइये गरीबी हटाने को दावों और हिसाबों को। यह महंगाई गरीबी कम करने के पिछले सभी फायदे चाट चुकी है। खाद्य उत्पादों की महंगाई गरीबी की सबसे बड़ी दोस्त है। दरअसल खेती का पूरा सॉफ्टवेर ही खराब हो गया है। इसका कोड नए सिरे से लिखने की जरुरत है और वह भी युद्धस्तर पर। अगर सरकार को कुछ रोककर भी खेती की सूरत बदलनी पड़े तो कोई हर्ज नहीं है। किसान के सहारे वोटों की खेती तो होती रहेगी लेकिन अगर खेतों में उपज न बढ़ी तो देश की आबादी खाद्य इमर्जेसी की तरफ बढ़ रही है। दस का बरस खाद्य संकट का बरस हो सकता है। एक अरब से ज्यादा लोगों को अगर सही कीमत पर रोटी न मिली तो सब बेकार हो जाएगा।

शहर फट जाएंगे

आपको मालूम है कि इस साल करीब आधा दर्जन नई छोटी कारें भारतीय बाजार में आने वाली हैं। मगर कोई बता सकता है कि वह चलेंगी कहां? शहर फूलकर फटने वाले हैं। पिछले दो दशकों के उदारीकरण ने शहरों को रेलवे प्लेटफार्म बना दिया है। सरकारें गांवों की तरफ देखने का नाटक करती रही और गांव के गांव आकर शहरों में धंस गए। सूरत सुधारने के लिए हर शहर में राष्ट्रमंडल खेल तो हो नहीं सकते लेकिन हर शहर को ढहने से बचने का रास्ता जरुर चाहिए। आबादी के प्रवास से लेकर, शहरी ढांचे की बदहाली व बीमार आबोहवा तक और कानून व्यवस्था की दिक्कतों से लेकर बिजली पानी की जरुरतों तक, शहरों का ताना बाना हर जगह खिंचकर फट रहा है। सिर्फ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलौर ही देश नहीं है। कानपुर, पटना, नासिक, इंदौर, लुधियाना भी देश में ही है। बरेली, जलगांव, भागलपुर, पानीपत भी उतने ही बेहाल हैं। दस का बरस शहरों के लिए नई और बड़ी दिक्कतों का है।

हवा में है खतरा

मतलब पर्यावरण से कतई नहीं है। बात विमानन क्षेत्र की है। अगर हवाई यात्रा करते हों इस साल बहुत संभल कर चलने की जरुरत है। देश का उड्डयन ढांचा चरमरा गया है। पिछले बरस लगभग हर माह कोई बड़ा हादसा हुआ है या होते-होते बचा है। हेलीकॉप्टर गिर रहे हैं, जहाज जमीन पर रनवे छोड़ कर गड्ढों में उतर रहे हैं, पायलट नशे में डूब कर सैकड़ो जिंदगियों के साथ एडवेंचर कर रहे हैं। जहाजों की तकनीकी खराबियां खौफ पैदा करने लगी हैं। विमानों को ऊपर वाला ही मेंटेन कर रहा है। दरअसल पूरा विमानन क्षेत्र एक गंभीर किस्म के खतरे में है और वह भी उस समय जब कि देश में विमान यात्रियों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है और नए हवाई मार्ग खुले हैं। विमानन सेवाओं को सुधारने के लिए पता नहीं किस अनहोनी का इंतजार है। दस के बरस में यहां संकट बढ़ सकता है।

इंसाफ का तकाजा

आर्थिक स्तंभ में न्यायिक सुधारों की चर्चा पर चौंकिये मत? दुनिया में कोई अर्थव्यवस्था चाहे कितनी समृद्ध क्यों न हो, कानून के राज के बिना नहीं चलती। जहां सरकार के मंत्री अदालतों की निष्क्रियता और दागी साख को अराजकता बढ़ने की वजह बता रहे हो वहां कौन निवेशक अदालतों पर भरोसा करेगा। मुश्किल नहीं है यह समझना जिन इलाकों व राज्यों में न्याय और कानून व्यवस्था ठीक है वहां निवेशक अपने आप चले आते हैं। न्यायिक तंत्र में सुधार इसलिए जरुरी है क्यों कि यह लोकतंत्र के अन्य हिस्सों को जल्दी सुधार सकता है। वक्त का तकाजा है कि इंसाफ करने वाला पूरा तंत्र सुधारा जाए और वह भी बहुत तेजी से। यह सिर्फ लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अनिवार्य नहीं है बल्कि आर्थिक प्रगति के लिए भी अपरिहार्य है। .. नया साल अदालतों से बहुत से सवाल करने वाला है।

बस एक पहचान

आखिर इस देश के सभी लोगों को एक पहचान पत्र देने के लिए कितने कर्मचारी और कितना पैसा चाहिए? लाखों बाबुओं की फौज और लाखों करोड़ के बजट वाला यह देश अगर चाहे तो एक या दो साल में पूरी परियोजना लागू नहीं कर सकता? मामला पैसे या संसाधनों का नहीं है, करने की जिद का है। अगर आतंकी हमले न हुए होते तो शायद नागरिक पहचान पत्र को लेकर कोई गंभीर नहीं होता। लेकिन वह संजीदगी भी किस काम की, जो वक्त पर नतीजे न दे सके। सुरक्षा संबंधी चाक चौबंदगी के लिए ही नहीं बल्कि लोगों को एक आधुनिक और वैधानिक पहचान भी चाहिए ताकि वह सरकारी सेवाओं तक और सरकारी सेवायें उन तक पहुंच सकें। यह परियोजना सरकार की इच्छा शक्ति की सबसे बड़ी परीक्षा है। इसमें देरी का नतीजा सिर्फ नुकसान है। दिसंबर में पूछेंगे कि हमें आपको पहचान देने की यह मुहिम फाइलों से कितना बाहर निकली?

नए साल में इस खुरदरे और अटपटे एजेंडे के लिए माफ करियेगा। हम जानते हैं कि यह नूतन वर्ष की रवायती शुभकामनाओं के माफिक नहीं है लेकिन यह हम सबकी उलझनों के माफिक जरुर है जो नए साल की पहली सुबह से ही हमें घेर कर बैठ गई हैं। तो नए साल में सिर्फ इतनी सी ख्वाहिश है कि सुधार अगरचे धीमे हों लेकिन संकटों के इलाज में सरकारें जल्दी दिखायेंगी। यह उम्मीद भी हमने सिर्फ इसलिए की है क्यों कि उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है। इसके बाद इंतजार के अलावा और क्या हो akataa है। ..तुम आए हो, न शबे इंतजार गुजरी है , तलाश में है सहर, बार-बार गुजरी है। (फैज)

Monday, December 28, 2009

बोया पेड़ बबूल का..

पच्चीस रुपये किलो का आलू और चालीस रुपये किलो की चीनी खरीदते हुए किसे कोस रहे हैं आप? बेहतर होगा कि खुद को कोसिए! पहले तो इस बात पर कि आप उपभोक्ता हैं और दुनिया में सरकारें बहुसंख्य उपभोक्ताओं के बजाय मुट्ठी भर उत्पादकों की ज्यादा सुनती हैं और दूसरी बात यह कि आपने ही सरकार को वह 'बहुमद' दिया है, जिसमें मस्त नेताओं के लिए महंगाई अब मुद्दा ही नहीं (नान इश्यू) है। दरअसल हम वक्त पर कभी सही सवाल करते ही नहीं। ..आपने अपने नेता से आखिरी बार कब यह पूछा था कि देश में पिछले चालीस वर्षो में फसलों का रकबा क्यों नहीं बढ़ा, जबकि खाने वाले पेट दोगुने हो गए? या चीन पिछले एक दशक में खेती में नौ फीसदी की विकास दर के साथ कृषि उत्पादों का बड़ानिर्यातक कैसे बन गया और भारत शुद्ध आयातक में कैसे बदल गया? याद कीजिए कि कब और किस चुनाव में उठा था यह सवाल कि भारत में पिछले एक दशक में हर आदमी को कम अनाज (प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता) क्यों मिलने लगा जबकि कमाई बढ़ गई है? या गरीब बांग्लादेश और रेगिस्तानी इजिप्ट (मिस्त्र) के खेत भारत से ज्यादा अनाज क्यों देते हैं? ..यकीन मानिए, आपको छेद रही महंगाई की बर्छियां इन्हीं सवालों से निकली हैं। मंदी आई और गई, शेयर बाजार गिरा और चढ़ा, सरकारें गई और आई मगर इन सबसे बेअसर, जिद्दी महंगाई पिछले दो ढाई साल में हमारे आर्थिक तंत्र में पैबस्त हो गई है। सरकार अब दयनीय विमूढ़ता में है, आयात नामुमकिन है और देश लगभग खाद्य आपातकाल की तरफ मुखातिबहै।
सरासर गलत दिलासे
हम आपको आटा दाल का भाव क्या बताएं? हम तो आपको उन दिलासों की असलियत बताना चाहते हैं जो महंगाई की जिम्मेदारी से बचने के लिए दिए जाते हैं। सरकार का चेहरा छिपाने वाली अंतरराष्ट्रीय पेट्रो कीमतें गिर चुकी हैं, मगर महंगाई चढ़ी हुई है। अब तो इस महंगाई से मुद्रा के प्रवाह का भी कोई रिश्ता नहंी रहा। यह अब तक की सबसे पेचीदा और कडि़यल महंगाई है, जिसे कई अहम क्षेत्रों की लंबी उपेक्षा ने गढ़ा है। भारत ने इससे पहले भी महंगाई के दौर देखे हैं। सत्तर, अस्सी, नब्बे के दशक औसतन सात से नौ फीसदी की महंगाई के थे। 1974-75 में महंगाई 25 फीसदी तक गई थी और 80-81 में 18.2 फीसदी व 91-92 में 13.2 फीसदी तक। लेकिन ताजी महंगाई उनसे फर्क है। 1974 की महंगाई सूखे में खरीफ की तबाही से उपजी थी, जबकि अस्सी की महंगाई को खेती की असफलता व तेल की कीमतों में तेजी ने गढ़ा था। मत भूलिए कि पिछले साल देश में दशक का सबसे अच्छा खाद्यान्न उत्पादन हुआ था, मगर तब भी खाने की कीमतें मार रही थीं और अब जब खरीफ कुछ नरम-गरम रही, तब भी महंगाई का कहर जारी है। भारत में महंगाई अब आम लोगों को मारने के लिए मौसम या दुनिया के बाजार की मोहताज नहीं है। सरकार के नीतिगत अपकर्मो ने उसे बला की ताकत दे दी है।
..आम कहां से खाय
भारतीय कृषि की करुण कथा बहुत लंबी है। हम इसे सुनाना भी नहीं चाहते। आप केवल खेती की चर्चा के जरिए ताजी महंगाई के कांटों की जड़ें देखिए। जिनकी तलाश के लिए कोई खुर्दबीन नहीं चाहिए। हिसाब बड़ा साफ है कि पिछले दो दशकों में देश की आबादी 20 से 24 फीसदी की (1991 में करीब 24 और 2000 में 22 फीसदी) प्रति दशक गति से बढ़ी, मगर अनाज उत्पादन बढ़ने की दर दो दशकों में 11 व 18 फीसदी रही है। भूल जाइए कि अधिकांश सांसद अपना पेशा किसान बताते हैं, भारत में (3124 किग्रा) एक हेक्टेअर जमीन में तो बांग्लादेश (3904 किग्रा) के बराबर भी धान नहीं पैदा होता। गेहूं की प्रति हेक्टेअर उपज में मरुस्थलीय इजिप्ट (6455 किग्रा) हमसे ढाई गुना आगे है। बीस साल में भूखे पेटों की आबादी दोगुना करने वाले देश में कुल बुवाई क्षेत्र तीन दशक से 140 से 141 मिलियन हेक्टेअर पर लटका है। हैरत में पड़ना जरूरी है कि भारत में अनाज की प्रति व्यक्ति वार्षिक उपलब्धता 1991 में 171 किग्रा से घटकर अब 150 किग्रा पर आ गई है। यह बात सिर्फ गेहूं चावल की है। दालें तो वर्षो से पतली हैं। 1.3 अरब पेटों को पाल रहे चीन में प्रति व्यक्ति 404 किग्रा अनाज उपलब्ध है। करीब डेढ़ दशक पहले तक विश्व खाद्य कार्यक्रम के तहत अनाज का दान लेने वाला चीन खेती की सूरत बदल कर दुनिया के अनाज बाजार बड़ा खिलाड़ी बन गया है और आज अनाज उत्पादन बढ़ाने की प्रयोगशाला है। इसके विपरीत भारत खाने की स्थायी किल्लत का केंद्र बनता जा रहा है। भारत ने पिछले दो दशकों में अपने खेतों में बदहाली उगाई और बाजार में मांग। आय, खपत व बाजार बढ़ा मगर पैदावार, खेत, अनुसंधान घट गया। रोटियों की जिद्दोजहद तो होनी ही है।
महंगाई का उदारीकरण
दो दशकों में देश के कुल आर्थिक उत्पादन में खेती का हिस्सा लगभग तीन गुना (52 फीसदी से 18 फीसदी) घट जाना आपको अचरज में नहीं डालता? उगाने वाले और खाने वाले हाथों के बीच संतुलन अब बिगड़ गया है। असंतुलन पहले भी था, मगर तब आय कम थी। उद्योग व सेवा क्षेत्रों के बूते बढ़ी आय ने लोगों को ताजी क्रय शक्ति दे दी है, जिसे वह किल्लत वाले खाद्य बाजार पर चलाकर मांग व आपूर्ति के संतुलन को कायदे से बिगाड़ रहे हैं। उत्पादन कम हो तो उदार बाजार मुश्किलों का सौदा करता है। खाद्य प्रसंस्करण, स्नैक्स और कृषि उपज आधारित मूल्य वर्धित उत्पादों का बाजार अनाज का विशाल व संगठित, नया ग्राहक है। सबको निवाला न दे पाने वाली खेती इन्हें भी आपूर्ति करती है। इन्हें खूब मुनाफा होता है। वक्त के साथ जमाखोरी के ढंग बदल रहे हैं। किल्लत की दुनिया में वायदा बाजार भी खूब चमकता है और मुश्किलें बढ़ाता है। यह महंगाई का उदारीकरण है। खेती में उत्पादक व उपभोक्ता के हितों के बीच संतुलन की बहस अंतरराष्ट्रीय है। भारत की खाद्य अर्थव्यवस्था में उत्पादक घटे हैं, जबकि उपभोक्ता बढ़ रहे हैं। आदर्श स्थिति में नीतियां उपभोक्ताओं के हित में होनी चाहिए क्योंकि उत्पादक भी किसी न किसी स्तर पर उपभोग करता है। लेकिन यहां तो साफ ही नहीं कि खेती की किस्मत लिखने वाली नीतियां किसानों के लिए हैं या उपभोक्ताओं के लिए। अगर पूरी राजनीति खेती के हक में है तो उत्पादकों को बाजार खाद्य सामग्री से भर देने चाहिए। फिर दाल, रोटी, सब्जी की आपूर्ति कम क्यों है? महंगाई क्यों निचोड़ रही है? और अगर खेती का उत्पादन नहीं बढ़ सकता तो फिर आयात खुलना चाहिए जैसा कि दुनिया के कई मुल्क करते हैं। भारत की खाद्य अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता पिसता है और उत्पादक का राजनीतिक इस्तेमाल होता है। .. कोई तीसरा है जो मालामाल होता है? हमने कभी पूछा नही कि यह तीसरा आदमी कौन है?. बस शांति के साथ महंगाई सहने की आदत डाल ली है। तो आइए, खुद को शाबासी तो दीजिए..आने वाली पीढि़यां आपके त्यागकी कथाएं गाएंगी!
anshumantiwari@del.jagran.com