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Saturday, December 31, 2016

कल क्या होगा?

नीति शून्यता (पॉलिसी पैरालिसिस) जवाब नीति रोमांच (पॉलिसी एडवेंचरिज्म)  हरगिज नहीं हो सकता

नोटबंदी के बाद राम सजीवन हर तीसरे दिन बैंक की लाइन में लग जाते हैं, कभी एफडी तुड़ाने तो कभी पैसा निकालने के लिए. फरवरी में बिटिया की शादी कैसे होगी? फ्रैंकफर्ट से भारत के बाजार में निवेश कर रहे एंड्रयू भी नोटबंदी के बाद से लगातार शेयर बाजार में बिकवाली कर रहे हैं.

सजीवन को सरकार पर पूरा भरोसा है और एंड्रयू को भारत से जुड़ी उम्मीदों पर. लेकिन दोनों अपनी पूरी समझ झोंक देने के बाद भी आने वाले वक्त को लेकर गहरे असमंजस में हैं.

सजीवन और एंड्रयू की साझी मुसीबत का शीर्षक है कल क्या होगा?

सजीवन आए दिन बदल रहे फैसलों से खौफजदा हैं. एंड्रयू को लगता है कि सरकार ने मंदी को न्योता दे दिया है, पता नहीं कल कौन-सा टैक्स थोप दे या नोटिस भेज दे इसलिए नुक्सान बचाते हुए चलना बेहतर.

सजीवन मन की बात कह नहीं पाते, बुदबुदा कर रह जाते हैं जबकि एंड्रयू तराशी हुई अंग्रेजी में रूपक गढ़ देते हैं, ''म ऐसी बस में सवार हैं जिसमें उम्मीदों के गीत बज रहे हैं. मौसम खराब नहीं है. बस का चालक भरोसेमंद है लेकिन वह इस कदर रास्ते बदल रहा है कि उसकी ड्राइविंग से कलेजा मुंह को आ जाता है. पता ही नहीं जाना कहां है?"

नोटबंदी से पस्त सजीवन कपाल पर हाथ मार कर चुप रह जाते हैं. लेकिन एंड्रयू, डिमॉनेटाइजेशन को भारत का ब्लैक स्वान इवेंट कह रहे हैं. सनद रहे कि नोटबंदी के बाद विदेशी निवेशकों ने नवंबर महीने में 19,982 करोड़ रु. के शेयर बेचे हैं. यह 2008 में लीमन ब्रदर्स बैंक तबाही के बाद भारतीय बाजार में सबसे बड़ी बिकवाली है.


ब्लैक स्वान इवेंट यानी पूरी तरह अप्रत्याशित घटना. 2008 में बैंकों के डूबने और ग्लोबल मंदी के बाद निकोलस नसीम तालेब ने वित्तीय बाजारों को इस सिद्धांत से परिचित कराया था. क्वांट ट्रेडर (गणितीय आकलनों के आधार पर ट्रेडिंग) तालेब को अब दुनिया वित्तीय दार्शनिक के तौर पर जानती है. ब्लैक स्वान इवेंट की तीन खासियतें हैः

एकऐसी घटना जिसकी हम कल्पना भी नहीं करते. इतिहास हमें इसका कोई सूत्र नहीं देता.
दोघटना का असर बहुत व्यापक और गहरा होता है.
तीनघटना के बाद ऐसी व्याख्याएं होती हैं जिनसे सिद्ध हो सके कि यह तो होना ही था

ब्लैक स्वान के सभी लक्षण नोटबंदी में दिख जाते हैं.

इसलिए अनिश्चितता 2016 की सबसे बड़ी न्यूजमेकर है.

और

नोटबंदी व ग्लोबल बदलावों के लिहाज से 2017, राजनैतिक-आर्थिक गवर्नेंस के लिए सबसे असमंजस भरा साल होने वाला है.

ब्लैक स्वान थ्योरी के मुताबिक, आधुनिक दुनिया में एक घटना, दूसरी घटना को तैयार करती है. जैसे लोग कोई फिल्म सिर्फ इसलिए देखते हैं क्योंकि अन्य लोगों ने इसे देखा है. इससे अप्रत्याशित घटनाओं की शृंखला बनती है. नोटबंदी के बाद उम्मीद थी कि भ्रष्टाचार खत्म होगा लेकिन यह नए सिरे से फट पड़ेगा, बेकारी-मंदी आ जाएगी यह नहीं सोचा था.

नोटबंदी न केवल खुद में अप्रत्याशित थी बल्कि यह कई अप्रत्याशित सवाल भी छोड़कर जा रही है, जिन्हें सुलझाने में इतिहास हमारी कोई मदद नहीं करता क्योंकि ब्लैक स्वान घटनाओं के आर्थिक नतीजे आंके जा सकते हैं, सामाजिक परिणाम नहीं.
  • नोटबंदी के बाद नई करेंसी की जमाखोरी का क्या होगाक्या नकदी रखने की सीमा तय होगीडिजिटल पेमेंट सिस्टम अभी पूरी तरह तैयार नहीं है. क्या नकदी का संकट बना रहेगाकाम धंधा कैसे चलेगा?
  • नई करेंसी का सर्कुलेशन शुरू हुए बिना नए नोटों की आपूर्ति का मीजान कैसे लगेगानकद निकासी पर पाबंदियां कब तक जारी रहेंगी ?
  • नकदी निकालने की छूट मिलने के बाद लोग बैंकों की तरफ दौड़ पडे तो ?
  • कैश मिलने के बाद लोग खपत करेंगे या बचतयदि बचत करेंगे तो सोना या जमीन-मकान खरीद पाएंगे या नहीं.
और सबसे बड़ा सवाल

इस सारी उठापटक के बाद क्या अगले साल नई नौकरियां मिलेंगी? कमाई के मौके बढेंग़े? या फिर 2016 जैसी ही स्थिति रहेगी?

भारत को ब्लैक स्वान घटनाओं का तजुर्बा नहीं है. अमेरिका में 2001 का डॉट कॉम संकट और जिम्बाब्वे की हाइपरइन्क्रलेशन (2008) इस सदी की कुछ ऐसी घटनाएं थीं. शेष विश्व की तुलना में भारतीय आर्थिक तंत्र में निरंतरता और संभाव्यता रही है. विदेशी मुद्रा संकट के अलावा ताजा इतिहास में भारत ने बड़े बैंकिंग, मुद्रा संकट या वित्तीय आपातकाल को नहीं देखा. 

आजादी के बाद आए आर्थिक संकटों की वजह प्राकृतिक आपदाएं (सूखा) या ग्लोबल चुनौतियां (तेल की कीमतें, पूर्वी एशिया मुद्रा संकट या लीमन संकट) रही हैं, जिनके नतीजे अंदाजना अपेक्षाकृत आसान था और जिन्हें भारत ने अपनी देसी खपत व भीतरी ताकत के चलते झेल लिया. नोटबंदी हर तरह से अप्रत्याशित थी इसलिए नतीजों को लेकर कोई मुतमइन नहीं है और असुरक्षा से घिरा हुआ है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सक्रिय राजनेता हैं. वह जल्द से जल्द से कुछ बड़ा कर गुजरना चाहते हैं. हमें मानना चाहिए कि वह सिर्फ चुनाव की राजनीति नहीं कर रहे हैं. पिछले एक साल में उन्होंने स्कीमों और प्रयोगों की झड़ी लगा दी है लेकिन इनके बीच ठोस मंजिलों को लेकर अनिश्चितता बढ़ती गई है. 

2014 में मोदी को चुनने वाले लोग नए तरह की गवर्नेंस चाहते थे जो रोजगार, बेहतर कमाई और नीतिगत निरंतरता की तरफ ले जाती हो. प्रयोग तो कई हुए हैं लेकिन पिछले ढाई साल में रोजगार और कमाई नहीं बढ़ी है. पिछली सरकार अगर नीति शून्यता (पॉलिसी पैरालिसिस) का चरम थी तो मोदी सरकार नीति रोमांच (पॉलिसी एडवेंचरिज्म) की महारथी है.

ब्लैक स्वान वाले तालेब कहते हैं विचार आते-जाते हैं, कहानियां ही टिकाऊ हैं लेकिन एक कहानी को हटाने के लिए दूसरी कहानी चाहिए. नोटबंदी की कहानी बला की रोमांचक है, लेकिन अब इससे बड़ी कोई कहानी ही इसकी जगह ले सकती है जिस पर उम्मीद को टिकाया जा सके. 

क्या 2017 में अनिश्चितता और असमंजस से हमारा पीछा छूट पाएगा?

Sunday, December 4, 2016

कैशलेस कतारों का ऑडिट

स्कीम का एक महीना बीतने से पहले ही टैक्‍स देकर काले धन को सफेद  
करने का मौका देने की जरूरत क्यों आन पड़ी
ह मजाक सिर्फ सरकारें ही कर सकती हैं कि काले धन को नेस्तनाबूद करने के मिशन के दौरान ही कालिख धोने का मौका भी दे दिया जाए. भारत दुनिया का शायद पहला देश होगा जो काला धन रखने वालों को बच निकलने के लिए दो माह में दूसरा मौका दे रहा है और वह भी काले धन की सफाई के नाम पर.

डिमॉनेटाइजेशन ने 8 नवंबर से अब तक इतने पहलू बदले हैं कि सरकार और रिजर्व बैंक भी भूल गए होंगे कि शुरुआत कहां से हुई थी. अलबत्ता टैक्स वाली कलाबाजी बेजोड़ है. स्कीम का एक महीना बीतने से पहले ही काले धन को सफेद (टैक्स चुकाकर) करने का मौका देने की जरूरत क्यों आन पड़ी

दरअसलनोटबंदी के पहले सप्ताह में जो सबसे बड़ी सफलता थीवही अगले कुछ दिनों में चुनौती और असफलता में बदलने लगी. डिमॉनेटाइजेशन के बाद बैंकों में डिपॉजिट की बाढ़ से काली नकदी का आकलन और नोटबंदी का मकसद ही पटरी से उतरने लगा है. रिजर्व बैंक के मुताबिक, 10 से 27 नवंबर तक डिपॉजिट और पुराने नोटों की अदला-बदली 8.44 लाख करोड़ रु. पर पहुंच गई. अपुष्ट आंकड़ों के अनुसार, 30 नवंबर तक डिपॉजिट 11 लाख करोड़ रु. हो गए थे.
  • ·    8 नवंबर को नोटबंदी से पहले बाजार में लगभग 14 लाख करोड़ रु. ऊंचे मूल्य (500/1000) के नोट सर्कुलेशन में थे. यानी कि 30 नवंबर तक 63 से 75 फीसदी नकदी बैंकों में लौट चुकी है.
  • ·        जमा करीब 49,000 करोड़ रु. प्रति दिन से बढ़े हैं. स्कीम 30 दिसंबर तक खुली है. आम लोगों के बीच हुए सर्वे बताते हैं कि अभी करीब 23 फीसदी लोगों ने अपने वैध पुराने नोट बैंकों में नहीं जमा कराए हैं.
  • ·        डिमॉनेटाइजेशन के बाद करीब 30 लाख नए बैंक खाते खुले हैं. 
  • ·        बैंकों से पुराने नोटों का एक्सचेंज बंद हो गया हैइसलिए अब डिपॉजिट ही होंगे. बैंकर मान रहे हैं कि करेंसी इन सर्कुलेशन का 90 फीसदी हिस्सा बैंकों में लौट सकता है.

डिपॉजिट की बाढ़ के दो निष्कर्ष हैः 
एकनकदी के रूप में काला धन था ही नहीं. आम लोगों की छोटी नकद बचत और खर्च का पैसा ही डिपॉजिट हुआ है. इसे बैंकों में लाना था तो इतनी तकलीफ बांटने की क्या जरूरत थी
अथवा
दोबैंकों की मिलीभगत से काला धन  खातों में पहुंच गया है. जन धन खातों के दुरुपयोग की खबरें इस की ताकीद करती हैं.

ध्यान रहे कि नोटबंदी की सफलता के दो पैमाने हैं. एककितना नकद बैंकों के पास आया और कितना बाहर रह कर बेकार हो गया. दोनोटबंदी से हुए नुक्सान के मुकाबले सरकार को कितनी राशि मिली है.
अब एक नजर नुक्सान के आंकड़ों परः
  •     सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसाररोजगारटोल की माफीकरेंसी की छपाई की लागत आदि के तौर पर 1.28 लाख करोड़ रु. का नुक्सान हो चुका है.
  •      इसमें जीडीपी का नुक्सान शामिल नहीं हैजो काफी बड़ा है.
  •      कंपनियों के मुनाफेशेयर बाजार में गिरावटबैंकों के नुक्सान अभी गिने जाने हैं.

प्रक्रिया पूरी होने के बाद रद्द हुई नकदी पर्याप्त मात्रा में नहीं होती है तो नुक्सान का आंकड़ाफायदों के आकलन पर भारी पड़ेगा.

डिपॉजिट की बाढ़ और नुक्सानों का ऊंचा आंकड़ा देखते हुए सरकार के पास पहलू बदलने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. इसलिए काले धन को सफेद करने की नई खिड़की खोली गईजिसके तहत काला धन की घोषणा पर 50 फीसदी कर लगेगा और डिपॉजिट का 25 फीसदी चार साल तक सरकार के पास जमा रहेगा. पकड़े जाने के बाद टैक्स की दर ऊंची हो जाएगी.

इनकम टैक्स की नई कवायद के दो स्पष्ट लक्ष्य दिखते हैः

पहला— बेहिसाब डिपॉजिट पर भारी टैक्स से लोग हतोत्साहित हो जाएंगे और जमा में कमी आएगी. इससे कुछ नकदी बैंकिंग सिस्टम से बाहर रह जाएगी जो कामयाबी में दर्ज होगी.

दूसराअगर डिपॉजिट नहीं रुके तो जमा पर टैक्स और खातों में रोकी गई राशि सफलता का आंकड़ा होगी. 

डिमॉनेटाइजेशन आर्थिक फैसला हैजिसकी तात्कालिक सफलता आंकड़ों से ही साबित होगीवह चाहे नकदी को बैंकिंग से बाहर रखकर हासिल किया जाए या फिर टैक्स से. सरकार को काली नकदी के रद्द होने या टैक्स से मिली राशि का खासा बड़ा आंकड़ा दिखाना होगा जो इस प्रक्रिया से होने वाले ठोस नुन्न्सान (जीडीपी में गिरावटरोजगार में कमीबैंकों पर बोझ) पर भारी पड़ सके.

यह आंकड़ा आने में वक्त लगेगा लेकिन पहले बीस दिनों में नोटबंदी के खाते में कुछ अनोखे निष्कर्ष दर्ज हो गए हैंजिनकी संभावना नहीं थी.
  • ·        भारत का बैंकिंग सिस्टम बुरी तरह भ्रष्ट है. यह सिर्फ कर्ज देने में ही गंदा नहीं है बल्कि इसका इस्तेमाल काले धन की धुलाई में भी हो सकता है. सरकार इसे कब साफ करेगी?
  •    इनकम टैक्स का चाबुक तैयार है. टैक्स टेरर लौटने वाला है और साथ ही भ्रष्टाचार और टैक्स को लेकर कानूनी विवाद भी. 
  •       एक बेहद संवेदनशील सुधार को लागू करते हुए हर रोज होने वाले बदलावों ने लोगों में विश्वास के बजाए असुरक्षा बढ़ाई है.
  •     भारत के वित्तीय बाजार के पास बड़े बदलावों को संभालने की क्षमता नहीं है. नौ लाख करोड़ रु. बैंकों में सीआरआर बनकर बेकार पड़े हैंजिनके निवेश के लिए पर्याप्त बॉन्ड तक नहीं हैं और न ही कर्ज के लिए इसका इस्तेमाल हो सकता है. नई नकदी आने तक इसे लोगों को लौटाना भी संभव नहीं है. यह आम लोगों का उपभोग का खर्च हैअर्थव्यवस्था की मांग है जो बैंक खातों में बेकार पड़ी हैबैंक इसे संभालने की लागत से दोहरे हुए जा रहे हैं जबकि लोग अपनी बचत निकालने बैंकों की कतार में खड़े होकर लाठियां खा रहे हैं.

जरा सोचिएअगर डिमॉनेटाइजेशन न होता तो क्या हम सचाइयों से मुकाबिल हो पातेइसलिए इन तीन निष्कर्षों को नोटबंदी के मुनाफे के तौर पर दर्ज किया जा सकता है

बाकी हिसाब-किताब 30 दिसंबर के बाद.




Sunday, November 20, 2016

नोटबंदी की बैलेंस शीट


यह एक आर्थिक फैसला है इसेे तथ्‍यों में नापना चाहिए और फिलहाल तो इस फैसले के बाद भारत दुनिया की सबसे तेजी से थमती अर्थव्‍यवस्‍था में बदल गया है 

बड़े नोटों का चलन बंद करने के साथ सरकार ने क्‍या इतना बडा निवाला काट लिया है कि अब चबाना मुश्किल पड रहा है ?
क्या प्रधानमंत्री मोदी ने खासे लंबे वक्त में मिलने वाले अनजाने फायदों के बदले मंदी और आम लोगों के लिए मुसीबतें न्‍योत ली हैं?
नोट बंद होने से भारी अफरा तफरी के बाद सरकार भावनात्‍मक और रक्षात्‍मक है। संसद की बहसें हमेशा की तरह तथ्‍यहीन है। जबकि यह एक आर्थिक फैसला है इसेे तथ्‍यों में नापना जरुरी है बोदी बयानबाजियों में नहीं। अपना ही पैसा निकालने में लाइन में लगकर मौत को गले लगाते बदहवास लोग यह जरुर जानना चाहते होंगे कि इस विशाल मौद्रिक बदलाव के फायदेे और नुक्सान क्‍या हो सकते हैं

पहले, तथ्यों पर एक नजर डालते हैं

1. तमाम स्वतंत्र एजेंसियों के अनुसार तकरीबन 20 फीसदी काला धन नकदी में है जबकि बाकी जमीन-जायदाद और जेवर-गहनों की शक्ल में रखा गया है. हालांकि काली नकदी और कम भी हो सकती है
2.  बड़े नोटों का बंद होना केवल उन लोगों को नुक्सान पहुंचाता हे जिन्होंने इस फैसले के वक्त अपनी काली कमाई नकदी की शक्ल में जमा कर रखी थी.
3. देश में जितनी मुद्रा चलन में थी, उसका 80 फीसदी हिस्‍सा अब बेकार हो चुका है। भारत का ज्यादातर व्यापार और खर्च बड़े नोटों में ही होता है. इस लिए नोटों को बदलने के लिए बैंकों या दूसरे विनिमय केंद्रों पर आना होगा.
4. भारत की 11.8 फीसदी अर्थव्यवस्था नकदी के सहारे चलती है. भारत के जीडीपी में नकदी का अनुपात कमोबेश कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बराबर है. जर्मनी के जीडीपी में नकदी का अनुपात 8.7 फीसदी है जबकि फ्रांस में यह 9.4 फीसदी है. जापान में 20.7 फीसदी अर्थव्यवस्था नकदी है.
5. नकद अर्थव्यवस्था में काले और सफेद लेनदेन का जटिल घालमेल है। गैरकानूनी तरीकों से कमाई गई नकदी का इस्तेमाल भी उत्पादक संपत्तियां और मांग पैदा करने के लिए भी किया जाता है. इसलिए  नकद अर्थव्यवस्था दूसरे तरह से समझते हैं।
नकद अर्थव्यवस्था में दो किस्म की नकदी होती है. एक एकाउंटेड या घोषित और दूसरी अनअकाउंटेड। नियमों के तहत दो ही खाते अधिकृत है। नकदी केवल तभी कानूनी बन सकती है जब या तो टैक्स खाते में उसका लेखाजोखा हो या बैंक खाते में. जो भी नकदी इन दोनों खातों से बाहर है उसे अनअकाउंटेडड कहेंगे।
6. काले धन की अर्थव्यवस्था के आकार के बारे में चाहे जो अनुमान हों लेकिन जहां तक नकद अर्थव्यवस्था की बात है, इसे भारतीय रिज़र्व बैंक हरेक तिमाही में अच्छी तरह से मापता और दर्ज करता है. चूंकि आरबीआइ छापे गए हरेक करेंसी नोट का रिकॉर्ड रखता है, इसलिए मनी इन सर्कुलेशन का आंकड़ा, नकद अर्थव्यवस्था की गणना है।

अब करते हैं फायदों का हिसाब  
लगभग दस ग्‍यारह दिन के दर्द के बाद देश यह जानने को बेचैन है कि इस कुर्बानी के फायदे आखिर क्‍या होने वाले हैं। नकद अर्थव्यवस्था के कुछ आंकड़ों से फेंट कर संभावित फायदों का अंदाज लगाया जा सकता है।
 रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2016 तक भारत में 500 और 1000 के नोटों में करीब 14,180 अरब रुपए की नकदी प्रचलन में थी. इसमें से 30 फीसदी यानी 4,254 अरब रुपए की नकदी बैंकों और दूसरी सरकारी एजेंसियों के पास थी जबकि 70 फीसदी यानी 9,926 अरब रुपए आम जनता (मनी विद पब्लिक) के पास थे.

यह लेख लिखे जाने तक करीब 6 लाख करोड़ रुपये बैंकों के पास जमा हो चुके थे

पूरेे अभियान की सफलता इस तथ्‍य पर निर्भर है कि बड़े नोट बंद होने के बाद कितनी नकदी अदला-बदली के लिए वापस आएगी और कितनी नकदी व्यवस्था से गायब हो सकती है?

1978 में इसी तरह के फैसले के बाद 75 फीसदी रकम व्यवस्था में वापस आ गई थी, जबकि बाकी 25 फीसदी नकदी सिसटम से बाहर हो गई थी.

हमारे पास नकदी में काले और सफेद का कोई ठोस आंकड़ा नहीं है फिर भी तमाम आकलनों के मुताबिक 2,500 अरब से 3000 अरब रुपए की रकम शायद नोट बदली के लिए बैंकों तक नहीं आएगी अर्थात यह धन बैंकिंग सिस्‍टम से बाहर हो जाएगा। यह रकम जीडीपी के 2.4 से 3 फीसदी के बीच कहीं हो सकती है।

अलबत्‍ता इधर जब हम इन आंकड़ों से सर खपा रहे थे तभी रिजर्व बैंक ने सरकार को बताया है कि अगर सरकारी छापेखाने तय वक्त से ज्यादा काम करेंगे तब भी गैरकानूनी करार दिये गये 22 अरब नोटों को एक साल का वक्त लगेगा. ऐसे में सरकार को मजबूर होकर करेंसी नोटों के आयात का रास्ता अपनाना पड़ सकता है और पुराने नोटों को बदलने की मियाद को 50 दिनों से आगे बढ़ाना पड़ सकता है.

इसलिए तीन चार माह बाद ही हमें यह पता चलेगा कि आखिर मनी इन सर्कुलेशन का कितना हिस्‍सा बैंकों के पास आया और कितना खत्‍म हो गया। 

फिर भी हम मानकर चल सकते हैं कि:
1. लोगों के पास जो कुल 9.9 लाख करोड़ रुपए की नकदी है, उसमें 7 से 8 लाख करोड़ बैंकों के पास नकदी बदलने के लिए वापस आएंगे
2. चूंकि करेंसी इन सर्कुलेशन आरबीआइ की देनदारी है इसलिए जितना धन वापस नहीं लौटेगा वह रिजर्व बैंक की कमाई होगी।
3. आरबीआइ यह रकम सरकार को निवेश के लिए या लाभांश के तौर पर बांट सकता है या फिर स्वाहा हो चुकी रकम को बेकार मानकर नोटों की आपूर्ति में कमी कर सकता है, जैसा कि 1978 में किया गया था.

आइए अब नुकसानों की गिनती करें

नोट बंद होने से बाजार में मांग और पूरी तरह खत्‍म हो चुकी है। व्‍यापार सुन्‍न पड़ा है और तरलता संकट की वजह से वित्तीय बाजार गिरे हैं और रुपया टूट गया है। बैंकों के सामने रकम के लिए ज्यादा लंबी कतारों ने सरकार को धन निकालने और अदला-बदली के नियमों में ढील देने के लिए मजबूर किया है।

खपत/मांग/ जीडीपी 

1.सरकार के आंकड़ों के मुताबिक भारत के भारत में उपभोग खर्च प्रति माह 2,97,455 रुपए है. इस खर्च में खाना, किराना, ईंधन, बुनियादी सेवाएं, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स के सामान वगैरह सभी कुछ शामिल हैं. नोट बंद होने के बाद पूरी खरीदारी जरुरी चीजों तक सीमित है।

3. ध्‍यान रखें कि भारत में उपभोग खर्च जीडीपी का औसतन 60 फीसदी और है. चूंकि हिंदुस्तान की 11.8 फीसदी अर्थव्यवस्था नकदी के भरोसे चलती है, इसलिए नकदी पर आधारित खपत खत्‍म्‍ाा हो चुकी है. बाजार छह महीने लंबी मंदी और जीडीपी में 0.5 से द फीसदी तक गिरावट की अंदाज लगा रहा है।

कॉरपोरेट
1 उपभोक्‍ता उत्‍पादों कंपनियां अगले तीन से छह महीनों के दौरान बिक्री में जबरदस्त गिरावट से कांप रही हैं। उपभोक्‍ता खपत के सामान बनाने वाली 10 शीर्ष कंपनियां नोटबंदी के बाद से शेयर बाजार में 1.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का बाजार मूल्य गंवा चुकी हैं.
2. मांग लौटने तक नए निवेशों और मार्केटिंग के खर्चों की उम्‍मीद बेमानी है।

बैंकिंग व्यवस्था
1. नया जमा बैंकों के लिए हरगिज खुशखबरी नहीं है। आखिरी गिनती तक बैंकों ने रिवर्स रेपो विंडो के जरिए आरबीआइ में 6 लाख करोड़ रुपये जमा कराये हैं। जिस पर आरबीआइ को उन पर भारी ब्याज चुकाना पड़ेगा तकरीबन 6.2 फीसदी सालाना की दर से।

2. बैंकों ने जमा पर ब्याज दरों में कटौती करना पहले ही शुरू कर दिया है और वे चाहेंगे इस जमा रकमों को जल्दी ही निकाल लिया जाए, क्‍यों कि कर्ज बांटने का धंधा मंदा चल रहा है।

3.  बैंकों के कर्ज रिकवरी में सुस्‍ती आने की संभावना है। ग्रामीण और खुदरा कारोबार में गिरावट के कारण कुछ समय के लिए बैंकों के एनपीए बढ़ सकते हैं। बैंकों को अगले कुछ महीनों के लिए खुदरा/ग्रामीण कर्जों की अपनी अंडरराइटिंग प्रक्रियाओं पर नए सिरे से नजर डालनी होगी और नए कर्ज रोकने होंगे।

4. जब तक यह नकदी संकट खत्म नहीं होता, बैंकों को कर्ज बांटने, वसूली और अन्‍य कामकाज स्थगित रखने पड़ेंगे.

सरकार
1. स्वाहा हो चुके काले धन की शक्ल में कितना धन सरकार को मिलेगा यह अभी पता नहीं लेकिन सरकार को नई मुद्रा की छपाई की लागत के लिए 11,000 करोड़ रुपए की चपत सहनी होगी.

2. राज्य सरकारें जमीन की रजिस्ट्रियों और वैट के संग्रह में कमी आने की वजह से कर संग्रह में गिरावट के लिए कमर कस रही हैं. उत्पादन और बिक्री में ठहराव की वजह से केंद्र को सेवा कर और उत्पाद शुल्क से हाथ धोना पड़ सकता है.

राजनेता हमेशा चौंकाना चाहते हैं लेकिन अर्थव्यवस्था का तकाजा है स्थिरता, ताकि लंबे समय के लिए निवेश किया जा सके। सरकार के फैसलों का सियासी फायदा नुकसान तो चुनावी आंकडों से ही पता चलता है अलबत्‍ता आर्थिक आंकड़े रोज आते हैं और राजनीतिक फैसलों पर फैसला सुनाते हैं। फिलहाल तो नकदी की कमी ने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था में बदल दिया है, हालांकि आखिरी निर्णय अभी आना बाकी है। 
भूल चूक लेनी देनी !





Monday, August 29, 2016

सबसे बड़ी लड़ाई का निर्णायक मोड़


काले धन पर सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति की राय मान कर सरकार खुद को साहसी साबित कर सकती है। 


मेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट कहते थे कि सही क्या है यह जाननेे से कोई फर्क नहीं पड़ताफर्क तो तब आएगा जब सही कदम उठाया जाए. अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ऐसा ही कुछ मानते हैं तो यकीन मानिए कि वक्त उन्हें एक ऐतिहासिक मोड़ पर ले आया है जहां से वे एक बड़े परिवर्तन के सूत्रधार बन सकते हैं. काले धन पर रोकथाम की जद्दोजहद निर्णायक बिंदु पर आ पहुंची है. सुप्रीम कोर्ट की निगहबानी में काले धन की जांच करने वाली विशेष जांच समिति (एसआइटी) ने सिफारिश की है कि तीन लाख रुपए से ऊपर के सभी नगद लेनदेन और 15 लाख रुपए से अधिक नकदी रखने पर पाबंदी लगा देनी चाहिए. यह सिफारिश सरकार के लिए हिम्मत दिखाने का सबसे माकूल मौका हैक्योंकि सुझाव पर अमल के साथ कुछ और कानून बदलते हुए काले धनअपारदर्शिता और राजनैतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे संगठित मिशन प्रारंभ किया जा सकता है.

एसआइटी की सिफारिश मानने में संकोच नहीं होना चाहिए. इसे मोदी सरकार ने ही बनाया था जो सुप्रीम कोर्ट के मातहत काम कर रही है यानी काले धन पर विधायिका व न्यायपालिका में कोई मतभेद नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एम.बी. शाह की अध्यक्षता वाली समिति ने अदालत को सौंपी अपनी पांचवीं रिपोर्ट में कहा है कि नकद लेनदेन और बैंकिंग तंत्र से बाहर नकदी रखने की सीमाएं कानून के जरिए तय होनी चाहिएजिसमें सजा के प्रावधान जरूरी हैं. 15 लाख रुपए से अधिक नकदी की जरूरत पर आयकर विभाग से अनुमति की शर्त होनी चाहिए. स्वाभाविक है कि आयकर कानून में संशोधन के जरिए इसे आसानी से लागू किया जा सकता है.

सिफारिशें क्रांतिकारी हैं और काले धन को लेकर पिछले दो साल में हुए फैसलों की अगली मंजिल तय करती हैं. अचल संपत्ति में 20,000 रु. से ज्यादा के नकद एडवांस पर रोक लग चुकी है. एक लाख रु. से ऊपर की किसी भी खरीद-बिक्री पर परमानेंट एकाउंट नंबर (पैन) दर्ज करना भी अनिवार्य है. आयकर विभाग दो लाख रुपए से ऊपर की ज्वेलरी खरीद पर पैन बताने की शर्त भी लगा चुका है.

वित्तीय सिस्टम पर इन फैसलों का असर नजर आया है. इन कदमों के बाद इस साल मार्च तक बाजार में नकदी का प्रवाह (करेंसी इन सर्कुलेशन) तेजी से बढ़ा था. यही वह नकदी है जिसे हम जेब में रखते हैं. मुद्रास्फीति में कमी और अचल संपत्ति बाजार में सुस्ती के बीच करेंसी इन सर्कुलेशन में बढ़ोतरी बताती है कि पैन की शर्त से बचने के लिए नकद लेनदेन में तेजी आई है. हालांकि यह बैंकों के लिए तात्कालिक तौर पर अच्छा नहीं है लेकिन पैन की शर्त असर कर रही है यह बात जरूर साबित होती है.

नकद लेनदेन पर रोक को कुछ और कानूनी उपायों से जोडऩा जरूरी है. राजनैतिक चंदा भारत में भ्रष्टाचार का आत्मतत्व है. बीजेपी और कांग्रेस से चुनाव आयोग को पहुंचे ताजे ब्योरे के मुताबिकदोनों दलों को 70 फीसदी धन गोपनीय स्रोतों से मिला है. इनका ब्योरा छिपाने के लिए राजनैतिक दल सुप्रीम कोर्ट तक लड़ रहे हैं. 

एसआइटी की सिफारिश मानने के साथ कृषि आय पर इनकम टैक्स के प्रावधान स्पष्ट होने चाहिए ताकि अरबपति और गैर खेतिहर किसान खेती के सहारे नकदी का लेनदेन और टैक्स की चोरी न कर सकें.

नकद लेनदेन की सीमा लागू होने के बाद जमीन-मकान के बाजार का रसायन बदल सकता है. यह काले धन की सबसे बड़ी मंडी हैजहां 50 से 70 फीसदी तक भुगतान नकद होते हैं. नकद भुगतान मकानों की कृत्रिम महंगाई और सरकार को राजस्व में नुक्सान का बड़ा कारण है क्योंकि मकान-जमीन की वास्तविक कीमत उसकी घोषित कीमत की दोगुनी होती है. नकद विनिमय की सीमा तय करने से मकानों की कीमतें 50 फीसदी तक कम हो सकती हैं. नकद लेनदेन को सीमित करने के फैसले से शुरुआती झटके जरूर लगेंगे. मकानजमीनमहंगी कारेंज्वेलरीलग्जरी उत्पाद कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां कारोबार का पहिया नकदी की चिकनाई पर फिसलता है. यहां मांग में शुरुआत में कुछ कमी नजर आएगी लेकिन कालिख की सफाई के लिए इतनी तकलीफ जरूरी है.

नकद लेनदेन सीमित होने के बाद बैंकों को कारोबारी और उपभोक्ता लेनदेन का बहुत बड़ा हिस्सा संभालना होगाइसके लिए ई-बैंकिंग का विस्तार और मजबूती अनिवार्य है. बैंकों को क्रेडित कार्ड जैसी सेवाओं की लागत घटानी होगी ताकि इलेक्ट्रॉनिक भुगतान बोझ न बन जाएं.

एसआइटी की सिफारिश भारत के लिए वही काम कर सकती है जो 1970 में अमेरिका में रीको कानून ने किया था. 1960 का दशक अमेरिका में माफिया आतंक का था. इसी आपाधापी के बीच 1963 में माफिया डॉन जोसफ वेलाची पकड़ा गया. वेलाची ने अमेरिकी सीनेट कमेटी के सामने यह कबूला कि अमेरिका में कोजा नोस्त्रा (अपराधियों की समानांतर सरकार) बन चुकी है.

वेलाची के इस कबूलनामे के बाद सांसद समझ गए कि आर्थिक व सामाजिक अपराध के इस विशाल नेटवर्क के सामने मौजूदा कानून बेकार हैं. अमेरिकी संसद ने कानूनविद् रॉबर्ट ब्लेकी की मदद सेरैकेटियर एनफ्लूएंस्ड ऐंड करप्ट ऑर्गेनाइजेशंस (रीको) ऐक्ट बनाया जो मारियो पुजो के क्लासिक उपन्यास गॉड फादर (1969) के प्रकाशन के ठीक साल भर बाद पारित हुआ. रीको कानून लागू होने के बाद माफिया के खात्मे की कथाएं अमेरिकी इतिहास का सबसे रोमांचक हिस्सा हैं. कानून इतना सख्त है कि पोंजी स्कीम चलाने वाले बर्नार्ड मैडाफ को 150 साल की सजा (2009) और मेक्सिको की खाड़ी में तेल रिसाव (2010) से हर्जाना वसूलने में भी इसका इस्तेमाल हुआ है. 



काला धन में सभी आर्थिक अपराधों की जड़ है. नकद लेनदेन और नकदी रखने की सीमा तय करने की सिफारिश भारत में आर्थिक अपराधों का रीको मूमेंट बन सकती है. सरकार अगर साहस दिखाए तो कालिख के तमाम ठिकानों पर नकेल डालना मुमकिन है जो तमाम कारोबारोंजमीन-जायदाद से लेकर राजनैतिक दलों के चंदे तक फैले हैं. यह शायद भारत का सबसे महत्वपूर्ण सफाई अभियान होगाजिस की प्रतीक्षा दशकों से की जा रही है.

Tuesday, May 24, 2016

असर तो है मगर !


काले धन पर रोक की कोशिशों के शुरुआती नतीजे नकारात्‍मक हैं लेकिन सरकार ने उन पर टिके रहने की हिम्‍मत दिखाई है 

जोखिम उठाए बिना बड़े तो दूर, छोटे बदलाव भी संभव नहीं हैं, कम से कम गवर्नेंस पर यह पुरानी सूझ पूरी तरह लागू होती है. दो साल की लानत-मलामत के बाद मोदी सरकार अंततः नपे-तुले जोखिम लेने लगी है. हमारा संकेत उन कदमों की तरफ है जो काले धन की अर्थव्यवस्था पर रोक को लेकर पिछले एक साल में उठाए गए हैं. हालांकि उनके शुरुआती नतीजे नकारात्मक रहे हैं लेकिन इसके बावजूद सरकार ने उन पर टिके रहने की हिम्मत दिखाई है.  वित्तीय पारदर्शिता को लेकर पिछले एक साल में तीन बड़े फैसले हुए, जो नकद लेन-देन सीमित करने, सर्राफा बाजार को नियमों में बांधने और शेयर बाजार के जरिए काले धन की आवाजाही पर सख्ती करने से जुड़े हैं. इन तीनों कदमों के प्रारंभिक नतीजे वित्तीय और राजनैतिक चुनौती बनकर सामने आए लेकिन शुक्र है कि सरकार ने प्रॉविडेंट फंड की तरह कोई पलटी नहीं मारी और जोखिम से जूझने की हिम्मत दिखाई है.
इस साल अप्रैल में आए रिजर्व बैंक के एक आंकड़े ने बैंकों और अर्थशास्त्रियों का सिर चकरा दिया. रिजर्व बैंक ने बताया कि वित्तीय सिस्टम में नकदी का प्रवाह अचानक तेजी से बढ़ा है, जिसे तकनीकी शब्दों में करेंसी इन सर्कुलेशन कहा जाता है. यही वह नकदी है जिसे हम जेब में रखते हैं. 20 मार्च, 2016 तक मौद्रिक प्रणाली में नकदी का स्तर 16.7 खरब (ट्रिलियन) रुपए पहुंच गया जो पिछले साल मार्च में 14.8 खरब (ट्रिलियन) पर था. यह बढ़ोतरी करीब 2 खरब (ट्रिलियन) रु. की है. 2015-16 में करेंसी इन सर्कुलेशन की वृद्धि दर 15.4 फीसदी दर्ज की गई जो पिछले साल केवल 10.7 फीसदी थी. सिर्फ यही नहीं, अप्रैल, 2015 से जनवरी, 2016 के बीच एटीएम से निकासी में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज किए जाने के आंकड़ों ने इस नकद कथा के रहस्य को और गहरा दिया.
नकदी में बढ़ोतरी पर रिजर्व बैंक गवर्नर को भी हैरत हुई. अर्थव्यवस्था में ऐसा कोई कारण नहीं था जो ऐसा होने की वजह बनता. मुद्रास्फीति न्यूनतम स्तर पर है, बाजार में मांग नदारद है, अचल संपत्ति का कारोबार ठप है तो फिर लोग कैश लेकर क्यों टहल रहे हैं? खास तौर पर उस दौर में जब इलेक्ट्रॉनिक और मोबाइल बैंकिंग गति पकड़ रही है और सरकार भी बैंकिंग सिस्टम के जरिए ही लोगों को सब्सिडी पहुंचाने की कोशिश में है.
बैंकिंग विशेषज्ञ इशारा कर रहे हैं कि बड़े नकद लेन-देन पर सख्ती, सिस्टम में नकदी बढ़ने की प्रमुख वजह हो सकती हैं. पिछले बजट में अचल संपत्ति सौदों में 20,000 रु. से ज्यादा के नकद एडवांस पर रोक लगा दी गई थी और एक लाख रु. से ऊपर की किसी भी खरीद-बिक्री पर पैन (इनकम टैक्स का परमानेंट एकाउंट नंबर) दर्ज करना भी अनिवार्य किया गया था. इस साल जनवरी में आयकर विभाग ने किसी भी माध्यम से दो लाख रु. से अधिक के लेन-देन पर पैन का इस्तेमाल जरूरी बना दिया और गलत पैन नंबर पर सात साल तक की सजा अधिसूचित कर दी. इसके साथ ही दो लाख रुपए से ऊपर की ज्वेलरी खरीद पर भी पैन बताने की शर्त लगा दी गई. इन फैसलों ने काले धन की नकद अर्थव्यवस्था पर चोट की है. रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, सिस्टम में नकदी की बढ़ोतरी नवंबर, 2015 से शुरू हुई जो, जनवरी, 2016 में काले धन पर सख्ती के आदेश लागू होने तक सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई, यानी लोग सख्ती से बचने के लिए नवंबर से नकदी जुटाने में लग गए थे.
नकद कारोबार कालेधन को सफेद करने का बड़ा जरिया है जिसे रोकने की कोशिशें असर तो कर रही हैं लेकिन इसका शुरुआती बुरा प्रभाव बैंकों पर पड़ा है, जहां जमा की वृद्धि दर 50 साल के सबसे निचले स्तर पर है. कारोबारी लेन-देन का बड़ा हिस्सा बैंकों से बाहर होता दिख रहा है. सरकार ने बैंक जमा घटने का जोखिम उठाते हुए नकद लेन-देन पर सख्ती बरकरार रखी है लेकिन अब बैंकों में जमा को प्रोत्साहन देने की जरूरत है क्योंकि बैंक भारी दबाव में हैं.

2010 में काले धन पर संसद में पेश श्वेत पत्र में सरकार ने माना था कि सोने और आभूषण कारोबार का एक बहुत बड़ा हिस्सा सरकारी तंत्र की नजरों से ओझल रहता है. यह कारोबार, अचल संपत्ति के बाद भारत में काले धन का सबसे बड़ा ठिकाना है. इस पर टैक्स की दर न्यूनतम है इसलिए यह धंधा गांवों तक फैला है. वित्त मंत्री ने इस बजट में जब सोने के आभूषणों पर एक फीसदी की एक्साइज ड्यूटी लगाई तो मकसद राजस्व जुटाना नहीं बल्कि इस कारोबार को टैक्स की रोशनी में लाना था.
इस फैसले के बाद हड़ताल हुई जो व्यापक राजनैतिक नुक्सान की वजह बनी, क्योंकि आभूषण कारोबारी बीजेपी के पारंपरिक वोटर हैं, लेकिन वित्त मंत्री ने इस जोखिम के बावजूद न केवल फैसला कायम रखा बल्कि स्वीकार किया कि देश में सोने-चांदी पर टैक्स की दर अनुचित रूप से कम है. इस सख्ती का नतीजा है कि सोने-चांदी के कारोबार पर ग्राहक (ज्वेलरी खरीद पर पैन का नियम) और विक्रेता (एक्साइज ड्यूटी) दोनों तरफ से शिकंजा कस गया है.
तीसरा बड़ा फैसला बीते सप्ताह हुआ है, जब सरकार ने दोहरा कराधान टालने की संधि को सख्त करते हुए दुरुपयोग के रास्ते सीमित करने पर मॉरिशस से सहमति बनाई. भारत में टैक्स से बचने के लिए मॉरिशस के जरिए शेयर बाजारों में बड़ा निवेश होता है, जिसमें बड़े पैमाने पर काले धन की आवाजाही होती है. कर संधियों का दुरुपयोग रोकने और उन्हें पारदर्शी बनाने की कोशिशें काफी समय से लंबित थीं. भारत ने करीब 80 देशों के साथ ऐसी संधियां की हैं जिन्हें आधुनिक बनाया जाना है. संधियों को बदलने का फैसला तात्कालिक तौर पर देश के शेयर बाजार में निवेश को प्रभावित करेगा लेकिन सरकार ने इस जोखिम को स्वीकार करते हुए यह ऑपरेशन शुरू किया है.

काले धन को लेकर बेसिर-पैर के चुनावी वादे पर फजीहत झेलने के बाद मोदी सरकार ने ठोस कदमों के साथ आगे बढ़ने का साहस दिखाया है, जो पिछले दो साल की कम चर्चित लेकिन प्रमुख उपलब्धि है. उम्मीद की जानी चाहिए कि यह संकल्प आगे बना रहेगा, क्योंकि काले धन से लड़ाई लंबी और पेचीदा है जिसमें कई आर्थिक और राजनैतिक चुनौतियां सरकार का इंतजार कर रही हैं.