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Sunday, November 13, 2022

महंगाई ज्‍यादा बुरी है या मंदी ?


 

 

  

एक्‍शन सिनेमा के शौकीन 2009 की फिल्‍म वाचमेन को नहीं भूल सकते.  यह दुविधा और असमंजस का सबसे रोमांचक फिल्‍मांकन है 1980 का दशक अमेरिका में कॉमिक्‍स के दीवानेपन का दौर था. लोग ब्रिट‍िश कॉमिक लेखक एलन मूर के दीवाने थे जिन्‍होंने कॉमिक्‍स की दुनिया को कुछ सबसे मशूर चरित्र दिये. यह मूवी एलन मूर की प्रख्‍यात कॉमिक्‍स वाचमेन पर आधारित थी जिसे फिल्‍म हालीवुड के स्‍टार एक्‍शन फिल्‍म प्रोड्यूसर लॉरेंस गॉर्डन ने बनाया था जो ब्रूस विलिस की एतिहा‍स‍िक फिल्‍म डाइ हार्ड के निर्माता भी थे.

वाचमेन मूवी का खलनायक ओजिमैंड‍ियास कुछ एसा करता है जिसे सही ठहराना जितना मुश्‍क‍िल है. वह गुड विलेन है यानी अच्‍छा खलनायक. उतना ही उसे गलत ठहराना. विज्ञान, न्‍यूक्‍लियर वार और एक्‍शन पर केंद्रित इस मूवी में मानव जाति‍ को नाभिकीय तबाही से बचाने के लिए ओजिमैंड‍ियास दुनिया के अलग हिस्‍सों में बड़ी तबाही बरपा करता है और नाभिकीय हमला टल जाता है. इस मूवी का प्रसि‍द्ध संवाद नाइट आउल और ओजिमैंडिआस के बीच है.

नाइट आउल - तुमने लाखों को मरवा दिया

ओजिमैंडिआस अरबों लोगों को बचाने के लिए

केंद्रीय बैंक यानी गुड विलेन

दुनिया के केंद्रीय बैंक भी गुड विलेन बन गए हैं. उन्‍होंने महंगाई को मारने के लिए ग्रोथ को मार दिया है. यानी मंदी बुला ली है.

लेक‍िन क्‍या उन्‍होंने सही किया है.

कैसे तय हो कि  महंगाई ज्‍यादा बुरी शय है या मंदी ज्‍यादा बुरी बला?

तो अब हम आपको सीधे बहस के बीचो बीच ले चलते हैं इसके बाद तो फिर  जाकी रही भावना जैसी

महंगाई सबसे बड़ी बुराई

इत‍िहास गवाह है कि महंगाई आते ही मौद्रिक नियामकों के तेवर बदल जाते है. हर कीमत पर अर्थव्‍यवस्‍था की ग्रोथ में सस्‍ते कर्ज का ईंधन डालने वालने बैंकर बला के क्रूर हो जाते हैं. यूरोप को देख‍िये मंदी न आए यह तय करने के लिए बीते एक दशक से ब्‍याज दर शून्‍य पर रखी गई लेक‍िन अब महंगाई भड़की तो मंदी का डर का खत्‍म हो गया.

यूरोप और अमेरिका जहां वित्‍तीय निवेश की संस्‍कृति भारत से ज्‍यादा मजबूत है वहां महंगाई के खतरे के प्रति गहरा आग्रह है. मंदी को उतना बुरा नहीं माना जाता. महंगाई का खौफ इसलिए बड़ा है क्‍यों कि वेतनों में बढ़ोत्‍तरी की गति सीमित रहती है. इसलिए जब भी कीमतें बढ़ती हैं जो जिंदगी जीने की लागत बढ़ जाती है. खासतौर पर उनके लिए जिनकी आय सीम‍ित है

हमारे पास जो भी है और उसकी जो भी कीमत है, महंगाई उस मूल्‍य को कम कर देती है. लोग याद करते हैं कि 1970 की महंगाई ने अमेरिका के लोगों को क्रय शक्‍ति (पर्चेज‍िंग पॉवर) का नुकसान 1930 की महामंदी से ज्‍यादा था.

महंगाई को मंदी के मुकाबले ज्‍यादा घातक यूं भी कहा जाता क्‍यों ि‍क यह पेंशनर और युवाओं दोनों को मारती है. जिंदगी जीने के लागत बढ़ने से युवाओं की बचत का मूल्‍य घटता है जो उनके सपनों पर भारी पड़ता है जैसे कि अगर कोई तीन साल बाद मकान लेना चाहता है तो महंगाई से उसकी लागत बढ़ाकर उसे पहुंच से बाहर कर दिया. इधर ब्‍याज या पेंशन पर गुजारा करने वाले रिटायर्ड की सीम‍ित आय महंगाई के सामने पानी भरती है.

महंगाई बचत की दुश्‍मन है और बचत टूटने से अर्थव्‍यवस्‍था का भविष्‍य संकट में पड़ता है अलबत्‍ता सरकारों को महंगाई से फर्क नहीं पड़ता क्‍यों कि आज के खर्च के लिए वह जो कर्ज दे रहें उसे आगे कमजोर मुद्रा में चुकाना होता है लेक‍िन न‍िवेशकों और उद्योगों की मुश्‍किल पेचीदा हो जाती है.

सरकारें मंदी से नहीं महंगाई से डरती हैं क्‍यों? 

महंगाई के बीच यह तय करना मुश्‍क‍िल होता है कि किसकी मांग बढ़ेगी और किसकी कम होगी. मांग आपूर्ति का पूरा गणित ध्‍वस्‍त! एसे में निवेशक और उद्योग गलत जगह निवेश कर बैठते हैं जिनमें महंगाई के बाद मांग टूट जाती है.

महंगाई खुद को ही ताकत देती है. कीमत बढ़ने से डर से लोग जरुरत से ज्‍यादा खरीदते हैं. बाजार में पूंजी ज्‍यादा हो तो महंगाई को और ईंधन. यही वजह है कि बैंक पूंजी की प्रवाह सिकोड़ते हैं.

पूरी दुनिया की सरकारें महंगाई को संभालने में मंदी से ज्‍यादा मेहनत इसल‍िए करती हैं कि महंगाई बढ़ते ही वेतन बढ़ाने का दबाव बनता है. इस वक्‍त यूरोप और लैटिन अमेरिका में यही हो रहा है. 1970 में महंगाई के दबाव कंपनियों को वेतन बढ़ाने पड़े और स्‍टैगफ्लेशन आ गई.

स्‍टैगफ्लेशन यानी उत्‍पादन में गिरावट और महंगाई दोनों एक साथ होना सबसे बुरी बला है. मंदी से ज्‍यादा बुरी बला क्‍यों कि नियामक मानत‍े हैं कि मंदी लंबी नहीं चलती. हाल के दशकों में तो यह एक दो साल से ज्‍यादा उम्रदराज नहीं होती.

 

कर्ज महंगा होने से संपत्‍त‍ियों की कीमत टूटती हैं और अंतत: अर्थव्‍यवस्‍था में कम कीमत पर नई खरीद आती है. मंदी से रोजगारों पर असर पड़ता है लेक‍िन महंगाई को सबसे बुरी बला मानने वाले कहते हैं कि वह अस्‍थायी है. महंगाई में नए रोजगार नहीं आते और जो हैं उनकी कमाई घटती जाती हैं

बैंकर यह मानते हैं कि मंदी दूर सकती है लेक‍िन महंगाई एक बार लंबी हो जाए तो फिर मुश्‍क‍िल से काबू आती है क्‍यों कि इसके बढ़ते जाने की धारणा इसे ताकत देती है. यह वजह है कि पूरा नियामक समुदाय महंगाई का लक्ष्‍य तय करता है और इसके बढ़ने पर हर कीमत पर इसे रोकने लगता है.

मंदी ज्‍यादा बुरी है

मंदी के पक्ष में भी तर्क कम नहीं है

2007 के बाद वाली मंदी, से हुआ नुकसान महंगाई की तुलना में कहीं ज्‍यादा है. तभी तो शेयर न‍िवेशक जो कर्ज महंगा करने वाले केंद्रीय बैंकों को बिसूर रहे हैं.

यह धारणा गलत है कि महंगाई पूरी अर्थव्‍यवस्‍था को प्रभाव‍ित करती है जबकि मंदी अस्‍थायी तौर पर केवल रोजगारों में कमी करती है. उनका तर्क है कि मंदी पूरी अर्थव्‍यवस्‍था में कमाई कम कर देती है. सभी संसाधनों मसलन पूंजी, श्रम आदि का इस्‍तेमाल क्षमता से कम हो जाता है. 2007 से 2009 की मंदी के दौरान दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍था को करीब 20 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ जो पूरी दुन‍िया के एक साल के कुल आर्थ‍िक उत्‍पादन से ज्‍यादा था. उसके बाद दुनिया की विकास दर में कभी पहले जैसी तेजी नहीं आई.

महंगाई से कहां कम होती कमाई ?  

महंगाई रोकने के लिए बैंकों कर्ज महंगा करो मुहिम के खिलाफ यह तर्क दिये जा रहे हैं कि महंगाई सकल आय (सभी कारकों को मिलाकर) कम नहीं करती. एक व्‍यक्‍ति की बढी हुई लागत दूसरे की इनकम है भाई. कच्‍चा तेल महंगा हुआ तो कंपनियों की आय बढ़ी. कीमतें बढती हैं तो किसी न किसी की आय भी तो बढती है. यह आय का पुर्नव‍ितरण है. जैसे महंगाई के साथ कंपनियों की बढ़ती कमाई और उस पर शेयर धारकों का बेहतर रिटर्न. अरे महंगाई से तो राष्‍ट्रीय आय बढती है क्‍यों कि सरकारों का टैक्‍स संग्रह ज्‍यादा होता है.

महंगाई न हो तो इनकम का यह नया बंटवारा करेगा कौन? कुछ लोगों को लगता है कि महंगाई की तुलना में वेतन मजदूरी की वृद्ध‍ि दर कम है लेक‍िन जैसे ही मंदी के वजह रेाजगार घटती है वेतन बढ़ोत्‍तरी के बजाय कमी होने लगती है क्‍यों कि ज्‍यादा लोग बाजार में काम मांग रहे होते हैं. दरअसल मंदी को न केवल बेकारी लाती है बल्‍क‍ि जो काम पर है उनकी कमाई की संभावना को भी सीमित कर देती है.

मंदी से ज्‍यादा बुरा बताने वाले कहते हैं कि केंद्रीय बैंकों को एकदम ब्‍याज दरों में तेज बढ़त नहीं करनी चाहिए बल्‍क‍ि महंगाई को धीरे धीरे ठंडा होने देना चाहिए. क्‍यों कि इतिहास बताता है कि महंगाई घाव तात्‍कालिक होते हैं मंदी का घाव वर्षों नहीं भरता.

 

महंगाई और मंदी के बीच चुनाव जरा मुश्‍क‍िल है ?

पुराने अर्थशास्‍त्री  महंगाई के राजनीतिक अर्थशास्‍त्र एक सूत्र बताते हैं

दरअसल बीते डेढ दशक में दुनिया में महंगाई नहीं आई. सस्‍ते कर्ज के सहारे समृद्ध लोगों ने खूब कमाई की. स्‍टार्ट अप से लेकर शेयर तक धुआंधार निवेश किया. यही वह दौर था जब दुनिया में आय असमानता सबसे तेजी से बढी.

 

 

 

 

इस असमानता कम करने के दो ही तरीकें या तो वेतन बढ़ाये जाएं अध‍िकांश लोगों की आय बढ़े, जो अभी संभव नहीं है तो फिर दूसरा तरीका है कि शेयर, अचल संपत्‍ति‍, सोना जैसी संपत्‍त‍ियां जहां ससती पूंजी लगाई गई है उनकी कीमतों में कमी हो ताकि असमानता दूर हो सके.

महंगाई इन संपत्‍ति‍यों कीमत करती है और इसलि‍ए निवेशकों को सबसे ज्‍यादा नुकसान होता है. अब आप चाहें तो कह सकते कि केंद्रीय बैंक दरअसल महंगाई कम कर के दरअसल निवेशकों को हो रहा नुकसान कम करना चाहते हैं. दूसरा पहलू यह भी होगा कि इस कमी से आम लोगों की कमाई में परोक्ष कमी भी तो बचेगी.

 

भारत को महंगाई और आर्थ‍िक सुस्‍ती दोनों साथ लंबा वक्‍त गुजारने का तजुर्बा है लेक‍िन इस बहस में आप तय कीजिये महंगाई ज्‍यादा बुरी है या मंदी


Wednesday, December 22, 2021

ये क्‍या हुआ, कैसे हुआ !


 कंपन‍ियां, बैकों का कर्ज चुका कर हल्‍की हो रही हैं और आम परिवार कर्ज में डूब कर जिंदगी खत्‍म कर रहे हैं. छोटे उद्यमी आत्‍महत्‍या चुन रहे हैं और बड़ी कंपन‍ियां अधिग्रहण कर रही हैं गुरु जी अखबार किनारे रखकर कबीर की उलटबांसी बुदबुदा उठे ... एक अचंभा देखा भाई, ठाढ़ा सिंघ चरावे गाई... 

इसी बीच उनके मोबाइल पर आ गि‍री वर्ल्‍ड इनइक्‍व‍िल‍िटी रिपोर्ट, जिसे मशहूर अर्थविद तोमा प‍िकेटी व तीन अर्थव‍िदों ने बनाया है. रिपोर्ट चीखी, आय असमानता में भारत दुन‍िया में सबसे आगे न‍िकल रहा है. एक फीसदी लोगों के पास 33 फीसदी संपत्‍ति‍ है सबसे नि‍चले दर्जे वाले  50 फीसदी वयस्‍क लोगों की औसत सालाना कमाई केवल 53000 रुपये है.

गुरु सोच रहे थे कि काश, भारतीय पर‍िवारों, को कंपन‍ियों जैसी कुछ नेमत मिल जाती !

यद‍ि आपको कंपन‍ियों और पर‍िवारों की तुलना असंगत लगती है तो  याद  कीजिये भारत में आम लोग कोविड के दौरान क्‍या कर रहे थे और क्‍या हो रहा था कंपनियों में? लोग अपने जेवर गिरवी रख रहे थे, रोजगार खत्‍म होने से बचत खा रहे थे या कर्ज उठा रहे थे और दूसरी तरफ कंपन‍ियों को स‍ितंबर 2020 की तिमाही में 60 त‍िमाहियों से ज्‍यादा मुनाफा हुआ था

महामारी की गर्द छंटने के बाद हमें दि‍खता है क‍ि भारत की  कारपोरेट और परिवार यानी हाउसहोल्‍ड अर्थव्‍यवस्थायें एक दूसरे की विपरीत दि‍शा में चल रही हैं. यानी असमानता की दरारों में पीपल के नए बीज.

किसने कमाया क‍िसने गंवाया

वित्‍त वर्ष 2020-21 में जब जीडीपी, कोवडि वाली मंदी के अंधे कुएं में गिर गया तब शेयर बाजार में सूचीबद्ध भारतीय कंपन‍ियों के मुनाफे र‍िकार्ड 57.6 फीसदी बढ़ कर 5.31 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गए. जो जीडीपी के अनुपात में 2.63 फीसदी है यानी (नकारात्‍मक जीडीपी के बावजूद) दस साल में सर्वाध‍िक.

यह बढत जारी है. इस साल की पहली छमाही का मुनाफा बीते बरस के कुल लाभ 80% है. कंपन‍ियों के प्रॉफ‍िट मार्ज‍िन 10.35 फीसदी की रिकार्ड ऊंचाई पर हैं.

पर‍िवारों की अर्थव्‍यवस्‍थाओं के ल‍िए बीता डेढ़ साल सबसे भयावह रहा. रिकार्ड बेरोजागारी की मार से लगभग 1.26 करोड़ नौकर‍ीपेशा काम गंवा बैठे. भारत में लेबर पार्टीस‍िपेशन दर ही 40 से नीचे चली गई यानी लाखों लोग रोजगार बाजार से बाहर हो गए. जबक‍ि 2020-21 के पहले छह माह में सभी (शेयर बाजार सहितकंपनियों के मुनाफे करीब 24 फीसद बढ़े अलबत्ता वेतन में बढ़ोतरी नगण्य थी (सीएमआईई)

सीएसओ के मुताबिक 2020-21 में प्रति व्यक्ति आय 8,637 रुपए घटी हैनिजी और  असंगठित क्षेत्र में बेरोजगारी और वेतन कटौती के कारण आयमें 16,000 करोड़ रुपए की कमी आई है. (एसबीआइ रिसर्च)

कमाई के आंकड़ों की करीबी पड़ताल बताती है क‍ि अप्रैल से अगस्‍त 2021 के बीच भी गांवों में गैर मनरेगा मजदूरी में कोई खास बढत नहीं हुई. 2020 का साल तो मजदूरी थी ही नहीं, केवल मनरेगा में काम मिला था.

इस बीच आ धमकी महंगाई. नोटबंदी के बाद से वेतन मजदूरी में बढ़ोत्‍तरी महंगाई से पिछड़ चुकी थी. कोव‍िड के दौरान लोगों ने उपचार पर न‍ियम‍ित खर्च के अलावा 66000 करोड़ रुपये किये. उपभोग खर्च में स्वास्थ्य का हिस्‍सा पांच फीसदी के औसत से बढ़कर एक साल में 11 फीसद हो गया. पेट्रोल डीजल की महंगाई के कारण सुव‍िधा बढ़ाने वाले उत्‍पाद सेवाओं पर खर्च बीते छह माह में करीब 60 फीसद घटा द‍िया (एसबीआइ रिसर्च)

किस्‍सा कोताह क‍ि बाजार में कहीं मांग नहीं थी. लेक‍िन इसके बाद भी कंपनियों ने रिकार्ड मुनाफे कमाये तो इसलिए क्‍यों क‍ि उन्‍हें 2018 में कर रियायतें मिलीं, खर्च में कमी हुई, रोजगारों की छंटनी और मंदी के कारण कमॉडिटी लागत बचत हुई इसलिए शेयर बाजारों में जश्‍न जारी है.

गुरु ठीक ही सोच रहे हैं क‍ि काश कम से कुछ आम भारतीय पर‍िवार इन कंपन‍ियों से जैसे हो जाते. 

कौन डूबा कर्ज में

बीते दो साल में जब सरकार के इशारे पर रिजर्व बैंक जमाकर्ताओं से कुर्बानी मांग रहा था यानी कर्ज सस्‍ता कर रहा था और जमा पर ब्‍याज दर घट रही थी तब मकसद यही था कि सस्‍ता कर्ज लेकर कंपन‍ियां नि‍वेश करेंगी, रोजगार मिलेगा और कमाई बढ़ेगी लेकिन हो उलटा हो गया.

कोविड कालीन मुनाफों का फायदा लेकर शीर्ष 15 उद्योगों की 1000 सूचीबद्ध कंपन‍ियों ने वित्‍त वर्ष 2021 अपने कर्ज में 1.7 लाख करोड़ की कमी की. इनमें भी रिफाइन‍िंग, स्‍टील, उर्वरक, कपड़ा, खनन की कंपनियों बड़े पैमानों पर बैंकों को कर्ज वापस चुकाये.. यहीं से सबसे ज्‍यादा रोजगारों की उम्‍मीद थी और जहां न‍िवेश हुआ ही नहीं.

कैपिटल लाइन के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 20 से मार्च 21 के बीच  भारत के कारपोरेट क्षेत्र का सकल कर्ज करीब 30 फीसदी घट गया. शुद्ध कर्ज में 17 फीसदी कमी आई.

तो फिर कर्ज में डूबा कौन ? वही पर‍िवार जिनके पास कमाई नहीं थी.

कोविड से पहले 2010 से 2019 में परिवारों पर कुल कर्ज उनकी खर्च योग्य आय के 30 फीसद से बढ़कर 44 फीसद हो चुका था (मोतीलाल ओसवाल रि‍सर्च)

कोव‍िड के दौरान 2020-21 में भारत में जीडीपी के अनुपात में पर‍िवारो का कर्ज 37.3 फीसदी हो गया जो इससे पहले साल 32.5 फीसदी था. जबकि जीडीपी के अनुपात में पर‍िवारों की शुद्ध वित्‍तीय बचत (कर्ज निकाल कर)  8.2 फीसदी पर है जो लॉकडाउन के दौरान तात्‍कालिक बढ़त के बाद वापस स‍िकुड़ गई.

 

कर्ज के कारण भोपाल में परि‍वार की खुदकुशी या छोटे उद्म‍ियों की बढ़ती आत्‍महत्‍या की घटनाओं को आंकड़ों में तलाशा जा सकता है. कई वर्ष में पहली बार एसा हुआ जब 2021 में वह कर्ज बढ़ा जिसके बदले कुछ भी गिरवी नहीं था. जाहिर है एसा कर्ज महंगा और जोखिम भरा होता है. बीते साल की चौथी तिमाही तक गैर आवास कर्ज में बढ़त 11.8 फीसदी थी जो मकानों के ल‍िए कर्ज से करीब चार फीसदी ज्‍यादा है. इस साल जून में गोल्‍ड लोन कंपन‍ियों ने 1900 करोड रुपये के  जेवरात की नीलामी की जो उनके पास गिरवी थे.

टैक्‍स की बैलेंस शीट

हमें हैरत होनी ही चाह‍िए कि भारत में अब कंपन‍ियां कम और लोग ज्‍यादा टैक्‍स देते हैं. इंडिया रेटिंग्‍स की रिपोर्ट बताती है क‍ि 2010 में केंद्र सरकार के प्रति सौ रुपए के राजस्व में  कंपन‍ियों से 40 रुपए  और  आम  लोगों  से  60  रुपए  आते  थे. अब 2020 में कंपनियां केवल 25 रुपए और आम परि‍वार 75  रुपए का टैक्‍स दे रहे हैं.  2018 में कॉर्पोरेट टैक्स में 1.45 लाख करोड़ रुपए की  रियायत दी गई है.

2010 से 2020 के बीच भारतीय परिवारों पर टैक्स (इनकम टैक्‍स और जीएसटी) का बोझ 60 से बढकर 75 फीसदी हासे गया. पिछले सात साल पेट्रो उत्‍पादों से टैक्स संग्रह 700 फीसद बढ़ा हैयह बोझ जीएसटी के बाद भी नहीं घटा. इस हिसाब में राज्‍यों के टैक्‍स शामि‍ल नहीं हैं जो लगातार बढ़ रहे हैं.

भारत और दुन‍िया में अब बड़ा फर्क आ चुका है. कोविड के दौरान भारतीय सबसे ज्‍यादा गरीब हुए. ताजा अध्‍ययन बताते हैं क‍ि अमेरिका, कनाडाऑस्ट्रेलिया व यूरोप में सरकारों ने सीधी मदद के जरिए परिवारों की कमाई में कमी नहीं होने दी. जबक‍ि भारत में राष्‍ट्रीय आय का 80 फीसद नुक्सान परिवार (और छोटी कंपन‍ियों) में खाते में गया.

कंपनियां कमायें और आम लोग गंवाये. कर्ज में डूबते जाएं. यह किसी भी आर्थि‍क मॉडल में चल ही नहीं सकता. परिवारों और कंपन‍ियों की अर्थव्‍यवस्‍थायें एक दूसरे के विपरीत दि‍शा चलना आर्थ‍िक बिखराव की शर्त‍िया गारंटी है. भारत के नी‍ति‍ नियामकों को यह समझने में ज‍ितनी देर लगेगी, हमारा भविष्‍य उतना ही ज्‍यादा अन‍िश्‍चित हो जाएगा

 


Saturday, October 23, 2021

भविष्य का भविष्य

 


सॉफ्टवेयर इंजीनियर वरुण विदेश में नौकरी के प्रस्ताव को फिर हासिल करने में लगा है जो उसने दो साल पहले नकार दिया था. परमानेंट वीजा के नए विज्ञापन उसे अपने लिए बनाए गए लगते हैं.

सुविधाओं की कमी होती तो वरुण के माता-पिता राजस्थान के एक कस्बे में बसा बसाया संसार छोड़कर वरुण के पास रहने आते. नौकरी जमते और मकान जुगाड़ते ही वरुण ने बुजुर्ग मां-बाप को कस्बाई अस्पतालों के बुरे हाल का वास्ता दिया और नोएडा ले आया. उसके चचेरे भाई भी अपने रिटायर्ड माता-पिता के साथ गाजियाबाद में बसे थे जहां से अस्पताल दूर थे, बच्चों के स्कूल की दिक्कत.

इस साल अप्रैल में कोविड के कहर के वक्त वरुण का परिवार किसी भी कीमत पर पिता के लिए अस्पताल नहीं तलाश सका. उन्होंने लंगरों में ऑक्सीजन की भीख मांगी लेकिन परिवार के दो बुजुर्ग साथ छोड़ गए.

वरुण के माता-पिता अब संपत्तिबेचकर बेटी के पास विदेश में बसने को तैयार हैं.

वरुण उन 23 करोड़ लोगों में नहीं है जो महामारी लॉकडाउन के कारण गरीबी की रेखा से नीचे खिसक (सर्वे अजीम प्रेम जी यूनिवर्सिटी) गए. अब जिनके लिए निम्न मध्यम वर्ग होना भी बहुत मुश्कि है. यह बात तो उन 13-14 करोड़ मध्यवर्गीय परिवारों की है जो सोच ही नहीं सकते थे कि दिल्ली, लखनऊ, नोएडा, गांधीनगर के शानदार अस्पतालों में किसी रोज ऑक्सीजन होने से उनके परिजन दम तोड़ देंगे.

यही मध्य वर्ग 25 साल में भारत की प्रत्येक चमत्कारी कथा का शुभंकर रहा है. यही वर्ग गांवों से संपत्तिखींच कर शहर लाया और नए नगर (80 फीसद मध्य वर्ग नगरीय) बसा दिए. उनके खर्च (60 फीसद जीडीपी खपत पर निर्भर) से अर्थव्यवस्था झूम उठी. शहरों में चिकित्सा, मनोरंजन और परिवहन, संचार का नया ढांचा बन गया. इसी वर्ग ने ऑटोमोबाइल, सूचना तकनीक, बैंकिंग, रिटेल, हाउसिंग, फार्मा जैसे उद्योगों को नए भारत की पहचान बना दिया.

यह बिंदास मध्य वर्ग, जो डिजिटल इंडिया वाले नए भारत को गर्व से कंधे पर लेकर चलता था उसकी नाउम्मीदी दोहरी है. वेतनभोगियों की तादाद जुलाई 2019 के 8.6 करोड़ से घटकर, जुलाई 2021 में 7.6 करोड़ रह गई (सीएमआइई). करीब 3.2 करोड़ लोग मध्य वर्ग से बाहर (प्यू रिसर्च 2020) हो गए.

मध्य वर्गीय परिवारों का संकट बहुआयामी है. बहुतों का रोजगार गया है या कमाई घट गई है. बीते एक साल में जीडीपी के अनुपात में परिवारों का कर्ज 35 से 37 फीसद हो गया. खुदरा (कार, मकान, शिक्षा) कर्ज लेने वालों ने, कर्ज का भुगतान टालने का विकल्प का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया. भारतीय परिवारों पर कर्ज का बोझ सालाना खर्च योग्य आय 44 फीसद (2011 तक 30 फीसद) हो गया है.

कोविड के बाद आई महंगाई ने खर्च और बचत दोनों मामलों में गरीब किया है. जिंदगी की लागत बढ़ रही है और वेतन बचत पर रिटर्न कम हो रहा है. सनद रहे कि यही वर्ग अपने खर्च के जरि कई निर्धन परिवारों को जीविका देता था.

विदेश में बसने या परमानेंट वीजा दिलाने के विज्ञापन यूं ही नहीं बढ़ गए. नौकरी और पढ़ाई के लिए विदेशी विकल्पों की तलाश तेज हो रही है. ‌परदेसी रिश्तेदारों से सलाह ली जा रही है. परमानेंट वीजा जैसे विकल्पों के लिए बचतें और संपत्ति टटोली जा रही है.

सनद रहे कि टैक्स कानूनों की वजह से 2019 तक करीब 7000-8000 सुपर रिच हर साल भारत छोड़ (मोर्गन स्टेनले रिपोर्ट) रहे थे, अब बारी उच्च मध्य वर्ग की है?

अलबत्ता भारतीय मध्य वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा किसी भी तरह विदेश नहीं बस सकेगा. वह जाएगा कहां? जिस बेहतर जिंदगी के लिए वह शहर आया, वहां हाल और बुरा हो गया.

भारतीय मध्यवर्ग की जिंदगी में सरकार कोई गुणात्मक बढ़ोतरी नहीं करती. वह शिक्षा और सेहत के लिए सरकार को टैक्स देता है और यह सेवाएं निजी क्षेत्र से खरीदता है. उसे रोजगार निजी क्षेत्र से मिलते हैं और रिश्वतें सरकार वसूलती है. इस मध्य वर्ग के टैक्स और बचत पर पलने वाले वीआइपी, कमाई तो छोडि़ए महंगाई तक को लेकर संवेदनशील नहीं हैं.

महामारियों और युद्धों के बाद एक पूरी पीढ़ी अपने आर्थि व्यवहार बदलती है, मध्य वर्ग की मांग टूटने का असर बाजार पर दिख रहा है. इस वर्ग का मोहभंग लोकतंत्र के लिए खतरनाक है. अरस्तू कहते थे, मध्य वर्ग सबसे मूल्यवान है. यह निर्धन और अमीरों के बीच खड़ा होता है. निर्धनों को सत्ता खरीद लेती है और समृद्ध वर्ग सत्ता को खरीद लेते हैं. सरकारों को काबू में रखने के लिए मध्य वर्ग का बड़ा होते जाना जरूरी है क्योंकि शासक तो बस यही चाहते हैं कि मुट्ठी भर अमीरों की मदद से करोड़ों गरीबों पर राज किया जा सके.

भारत की सरकारों को हर हाल में ऐसा सब कुछ करना होगा, जिससे मध्य वर्ग का आकार बढ़े क्योंकि मौजूदा प्रजनन दर पर एक बड़े हिस्से में 2030 से बुढ़ापा शुरू हो जाएगा. क्या भारत की बड़ी आबादी बूढ़े होने से पहले मध्य वर्गीय हो सकेगी?

उलटी गिनती शुरू होती है अब.