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Monday, September 12, 2016

ढांचागत सुधारों की नई पीढ़ी

 स्कीमों की आतिशबाजी के बाद मोदी सरकार, अब उन फैसलों हिम्‍मत जुटा रही है जिनकी अपेक्षा उससे की गई थी। 
रीब दो वर्ष और तीन माह के स्कीम और मिशन राज के बाद मोदी सरकार ढांचागत सुधारों से नजर मिलाने की हिम्मत दिखाने लगी है. सुधारों की ताजा कोशिशें उतनी धमाकेदार और प्रचार भरी हरगिज नहीं हैं जितनी कि स्कीमें थीं, अलबत्ता इस कवायद में ढाई साल के स्कीम राज की बड़ी भूमिका जरूर है, जिनकी सीमित सफलता और जमीनी स्तर से उभर रही गफलत सरकार को पहलू बदलने पर मजबूर कर रही है. राज्यों के स्तर पर केंद्रीय स्कीमों का कमजोर क्रियान्वयन भी टीम मोदी को वापस उन सुधारों की तरफ लाया है, जो केंद्र सरकार अपने स्तर पर कर सकती है. 

जीएसटी की संसद से मंजूरी के साथ ही केंद्र सरकार में फैसलों का मौसम बदला है. साहसी सुधारों और मजबूत आर्थिक फैसलों पर राजनैतिक सहमति की उम्मीदें बंधने के साथ मोदी सरकार ने पिछले दो माह में कम से कम चार बड़ी पहल की हैं, जिन्हें ढांचागत सुधार या दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों की श्रेणी में रखा जा सकता है. यह चारों कोशिशें पर्याप्त साहसिक हैं और इनके शुरुआती नतीजे चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन मोदी सरकार को समझ में आ गया है कि इस तरह के साहस के अलावा कोई विकल्प बचा भी नहीं है.
पहला बड़ा कदम मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी के गठन और महंगाई पर नियंत्रण का लक्ष्य तय करने पर सामने आया. सरकार ने तय किया कि वह ब्याज दरें घटाने के लिए अगले पांच साल तक खुदरा यानी उपभोक्ता महंगाई को चार फीसदी (दो फीसदी ऊपर-नीचे यानी औसत छह फीसदी) पर रोकने की कोशिश करेगी. इस फैसले से उसे कई बार नीम चबाना पड़ा. एक, पूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर रघुरामन राजन महंगाई पर जिस सख्ती के लिए दुरदुराए गए थे, सरकार अंतत: उसी फॉर्मूले की शरण में आई. और दूसरा, बीजेपी के 'स्वामी' और 'गुरु' जो महंगाई की फिक्र छोड़कर ब्याज दरें घटाने का दबाव बना रहे थे, उन्हें बरजना पड़ा.
मौद्रिक नीति समिति का गठन और महंगाई दर का लक्ष्य हर तरह से ढांचागत सुधार है. महंगाई घटाना, अब रिजर्व बैंक और सरकार की साझा जिम्मेदारी है, क्योंकि इस समिति में रिजर्व बैंक व सरकार के तीन-तीन सदस्य होंगे. अब तक रिजर्व बैंक ब्याज दरें तय करने में ग्रोथ, रोजगार, महंगाई आदि कई कारकों को आधार बनाता था. इस नई व्यवस्था के बाद महंगाई पर काबू होने तक ब्याज दरें नहीं घटेंगी.
यह फैसला बैंक में जमा रखने वाले और उपभोक्ताओं के हक में हैं, जिनकी जमा पर रिटर्न और खपत को महंगाई सबसे ज्यादा मारती है. इस फैसले के बाद ब्याज दरें घटाने के विकल्प सीमित हो जाएंगे और केंद्र सरकार को सक्रिय रूप से महंगाई नियंत्रण के प्रयास करने होंगे. 
दूसरा एक बड़ा सुधार दबे पांव रेलवे में प्रारंभ हो रहा है. रेलवे गहरी मुसीबत में है. मोदी सरकार पिछले ढाई साल में रेलवे को बदलने की ज्यादातर कोशिशों में बहुत उत्साहवर्धक नतीजे नहीं ला पाई. रेलवे का घाटा, अक्षमता, किस्म-किस्म की असंगतियां बदस्तूर बनी हुई हैं और देनदारी बढ़ती जा रही है. इसलिए रेलवे 95 साल पुराना इतिहास छोडऩे की तैयारी में है. रेल बजट को केंद्रीय बजट का हिस्सा बनाने की तैयारी शुरू हो गई है जो एक बड़े सुधार की पहली पदचाप है. रेलवे और वित्त मंत्रालय में इसे लेकर गहरी बेचैनी और असमंजस है, लेकिन इस ऑपरेशन की शुरुआती हिम्मत जुटा ली गई है. स्वाभाविक है कि रेलवे बजट का आम बजट में विलय रेलवे के लंबित पुनर्गठन की शुरुआत होगी, जो कई पेचो-खम से गुजरेगा और सरकार को कई बार कड़वी गोलियां खानी व रेलवे को खिलानी होंगी.
तीन सरकार के खर्चों का पुनर्गठन बजटीय ढांचे की सबसे कडिय़ल गुत्थी है, जिसे सुलझाने की कोशिश में कई सरकारें और विशेषज्ञ समितियां खर्च हो गईं. यह भारतीय बजट व्यवस्था में दूसरी पीढ़ी का सबसे बड़ा सुधार है, जो प्रत्यक्ष रूप से सरकार के दानवी खर्चों को प्रभावी बनाने और घाटे को सीमित रखने से जुड़ा है. सरकार के बही- खाते में खर्चों को योजना और गैर योजना दो मदों में दिखाया जाता है. इस बंटवारे से यह भ्रम होता है कि योजना खर्च विकास के लिए है और गैर योजना खर्च, अनुत्पादक कामों के लिए.
इस बंटवारे को बदलने की कवायद शुरू हो गई है. खर्च को राजस्व और पूंजी, दो हिस्सों में बांटा जाएगा यानी पुल सड़क, मकान, स्कूल अस्पताल आदि तैयार करने वाला (पूंजी) खर्च और तनख्वाहों, ब्याज आदि पर जाने वाला राजस्व खर्च. यह सुधार खर्चों की सही पैमाइश में मदद करेगा. इसके बाद तय करना आसान होगा कि कहां निर्माण करना है और कहां मेनटेनेंस की लागत उठानी है. प्रारंभिक तौर पर यह एकाउंटिंग में बड़े बदलाव लाएगा, जिसे राज्यों को भी अपनाना होगा. 
चार पिछले दो साल तक सरकारी कंपनियों के विनिवेश को लेकर ठिठकती सरकार अपने तथाकथित घाटा रत्नों को बेचने पर भी तैयार हो गई दिखती है. नीति आयोग ने 74 सरकारी कंपनियों की किस्मत तय करने की सिफारिशें सरकार को सौंप दी है. इनमें 26 को बंद किया जाएगा, 32 को पूरी तरह बेचा जाएगा और कुछ कंपनियों का विलय होगा या राज्यों को दे दी जाएंगी. इसकी शुरुआत हो गई है. सरकार ने 30 अगस्त की कैबिनेट बैठक में सेंटर इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन को बंद करने का निर्णय कर लिया.
ढांचागत सुधार हमेशा से कठिन और राजनैतिक चुनौती रहे हैं. इनके नतीजे आने तक इन पर टिके रहना जरूरी होता है. मोदी सरकार ने भले ही शुरुआत स्कीमों की आतिशबाजी से की हो, लेकिन मजबूरी यह है कि उससे इसी तरह के फैसलों की अपेक्षा की गई थी, जो अब शुरू हुए हैं.
सुधारों की कोशिशें सराहनीय हैं और समर्थन की दरकार रखती हैं. लेकिन इन्हें सांकेतिक और सुस्त होने से बचाना होगा. सुधारों के पुराने तजुर्बे बताते हैं कि बहुत से कदम सिर्फ एकमुश्त और समग्र न होने के कारण उम्मीद पर खरे नहीं उतरे. यदि मोदी सरकार की ताजी कोशिशें प्रतीकात्मक और आधी-अधूरी नहीं रहीं तो अगले दो-तीन आधी में हम आर्थिक गवर्नेंस का एक नया कलेवर देख पाएंगे जिसके इंतजार में पिछला एक दशक बेकार हो गया है.
राजनैतिक असहमति की उम्मीदें बंधने के साथ मोदी सरकार ने पिछले दो माह में कम से कम चार बड़ी पहल की हैं, जिन्हें दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों की श्रेणी में रखा जा सकता है.