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Sunday, March 19, 2023

सदि‍यों में होता है जो


 

अर्थव्‍यवस्‍थाओं को हमेशा के लिए कौन बदल सकता है .. 

मंदी

महामारी

युद्ध

राजनीत‍ि

शायद नहीं यह तो वक्‍त चादर की सलवटें हैं ...

अर्थव्‍यवस्‍थायें तो बदलते हैं लोग

बहुत से लोग

जनसंख्‍या की ताकत

दुन‍िया तो दरअसल संतानों का अर्थशास्‍त्र है

यह अर्थशास्‍त्र जब करवट लेता है तो महाप्रतापी समय भी नतमस्‍तक हो जाता है क्‍यों कि यह बदलाव सद‍ियों आते हैं और सदियों तक असर करते हैं.

अब दुनिया ठीक एसे ही एक महासंक्रमण की दहलीज पर है.

इसे समझने के लिए हमें कुछ पीछे जाना होगा

तो आइये बैठ‍िये एक टाइम मशीन में  और शुरु कीजिये तीन सौ साल का सफर. चलते हैं 18 वीं सदी से 21 वीं  सदी की तरफ यानी अतीत से वर्तमान की ओर

इस  यात्रा में सबसे पहले आपको दिखेगा यूरोप का बदलता नक्‍शा.  तीस साल लंबे युद्ध के बाद  यानी थर्टी इयर्स ऑफ वार के यूरोप के देशों के बीच वेस्‍टफीलिया की संध‍ि. 300 साल के सफर में आपको चीन में दो साम्राज्‍यों मिंग और क्‍व‍िंग का पतन नजर आएगा. नेपोल‍ियन के युद्ध मिलेंगे,  फ्रांस की क्रांति मिलेगी, यूरोप की औद्योगिक क्रांति मिलेगी. भारत मे मुगलों का पराभव मिलेगा. भारत और अमेरिका से कारोबार के लिए ब्रिटेन, पुर्तगाली, स्‍पेन, डच के बीच होड़ मिलेगी. फिर दिखेगी अमेरिका और भारत की गुलामी और आजादी का संघर्ष.  इस सफर में मिलेगा लाखों की जाने लेने वाला स्‍पेन‍िश फ्लू , महामंदी मिलेगी, दो महायुद्ध मिलेंगे.  ‍‍

अलबत्‍ता सम्राटों युद्धों और तबाही के इतिहास से अपनी नजरें हटायें तो आपको पता चलेगा कि यह दौर लोगों के लिए यानी आबादी के लिए सबसे बुरा था. गुलामी बर्बरता खून खच्‍चर गरीबी बदहाली . अध‍िकांश लोगों के पास इसके अलावा और कुछ नहीं था. यह दौर था जब दुनिया में औसत आयु केवल 27 साल थी. प्रजनन दन (फर्ट‍िल‍िटी रेट)  काफी ऊंची थी  एक महिला करीब छह बच्‍चों को जन्‍म देती थी लेक‍िन इनमें अधिकांश जीव‍ित नहीं रहते थे. आबादी की वृद्ध‍ि दर बमुश्‍क‍िल आधा फीसदी थी. 17 वीं 18 वीं सद‍ियां और 19 वीं सदी का बड़ा हिस्‍सा ऊंची जन्‍म दर, बड़ी संख्‍या में युवा आबादी, बदतर जीवन स्‍तर और ऊंची मृत्‍यु दर के साथ गुजरा था

फिर आप को म‍िलेगी 19 वीं सदी की शुरुआत जहां जिंदगी थोड़ी सी बदलने लगी. यूरोप में मृत्‍यु दर घटने लगी थी, जन्‍म दर भी कम हुई, फिर यह पूरी दुन‍िया में हुआ  और एक जनसंख्‍या संक्रमण आकार लेने लगा.  बीसवीं सदी की शुरुआत तक दुनिया की आबादी एक अरब के पास पहुंचने लगी थी. आबादी बढ़ने की रफ्तार रफ्ता रफ्ता तेज हो रही थी.

बीसवीं सदी की शुरुआत के साथ सब कुछ बदल गया जीवन प्रत्‍याशा दर बढ़ी. जन्‍म दर घटी और 21 वीं सदी की शुरुआत तक दुनिया की आबादी 1800 की तुलना में छह गुना बढ़ गई. बच्‍चों की तुलना में बुजुर्गों का अनुपात तीन गुना बढ़ा. करीब सौ साल पहले महिलायें अपने युवा जीवन का 70 फीसदी हिस्‍सा बच्‍चों जन्‍म देने और पालने में गुजारती थीं वह 21 वीं सदी की शुरुआत तक घटकर 14 फीसदी रह गया.

यही वह दौर था जब संतानों अर्थशास्‍त्र ने अर्थव्‍यवस्‍थाओं की सीरत और सूरत बदल दी. अमेरिका में बेबी बूमर्स (1946 से 1964 के बीच जन्मे) ने अमेरिका को 30 साल की सबसे तेज विकास दर की नेमत बख्शी, जिसे 2000 में बिल क्लिं‍टन ने नई अर्थव्यवस्था कहा था। (इन बेबी बूमर्स के हाथ अमेरिका की 70 फीसदी एसी कमाई (खर्च योग्य आय) है जिस पर बाजार झूम उठते हैं है). अमेरिका को एक और बड़े जनसंख्या संक्रमण का लाभ मिला जो 2000 की पीढ़ी थी जिन्हें मिलेनियल्स कहा गया हालांकि यह मिलेन‍ियल्‍स ठीक उस वक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था में आए जब 2008 की मंदी आ धमकी थी. इधर 1980 के बाद चीन और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं ने अपनी जनसंख्या को खपत, उत्पादन और श्रम शक्ति‍ का बाजार बनाया जबकि यूरोप में बुढापा घ‍िरने लगा  

आबादी की चक्‍की

कहते हैं जनसंख्‍या की चक्‍की इतनी धीमी चलती है और इतना महीन पीसती है हम अक्‍सर भूल ही जाते है लोगों से अर्थव्‍यवस्‍था बनती है है अर्थव्‍यवस्‍था से लोग नहीं.  यह पहिया अपना सबसे बड़ा संक्रमण करने जा रहा है. दुनिया में जनसंख्‍या का संतुलन स्‍थायी तौर पर बदलने जा रहा है. यह संक्रमण तीन सौ  साल में सबसे बड़ा बदलाव शुरु हो चुका है पहली बार होगा. आने वाले में दशकों में दुनिया को चाहे जो राजनीति बर्दाश्‍त करनी पड़े, चाहे जो  सरकारें आए या जाएं , विज्ञान और तकनीक के नए श‍िखर कितने भी ऊंचे हों जनसंख्‍या का यह परिवर्तन  कामागारों की कमी , वेतन बढ़ने के दबाव, उत्‍पादन में कमी और जिद्दी महंगाई लेकर आएगा

चौंक गए न !

यह चारों बदलाव अर्थव्‍यवस्‍था के बारे में हमारी मौजूदा समझ को उलट पलट कर सकते हैं लेक‍िन आबादी और अर्थव्‍यवस्‍था को रिश्‍तों को करीब से पढ़ने वाले इस संक्रमण की शुरुआत का बिगुल बजा रहे हैं. महामारी की चीख पुकार के बीच दुनिया के विशेषज्ञ जनसंख्‍या की नई करवट को समझ रहे हैं चार्ल्‍स गुडहार्ट और मनोज प्रधान की ताजा किताब द ग्रेट डेमोग्राफ‍िक रिवर्सल – एजिंग सोसाईटीज, वैनिंग इनइक्‍व‍िलिटीज एंड एन इन्‍फेलशन रिवाइवल इस संक्रमण पर नई रोशनी डालती है

 काम होगा कामगार नहीं

भारत की तपती बेरोजगारी के बीच यह बात कुछ अटपटी सी लगेगी लेक‍िन दुनिया की आबादी की नई करवट समझने वाले इस अनोखी किल्‍लत की तैयारी कर रहे हैं.

1950 के बाद दुनिया तीन धीमे लेक‍िन बड़े बदलाव हुए हैं. प्रजनन दर यानी फर्टि‍ल‍िटी रेट बीते शताब्‍दी की तुलना मेंआधी करीब 2.7 फीसदी रह गई. जिंदगी लंबी हुई. 2000 तक 50 साल में दुनिया की आबादी दोगुनी हो गई और युवा आबादी का अनुपात मजबूती से बढ़ने लगा. इस बदलाव ने दुनिया में कार्यशील आयु वाली लोगों की संख्‍या में तेज बढ़ोत्‍तरी की. यह चार्ट इस अभूतपूर्व बदलाव की नजीर है

श्रमिकों का आपूर्त‍ि का स्‍वर्ण युग आया 1990 के बाद. तब तक बेबी बूमर्स यानी 1950 से 1964 के बीच जन्‍मे लोग बाजार में आ गए थे. 1991 से 2018 विकस‍ित अर्थव्‍यवस्‍थाओ में श्रमिकों की आूपर्ति दो गुनी से ज्‍यादा हो गई. काम तो मिला लेक‍िन वेतन बहुत नहीं बढ़े क्‍यों कि श्रमिक आपूर्ति ज्‍यादा थी. चीन की विकास कथा इसी दौर मे बनती है. भारत और एश‍िया की अर्थव्‍यवस्‍थाओं ने भी इस संक्रमण को पूरा लाभ लिया. अलबत्‍ता उत्‍पादन बढ़ा और दुनिया ने करीब 28 साल तक महंगाई नहीं देखी. जिसका लाभ जीवन स्‍तर बेहतर होने के तौर पर सामने आया.

बीते करीब 60 सालों में दुनिया का हर परिवार बीती सदी के तुलना में अमीर हुआ है. छोटे परिवार रखना कमाई की गारंटी थी और लंबे समय तक काम करने का मौका था इसलिए आय में बढ़ोत्‍तरी हुई हालांकि यह पूरी दुनिया में असमान थी. क्‍यों कि एक छोटी सी आबादी की आय ज्‍यादा तेजी से बढ़ी.

अब यह पूरा पर‍िदृश्‍य  बदलने वाला है.  एक नई दुनिया हमारे सामने होगी.

दुनिया के ज्‍यादातर देशों में कार्यशील आबादी कम होती जाएगी. अब उतने श्रमिक नहीं होंगे. जापान, कोरिया, जर्मनी, रुस, चीन, इटली, फ्रांस, चीन  में अब बुढ़ापा घिर रहा है. चीन ने 1990 से 2015 के करीब 29 करोड लोग कार्यशील आबादी में जोडे.  अब 2050 तक 22 करोड़ लोग श्रम बाजार से बाहर हो जाएंगे क्‍यों कि उनकी उम्र काम के लायक नहीं रहेगी.

इसका असर धीमी आर्थ‍िक विकास दर के तौर पर सामने आएगा. विशेषज्ञ मान रहे हैं कि उत्‍पादन घटेगा क्‍यों कि श्रमिकों की कमी भी होगी, खपत भी गिरेगी. बहुत तेज विकास दर के दिन अब गए. अगले करीब तीन दशकों में भारत चीन जैसे एश‍ियाई अर्थव्‍यवस्‍थायें औसत 6 से 8 फीसदी के बीच विकास दर हासिल कर पाएंगी. यूरोप की अर्थव्‍यवस्‍थाओं कीविकास दर तो तीन फीसदी से भी नीचे रहेगी. यह संक्रमण  ग्‍लोबलाइजेशन की रफ्तार को भी धीमा कर सकता क्‍यों कि श्रमिकों आपूर्ति सीमित होगी. प्रवासी श्रमिकों को रोजगार देना राजनीतिक रुप से मुफीद नहीं होगा. इसलिए दुनिया को देशों के जो सामान सेवायें आयात करते थे उनमें से कई मामलेां उन्‍हें अपने यहां नई क्षमतायें बनानी होंगी

 महंगाई की वापसी

सन 2000 के बाद यहां युवा और बुजर्ग आबादी का अनुपात बदल रहा है. आबादी का का ड‍िपेंडेंसी रेश‍ियो कमजोर हो रहा है यह इस वक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था का सबसे प्रभावी फार्मूला है. यह अनुपात बताता है कि आबादी कार्यशील लोगों पर कितने बच्‍चे और बुजुर्ग निर्भर हैं.

किसी भी जनसंख्‍या में बच्‍चे और बुजुर्ग शुद्ध उपभोक्‍ता हैं. वह कार्यशील लोगों पर निर्भर हैं. यह आबादी उत्‍पादन करती है खपत करती है और बचत करती है. इसलिए इस अनुपात में गिरावट अर्थव्‍यवस्‍था के अचछी मानी जाती है. 1950 तक यह अनुपात संतुलित था. बाद के दशकों में इसमें बढोत्‍तरी हुई.  1990 के इसमें बढ़त हुई है. कार्यशील आबादी घट रही है जबकि उस पर निर्भर आबादी बढ़ रही है.

1990 के बाद  श्रम बाजार में औसत श्रमिकों की कार्यशील आयु स्‍थि‍र होने लगी थी. बाद मे वर्षों में इसमें तेज गिरावट आई. इसी के साथ सभी बडी अर्थव्‍यवस्‍थाओं में ड‍िपेंडेसी रेश‍ियो बढ़ने लगा

 आबादी का ड‍िपेंडेसी रेश‍ियो महंगाई के लिए सबसे जरुरी कारक है. 1870 से 2016 के बीच दुनिया के 22 प्रमुख देशों में महंगाई और जनसंख्‍या के रिश्‍तों पर अध्‍ययन बताता है कि कार्यशील आबादी कम होने से वेतन बढ़ने का दबाव बनता है. यद‍ि खपत करने वाली आबादी , उत्‍पादक आबादी से ज्‍यादा है तो मतलब है कि आबादी का एक  बड़ा हिस्‍सा  उतादन नहीं करेगा बल्‍क‍ि केवल उपभोग करेगा. इस उत्‍पादन के ल‍ि कम लोगों को ज्‍यादा वेतन देने होंगे जिसका असर उत्‍पादन लागत पर दिखता है. और इससे बढ़ती है महंगाई. आबादी में आयु का संतुलन बदलने के बाद खपत भी कम होती है जो उत्‍पादकों के कम बिक्री पर ज्‍यादा कीमत वसूलने का मौका देती है.

 जनसंख्‍या की चक्‍की धीमा पीसती है इसलिए सब कुछ तुरंत नहीं बदलेगा अलबत्‍ता लंबी अवध‍ि में कई बडे असर होने वाले हैं

-         महंगाई बढ़ने के साथ खपत में कमी और उपभोग में भी कमी क्‍योंकि बुढ़ाती आबादी की खपत कम होती है. इसका मतलब यह कि अब बल्‍ल‍ियों उछली विकास दर की जरुरत नहीं होगी क्‍यों कि मांग कम रहेगी

-         बुजर्ग आबादी अपनी पुरानी बचतों पर जियेगी नई बचतें नहीं होगी इसलिए  निवेश को कर्ज पर निर्भर रहना होगा. महंगाई के बीच यह पर‍िस्‍थ‍िति‍ ब्‍याज दरों को ऊंचा रख सकती है.

-         निवेश में कमी होने की संभावना कम है क्‍यों कि आबादी का संतुलन बदलने के साथ आवासों पर सबसे जयादा निवेश चाहिए. बुजुर्गों को रहने के लिए घर चाहिए. गुडहार्ट और प्रधान अपने अध्‍ययन बता रहे हैं कि पूरी दुनिया में हाउस‍िंग की मांग बढेगी अलबत्‍ता इसके लिए कर्ज भी जरुरत में भी इजाफा होगा

-         कर्ज इसल‍िए भी महंगा रह सकता है क्‍यों कि सरकारों को बुजुर्ग कल्‍याण पर खर्च बढ़ाना होगा. यह स्‍वास्‍थ्‍य पेंशन शहरी सुव‍िधाओं पर होगा. बीते करीब 40 सालों से सरकारों ने इस तरफ सोचा नहीं. अब बुजुर्ग आबादी सबसे बडी राजनीतिक मजबूरी बनती जाएगी.

-         सरकारों को पेंशन के पूरे ढांचे बदलने होगे. सेवानिवृत्‍त‍ि की आयु बढ़ाना जरुरी होगा क्‍यों कि जीवन प्रत्‍याशा बढ़ने से लोग 70 साल तक काम कर सकते हैं. यह पेंशन बजटों के संतुल‍ित करेगा

-          स्वास्थ्य सेवाओं को सड़कबिजलीदूरसंचार की तर्ज पर विकसित करना होगा ताकि कार्यशील आयु बढ़ाई जा सके और 65 की आयु वाले लोग 55 साल वालों के बराबर उत्पादक हो सकें.

-         मेकेंजी का मानना है कि स्वास्थ्य में नई तकनीकें लाकरबेहतर प्राथमि‍क उपचारसाफ पानी और समय पर इलाज देकर बडी आबादी की सेहत 40 फीसदी तक बेहतर की जा सकती है. स्वास्‍थ्य पर प्रति 100 डॉलर अतिरिक्त खर्च हों जीवन में प्रति वर्षएक स्वस्थ वर्ष बढाया जा सकता है. स्वास्थ्य सुविधायें संभाल कर, 2040 तक दुनिया के जीडीपी में 12 ट्रि‍ि‍लयन डॉलर जोडे जा सकते हैं जो ग्लोबल जीडीपी का 8 फीसदी होगा यानी कि करीब 0.4 फीसदी की सालाना बढ़ोत्तरी

-         विशेषज्ञ मान रहे हैं कि वेतन बढ़ने की संभावनाओं के बीच यह  बदलाव अगले कुछ दशकों में आय असमानता कम कर सकता है लेक‍िन यहां तस्‍वीर बहुत धुंधली है, वक्‍त ही बतायेगा कि क्‍या हुआ.

 

अर्थशास्‍त्र का सबसे लोहा लाट नियम किसी बैंक बजट या मुद्रा पर आधारित नहीं है. यह तो लोगों पर आधार‍ित है

आर्थ‍िक विकास = लोगों की संख्‍या में कमी बेशी+लोगों की उत्‍पादकता में बढ़ोत्‍तरी

 कोई भी अर्थव्‍यवस्‍था अर्थव्‍यवस्‍था लोगों की संख्‍या और उनकी उत्‍पादकता बढाकर ही आगे बढती है. यह फार्मूला मांग बचत और टैक्‍स का फार्मूला है

यही फार्मूला अब नई करवट ले रहा है

अगली सदी की दुनिया नई दुनिया होगी

 

 

Friday, September 25, 2020

आबादी का अर्ध सत्य

 

तमाम पापड़ बेलने और धक्के खाने के बाद समीर को इस जनवरी में नौकरी मिली थी और अप्रैल में छुट्टी हो गई. लॉकडाउन दौरान व्हाट्सऐप मैसेज पढ़-पढ़कर वह बिल्कुल मान ही बैठा था किबढ़ती आबादी उसकी बेकारी की वजह है. वह तो भला हो उसके एक पुराने टीचर का जिनसे मिले कुछ तथ्य पढ़कर उसे समझ में आया कि जब भी सरकारें बेरोजगारी पर घिरती हैं तो उनके सलाहकार और पैरोकार बढ़ती आबादी का दकियानूसी स्यापा क्यों शुरू कर देते हैं?


चालाक राजनीतिशोर की ताकत से सच समझने की क्षमता तोड़ देती हैं. यह समझ गंवाते ही लोग तथ्य और झूठ का फर्क ही भूल जाते हैं. वे मुसीबतों के लिए खुद को ही कोसने लगते हैं और जिम्मेदारों से सवाल पूछना बंद कर देते हैं. समीर और असंख्य बेरोजगारों के साथ यही हो रहा है. उनके दर्द को आबादी बढ़ने के अर्ध सत्य में लपेटा जा रहा है.


2011 की जनगणना और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज के शोध के आधार पर आर्थिक समीक्षा (2018-19) ने जनसंख्या को लेकर ताजे आंकड़े दिए हैं, उसके बाद रोजगार न दे पाने में विफलता पर सरकार के बचाव में दूसरे तर्क गढ़े जाने चाहिए.


क्या सच में भारत की आबादी बढ़ रही है?


नहीं. आबादी की सालाना वृद्धि दर की गणना के फॉर्मूले के आाधार पर भारत में आबादी बढ़ने की दर अब केवल 1.3 फीसद (2011-16) रह गई है जो 1971 से 1981 के बीच में 2.5 फीसद थी. यह रफ्तार अब दक्षिण एशिया (1.2 फीसद) के प्रमुख देशों के आसपास है और निम्न मझोली आय वाले देशों की वृद्धि दर (1.5 फीसद) से कम है (विश्व बैंक). यानी ऊंची आबादी वृद्धि दर (2 से 2.5 फीसद) के दिन पीछे छूट चुके हैं.


आंकड़ों के भीतर उतरने पर आबादी को लेकर हमारी चिंताएं और कम होती जाती हैं. दक्षिण भारत और बंगाल, पंजाब, असम, हिमाचल, महाराष्ट्र, ओडिशा सहित 13 राज्यों यानी करीब आधे भारत में आबादी बढ़ने की दर एक फीसद नीचे आ गई है जो कि यूरोप के लगभग बराबर है.


यहां तक कि जनसंख्या में तेजी बढ़ोतरी के लिए कुख्यात उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान हरियाणा में भी आबादी बढ़ने की रफ्तार में आश्चर्यजनक गिरावट आई है. दस राज्य जो एक फीसद से ज्यादा की आबादी वृद्धि दर दर्ज कर रहे हैं वहां भी वृद्धि दर दो फीसद से काफी नीचे है.


भारत में आबादी रफ्तार रोकने का यह चमत्कार हुआ कैसे? 1971 से 2016 के बीच भारत में टोटल फर्टिलिटी रेट या प्रजनन दर (मातृत्व आयु के दौरान प्रति महिला बच्चों का जन्म या पैदा होने की संभावना) घटकर आधी (5.3 से 2.3) रह गई है. इसका यह नतीजा हुआ कि भारत के करीब 13 राज्यों में अब रिप्लेसमेंट फर्टिलिटी दर 2.1 फीसद से नीचे आ गई है. यह बेहद महत्वपूर्ण पैमाना है जो बताता है कि अगली पीढ़ी को लाने के लिए प्रति महिला कम से कम 2.1 बच्चे होना अनिवार्य है. दक्षिण और पश्चिम के राज्यों में यह दर अब 1.4 से 1.6 के बीच आ गई है यानी दो से कम बच्चे सबसे अच्छे माने जा चुके हैं.


फर्टिलिटी रेट में कमी हमेशा आय बढ़ने के साथ होती है लेकिन भारत ने गरीबी और कम आय के बीच यह चमत्कार किया है. यही वजह है 2031 तक भारत में जनसंख्या की वृद्धि दर घटकर एक फीसद आ जाने का आकलन है जो 2041 तक 0.5 फीसद रह जाएगी. यानी जनसंख्या वृद्धि के मामले में हम विकसित देशों बराबर खड़े होंगे.


आबादी बढ़ने का अर्ध सत्य बुरी तरह हार चुकाा हैं. हां, रोजगारों पर बहस और तेज होनी चाहिए क्योंकि बीते दो दशक के बदलावों के बाद आबादी में आयु वर्गों का जो औसत बदलेगा उससे... 

 

2021 से 31 के बीच करीब 97 करोड़ और इसके अगले दस वर्षों में लगभग 42 करोड़ लोग (श्रमजीवी आबादी) काम करने की ऊर्जा से भरपूर होंगे

इनके लिए अगले दो दशकों में प्रति वर्ष क्रमश: एक करोड़ और 50 लाख रोजगार चाहिए

मौजूदा प्रजनन दर पर 2041 तक युवा आबादी का अनुपात अपने चरम पर पहुंच चुका होगा. इसके बाद भारत बूढ़ा हो जाएगा. दक्षिण के राज्यों में बुढ़ापा 2030 से ही शुरू हो जाएगा

कहां हैं वे लोग जो भारत की युवा आबादी को उसकी सबसे बड़ी ताकत या संभावनाओं का खजाना कह रहे थे. कहीं वे ही तो आबादी नियंत्रण कानून की जरूरत का स्यापा तो नहीं कर रहे!

दरअसल, जिस मौके का इंतजार था वह अब आ पहुंचा है. इस युवा आबादी के अलावा भारत के पास और कुछ नहीं है. भविष्य की खपत, ग्रोथ, निवेश, बचत सब इस पर निर्भर है. भारत को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, सुपर पावर या विश्व गुरु जो भी बनना है उसके लिए 15 साल का वक्त है और यही युवा उसका माध्यम हैं. सियासत का अधिकांश वक्त, इसी युवा को भरमाने, लठियाने, धमकाने, ठगने और लड़ाने में जाता है.

Saturday, December 28, 2019

अवसरों का अंतिम दशक


हमारे फैसलों के नतीजे अक्सर बेहद जटिल और बहुआयामी होते हैं...इसलिए भविष्य को जान पाना बहुत कठिन हो जाता है.’’ जे.के. राउलिंग (हैरी पॉटर ऐंड प्रिजनर ऑफ अज्कबान) ने ठीक पकड़ा था भविष्य को. हम भी तो अपने कदमों के नतीजे कहां समझ पाए और...2020 गया.

2020 यानी भारत के लिए अवसरों के आखिरी दशक की शुरुआत हो रही है.

2020 की मंजिल वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. .पी.जे. अब्दुल कलाम ने तय की थी जिससे प्रेरणा लेकर तब के योजना आयोग ने पांच साला योजनाओं से परे 2002 में भविष्य का रोडमैप (विजन 2020) बनाया था, जिसमें एक दशक की उपलब्धियों के आधार पर अगले दो दशकों की चुनौतियों को मापा गया था. सरकारी लक्ष्यों में राजनैतिक सुविधा के हिसाब से बदलावों के बीच, विजन 2020 उम्मीदों की एक सुहानी मंजिल की तरह टंगा रहा है क्योंकि आर्थिक उदारीकरण के बाद के वर्षों में शायद यह इकलौता दस्तावेज है जिसमें तर्कसंगत आकलन के साथ दूरगामी लक्ष्य तय किए गए थे.

दस्तावेज पुराना है लेकिन अवसरों के आखिरी दशक पर निगाह डालने के लिए 2002 में तय की गई कई मंजिलों के संदर्भ बेहद कारगर हैं. बाद के दशकों में, यही लक्ष्य अलग संख्याओं और व्याख्याओं में बंधकर हमारे पास आते रहे हैं.

मसलन, 2020 तक गरीबी दूर करने के लिए 2002 के बाद हर साल 8-9 फीसद की विकास दर का लक्ष्य तय किया गया था. हम यह विकास दर नहीं हासिल कर सके. 2020 तक बेकारी को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य था क्योंकि तब तक जीवन प्रत्याशा दर 69 वर्ष तक पहुंच जानी थी. बुढ़ापे के मामले में हम लगभग इसी मुकाम पर हैं. 

इन सुहाने सपनों और चुभती सचाइयों के बीच भारत अपने सबसे मूल्यवान आखिरी दशक की राह में तीन बहुत बड़ी चुनौतियों से मुकाबिल है.

·       आर्थिक विकास यानी प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में 2020 की शुरुआत में हम ठीक वहीं खडे़ हैं जहां चीन 2003-04 में खड़ा था.  ग्लोबल निवेशकों से लेकर देशी कारोबारियों तक किसी को यह उम्मीद नहीं है कि भारत अगले दशक में दस फीसद यानी दहाई की विकास दर हासिल कर सकेगा.

बेहतर सुधारों की शर्त पर सात फीसद की विकास दर मुमकिन है लेकिन अब अगले वर्षों में दुनिया भारत को इसकी वास्तविक विकास दर (महंगाई रहित) की रोशनी में आंकेगी. अगर यह दर 5 फीसद के आसपास रही तो फिर एक-तिहाई आबादी कभी भी बेहतर खपत की तरफ नहीं बढ़ पाएगी. बेकारी, गरीबी को लेकर इस दशक के लक्ष्य भरोसेमंद नहीं रह पाएंगे. जरूरी सामान और अन्य चीजों की खपत में गिरावट होगी. और निवेशकों (शेयर बाजार, उद्येाग) के लिए लंबी अवधिमें बहुत उम्मीदें नहीं बचेंगी.

·       अगले एक दशक में आर्थि विकास दर की यह तस्वीर हमें दूसरे बड़े बदलाव की तरफ देखने पर मजबूर करती है. तेज विकास के लिए भारत का सबसे बड़ा संसाधन उसके युवा रहे हैं. लेकिन अब हम बुढ़ाते हुए समाज की तरफ यात्रा प्रारंभ कर रहे हैं. हिमाचल प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में युवा आबादी घटने लगी है. हमारे पास युवा आबादी का लाभ लेने का यह अंतिम दशक है. 2021 से 2031 के बीच भारत की कामगार आबादी हर साल 97 लाख लोगों की दर से बढ़ेगी. इस बीच बड़ी आबादी रिटायर होगी जिसे सेवाएं देने के लिए इस युवा आबादी को बचत और खपत (टैक्स) बढ़ानी होगी.

·       कमजोर ग्रोथ और बुढ़ाती आबादी के आगामी दशक के बीच गवर्नेंस उम्मीदें तोड़ रही है. निराशा केवल सरकार को लेकर ही नहीं, हर तरह की गवर्नेंस को लेकर है. 2020 की शुरुआत में भारत का राजनैतिक नक्शा केंद्र और राज्यों के बीच युद्ध के संभावित मैदान में तब्दील हो चुका है. सरकारें सक्षम होने के बजाए टैक्स पचाकर फूल रही हैं, भ्रष्ट हो रही हैं और लोगों की बचत (सरकारी खर्च) के बूते अपने सियासी संगठन पाल रही हैं. स्वतंत्र नियामकों का गठन और मौजूदा नियामकों को नई ताकत देने के एजेंडे पीछे छूट चुके हैं. गवर्नेंस का क्षरण राज्यों से होता हुआ स्थानीय संस्थाओं तक पहंच चुका है.

भारत की कॉर्पोरेट गवर्नेंस भी उतने ही बुरे दौर में है. कागजों पर सबसे अच्छे कानूनों के बावजूद पिछले एक दशक में कई बड़ी कंपनियों के निदेशकों ने हर तरह का धतकरम किया और निवेशकों कर्मचारियों के सपनों को आग लगाई है. इस गवर्नेंस का क्षरण और शून्य हमें कई क्षेत्रों में निजी एकाधिकार की तरफ ले जा रहा है. अगला एक दशक इस लिहाज से बेहद संवेदनशील होने वाला है. 

भविष्य कभी हमारे मन मुताबिक नहीं आता. सो, 2020 भी अफरातफरी और आर्थि संकट के बीच धप्प से कूद पड़ा. हमें इस समय सब कुछ बदलने वाले तेज रफ्तार सुधारों की जरूरत है. एक देश के तौर पर  हम समय के उस मोड़ पर हैं जहां वर्तमान कुछ नहीं होता. वक्त या तो तुरंत आने वाला भविष्य होता है अथवा अभी बीता हुआ कल (अमेरिकी कॉमेडियन जॉर्ज कार्लिन). 2020 का पहला सूरज हमारे लिए सबसे निर्णायक उलटी गिनती की शुरुआत लेकर आया है, क्योंकि अवसरों के भंडार में अब केवल दस साल बचे हैं...

केवल दस साल!