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Sunday, March 19, 2023

सदि‍यों में होता है जो


 

अर्थव्‍यवस्‍थाओं को हमेशा के लिए कौन बदल सकता है .. 

मंदी

महामारी

युद्ध

राजनीत‍ि

शायद नहीं यह तो वक्‍त चादर की सलवटें हैं ...

अर्थव्‍यवस्‍थायें तो बदलते हैं लोग

बहुत से लोग

जनसंख्‍या की ताकत

दुन‍िया तो दरअसल संतानों का अर्थशास्‍त्र है

यह अर्थशास्‍त्र जब करवट लेता है तो महाप्रतापी समय भी नतमस्‍तक हो जाता है क्‍यों कि यह बदलाव सद‍ियों आते हैं और सदियों तक असर करते हैं.

अब दुनिया ठीक एसे ही एक महासंक्रमण की दहलीज पर है.

इसे समझने के लिए हमें कुछ पीछे जाना होगा

तो आइये बैठ‍िये एक टाइम मशीन में  और शुरु कीजिये तीन सौ साल का सफर. चलते हैं 18 वीं सदी से 21 वीं  सदी की तरफ यानी अतीत से वर्तमान की ओर

इस  यात्रा में सबसे पहले आपको दिखेगा यूरोप का बदलता नक्‍शा.  तीस साल लंबे युद्ध के बाद  यानी थर्टी इयर्स ऑफ वार के यूरोप के देशों के बीच वेस्‍टफीलिया की संध‍ि. 300 साल के सफर में आपको चीन में दो साम्राज्‍यों मिंग और क्‍व‍िंग का पतन नजर आएगा. नेपोल‍ियन के युद्ध मिलेंगे,  फ्रांस की क्रांति मिलेगी, यूरोप की औद्योगिक क्रांति मिलेगी. भारत मे मुगलों का पराभव मिलेगा. भारत और अमेरिका से कारोबार के लिए ब्रिटेन, पुर्तगाली, स्‍पेन, डच के बीच होड़ मिलेगी. फिर दिखेगी अमेरिका और भारत की गुलामी और आजादी का संघर्ष.  इस सफर में मिलेगा लाखों की जाने लेने वाला स्‍पेन‍िश फ्लू , महामंदी मिलेगी, दो महायुद्ध मिलेंगे.  ‍‍

अलबत्‍ता सम्राटों युद्धों और तबाही के इतिहास से अपनी नजरें हटायें तो आपको पता चलेगा कि यह दौर लोगों के लिए यानी आबादी के लिए सबसे बुरा था. गुलामी बर्बरता खून खच्‍चर गरीबी बदहाली . अध‍िकांश लोगों के पास इसके अलावा और कुछ नहीं था. यह दौर था जब दुनिया में औसत आयु केवल 27 साल थी. प्रजनन दन (फर्ट‍िल‍िटी रेट)  काफी ऊंची थी  एक महिला करीब छह बच्‍चों को जन्‍म देती थी लेक‍िन इनमें अधिकांश जीव‍ित नहीं रहते थे. आबादी की वृद्ध‍ि दर बमुश्‍क‍िल आधा फीसदी थी. 17 वीं 18 वीं सद‍ियां और 19 वीं सदी का बड़ा हिस्‍सा ऊंची जन्‍म दर, बड़ी संख्‍या में युवा आबादी, बदतर जीवन स्‍तर और ऊंची मृत्‍यु दर के साथ गुजरा था

फिर आप को म‍िलेगी 19 वीं सदी की शुरुआत जहां जिंदगी थोड़ी सी बदलने लगी. यूरोप में मृत्‍यु दर घटने लगी थी, जन्‍म दर भी कम हुई, फिर यह पूरी दुन‍िया में हुआ  और एक जनसंख्‍या संक्रमण आकार लेने लगा.  बीसवीं सदी की शुरुआत तक दुनिया की आबादी एक अरब के पास पहुंचने लगी थी. आबादी बढ़ने की रफ्तार रफ्ता रफ्ता तेज हो रही थी.

बीसवीं सदी की शुरुआत के साथ सब कुछ बदल गया जीवन प्रत्‍याशा दर बढ़ी. जन्‍म दर घटी और 21 वीं सदी की शुरुआत तक दुनिया की आबादी 1800 की तुलना में छह गुना बढ़ गई. बच्‍चों की तुलना में बुजुर्गों का अनुपात तीन गुना बढ़ा. करीब सौ साल पहले महिलायें अपने युवा जीवन का 70 फीसदी हिस्‍सा बच्‍चों जन्‍म देने और पालने में गुजारती थीं वह 21 वीं सदी की शुरुआत तक घटकर 14 फीसदी रह गया.

यही वह दौर था जब संतानों अर्थशास्‍त्र ने अर्थव्‍यवस्‍थाओं की सीरत और सूरत बदल दी. अमेरिका में बेबी बूमर्स (1946 से 1964 के बीच जन्मे) ने अमेरिका को 30 साल की सबसे तेज विकास दर की नेमत बख्शी, जिसे 2000 में बिल क्लिं‍टन ने नई अर्थव्यवस्था कहा था। (इन बेबी बूमर्स के हाथ अमेरिका की 70 फीसदी एसी कमाई (खर्च योग्य आय) है जिस पर बाजार झूम उठते हैं है). अमेरिका को एक और बड़े जनसंख्या संक्रमण का लाभ मिला जो 2000 की पीढ़ी थी जिन्हें मिलेनियल्स कहा गया हालांकि यह मिलेन‍ियल्‍स ठीक उस वक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था में आए जब 2008 की मंदी आ धमकी थी. इधर 1980 के बाद चीन और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं ने अपनी जनसंख्या को खपत, उत्पादन और श्रम शक्ति‍ का बाजार बनाया जबकि यूरोप में बुढापा घ‍िरने लगा  

आबादी की चक्‍की

कहते हैं जनसंख्‍या की चक्‍की इतनी धीमी चलती है और इतना महीन पीसती है हम अक्‍सर भूल ही जाते है लोगों से अर्थव्‍यवस्‍था बनती है है अर्थव्‍यवस्‍था से लोग नहीं.  यह पहिया अपना सबसे बड़ा संक्रमण करने जा रहा है. दुनिया में जनसंख्‍या का संतुलन स्‍थायी तौर पर बदलने जा रहा है. यह संक्रमण तीन सौ  साल में सबसे बड़ा बदलाव शुरु हो चुका है पहली बार होगा. आने वाले में दशकों में दुनिया को चाहे जो राजनीति बर्दाश्‍त करनी पड़े, चाहे जो  सरकारें आए या जाएं , विज्ञान और तकनीक के नए श‍िखर कितने भी ऊंचे हों जनसंख्‍या का यह परिवर्तन  कामागारों की कमी , वेतन बढ़ने के दबाव, उत्‍पादन में कमी और जिद्दी महंगाई लेकर आएगा

चौंक गए न !

यह चारों बदलाव अर्थव्‍यवस्‍था के बारे में हमारी मौजूदा समझ को उलट पलट कर सकते हैं लेक‍िन आबादी और अर्थव्‍यवस्‍था को रिश्‍तों को करीब से पढ़ने वाले इस संक्रमण की शुरुआत का बिगुल बजा रहे हैं. महामारी की चीख पुकार के बीच दुनिया के विशेषज्ञ जनसंख्‍या की नई करवट को समझ रहे हैं चार्ल्‍स गुडहार्ट और मनोज प्रधान की ताजा किताब द ग्रेट डेमोग्राफ‍िक रिवर्सल – एजिंग सोसाईटीज, वैनिंग इनइक्‍व‍िलिटीज एंड एन इन्‍फेलशन रिवाइवल इस संक्रमण पर नई रोशनी डालती है

 काम होगा कामगार नहीं

भारत की तपती बेरोजगारी के बीच यह बात कुछ अटपटी सी लगेगी लेक‍िन दुनिया की आबादी की नई करवट समझने वाले इस अनोखी किल्‍लत की तैयारी कर रहे हैं.

1950 के बाद दुनिया तीन धीमे लेक‍िन बड़े बदलाव हुए हैं. प्रजनन दर यानी फर्टि‍ल‍िटी रेट बीते शताब्‍दी की तुलना मेंआधी करीब 2.7 फीसदी रह गई. जिंदगी लंबी हुई. 2000 तक 50 साल में दुनिया की आबादी दोगुनी हो गई और युवा आबादी का अनुपात मजबूती से बढ़ने लगा. इस बदलाव ने दुनिया में कार्यशील आयु वाली लोगों की संख्‍या में तेज बढ़ोत्‍तरी की. यह चार्ट इस अभूतपूर्व बदलाव की नजीर है

श्रमिकों का आपूर्त‍ि का स्‍वर्ण युग आया 1990 के बाद. तब तक बेबी बूमर्स यानी 1950 से 1964 के बीच जन्‍मे लोग बाजार में आ गए थे. 1991 से 2018 विकस‍ित अर्थव्‍यवस्‍थाओ में श्रमिकों की आूपर्ति दो गुनी से ज्‍यादा हो गई. काम तो मिला लेक‍िन वेतन बहुत नहीं बढ़े क्‍यों कि श्रमिक आपूर्ति ज्‍यादा थी. चीन की विकास कथा इसी दौर मे बनती है. भारत और एश‍िया की अर्थव्‍यवस्‍थाओं ने भी इस संक्रमण को पूरा लाभ लिया. अलबत्‍ता उत्‍पादन बढ़ा और दुनिया ने करीब 28 साल तक महंगाई नहीं देखी. जिसका लाभ जीवन स्‍तर बेहतर होने के तौर पर सामने आया.

बीते करीब 60 सालों में दुनिया का हर परिवार बीती सदी के तुलना में अमीर हुआ है. छोटे परिवार रखना कमाई की गारंटी थी और लंबे समय तक काम करने का मौका था इसलिए आय में बढ़ोत्‍तरी हुई हालांकि यह पूरी दुनिया में असमान थी. क्‍यों कि एक छोटी सी आबादी की आय ज्‍यादा तेजी से बढ़ी.

अब यह पूरा पर‍िदृश्‍य  बदलने वाला है.  एक नई दुनिया हमारे सामने होगी.

दुनिया के ज्‍यादातर देशों में कार्यशील आबादी कम होती जाएगी. अब उतने श्रमिक नहीं होंगे. जापान, कोरिया, जर्मनी, रुस, चीन, इटली, फ्रांस, चीन  में अब बुढ़ापा घिर रहा है. चीन ने 1990 से 2015 के करीब 29 करोड लोग कार्यशील आबादी में जोडे.  अब 2050 तक 22 करोड़ लोग श्रम बाजार से बाहर हो जाएंगे क्‍यों कि उनकी उम्र काम के लायक नहीं रहेगी.

इसका असर धीमी आर्थ‍िक विकास दर के तौर पर सामने आएगा. विशेषज्ञ मान रहे हैं कि उत्‍पादन घटेगा क्‍यों कि श्रमिकों की कमी भी होगी, खपत भी गिरेगी. बहुत तेज विकास दर के दिन अब गए. अगले करीब तीन दशकों में भारत चीन जैसे एश‍ियाई अर्थव्‍यवस्‍थायें औसत 6 से 8 फीसदी के बीच विकास दर हासिल कर पाएंगी. यूरोप की अर्थव्‍यवस्‍थाओं कीविकास दर तो तीन फीसदी से भी नीचे रहेगी. यह संक्रमण  ग्‍लोबलाइजेशन की रफ्तार को भी धीमा कर सकता क्‍यों कि श्रमिकों आपूर्ति सीमित होगी. प्रवासी श्रमिकों को रोजगार देना राजनीतिक रुप से मुफीद नहीं होगा. इसलिए दुनिया को देशों के जो सामान सेवायें आयात करते थे उनमें से कई मामलेां उन्‍हें अपने यहां नई क्षमतायें बनानी होंगी

 महंगाई की वापसी

सन 2000 के बाद यहां युवा और बुजर्ग आबादी का अनुपात बदल रहा है. आबादी का का ड‍िपेंडेंसी रेश‍ियो कमजोर हो रहा है यह इस वक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था का सबसे प्रभावी फार्मूला है. यह अनुपात बताता है कि आबादी कार्यशील लोगों पर कितने बच्‍चे और बुजुर्ग निर्भर हैं.

किसी भी जनसंख्‍या में बच्‍चे और बुजुर्ग शुद्ध उपभोक्‍ता हैं. वह कार्यशील लोगों पर निर्भर हैं. यह आबादी उत्‍पादन करती है खपत करती है और बचत करती है. इसलिए इस अनुपात में गिरावट अर्थव्‍यवस्‍था के अचछी मानी जाती है. 1950 तक यह अनुपात संतुलित था. बाद के दशकों में इसमें बढोत्‍तरी हुई.  1990 के इसमें बढ़त हुई है. कार्यशील आबादी घट रही है जबकि उस पर निर्भर आबादी बढ़ रही है.

1990 के बाद  श्रम बाजार में औसत श्रमिकों की कार्यशील आयु स्‍थि‍र होने लगी थी. बाद मे वर्षों में इसमें तेज गिरावट आई. इसी के साथ सभी बडी अर्थव्‍यवस्‍थाओं में ड‍िपेंडेसी रेश‍ियो बढ़ने लगा

 आबादी का ड‍िपेंडेसी रेश‍ियो महंगाई के लिए सबसे जरुरी कारक है. 1870 से 2016 के बीच दुनिया के 22 प्रमुख देशों में महंगाई और जनसंख्‍या के रिश्‍तों पर अध्‍ययन बताता है कि कार्यशील आबादी कम होने से वेतन बढ़ने का दबाव बनता है. यद‍ि खपत करने वाली आबादी , उत्‍पादक आबादी से ज्‍यादा है तो मतलब है कि आबादी का एक  बड़ा हिस्‍सा  उतादन नहीं करेगा बल्‍क‍ि केवल उपभोग करेगा. इस उत्‍पादन के ल‍ि कम लोगों को ज्‍यादा वेतन देने होंगे जिसका असर उत्‍पादन लागत पर दिखता है. और इससे बढ़ती है महंगाई. आबादी में आयु का संतुलन बदलने के बाद खपत भी कम होती है जो उत्‍पादकों के कम बिक्री पर ज्‍यादा कीमत वसूलने का मौका देती है.

 जनसंख्‍या की चक्‍की धीमा पीसती है इसलिए सब कुछ तुरंत नहीं बदलेगा अलबत्‍ता लंबी अवध‍ि में कई बडे असर होने वाले हैं

-         महंगाई बढ़ने के साथ खपत में कमी और उपभोग में भी कमी क्‍योंकि बुढ़ाती आबादी की खपत कम होती है. इसका मतलब यह कि अब बल्‍ल‍ियों उछली विकास दर की जरुरत नहीं होगी क्‍यों कि मांग कम रहेगी

-         बुजर्ग आबादी अपनी पुरानी बचतों पर जियेगी नई बचतें नहीं होगी इसलिए  निवेश को कर्ज पर निर्भर रहना होगा. महंगाई के बीच यह पर‍िस्‍थ‍िति‍ ब्‍याज दरों को ऊंचा रख सकती है.

-         निवेश में कमी होने की संभावना कम है क्‍यों कि आबादी का संतुलन बदलने के साथ आवासों पर सबसे जयादा निवेश चाहिए. बुजुर्गों को रहने के लिए घर चाहिए. गुडहार्ट और प्रधान अपने अध्‍ययन बता रहे हैं कि पूरी दुनिया में हाउस‍िंग की मांग बढेगी अलबत्‍ता इसके लिए कर्ज भी जरुरत में भी इजाफा होगा

-         कर्ज इसल‍िए भी महंगा रह सकता है क्‍यों कि सरकारों को बुजुर्ग कल्‍याण पर खर्च बढ़ाना होगा. यह स्‍वास्‍थ्‍य पेंशन शहरी सुव‍िधाओं पर होगा. बीते करीब 40 सालों से सरकारों ने इस तरफ सोचा नहीं. अब बुजुर्ग आबादी सबसे बडी राजनीतिक मजबूरी बनती जाएगी.

-         सरकारों को पेंशन के पूरे ढांचे बदलने होगे. सेवानिवृत्‍त‍ि की आयु बढ़ाना जरुरी होगा क्‍यों कि जीवन प्रत्‍याशा बढ़ने से लोग 70 साल तक काम कर सकते हैं. यह पेंशन बजटों के संतुल‍ित करेगा

-          स्वास्थ्य सेवाओं को सड़कबिजलीदूरसंचार की तर्ज पर विकसित करना होगा ताकि कार्यशील आयु बढ़ाई जा सके और 65 की आयु वाले लोग 55 साल वालों के बराबर उत्पादक हो सकें.

-         मेकेंजी का मानना है कि स्वास्थ्य में नई तकनीकें लाकरबेहतर प्राथमि‍क उपचारसाफ पानी और समय पर इलाज देकर बडी आबादी की सेहत 40 फीसदी तक बेहतर की जा सकती है. स्वास्‍थ्य पर प्रति 100 डॉलर अतिरिक्त खर्च हों जीवन में प्रति वर्षएक स्वस्थ वर्ष बढाया जा सकता है. स्वास्थ्य सुविधायें संभाल कर, 2040 तक दुनिया के जीडीपी में 12 ट्रि‍ि‍लयन डॉलर जोडे जा सकते हैं जो ग्लोबल जीडीपी का 8 फीसदी होगा यानी कि करीब 0.4 फीसदी की सालाना बढ़ोत्तरी

-         विशेषज्ञ मान रहे हैं कि वेतन बढ़ने की संभावनाओं के बीच यह  बदलाव अगले कुछ दशकों में आय असमानता कम कर सकता है लेक‍िन यहां तस्‍वीर बहुत धुंधली है, वक्‍त ही बतायेगा कि क्‍या हुआ.

 

अर्थशास्‍त्र का सबसे लोहा लाट नियम किसी बैंक बजट या मुद्रा पर आधारित नहीं है. यह तो लोगों पर आधार‍ित है

आर्थ‍िक विकास = लोगों की संख्‍या में कमी बेशी+लोगों की उत्‍पादकता में बढ़ोत्‍तरी

 कोई भी अर्थव्‍यवस्‍था अर्थव्‍यवस्‍था लोगों की संख्‍या और उनकी उत्‍पादकता बढाकर ही आगे बढती है. यह फार्मूला मांग बचत और टैक्‍स का फार्मूला है

यही फार्मूला अब नई करवट ले रहा है

अगली सदी की दुनिया नई दुनिया होगी

 

 

चीन का सबसे सीक्रेट प्‍लान


 

 

चीन ने अपनी नई बिसात पर पहला मोहरा तो इस सितंबर में ही चल दिया था, उज्‍बेकिस्‍तान के समरकंद में शंघाई कोआपरेशन ऑर्गनाइजेशन की बैठक की छाया में चीन, ईरान और रुस ने अपनी मुद्राओं में कारोबार का एक अनोखा त्र‍िपक्षीय समझौता किया.  यह  अमेरिकी  डॉलर के वर्चस्‍व को  चुनौती देने के लिए यह पहली सामूहिक शुरुआत थी. इस पेशबंदी की धुरी है  चीन की मुद्रा यानी युआन.

नवंबर में जब पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ के बीज‍िंग में थे चीन और पाकिस्‍तान के केंद्रीय बैंकों ने युआन में कारोबार और क्‍ल‍ियर‍िंग के लिए संध‍ि पर दस्‍तखत किये. पाकिस्‍तान को चीन का युआन  कर्ज और निवेश के तौर पर मिल रहा है. पाक सरकार इसके इस्‍तेमाल से  रुस से तेल इंपोर्ट करेगी.

द‍िसंबर के दूसरे सप्‍ताह में शी जिनप‍िंग सऊदी अरब की यात्रा पर थे. चीन, सऊदी का अरब का सबसे बडा ग्राहक भी है सप्‍लायर भी. दोनों देश युआन में तेल की खरीद‍ बिक्री पर राजी हो गए. इसके तत्‍काल बाद जिनपिंग न गल्‍फ कोआपरेशन काउंस‍िल की बैठक में शामिल हुए  जहां उन्‍होंने शंघाई पेट्रोलियम और गैस एक्‍सचेंज में युआन में तेल कारोबार खोलने का एलान कर दिया.

डॉलर के मुकाबिल कौन

डॉलर को चुनौती देने के लिए युआन की तैयार‍ियां सात आठ सालह पहले शुरु हुई थीं केंद्रीय बैंक के तहत  युआन इंटरनेशनाइलेजेशन का एक विभाग है. जिसने 2025 चीनी हार्ब‍िन बैंक और रुस के साबेर बैंक से वित्‍तीय सहयोग समझौते के साथ युआन के इंटरनेशनलाइजेशन की मुहिम शुरु की थी. इस समझौते के बाद दुनिया की दो बड़ी अर्थव्‍यवस्थाओं यानी रुस और चीन के बीच रुबल-युआन कारोबार शुरु हो गया. इस ट्रेड के लिए हांगकांग में युआन का एक क्‍ल‍ियर‍िंग सेंटर बनाया गया था.

2016 आईएमएफ ने युआन को इस सबसे विदेशी मुद्राओं प्रीम‍ियम क्‍लब एसडीआर में शामिल कर ल‍िया.  अमेरिकी डॉलर, यूरो, येन और पाउंड इसमें पहले से शामिल हैं. आईएमएफ के सदस्‍य एसडीआर का इस्‍तेमाल करेंसी के तौर पर करते हैं.

चीन की करेंसी व्‍यवस्‍था की साख पर गहरे सवाल रहे हैं  लेक‍िन कारोबारी ताकत के बल पर एसडीआर  टोकरी में चीन का हिस्‍सा, 2022 तक छह साल में करीब 11 फीसदी बढ़कर 12.28  फीसदी हो गया.

कोविड के दौरान जनवरी 2021 में चीन के केंद्रीय बैंक ने ग्‍लोबल इंटरबैंक मैसेजिंग प्‍लेटफार्म स्‍व‍िफ्ट से करार किया. बेल्‍ज‍ियम का यह संगठन दुनिया के बैंकों के बीच सूचनाओं का तंत्र संचालित करता है  इसके बाद चीन में स्‍व‍िफ्ट का डाटा सेंटर बनाया गया.

चीन ने  बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटलमेंट के लिक्‍व‍िड‍िटी कार्यक्रम के तहत इंडोन‍िश‍िया, मलेश‍िया, हांगकांग , सिंगापुर और चिली के साथ मिलकर 75 अरब युआन का फंड भी बनाया है जिसका इस्‍तेमाल कर्ज परेशान देशों की मदद के लिए  के लिए होगा.

ड‍ि‍ज‍िटल युआन का ग्‍लोबल प्‍लान

इस साल जुलाई में चीन शंघाई, गुएनडांग, शांक्‍सी, बीजिंग, झेजियांग, शेनजेन, क्‍व‍िंगादो और निंग्‍बो सेंट्रल बैंक डि‍ज‍िटल युआन पर केंद्र‍ित एक पेमेंट सिस्‍टम की परीक्षण भी शुरु कर दिया. यह सभी शहर चीन उद्योग और व्‍यापार‍ के केंद्र हैं. इस प्रणाली से विदेशी कंपनियां को युआन में भुगतान और निवेश की सुपिवधा देंगी. यह अपनी तरह की पहला ड‍ि‍ज‍िटल करेंसी क्‍ल‍ियरिंग सिस्‍टम है हाल में ही बीजिंग ने ने हांगकांग, थाईलैंड और अमीरात के साथ  डिजिटल करेंसी में लेन देन के परीक्षण शुरु कर दिये हैं.

पुतिन भी चाहते थे मगर ...

2014 में यूक्रेन पर शुरुआती हमले के बाद जब अमेरिका ने प्रतिबंध  लगाये थे तब रुस ने डॉलर से अलग रुबल में कारोबार बढाने के प्रयास शुरु किये थे. और 2020 तक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर का हिस्‍सा आधा घटा दिया. जुलाई 2021 में रुस के वित्‍त मंत्री ने एलान किया कि डॉलर आधार‍ित विदेशी कर्ज को पूरी तरह खत्‍म किया जाएगा. उस वक्‍त तक यह कर्ज करीब 185 अरब डॉलर था.

रुस ने 2015 में अपना क्‍लियरिंग सिस्‍टम मीर बनाया.  यूरोप के स्‍व‍िफ्ट के जवाब मे रुस ने System for Transfer of Financial Messages (SPFS) बनाया है जिसे दुनि‍या के 23 बैंक जुड़े हैं.

अलबत्‍ता युद्ध और कड़े प्रतिबंधों से रुबल की आर्थि‍क ताकत खत्‍म हो गई. रुस अब युआन की जकड़ में है. ताजा आंकडे बताते हैं कि रुस के विदेशी मुद्रा भंडार में युआन का हिस्‍सा करीब 17 फीसदी है. चीन फ‍िलहाल रुस का सबसे बड़ा तेल गैस ग्राहक और संकटमोचक है.

यूरोप की कंपनियों की वि‍दाई के बाद चीन की कंपनियां रुस में सस्‍ती दर पर खन‍िज संपत्‍त‍ियां खरीद रही हैं.रुस का युआनाइेजशन शुरु हो चुका है.

भारत तीसरी अर्थव्‍यवस्‍था है जिसने अपनी मुद्रा यानी रुपये में कारोबार भूम‍िका बना रहा है. रुस पर प्रतिबंधों के कारण  भारतीय बैंक दुव‍िधा में हैं. भारत सबसे बड़े आयातक (तेल गैस कोयला इलेक्‍ट्रानिक्‍स) जिन देशों से होते हैं वहां भुगतान अमेरिकी डॉलर में ही होता है.

 

युआन की ताकत

 युआन ग्‍लोबल करेंसी बनने की शर्ते पूरी नहीं करता. लेक‍िन यह  चीन की मुद्रा कई देशों के लिए वैकल्पि‍क भुगतान का माध्‍यम बन रही है. चीन के पास दो बडी ताकते हैं. एक सबसे बडा आयात और निर्यात और दूसरा गरीब देशों को देने के लिए कर्ज. इन्‍ही के जरिये युआन का दबदबा बढा है. 

चीन के केंद्रीय बैंक का आंकड़ा बताता है कि युआन में व्‍यापार भुगतानों में सालाना 15 फीसदी की बढ़ोत्‍तरी हो रही है. 2021 में युआन में गैर वित्‍तीय लेन देन करीब 3.91 ट्र‍िल‍ियन डॉलर पर पहुंचा गए हैं. 2017 से युआन के बांड ग्‍लोबल बांड इंडेक्‍स का हिस्‍सा हैं. प्रतिभूत‍ियों में निवेश में युआन का हिस्‍सा 2017 के मुकाबले दोगुना हो कर 20021 में 60 फीसदी हो गया है.

दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद से अमेर‍िकी डॉलर व्‍यापार और निवेश दोनों की केंद्रीय करेंसी रही है. अब चीन दुन‍िया का सबसे बड़ा व्‍यापारी है इसलिए बीते दो बरस में चीन के केंद्रीय बैंक ने यूरोपीय सेंट्रल बैंक, बैंक ऑफ इंग्‍लैंड, सिंगापुर मॉनेटरी अथॉरिटी, जापान, इंडोनेश‍िया, कनाडा, लाओस, कजाकस्‍तान आद‍ि देशों के साथ युआन में क्‍ल‍िर‍िंग और स्‍वैप के करार किये हैं.दुनिया के केंद्रीय बैकों के रिजर्व में युआन का हिस्‍सा बढ़ रहा है.

इस सभी तैयार‍ियों के बावजूद चीन की करेंसी व्‍यवस्‍था तो निरी अपारदर्शी है फिर भी क्‍या दुनिया चीन की मुद्रा प्रणाली पर भरोसे को तैयार है? करेंसी की बिसात युआन चालें दिलचस्‍प होने वाली हैं

Friday, April 22, 2022

चीन क्‍या कर रहा है यह .... !

 



आनंद भाई का घनघोर कमाई वाट्स अप ग्रुप उदास रहता है अब घाटे कवर करने की सिफार‍िशों ही तैरती रहती हैं

लंबे वक्‍त तक शांत‍ि के बाद ग्रुप पर भूपेश भाई का संदेश चमका.

क्रेडिट सुइस ने भारत के शेयर बाजार में निवेश घटाकर चीन आस्‍ट्रेल‍िया और इंडोन‍ेशि‍या में बढ़ाने का फैसला क‍िया था

जेपी मोर्गन ने भी इंडिया का डाउनग्रेड कर दि‍या. यानी अब दूसरे बाजारों को तरजीह दी जाएगी.

आश्‍चर्य, असमंजस वाली इमोजी बरस पड़ी ग्रुप में

आनंद भाई ने पूछा यह विदेशी भारत से क्‍यों भाग रहे हैं

भूपेश भाई ने कहा ... लंबा किस्‍सा छोटे में किस तरह सुनाना

शाम को कॉफी पर मिलकर तलाशते हैं कि विदेशी निवेशक कहां जा रहे हैं यह चीन पर रीझने का नया मामला क्‍या है ?

शाम को लगी बैठकी ...

बात शुरु होते ही आनंद ने चुटकी ली कौन कमॉड‍िटी ट्रेड‍िंग शुरु कर रहा है अब ? देख‍िये 911 अरब डॉलर की एसेट संभालने वाला और 2.8 अरब के मुनाफे वाला स्‍विस बैंकर क्रेडिट सुई इक्‍व‍िटी बाजारों का लालच छोड़ कमॉड‍िटी वाली अर्थव्‍यवस्‍थाओं आस्‍ट्रेल‍िया चीन और इंडोनेश‍िया पर दांव लगा रहा है.

यह बाजार है पेचीदा  

भूपेश भाई बोले क‍ि कमॉड‍िटी वाले इन्‍हीं दिनों के इंतजार में थे कहते है कमॉडिटी ट्रेड‍िंग कमजोर दिल वालों का कारोबार नहीं हैं यहां बड़ा फायदा कम ही होता है. खन‍िज,तेल, कृष‍ि जिंस की कीमतें बढ़ने से महंगाई बढ़ती है इसलिए दुन‍िया में कोई कमॉड‍िटी या जिंस की महंगाई नहीं चाहता.

1970 से 2008 तक करीब चालीस साल में शेयर बाजार और प्रॉपर्टी कहां से कहां पहुंच गए लेक‍िन बकौल रसेल इंडेक्‍स कमॉडिटी पर सालाना रिटर्न 6.24 फीसदी ही रहा. 2008 से 2021 के बीच दरअसल यह रिटर्न नकारात्‍मक -12.69 फीसदी रहा लेकिन उतार-. चढाव बहुत तेज हुआ यानी भरपूर जोखिम और नुकसान.

क्रूड ऑयल, नेचुरल गैस, सोना चांदी, कॉपर, निकल, सोयाबीन, कॉर्न, शुगर और कॉफी सबसे सक्रिय कमॉडि‍टी हैं. जनवरी 2022 में जारी विश्‍व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 50 साल यह बाजार पूरी ग्‍लोबल वजहों से खौलता है. पांच दशक में करीब 39 कमॉड‍िटी कीमतों बढ़ने वजह अंतरराष्‍ट्रीय रही हैं. यह कॉमन ग्‍लोबल फैक्‍टर मेटल और एनर्जी पर यह समान कारक ज्‍यादा ज्‍यादा असर करता है. कृषि‍ और उर्वरक पर कम. 

1990 के बाद से तो कीमतों पर इस कॉमन फैक्‍टर का असर  30 से 40 फीसदी हो गया. यानी कि मेटल व एनर्जी की कीमतों में बदलाव और उथल पुथल पूरी दुनिया में एक साथ होती है

मनी की नई गण‍ित

कमॉडिटी में उतार चढाव नए नहीं लेक‍िन एसा कया हुआ कि विदेशी निवेशकों को इक्‍वि‍टी की जगह कमॉड‍िटी में भविष्‍य दिखने लगा.

दरअसल रुस का विदेशी मुद्रा भंडार जब्‍त होने के बाद यह अहसास हुआ कि जिस करेंसी रिजर्व को प्रत्येक संकट का इलाज माना जाता है वही बेकार हो गया है.

क्रेडिट सुई के विशेषज्ञ जोलान पोत्‍जार ने इस नए पर‍िदृश्‍य को ब्रेटन वुड्स थ्री की शुरुआत कहा है. पहला ब्रेटन वुड्स की पहली मौद्रि‍ क व्‍यवस्‍था में अमेरिकी डॉलर की कीमत सोने के साथ के समानांतर तय हुई थी. अमेर‍िकी राष्‍ट्रपति  रिचर्ड न‍िक्‍सन 1971 में इसे खत्‍म कर डॉलर की सोने परिवर्तनीयता रद्द कर दी. इसके बाद आई इनसाइड मनी जो जो दअरसल बैंकों का कर्ज लेन देन है. इसमें मनी एक तरफ जमाकर्ता की एसेट है तो दूसरी तरफ बैंक व कर्ज लेने की देनदारी.

मनी की चार कीमतें होती हैं एक अंक‍ित मूल्‍य यानी फेस वैल्‍यू, दूसरा टाइम वैल्‍यू यानी ब्‍याज, तीसरा दूसरी मुद्रा से विनिमय दर कि और चौथी प्राइस वैल्‍यू यानी किसी कमॉडिटी के बदले उसका मूल्‍य.

जोलान पोत्‍जार कह रहे हैं कि अब यह चौथी कीमत के चढ़ने का दौर है. दुनिया के देश और केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडारों को सोने व धातुओं से बदल रहे हैं. यही वजह है कि  रुस का संकट बढ़ने के साथ कमॉड‍िटी कीमत और फॉरवर्ड सौदे नई ऊंचाई पर जा रहे हैं.

करेंसी और कमॉड‍िटी का यह नया रिश्‍ता दुनिया  उन देशों को करेंसी को मजबूत कर रहा है जिनके पास धातुओं ऊर्जा के भंडार है जिनके पास यह नहीं है वे विदेशी मुद्रा भंडार के डॉलर को जिंसो से बदल रहे हैं. इनमें चीन सबसे आगे है जिसके पास 3000 अरब डॉलर का भरपूर विदेशी मुद्रा भंडार है 

इसलिए क्‍या अचरज क‍ि क्रेडिट सुई जैसे निवेशक चीन पर दांव लगायेंगे.

 

चीन की तैयार‍ियां

भूपेश भाई पानी पीने के लिए रुके तो आनंद चीन के आंकड़े लेकर आ गए

चीन का दुनिया का सबसे बड़ा जिंस उपभोक्‍ता और दूसरा सबसे बड़ा आयातक है. सीमेंट, निकल, स्‍टील, कॉटन, अल्‍युमिन‍ियम, कॉर्न, सोयाबीन, कॉपर, जिंक, कच्‍चा तेल और  कोयला के आयात व खपत में दुनिया या पहले या दूसरे नंबर पर है.

2021 में जब दुनिया कोविड की उबरने की कोशिश मे थी तब मंदी के बावजूद चीन ने कमॉडि‍टी आयात का अभियान शुरु किया. आस्‍ट्रेल‍िया की वेबसाइट स्‍टॉकहेड के मुताबिक 2021 में चीन में कोयला ,ऑयरन ओर, सोयाबीन का आयात 2020 की तुलना में 6 से 18 फीसदी तक बढ़ा. कॉपर व स्‍क्रैप के आयात में 80 फीसदी इजाफा हुआ.  नेचुरल गैस, कोबाल्‍ट और  कोयले के आयात भी नई ऊंचाई पर था.

2021 में नैसडाक की एक र‍िपोर्ट, फूड प्रोसेस‍िंग उद्योग के आंकड़े और स्‍वतंत्र अध्‍ययन बताते हैं क‍ि 2020 में डॉलर की  कमजोरी के कारण चीन ने बीते साल तांबा और कृषि ‍उत्‍पादों का आयात बढ़ाकर भारी भंडार तैयार किया है.

चीन कमॉडिटी के गोपनीय रणनीतिक रिजर्व बनाता हैं. रायटर्स की एक रिपोर्ट बताती है कि चीन में करीब 15 से 20 लाख टन तांबा , 8-9 लाख टन अल्‍युम‍िन‍ियम, 4 लाख टन जिंक, 700 टन कोबाल्‍ट  का रिजर्व है. निकल, मॉलबेडनम, इंडियम आदि के रिजर्व भी बनाये हैं. 200 मिलियन बैरल का तेल और 400 मिल‍ियन टन का कॉमर्श‍ियल कोल रिजर्व है और गेहूं, सोयाबीन व कॉर्न के बडे भंडार हैं.

चीन का सोना भंडार 

गोल्‍ड अलायंस की एक रिपोर्ट चौंकाती है 2021 में हांगकांग के जरिये चीन का शुद्ध सोना आयात 40.9 टन से बढ़कर 334.3 टन हो गया हो गया. यह आंकड़ा स्‍विस कस्‍टम से जुटाया गया है जहां से चीन का अध‍िकांश सोना आता है. इसके बदले अमेरिका को चीन का सोना निर्यात 508 टन से घटकर 113 टन रह गया.

इसके अलावा चीन दुनिया का सबसे बड़ा सोना उत्‍पादक भी है. गोल्‍ड अलायंस के अनुसान बीते 20 साल में चीन में 6500 टन सोना निकाला गया.. चीन इस सोने का निर्यात नहीं करता. चीन की कंपनियां दुनिया के देशों में जो सोना निकालती हैं, शंघाई गोल्‍ड एक्‍सचेंज से उसका कारोबार होता है.

ढहता रुस किसका?

रुस के संकट के बाद अब चीन की नजर वहां की खनन व तेल कंपनियों पर है. ब्‍लूमबर्ग की एक रिपोर्ट बताती है कि चीन की विशाल सरकारी तेल, ऊर्जा, अल्‍युम‍िन‍ियम कंपनियां रुस की गैजप्रॉम, यूनाइटेड, रसेल आदि के संपर्क में हैं क्‍यों यूरोपीय कंपनियों रुसी दिग्‍गजों से रिश्‍ते तोड़ लिये हैं. 

क्रेडिट सुई के पोल्‍जार ठीक कहते हैं. रुसी कमॉडिटी सब प्राइम सीडीओ जैसी हैं जिनमें डिफाल्‍ट हो रहा है जबकि कमॉड‍िटी में अमीर अन्‍य देश अब अमेरिका के ट्रेजरी बिल जैसें जिनकी साख चमक रही है.

युद्ध खत्‍म होने तक कमॉड‍िटी चीन की बादशाहत और मजबूत हो जाएगी. डॉलर अभी मजबूत है क्‍यों कि वह दुनिया की केंद्रीय मुद्रा है लेक‍िन बाजार यह मान रहा है कि युद्ध के बाद डॉलर कमजोर होगा और तब कमॉडटी की ताकत के साथ चीन का युआन कहीं ज्‍यादा मजबूत होगा.  

जेपी मोर्गन और क्रेडटि सुई को देखकर आनंद और भूपेश भाई कि एक कमॉडिटी का सुपरसाइक‍िल शुरु हो रहा है. जहां कमॉड‍िटी की महंगाई  लंबे वक्‍त चलती है.

पहला सुपरसाइकिल 1890 में अमेरिका के औद्योगीकरण से लेकर पहले विश्‍व युद्ध  तक चला. दूसरी सुपरसाइक‍िल दूसरे विश्‍वयुद्ध से 1950 तक और तीसरी 1970 से 1980 तक और तीसरी 2000 में शुरु हुई जब चीन डब्‍लूटीओ में आया था लेकि‍न 2008 के बैंकिंग संकट ने इसे बीच में रोक दिया.

उत्‍पादन बढ़ने व मांग आपूर्त‍ि का सुधरने में वक्‍त लगता है इसलिए कमॉड‍िटी के सुपरसाइकिल लंबी महंगाई लाते हैं. यद‍ि धातुओं उर्जा की तेजी एक सुपरसाइकिल है तो भारत के लि‍ए अच्‍छी खबर नहीं है. भारत को सस्‍ता कच्‍चा माल और सस्‍ती पूंजी चाहिए और भरपूर खपत भी. नीति नि‍र्माताओं को पूरी गणित ही बदलनी पडेगी. शायद यही वजह है भारत की विकास दर को लेकर अनुमानों में कटौती शुरु हो गई है