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Sunday, February 11, 2018

टैक्स सत्यम्, बजट मिथ्या

सत्य कब मिलता है ?

लंबी साधना के बिल्कुल अंत में.

जब संकल्प बिखरने को होता है तब अचानक चमक उठता है सत्य. 

ठीक उसी तरह जैसे कोई वित्त मंत्री अपने 35 पेज के भाषण के बिल्कुल अंत में उबासियां लेते हुए सदन पर निगाह फेंकता है और बजट को सदन के पटल पर रखने का ऐलान करते हुए आखिरी पंक्तियां पढ़ रहा होता है, तब ...
अचानक कौंध उठता है बजट का सत्य.

टैक्स ही बजट का सत्य है, शेष सब माया है.

एनडीए सरकार के आखिरी पूर्ण बजट की सबसे बड़ी खूबी हैं इसमें लगाए गए टैक्स.

करीब 90,000 करोड़ रु. के कुल नए टैक्स के साथ यह पिछले पांच साल में सबसे ज्यादा टैक्स वाला बजट है.

पिछले पांच साल में अरुण जेटली ने 1,33,203 करोड़ रु. के नए टैक्स लगाए औसतन करीब 26,000 करोड़ रु. प्रति वर्ष. पांच साल में केवल 53,000 करोड़ रु. की रियायतें मिलीं. 2014-15 और 17-18 के बजटों में रियायतें थीं, जबकि अन्य बजटों में टैक्स के चाबुक फटकारे गए. जेटली के आखिरी बजट में टैक्सों का रिकॉर्ड टूट गया. 

टैक्स तो सभी वित्त मंत्री लगाते हैं लेकिन यह बजट कई तरह से नया और अनोखा है.

ईमानदारी की सजा

वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में जानकारी दी थी कि देश में आयकरदाताओं की तादाद 8.67 करोड़ (टीडीएस भरने वाले लेकिन रिटर्न न दाखिल करने वालों को मिलाकर) हो गई है. टैक्स बेस बढऩे से (2016-17 और 2017-18) में सरकार को 90,000 करोड़ रु. का अतिरिक्त राजस्व भी मिला. लेकिन हुआ क्या? ईमानदार करदाताओं का उत्साह अर्थात् टैक्स बेस बढऩे से टैक्स दर में कमी नहीं हुई.
याद रखिएगा कि इसी सरकार ने अपने कार्यकाल में कर चोरों को तीन बार आम माफी के मौके दिए हैं. एक बार नोटबंदी के बीचोबीच काला धन घोषणा माफी स्कीम लाई गई. तीनों स्कीमें विफल हुईं. कर चोरों ने सरकार पर भरोसा नहीं किया.
आर्थिक सर्वेक्षण ने बताया कि जीएसटी आने के बाद करीब 34 लाख नए करदाता जुड़े हैं लेकिन वह सभी जीएसटीएन को बिसूर रहे हैं और टैक्स के नए बोझ से हलकान हैं.

ताकि सनद रहे: टैक्स बेस में बढ़ोतरी यानी करदाताओं की ईमानदारी, सरकार को और बेरहम कर सकती है.  

सोने के अंडे वाली मुर्गी

भारतीय शेयर बाजारों में अबाधित तेजी को पिछले चार साल की सबसे चमकदार उपलब्धि कहा जा सकता है. मध्य वर्ग ने अपनी छोटी-छोटी बचतों से एक नई निवेश क्रांति रच दी. म्युचुअल फंड के जरिए शेयर बाजार में पहुंची इस बचत ने केवल वित्तीय निवेश की संस्कृति का निर्माण नहीं किया बल्कि भारतीय बाजार पर विदेश निवेशकों का दबदबा भी खत्म किया.
इस बजट में वित्त मंत्री ने वित्तीय निवेश या बचत को नई रियायत तो नहीं उलटे शेयरों में निवेश पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस और म्युचुअल फंड पर लाभांश वितरण टैक्स लगा दिया. शेयरों व म्युचुअल फंड कारोबार पर अब पांच (सिक्यूरिटी ट्रांजैक्शन, शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस, लांग टर्म कैपिटल गेंस, लाभांश वितरण और जीएसटी) टैक्स लगे हैं. बाजार गिरने के लिए नए गड्ढे तलाश रहा है.

ताकि सनद रहे: वित्तीय निवेश को प्रोत्साहन नोटबंदी का अगला चरण होना चाहिए था. ये निवेश पारदर्शी होते हैं. भारत में करीब 90 फीसदी निजी संपत्ति भौतिक निवेशों में केंद्रित है. नए टैक्स के असर से बाजार गिरने के बाद अब लोग शेयरों से पैसा निकाल वापस सोना और जमीन में लगाएंगे जो दकियानूसी निवेश हैं और काले धन के पुराने ठिकाने हैं. 

लौट आए चाबुक

उस नेता को जरूर तलाशिएगा, जिसने यह कहा था कि जीएसटी के बाद टैक्स का बोझ घटेगा और सेस-सरचार्ज खत्म हो जाएंगे. इस बजट ने तो सीमा शुल्क में भी बढ़ोतरी की है, जो करीब एक दशक से नहीं बढ़े थे. नए सेस और सरचार्ज भी लौट आए हैं. सीमा शुल्क पर जनकल्याण सेस लगा है और डीजल-पेट्रोल पर 8 रु. प्रति लीटर का सेस. आयकर पर लागू शिक्षा सेस एक फीसदी बढ़ गया है. यह सब इसलिए कि अब केंद्र सरकार ऐसे टैक्स लगाना चाहती है जिन्हें राज्यों के साथ बांटना न पड़े. ऐसे रास्तों से 2018-19 में सरकार को 3.2 लाख करोड़ रु. मिलेंगे.

जीएसटी ने खजाने की चूलें हिला दी हैं. इसकी वजह से ही टैक्स की नई तलवारें ईजाद की जा रही हैं. जीएसटी के बाद सभी टैक्स (सर्विस, एक्साइज, कस्टम और आयकर) बढ़े हैं, जिसका तोहफा महंगाई के रूप में मिलेगा.


सावधान: टैक्स सुधारों से टैक्स के बोझ में कमी की गारंटी नहीं है. इनसे नए टैक्स पैदा हो सकते हैं. 

Tuesday, June 27, 2017

सही साबित होने का अफसोस

नोटबंदी या डिमॉनेटाइजेशन बहुत बड़ा उलटफेर था. इसकी विफलता से उठने वाले सवाल नोटबंदी के फैसले से ज्‍यादा बडे हो गए हैं 

लत सिद्ध होने का संतोष, कभी-कभी सही साबित होने से ज्यादा कीमती होता है. सरकारी नीतियों के बनते या लागू होते वक्त जोखिमों को रोशनी में लाना और चेतावनियों की टेर लगाना जरूरी है. नीतियों के नतीजे यदि आशंकाओं के विपरीत अर्थात् अच्छे आएं तो लोकतंत्र में पत्रकारिता की यह विफलता शुभ और श्रेयस्कर ही होगी.

नोटबंदी के दौरान इस स्तंभ को पढ़ते रहे लोग याद करेंगे इस फैसले को लेकर जितनी आशंकाएं जाहिर की गईंवे एक-एक कर सच साबित हुईं.

काशनोटबंदी से जुड़े डर सच न होते और हम गलत साबित होते!

नोटबंदी या डिमॉनेटाइजेशन बहुत बड़ा उलटफेर था. इसकी भव्य विफलता ने बहुत कुछ तोड़ दिया है.

नोटबंदी की बैलेंस शीट
  - इस साल जनवरी से मार्च के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर घटकर 6.1 फीसद (इससे पिछली तिमाही में 7 फीसदी) रह गई. यह नोटबंदी के बाद पहली तिमाही थी. पूरे वित्त वर्ष (2016-17) की विकास दर आठ फीसदी की बजाए 7.1 फीसदी रह गई. भारत ने दुनिया की सबसे तेज दौड़ती अर्थव्यवस्था का दर्जा गंवा दिया. जब संगठित औपचारिक अर्थव्यवस्था इस कदर टूट गई तो नकद पर काम करने वाली छोटी इकाइयोंकारोबारों और रोजगारों का क्या हाल हुआ होगा?
  - याद कीजिए गरीब कल्याण योजना जो नोटबंदी के साथ आई थीजिसमें पुराने नोटों में काला धन घोषित करने पर 50 फीसदी टैक्स और घोषित धन का एक-चौथाई चार माह सरकार के पास जमा रखने की शर्त थी. इस योजना में केवल 5,000 करोड़ रु. जमा हुए. सरकार ने मान लिया कि स्कीम ढह गई.
  - नोटबंदी के छह माह पूरे होने से पहले ही लोग वापस नकदी की तरफ लौट आए. बकौल रिजर्व बैंक केडिजिटल माध्यमों से वित्तीय लेन-देननोटबंदी के पहले वाले स्तर पर पहुंच गया. पता नहीं कि ''भीम" और यूपीआइ कहां गए?
  - रिजर्व बैंक में पुराने नोटों की गिनती सतयुग आने तक चलेगी. वित्त मंत्रालय काले धन की फिक्र छोड़ जीएसटी की उधेड़बुन में है. 
  - नोटबंदी के जरिए काले धन के बारे भरपूर सूचनाएं मिली थीं लेकिन उत्तर प्रदेश का चुनाव शुरू होते ही छापेमारी और पड़ताल बंद हो गई.
  - नोटबंदी के बाद रिजर्व बैंक ने भी कर्ज सस्ते करने से तौबा कर ली.

इस हिसाब-किताब में हमें उन वादों की श्रद्धांजलि मिल जाएगी जो नोटबंदी के दौरान सरकारी मंत्रियों के बड़बोले उच्छवासों से फूटते थे.

नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था को कई गुप्त चोटें दी हैं जिनके ठीक होने में बहुत लंबा वक्त लगेगा.

  - काले धन के खिलाफ या तो सख्ती की जा सकती है या फिर लोगों को कालिख धोने के मौके यानी टैक्स माफी की स्कीमें उपलब्ध कराई जा सकती हैं. नोटबंदी पहला ऐसा अभियान था जिसमें दोनों पैंतरे आजमाए गए. तीन साल में तीन (एक विदेशी कालाधन के लिए और दो देशी) ऐसी स्कीमें आईं जो काले धन वालों को पवित्र होने का मौका देती थींलेकिन तीनों ही नाकाम रहीं. नोटबंदी के चाबुक से कितना काला धन निकलासरकार यह बताने को तैयार नहीं है. इस कौतुक में न तो सरकारी सख्ती की साख बची और न रियायतों की. काले धन को लेकर सरकारी कोशिशों पर आगे कोई आसानी से भरोसा करेगाइस पर शक है.

  - नोट बदलने के दो महीनों ने बैंकिंग तंत्र को भ्रष्ट कर दिया. लोगों का जमा बैकों की बैलेंस शीट पर बोझ बन गया. नोटबंदी के दौरान कर्ज चुकाने से मिली रियायतों ने फंसे हुए कर्जों के बोझ को और बढ़ा दिया. पहले से हलाकान बैंक अब ज्यादा मुसीबत में हैं. सरकार के पास उन्हें उबारने के लिए संसाधन नहीं हैं.

  - रिजर्व बैंक की साख और स्वायत्तता पुराने नोटों के ढेर में दब गई है.

 - हमें शायद ही कभी यह पता चल सके कि नोटबंदी से उन ''खास" लोगों की जिंदगी पर क्या असर पड़ा जिन्हें सजा देने के लिए आम लोगों को गहरी यंत्रणा से गुजरना पड़ा था.

  - और अंत में.. नोटबंदी के साथ सरकार के नए चेहरे से हमारा परिचय हुआ है जो एक क्रांतिकारी कदम के लिए पूरे देश को सिर के बल खड़ा कर देती है पर नतीजे बताने का मौका आने पर पीठ दिखा देती है. 

हम नहीं मानते कि नोटबंदी यूपी के चुनावों से प्रेरित थी. राजनीति इतनी गैर जिम्मेदार कैसे हो सकती है ??   

नोटबंदी सिद्ध करती है कि सरकार साहसी फैसले लेने में सक्षम है लेकिन विफलता बताती है कि हकीकत से कटा साहस आत्मघाती हो जाता है.

हमें अपने सही साबित होने का अफसोस है.



Tuesday, July 5, 2016

बार बार मिलने वाला आखिरी मौका

काला धन रखने वालेे सरकार पर कभी भरोसा नहीं करते लेकिन फिर भी उन्‍हें हर दशक में एक बार बच निकलने का मौका जरुर मिल जाता है

दि आप ईमानदारी से अपना टैक्स चुकाते हैं और सरकार से किसी मेहरबानी की उम्मीद नहीं रखते तो आपको इस बात पर चिढ़ जरूर होनी चाहिए कि यह कैसा आखिरी मौका है जो बार-बार आता है और जो सिर्फ टैक्स चोरों और काली कमाई वालों को ही मिलता है. बीते सप्ताह प्रधानमंत्री ने ''न की बात" में काले धन की स्वैच्छिक घोषणा की नई स्कीम को जब आखिरी मौका कहा तो वे दरअसल इतिहास को नकार रहे थे. हकीकत यह है कि नई स्कीम काले धन (घरेलू) के पाप धोकर चिंतामुक्त होने का आखिरी नहीं बल्कि एक और नया मौका है. आम करदाताओं के लिए सहूलियतें भले न बढ़ी हों लेकिन आजादी के बाद लगभग हर दशक में एक ऐसी स्कीम जरूर आई है जो कर चोरों को बच निकलने का एकमुश्त मौका देती है.

कर चोरों को माफी देने की स्कीमों के नैतिक सवाल हमेशा से बड़े रहे हैं क्योंकि यह ईमानदार करदाताओं के साथ खुला अन्याय है. इसलिए ज्यादातर देश विशेष हालात में ही ऐसी पहल करते हैं. भारत में माफी स्कीमों के दोहराव ने नैतिकता के सवालों को तो पहले ही नेस्तनाबूद कर दिया थाअब तो इनकी भव्य विफलता कर प्रशासन की साख के लिए बड़ी चुनौती है. लेकिन इसके बाद भी सरकारें यह जुआ खेलने से नहीं हिचकतीं.

एनडीए सरकार पिछले 65 वर्षों की दूसरी सरकार (1965 में तीन स्कीमें) है जो दो साल के भीतर कर चोरों को सजा से माफी (टैक्स चुकाने के बाद) की दो स्कीमें ला चुकी है. अचरज तब और बढ़ जाता है जब हमें यह पता हो कि 2015 में विदेश में जमा काले धन की महत्वाकांक्षी स्वैच्छिक घोषणा की स्कीम सुपर फ्लॉप रही. इसमें केवल 3,770 करोड़ रु. का काला धन घोषित हुआ और सरकार के खजाने में महज 2,262 करोड़ रु. का टैक्स आया. इसके बाद एक और स्कीम समझनीयत और नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े करती है.

कर चोरों को बार-बार मिलने वाले ''आखिरी" मौकों का इतिहास बहुत लंबा है लेकिन इससे गुजरना जरूरी है ताकि हमें काली कमाई करने वालों के प्रति अक्सर उमडऩे वाली सरकारी सहानुभूति का अंदाज हो सके और यह पता चल सके कि इन स्कीमों के डीएनए में ही खोट है.

आजादी मिले चार साल ही बीते थे जब 1951 में पहली वॉलेंटरी डिस्क्लोजर स्कीम आई. त्यागी स्कीम (तत्कालीन राजस्व और खर्च मंत्री महावीर त्यागी) के नाम से जानी गई यह खिड़की केवल 70 करोड़ रु. का काला धन और 10-11 करोड़ रु. का टैक्स जुटा सकी क्योंकि लोगों को आगे कार्रवाई न होने का भरोसा नहीं था.

1965 भारत-पाक युद्ध का वर्ष था. उस साल तीन स्कीमें आई थीं. इनमें एक सिक्स फोर्टी स्कीम थी और दूसरी ब्लैक स्कीम. दोनों की कर दर ऊंची थी इसलिए केवल 49 करोड़ रु. का टैक्स मिला. उसी साल सरकार ने काला धन जुटाने के लिए नेशनल डिफेंस गोल्ड बॉन्ड जारी किए जिसमें निवेश करने वालों का ब्यौरा गोपनीय रखा गया लेकिन बॉन्ड बहुत लोकप्रिय नहीं हुए.

इमरजेंसी की छाया में 1975 में आई स्कीम में कंपनी और व्यक्तिगत आय को घोषित करने और 25 से 60 फीसदी टैक्स देने पर सजा से माफी का प्रावधान था. स्कीम से केवल 241 करोड़ रु. का राजस्व मिला. 1978 में 1,000 रु. के नोट बंद करके काले धन को सीमित करने की कोशिश हुई. काले धन के निवेश के लिए 1981 में स्पेशल बॉन्ड जारी हुए जिसमें रिटर्न कर मुक्त था जो बहुत कामयाब नहीं हुए. काली संपत्ति की घोषणा पर 1985 में आयकर विभाग ने छूट के प्रावधान किए और 1986 में इंदिरा विकास पत्र लाए गए जो काली कमाई के निवेश का मौका देते थे. 1991 की नेशनल हाउसिंग डिपॉजिट स्कीम भी काली कमाई निकालने में नाकाम रही.

1991 की फॉरेन एक्सचेंज रेमिटेंस स्कीम और नेशनल डेवलपमेंट बॉन्ड में काले धन की घोषणा पर माफी का प्रावधान था. ये बॉन्ड अपेक्षाकृत सफल रहे लेकिन 1993 की गोल्ड  बॉन्ड स्कीम को समर्थन नहीं मिला. 1997 की वीडीआइएस अकेली स्कीम थी जो 33,697 करोड़ रु. के काले धन और 9,729 करोड़ रु. के टैक्स के साथ सबसे सफल प्रयोग थी.

इतिहास प्रमाण है कि काला धन माफी स्कीमों का डिजाइन लगभग एक-सा हैकेवल टैक्स पेनाल्टी दरों में फर्क आता रहा है. यह स्कीमें सूचनाओं की गोपनीयता के प्रति कभी भी भरोसा नहीं जगा सकींबल्कि बाद के कुछ मामलों में टैक्स की पड़ताल ने विश्वास को कमजोर ही किया. कर दरें ऊंची होने के कारण भी काला धन रखने वाले स्वैच्छिक घोषणा को लेकर उत्साहित नहीं हुए. 

इन स्कीमों के बार-बार आने से काला धन तो बाहर नहीं आया और न ही काली कमाई के कारखाने बंद हुएअलबत्ता इन स्कीमों के कारण कर प्रशासन का उत्साह और रसूख टूट गया. टैक्स सिस्टम से लेकर बाजार तक सबको यह मालूम है कि हर दशक में इस तरह का आखिरी मौका फिर आएगा. इसलिए एक बार सफाई के बादकाली कमाई जुटाने वाले अगली स्कीम का इंतजार करने लगते हैं.

1971 में वांचू कमेटी ने पिछली तीन स्कीमों के अध्ययन के आधार पर कहा था कि हमें भरोसा है कि कर माफी या काला धन घोषणा की कोई स्कीम न केवल असफल होगीबल्कि ईमानदार करदाता का विश्वास और कर प्रशासन का उत्साह टूटेगा. इसलिए भविष्य में स्कीमें नहीं आनी चाहिए. 1985 में शंकर आचार्य कमेटी ने कहा कि काला धन को सीमित करने की कोशिशों को इन स्कीमों से कोई फायदा नहीं हुआ. 

असफलता को दोहराने की एक सीमा होती है लेकिन भारत मे काले धन पर माफी की स्कीमें तो विफलताओं का धारावाहिक बन चुकी हैं. पिछले छह-सात दशकों में काले धन को बाहर लाने के लगभग सभी तरीके अपनाने और असफल होने के बाद भी जब नए मौके तैयार किए गए तो क्या यह शक नहीं होना चाहिए कि ये स्कीमें सिर्फ इसलिए लाई जाती हैं कि हर दशक में एक बार काला धन रखने वालों को बच निकलने का मौका देना जरूरी हैक्योंकि इसके अलावा तो इन स्कीमों से और कुछ भी हासिल नहीं हुआ है.