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Friday, December 23, 2022

ये नहीं तो कुछ नहीं


 

 

यूरोप के देश कई हफ्तों से यही तो सुनने के लिए व्‍याकुल थे. अगस्‍त के आख‍िरी सप्‍ताह में जर्मनी ने एलान क‍र दिया कि पुतिन का ब्‍लैकमेल नहीं चलेगा. जर्मनी में गैस के 80 फीसदी भंडार भर चुके हैं. अगले साल तक रुस निर्भरता और खत्‍म हो जाएगी.

इस एलान के वक्‍त रुस ने जर्मनी को गैस ले जाने वाली नॉर्डस्‍ट्रीम पाइपलाइन से तीन दिन तक सप्‍लाई बंद कर दी थी. सितंबर के पहले सप्‍ताह में यह आपूर्ति पूरी तरह रोक दी गई. लेक‍िन इस बीच जर्मनी ने न केवल छह माह में अपनी ऊर्जा सुरक्षा का बंदोबस्त कर ल‍िया बल्‍क‍ि महंगाई थामने के लिए महंगी बिजली के बदलने लोगों को राहत देने का पैकेज भी तैयार कर लिया.

यूक्रेन पर रुस के हमले के बाद यूरोप ने रिपॉवर ईयू कार्यक्रम प्रारंभ किया था. जिसका मकसद 2027 तक रुस पर ऊर्जा निर्भरता खत्‍म करना था. एलएनजी का आयात इस कार्यक्रम का आधार था. ाीजभी जर्मनी के द बंदरगाहों विलहेल्‍मसहैवेन और ब्रूंसबुटल, यूरोप की इस नई ताकत का आधार हैं.

विलहेल्‍मसहैवेन यह शहर नॉर्थ सी खाड़ी में जर्मनी का प्रमुख डीप वाटर बंदरगाह है जो एम्‍स और वीजर नदियों की बीच जेड डेल्‍टा में स्‍थ‍ित है ब्रूंसबुटेल भी नॉर्थ सी में एल्‍ब नदी के मुहाने पर स्‍थित है. कील नहर दुनिया का सबसे व्‍यस्‍त मानवन‍िर्मित वाटरवे यानी जलमार्ग है.

यह दोनों ही जर्मनी में आयात‍ित एलएनजी के नए केंद्र हैं. यहां जर्मनी ने चार  floating storage and regasification units (FSRUs) लगाये हैं. इन्‍हे तैरते हुए गैस टर्मिनल समझ‍िये जहां तरल एलएएनजी जमा होती है और  उसे गैस में बदला जाता है. बूंसबुटेल के दूसरी तरफ यानी एल्‍ब नदी के पास हैम्‍बर्ग के करीब पोर्ट ऑफ स्‍टेड में भी ठीक इसी तरह के टर्मिनल बन रहे हैं .बाल्‍ट‍िक तट पर ल्‍युबम‍िन में भी तैरते हुए गैस टर्मिनल एलएनजी जमा करेंगे.

एलएनजी आयात की क्षमतायें बढ़ाकर जर्मनल ने रिपॉवर ईयू

2021 में जर्मनी की जरुरत की 55 फीसदी गैस रुस से आती थी जो इस साल जून में घटकर 26 फीसदी रह गया. अब जर्मनी अगले साल तक रुस पर निर्भरता पूरी तरह खत्‍म करने की तरफ बढ़ गया है.

यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था जर्मनी की गैस में बढ़ती आत्‍मनिर्भरता यूरोप के लिए ठीक वैसा ही अवसर है जैसा कि 1970 में अमेरिका में हुआ था जब इजरायल अरब युद्ध में, इज़रायल के समर्थन पर अरब देशों ने अमेरिका का तेल का निर्यात बंद कर दिया था. इसके बाद अमेरिका ने नए ऊर्जा स्रोतों, शेल और गैस में निवेश किया. यही गैस आज पुतिन के ब्‍लैकमेल को जवाब देने के लिए यूरोप के काम भी आ रही है.

 

भारत की ऊर्जा पहेली

लौटते हैं अपने मुल्‍क की तरफ

यूरोप पूरा घटनाक्रम भारत के लिए कई जरुरी नसीहतों से लबरेज़ है. प्रधानमंत्री ने इस साल स्‍वाधीनता दिवस पर अपने संबोधन में ऊर्जा आत्‍मनिर्भरता की हुंकार लगाई. हालांकि बात उन्‍होंने इलेक्‍ट्र‍िक वाहनों के संदर्भ में की थी. इससे ज्‍यादा कुछ कहना मुश्‍कि‍ल भी था क्‍यों कि 2022 भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सबसे निराशाजनक या कहें कि अपशकुनी साल बन गया है.

यह साल ऊर्जा की संसाधनों की खौलती कीमतों के बीच  भारत ऊर्जा सुरक्षा के कमजोर होते जाने का है. सैकड़ों सुर्ख‍ियों के बीच क्‍या हमें याद है कि 2015 में सरकार ने तय किया था आयात‍ित कच्‍चे तेल पर निर्भरता को 2022 में दस फीसदी घटा दिया जाएगा. 2022 की वह साल भी है जब भारत थर्मल कोल यानी बिजली के लिए कोयले के आयात बंद करने का एलान कर चुका था. यह एलान बीते बरस कोयला मंत्रालय के एक चिंतन श‍िविर में हुआ था, जो गुजरात के केवड़‍िया में आयोजित किया गया था.

कोयले और तेल के साथ नेचुरल गैस की आपूर्ति भी घट रही है.

सनद रहे कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा केवल रुस यूक्रेन युद्ध के कारण मुश्‍क‍िल में नहीं आई यहां तो मुसीबत पुरानी है और लंबी लंबी बातों के बीच उत्‍पादन में गिरावट बढ़ती गई है इधर लीथि‍यम, बैटरी, तकनीक, सोलर सेल्‍स और हाइड्रोजन फ्यूल के आयात पर निर्भरता के बाद पूरा ऊर्जा क्षेत्र भी आयात का मोहताज हो गया है जो विदेशी मुद्रा भंडार के ल‍िए किसी संकट की पदचाप है.

 

सबसे पहले देखते हैं कच्‍चे तेल की तरफ .. जहां कुछ चाहते थे कुछ और ही हो गया है.

 

तेल में यह क्‍या हुआ

इस साल अप्रैल से अगस्‍त के बीच भारत में कच्‍चे तेल के आयात का बिल करीब 99 अरब डॉलर पर पहुंच गया. इससे पहले मार्च 2022 तक भारत का तेल आयात 2021 के मुकाबले दोगुना बढ़कर 119 अरब डॉलर हो गया था.

यदि हम इसे रुस यूक्रेन युद्ध के कारण तेल की कीमतों में लगी का आग का असर मानते हैं तो दरसअल यह रेत में सर डाल देने जैसा है.

2015 में सरकार ने लक्ष्‍य रखा था कि 2022 तक तेल आयात पर भारत की निर्भरता 87 फीसदी से घटाकर 77 फीसदी और 2030 तक 50 फीसदी कर दी जाएगी. लेक‍िन हुआ इसका उलटा. 2015 से तेल आयात पर भारत की निर्भरता बढ़ने लगी. सरकार के पेट्रोल‍ियम प्‍लानिंग एंड एनाल‍िसिस सेल के आंकड़ो के अनुसार जून 2022 में भारत अपनी जरुरत का  87 फीसदी तेल आयात करने लगा. वह भी इतनी ऊंची कीमतों पर .

 

अब आइये आपको भारत की ऊर्जा सुरक्षा के खलनायक से मिलवाते हैं. भारत में कच्‍चे तेल का घरेलू उत्‍पादन वित्‍त वर्ष 2022 में 28 साल के न्‍यूनतम स्‍तर पर आ गया.

भारत में बुनियादी उद्योगों का एक सूचकांक है जिसमें मासिक आधार पर तेल, कोयला, स्‍टील, बिजली आदि उद्योगों के उत्‍पादन वृद्धि का आकलन किया जाता है. इस सूचकांक के आधार पर बीते चार बरस से भारत का कच्‍चा तेल उत्‍पादन लगातार गिर रहा है.

ओएनजीसी सबसे बड़ा खलनायक है. दूसरी सरकारी कंपनी ऑयर इंडिया है. इन दोनों पर घरेलू उत्‍पादन का दारोमदार है. इनका उत्‍पादन लगातार गिर रहा है. ओएनजीसी में तेल उत्‍पादन का बुरा हाल है.  कंपनी का तेल उत्‍पादन बीते चार साल में करीब 10 से 16 फीसदी गिरा है. नए रिजर्व जोड़ने की रफ्तार करीब 35 फीसदी टूटी है. देश की शीर्ष तेल खोज कंपनी अपने पूंजी खर्च का इस्‍तेमाल भी नहीं कर पा रही है.

 

सरकार कंपन‍ियां ही नहीं निजी क्षेत्र के घरेलू कच्‍चे तेल उत्‍पादन में भी गिरावट आ रही है. भारत के तेल कुएं सूख रहे हैं. ड्राइ वेल्‍स सबसे बड़ी समस्‍या हैं. तेल की खोज में निवेश नहीं हुआ है इसलिए जितने भंडार थे वह निचोड़े जा चुके हैं. नए भंडार उपलब्‍ध नहीं हैं. अगर आप अपने ज़हन पर जोर डालकर बीते वर्षों में आई तेल खोज नीति यानी एनईएलपी और एचईएलपी की याद कर पूछना चाहते हैं कि उनसे क्‍या नए स्रोत नहीं मिले? तो आपको पता चले कि यह नीतियां असफलता का सबसे बड़ा स्‍मारक बन चुकी हैं

1999 से 2016 तक तेल ब्‍लॉक आवंटन की कोश‍िशें लगभग असफल रहीं. कोई बड़ी विदेशी कंपनी आई नहीं और जिन कंपन‍ियों ने लाइसेंस ल‍िये भी वह ब्‍लॉक छोड़कर निकल गईं. 2018 की तेल खोज लाइसेंस नीति में 127 ब्‍लॉक आवंट‍ित हुए हैं उत्‍पादन किसी में नहीं हो रहा है.

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी का आकलन है कि इलेक्‍ट्रि‍क वाहनों के आने बावजूद 2040 तक भारत में क्रूड ऑयल की मांग कम से 7 मिल‍ियन बैरल प्रत‍िद‍िन के हिसाब से बढ़ेगी.

आप खुद अंदाज लगा सकते हैं कि लगातार महंगे कच्‍चे तेल की बीत भारत की तेल आत्‍मनिर्भरता का क्‍या हश्र होने वाला है.

 

कोयले की ट्रेजडी

भारत इस साल करीब 76 मिल‍ियन टन कोयला आयात करेगा. जो बीते कई वर्षों का रिकार्ड है. भारत की 90 फीसदी बिजली थर्मल यानी कोयला आधारित है. इस साल कोयले का आयात करीब 40 फीसदी बढ़ा है. यह आयात बीते कई बरसों में कोयले की सबसे महंगी कीमत पर होगा. 

कोयले की त्रासदी, क्रूड ऑयल से ज्‍यादा दर्दनाक है. भारत दुनिया का दूसरा सबसे कोयला खनन वाला देश है. पांचवा सबसे बड़ा कोयला भंडार है. बीते साल अक्‍टूबर में सरकार ने दावा किया कि कोयला उत्‍पादन बढ़ रहा है. इस साल यानी 2022 से थर्मल कोल का आयात बंद हो जाएगा लेक‍िन इस साल पूरी आपूर्ति चरमरा गई. जनवरी के बाद बिजली घर बंद होने लगे. सरकार को न केवल कोयला आयात को बढ़ावा  देना पड़ा बल्‍क‍ि देश की सबसे बड़ी कोयला उत्‍पादक कंपनी कोल इंड‍िया खुद ही इंपोर्टर होगई.

कोयले में समस्‍या उत्‍पादन की ही नहीं बल्‍क‍ि आपूर्ति और ि‍बजली घरों तक कोयला पहुंचाने की भी है. कोल इंडिया को अगले एक साल कोयला ढुलाई की क्षमताओं मसलन रेल लाइन, ढुलाई तकनीक में करीब 14000 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा

कोल इंडिया मांग का 80 फीसदी कोयला उत्‍पादन करती है लेक‍िन कंपनी का निवेश नहीं बढ़ा है. नई खदानों को खोलने का काम पिछड़ा है. करीब 39 खदानें लंबित मंजूर‍ियों की वजह से अधर में हैं. बीते पांच बरस में कोयला खदानों के निजीकरण कोश‍िश भी सफल नहीं हुई. कोयला नीति में बड़े बदलावों के बाद 2020 में करीब 40 खदानों को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया था मगर नि‍वेश नहीं आया. हाल के कोयला संकट के बाद कोल इंड‍िया ने बंद पड़ी खदानों के निजीकरण की तैयारी की थी मगर बाजार से कोई उत्‍सुकता नहीं दिखी.

गैस तो है ही नहीं

पूरी दुनिया में नेचुरल गैस की ले दे मची है. रुस यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप से लेकर चीन तक गैस की आपूर्ति बढ़ाने के नए उपायों की होड़ है. नेचुरल गैस भविष्‍य का ईंधन है सुरक्षि‍त और सस्‍ता. रिकार्ड तेजी है कीमतों में.

भारत में ऊर्जा की चर्चायें तेल से आगे नहीं निकलती,  नेचुरल गैस पर चर्चा केवल सीएनजी की कीमतें बढ़ने की वजह से होती है.

नेचुरल गैस भी सरकारों के कुछ कहने और कुछ होने का प्रमाण है. सरकार ने यह लक्ष्‍य रखा था कि भारत की ऊर्जा आपूर्ति में गैस का हिस्‍सा 2030 तक आज के 6.4 फीसदी  से बढ़ाकर 15% किया जाएगा.

अलबत्‍ता बीते एक दशक में भारत में नेचुरल गैस का उत्‍पादन लगातार गिर रहा है. 2013 में यह 39 एमएमएससीएम था जो अब 33 एमएमएससीएम है जबकि मांग दोगुानी बढ़कर 63MMSCM पर पहुंच गई. यहां भी उत्‍पादन की खलनायक ओनएनजीसी है जो करीब 61 फीसदी उत्‍पादन करती है.

आयात पर निर्भरता बढ़ रही है क्‍यों कि उर्वरक, बिजली, परिवहन और घरेलू आपूर्ति की मांग सालाना करीब 10 फीसदी की गति से बढ रही है. मांग की आधी गैस आयात होती है. रुस यूक्रेन युद्ध और दुनिया में गैस की कीमतें बढ़ने के बाद भारत की प्रमुख गैस कंपनी को आयात में दिक्‍कत होने लगी. रुस की कंपनी गैजप्रॉम आपूर्ति का प्रमुख स्रोत थी जिस पर प्रत‍िबंध लगा हुआ है.

भारत में एलएनजी टर्मिनल हैं लेक‍िन गैस नहीं है. बीते बरस इन टर्मिनल की केवल 59 फीसदी क्षमता का उपयोग हो सका था. एलएनजी आयात की लागत बढ़ रही है. कीमतों को लेकर तस्‍वीर साफ नहीं होती क्‍येां कि सरकार हर छह माह में कीमतों पर फैसला करती है इसलिए आयात भी कम है.

 

भारत में नए एलएनजी टर्म‍िनल बन रहे हैं. जिनमें बैकों का बड़ा निवेश फंसा है लेक‍िन गैस कहां से आएगी इसकी यह पता नहीं है. यूरोप में गैस की मांग बढ़ने के बाद मध्‍य पूर्व ने अपनी आपूर्ति यूरोप की तरफ मोड़ दी है, भारत को नए स्रोत नहीं मिल रहे हैं

 

नए चुनौतियां

भारत की इलेक्‍ट्र‍िक वाहनों की फैशनेबल चर्चाओं से गुलजार है. हाइड्रोजन और सोलर ऊर्जा की उडाने हैं. बैटरी को लेकर भारत के पास कच्‍चा माल और तकनीक दोनों नहीं है. जबकि बैटरी के ईंधन जैसे लीथि‍यम, कोबाल्‍ट की कीमतें बढ रही हैं. बैटरी तकनीक का आयात ही एक रास्‍ता है. भारत इस साल करीब 13000 करोड़ रुपये के लीथियम का इंपोर्ट करेगा.

यह है सबसे कठिन पहेली

अगले 25 वर्षों में विकस‍ित देश बनने के लक्ष्‍य रखने वाले शायद ऊर्जा सुरक्षा पर बात करने से कतराते हैं. यह भारत की विकास की कोश‍िशों का सबसे बड़ा गर्त है.

ऊर्जा के आइने में आत्‍मनिर्भरता को तो छोड़ि‍ये और छोड़‍िये ग्रोथ की छलांग को यहां तो एक कामचलाऊ विकास दर के लिए भी सस्‍ती ऊर्जा का टोटा होने वाला है.

भारत  दो राहे पर है.

लाख कोश‍िशों के बावजूद भौगोलिक तौर पर भारत के पास बड़े ऊर्जा स्रोत नहीं हैं, चाहे तेल गैस हो या बैटरी खनिज. इसे आयात से ही काम चलेगा. जहां कीमतें नई ऊंचाई पर हैं. कार्टेल हैं और सस्‍ता होने की गुंजायश नहीं है. ऊपर से टूटता घरेलू मुद्रा आयात महंगा करती जाएगाी

दूसरी तरफ बिजल और बिजली चलित वाहनों के लिए कोयला है लेक‍िन तो उसकी निकासी, आपूर्ति पर भारी निवेश चाहिए. इसके बाद पर्यावरण के ल‍िए सुरक्ष‍ित बनाना होगा जो बहुत महंगा सौदा है.

भारत की सरकारें फिलहाल तात्‍कालिक उपायों या सपनों उड़ान में लगी हैं. ऊर्जा सुरक्षा की पूरी नीति पर नये सिरे से तैयारी चाहिए. हम आज के यूरोप या 1970 के अमेरिका से सीख सकते हैं सनद रहे भारत के आर्थ‍िक विकास की गति में स्‍थायी ऊर्जा महंगाई का पत्‍थर बंध चुका है. यह हमें दौड़ने तो दूर तेज चलने भी नहीं देगा.

Friday, October 21, 2022

क‍िंग कोल की वापसी


साल 1306 ब्रिटेन की गर्म‍ियां. नाइट्स, बैरन्‍स बिशप्‍स
यानी ब्रिटेन के सामंत गांवों में मौजूद अपनी रियासत और किलों से दूर लंदन आए थे. जहां संसद का पहला प्रयोग हो रहा था.

सामंतों का स्‍वागत किया लंदन की आबोहवा में घुली एक अजीब सी गंध ने. एक तीखी चटपटी सी महक जो नाक से होकर गले तक जा रही थी

यह गंध कोयले की थी.

उस वक्‍त तक लंदन के कारीगर लकड़ी छोड़ कर एक काले पत्‍थर को जलाने लगे थे.

सामंतों ने  धुआं धक्‍कड़ का विरोध व‍िरोध किया तो सम्राट एडवर्ड कोयले इस्‍तेमाल रोक दिया. पाबंदी ने बहुत असर नहीं कि‍या. तो सख्‍ती हुई जुर्माने लगे, फर्नेस तोड़ दी गईं.

 

मगर वक्‍त कोयले के साथ था. 1500 में ब्रिटेन में ऊर्जा की क‍िल्‍लत हो गई. ब्रिटेन दुनिया का पहला देश हो गया जहां कोयले का संगठित और व्‍यापक खनन शुरु हुआ. पहली औद्योगिक क्रांति कोयले के धुंए में लिपट धरती पर आई.

करीब 521 साल बाद दुनिया को फिर कोयले के धुएं से तकलीफ महसूस हुई. धुआं-धुआं आबोहवा पृथ्‍वी का तापमान बढ़ाकर विनाश कर रही थी.  

नवंबर 2021 में ग्‍लासगो में दुनिया की जुटान में तय हुआ कि 2030 तक विकस‍ित देश और 2040 तक विकासशील देश कोयले का इस्‍तेमाल बंद कर देंगे. इसके बाद थर्मल पॉवर यानी कोयले वाली बिजली नहीं होगी.

भारत-चीन राजी नहीं थे मगर 40 देशों ने कोयले से तौबा कर ली. 20 देशों ने यह भी तय किया कि 2022 के अंत से कोयले से बिजली वाली परियोजनाओं वित्‍त पोषण यानी कर्ज आदि बंद हो जाएगा. बैंकरों में  मुनादी पिट गई. नई खदानों पर काम रुक गया.

एंग्‍लो आस्‍ट्रेल‍ियन माइन‍िंग दिग्‍गज रिओ टिंटो ने आस्‍ट्रेल‍िया की अपनी खदान में 80 फीसदी हिस्‍सेदार बेच कर कोयले को श्रद्धांजलि की कारोबारी रजिस्‍ट्री कर दी थी.

लौट आया काला सम्राट  

कोयला मरा नहीं.

फंतासी नायक या भारतीय दोपहर‍िया टीवी सीरियलों के हीरो के तरह वापस लौट आया. पुतिन ने यूक्रेन पर हमला कर दुनिया की ऊर्जा योजनाओं को काले सागर में डुबा दिया. पर्यावरण की सुरक्षा के वादे और दावे पीछे छूट गए. पूरी दुनिया कोयला लेने दौड़ पड़ी है. सबसे आगे वे ही हैं जो कोयले का युग बीतने की दावत बांट रहे थे

दुनिया की करीब 37 फीसदी बिजली कोयले से आती है इस‍का क्षमता का अध‍िकांश हिस्‍सा यूरोप से बाहर स्‍थापित था. यूरोस्‍टैट के आंकड़ों के मुताबिक 2019 तक यूरोप की अपनी केवल 20 फीसदी ऊर्जा के लिए कोयले का मोहताज था. बाकी ऊर्जा सुरक्षित स्रोतों और गैस से आती थी.

यूरोप 2025 तक अपने अध‍िकांश कोयला बिजली संयंत्र खत्‍म करने वाला था लेक‍िन अब रुस की गैस न मिलने के बाद बाद आस्‍ट्र‍िया जर्मनी इटली और नीदरलैंड ने अपने पुराने कोयला संयंत्र शुरु करने का एलान किया है.

इंटरनेशनल इनर्जी एजेंसी (आईईए)  ने बताया है कि यूरोपीय समुदाय में कोयले की खपत 2022 में करीब 7 फीसदी बढ़ेगी जो 2021 में 14 फीसदी बढ़ चुकी है. पूरी दुनिया में कोयले की खपत इस साल यानी 2022 में 8 बिल‍ियन टन हो जाएगी जो 2013 की रिकार्ड खपत के बराबर है.

कोयले की कीमत भी चमक उठी है. इस मई में यह 400 डॉलर प्रति टन के रिकार्ड स्‍तर पर को छू गई.

माइन‍िंग डॉट कॉम और इन्‍फोरिसोर्स ने बताया कि विश्‍व के ताजा खनन न‍िवेश में कोयले अब तांबे से आगे है 2022-23 में करीब 81 अरब डॉलर की 1863 कोयला परियोजनायें सक्रिय हैं 2022 के जून तक दुनिया की कोल सप्‍लाई चेन में निवेश रिकार्ड 115 अरब डॉलर पर पहुंच गया था इसके बड़ा हिस्‍सा चीन का है.

दुनिया के बैंकर और कंपन‍ियां कोयले को पूंजी दे रहे हैं. इंडोनेश‍िया दुनिया सबसे बड़ा न‍िर्यातक और पांचवा सबसे बड़ा कोयला उत्‍पादक है यहां के माइनिंग उद्योग को सिटी ग्रुप, बीएनपी पारिबा, स्‍टैंडर्ड एंड चार्टर्ड का कर्ज जनवरी 2022 में 27 फीसदी बढ़ा है. एश‍िया की कोयला जरुरतों के लि‍हाज से इंडोनेश‍िया सबसे बड़ा सप्‍लायर है.

अमेरिका कोयले का स्‍व‍िंग उत्‍पादक है. बीते बरस चीन ने आस्‍ट्रेल‍िया से कोयला आयात पर रोक लगाई थी उसके बाद अमेरिका का कोयला निर्यात करीब 26 फीसदी बढ़ा है..

 

भारत और चीन की बेचैनी

 

रुस, इंडोनेशिया और आस्‍ट्रेल‍िया कोयले सबसे बड़े निर्यातक है इनके बाद दक्षि‍ण अफ्रीका और कनाडा आते हैं. चीन, जापान और भारत से सबसे बड़े आयातक हैं अब यूरोप भी इस कतार में शामिल होने जा रहा है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी बता रही है भारत और चीन की मांग ने बाजार को हिला दिया है. इनकी कोयला खपत पूरी दुनिया कुल खपत की दोगुनी है.

दुनिया की आधी कोयला मांग तो केवल चीन से निकलती है.चीन की 65 फीसदी बिजली कोयले से आती है. उसके पास कोयले का अपना भी भारी भंडार है. गैस की महंगाई और कि‍ल्‍लत के कारण यहां नई खनन परियोजनाओ में निवेश बढ़ाया जा रहा

भारत में इस साल फरवरी में कोयले का संकट आया. महाकाय सरकारी कोल कंपनी कोल इंड‍िया आपूर्तिकर्ता की जगह आयातक बन गई. इस साल भारत का कोयला आयात बीते साल के मुकाबले तीन गुना हो गया है..ईआईए का अनुमान है कि भारत में कोयले की मांग इस साल 7 से 10 फीसदी तक बढ़ेगी.

सब कुछ उलट पलट

ग्रीनहाउस गैस रोकने वाले इस साल कोयले से रिकार्ड बिजली बनायेंगे. नौ फीसदी की बढ़त के साथ यह उत्‍पादन इस साल 10350 टेरावाट पर पहुंच जाएगा.

कोयला दुनिया का सबसे अध‍िक कार्बन गहन जीवाश्‍म ईंधन है. पेरिस समझौते का लक्ष्‍य था इसकी खपत घटाकर ग्‍लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्‍स‍ियस कम किया जाएगा.

2040 तक कोयले को दुनिया से विदा हो जाना था. लेक‍िन तमाम हिकारत, लानत मलामत के बाद भी कोयला लौट आया है. अब अगर  दुनिया को धुंआ रहित कोयला चाहिए एक टन कोयले को साफ करने यानी सीओ2 कैच का खर्चा 100 से 150 डॉलर प्रति टन हो सकता है. बकौल ग्‍लोबल कॉर्बन कैप्‍चर एंड रिसोर्स इंस्‍टीट्यूट के मुताबिक दुनिया को हर साल करीब 100 अरब डॉलर लगाने होंगे यानी अगले बीच साल में 650 बिल‍ियन से 1.5 ट्रि‍ल‍ियन डॉलर का निवेश.

यानी धुआं या महंगी बिजली दो बीच एक को चुनना होगा ..

और यह चुनाव आसान नहीं होने वाला.

 

Friday, May 6, 2022

क्‍या से क्‍या हो गया ?




2022 की गर्मियों में भारत में क्‍या हो रहा है

वही जो 2021 में 2011, 2014, 2018 में हुआ था

यानी कोयले की किल्‍लत, बिजली कटौती और केंद्र और राज्‍य सरकारों के बीच आरोपों का लेन देन

इस बार नया क्‍या है?

कोयले की कमी का ताजा संस्‍करण भारत की ऊर्जा की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है. आयात‍ित कच्‍चे तेल के बाद भारत इंपोर्टेड कोयले का मोहताज होने वाला है.

एसी क्‍या मजबूरी है

इस पहले क‍ि इस संकट को कोई रुस यूक्रेन युद्ध से जोड़ दे हमें कुछ जरुरी तथ्‍य देखकर चश्‍मे साफ कर लेने चाहिए

-         भारत में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार है और दूसरा सबसे बड़ा उत्‍पादक है. 

-        भारत दुनिया में बिजली का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक हैबिजली की उत्पादन क्षमता बढ़ने की दर 8.9 फीसद है जो  जीडीपी और बिजली की औसत सालाना मांग  (पीक डि‍मांड) बढ़ने से  ज्यादा तेज है.

-         2012 के बाद से पारेषण (ट्रांसमिशनक्षमता 7% की दर से बढ़ी है

फिर भी बीते दस साल में हर दूसरे वर्ष हम बिजली को तरसते हैं

वही पुरानी कहानी

अक्‍टूबर 2021 में  बिजली घरों के पास दो तीन दिन (24 दिन का स्‍टॉक जरुरी)  का कोयला बचा था. कोल इंड‍िया से उत्‍पादन और आपूर्ति बढ़ाने को कहा गया. अक्‍टूबर के अंत में दावा किया गया बिजली घरों के पास कोयला पहुंचा दिया गया है यानी सब ठीक है

ठीक कुछ भी नहीं था. दो महीने बाद जनवरी से मार्च के दौरान बिजली की पीक डिमांड मांग औसत 187 गीगावाट पर पहुंच गई.  गर्मी शुरु होते ही अप्रैल के पहले पखवाड़े में मांग ने 197 गीगावाट की मंजिल छू ली. कोयला आपूर्ति की कमर टूट गई. बिजली उत्‍पादन यानी प्‍लांट लोड फैक्‍टर में एक फीसदी की बढत पर कोयले की मांग करीब 10 मिल‍ियन टन बढ़ जाती है. बिजली की मांग दस फीसदी से ज्‍यादा बढ चुकी है. महाकाय कोल इंडिया के पास  100 मिल‍ियन टन की आपूर्ति तुरंत बढ़ाने की क्षमता नहीं  

आयात‍ित कोयले की कीमत 280-300 डॉलर प्रति टन की ऊंचाई पर है. बिजली कंपनियां अगर इसे खरींदें तो तत्‍काल बिजली महंगी करनी होगी जो संभव नहीं है.

अप्रैल के तीसरे सप्‍ताह तक बिजली घरों के पास कोयला स्‍टॉक   सात साल के सबसे निचले स्‍तर पर आ गया. बिजली एक्‍सचेंज कीमतें  राज्‍य सरकारों की क्षमता के बाहर हो गईं.  

ऊर्जा क्रांति बैठ गई.

भारत की करीब 60 फीसदी बिजली कोयले से आती है. करीब 100  बिजली घर कोयले पर आधार‍ित हैं, 79 घरेलू कोयले पर और 11 आयात‍ित कोयले से चलते हैं.  

भारत में कुल सालाना खपत का 111 गुना ज्‍यादा कोयला भंडार है. कोल इंडिया 7.7 करोड़ टन का उत्‍पादन (2021-22) करती है. जो  8.5 फीसदी की सालाना गति से बढ़ रहा है. दो करोड टन कोयले का सालाना आयात होता है.

फिर संकट क्‍यों ?

यह न कहियेगा कि सरकार को  बिजली की मांग बढ़ने, कोयले की आपूर्ति कम पड़ने और रिकार्ड गर्मी का अंदाज नहीं था. कोयले और बिजली की कमी प्राकृतिक नहीं है. यह संकट ऊर्जा सुधारों की सालाना पुण्‍य त‍िथि‍ जैसा बन गया है. इसे समझने में लिए तीन सवालों से मुठभेड़ जरुरी है

पहला – बिजली घरों के पास कोयले के पर्याप्‍त  भंडार क्‍यों नहीं बन पाते

जवाब – बिजली वितरण कंपन‍ियां बिजली उत्‍पादकों को वक्‍त पर बिजली का पैसा नहीं चुकाती हैं. बिजली दरें सरकारें तय करती हैं. सब्‍स‍िडी का पैसा कंपनियों को मिलता नहीं. यहां तक सरकारें अपनी खपत की बिजली का पैसा भी नहीं चुकातीं. पूरा कारोबार उधार का है. बिजली दरें न बढ़ने के कारण बिजली कंपनियां करीब 5.2 लाख करोड़ के नुकसान में हैं.  राज्‍यों पर 1.1 लाख करोड़ रुपये सब्‍सिडी और मुफ्त बिजली के मद में बकाया हैं.

2001 के बाद  के बीच बिजली बोर्ड या वितरण कंपनियों  को बकाए और     कर्ज से उबरने के लिए चार बार कर्ज पैकेज दिये गए लेक‍िन बिजली वितरण कंपनियों पर इस समय बिजली उत्‍पादन कंपनियों का का करीब 1.25 लाख करोड़ बकाया है.

दूसरा सवाल – कोल इंडि‍या  वक्‍त पर आपूर्ति क्‍येां नहीं बढ़ा पाती?

जवाब - कोयले की कुल मांग का 83 फीसदी हिस्‍सा कोल इंडिया से आता है. उत्‍पादन में बढ़त नई खदानों पर निर्भर है जो नौकरशाही और पर्यावरण की मंजूरी के कारण अटकी हैं. कोल इंडिया के पास 35000 करोड़ का सरप्‍लस व रिजर्व लेक‍िन सरकार उससे लाभांश निचोड़ती है. नई खदानों में निवेश वरीयता पर नहीं है

बीते साल अक्‍टूबर में निजी ब‍िजली उत्‍पादकों ने आपूर्ति में कमी को लेकर कोल इंडिया पर जुर्माना लगाने की मांग की थी

तीसरा सवाल -  निजी खदानों का क्‍या हुआ?  

-         कोयला ब्‍लॉक आवंटन घोटाले के बाद 2014 में सब ठीक होने का दावा किया गया लेकिन 2018 में कोयला संकट फिर लौट आया.

-         2020 में
 निजी क्षेत्र को कोयला खदानें देने का फैसला हुआ. 70 फीसदी खदानों के लिए बोलियां ही नहीं आईं. जब कोल इंडिया की खदानों की मंजूरी वक्‍त पर नहीं होती तो निजी निवेशकों की कौन सुन रहा.  

-         इंटरनेशनल इनर्जी फाइनेंस एंड इकोनॉमिक एनाल‍िसिस का  अध्‍ययन बताता है कि भारत के कोयले की गुणवत्‍ता अच्‍छी नहीं है इसलिए निर्यात की संभावना सीमित है.  दुनिया के बैंकर क्‍लाइमेट चेंज की शर्तों के कारण कोयला परियोजनाओं में निवेश कम कर रहे हैं. इसलिए भारत में विदेशी निवेशक नहीं आ रहा . मेगा ग्‍लोबल कंपनी रिओ टिंटो भी 2018 में अपनी आख‍िरी खदान बेचकर भारत से रुखसत हो गई. 

सबसे बड़ी हार

फरवरी 2020 में गुजरात के केवड़‍िया में के चिंतन शि‍व‍िर में  केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने घोषणा की थी कि 2023-24 के वित्‍त वर्ष से भारत बिजली के लिए कोयले (नॉन कोकिंग कोल) का आयात बंद कर देगा लेकिन अब हाल यह है कि राज्‍यों और निजी बिजली घरों को अगस्‍त तक 19 मिल‍ियन टन कोयेल का आयात करने का लक्ष्‍य दे दिया गया है. रुस यूक्रेन युद्ध के बाद विश्‍व बाजार में कोयले की कीमत 45 फीसदी तक बढ़ चुकी है. इस बीच दुनिया की दूसरा सबसे कोयला आयातक मुल्‍क, पांच माह में इतना कोयला इंपोर्ट करने वाला है जितना पूरे साल में होता है.

सनद अभी तक हम केवल कच्‍चे तेल के लिए आयात पर निर्भरता को बिसूरते थे लेक‍िन अब दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा कोयला भंडार रखने वाले भारत के सरकारी बिजली घर भी इंपोर्टेड कोयले पर चलेंगे.

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार जो अब केवल एक साल के लिए पर्याप्‍त है उसके लिए यह बुरी खबर है. क्‍यों कि तेल और कोयला दोनों ही ईंधनों की कीमतों में लगी आग लंबी चलेगी


Saturday, May 5, 2018

अच्छे दिनों की कमाई


अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन कहते थे कि किसी सरकार को सहारा के रेगिस्तान की जिम्मेदारी दे दीजिएपांच साल बाद वहां रेत की कमी हो जाएगी... 


अपने आसपास के किसी भी पेट्रोल पंप परफ्रीडमैन के तंज की समानार्थी देशज बड़बड़ाहटें सुनी जा सकती हैं. पिछले चार साल में पेट्रोल-डीजल की सबसे ऊंची कीमत चुकाते हुए लोग उस बचत की तलाश में मुब्तिला हैं जो सस्ते तेल के अच्छे दिनों के दौरान सरकार को हुई थी.


अच्छे दिनों के जितने मुंह उतने मतलब हैंअलबत्ता  उन दिनों की इस पहचान पर कोई टंटा शायद नहीं होगा कि एक लंबे वक्‍त के बाद पूरे चार साल (2014 से 2018) तक कच्चे तेल की कीमतें ललचाने वाले स्तर तक कम थीं. उपभोक्‍ताओं के लिए पेट्रोल डीजल इस दौरान भी महंगा रहा क्‍यों कि सरकार ने पेट्रो परिवार पर दबा कर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई थी.

कितनी बचत या कमाई हुई थी सरकार कोकहां गई वहक्या तेल की बढ़ती कीमतों से सरकार हमें बचा पाएगी?

आइएआंकड़े फींचते हैं 

- वह 2014 की दूसरी छमाही थी जब तेल की घटती कीमतों का त्योहार (जुलाई 2008-132 डॉलरजून 2014-46 डॉलर प्रति बैरल) शुरू हुआ जो 2017-18 की आखिरी तिमाही तक चला. इसी दौरान सरकार ने पेट्रो उत्पादों की कीमतों को बाजार को सौंप दिया और कंपनियां कच्चे तेल और अन्य लागतों के हिसाब से कीमतों को रोज बदलने लगीं.

- कच्चा तेल सस्ता हुआ लेकिन पेट्रोल-डीजल नहीं क्योंकि 2017 तक सरकार ने पेट्रोल पर 21.5 रु. और डीजल पर 17.3 रु. प्रति लीटर की एक्साटइज ड्यूटी लगा दी थी.

- इस बढ़े हुए टैक्स के कारण 2017 में पेट्रो एक्साइज ड्यूटी का संग्रह जीडीपी के अनुपात में 1.6 फीसदी यानी पर पहुंच गया जो 2014 में केवल 0.7 फीसदी थी. यह पिछले दशकों में तेल पर रिकॉर्ड टैक्स संग्रह था.

- इस कमाई का इस्तेमाल हुआएक-14वें वित्त आयोग की सिफारिश के मुताबिक राज्यों को ज्यादा संसाधन आवंटन और दो-सरकारी कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग के भुगतान के लिए.

- सस्ते कच्चे तेल वाले अच्छे दिनों में दो और फायदे हुए. थोक (5.2 से 1.8%) और खुदरा ( 9.4 से 4.5%) महंगाई घट गई. साथ ही सस्ते आयात के चलते विदेशी मोर्चे पर राहत आई. विदेशी आय-व्यय का अंतर बताने वाला करेंट एकाउंट डेफिसिट कम हो गया

यह थी अच्छे दिनों की कमाई और उसका खर्च... अब बारी है महंगे तेल के साथ आगे की चढ़ाई की.

- कच्चे तेल की वर्तमान कीमत (74-75 डॉलर प्रति बैरल) में प्रति दस डॉलर से महंगाई में 0.50 फीसदी की बढ़ोतरी होगी क्योंकि पेट्रो उत्पाद महंगे होंगे

- दस डॉलर प्रति बैरल की प्रत्येक तेजी पर करेंट एकाउंट डेफिसिट में 0.60 फीसदी की बढ़त और रुपए में कमजोरी

- अब अगर महंगाई रोकनी है तो सरकार को एक्साइज ड्यूटी घटानी होगी यानी दो रु. प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी कमी से 280 अरब रु. के राजस्व का नुक्सान और केरोसिन व एलपीजी सब्सिडी में भारी इजाफा अलग से.

चुनावी चुनौती से भरपूर महंगे दिनों के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब राज्यों की मदद चाहिए.

- राज्यों को तेल की महंगाई रोकने के लिए वैट घटाना होगा. जो फायदा उन्हें मिला था वह लौटाना होगा. लेकिन यह असंभव है क्योंकि केंद्र से भरपूर मदद के बावजूद राज्यों की वित्तीय हालत बिगड़ती गई है

- पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की उम्‍मीद अब खत्म हो गई है. कीमतें बढ़ रही हैं और राजस्व में गिरावट रुकने की उम्मीद नहीं है

पिछले चार साल में सरकार ने सस्ते तेल पर भारी टैक्स थोपा लेकिन इस कमाई को संजोने का सूझबूझ भरा तरीका नहीं निकाला. जब दुनिया सस्ते कच्चे तेल का आनंद ले रही थी तब हम महंगा ईंधन इस उम्मीद से खरीद रहे थे कि सरकार जो टैक्स लगा रही है उससे आगे की मुश्किलें हल होंगी. लेकिन राजकोषीय आंकड़ों को कंघी करने से यह नजर आता है कि चार साल के दौरान वित्त मंत्री का सारा बजटीय कौशलदरअसलसस्ते कच्चे तेल और भारी टैक्स पर टिका था. सस्ते तेल के अच्छे दिन बीतते ही सब कुछ बदलने लगा है. 

तेल फिर खौल रहा है. इसमें उपभोक्ता भी झुलसेंगे और तेल कंपनियां भी. सरकारें चुनाव देखकर तेल की कीमतों की राजनीति करेंगी. 2014 के पहले भी यही तो हो रहा था.

हम बुद्धू लौट कर वापस घर आ गए हैं.  


कच्चा तेल जब सस्ता था तब सरकार ने खूब टैक्स लगायाअब हिसाब मांगने की बारी है