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Thursday, November 19, 2020

कारवां गुजर गया...

 


कहते हैं कि अमेजन वाले जेफ बेजोस और चीन के पास बदलती दुनिया की सबसे बेहतर समझ है. वे न सिर्फ यह जानते हैं कि क्या बदलने वाला है बल्कि यह भी जानते हैं कि क्या नहीं बदलेगा.

बेजोस ने एक बार कहा था कि कुछ भी बदल जाए लेकिन कोई उत्पादों को महंगा करने या डिलिवरी की रफ्तार धीमी करने को नहीं कहेगा. लगभग ऐसा ही ग्लोबलाइजेशन के साथ है जिससे आर्थिक तरक्की तो क्या, कोविड का इलाज भी असंभव है. चीन ने यह सच वक्त रहते भांप लिया है.

दुनिया जब तक यह समझ पाती कि डोनाल्ड ट्रंप की विदाई उस व्यापार व्यवस्था से इनकार भी है जो दुनिया को कछुओं की तरह अपने खोल में सिमटने यानी बाजार बंद करने के लिए प्रेरित कर रही थी, तब तक चीन ने विश्व व्यापार व्यवस्था का तख्ता पलट कर ग्लोबलाइजेशन के नए कमांडर की कुर्सी संभाल ली.

चीन, पहली बार किसी व्यापार समूह का हिस्सा बना है. आरसीईपी (रीजन कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप) जीडीपी के आधार पर दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक (30 फीसद आबादी) गुट है, जिसमें दक्षिण-पूर्व एशिया (आसियान) के देश, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड के अलावा एशिया की पहली (चीन), दूसरी (जापान) और चौथी (कोरिया) सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं. आरसीईपी अगले दस साल में आपसी व्यापार में 90 फीसद सामान पर इंपोर्ट ड‍्यूटी पूरी तरह खत्म कर देगा.

आरसीईपी के गठन का मतलब है कि

चीन जो विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में सबसे देर से दाखिल हुआ था, उसने उदारीकरण को ग्लोबल कूटनीति की मुख्य धारा में फिर बिठा दिया है. मुक्त व्यापार की बिसात पर आरसीईपी चीन के लिए बड़ा मजबूत दांव होने वाला है.

अमेरिका के नेतृत्व में ट्रांस पैसिफिक संधि‍, (ट्रंप ने जिसे छोड़ दिया था) को दुनिया की सबसे बड़ा आर्थिक व्यापारिक समूह बनना था. आरसीईपी के अब अमेरिका, लैटिन अमेरिका, कनाडा और यूरोप को अपनी संधिखड़ी करनी ही होगी.

छह साल तक वार्ताओं में शामिल रहने के बाद, बीते नवंबर में भारत ने अचानक इस महासंधिको पीठ दिखा दी. फायदा किसे हुआ यह पता नहीं लेकिन सरकार को यह जरूर मालूम था कि आरसीईपी जैसे बड़े व्यापारिक गुट का हिस्सा बनने पर भारत के जीडीपी में करीब एक फीसद, निवेश में 1.22 फीसद और निजी खपत में 0.73 फीसद  की बढ़ोतरी हो सकती थी (सुरजीत भल्ला समिति 2019). वजह यह कि आरसीईपीमें शामिल आसियान, दक्षिण कोरिया और जापान के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) हैं. इन समझौतों के बाद (आर्थिक समीक्षा 2015-16) इन देशों से भारतीय व्यापार 50 फीसद बढ़ा. निर्यात में बढ़ोतरी तो 25 फीसद से ज्यादा रही.

आत्मनिर्भरता के हिमायती स्वदेशीचिंतकमान रहे थे कि भारत के निकलने से आरसीईपी बैठ जाएगा पर किसी ने हमारा इंतजार नहीं किया. यही लोग अब कह रहे हैं कि धीर धरो, आरसीईपी में शामिल देशों से भारत के व्यापार समझौतों पर इस महासंधिका असर नहीं होगा. जबकि हकीकत यह है कि आरसीईपी के सदस्य दोतरफा और बहुपक्षीय व्यापार में अलग-अलग नियम नहीं अपनाएंगे. दस साल में यह पूरी तरह मुक्त व्यापार (ड‍्यूटी फ्री) क्षेत्र होगा. भारत को चीन से निकलने वाली कंपनियों की अगवानी की उम्मीद है लेकिन तमाम प्रोत्साहनों के चलते वे अब इस समझौते के सदस्यों को वरीयता देंगी. यानी कि भारत के और ज्यादा अलग-थलग पड़ने का खतरा है.

आरसीईपी के साथ उदार बाजार (ग्लोबाइलाइजेशन) पर भरोसा लौट रहा है. कारोबारी हित जापान और चीन को एक मंच पर ले आए हैं. नई व्यापार संधियां बनने में लंबा वक्त लेती हैं इसलिए आरसीईपी फिलहाल अगले एक दशक तक दुनिया में बहुपक्षीय व्यापार का सबसे ताकतवर समूह रहेगा. ‍

भविष्य जब डराता है तो लोग सबसे अच्छे दिन वापस पाना चाहते हैं. जीडीपी में बढ़त, गरीबी में कमी, नई तकनीकें, अंतरराष्ट्रीय संपर्क ताजा इतिहास में सबसे अच्छे दिन हैं जो ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण ने गढ़े थे. आज कोविड वैक्सीन और दवा पर अंतरराष्ट्रीय विनिमय इसी की देन है.

बीते दो दशक में मुक्त व्यापार और ग्लोबलाइजेशन ने भारत की विकास दर में करीब पांच फीसद का इजाफा किया. यानी गरीबी घटाने वाली ग्रोथ काचमत्कारदुनिया से हमारी साझेदारी का नतीजा था. इसे दोहराने के लिए अब हमें पहले से दोहरी मेहनत करनी होगी.

आरसीईपी को भारत की नहीं बल्किबल्कि भारत को दुनिया के बाजार की ज्यादा जरूरत है. कोविड की मंदी के बाद घरेलू मांग के सहारे 6 फीसद की विकास दर भी नामुमकिन है. अब विदेशी बाजारों के लिए उत्पादन (निर्यात) के बिना अर्थव्यवस्था खड़ी नहीं हो सकती.

एशिया में मुक्त व्यापार का कारवां, भारत को छोड़कर चीन की अगुआई में नई व्यवस्था की तरफ बढ़ गया है. भारत को इस में अपनी जगह बनानी होगी, उसकी शर्तों पर व्यवस्था नहीं बदलेगी.

Friday, May 8, 2020

...मगर इंतजार है



व‍िक्रम की पीठ पर सेट होते ही वेताल ने सवाल दागा, हे राजन! जब दुनिया की कंपनियां चीन से निकल कर दूसरे ठिकाने तलाश रहीं हैं तब दिल्ली की सरकार कछुए की तरह विदेशी निवेश पर पाबंदियों के खोल में क्यों दुबक गई? जापान तो इन्हें लुभाने के लिए एक पैकेज ले आया है और जब सरकार इन्हें बुलाना चाहती है तो उसकी वैचारिक रसोई के आर्थिक सलाहकार चीन के टरबाइन से बनी बिजली से चार्ज हुए चीनी मोबाइल लेकर विदेशी निवेशकों को डरा क्यों रहे हैं?

विक्रम ने कहा कि हे पुराने प्रेत! आत्मनिर्भरता के सभी मतलब बदल चुके हैं. इससे पहले कि तुम उड़ जाओ, श्मशान से आते-जाते, मुझे आने वाली दुनिया की झलक मिली है. उसका वृत्तांत ध्यान लगाकर सुनो.

कोविड की धमक से पहले ही दुनिया में नए चीन की तलाश शुरू हो चुकी थी. चीन में महंगी होती मजदूरी से कंपनियां पहले ही परेशान थीं. इस बीच अमेरिका से व्यापार युद्ध के बाद इंपोर्ट ्यूटी बढ़ने से डरी कंपनियों ने चीन से डेरा उठाना शुरू कर दिया था. 2018 तक चीन में विदेशी निवेश बढ़ने की सालाना गति घटकर 15 फीसद से नीचे (2009 में 25 फीसद-अंकटाड) गई थी.

कोविड के कहर के बाद भगदड़ तेज होने की आशंका के बीच उद्योग अब समझ चुके हैं कि कोई एक मुल्क अकेला नया चीन नहीं हो सकता जो एक साथ सस्ते श्रम, बुनियादी ढांचे और कम लागत की सुविधा दे सके. इसलिए अब दुनिया में कई छोटे-छोटे चीन होंगे जहां ये कंपनियां अपना नया ठिकाना बनाएंगी.

चीन से कंपनियों के संभावित पलायन पर रोबो बैंक का अध्ययन (कोविड से ठीक पहले) बताता है कि ऑटोमोटिव, खिलौने, कंप्यूटर रोबोटिक्स, इलेक्ट्रॉ निक्स, पैकेजिं, टेक्नोलॉजी हार्डवेयर, फुटवियर, गारमेंट कंपनियां दुनिया के अन्य देशों में जाना चाहती हैं. अमेरिकन चैम्बर के मुताबिक, करीब 25 फीसद अमेरिकी कंपनियां दक्षि पूर्व एशिया में रहना चाहती हैं जबकि 8-10 फीसद अन्य देशों में जाएंगी.

चीन से बाहर इस निवेश के संभावित देशों की सूची में मलेशिया, ताईवान, थाईलैंड, वियतनाम, भारत, सिंगापुर, फिलीपींस, इंडोनेशिया, दक्षि कोरिया, जापान, श्रीलंका, मंगोलिया, कंबोडिया, लाओस, पाकिस्तान, म्यांमार और बंगलादेश शामिल हैं.

चीन से कंपनियों का प्रवास चार पैमानों पर निर्भर होगा.

मेजबानों के निर्यात ढांचे की चीन के साथ समानता. इस पैमाने पर वियतनाम, थाईलैंड, कोरिया, ताईवान, मलेशिया, फिलीपींस के बाद भारत का नंबर आता है

चीन के मुकाबले श्रम लागत में कमी के पैमाने पर मंगोलिया, बंगलादेश, श्रीलंका, कंबोडिया सबसे आकर्षक हैं. भारत इनके बाद है लेकि थाईलैंड, मलेशिया और फिलीपींस से सस्ता है.

कारोबार की आसानी में सिंगापुर, कोरिया, ताईवान, मलेशिया और थाईलैंड सबसे आगे हैं, भारत इस सूची में काफी पीछे है

नियामक तंत्र की गुणवत्ता के मामले में भारत की रैंकिंग बेहतर है. दक्षिय एशिया के अन्य प्रमुख लोकतंत्र इसी के आसपास हैं

ग्लोबल एजेंसी नोमुरा की ताजा रिपोर्ट कहती है कि चीन से निकलने वाली कंपनियों में केवल एक-दो ही भारत की तरफ रुख करेंगी. भारत निवेश लाने की होड़ में आगे इसलिए नहीं है क्योंकि

■ चीन से सस्ती श्रम लागत के बावजूद इंस्पेक्टर राज चरम पर है कोविड वाली बेकारी के बाद श्रम कानूनों को उदार करना बेहद कठिन होने वाला है

■ स्वदेशी के दबाव और देशी कंपनियों की लामबंदी के बाद कई उत्पादों पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर भारत ने आयात को महंगा और खुद को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर लिया है

■ निर्यात और आरसीईपी में भारत के प्रवेश पर सरकारी समिति की रिपोर्ट बताती है कि भारत में उदारीकरण सिमट रहा है. ग्लोबल इकोनॉमिक फ्रीडम इंडेक्स के 186 देशों में भारत 129वें नंबर पर है. ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, जिन उद्योगों में सरकार का दखल ज्यादा है वही सबसे ज्यादा पिछडे़ हैं. कोविड के बाद इंस्पेक्टर राज बढ़ने का खतरा है

सरकार के वैचारिक सलाहकारों को आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा पचाने में दिक्कत हो रही है. उनको लगता है कि अपनी जरूरत भर का निर्माण और आयात सीमित रखना ही आत्मनिर्भरता है, जबकि अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी सहित दुनिया में जो मुल्क आत्मनिर्भर हैं वह अपनी जरूरत से ज्यादा उत्पादन करते हैं. अब आत्मनिर्भरता का मतलब भरपूर उत्पादन और विदेशी मुद्रा भंडार की ताकत है इसी से किसी देश की करेंसी की साख और पूंजी की आपूर्ति तय होती है.

चीन से उखड़ती कंपनियां भारत के बाजार में सिर्फ माल बेचने नहीं आएंगी. वे यहां नया चीन बनाना चाहेंग जहां से पूरी दुनिया में निर्यात हो सके. जैसे चीन की मोबाइल हैंडसेट कंपनियों के आने के बाद भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात बढ़ गया. यह कंपनियां तगड़ी सौदेबाजी करेंगी, चौतरफा उदारीकरण और पूरी तरह मुक्त बाजार उनकी प्रमुख शर्तें होंगी. 

अब वही जीतेगा जो खुल कर खेलेगा.