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Friday, September 20, 2019

बदकिस्मत सुधार !

अगर मंदी खपत गिरने की वजह से है तो फिर कंपनियों को करीब 1.47 लाख करोड़ की टैक्स रियायत क्योंइतनी ही रियायत उपभोक्ताओं को दी जाती तो कंपनियां तो मांग बढ़ाने के उपाय मांग रही थी सरकार ने उनके मुनाफे बढ़ाने का इंतजाम कर दिया.

अगर सरकारी बैंकों का विलय इतना ही क्रांतिकारी है तो फिर बाजार  क्यों कह रहा है कि यह अगले कुछ वर्ष तक बैंकों पर बड़ा भारी पड़ेगा?

अगर इलेक्ट्रिक वाहनों की इतनी जरूरत है तो फिर नीति और रियायतों के ऐलान के बाद सरकार को क्यों लगा कि जल्दबाजी ठीक नहीं है?

यह दोनों ही सिद्धांत की कसौटी पर सौ टंच सुधार हैं जैसे कि जीएसटी या फिर रियल एस्टेट रेगुलेटर (रेराआदिइनकी जरूरत से किसे इनकार होगालेकिन यह नामुराद अर्थव्यवस्था अजीब ही शय हैयहां सबसे ज्यादा कीमती होती है नीतियों की सामयिकतावक्त की समझ ही नीतियों को सुधार बनाती है.

पिछले पांच-छह वर्षों में सुधारों की टाइमिंग बिगड़ गई हैदवाएं बीमार कर रही हैं और सहारे पैरों में फंसकर मुंह के बल गिराने लगे हैं.

बैंकों का महाविलय अभी क्यों प्रकट हुआयह फाइल तो वर्षों से सरकार की मेज पर हैबैंकों को कुछ पूंजी देकर एक चरणबद्ध विलय 2014 में ही शुरू हो सकता थाया फिर स्टेट बैंक (सहायक बैंकऔर बैंक ऑफ बड़ोदा (देना बैंकके ताजा विलय के नतीजों का इंतजार किया जाताइस समय मंदी दूर करने के लिए सस्ते बैंक कर्ज की जरूरत है लेकिन अब बैंक कर्ज बांटने की सुध छोड़कर बहीखाते मिला रहे हैं और घाटा बढ़ने के डर से कांप रहे हैंनुक्सान घटाने के लिए कामकाज में दोहराव खत्म होगा यानी नौकरियां जाएंगी.

बैंकों के पास डिपॉजिट पर ब्याज की दर कम करने का विकल्प नहीं हैजमा टूट रही है तो फिर वह रेपो रेट के आधार पर कर्ज कैसे देंगेयह सुधार भी बैंकों के हलक में फंस गया.

रियल एस्टेट रेगुलेटरी बिल (रेराएक बड़ा सुधार थालेकिन यह आवास निर्माण में मंदी के समय प्रकट हुआनतीजतन असंख्य प्रोजेक्ट बंद हो गएडूबा कौनग्राहकों का पैसा और बैंकों की पूंजीअब जो बचेंगे वे मकान महंगा बेचेंगेरिजर्व बैंक ने यूं ही नहीं कहा कि भारत में मकानों की महंगाई सबसे बड़ी आफत है और यह बढ़ती रहेगीक्योंकि कुछ ही बिल्डर बाजार में बचेंगे.

ऑटोमोबाइल की मंदी गलत समय पर सही सुधारों की नुमाइश हैमांग में कमी के बीच डीजल कारें बंद करने और नए प्रदूषण के नियम लागू किए गए और जब तक यह संभलतासरकार बैटरी वाहनों की दीवानी हो गई. इन सबकी जरूरत थी लेकिन क्या सब एक साथ करना जरूरी थानतीजे सामने हैंकई कंपनियां बंद होने की तरफ बढ़ रही हैं.

एक और ताजा फैसलाजब शेयर बाजारअर्थव्यवस्था की बुनियाद दरकने से परेशान था तब उस पर टैक्स लगा दिए गएबाजार पर टैक्स पहले भी कम नहीं थे लेकिन बेहतर ग्रोथ के बीच उनसे बहुत तकलीफ नहीं हुईसरकार जब तक गलती सुधारती तब तक विदेशी निवेशक बाजार से पैसा निकाल कर रुपए को मरियल हालत में ला चुके थे.

नोटबंदी सिद्धांतों की किताब में सुधार जरूर है लेकिन यह जरूरी नहीं था कि हर अर्थव्यवस्था इसे झेल सकेकाला धन नहीं रुकाकैशलैस इकोनॉमी नहीं बनी लेकिन कारोबार तबाह हो गए.

सिंगल यूज प्लास्टिक बंद होना चाहिए लेकिन विकल्प तो सोच लिया जाताइस मंदी में केवल प्लास्टिक ही एक सक्रिय लघु उद्योग हैयह फैसला इस कारोबार पर भारी पड़ेगा.

जन धनबैंकरप्टसी कानूनमेक इन इंडियाडिजिटल इंडिया... गौर से देखें तो इन सब की टाइमिंग इन्हें धोखा दे गई हैजीएसटी तो 1991 के बाद सामयिकता की सफलता और विफलता की सबसे बड़ी नजीर है.

वैट या वैल्यू एडेड टैक्सआज के जीएसटी का पूर्वज थाउसे जिस समय लागू किया गया (2005) तब देश की अर्थव्यवस्था बढ़त पर थीसुधार सफल रहाखपत बढ़ी और राज्यों के खजाने भर गएलेकिन जीएसटी जब अवतरित हुआ तब नोटबंदी की मारी अर्थव्यवस्था बुरी तरह घिसट रही थीजीएसटी खुद भी डूबा और कारोबारों व बजट को ले डूबाइसलिए ही तो मंदी में टैक्स सुधार उलटे पड़ते हैं.

सुधार की सामयिकता का सबसे दिलचस्प सबक रुपए के अवमूल्यन के इतिहास में दर्ज हैआजादी के बाद रुपए का दो बार अवमूल्यन हुआएक 6.6.66 को जब इंदिरा गांधी ने रुपए का 57 फीसद अवमूल्यन किया. 1965 के युद्ध के बाद हुआ यह फैसला उलटा पड़ा और अर्थव्यवस्था टूट गई और असफल इंदिरा गांधी लाइसेंस परमिट राज की शरण में चली गईंदूसरा अवमूल्यन 1991 में हुआ वह भी 72 घंटे में दो बारउसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मुड़कर नहीं देखा.

सुधारों की सामयिकता लोकतंत्र से आती हैपिछले कई बड़े सुधार शायद इसलिए मुसीबत बन गए क्योंकि उनसे प्रभावित होने वालों से कोई संवाद ही नहीं किया गयायह समस्या शायद अब तक कायम है

मंदी की हां-ना के बीच पांच पैकेज न्योछावर हो चुके हैं. कारपोरेट टैक्स कम होने से खपत बढेगी क्यानिवेश तो खपत का पीछा करता है. मांग थी तो ऊंचे टैक्स पर भी कंपनियां निवेश कर रही थीं.

दुआ कीजिये कि इन रियायतों से मांग या निवेश बढ़े. नतीजे अगली तिमाही तक सामने होंगे. क्यों कि अगर यह भी एक और बदकिस्मत असामयिक सुधार साबित हुआ तो घाटे का अंबार बजटीय संतुलन का क्रिया कर्म कर देगा. 


Sunday, May 20, 2018

नायाब नाकामी


 कथा सूत्र 
  • जीडीपी में 22 फीसदी का हिस्सा रखने वाला भारत का विशाल खुदरा व्यापार यानी रिटेल, खेती के बाद सबसे बड़ा रोजगार है. इसका आधुनिकीकरण तत्काल 5.6 करोड़ और 2022 तक करीब 173 करोड़ रोजगार दे सकता है 
  •  खुदरा बाजार 948 अरब डॉलर (केपीएमजी) का है जो पांच साल में 15 फीसदी की गति से बढ़ा है. इस बाजार में संगठित विक्रेताओं का हिस्सा केवल 8 फीसदी है
  •  भारत में ऑनलाइन रिटेल यानी ई-कॉमर्स का बाजार 38.5 अरब डॉलर का है
  •  संगठित या मल्टी  ब्रांड रिटेल (जैसे बिग बाजार) में वॉलमार्ट जैसी बड़ी विदेशी कंपनियों को आने की छूट नहीं है. लेकिन ई-कॉमर्स में 100 फीसदी विदेशी पूंजी की अनुमति है. इसी रास्ते से वॉलमार्ट ने फ्लिपकार्ट को खरीद लिया. इतनी पूंजी लगाकर ई-कॉमर्स कंपनियां भी अपने गोदाम या वितरण नेटवर्क (रोजगार बढ़ाने वाले काम) नहीं बना सकतीं, उन्हें बस मार्केटप्लेस बनाने यानी ग्राहकों को विक्रेताओं से जोडऩे की छूट है

और
  • ·      अमेरिकी वॉलमार्ट ने फ्लिपकार्ट (सिंगापुर) को खरीदने में जो 16 अरब डॉलर लगाए हैं उनमें करीब 14 अरब डॉलर जापान, अमेरिका, चीन और दक्षिण अफ्रीका की कंपनियों को मिलेंगे, क्रिलपकार्ट में जिनका हिस्सा वॉलमार्ट ने खरीदा है. यह निवेश भारत नहीं आएगा. 

अब कहानी...

वे दिन तेज ग्रोथ के थे. 2006 जनवरी की एक ठंडी शाम उस समय गरमा उठी जब उद्योग विभाग ने (सिंगल ब्रांड) रिटेल में विदेशी निवेश का ऐलान किया. इससे पहले खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का जिक्र कुफ्र था. इस बयान के अगले ही साल, 2007 में ही वॉलमार्ट भारती (एयरटेल) के साथ भारत आ गई. वॉलमार्ट को देखकर कार्फू और टेस्को जैसे ग्लोबल रिटेलर भी आ पहुंचे.

2010 में मल्टी ब्रांड रिटेल खोलने की पहल हुई और विभिन्न शर्तों के साथ 2012 में 51 फीसदी विदेशी निवेश खुला तो लेकिन संघ परिवार और भाजपा ने इस कदर आंदोलन खड़ा किया कि रिटेल में विदेशी निवेश जहां का तहां थम गया. वॉलमार्ट ने करीब एक दर्जन शहरों में थोक बिक्री के मेगा स्टोर भी खोले लेकिन विदेशियों के लिए मल्टी ब्रांड रिटेल पर राजनीति से ऊबकर वॉलमार्ट ने 2013 में भारती के साथ अपना उपक्रम खत्म कर दिया.

इस हड़बोंग के बीच देसी कंपनियों को संगठित रिटेल में फायदा दिखने लगा था. सुभिक्षा, स्पेंसर (आरपीजी), रिलायंस, मोर (बिरला), इजी डे (भारती), ट्रेंट (टाटा), बिग बाजार (फ्यूचर) जैसे देसी रिटेलर्स सामने आए और अनुमान लगाया गया कि 2010 से 2015 के बीच संगठित रिटेल 21 फीसदी की गति से बढऩे की उम्मीद जड़ पकडऩे लगी. लेकिन कॉमर्शियल प्रॉपर्टी, नई तकनीक और बुनियादी ढांचे के लिए इनके पास पूंजी की कमी थी इसलिए 2015 आते आते तमाम स्टोर बंद हो गए.



इसी दौरान ई-कॉमर्स की आमद हुई. नए धनाढ्यों (वेंचर कैपिटल) की पूंजी पर डिस्काउंट सेल के इस धंधे ने संगठित रिटेल को तोड़ दिया. ई-कॉमर्स की क्रांति अल्पजीवी थी. परस्पर विरोधी नीतियों और नोटबंदी व जीएसटी के कारण 2017 में देसी ई-कॉमर्स भी दम तोड़ गया. 


अब फ्लिपकार्ट अधिग्रहण के बाद इस बाजार में दो विदेशी कंपनियोंअमेजन और वॉलमार्ट  का राज होगा

आज रिटेल के उदारीकरण के 12 साल बाद ...
  • ·      खुदरा यानी रिटेल कारोबार का आधुनिकीकरण खेती, खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग, वित्तीय सेवाओं को एक साथ गति दे सकता था और प्रति 200 वर्ग फुट पर एक रोजगार के औसत वाला यह क्षेत्र हर तरह के रोजगारों का इंजन बन सकता था लेकिन इसमें विदेशी निवेश रोक दिया गया.

  • ·     मुक्त बाजार में पूंजी अपना रास्ता तलाश ही लेती है. वॉलमार्ट जिस पूंजी से रिटेल का बुनियादी ढांचा बनाकर रोजगार दे सकती थी उसके जरिए उसने पिछले दरवाजे से ई-कॉमर्स में प्रवेश कर लिया. अब वह उपभोक्ताओं को सामान बेचेगी, जिसके लिए उसे विदेशी निवेश नियमों के तहत रोका गया था. ई-कॉमर्स से बनने वाले अधिकतम नए रोजगार केवल कूरियर लाने वालों के होंगे.

  • ·     भारत के लोगों की खपत में 61 फीसद हिस्सा खाद्य उत्पादों का है. रोजगार और उपभोक्ता सुविधाएं बढ़ाने के लिए इनके उत्पादन और वितरण का आधुनिकीकरण होना था लेकिन यह पिछड़ा ही रह गया है.


यह केवल भाजपा परिवार की रूढि़वादी जिद थी जिसके चलते विशाल खुदरा बाजार को आधुनिकता और नए रोजगारों की रोशनी नहीं मिल सकी. लेकिन विदेशी पूंजी तो आ ही गई. अब इस बाजार के एक हिस्से (ई-कॉमर्स) पर विदेशी कंपनियां काबिज हो गईं हैं जबकि दूसरे बड़े हिस्से में पुराने ढर्रे का कारोबार चल रहा है. इन दोनों के बीच खड़े उपभोक्ता और बेरोजगार सरकार को बिसूर रहे हैं. 

सरकार अब भी मल्टी ब्रांड रिटेल के उदारीकरण के जरिए अवसरों की बर्बादी बचा सकती है लेकिन हम क्यों करेंगे? हम तो मौके गंवाने में महारथी हैं.  


Monday, April 9, 2018

सूबेदारों पर दारोमदार



एक राजा था. उसके सिपहसालार धुरंधर थे. वे राजा के लिए जीत पर जीत लाते रहते थे. राजा नए सूबेदारों को जीते हुए सूबे सौंप कर अगली जंग में जुट जाता था.

फिर शुरू हुई सबसे बड़ी जंग की तैयारी. कवच बंधने लगे. सिपहसालारों ने जीते हुए मोर्चों का दौरा किया और थके से वापस लौट आए. राजा ने पूछा कि माजरा क्या है? एक पके हुए सलाहकार ने कहा कि हुजूर, यह जंग अब सिपहसालारों की नहीं रही. लोग अब सूबेदारों से जवाब मांग रहे हैं.

इस कहानी के पात्र रहस्यमय नहीं हैं. सरकारी पार्टी में यह किस्सा अलग-अलग संदर्भों के साथ बार-बार कहा-सुना जा रहा है. गुजरात से गोरखपुर तक वाया राजस्थान, मध्य प्रदेश सत्ता विरोधी तापमान बढऩे लगा है. पेशानी पर पसीना सवालों की इबारत में छलक रहा है. सूबेदार दिल्ली तलब होने लगे हैं.

तो सरकार से नाराजगी ने दिग्विजयी भाजपा को भी घेर लिया! 

लोकसभा चुनाव की भव्य जीत लेकर गुजरात तक, जीत पर जीत (बिहार व दिल्ली को छोड़कर) में झूमती भाजपा में किसी ने नहीं सोचा था कि लोग उनकी सरकारों से भी नाराज हो सकते हैं. गुजरात की हार जैसी जीत और उपचुनावों में बेजोड़ हार के बाद सरकार में ऐसे सवाल घुमड़ रहे हैं जिनका सामना हाल के वर्षों में किसी पार्टी ने नहीं किया. जाहिर है, इस तरह की निरंतर चुनावी विजय भी तो दुर्लभ थीं.

आर्थिक उदारीकरण के बाद पहली बार देश ने यह देखा कि पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं यानी कि क्लब फाइव (महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक) में तीन और उभरते हुए तीनों प्रमुख राज्यों (राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश) पर उस पार्टी का शासन है जो केंद्र में भी राज कर रही है. भारत के जो 11 राज्य (महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, केरल, बिहार, ओडिशा और संयुक्त आंध्र) 2020 तक देश की जीडीपी में 76 फीसदी के हिस्सेदार होंगे, उनमें सात (आंध्र प्रदेश अभी तक एनडीए में था) पर भाजपा का शासन है. इसके बाद तीन प्रमुख छोटी अर्थव्यवस्थाएं झारखंड, हरियाणा और असम भी भाजपा के नियंत्रण में हैं.

यह ऐसा अवसर था, जिसके लिए यूपीए सरकार दस साल तक तरसती रही. सुधारों के कई अहम प्रयोग इसी वजह से जमीन नहीं पकड़ सके क्योंकि बड़े और संसाधन संपन्न राज्यों से केंद्र के राजनैतिक रिश्तों में गर्मजोशी नहीं थी.

लेकिन क्या केंद्र व राज्यों में राजनैतिक रिश्तों के रसायन से मोदी सरकार के मिशन परवान चढ़ सके? मोदी सरकार पिछले एक दशक की पहली ऐसी सरकार है जिसने 'स्वच्छता' से 'उड़ान' यानी जमीन से लेकर आसमान तक कार्यक्रमों और मिशनों की झड़ी लगा दी, फिर भी सरकारों से नाराजगी ने घेर ही लिया! 

क्यों नहीं उम्मीदों पर खरी उतरी मोदी की टीम इंडिया?

1. राज्यों में पहले से ही मुख्यमंत्रियों के पास खासी ताकत थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पीएमओ केंद्रित राजनैतिक गवर्नेंस राज्यों का आदर्श बन गई. सत्ता का विकेंद्रीकरण न होने से जमीनी क्रियान्वयन और संवाद जड़ नहीं पकड़ सका जबकि दूसरी तरफ घोषणाओं का अंबार लगा दिया गया. अब बारी मोहभंग की है. उदाहरण के लिए गोरखपुर.

2. राज्यों का प्रशासनिक ढांचा थक चुका है. इसे कहीं ज्यादा कठोर और नए सुधारों की जरूरत है. लेकिन पिछले चार साल में किसी राज्य में कोई नया बड़ा क्रांतिकारी सुधार या प्रयोग नजर नहीं आया. योजना आयोग को समाप्त करने से फायदा नहीं हुआ. राज्यों के आर्थिक फैसलों में आजादी मिलने की बजाए नया स्कीम राज मिला जिसे पुराने ढांचे पर लाद दिया गया.

3. पिछले तीन साल में राज्यों की वित्तीय स्थिति बिगड़ी है. बिजली घाटों की भरपाई, कर्ज माफी और राजस्व में कमी के कारण राज्यों का समेकित घाटा बारह साल और बाजार कर्ज दस साल के सर्वोच्च स्तर पर है. यह हालत चौदहवें वित्त आयोग से अधिक संसाधन मिलने के बाद है. जीएसटी की असफलता ने राज्यों के खजाने की हालत और बिगाड़ दी है.

केंद्र व 20 राज्यों और करीब 60 फीसदी जीडीपी पर शासन के बाद भी भाजपा को अगर अपनी सरकारों से नाराजगी का डर है और कुछ राज्यों में सूबेदारों की तब्दीली के जरिए नाराजगी को कम करने की नौबत आन पड़ी है तो मानना चाहिए कि लोकतंत्र मजबूत हो रहा है. सरकारों से नाराजगी लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण है. 

गुजरात से गोरखपुर तक मतदाता यह एहसास कराने लगे हैं कि प्रत्येक चुनावी जीत अगली जीत की गारंटी नहीं है. क्या लोग सियासत और सरकार का फर्क समझने लगे हैं अगर ऐसा है तो फिर याद रखना होगा कि इन लाखों अनाम लोगों की एक उंगली में बला की ताकत है. 


Sunday, October 8, 2017

सोचा न था...


सरकारें आक्रामक हों यह जरूरी नहीं है, लेकिन उन्हें सूझ-बूझ भरा जरूर होना चाहिए.
वे ताबड़तोड़ फैसले भले ही न करें, लेकिन उनके फैसले सधे हुए और सुविचारित जरूर होने चाहिए.
लोगों की जिंदगी में संकटों की कमी नहीं है, सुधार संकट दूर करने वाले होने चाहिए उन्हें बढ़ाने वाले नहीं.
राजनैतिक पेशबंदी चाहे जो हो लेकिन सरकार का तापमान यह बता रहा है कि उसे दो बड़े फैसलों के चूक जाने का एहसास हो चला है. नोटबंदी अपने सभी बड़े लक्ष्य हासिल करने में असफल रही है. जाहिर है कि इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने वालों की संख्या बढ़ाने के लिए तो इतना बड़ा जोखिम नहीं लिया गया था. 
और जीएसटी ! इसे तो एक जुलाई की आधी रात को संसद के केंद्रीय कक्ष में भारत का सबसे  क्रांतिकारी आर्थिक सुधार घोषित किया माना गया था, तब संसद में दीवाली  मनाई गई थी लेकिन तीन माह के भीतर ही यह संकटकारी और लाल फीता शाही बढ़ाने वाला लगने लगा। याद नहीं पड़ता कि हाल के वर्षों में कोई इतना बड़ा सुधार तीन माह बाद ही पूरी तरह सर के बल खड़ा हो गया हो।  
जीएसटी और नोटबंदी को एक साथ देखिए, उनकी विफलताओं में गहरी दोस्ती नजर आएगी.
दोनों ही गवर्नेंस के बुनियादी सिद्धांतों की कमजोरी का शिकार होकर सुधार की जगह खुद संकट बन गएः

1. गवर्नेंस अंधेरे में तीर चलाने का रोमांच नहीं है. प्रबंधन वाले पढ़ाते हैं जिसे आप माप नहीं सकते उसे संभाल नहीं सकते. सवाल पूछना जरूरी है कि क्या नोटबंदी से पहले सरकार ने देश में काली नकदी का कोई आंकड़ा भी जुटाया था? आखिरी सरकारी अध्ययन 1985 में हुआ और सबसे ताजा सरकारी दस्तावेज वह श्वेत पत्र था जो 2012 में संसद में रखा गया. दोनों ही नकद में बड़ी मात्रा में काला धन होने को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं थे.

नकदी और बैंक खातों में जमा रकम को लिक्विड वेल्थ माना जाता है. वित्तीय शोध फर्म कैपिटलमाइंड ने हिसाब लगाया कि भारत में कुल लिक्विड वेल्थ में नकदी का हिस्सा केवल 14 फीसदी (1950 में 50 फीसदी) है, जिसका 99 फीसदी हिस्सा बैंकों से गुजरकर हाथों में वापस पहुंच रहा है. अगर सरकार काले धन के लिए सोना या जमीनों पर निगाह जमाती तो उत्साहजनक नतीजे मिल सकते थे. कम से कम अर्थव्यवस्था का दम घुटने से तो से बच जाता.

जीएसटी दस साल से बन रहा है लेकिन इसकी जरूरत, कारोबारी हालात और तैयारियों का एक अध्ययन या जमीनी शोध तक नहीं हुआ. छोटे उद्योग कितनी टैक्स चोरी करते हैं, यह बताने के लिए सरकार के पास कोई आंकड़ा नहीं है.किस कारोबार पर इसका क्‍या असर होगा? सरकार से लेकर कारोबार तक कौन कितना तैयार है? सरकार ने तो यह भी नहीं आंका कि जीएसटी से राजस्व का क्या नुक्सान या फायदा होगा. इसलिए जीएसटी तीन माह में बिखर गया. हम ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, मलेशिया के तजुर्बों से सीखकर पूरे सुधार को सहज व पारदर्शी बना सकते थे.

2. यदि संकट सिर पर न खड़ा हो तो कोई आर्थिक सुधार में नुक्सान-फायदों की सही गणना जरुरी होती है. नोटबंदी के समय सरकार ने शायद यह हिसाब भी नहीं लगाया कि एटीएम नए नोटों के साथ कैसे काम करेंगे? रिजर्व बैंक कितने नोट छाप सकता है ? करेंसी कहां और कैसे पहुंचेगी? नियम कैसे बदलने होंगे? जीडीपी में गिरावट, रिजर्व बैंक व बैंकों को नुक्सान, कंपनियों को घाटा, रोजगारों में कमी—नोटबंदी ने 12 लाख करोड़ रु. की चपत (एनआइपीएफपी का आकलन) लगाई है. 

जीएसटी के नुक्सानों का आंकड़ा आना है अलबत्‍ता सरकार ने इस जिस तरह वापस लिया है वह संकेत ददेता है कि जीएसटी ने भी राजस्व, जीडीपी और कंपनियों के मुनाफों में बड़े छेद किये हैं.

3. सुधार कैसे भी हों लेकिन उनसे सेवाओं सामानों की किल्‍लत पैदा नहीं हो चा‍हिए। मांग व आपूर्ति की कमी कुछ लोगों को हाथ में अकूत ताकत दे देती है, यही तो भ्रष्‍टाचार है. नोटबंदी और जीएसटी, दोनों ही भ्रष्टाचार के नए नमूनों के साथ सामने आए. नोटबंदी ने बैंक अफसरों को दो माह के लिए सुल्तान बना दिया. नोटों की अदला-बदली में बैंकिंग तंत्र भ्रष्ट और जन धन ध्व‍स्त हो गए. जीएसटी की किल्लतों के वजह से कच्चे बिल और नकद के कारोबार की साख और मजबूत हो गई. जीएसटी में ताजी तब्‍दीलियों के बाद अब वही पुराना दौर लौटने वाला है जिसमें टैक्‍स चोरी और भष्‍टाचार एक साथ चलता था. 

कमजोर तैयारियां, खराब डिजाइन और बदहाल क्रियान्वयन,  गवर्नेंस के स्थायी रोग हैं. लेकिन हमने दुनिया को दिखाया है कि अर्थव्यवस्था को उलट-पलट देने वाले निर्णय, अगर इन बीमारियों के साथ लागू हों तो दुनिया की सबसे तेज दौड़ती अर्थव्यवस्था को भी विकलांग बनाया जा सकता है.
सरकारों की मंशा पर शक नहीं होना चाहिए वह हमेशा अच्‍छी ही होती है मुसीबत यह है कि सरकारी फैसलों की परख उनकी मंशा से नहीं, नतीजों से होती है. नोटबंदी और जीएसटी सुधार होने का तमगा लुटा चुके हैं. अब तो कवायद इनके असर से बचने और उबरने की है.  

Saturday, July 1, 2017

जल्दी बड़े हो जाइये

जीएसटी आ गया है, छोटे रहना अब जोखिम भरा है...

जीएसटी का यह सबसे कीमती संदेश है जिसे लाखों छोटे उद्यमियों और व्यापारियों को पूरे ध्यान से सुनना चाहिएनहीं तो बड़ी गफलत हो सकती है. अब बड़े होने में पूरा जतन लगा देना होगा क्योंकि सरकार छोटे रहने और छोटा कारोबार करने के लिए ज्यादा सुविधाओं के हक में हरगिज नहीं है.
आप असहमत हो सकते हैं लेकिन जीएसटी लगा रही सरकार मुतमइन है कि ...
1. लघुअनौपचारिकअसंगठित कारोबारों में टैक्स चोरी होती है. छोटे रहना टैक्स चोरी को सुविधाजनक बनाता है.
2. छोटी इकाइयों से टैक्स कम मिलता है और उसे जुटाने की लागत बहुत ज्यादा है.
3. इन्हें टैक्स के अलावा सस्तेे कर्ज जैसी कई तरह की रियायतें मिलती हैं जिनकी लागत बड़ी है.
इसलिए जीएसटी ने देश के करीब पंद्रह करोड़ छोटे उद्योगों और व्या‍पारियों को एक झटके में बड़े उद्योगों के बराबर खड़ा कर दिया है. जीएसटी चर्चा से पहलेकुछ तथ्यों पर निगाह डाल लेना बेहतर होगा.
एडेलवाइस रिसर्च की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिकदेश में लगभग 17 उद्योगसेवाएं या कारोबार ऐसे हैं जो 30 फीसदी से लेकर 90 फीसदी तक असंगठित क्षेत्र में हैं. खुदरा (रिटेल)यार्न व फैब्रिक और परिधान में 90 से 70 फीसदी उत्पाद या व्यापार असंगठित क्षेत्र में है. डेयरीज्वेलरीप्लाइवुडएयर कूलरडाइज पिगमेंट्ससैनिटरीवेयरफुटवियर और  पैथोलॉजी सेवा का 50 से 70 फीसदी और लाइटिंगपंप्सबैटरीज में करीब 30 फीसदी उत्पादन छोटी इकाइयों में होता है.
आइएजीएसटी में छोटों के मतलब के तथ्य तलाशते हैं:
  - जीएसटी से पहले लागू व्यवस्था के तहत 1.5 करोड़ रु. तक के सालाना कारोबार वाली उत्पादन इकाइयां एक्साइज ड्यूटी से बाहर थीं जबकि 10 लाख रु. के सालाना कारोबार पर सर्विस टैक्स से छूट थी.
  - जीएसटी के तहत केवल 20 लाख रु. तक सालाना कारोबार करने वाली सेवा और उत्पादन इकाइयों को रजिस्ट्रेशन और रिटर्न से छूट मिलेगी.
  - 75 लाख रु. तक कारोबार करने वाले कंपोजिशन स्कीम का हिस्सा बन सकते हैंइसके तहत निर्माताओंव्यापारियों और रेस्तरांवालों को रियायती दर पर टैक्स देना होगा. तिमाही और सालाना रिटर्न भरने होंगे.
  - जीएसटी के तहत अगर कोई रजिस्टर्ड इकाईगैर रजिस्टर्ड इकाई से सामान लेती है तो उसका टैक्स और रिटर्न रजिस्टर्ड इकाई ही भरेगी.
जीएसटी के इन तीन प्रावधानों में छिपे संदेश को समझना जरूरी है.
- 20 लाख रु. की छूट सीमा के जरिए बहुत ही छोटे कारोबारी जीएसटी से बाहर रहेंगे. कस्बों या शहरों के औसत कारोबारियों को जीएसटी अपनाना होगा.
छूट और कंपोजिशन स्कीम का सबसे कीमती पहलू यह है कि इन्हें अपनाने वाले कारोबारियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट की सुविधा नहीं मिलेगी यानी कि अपने उत्पादन के कच्चे माल या सेवा पर जो टैक्स उन्होंने चुकाया हैउसकी वापसी नहीं होगी.

 जीएसटी के तहतइनपुट टैक्स क्रेडिट कारोबारी सफलता की बुनियाद बनने वाला है. चुकाए गए टैक्स की वापसी कारोबार के फायदे और प्रतिस्पिर्धा में टिकने का आधार होगी. जो उद्यमी या व्यापारी जीएसटी से बाहर होंगे उनके उत्पाद या सेवाएंजीएसटी अपनाने वालों की तुलना में प्रतिस्पर्धात्मक नहीं रहेंगी. यह उम्‍मीद करना बेकार है कि बड़े टैक्सपेयर छोटी इकाइयों से माल खरीदकर उनका टैक्स (रिवर्स चार्ज) भरेंगे

हकीकत यह है कि जीएसटी के तहत पूरी उत्पाद चेन और वैल्यू एडिशन को संयोजित करने वाले ही फायदे में रहेंगेइसलिए बड़ी कंपनियां सब कुछ चाक-चौबंद कर चुकी हैं.

सरकार को अच्छी तरह से मालूम है कि छोटे कारोबारी तकनीकआदतों और सूचनाओं के नजरिए से जीएसटी के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन आपकी दुकान तक पहुंचते-पहुंचते जीएसटी की परिभाषा बदल चुकी होगी. कारोबारी सहजता और मांग बढ़ाने के मकसद से शुरू हुआ यह सुधार टैक्स सतर्कता और चोरी रोकने की सबसे बड़ी कोशिश में बदल रहा है.

कोई फर्क नहीं पड़ता कि जो आप यह निष्कर्ष निकालें कि जीएसटी बड़ी कंपनियों के लिए सुविधाजनक और फायदेमंद है. सरकार चाहती भी यही है कि असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र सिकुड़े और बड़ा बाजार बड़ों के ही पास रहे.  
इसलिएजीएसटी को लेकर बिसू‍रना छोडि़ए.

जल्द बड़े हो जाने में ही समझदारी है!