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Tuesday, June 13, 2017

नोटबंदी और जीएसटी




जीएसटी और नोटबंदी में इतने गहरे अंतविरोध क्‍यों हैं ?
 

सोने की उत्पादक उपयोगिता (डिमेरिट या सिन प्रोडक्ट) नहीं है. सोने पर कम टैक्स एक  भारी सब्सिडी है जो देश के केवल दो फीसदी समृद्ध लोगों को मिलती है: आर्थिक समीक्षा 2015-16

वित्त मंत्री अरुण जेटली जब आम खपत की चीजों पर भारी टैक्स के बदले सोने पर तीन फीसदी और हीरे (अनगढ़) पर केवल 0.25 फीसदी जीएसटी लगाने का ऐलान कर रहे थे, तब शायद सबसे ज्यादा असहज स्थिति में सरकार के आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मïण्यम रहे होंगे जिन्होंने बीते साल ही सोने पर नगण्य टैक्स की नीति को सूट-बूट की सरकारों के माफिक कहा था.

वैसे, नोटबंदी के पैरोकारों की जमात, जीएसटी पर सुब्रह्मïण्यम से ज्यादा असमंजस में है. जीएसटी नोटबंदी के पावनउद्देश्यों को सिर के बल खड़ा कर रहा है. नकद से दूर हटती अर्थव्यवस्था वित्तीय निवेशों (बॉन्ड, बीमा, शेयर, बैंक जमा) के लिए प्रोत्साहन और सोने व जमीन जैसे निवेशों पर सख्ती चाहती थी ताकि काले धन की खपत के रास्ते बंद हो सकें. लेकिन सोना सरकार का नूरे-नजर है. अचल संपत्ति जीएसटी से बाहर है और वित्तीय निवेशों पर टैक्स बढ़ गया है.

भारत में अधिकांश निजी संपत्ति भौतिक निवेशों में केंद्रित है. सोना और अचल संपत्ति इनमें प्रमुख हैं. क्रेडिट सुईस की ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट (2016) बताती है कि भारत में 86 फीसदी निजी संपत्ति सोना या जमीन में केंद्रित है, वित्तीय निवेश का हिस्सा 15 फीसदी से भी कम है. अमेरिका में लगभग 72, जापान में 53 और ब्रिटेन में 51 फीसदी निजी संपîत्ति शेयर, बैंक बचत, बॉन्ड, बीमा के रूप में हैं.

नोटबंदी का सबसे सार्थक अगला कदम यही होना चाहिए था कि लोगों को सोना और जमीन में निवेश की आदत छोडऩे और वित्तीय निवेश के लिए प्रेरित किया जाए. सोना और जमीन हर तरह की कालिख पचा लेते हैं जबकि वित्तीय निवेशों की निगरानी आसान है.

सोने-हीरे पर जीएसटी का पाखंड दूर से चमकता है. गोल्ड क्रोनिज्म और सोना बेचने-खरीदने वालों की राजनीति इतनी ताकतवर थी कि सोना, हीरा, जेवरों पर केवल तीन फीसदी जीएसटी लगाया गया. इन महंगी खरीदों को विशेष दर्जा देने के लिए जीएसटी की नई दर भी ईजाद की गई.

भारत में सोने की 80 फीसदी खपत केवल 20 फीसदी जनता तक केंद्रित है. इनमें बड़े खरीदार आबादी का दो फीसदी हैं यानी कि कम टैक्स का फायदा केवल दो फीसदी लोगों को मिलेगा.

जानना जरूरी है कि दवा पर सोने से चार गुना या 12 फीसदी और उपभोक्ता सामान पर छह से नौ गुना ज्यादा जीएसटी लगेगा. हमें भूलना नहीं चाहिए कि 2015 में सरकार गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम लाई थी. तब प्रधानमंत्री ने लोगों से सोने का मोह छोडऩे को कहा था.

यदि वह आह्वान सही था तो सोने पर अधिकतम जीएसटी लगना चाहिए था ताकि लोग सोना खरीदने की बजाए गोल्ड बॉन्ड में निवेश करने को प्रेरित होते. अलबत्ता न्यूनतम टैक्स के साथ जीएसटी ने सोने को निवेश का सबसे आकर्षक विकल्प बना कर नोटबंदी के संकल्प को सिर के बल खड़ा कर दिया है.

काले धन को खपाने का सबसे बड़ा स्रोत यानी अचल संपत्ति जीएसटी से बाहर है. अगर जीएसटी वित्तीय पारदर्शिता का सबसे बड़ा अभियान है, तो जमीन-मकान के सौदों के जीएसटी के दायरे में होना ही चाहिए था.

पूरे देश में अचल संपत्ति रजिस्ट्रेशन और सर्किल दरें एक समान बनाकर रियल एस्टेट का कॉमन नेशनल मार्केट बनाना जरूरी है. जमीन-मकान की हर खरीद-फरोख्त पर डिजिटल निगरानी के बिना काले धन के इस्तेमाल पर रोक नामुमकिन है. अचल संपत्ति प्रत्येक कारोबार में आर्थिक  लागत का हिस्सा है, इस पर टैक्स क्रेडिट क्यों नहीं होना चाहिए?

राज्यों ने राजस्व को सुरक्षित रखने की गरज से अचल संपत्ति को दागी सौदों का बाजार बनाए रखना मुनासिब समझा. असंगति देखिए कि मकानों की बिक्री पर सर्विस टैक्स है लेकिन जमीन-मकान के सौदे जीएसटी से बाहर रहेंगे.

जीएसटी में नोटबंदी के शीर्षासन की एक और तस्वीर मिलती है. इस क्रांतिकारीसुधार के बाद वित्तीय सेवाओं पर सर्विस टैक्स 15 से बढ़कर 18 फीसदी हो जाएगा यानी कि वित्तीय निवेश महंगा हो जाएगा. जीएसटी के बाद म्युचुअल फंड मैनेजमेंट चार्ज बढ़ जाएगा. बीमा पर जीएसटी भारी पड़ेगा. जीएसटी से शेयर ब्रोकरेज तो महंगा हो ही जाएगा.

नोटबंदी और जीएसटी दोनों एक ही टकसाल से निकले हैं.

लेकिन तय करना मुश्किल है कि नोटबंदी के मकसद ज्यादा पवित्र थे या फिर जीएसटी के उद्देश्य ज्यादा कीमती हैं?

या फिर सरकार में एक हाथ को दूसरे हाथ का पता ही नहीं है. 


Monday, April 11, 2016

एक लाख करोड़ का सवाल


सब्सिडी गरीबी की नहीं बल्कि अमीरी की राजनीति का शिकार है. सब्सिडी पर नए तथ्य सबूत हैं कि निम्न तो छोड़िए, मध्यम वर्ग भी अब सब्सिडी के बड़े हिस्से के दायरे में नहीं है. 

गर आप यह मानते हैं कि सब्सिडी की पूरी राजनीति केवल निम्न व मध्यम वर्ग के लिए है तो अगली पंक्तियां ध्यान से पढ़िए. भारत में हर साल एक लाख करोड़ रु. की सब्सिडी अमीरों की जेब में जाती है और वह भी केवल सात बड़ी सेवाओं पर. सभी तरह की सेवाओं पर आंकड़ा और बड़ा हो सकता है. भारत में छोटी बचतों पर कर रियायतों का फायदा उठाने वाले 62 फीसदी लोग चार लाख रुपए से ज्यादा की सालाना आय वाले हैं यानी छोटी आय वाले हरगिज नहीं.
सब्सिडी की बहस में अब सिर्फ गरीब-गुरबों और मझोले तबके को कोसने से काम नहीं चलने वाला. इस पेचीदगी की समझने के लिए रियायतों के उस दालान में उतरना होगा जहां अमीरी का राज है.  2015-16 की आर्थिक समीक्षा ने सब्सिडीखोरी के इस तपकते फोड़े को छूने की कोशिश की है. इससे अमीरों को जा रही सब्सिडी की एक छोटी-सी तस्वीर हमारे सामने आई, जिसमें साफ नजर आता है कि छोटी बचत स्कीमें, सोना, बिजली, केरोसिन, रेलवे किराया और विमान ईंधन जैसी सेवाएं जिन पर सरकार सब्सिडी देती है, उनका फायदा समाज के खाए-अघाए लोग उठाते हैं. यहां गरीबों से हमारा मतलब 30 फीसदी लोगों से है जो आबादी में खपत और आमदनी के हिसाब से सबसे नीचे हैं. शेष 70 फीसदी लोगों को बेहतर माना जा सकता है. 
दुनिया की किसी सभ्यता में सोना (गोल्ड ) गरीबी से कोई रिश्ता नहीं रखता. सोना ऐसी वस्तु हरगिज नहीं है जिसकी खरीद के लिए टैक्स में रियायत दी जाए बल्कि हकीकत में तो सोने पर ऊंचे व भरपूर टैक्स की दरकार होती है. लेकिन भारत में सोने पर टैक्स का ढांचा हमारी पूरी टैक्स समझ पर अट्टहास करता है. हम दुनिया के उन कुछ चुनिंदा देशों में होंगे जहां सोने पर दो फीसदी से कम टैक्स लगता है. केंद्र व राज्य दोनों मिलकर सोने पर महज 1 से 1.6 फीसदी टैक्स लगाते हैं जबकि इसके बदले खाने-पीने की सामान्य चीजों से लेकर पेट्रोल-डीजल पर लोग 12.5 फीसदी से 25 फीसदी तक टैक्स चुकाते हैं. सोने पर अगर टैक्स की आदर्श दर 25 फीसदी मान ली जाए तो करीब पूरा देश जरूरी चीजों पर भारी टैक्स चुकाकर और अमीरी तथा समृद्धि के इस प्रतीक पर करीब 23 फीसदी टैक्स सब्सिडी देता है जिसका 98 फीसदी फायदा समृद्ध तबकों को जाता है. समीक्षा मानती है कि सोने पर टैक्स सब्सिडी 4,000 करोड़ रु. से ज्यादा है.
समृद्ध तबके के फायदे के मामले में एलपीजी सिलेंडर सोने से कम नहीं है. एक सिलेंडर बाजार मूल्य की तुलना में 36 फीसदी सस्ता मिलता है. भारत में 91 फीसदी एलपीजी कनेक्शन मझोले व उच्च वर्ग के पास हैं इसलिए एलपीजी पर अमीरों की सब्सिडीखोरी 40,000 करोड़ रु. की है.
इसी तरह रेलवे में अगर सामान्य व ऊंची श्रेणी के दर्जों की यात्रा पर लागत व सब्सिडी का हिसाब किया जाए तो किराए में मिल रही रियायत का करीब 34 फीसदी फायदा अमीरों को जाता है जो 3,671 करोड़ रु. है. बिजली दरों पर दी जा रही सब्सिडी का करीब 32 फीसदी (दिल्ली व तमिलनाडु के सैंपल) फायदा ऊपरी तबकों को जाता है. बिजली दरों पर अमीरों को मिल रही सब्सिडी 37,170 करोड़ रु. तक हो सकती है.
ईंधनों पर सब्सिडी की उलटबांसी में सबसे दिलचस्प मामला है विमानन ईंधन (एविएशन टर्बाइन फ्यूल-एटीएफ) का. भारत में एटीएफ पर औसतन 20 फीसदी टैक्स है जबकि पेट्रोल और डीजल पर अधिकतम 55 और 61 फीसदी. लिखना जरूरी नहीं है कि एटीएफ का इस्तेमाल किस वर्ग के परिवहन के लिए होता है. एटीएफ पर करीब 762 करोड़ रु. सब्सिडी समृद्ध तबके को जाती है. सरकार के अपने सर्वेक्षण मानते हैं कि सस्ता और सब्सिडीवाला 50 फीसदी केरोसिन अमीर तबके को जाता है और साथ में करीब 5,500 करोड़ रु. की सब्सिडी ले जाता है.
आर्थिक समीक्षा की मानी जाए तो इस साल के बजट में प्रॉविडेंट फंड की निकासी पर टैक्स लगाने को लेकर सरकार सही थी लेकिन अगर कोई समझता है कि इस फैसले पर यू-टर्न मध्यम वर्ग की जरूरत को ध्यान में रखकर हुआ तो वह गफलत में है. दरअसल, 12,000 करोड़ रु. की यह सब्सिडी भी करदाताओं में ऊंचे आय वर्गों के फायदे में दर्ज होती है. भारत में छोटी बचतों पर टैक्स छूट विवादित रही है क्योंकि इसके फायदे उठाने वालों की पैमाइश नहीं हो पाती. लेकिन ताजा आंकड़े आयकर की धारा 80 सी (बचत पर छूट) से फायदों की पड़ताल पर नई रोशनी डालते हैं. भारत में 30 फीसदी टैक्स के दायरे में आने वाले लोगों की औसत आय 24.7 लाख रु. सालाना है. कुल करदाताओं में इनका हिस्सा 1.1 फीसदी है. करदाताओं की यह जमात कमाई के आधार पर देश की आबादी में केवल 0.5 फीसदी बैठती है. बीस फीसदी के टैक्स की सीमा में आने वाले कुल करदाता, आबादी के महज 1.6 फीसदी हैं. पीपीएफ सहित छोटी बचतों पर ज्यादातर टैक्स छूट का लाभ इन्हीं दो वर्गों को मिलता है और उसमें भी सबसे ज्यादा सुपर रिच को.
सब्सिडीखोरी की यह सूची अंतिम नहीं है. एक लाख करोड़ रु. की इस सूची में सिर्फ छह जिंस या सेवाएं शामिल हैं और लघु बचतों के एक छोटे वर्ग को गिना गया है जो सब्सिडी, कर रियायतों, और किस्म-किस्म की छूट की विशाल दुनिया का एक सैंपल मात्र है. इसमें राज्यों में दी जाने वाली अलग-अलग तरह की रियायतें शामिल नहीं हैं, जिनमें पेयजल, सड़क परिवहन, संपत्ति कर, हाउस टैक्स और विभिन्न स्थानीय कर हैं. इनमें तमाम कर लागत से कम दर पर इसलिए लगाए जाते हैं ताकि उनका लाभ गरीबों और मझोले तबके को मिल सके.
समझना मुश्किल नहीं है कि भारत में सब्सिडी को संतुलित और तर्कसंगत बनाने की बहसें राजनैतिक जड़ क्यों नहीं पकड़तीं? दरअसल, सब्सिडी गरीबी की नहीं बल्कि अमीरी की राजनीति का शिकार है. सब्सिडी पर नए तथ्य सबूत हैं कि निम्न तो छोड़िए, मध्यम वर्ग भी अब सब्सिडी के बड़े हिस्से के दायरे में नहीं है. इसकी मलाई तो सिर्फ शहरी उच्च व उच्च मध्यम वर्ग काट रहा है जबकि गरीब व मझोले बेसबब ही सब्सिडी की तोहमत और लानत ढो रहे हैं.