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Friday, December 23, 2022

ये उन दिनों की बात है


 

शाम की बात है.. डा. वाटसन ने कमरे के अंदर कदम रखा ही था कि शरलक होम्‍स बोल उठे

आज पूरा दिन आपने क्‍लब में मस्‍ती की है

डा. वाटसन ने चौकते हुए कहा कि आपको कैसे पता

आज पूरा दिन लंदन में बार‍िश हुई

इसके बीच भी अगर कोई व्‍यक्‍ति‍ साफ सुथरे जूतों और चमकते हुए हैट के साथ आता है तो स्‍वाभाविक है क‍ि वह बाहर नहीं था

डा. वाटसन ने कहा यू आर राइट शरलक

यह स्‍वाभाविक है

होम्‍स ने कहा क‍ि हमारे आस-पास बहुत से घटनाक्रम स्‍वाभाविक ही हैं लेक‍िन हम उन्‍हें पढ़ नहीं पाते

यह किस्‍सा इसलिए मौजूं है क्‍यों कि दुनिया इस वक्‍त बड़ी बेज़ार है.  मंदियां बुरी होती हैं लेक‍िन इस वक्‍त भरपूर मंदी चाहती है लेक‍िन जिससे महंगाई से पीछा छूटे मगर मंदी है कि आती ही नहीं ...

क्‍या कहीं कुछ एसा तो नहीं जो स्‍वाभाविक है मगर दिख नहीं पा रहा है. इसलिए पुराने सिद्धांत ढह रहे हैं और कुछ और ही होने जा रहा है.  

महंगाई मंदी युद्ध महामारी सबका इतिहास है लेक‍िन वह बनता अलग तरह से है. बड़ी घटनायें एक जैसी होती हैं मगर उनके ताने बाने फर्क होते हैं. मंदी महंगाई की छाया में एक नया इतिहास बन रहा है.

एश‍िया के देश चाहते हैं कि अमेरिका में टूट कर मंदी आए क्‍यों कि जब महंगाई काट रही हो तो वह मंदी बुलाकर ही हटाई जा सकती है. यानी मांग तोड़ कर कीमतें कम कराई जा सकती हैं. अमेरिका में मंदी आने देरी की वजह ब्‍याज दरें बढ़ रही हैं. डॉलर मजबूत हो रहा है बहुत से देशों के विदेशी मुद्रा भंडार फुलझडी की तरह फुंके जा रहे हैं. सरकारों का प्राण हलक में आ गया है.  

विश्‍व बैंक की जून 2022 रिपोर्ट बताती है कि सभी विकसित देशों और उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं की महंगाई उनके केंद्रीय बैंकों के लक्ष्‍य से काफी ऊपर हैं. एसा बीती सदी में कभी नहीं हुआ. ब्‍याज दरें बढ़ने एश‍िया वाले बुरी तरह संकट में हैं क्‍यों कि यहां महामारी ने बहुत तगड़े घाव किये हैं;    

अर्थशास्‍त्री कहते हैं कि ब्‍याज दरें बढ़ें तो मंदी आना तय. क्‍यों कि रोजगार कम होंगे, कंपन‍ियां खर्च कम करेंगी, बाजार में मांग टूटेगी फिर महंगाई कम होगी. पह‍िया वापसी दूसरी दिशा में घूम पड़ेगा. मंदी की मतलब है कि तीन माह लगातार नकारात्‍मक विकास दर.

अमेरिका फेडरल रिजर्व 2022 में अब तक ब्‍याज दर में तीन फीसदी यानी 300 प्रतिशतांक की बढ़ोत्‍तरी कर चुका है. दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंक अब तक कुल 1570 बेसिस प्‍वाइंट यानी करीब 16 फीसदी की बढत कर चुके हैं.

 

 

इसके बाद महंगाई को धुआं धुआं हो जाना चाहिए था लेक‍िन

कुछ ताजा आंकड़े देख‍िये

-    अमेरिका में उपभोक्‍ताओं की खपत मांग सितंबर में 11 फीसदी बढ़ गई.

-    अमेरि‍का सितंबर में बेरोजगारी बढ़ने के बजाय 3.5 फीसदी कम हो गई

-    फ्रांस में मंदी नहीं आई है केवल आर्थि‍क विकास दर गिरी है.

-    जर्मनी में महंगाई 11 फीसदी पर है लेक‍िन सितंबर की तिमाही में मंदी की आशंक को हराते हुए विकास दर लौट आई

-    कनाडा में अभी मंदी के आसार नहीं है. 2023 में शायद कुछ आसार बनें

-    आस्‍ट्रेलिया में बेरोजगारी दर न्‍यूनतम है. कुछ ति‍माही में विकास दर कम हो सकती है लेक‍िन मंदी नहीं आ रही

-    जापान में विकास दर ि‍गरी है येन टूटा है मगर मंदी के आसार नहीं बन रहे

-    ब्राजील में महंगाई भरपूर है लेक‍िन जीडीपी बढ़ने की संभावना है

-    बडी अर्थव्‍यवस्‍थाओं में केवल ब्रिटेन ही स्‍पष्‍ट मंदी में है 

सो किस्‍सा कोताह कि महंगाई थम ही नहीं रही. अमेरिका में ब्‍याज दर बढ़ती जानी है तो अमेरिकी डॉलर के मजबूती दुन‍िया की सबसे बड़ी मुसीबत है जिसके कारण मुद्रा संकट का खतरा है

कुछ याद करें जो भूल गए

क्‍या है फर्क इस बार .; क्‍यों 1970 वाला फार्मूला उलटा पड़ रहा है जिसके मुताबि‍क महंगी पूंजी से मांग टूट जाती है.

शरलक होम्‍स वाली बात कि कुछ एसा हुआ जो हमें पता मगर दिख नहीं रहा है और वही पूरी गण‍ित उलट पलट कर रहा है

राष्‍ट्रपति बनने के बाद फेड रिजर्व गवर्नर जीरोम पॉवेल को खुल कर बुरा भला कह रहे थे कि उन्‍होंने 2018 में वक्‍त पर ब्‍याज दरें नहीं घटाईं. फेड और व्‍हाइट हाउस के रिश्‍तों को संभाल रहे थे तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री स्‍टीवेन मंच‍ेन जो पूर्व इन्‍वेस्‍टमेंट बैंकर हैं

किस्‍सा शुरु होता है 28 फरवरी 2020 से. इससे पहले वाले सप्‍ताह में जीरोम पॉवेल रियाद में थे जहां प्रिंस सलमान दुनिया के 20 प्रमुख देशों के वित्‍त मंत्र‍ियों और केंद्रीय बैंकों का सम्‍मेलन किया था. वहां मिली सूचनाओं के आधार पर फेड ने समझ लिया था कि अमेरिकी सरकार संकट की अनदेखी कर रही है.

28 फरवरी को तब तक अमेरिका में कोविड के केवल 15 मरीज थे, दो मौतें थे. राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप इस वायरस को सामान्‍य फ्लू बता रहे थे. 28 फरवरी की सुबह जीरोम पॉवल ने वित्‍त मंत्री मंचेन के साथ अपनी नियमित मुलाकात की और उसके बाद रीजलन फेड प्रमुखों के साथ फोन कॉल का सिलस‍िला शुरु हो गया.

दोपहर 2.30 बजे जीरोम पॉवेल ने एक चार लाइन का बयान आया. जिसमें ब्‍याज दर घटाने का संकेत दिया गया था. कोविड का कहर शुरु नहीं हुआ था मगर फेड ने वक्‍त से पहले कदम उठाने की तैयारी कर ली थी. बाजार को शांति मिली.

 

इसके तुरंत बाद पॉवेल और मंचेन ने जी 7 देशों के वित्‍त मंत्र‍ियों की फोन बैठक बुला ली. यह लगभग आपातकाल की तैयारी जैसा था. तब तक अमेरिका में कोविड से केवल 14 मौतें हुईं थी लेक‍िन इस बैठक में ब्‍याज दरें घटाने का सबसे बड़ा साझा अभ‍ियान तय हो गया.

तीन मार्च और 15 मार्च के फेड ने दो बार ब्‍याज दर घटाकर अमेरिका में ब्‍याज दर शून्‍य से 0.25 पर पहुंचा दी. कोव‍िड से पहले ब्‍याज दर केवल 1.5 फीसदी था. 2008 के बाद पहली बार फेड ने अपनी नियम‍ित बैठक के बिना यह फैसले किये थे. सभी जी7 देशों में ब्‍याज दरों में रिकार्ड कमी हुई.

बात यहीं रुकी नहीं इसके बाद अगले कुछ महीनों तक फेड ने अमेरिका के इत‍िहास का सबसे बड़ा कर्ज मदद कार्यक्रम चलाया. करीब एक खरब डॉलर के मुद्रा प्रवाह से फेड ने बांड खरीद कर सरकार, बड़े छोटे उद्योग, म्‍युनिसपिलटी, स्‍टूडेंट, क्रेड‍िट कार्ड आटो लोन का सबका वित्‍त पोषण किया.

 

 

 

कोवि‍ड के दौरान अमेरिक‍ियों की जेब में पहले से ज्‍यादा पैसे थे और उद्योगों के पास पहले से ल‍िक्‍व‍िड‍िटी.

इस दौरान जब एक तरफ वायरस फैल रहा था और दूसरी तरफ सस्‍ती पूंजी.

कोविड से मौतें तो हुईं लेक‍िन अमेरिका और दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍था वायरस से आर्थ‍िक तबाही से बच गईं. यही वजह थी कि कोविड की मौतों के आंकडे बढने के साथ शेयर बाजार बढ़ रहे थे. भारत के शेयर बाजारों इसी दौरान विदेशी निवेश केरिकार्ड बनाये

तो अब क्‍या हो रहा है

यह सब सिर्फ एक साल पहले की बात है और हम इस स्‍वाभाव‍िक घटनाक्रम के असर को नकार कर ब्‍याज दरें बढ़ने से महंगाई कम होने की उम्‍मीद कर रहे हैं. जबकि बाजार में कुछ और ही हो रहा है

अमेरिका में महंगाई दर के सात आंकडे सामने हैं. 1980 के बाद कभी एसा नहीं हुआ कि महंगाई सात महीनों तक सात फीसदी से ऊपर बनी रहे

 

 

मंदी को रोकने और महंगाई को ताकत देने वाले तीन कारक है सामने दिख रह हैं

जेबें भरी हैं ...

2020 में अमेर‍िका के परिवारों की नेट वर्थ यानी कुल संपत्‍त‍ि 110 खरब डॉलर थी साल 2021 में यह 142 ट्र‍िल‍ियन डॉलर के रिकार्ड पर पहुंच गई. 2022 की पहली ति‍माही में इसे 37 फीसदी की बढ़ोत्‍तरी दर्ज हुई. यह 1989 के बाद सबसे बड़ी बढ़त है. यही वह वर्ष था जब फेड ने नेटवर्थ के आंकड़े जुटाने शुरु किये थे.

संपत्‍त‍ि और समृद्ध‍ि में इस बढ़ोत्‍तरी का सबसे बड़ा फायदा शीर्ष दस फीसदी लोगों को  मिला.

 

लेक‍िन नीचे वाले भी बहुत नुकसान में नहीं रहे. आंकड़ो  के मुताबिक सबसे नीचे के 50 फीसदी लोगों की संपत्‍ति‍ जेा 2019 में 2 ट्रि‍लियन डॉलर थी अब करीब 4.4 ट्र‍िलियन डॉलर है यानी करीब दोगुनी बढ़त.

एसा शायद उन अमेरिका में रेाजगार बचाने के लिए कंपनियों दी गई मदद यानी पे चेक प्रोटेक्‍शन ओर बेरोजगारी भत्‍तों के कारण हुआ.

अमेर‍िका में बेरोजगारी का बाजार अनोखा हो गया. नौकर‍ियां खाली हैं काम करने वाले नहीं हैं.

इस आंकडे से यह भी पता चलता है कि अमेर‍िका के लोग महंगाई के लिए तैयार थे तभी गैसोलीन की कीमत बढ़ने के बावजूद उपभोक्‍ता खर्च में कमी नहीं आई है.

कंपनियों के पास ताकत है  

कोविड के दौरान पूरी दुनिया में कंपनियों के मुनाफे बढे थे. खर्च कम हुए और सस्‍ता कर्ज मिला. महंगाई के साथ उन्‍हें कीमतें बढ़ने का मौका भी मिल गया. अब कंपनियां कीमत बढाकर लागत को संभाल रही हैं निवेश में कमी नहीं कर रहीं. अमेरिका में कंपनियों के प्रॉफ‍िट मार्जिन का बढ़ने का प्रमाण इस चार्ट में दिखता है

भारत में भी कोविड के दौरान रिकार्ड कंपनियों ने रिकार्ड मुनाफे दर्ज किये थे. वित्‍त वर्ष 2020-21 में जब जीडीपीकोवडि वाली मंदी के अंधे कुएं में गिर गया तब शेयर बाजार में सूचीबद्ध भारतीय कंपन‍ियों के मुनाफे र‍िकार्ड 57.6 फीसदी बढ़ कर 5.31 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गए. जो जीडीपी के अनुपात में 2.63 फीसदी है यानी (नकारात्‍मक जीडीपी के बावजूद) दस साल में सर्वाध‍िक.

यूरोप और अमेरिका भारत से इस ल‍िए फर्क हैं कि वहां कंपनियां महंगे कर्ज के बावजूद रोजगार कम नहीं कर रही हैं. नई भर्त‍ियां जारी हैं. अमेरिका में ब्‍याज दरें बढ़ने के बाद सितंबर तक हर महीने गैर कृषि‍ रोजगार बढ़ रहे हैं यह बढ़त पांच लाख से 2.5 लाख नौकर‍ियां प्रति माह की है.

 

और कर्ज की मांग भी नहीं टूटी

सबसे अचरज का पहलू यह है कि ब्‍याज दरों में लगातार बढोत्‍तरी के बावजूद प्रमुख बाजारों में कर्ज की मांग कम नहीं हो रही है. कंपनियां शायद यह मान रही हैं कि मंदी नहीं आएगी इसलिए वे कर्ज में कमी नहीं कर रहीं. अमेरिका जापान और यूके में कर्ज की मांग 7 से 10 फीसदी की दर से बढ रही है. भारत में महंगे ब्‍याज के बावजूद कर्ज की मांग अक्‍टूबर के पहले सप्‍ताह में 18 फीसदी यानी दस साल के सबसे ऊंचे स्‍तर पर पहुंच गई है.

 

 

 

 

 

 

 

 

इसलिए एक तरफ जब दुनिया भर के केंद्रीय बैंक मंदी की अगवानी को तैयार बैठे हैं शेयर बाजारों में कोई बड़ी गिरावट नहीं है.

 

कमॉड‍िटी कीमतों में कोई तेज‍ गिरावट भी नहीं हो रही है. तेल और नेचुरल गैस तो खैर खौल ही ही रहे हैं लेकिन अन्‍य कमॉडिटी भी कोई बहुत कमजोर पड़ी हैं. ब्लूबमर्ग का कमॉडि‍टी सूचकांक सितंबर तक तीन माह में केवल चार फीसदी नीचे आ आया है.

 

 

 

 

 

तो अब संभावना क्‍या हैं

मौजूदा कारकों की रोशनी में अब मंदी को लेकर दो आसार हैं.

एक या तो मंदी बहुत सामान्‍य रहेगी

या फिर आने में लंबा वक्‍त लेगी

मंदी न आना अच्‍छी खबर है या चिंताजनक

मंदी का देर से आना यानी  महंगाई का ट‍िकाऊ होना है

तो फिर ब्‍याज दरों में बढ़त लंबी चलेगी

और डॉलर की मजबूती भी

जिसकी मार से दुनिया भर की मुद्रायें परेशान हैं

तो आगे क्‍या

दुनिया ने मंदी नहीं तो स्‍टैगफ्लेशन चुन ली है

यानी आर्थ‍िक विकास दर में गिरावट और महंगाई एक साथ

क्‍या स्‍टैगफ्लेशन मंदी से ज्‍यादा बुरी होती है ..

महंगाई क्‍यों मजबूत दिखती है 

Sunday, November 13, 2022

महंगाई ज्‍यादा बुरी है या मंदी ?


 

 

  

एक्‍शन सिनेमा के शौकीन 2009 की फिल्‍म वाचमेन को नहीं भूल सकते.  यह दुविधा और असमंजस का सबसे रोमांचक फिल्‍मांकन है 1980 का दशक अमेरिका में कॉमिक्‍स के दीवानेपन का दौर था. लोग ब्रिट‍िश कॉमिक लेखक एलन मूर के दीवाने थे जिन्‍होंने कॉमिक्‍स की दुनिया को कुछ सबसे मशूर चरित्र दिये. यह मूवी एलन मूर की प्रख्‍यात कॉमिक्‍स वाचमेन पर आधारित थी जिसे फिल्‍म हालीवुड के स्‍टार एक्‍शन फिल्‍म प्रोड्यूसर लॉरेंस गॉर्डन ने बनाया था जो ब्रूस विलिस की एतिहा‍स‍िक फिल्‍म डाइ हार्ड के निर्माता भी थे.

वाचमेन मूवी का खलनायक ओजिमैंड‍ियास कुछ एसा करता है जिसे सही ठहराना जितना मुश्‍क‍िल है. वह गुड विलेन है यानी अच्‍छा खलनायक. उतना ही उसे गलत ठहराना. विज्ञान, न्‍यूक्‍लियर वार और एक्‍शन पर केंद्रित इस मूवी में मानव जाति‍ को नाभिकीय तबाही से बचाने के लिए ओजिमैंड‍ियास दुनिया के अलग हिस्‍सों में बड़ी तबाही बरपा करता है और नाभिकीय हमला टल जाता है. इस मूवी का प्रसि‍द्ध संवाद नाइट आउल और ओजिमैंडिआस के बीच है.

नाइट आउल - तुमने लाखों को मरवा दिया

ओजिमैंडिआस अरबों लोगों को बचाने के लिए

केंद्रीय बैंक यानी गुड विलेन

दुनिया के केंद्रीय बैंक भी गुड विलेन बन गए हैं. उन्‍होंने महंगाई को मारने के लिए ग्रोथ को मार दिया है. यानी मंदी बुला ली है.

लेक‍िन क्‍या उन्‍होंने सही किया है.

कैसे तय हो कि  महंगाई ज्‍यादा बुरी शय है या मंदी ज्‍यादा बुरी बला?

तो अब हम आपको सीधे बहस के बीचो बीच ले चलते हैं इसके बाद तो फिर  जाकी रही भावना जैसी

महंगाई सबसे बड़ी बुराई

इत‍िहास गवाह है कि महंगाई आते ही मौद्रिक नियामकों के तेवर बदल जाते है. हर कीमत पर अर्थव्‍यवस्‍था की ग्रोथ में सस्‍ते कर्ज का ईंधन डालने वालने बैंकर बला के क्रूर हो जाते हैं. यूरोप को देख‍िये मंदी न आए यह तय करने के लिए बीते एक दशक से ब्‍याज दर शून्‍य पर रखी गई लेक‍िन अब महंगाई भड़की तो मंदी का डर का खत्‍म हो गया.

यूरोप और अमेरिका जहां वित्‍तीय निवेश की संस्‍कृति भारत से ज्‍यादा मजबूत है वहां महंगाई के खतरे के प्रति गहरा आग्रह है. मंदी को उतना बुरा नहीं माना जाता. महंगाई का खौफ इसलिए बड़ा है क्‍यों कि वेतनों में बढ़ोत्‍तरी की गति सीमित रहती है. इसलिए जब भी कीमतें बढ़ती हैं जो जिंदगी जीने की लागत बढ़ जाती है. खासतौर पर उनके लिए जिनकी आय सीम‍ित है

हमारे पास जो भी है और उसकी जो भी कीमत है, महंगाई उस मूल्‍य को कम कर देती है. लोग याद करते हैं कि 1970 की महंगाई ने अमेरिका के लोगों को क्रय शक्‍ति (पर्चेज‍िंग पॉवर) का नुकसान 1930 की महामंदी से ज्‍यादा था.

महंगाई को मंदी के मुकाबले ज्‍यादा घातक यूं भी कहा जाता क्‍यों ि‍क यह पेंशनर और युवाओं दोनों को मारती है. जिंदगी जीने के लागत बढ़ने से युवाओं की बचत का मूल्‍य घटता है जो उनके सपनों पर भारी पड़ता है जैसे कि अगर कोई तीन साल बाद मकान लेना चाहता है तो महंगाई से उसकी लागत बढ़ाकर उसे पहुंच से बाहर कर दिया. इधर ब्‍याज या पेंशन पर गुजारा करने वाले रिटायर्ड की सीम‍ित आय महंगाई के सामने पानी भरती है.

महंगाई बचत की दुश्‍मन है और बचत टूटने से अर्थव्‍यवस्‍था का भविष्‍य संकट में पड़ता है अलबत्‍ता सरकारों को महंगाई से फर्क नहीं पड़ता क्‍यों कि आज के खर्च के लिए वह जो कर्ज दे रहें उसे आगे कमजोर मुद्रा में चुकाना होता है लेक‍िन न‍िवेशकों और उद्योगों की मुश्‍किल पेचीदा हो जाती है.

सरकारें मंदी से नहीं महंगाई से डरती हैं क्‍यों? 

महंगाई के बीच यह तय करना मुश्‍क‍िल होता है कि किसकी मांग बढ़ेगी और किसकी कम होगी. मांग आपूर्ति का पूरा गणित ध्‍वस्‍त! एसे में निवेशक और उद्योग गलत जगह निवेश कर बैठते हैं जिनमें महंगाई के बाद मांग टूट जाती है.

महंगाई खुद को ही ताकत देती है. कीमत बढ़ने से डर से लोग जरुरत से ज्‍यादा खरीदते हैं. बाजार में पूंजी ज्‍यादा हो तो महंगाई को और ईंधन. यही वजह है कि बैंक पूंजी की प्रवाह सिकोड़ते हैं.

पूरी दुनिया की सरकारें महंगाई को संभालने में मंदी से ज्‍यादा मेहनत इसल‍िए करती हैं कि महंगाई बढ़ते ही वेतन बढ़ाने का दबाव बनता है. इस वक्‍त यूरोप और लैटिन अमेरिका में यही हो रहा है. 1970 में महंगाई के दबाव कंपनियों को वेतन बढ़ाने पड़े और स्‍टैगफ्लेशन आ गई.

स्‍टैगफ्लेशन यानी उत्‍पादन में गिरावट और महंगाई दोनों एक साथ होना सबसे बुरी बला है. मंदी से ज्‍यादा बुरी बला क्‍यों कि नियामक मानत‍े हैं कि मंदी लंबी नहीं चलती. हाल के दशकों में तो यह एक दो साल से ज्‍यादा उम्रदराज नहीं होती.

 

कर्ज महंगा होने से संपत्‍त‍ियों की कीमत टूटती हैं और अंतत: अर्थव्‍यवस्‍था में कम कीमत पर नई खरीद आती है. मंदी से रोजगारों पर असर पड़ता है लेक‍िन महंगाई को सबसे बुरी बला मानने वाले कहते हैं कि वह अस्‍थायी है. महंगाई में नए रोजगार नहीं आते और जो हैं उनकी कमाई घटती जाती हैं

बैंकर यह मानते हैं कि मंदी दूर सकती है लेक‍िन महंगाई एक बार लंबी हो जाए तो फिर मुश्‍क‍िल से काबू आती है क्‍यों कि इसके बढ़ते जाने की धारणा इसे ताकत देती है. यह वजह है कि पूरा नियामक समुदाय महंगाई का लक्ष्‍य तय करता है और इसके बढ़ने पर हर कीमत पर इसे रोकने लगता है.

मंदी ज्‍यादा बुरी है

मंदी के पक्ष में भी तर्क कम नहीं है

2007 के बाद वाली मंदी, से हुआ नुकसान महंगाई की तुलना में कहीं ज्‍यादा है. तभी तो शेयर न‍िवेशक जो कर्ज महंगा करने वाले केंद्रीय बैंकों को बिसूर रहे हैं.

यह धारणा गलत है कि महंगाई पूरी अर्थव्‍यवस्‍था को प्रभाव‍ित करती है जबकि मंदी अस्‍थायी तौर पर केवल रोजगारों में कमी करती है. उनका तर्क है कि मंदी पूरी अर्थव्‍यवस्‍था में कमाई कम कर देती है. सभी संसाधनों मसलन पूंजी, श्रम आदि का इस्‍तेमाल क्षमता से कम हो जाता है. 2007 से 2009 की मंदी के दौरान दुनिया की अर्थव्‍यवस्‍था को करीब 20 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ जो पूरी दुन‍िया के एक साल के कुल आर्थ‍िक उत्‍पादन से ज्‍यादा था. उसके बाद दुनिया की विकास दर में कभी पहले जैसी तेजी नहीं आई.

महंगाई से कहां कम होती कमाई ?  

महंगाई रोकने के लिए बैंकों कर्ज महंगा करो मुहिम के खिलाफ यह तर्क दिये जा रहे हैं कि महंगाई सकल आय (सभी कारकों को मिलाकर) कम नहीं करती. एक व्‍यक्‍ति की बढी हुई लागत दूसरे की इनकम है भाई. कच्‍चा तेल महंगा हुआ तो कंपनियों की आय बढ़ी. कीमतें बढती हैं तो किसी न किसी की आय भी तो बढती है. यह आय का पुर्नव‍ितरण है. जैसे महंगाई के साथ कंपनियों की बढ़ती कमाई और उस पर शेयर धारकों का बेहतर रिटर्न. अरे महंगाई से तो राष्‍ट्रीय आय बढती है क्‍यों कि सरकारों का टैक्‍स संग्रह ज्‍यादा होता है.

महंगाई न हो तो इनकम का यह नया बंटवारा करेगा कौन? कुछ लोगों को लगता है कि महंगाई की तुलना में वेतन मजदूरी की वृद्ध‍ि दर कम है लेक‍िन जैसे ही मंदी के वजह रेाजगार घटती है वेतन बढ़ोत्‍तरी के बजाय कमी होने लगती है क्‍यों कि ज्‍यादा लोग बाजार में काम मांग रहे होते हैं. दरअसल मंदी को न केवल बेकारी लाती है बल्‍क‍ि जो काम पर है उनकी कमाई की संभावना को भी सीमित कर देती है.

मंदी से ज्‍यादा बुरा बताने वाले कहते हैं कि केंद्रीय बैंकों को एकदम ब्‍याज दरों में तेज बढ़त नहीं करनी चाहिए बल्‍क‍ि महंगाई को धीरे धीरे ठंडा होने देना चाहिए. क्‍यों कि इतिहास बताता है कि महंगाई घाव तात्‍कालिक होते हैं मंदी का घाव वर्षों नहीं भरता.

 

महंगाई और मंदी के बीच चुनाव जरा मुश्‍क‍िल है ?

पुराने अर्थशास्‍त्री  महंगाई के राजनीतिक अर्थशास्‍त्र एक सूत्र बताते हैं

दरअसल बीते डेढ दशक में दुनिया में महंगाई नहीं आई. सस्‍ते कर्ज के सहारे समृद्ध लोगों ने खूब कमाई की. स्‍टार्ट अप से लेकर शेयर तक धुआंधार निवेश किया. यही वह दौर था जब दुनिया में आय असमानता सबसे तेजी से बढी.

 

 

 

 

इस असमानता कम करने के दो ही तरीकें या तो वेतन बढ़ाये जाएं अध‍िकांश लोगों की आय बढ़े, जो अभी संभव नहीं है तो फिर दूसरा तरीका है कि शेयर, अचल संपत्‍ति‍, सोना जैसी संपत्‍त‍ियां जहां ससती पूंजी लगाई गई है उनकी कीमतों में कमी हो ताकि असमानता दूर हो सके.

महंगाई इन संपत्‍ति‍यों कीमत करती है और इसलि‍ए निवेशकों को सबसे ज्‍यादा नुकसान होता है. अब आप चाहें तो कह सकते कि केंद्रीय बैंक दरअसल महंगाई कम कर के दरअसल निवेशकों को हो रहा नुकसान कम करना चाहते हैं. दूसरा पहलू यह भी होगा कि इस कमी से आम लोगों की कमाई में परोक्ष कमी भी तो बचेगी.

 

भारत को महंगाई और आर्थ‍िक सुस्‍ती दोनों साथ लंबा वक्‍त गुजारने का तजुर्बा है लेक‍िन इस बहस में आप तय कीजिये महंगाई ज्‍यादा बुरी है या मंदी


Sunday, June 5, 2022

जाने कहां गए वो दिन ?


राजामणि‍ टैक्‍सी खरीदना चाहते हैं. उनको याद है कि उनके दोस्‍त महेशबाबू ने चार साल पहले  टैक्‍सी ली थी. महेशबाबू को बैंक कर्ज नहीं दे रहे थे.  कर्ज महंगा तो मिला लेक‍िन फाइनेंस कंपनी से कर्ज की मदद मिल गई . टैक्‍सी चलने लगी. लॉकडाउन में नुकसान हुआ लेक‍िन महेश बाबू खींचतान कर बुरा वक्‍त काट ले गए

राजामण‍ि को भी बैंक कर्ज नहीं दे रहा. उनके पास कमाई का कोई ठोस जरिया नहीं है. और अब वह कंपनी बंद हो गई है जिससे महेशबाबू को कर्ज मिला था. निजी महाजनों से कर्ज लेने का मतलब है सूदखोरी की चपेट में आना.

राजामण‍ि जैसों के लिए बड़ा कठिन वक्‍त शुरु हुआ है. इस फेहर‍िस्‍त में छोटे उद्योग, गांवों ट्रैक्‍टर खरीदने वाले, व्‍यापारी आदि भी शामिल हैं जिनके लिए कर्ज की ख‍िड़की सरकारी या निजी बैंकों में नहीं बल्‍क‍ि  शैडो बैंकों में खुलती थी. वक्‍त ने कुछ एसा पलटा खाया कि भारत की शैडो बैंकिंग का युग खत्‍म हो रहा है. बदलते कानून, नई तकनीकें और महंगा होता कर्ज भारत की विवादि‍त और क्रांतिकारी शैडो बैंकिंग को इति‍हास में दफ्न करने जा रहे हैं 

शैडो बैंकिंग से हमारा मतलब एनबीएफसी से है यानी नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी से. यानी वे बैंक जैसी कंपन‍ियां जो कर्ज तो दे सकती थीं लेक‍िन बैंकों की तरह डिपॉजिट नहीं ले सकती थीं. यह कर्ज के लिए धन कहां से लातीं थी इसकी कहानी जरा लंबी और पेचीदा है क्‍यों कि इस कहानी में इनके ध्‍वस्‍त होने का इतिहास छिपा है.

पहले यह समझना ठीक रहेगा कि किस तरह शैडो बैंकिंग यानी एनबीएफसी  ने कोविड से पहले तक भारत बाजार कर्ज की पूरी तस्‍वीर ही बदल दी थी.

भारत में नई एनबीएफसी बनाने की रफ्तार में 2010 के बाद तेजी आई. 2012 के बाद भारत की बैंकिंग ढांचा लड़खड़ाने लगा था. यह ट‍ि्वन बैलेंस शीट की उलझन का दौर था. भारी कर्ज में डूबी कंपन‍ियों के कारोबार टूट रही थे. सरकारी बैंकों का  बकाया का कर्ज  फंसने लगा था. 2014 तक यह हालत और गंभीर हो गई. बैंकों को कर्ज से हाथ पीछे खींचने पड़े. अगले चार साल में पूरे बैंकिंग सिस्‍टम में  एनपीए यानी फंसे हुए कर्ज का स्‍तर (कुल कर्ज के अनुपात में ) दोगुना हो गया.

 

2014 वह वक्‍त था जब भारत में शैडो बैंकिंग का उदय हुआ. एनबीएफसी की कतार लग गई. कई प्रमुख औद्योगिक घरानों और बड़े निवेशक इस कारोबार में कूद पड़े. उद्योगों से उपभोक्‍तओं तक कर्ज बांटने की कमान इन कंपनियों ने संभाल ली. इन कंपनियों के पास बैंकों की तरह आम लोगों से बचत जुटाने की छूट नहीं थी लेक‍िन कर्ज बांटने की इजाजत थी. बांटने के लिए यह पैसा इन्‍हें बैंकों से मिलता था. बैंक इन्‍हें सीधा कर्ज भी देते थे और इनके बांड में निवेश करते थे  

 

बैंक अपने फंसे कर्ज के कारण नए कर्ज रोक रहे थे. 2014 के ब्‍याज दर कम होने से बाजार में पूंजी भी थी. नोटबंदी (2016) के बाद बैंकों के पास काफी बचत मौजूद थी. इधर  2012 से 2017 के बीच बड़ी मात्रा में लोगों की बचतें म्‍युचुअल फंड के पास पहुंचने लगी थीं. इस दौरान में इनके पास उपलब्‍ध निवेश धन (एसेट अंडर मैनेजमेंट ) में सालाना 22.1 फीसदी के दर बढ़ा.   बैंक और म्‍युचुअल फंड की बचतें यह बचतें एनबीएफसी कर्ज देने या उनके बांड में निवेश में इस्‍तेमाल हुई.


कर्ज की पायलट सीट पर आ गई भारत की शैडो बैंकिंग. मुख्‍य बैकिंग अब पीछे से इन्‍हें पैसा दे रही थी. यही वह दौर था जब भारत में लगभग 10-11 अलग अलग तरह के एनबीएफसी बने जिनमें आटो, हाउस‍िंग, माइक्रो फाइनेंस आद‍ि प्रमुख थे. 

रिजर्व बैंक के आंकडे बताते हैं कि 2014 से 2017  तक कुल कर्ज में बैंकों का हिस्‍सा 62 फीसदी से घटकर 35 फीसदी रह गया. 2013 से 2017 के बीच एनबीएफ का कर्ज वितरण सालाना 13.1 फीसदी और 2017 से 2019 के बीच 23.4 फीसदी की गत‍ि से बढ़ा. 2018-19 तक यानी  कोविड से पहले  वाण‍िज्‍य‍िक कर्ज में खासतौर पर उद्योगों को कर्ज में एनबीएफसी बैंकों की बराबरी पर आ गए थे. 2020 की पहली छमाही तक शैडो बैंकिंग का कुल कर्ज वितरण 23 लाख करोड़ पहुंच रहा था.

 शैडो बैंकिंग का लीमैन मौका

फिर आया 2018, जहां अमेरिका के लीमैन ब्रदर्स की बैंक की तर्ज पर पर  भारत की शैडों बैंकिंग साइकिल स्‍टैंड पर खड़ी साइकिलों की तरह गिरने लगी. भारत की एनबएफसी कर्ज को बांट कर उसे प्रतिभूत‍ियों में बदल रही थी यानी सिक्‍योरिटाइज कर रही थीं. बाजार में पूंजी सस्‍ती थी, बैंक और म्‍युचुअल उनके बांड में पैसा लगा रहे थे. एनबीएफ छोटी अवध‍ि का कर्ज लेकर लंबी अवध‍ि के लिए बांट रही थीं. लिया गया कर्ज सस्‍ता था और बांटा गया महंगा. सामान्‍य तौर पर एनबीएफसी उनको कर्ज दे रही थीं जिन्‍हें बैंक कर्ज लेने लायक नहीं मानते थे. अर्थव्‍यवस्‍था में ढांचागत मंदी आ चुकी थी, एनबीएफसी के कर्ज की क‍िश्‍तें टूटने लगीं, कर्ज डूबने लगे. एनबीएफस का कर्ज सिक्‍यूराइटजेशन 2018 में 1.99 लाख करोड़ तक पहुंच गया था लेक‍िन इनका बिजनेस मॉडल दरक गया था

पहले डूबी देवान हाउस‍िंग जहां 30000 करोड़ का कर्ज घोटाला हुआ और फिर भारत की एनबीएफस की लीमैन आईएलएफस का पतन हुआ. इन्‍हें कर्ज देने वाले बैंक और म्‍युचुअल फंड भी संकट में आ गए.

सनद रहे कि 2014 के बाद कर्ज की सप्‍लाई में इनका हिस्‍सा बहुत बड़ा था. भरपूर कर्ज बांटने का सरकारी अभियान इनके कंधों पर था इसल‍िए सरकार ने बैंकों के जरिये इनके पैकेज, बेलआउट का इंतजाम किया लेक‍िन निवेश हाथ क्‍या कोहनी भी जला चुके थे. वे एनबीएफसी के लिए सख्‍त और बैंकों जैसे नियम मांग रहे थे इसल‍िए शैडो बैंकिंग अस्‍ताचल की तरफ बढ़ चली. यहीं से भारत की शैडो बैंक‍िंग को लेकर नियम कानूनों का मि‍जाज बदलने लगा.

2018 के बाद इस एनबीएफ की दुनिया में तीन बड़े भूचाल आए हैं. इनको समझना जरुरी है ताकि हमें पता चल सके कि राजामणि‍ को जैसों कर्ज मिलना कयों मुश्‍क‍िल हो गया है.

1- आईएलएफएस के डूबने के बाद रिजर्व बैंक को शैडो बैंकिंग की दरारें नजर आईं. नियम बदले गए. एनबीएफसी को बैंकों तरह संकट के लिए रिजर्व बनाने होंगे. एनपीए घोष‍ित करने होंगे. कर्ज फंसने की सूरत बैंकों की तर्ज इन्‍हें सख्‍त नियमों (पीसीए) में बांधा जाएगा. अब केवल बड़ी एनबीएफसी ही टिकेंगी लेक‍िन उन्‍हें बहुत पूंजी लगानी होगी

2- दूसरा भूचाल तकनीक की दुनिया से आया. फिनटेक के बाद नई तरह व‍ित्‍तीय सेवायें. एनबीएफसी केवल कर्ज बांटने में सक्रिय थे. इस बीच बैकों व अन्‍य वित्‍तीय कंपनियों में पेमेंट, वालेट, यूपीआई,  ऑनलाइन पेमेंट, आदि सेवाओं का  पूरा पोर्टफोलियो बना लिया. सरकारी और निजी बैंक तेजी से से आगे गए आ गए.  कर्ज के कारोबार तक सीम‍ित एनबीएफसी इस होड़ में अब दौड़ नहीं पाएंगे

3- तीसरा सबसे बड़ा झटका कर्ज की महंगाई है. एनबीएफसी सस्‍ते कर्ज के युग में उभरे थे. यह वित्‍तीय प्रणाली के आर‍बि‍ट्राज पर चलते थे. बैंकों व बांड के जरिये सस्‍ता कर्ज उठाकर आगे बांटते थे. कर्ज महंगा होने के बाद यह संभावान चुक गई है. एनबीएफसी के लिए फंड की लागत में बेतहाशा बढ़ोत्‍तरी हो रही हैं दूसरी तरफ महंगे कर्ज के लेनदार घट हैं

 

चार अप्रैल का दिन भारत के वित्‍तीय बाजार की एक और बड़ी करवट थी जब एचडीएफसी के एचडीएफसी बैंक में विलय का एलान हुआ. देश की सबसे बड़ी हाउस‍िंग फाइनेंस कंपनी एचडीएफसी जो कि एनबीएफसी है, वह सबसे बड़ी निजी बैंक में विलय होने जा रही थी. यह विलय अभी मंजूर‍ियों में फंसा है लेक‍िन बाजार ने समझ लिया था कि जब नए कानूनों में बैंकों और एनबीएफसी में अंतर नहीं बचा दो का क्‍या फायदा. अचरज नहीं कि बची हुए बड़ी एनबीएफसी या तो बैंकों के लाइसेंस लें लें या किसी बैंक की गोद में समा जाएं.

शैडो बैंकिंग के पतन के साथ देश के कर्ज के बाजार में दो बहुत बड़े  बदलाव हो रहे हैं. 

एक-                     कर्ज अब आमतौर पर महंगा होगा और कर्ज देने वाले कम बचेंगे

दो-                         दो- बहुत बड़ा तबका बैंकों से कर्ज नहीं ले पाएगा क्‍यों कि उनके पास मजबूत बिजनेस मॉडल नहीं है और बैंक उनके साथ जोखिम नहीं ले सकते.

भारत इस समय करीब 3 ट्र‍िल‍ियन डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था है जिसमें कर्ज का हिसस करीब 1.6 ट्रिल‍ियन डॉलर है. बैंक कर्ज का जीडीपी से अनुपात 56 फीसदी है जबक‍ि कारपोरेट कर्ज जीडीपी का 90 फीसदी. विक‍स‍ित देशों में प्राइवेट कर्ज जीडीपी अनुपात 200 फीसदी से ऊपर है. स्‍टेट बैंक का आकलन है कि भारत मे 5 ट्रि‍ल‍ियन डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था बनने के लिए करीब एक ट्र‍िल‍ियन डॉलर के कर्ज बांटने होंगे...

सरकार को कर्ज बाजार और कर्ज विकल्‍पों की नियमावली नए स‍िरे लिखनी होगी. लेक‍िन सरकारों के पास वक्‍त कहां है?