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Monday, July 2, 2012

याद हो कि न याद हो


ह जादूगर यकीनन करामाती था। उसने सवाल उछाला। कोई है जो बीता वक्‍त लौटा सके। .. मजमे में सन्‍नाटा खिंच गया। जादूगर ने मेज से यूपीए सरकार के पिछले बजट उठाये और पढ़ना शुरु किया। भारी खर्च वाली स्‍कीमें, अभूतपूर्व घाटेभीमकाय सब्सिडी बिलकिस्‍म किस्‍म के लाइसेंस परमिट राज, प्रतिस्‍पर्धा पर पाबंदी,.... लोग धीरे धीरे पुरानी यादों में उतर गए और अस्‍सी के दशक की समाजवादी सुबहें, सब्सिडीवादी दिन और घाटा भरी शामें जीवंत हो उठीं। यह जादू नही बल्कि सच है। उदार और खुला भारत अब अस्सी छाप नीतियों में घिर गया है। यह सब कुछ सुनियोजित था या इत्तिफाकन हुआ अलबत्‍ता संकटों की इस ढलान से लौटने के लिए भारत को अब बानवे जैसे बड़े सुधारों की जरुरत महसूस होने लगी है। इन सुधारों के लिए प्रधानमंत्री को वह सब कुछ मिटाना होगा जो खुद उनकी अगुआई में पिछले आठ साल में लिखा गया है।
बजट दर बजट
ढहना किसे कहते हैं इसे जानने के लिए हमें 2005-06  की रोशनी में 2011-12 को देखना चाहिए। संकटों के सभी प्रमुख सूचकांक इस समय शिखर छू रहे हैं। जो यूपीए की पहली शुरुआत के वक्‍त अच्‍छे खासे सेहत मंद थे। राजकोषीय घाटा दशक के सर्वोच्‍च स्‍तर पर (जीडीपी के अनुपात में छह फीसद) है और विदेशी मुद्रा की आवक व निकासी का अंतर यानी चालू खाते का घाटा बीस साल के सबसे ऊंचे स्‍तर (4.5 फीसद) पर। ग्रोथ भी दस साल के गर्त में है। राजकोषीय संयम और संतुलित विदेशी मुद्रा प्रबंधन भारत की दो सबसे बडी ताजी सफलतायें थीं, जिन्‍हें हम पूरी तरह गंवा चुके हैं।  ऐसा क्‍यों हुआ इसका जवाब यूपीए के पिछले आठ बजटों में दर्ज है। उदारीकरण के सबसे तपते हुए वर्षों में समाजवादी कोल्‍ड स्‍टोरेज से निकले पिछले बजट ( पांच चिदंबरम चार प्रणव) भारत की आर्थिक बढ़त को कच्‍चा खा गए। बजटों की बुनियाद यूपीए के न्‍यूनतम साझा कार्यक्रम ने तैयार की थी। वह भारत का पहला राजनीतिक दस्‍तावेज था जिसने देश के आर्थिक संतुलन को मरोड़ कर

Monday, March 26, 2012

इन्‍क्‍लूसिव (ग्रोथ) बोझ

तीत कभी वापस नहीं लौटता। जिस ज्ञानी गुणी ने यह सिद्धांत दिया होगा उसे यह अंदाज नहीं होगा कि भारत की सरकारें ऐसा बजट बना सकती हैं जो अतीत को खीच कर वापस वर्तमान में खड़ा कर दें। भारी सब्सिडी, फिजूल की स्‍कीमें, बेसिर पैर के खर्च वाला पुराना समाजवादी नुस्‍खा। भारी टैक्‍स व मनमानी रियायतों का बोदा फार्मूला। वही भयानक घाटा, कर्जदार सरकार, बर्बाद होते बैंक। कुछ खास लोगों को सब कुछ देने वाला पुराना भ्रष्‍ट लाइसेंस राज। लगता है कि जैसे आर्थिक सुधारों से पहले वाला बंद, अंधेरा, सीलन भरा लिजलिजा सरकारी दौर जी उठा है। समावेशी विकास यानी इन्‍क्‍लूसिव ग्रोथ की कांग्रेसी सियासत ने हमें उलटी गाड़ी में चढ़ा दिया है। यूपीए की दो सरकारों के कथित समावेशी विकास की नीतियों ने पूरे बजटीय अनुशासन का श्राद्ध कर कर दिया और ग्रोथ लाने वाले खर्च का गला घोंट दिया। अद्भुत स्‍कीम प्रेम में आर्थिक सुधारों फाइलें बंद हो गई जबकि गांवों तक भ्रष्‍टाचार की दुकानें खुल गई। इन्‍क्‍लूसिव ग्रोथ की सूझ अब सबसे बड़ा बोझ बन गई है।
समावेशी संकट
बजट को आंकड़ा दर आंकड़ा खंगालते हुए कोई भी एक अजीब किस्‍म के डर से भर जाएगा। समावेशी विकास की अंधी सूझ हम पर बहुत भारी पड़ी। समस्‍याओं की शुरुआत आर्थिक नीतियों में उस करवट से हुई है जहां सरकार की नीतियों का फोकस बदला और समावेशी विकास के नाम पर सब कुछ मुफ्त बांटने की पुरानी सियासत शुरु हो गई। 2005-06 में बजट का कुल खर्च पांच लाख करोड़ रुपये था जो छह साल के भीतर करीब 15 लाख करोड़ (इस बजट में) हो गया। (छठे वेतन आयोग के अलावा) इतना अधिक खर्च किस पर बढ़ा ? पिछले आठ वर्षों में सरकार ने देश में कोई नई परियोजनाए नहीं लगाईं। सरकार के खर्च से कोई बडा बुनियादी ढांचा नहीं बना। यह बढ़ा हुआ खर्च दरअसल उस नए राजनीतिक अर्थशास्‍त्र

Monday, March 19, 2012

बजट नहीं संकट

रकारें दुर्भाग्‍य भी ला सकतीं  हैं। सियासत अभिशाप भी बन सकती है और बजट संकटों की शुरुआत भी कर सकते हैं। अब से छह माह बाद जब देश में महंगाई की दर दहाई को छू रही होगी, ग्रोथ यानी आर्थिक विकास की दर अपनी एडि़यां रगड रही होगी और बजट का संतुलन बिखर चुका होगा तब हमें यह समझ में आएगा बजट कितने बदकिस्‍मत होते हैं। उम्‍मीदें टूटने का गम भूल कर बस यह देखिये कि सरकार कितनी जल्‍दी इस बजट के बुरे असर कम करने के लिए मोर्चे पर लगती है। यह हाल के वर्षों का पहला बजट होगा, जिससे मुसीबतों के समाधान की नहीं बलिक समस्‍याओं के नए दौर की शुरुआत होती दिख रही है। लड़खड़ाती अर्थव्‍यवस्‍था, थके उपभोक्‍ता और ह‍ताश निवेशक बजट से बेहद तर्कसंगत सुधार (रियायतें नहीं) चाहते थे तब प्रणव के बजट ने उपभोक्‍ताओं की कमर और ग्रोथ की टांगे तोड़ दी हैं। सियासत और सरकार दोनों ने मिलकर अब अर्थव्‍यव्‍स्‍था को अंधी गली में धके‍ल दिया है,  जहां से बाहर आने में कम से कम तीन वर्ष लगेंगे।
भयानक मार
आप जिंदा मक्‍खी निगल सकते हैं मगर जिंदा मेढक नहीं। 45000 करोड़ रुपये के नए अप्रत्‍यक्ष करों (पिछले एक दशक में सर्वाधिक) के बाद महंगाई नहीं तो और क्‍या बढेगा। टैक्‍स बुरे नहीं हैं क्‍यों कि इनसे देश चलता है मगर जब ग्रोथ डूब रही तो सर पर टैक्‍स का बोझ रख देना पता नहीं कहां की समझदारी है। समझना मुश्किल है कि वितत मंत्री इस कदर टैक्‍स बढाकर आखिर हासिल क्‍या

Monday, March 7, 2011

बजट तो कच्चा है जी !

अथार्थ
गरबत्ती का बांस, क्रूड पाम स्टीरियन, लैक्टोज, टैनिंग एंजाइन, सैनेटरी नैपकिन, रॉ सिल्क पर टैक्स ......! वित्त मंत्री मानो पिछली सदी के आठवें दशक का बजट पेश कर रहे थे। ऐसे ही तो होते हैं आपके जमाने में बाप के जमाने के बजट। हकीकत से दूर, अस्त व्यस्त और उबाऊ। राजनीति, आर्थिक संतुलन और सुधार तीनों ही मोर्चों पर बिखरा 2011-12 का बजट सरकार की बदहवासी का आंकड़ाशुदा निबंध है। महंगाई की आग में 11300 करोड़ रुपये के नए अप्रत्यक्ष करों का पेट्रोल झोंकने वाले इस बजट और क्‍या उम्मीद की जा सकती है। इससे तो कांग्रेस की राजनीति नहीं सधेगी क्यों कि इसने सजीली आम आदमी स्कीमों पर खर्च का गला बुरी तरह घोंट कर सोनिया सरकार (एनएसी) के राजनीतिक आर्थिक दर्शन को सर के बल खड़ा कर दिया है। सब्सिडी व खर्च की हकीकत से दूर घाटे में कमी के हवाई किले बनाने वाले इस बजट का आर्थिक हिसाब किताब भी बहुत कच्चा है। और रही बात सुधारों की तो उनकी चर्चा से भी परहेज है। प्रणव दा ने अपना पूरा तजुर्बा उद्योगों के बजट पूर्व ज्ञापनों पर लगाया और कारपोरेट कर में रियायत देकर शेयर बाजार से 600 अंकों में उछाल की सलामी ले ली। ... लगता है कि जैसे बजट का यही शॉर्ट कट मकसद था।
महंगाई : बढऩा तय
इस बजट ने महंगाई और सरकार में दोस्ती और गाढ़ी कर दी है। अगले वर्ष के लिए 11300 करोड़ रुपये और पिछले बजट में 45000 करोड़ रुपये नए अप्रत्यक्ष करों के बाद महंगाई अगर फाड़ खाये तो क्या अचरज है। चतुर वित्त मंत्री ने महंगाई के नाखूनों को पैना करने का इंतजाम छिपकर किया है। जिन 130 नए उत्पादों को एक्साइज ड्यूटी के दायरे में लाया गया है उससे पेंसिल से लेकर मोमबत्ती तक दैनिक खपत वाली

Monday, February 21, 2011

एक बजट बने न्यारा

अर्थार्थ
गर आर्थिक सुधारों के लिए संकट जरुरी है तो भारत सौ फीसदी यह शर्त पूरी करता है। यदि संकट टालने के लिए सुधार जरुरी हैं तो हम यह शर्त भी पूरी करते हैं। और यदि संतुलित ढंग से विकसित होते रहने के लिए सुधार जरुरी हैं तो भारत इस शर्त पर भी पूरी तरह खरा है। यानी कि आर्थिक सुधारों की नई हवा अब अनिवार्य है। लेकिन कौन से सुधार ?? प्रधानमंत्री (ताजी प्रेस वार्ता) की राजनीतिक निगाहों में खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण स्वास्‍थ्‍य मिशन नए सुधार हैं लेकिन उद्योग कहता है उहं, यह क्या् बात हुई ? सुधारों का मतलब तो विदेशी निवेश का उदारीकरण, वित्तीसय बाजार में नए बदलाव, बुनियादी ढांचे में भारी निवेश आदि आदि है।... दरअसल जरुरत कुछ हाइब्रिड किस्म के सुधारों की है यानी सामाजिक व आर्थिक दोनों जरुरतों को पूरा करने वाले सुधार। हम जिन सुधारों की बात आगे करेंगे वह किसी बौद्धिक आर्थिक विमर्श से नहीं निकले बल्कि संकटों के कारण जरुरी हो गए हैं। यदि यह बजट इन्हें या इनकी तर्ज (नाम कोई भी हो) पर कुछ कर सके तो तय मानिये कि यह असली ड्रीम बजट होगा क्यों कि यह उन उम्मीदों और सपनों को सहारा देगा जो पिछले कुछ महीनों दौरान टूटने लगे हैं।
स्पेशल एग्रीकल्चर जोन
हम बडे नामों वाली स्कीमों के आदी हैं इसलिए इस सुधार को एसएजेड कह सकते हैं। मकसद या अपेक्षा खेती में सुधार की है। केवल कृषि उत्पादों की मार्केटिंग के सुधार की नहीं (जैसा कि प्रधानमंत्री सोचते हैं और खेती का जिम्मा राज्यों के खाते में छोड़ते हैं।) बल्कि खेती के कच्चे माल (जमीन, बीज, खाद पानी) से लेकर उत्पादन तक हर पहलू की। अब देश में फसलों के आधार पर विशेष् जोन

Monday, February 7, 2011

बड़े मौके का बजट

अर्थार्थ
चहत्तर साल के प्रणव मुखर्जी इकसठ साल के गणतंत्र को जब नया बजट देंगे तब भारत की नई अर्थव्यवस्था पूरमपूर बीस की हो जाएगी। ... है न गजब की कॉकटेल। हो सकता है कि महंगाई को बिसूरते, थॉमसों, राजाओं और कलमाडि़यों को कोसते या सरकार की हालत पर हंसते हुए आप भूल जाएं कि अट्ठाइस फरवरी को भारत का एक बहुत खास बजट आने वाला है। बजट यकीनन रवायती होते हैं लेकिन यह बजट बड़े मौके का है। यह बजट भारत के नए आर्थिक इंकलाब (उदारीकरण) का तीसरा दशक शुरु करेगा। यह बजट नए दशक की पहली पंचवर्षीय योजना की भूमिका बनायेगा जो उदारीकरण के बाद सबसे अनोखी चुनौतियों से मुकाबिल होगी क्यों कि खेत से लेकर कारखानों और सरकार से लेकर व्या पार तक अब उलझनें सिर्फ ग्रोथ लाने की नहीं बल्कि ग्रोथ को संभालने, बांटने और बेदाग रखने की भी हैं। हम एक जटिल व बहुआयामी अर्थव्यवस्था हो चुके हैं, जिसमें मोटे पैमानों (ग्रोथ, राजकोषीय संतुलन) पर तो ठीकठाक दिखती तस्वी्र के पीछे कई तरह जोखिम व उलझने भरी पडी हैं। इसलिए एक रवायती सबके लिए सबकुछ वाला फ्री साइज बजट उतना अहम नहीं है जितना कि उस बजट के भीतर छिपे कई छोटे छोटे बजट। देश इस दशकारंभ बजट को नहीं बलिक इसके भीतर छिपे बजटों को देखना चाहेगा, जहां घाटा बिल्कुल अलग किस्म का है।
ग्रोथ : रखरखाव का बजट
वित्त मंत्री को अब ग्रोथ की नहीं बलिक ग्रोथ के रखरखाव और गुणवत्ता की चिंता करनी है। बीस साल की आर्थिक वृद्धि ऊंची आय, असमानता, असंतुलन, निवेश, तेज उतपादन, भ्रष्टाचार, उपेक्षा, अवसर यानी सभी गुणों व दुर्गुणों के साथ मौजूद है। मांग के साथ महंगाई मौजूद है और आपूर्ति के साथ बुनियादी ढांचे की किल्लत लागत चौतरफा बढ़ रही है और ग्रोथ की दौड़ मे पिछड़ गए कुछ अहम क्षेत्र आर्थिक वृद्धि की टांग खींचने लगे हैं। कायदे से वित्त मंत्री को महंगाई से निबटने का बजट ठीक करते नजर आना चाहिए। महंगाई भारत की ग्रोथ कथा में खलनायक बनने वाली है। इस आफत को  टालने के लिए खेती को जगाना जरुरी है। यानी कि इस बजट को पूरी तरह

Thursday, April 22, 2010

बजट की षटपदी (दो) – खर्च प्रसंग

यह अर्थार्थ स्‍तंभ का हिस्‍सा नहीं है लेकिन इसे एक तरह से अर्थार्थ भी माना जा सकता है। बजट के भीतर कर और खर्च को दो अलग-अलग दिलचस्‍प जगत हैं। बजट के अंतर्जगत की यात्रा पर दैनिक जागरण में दो चरणों मे प्रकाशित छह खबरों को लेकर कई स्‍नेही पाठकों काफी उत्‍सुकता दिखाई थी इसलिए लगा कि बजट की इस दिलचस्‍प दुनिया का ब्‍योरा सबसे बांट लिया जाए। सो बजट की यह षटपदी आप सबके सामने प्रस्‍तुत है। खुद ही देख लीजिये कि हमारी सरकारें कैसे कर लगाती है और कैसे खर्च करती हैं।
खातों में खेल-1
(केंद्र सरकार के खातों में दिलचस्प खेल जारी हैं। सरकार के पास विनिवेश फंड के खर्च का हिसाब- किताब रखने का खाता तक नहीं है।)

विनिवेश की रकम, बजट में गुम
-किस सामाजिक विकास के काम आई सरकारी रत्न बेचकर की गई कमाई?
-बजट में नहीं है विनिवेश की रकम के इस्तेमाल का ब्यौरा
-राष्ट्रीय निवेश फंड के इस्तेमाल का खाता तक नहीं
(अंशुमान तिवारी) सरकारी रत्नों को बेचकर की गई कमाई सरकार ने किस सामाजिक विकास में लगाई? सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश से आया पैसा किसके काम आया? विनिवेश का पूरा हिसाब-किताब बजट के भीतर शायद कहीं खो गया है। न सही खाता है न बही। वित्त मंत्रालय को बस विनिवेश से मिली रकम मालूम है। मगर इस रकम का इस्तेमाल कहां और कितना हुआ, यह जानकारी देने वाला खाता या हिसाब-किताब बजट में है ही नहीं।
पूरा मामला सरकारी खातों में गंभीर अपारदर्शिता का है। सरकार ने विनिवेश की रकम को सामाजिक विकास स्कीमों और सरकारी उपक्रमों के सुधार में लगाने का नियम तय किया था। लेकिन सरकारी खातों की ताजी पड़ताल बताती है कि विनिवेश की रकम के इस्तेमाल का ब्यौरा ही उपलब्ध नहीं है। सूत्रों के मुताबिक नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (कैग) विनिवेश से मिली राशि को लेकर सरकार के खातों की पड़ताल कर रहा है और वित्त मंत्रालय से मामले की कैफियत भी पूछी गई है। मंत्रालय के अधिकारी इसके आगे कुछ बताने को तैयार नहीं है। बताते चलें कि सरकार ने पिछले वित्त वर्ष 2009-10 में विनिवेश से 25,958 करोड़ रुपये जुटाए हैं और इस साल 40,000 करोड़ रुपये जुटाने का कार्यक्रम है। जब पिछला हिसाब-किताब ही गफलत में है तो इसके इसके निर्धारित इस्तेमाल को लेकर भी संदेह है ।
सरकार ने विनिवेश से मिली रकम को रखने के लिए नेशनल इन्वेस्टमेंट फंड बनाया है। वर्ष 2008-09 के आंकड़े बताते हैं कि इसमें करीब 1,814.45 करोड़ रुपये की रकम है। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। भारत की समेकित निधि में इस विनिवेश की राशि से 84.81 करोड़ रुपये की कमाई भी दिखाई गई, लेकिन इसके बाद इस रकम के इस्तेमाल और खर्च का कोई खाता या हिसाब बजट में उपलब्ध नहीं है। जबकि नियमों के तहत इस इस फंड से खर्च और कमाई का हर छोटा-बड़ा ब्यौरा बजट के हिस्से के तौर पर संसद के सामने होना चाहिए।
गौरतलब है कि विनिवेश से आई राशि को शेयर व ऋण बाजार में लगाया जाता है। यूटीआई एसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी), एसबीआई फंड्स और जीवन बीमा सहयोग एएमएसी विनिवेश से मिली रकम का निवेश एक पोर्टफोलियो मैनेजमेंट स्कीम के तहत शेयर बाजार में करती हैं। यह स्कीम सेबी के नियंत्रण मे है, लेकिन इस निवेश पर होने वाली कमाई या नुकसान का ब्यौरा भी सरकार के खातों में तलाशने पर नहीं मिलता।
एक जानकार के मुताबिक विनिवेश की राशि तो बजट में ही है, लेकिन इस खर्च का खाता न होने का मतलब है कि शायद इसका इस्तेमाल उन मदों में नहीं हुआ है जहां होना चाहिए था। अर्थात रत्नों की कमाई शायद बजट का घाटा कम करने में ही काम आई है। जिसे टालने के लिए सरकार ने यह तय किया था कि यह रकम स्पष्ट रूप से सामाजिक विकास व सार्वजनिक उपक्रमों के सुधार पर खर्च होगी।
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खातों में खेल-2
(सरकार के बजट का 'अन्य' खाता बहुत बड़ा हो गया है। करीब 30 फीसदी खर्च अन्य में डाल कर छिपा लिया जाता है, जो बजट में नजर नहीं आता। )

पूरी-पूरी स्कीमें निगल जाता है बजट का 'बेनामी' खाता
-अन्य खर्चो की छोटी सी मद हुई बहुत बड़ी
-हज सब्सिडी से लेकर इंदिरा आवास योजना तक अन्य खर्च में
-बड़ी मदों का आधा खर्च अन्य के खाते में
(अंशुमान तिवारी) बजट के खातों की खर्च की सबसे उपेक्षित और छोटी मद खर्च 'छिपाने' की शायद सबसे बड़ी मद बन चुकी है। बजट की खर्च सूची में सबसे नीचे छिपा नामालूम सा 'अन्य खर्च' पूरी-पूरी स्कीमें, भारी भरकम अनुदान और मोटी सब्सिडी तक निगल जाता है। पिछले कुछ वर्षो दौरान बजट में 'अदर एक्सपेंडीचर' दरअसल एक ब्लैक होल बन गया है। जिसमें हज सब्सिडी और इंदिरा आवास योजना जैसे बड़े-बड़े खर्चे भी गुम हो जाते हैं। और ऊपर से तुर्रा यह कि इस भीमकाय अन्य खर्च का कोई ब्यौरा बजट के जरिए देश को बताया भी नहीं जाता।
सरकार के खातों में इतने बड़े-बड़े गुन हैं कि दांतों तले उंगली दबानी पड़ती है। ताजा बजट 7,35,657 करोड़ रुपये के गैर योजना खर्च में 2,07,544 करोड़ रुपये अर्थात करीब 30 फीसदी खर्च अन्य के खाते में डाल कर निकल गया है। इस अन्य में राज्यों की पुलिस को चुस्त करने के लिए अनुदान जैसे अहम खर्च भी हैं। सूत्रों के मुताबिक सीएजी यानी नियंत्रक व महालेखा परीक्षक पिछले साल से इस अन्य के रहस्य से जूझ रहा है। पिछले साल आई सीएजी की रिपोर्ट में इस पर सरकार से जवाब मांगा गया था, लेकिन वित्त मंत्रालय सवालों से किनारा कर रहा है।
वर्ष 2007-08 और 08-09 में सरकारी खर्च की गहरी पड़ताल बताती है कि 29 प्रमुख खर्चो के मामले में क्रमश: करीब 20,000 करोड़ रुपये और 28,000 करोड़ रुपये का खर्च अन्य की छोटी मद में दिखा दिया गया। सूत्रों के मुताबिक वर्ष 2008-09 के बजट में 8,799 करोड़ रुपये की इंदिरा आवास योजना, 620 करोड़ रुपये की हज सब्सिडी और सफाई कर्मियों के लिए 100 करोड़ रुपये की योजना जैसे खर्च अन्य के अंधे कुएं में खो गए। वर्ष 2007-08 के बजट में हज सब्सिडी के अलावा गांवों में गोदाम बनाने और अनुसूचित जातियों के कल्याण की स्कीम भी अन्य खर्चो का हिस्सा बन गई।
अपारदर्शी हिसाब-किताब की यह बीमारी ग्रामीण विकास, आवास, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण, नागरिक विमानन और कृषि जैसे बड़े मंत्रालयों के खर्च में और बढ़ी है। आकलन बताता है कि 29 बड़ी मदों में कुल खर्च का आधा से ज्यादा हिस्सा अन्य खर्च में खो गया है। दरअसल सरकार अन्य खर्चो के हिसाब को बजट के जरिए देश को नहीं बताती। इसलिए यह पता भी नहीं चलता कि इस अन्य की मद में क्या-क्या छिपा है। केंद्र के बजट में खर्च को कुछ बड़ी मदें (मेजर हेड) और एक छोटी मद (माइनर हेड) में बांटा जाता है। अन्य खर्च बजट की छोटी मद है। सिर्फ बड़ी मदों का खर्च बजट के जरिए संसद और देश के सामने रखा जाता है। छोटी मदों के खर्च को सरकारी खातों के नियंत्रक (सीजीए) अलग से हिसाब लगाकर फाइलों में दाखिल दफ्तर कर देते हैं। अन्य खर्चो की यह छोटी सी मद हर मंत्रालय के खर्च के साथ चिपकी रहती है और जाहिर है कि अब सरकार के लिए बड़े काम की साबित हो रही है।
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खातों में खेल (अंतिम)
केंद्र सरकार अब पंचायती राज संस्थाओं व स्थानीय निकायों को पैसा दे रही है। बजट का एक मोटा हिस्सा इन्हें सीधे मिलता है, लेकिन इन तक नहीं पहुंचती आडिट की रोशनी।

खर्च के अधिकार, हिसाब पर अंधकार
-स्वायत्त संस्थाओं को सीधे मिलने वाले हजारों करोड़ सरकार के राडार से बाहर
-मनरेगा, ग्राम सड़क सहित कुल योजना खर्च का 40 फीसदी आवंटन निचले निकायों व स्वायत्त संस्थाओं को
(अंशुमान तिवारी) प्रदेश व जिलों में स्वायत्त संस्थाओं, सोसाइटी और स्वयंसेवी संस्थाओं को सीधा आवंटन सरकार के बजट का अंधा कोना बन गया है। इन संस्थाओं को खर्च के अधिकार तो मिल गए हैं, लेकिन हिसाब को लेकर अंधेरा है। आवंटन होने के बाद खर्च और इनके खातों में बचत को जांचने का कोई तंत्र नहीं है, क्योंकि इन्हें मिला पैसा सरकारी खातों के राडार से बाहर हो जाता है। मनरेगा, ग्रामीण पेयजल, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी हाई प्रोफाइल स्कीमों सहित केंद्र के योजना खर्च का करीब 40 फीसदी हिस्सा इसे 'अंधेरे' में डूबा है।
सरकारी स्कीमों पर अमल की प्रणाली पिछले दशक में आमूलचूल बदल गई है। केंद्र की बड़ी-बड़ी सामाजिक विकास स्कीमें कभी राज्य सरकारें लागू करती थीं, लेकिन अमल सुनिश्चित कराने के लिए केंद्र प्रदेशों में स्वायत्त संस्थाओं और स्वयंसेवी संगठनों को सीधे पैसा देता है। इन संस्थाओं को बजट से सीधे मिलने वाला धन बढ़ते-बढ़ते ताजे बजट में 1,07,551.53 करोड़ रुपये पर जा पहुंचा है। लेकिन आवंटन के बाद इस खर्च की गली बंद हो जाती है। इन के खर्च मामले में सीएजी के भी हाथ बंधे हैं, क्योंकि इन स्वायत्त संस्थाओं के संचालन सरकारी खातों का हिस्सा नहीं हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी इस मामले में सरकार से जवाब-तलब कर रहा है।
सीधे आवंटन की यह प्रणाली जबर्दस्त असंगति और अपारदर्शिता का शिकार हो गई है। स्थानीय संस्थाओं को वित्तीय ताकत देते हुए केंद्र यह सुनिश्चित नहीं कर पाया कि इनके खाते सरकार की निगाह में रहने चाहिए। सूत्रों के मुताबिक स्वायत्त संस्थाओं को दी गई राशि आवंटन के बाद सरकारी खातों से निकलकर इन संस्थाओं के अपने अकाउंट में चली जाती है। निश्चित तौर पर पूरा आवंटन उसी वर्ष खर्च नहीं होता और इनके खातों में पड़ा रहता है। जबकि सरकार का बजट उसे खर्च मान लेता है और अगले साल संस्थाओं को नया आवंटन हो जाता है।
इन संस्थाओं को दिया जाने वाला यह पैसा केंद्र प्रायोजित स्कीमों का है जो कि विभिन्न मंत्रालय चलाते हैं। करीब 40,000 करोड़ रुपये के बजट वाली मनरेगा पूरी तरह इन संस्थाओं के हवाले है। 9,000 करोड़ रुपये इंदिरा आवास योजना, इतनी ही राशि वाले ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम, 12,000 करोड़ की ग्राम सड़क योजनाओं का 90 फीसदी आवंटन सीधे निचली संस्थाओं को होता है। इसी तरह स्कूली शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि की कई स्कीमों में भी बड़ा हिस्सा अब इन्हीं संस्थाओं के जरिए खर्च होता है।
इस सीधे आवंटन की राशि वित्त वर्ष 2007-08 में करीब 51,000 करोड़ रुपये थी, जो कि वर्ष 08-09 में बढ़कर 83,000 करोड़ रुपये और 09-10 में 95,000 करोड़ रुपये हो गई है। निचली संस्थाओं को सीधे आवंटन की प्रणाली एक नए तरह की वित्तीय विसंगति की वजह बन रही है और खर्च के एक बहुत बडे़ हिस्से को स्थापित मानीटरिंग प्रक्रिया से बाहर निकाल रही है।
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बजट की षटपदी (एक) : कर कथा

यह अर्थार्थ स्‍तंभ का हिस्‍सा नहीं है लेकिन इसे एक तरह से अर्थार्थ भी माना जा सकता है। बजट के भीतर कर और खर्च के दो अलग-अलग दिलचस्‍प जगत हैं। बजट की इस अंतर्जगत की यात्रा पर दैनिक जागरण में दो चरणों मे प्रकाशित छह खबरों को लेकर कई स्‍नेही पाठकों काफी उत्‍सुकता दिखाई थी इसलिए लगा कि बजट की इस दिलचस्‍प दुनिया का ब्‍योरा सबसे बांट लिया जाए। सो बजट की यह षटपदी आप सबके सामने प्रस्‍तुत है। खुद ही देख लीजिये कि हमारी सरकारें कैसे कर लगाती है और कैसे खर्च करती हैं।

बेदर्द बजट -1

वही पीठ और वही चाबुक, बार-बार.. लगातार
· -आजमाई हुई सूइयां : दस साल में पांच सरचार्ज और पांच सेस
· उत्पाद शुल्क दरें यानी पहाड़ का मौसम
· -एफबीटी और मैट नए हथियार
(अंशुमान तिवारी) अगर दुनिया में टैक्स से बड़ी कोई सचाई नहीं है!! (बकौल चा‌र्ल्स डिकेंस) तो सच यह भी है कि भारत में न तो करों के चाबुक बदले हैं और न उन्हें सहने वाली पीठ। बदलते रहे हैं तो सिर्फ बजट व वित्त मंत्री। सरचार्ज और सेस वित्त मंत्रियों की पसंदीदा सूइयां हैं, जिन्हें पिछले दस बजटों में चार बार घोंपकर अर्थव्यवस्था से अचानक राजस्व निकाला गया है। पेट्रोल-डीजल से तीन बार नया सेस वसूला गया है। और उत्पाद शुल्क तो वित्त मंत्रियों के हाथ का खिलौना हैं। जिस वित्त मंत्री ने जब जैसे चाहा इन्हें निचोड़ लिया। पिछले एक दशक में सिर्फ मैट और एफबीटी करों के दो नए चाबुक थे, जिन्होंने बहुतों को लहूलुहान किया है।
बजट भाषणों में अक्सर होने वाली कर दरों की निरंतरता की वकालत अक्सर होती है, लेकिन पछले दस बजटों को एक साथ देखें तो समझ में आ जाता है कि कर ढांचे में और कुछ हो या न हो मगर निरंतरता तो कतई नहीं है। सिर्फ सरचार्ज और सेस ही नहीं, बल्कि लाभांश वितरण कर और मैट की दरें भी एक से अधिक बार बदली गई हैं।
उत्पाद शुल्क का खिलौना
बजट उत्पाद शुल्क के कारण इतने रोमांचक होते हैं। कोई नहीं जानता कि एक्साइज ड्यूटी में अगले साल क्या होने वाला है। सिर्फ वर्ष 1999 से लेकर 2003-04 तक उत्पाद शुल्क का ढांचा दो बार पूरी तरह उलट गया। तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा वर्ष 1999-2000 में उत्पाद शुल्क की तीन मूल्यानुसार दरों (8,16,24) से शुरू हुए। अगले साल तीनों का विलय कर 16 फीसदी की एक सेनवैट दर बन गई, लेकिन साथ ही विशेष उत्पाद शुल्क की तीन (8,16,24) दरें पैदा हो गई। अगले साल तीनों विशेष दरें भी 16 फीसदी की एक दर में समा गई। और जब राजग सरकार का आखिरी बजट आया तो तीनों पुरानी दरें एक बार फिर बहाल हो गई। इसे देखने के बाद भारत में निवेश करने वाला लंबी योजना बनाए भी तो कैसे?
सर पर चढ़ कर चार्ज
वह वित्त मंत्री ही क्या जो सरचार्ज न लगाए? पिछले दस साल में यह इंजेक्शन चार बार लगा है और खासी ताकत के साथ। राजग सरकार का पहला बजट व्यक्तिगत व कंपनी आयकर पर 10 फीसदी और सीमा शुल्क पर भी इतना ही सरचार्ज लेकर आया। अगले साल ऊंची आय वालों के लिए सरचार्ज को 15 फीसदी कर दिया गया। वर्ष 2001-02 में सरचार्ज वापस हो गया, लेकिन अगले ही साल राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता करते हुए बजट ने 5 फीसदी सरचार्ज की सूई फिर लगा दी गई। अपने अंतिम बजट में राजग सरकार ने आठ लाख से ऊपर की आय वालों पर 10 फीसदी का सरचार्ज लगाकर अपनी पारी पूरी की।
तेल का तेल
पेट्रोल-डीजल है तो राजस्व की क्या चिंता। पिछले दस सालों में वित्त मंत्रियों ने तीन बार पेट्रोल, डीजल आदि पर उपकर (सेस) लगाए हैं। यह जानते हुए भी कि इनकी बढ़ी कीमतें महंगाई बढ़ाती हैं। सिन्हा ने पहले बजट में डीजल पर एक रुपये प्रति लीटर का सेस लगाया था। दो साल बाद कच्चे तेल पर सेस बढ़ा और पेट्रोल पर भी सरचार्ज लग गया। वर्ष 2005-06 में चिदंबरम ने भी पेट्रोल-डीजल पर 50 पैसे प्रति लीटर का सेस लगाया था।
कर बिना लाभांश कैसा?
यह भी वित्त मंत्रियों का पसंदीदा कर रहा है। पिछले दस बजटों में चार बार इसका इस्तेमाल हुआ। एक बार सिन्हा ने इसे 10 से बढ़ाकर 20 फीसदी किया, मगर अगले ही साल घटाकर 10 फीसदी कर दिया तो चिदंबरम ने एक बार इसे 12.5 फीसदी किया और दूसरी बार 15 फीसदी कर दिया गया।
सिर्फ यही नहीं पिछले दस बजटों में दो बार शिक्षा उपकर लगा है। जबकि जीरो टैक्स कंपनियों पर मैट लगाकर और मैट बढ़ाकर वित्त मंत्रियों ने खजाने की सूरत संभाली है।
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बेदर्द बजट -2
किसी ने नहीं छोड़ा, मगर सिन्हा जी ने ज्यादा निचोड़ा
· -टैक्स के मामले में सिन्हा के चार बजट, चिदंबरम के पांच बजटों पर दोगुने भारी
· -पिछले दस बजटों में लगे कुल 50 हजार करोड़ रुपये के नए कर
(अंशुमान तिवारी) अगर टैक्स किसी सभ्य समाज का सदस्य होने की फीस (बकौल फ्रेंकलिन रूजवेल्ट) है तो अपनी पीठ ठोंकिए, क्योंकि पिछली दो सरकारों ने आपसे यह फीस बखूबी वसूली है। पिछले दस बजटों में लगे नए टैक्सों का गणित औसतन पांच हजार करोड़ रुपये प्रति वर्ष बैठता है। करीब एक दशक में दो अलग-अलग सरकारों के वित्त मंत्रियों ने नए टैक्स लगाकर या कर दरें बढ़ाकर हमारी आपकी जेब से करीब 50 हजार करोड़ रुपये निकाले हैं। बात अगर निकली है तो यह भी बताते चलें कि सबसे ज्यादा कर लगाने का तमगा राजग और उसके वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के नाम है। उनकी सरमायेदारी में आए बजटों में कर लगे नहीं, बल्कि बरसे हैं। नए करों के पैमाने पर यशवंत सिन्हा के चार बजट, पी. चिंदबरम के पांच बजटों पर दोगुना से ज्यादा भारी हैं।
टैक्स बजट का असली दर्द हैं। कम ज्यादा हो सकता है, लेकिन यह भेंट देने में कोई वित्त मंत्री नहीं चूकता। पिछले दस साल के बजटों का एक दिलचस्प हिसाब- किताब उस पुरानी यहूदी कहावत के माफिक है, कर बगैर बारिश के बढ़ते हैं। ध्यान रहे कि यह बात उन नए या अतिरिक्त करों की है, जो किसी बजट में पुराने करों के अलावा लगाए जाते हैं।
राजग सरकार के वित्त मंत्री के तौर पर यशवंत सिन्हा ने अपने चार बजटों में 33 हजार 400 करोड़ रुपये के नए टैक्स लगाए, जबकि चिदंबरम के खाते में पांच बजटों में 17 हजार करोड़ रुपये के टैक्स दर्ज हैं। यह आंकड़ा वित्त मंत्रियों के बजट भाषणों पर आधारित है, जिसमें वह बताते हैं कि उनके कर प्रस्तावों से कितनी अतिरिक्त राशि खजाने को मिलने जा रही है।
वर्ष 1999-2000 से लेकर 2003-04 अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार के पांच बजटों में चार यशवंत सिन्हा ने पेश किए थे, जबकि अगले पांच बजट संप्रग के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने। राजग के कार्यकाल का आखिरी बजट जसवंत सिंह लाए थे। राजग के सभी बजटों को यदि एक कतार में रखा जाए तो वह करीब 36 हजार 694 करोड़ रुपये के टैक्स की सरकार थी। राजग की सरकार ने तो चुनाव से पहले के आखिरी पूर्ण बजट यानी 2003-04 में भी 3 हजार 294 करोड़ रुपये के कर लगाए थे।
राजग के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा निर्विवाद रूप से कर लगाने की मुहिम में चैम्पियन हैं। बात वर्ष 2002-03 के बजट की है। यह पिछले एक दशक में सबसे अधिक टैक्स वाला बजट था। इसमें 12 हजार 700 करोड़ रुपये के कर लगाए गए। उनके चार बजटों में सबसे कम टैक्स वाला बजट 2001-02 का था, मगर उस बजट में भी 4 हजार 677 करोड़ रुपये का कर लगा था। खास बात यह है कि राजग सरकार के बजट में अप्रत्यक्ष व प्रत्यक्ष दोनों कर बढ़े थे। इसमें भी प्रत्यक्ष करों यानी आयकर का बोझ कुछ ज्यादा था।
चिदंबरम की बजट मशीन ने करदाताओं का तेल अपेक्षाकृत कुछ कम निकाला है, लेकिन बख्शा उन्होंने भी नहीं। उन्होंने वर्ष 2005-06 और 2006-07 में हर साल 6 हजार करोड़ रुपये के कर लगाए। चिदंबरम ने आखिरी बजट को करों के बोझ से मुक्त कर दिया था, अलबत्ता संप्रग की दूसरी पारी के पहले बजट में इस साल जुलाई में प्रणब दादा ने 2 हजार करोड़ रुपये के अतिक्ति टैक्स लगाने का इंतजाम किया था।
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यशवंत सिन्हा : 'बजट आर्थिक नीतियों व आय व्यय का सालाना दस्तावेज होता है, जो उस समय की परिस्थितियों को देखकर बनाया जाता है। .. हमारे बजटों को भारी कर वाले बजट कहना ठीक नहीं होगा। दरअसल उन पर टैक्स बढ़ा जो छूट ले रहे थे या कम दरों पर कर दे रहे थे। सबसे जरूरी है- बजट का संतुलन, जो हमने किया था। एक असंतुलित बजट का खामियाजा देश व लोगों को भुगतना पड़ता है।'
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बेदर्द बजट -2
टैक्स ने जितना काटा, उतना बढ़ा घाटा
-भारी टैक्स वाले बजटों को लगी करधारकों की बद्दुआ, कर बढ़े तो बढ़ा घाटा भी
-मगर जब अर्थव्यवस्था हुई खुशहाल तो खजाना भी मालामाल
(अंशुमान तिवारी) यह टैक्स के कोड़े खाने वालों की बद्दुआ है या फिर वित्त मंत्रियों की अंधी गणित, लेकिन करों की कैंची से बजटों का घाटा कम नहीं हुआ है। पिछले दस बजटों में अधिकांश बार ऐसा हुआ है कि जब-जब कर बढ़े हैं, घाटा भी बढ़ गया है। घाटा दरअसल तेज आर्थिक विकास दर के सहारे ही कम हुआ है यानी अगर अर्थव्यवस्था खुशहाल तो सरकार की तिजोरी भी मालामाल।
वित्त मंत्री नए कर सिर्फ इसलिए लगाते हैं ताकि घाटा कम हो सके। पिछले एक दशक के सभी बजट भाषण पढ़ जाइए, हर वित्त मंत्री ने नए कर लगाते हुए यही सफाई दी है कि इससे घाटा कम किया जाएगा, लेकिन अगर आंकड़ों के भीतर उतर कर देखा जाए तो तस्वीर कुछ जुदा ही दिखती है। जिस साल भी नए कर लगाकर घाटा कम करने की जुगत भिड़ाई गई है, उसी साल के संशोधित आंकड़ों में घाटा बजट अनुमानों को चिढ़ाता हुआ नजर आया है।
वर्ष 1999-2000 से 2003-04 तक के सभी बजट जबर्दस्त टैक्स के बजट थे, लेकिन अचरज होता है कि यही बजट भारी घाटे के भी थे। इन पांच बजटों में पहले चार में (जीडीपी के अनुपात) में राजकोषीय घाटा 5.1 फीसदी से 5.9 फीसदी तक रहा, जो कि कर लगाने वाले वित्त मंत्रियों के अपने बजट अनुमानों को सर के बल खड़ा कर रहा था। सिर्फ 2003-2004 के बजट में यह पांच फीसदी से मामूली नीचे आया। इधर बाद के पांच बजट अपेक्षाकृत सीमित टैक्स के थे और इस दौरान घाटा 3.1 से 4.5 फीसदी के बीच रहा। पिछले वित्त मंत्री चिदंबरम का गणित आखिरी साल बिगड़ा जब राजकोषीय घाटा अचानक छह फीसदी हो गया।
नए करों का बोझ और घाटे का रिश्ता पिछले कई बजटों की कलई खोल देता है। राजग के वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने वर्ष 2002-03 के बजट में 12 हजार 700 करोड़ रुपये के नए टैक्स लगाए थे, लेकिन उस बजट में राजकोषीय घाटा रहा 5.9 फीसदी पर। जबकि कर लगाते हुए सिन्हा ने 5.3 फीसदी का लक्ष्य तय किया था। इससे बुरा हाल हुआ वर्ष 1999-2000 के बजट का, जब भारी टैक्सों के बावजूद घाटा जीडीपी के अनुपात में चार फीसदी के मुकाबले 5.6 फीसदी रहा। सिर्फ जिस एक वर्ष (2003-04) में घाटा बजट अनुमान से नीचे रहा है, वह वर्ष 8.5 फीसदी की तेज आर्थिक विकास दर का था।
यहीं बजट का दूसरा दिलचस्प पहलू सामने आता है कि खजाने की हालत कर लगाने से नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था के बेहतर होने से सुधरी है। पिछले एक दशक के दूसरे पांच बजट इसकी नजीर हैं। इन पांचों बजटों में दिलचस्प यह है कि चिदंबरम ने लगातार दो साल (2005-06, 2006-07) में प्रति वर्ष 6 हजार करोड़ रुपये के अतिरिक्त कर लगाए, लेकिन दोनों वर्षो में राजकोषीय घाटा बजट अनुमान से नीचे रहा। यह दोनों वर्ष दरअसल पिछले एक दशक में सबसे तेज आर्थिक विकास दर यानी 9.5 और 9.7 फीसदी के थे।
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Monday, March 8, 2010

वाह! क्या गुस्सा है?

बजट को सुनकर या पेट्रो व खाद कीमतों में वृद्धि को देखकर आपको नहीं लगता कि सरकार कुछ झुंझलाहट या गुस्से में है। सब्सिडी उसे अचानक अखरने लगी है। महंगाई के बावजूद तेल की कीमतों को बेवजह सस्ता रखना उसे समझ में नहीं आता। मोटा आवंटन पचा कर जरा सा विकास उगलने वाली स्कीमों से उसे अब ऊब सी हो रही है। मानो सरकार अपने लोकलुभावन चेहरे को देखकर चिढ़ रही है। बजट और आर्थिक समीक्षा जैसे दस्तावेज एक उकताहट में तैयार किए गए महसूस होते हैं। यह जिद या ऊब उन नीतियों के खिलाफ है, जो बरसों बरस से सरकारों के कथित मानवीय चेहरे का श्रंगार रही हैं। इसी लोकलुभावन मेकअप का बजट इस बार निर्दयता से कटा है और इस कटौती या सख्ती के राजनीतिक नुकसान का खौफ नदारद है। इधर सालाना आर्थिक समीक्षा, सरकार में संसाधनों की बर्बादियों की अजब दास्तां सुनाती है और विकास के मौजूदा निष्कर्षो से शीर्षासन कराती है। लगता है कि जैसे कि सरकार अपने खर्च के लोकलुभावन वर्तमान से विरक्ति की मुद्रा में है। यह श्मशान वैराग्य है या फिर स्थायी विरक्ति? पता नहीं! ..मगर पूरा माहौल सुधारों के अनोखे एजेंडे की तरफ इशारा करता है। अनोखा इसलिए, क्योंकि सुधार हमेशा किसी नई शुरुआत के लिए ही नहीं होते। पुरानी गलतियों को ठीक करना भी तो सुधार है न?
विरक्ति के सूत्र
सालाना आर्थिक समीक्षा और बजट, सरकार के दो सबसे प्रतिनिधि दस्तावेज हैं। इन दोनों में ही लोकलुभावन नीतियों से विरक्ति के सूत्र बड़े मुखर हैं। अगर बारहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट को भी साथ में जोड़ लिया जाए तो एक त्रयी बनती है और तीनों मिलकर उन समीकरणों को स्पष्ट कर देते हैं, जिनके कारण सरकार को अपने लोकलुभावन मेकअप से चिढ़ हो गई। बड़ी-बड़ी स्कीमें और भीमकाय सब्सिडी !! इन्हीं दो प्रमुख प्रसाधनों ने हमेशा सरकारों के आर्थिक चेहरे का लोकलुभावन श्रंगार किया है और मजा देखिए कि वित्त आयोग व सर्वेक्षण ने इन्हीं दोनों के प्रति सरकार में विरक्ति भर दी है। नतीजे में पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा नए कर और खर्च में सबसे कम बढ़ोतरी वाला एक बेहद सख्त बजट सामने आया।
बोरियत वाला जादू
सरकार अपनी स्कीमों के जादू से ऊब सी गई लगती है। लाजिमी भी है। (बकौल सर्वेक्षण) पिछले छह साल में सरकार के कुल खर्च में सामाजिक सेवाओं का हिस्सा 10.46 से बढ़कर 19.46 फीसदी हो गया, लेकिन सामाजिक सेवाओं का चेहरा नहीं बदला। सरकार का अपना विशाल तंत्र ही सामाजिक सेवाओं की बदहाली का आइना लेकर सामने खड़ा है। दुनिया भर के मानव विकास सूचकांक मोटे अक्षरों में लिखते हैं कि भारत के लोग बुनियादी सुविधाओं में श्रीलंका व इंडोनेशिया से भी पीछे हैं। साक्षरता की दर अर्से से 60 फीसदी के आसपास टिकी है। 1000 में से 53 नवजात आज भी मर जाते हैं। 30 फीसदी आबादी को पीने का पानी मयस्सर नहीं। स्कूलों में दाखिले का संयुक्त अनुपात अभी भी 61 फीसदी है। सरकार को दिखता है कि शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास से लेकर कमजोर वर्गो तक स्कीमों से, पिछले छह दशकों में, कोई बड़ा जादू नहीं हुआ। अब इन स्कीमों में भ्रष्टाचार भी आधिकारिक व प्रामाणिक हो चुका है। यह सब देखकर स्कीमों के जादू से ऊब होना स्वाभाविक है। यह बजट इस बदले नजरिए का प्रमाण है। सरकार के चहेते मनरेगा परिवार से लेकर सभी बड़ी स्कीमों काबजट अभूतपूर्व ढंग से छोटा हो गया है।
नहीं सुहाती सब्सिडी
आसानी से भरोसा नहीं होता कि कांग्रेस सब्सिडी से चिढ़ जाएगी। सब्सिडी तो सरकार लोकलुभावन आर्थिक नीतियों का कंठहार है। जो केंद्र से लेकर राज्य तक फैला है और पिछले कुछ वर्षो में लगातार मोटा हुआ है, लेकिन अब सब्सिडी चुभने लगी है। 2002 के बाद पहली बार खाद की कीमत बढ़ी। आर्थिक सर्वेक्षण ने कहा कि सब्सिडी से न तो गरीबों का फायदा हुआ न खेती का और न खजाने का। वित्त आयोग ने तो हर साल सब्सिडी बिल में वृद्धि की सीमा तय कर दी। बात अब इतनी दूर तक चली गई है कि राशन प्रणाली को सीमित कर गरीबों को अनाज के कूपन देने के प्रस्ताव हैं। पेट्रो उत्पादों को सब्सिडी के सहारे सस्ता रखने पर सरकार तैयार नहीं है। सरकार के ये ज्ञान चक्षु सिर्फ खजाने की बीमारी देखकर ही नहीं खुले, बल्कि मोहभंग कहीं भीतर से है क्योंकि तेज विकास और भारी सरकारी खर्च के बाद भी गरीबी नहीं घटी। 37 फीसदी आबादी गरीबी की रेखा से नीचे है और सरकार के कुछ आकलन तो इसे 50 फीसदी तक बताते हैं। नक्सलवाद जैसी हिंसक और अराजक प्रतिक्रियाएं अब गरीबी उन्मूलन और विकास की स्कीमों की विफलता से जोड़ कर देखी जाने लगी हैं। आर्थिक सर्वेक्षण कहता है कि समावेशी विकास यानी इन्क्लूसिव ग्रोथ के लिए सबसे गरीब बीस फीसदी लोगों के जीवन स्तर में बेहतरी को मापना चाहिए। यह पैमाना अपनाने पर सरकार को सब्सिडी के नुस्खे का बोदापन नजर आ जाता है। इसलिए लोकलुभावन नीतियों की नायक सब्सिडी अचानक सबसे बड़ी खलनायक हो गई है। खाद और पेट्रो उत्पादों की सब्सिडी पर कतरनी चली है, राशन पर चलने वाली है।
..ढेर सारे किंतु परंतु
यह ऊब उपयोगी, तर्कसंगत और सार्थक है। लेकिन इसके टिकाऊ होने पर यकायक भरोसा नहीं होता। पिछले दशकों में एक से अधिक बार सरकार में सब्सिडी व बेकार के खर्च से विरक्ति जागी है, लेकिन स्कीमों का जादू फिर लौट आया और भारी सब्सिडी से बजटों का श्रंगार होने लगा। पांचवे वेतन आयोग को लागू किए जाने के बाद खर्च पर तलवार चली थी, लेकिन बाद के बजटों में खर्च ने रिकार्ड बनाया। आर्थिक तर्क पीछे चले गए और बजट राजनीतिक फायदे के लिए बने। इसीलिए ही तो सब्सिडी पर लंबी बहसों व अध्ययनों के बाद भी सब कुछ जहां का तहां रहा है। लेकिन इस अतीत के बावजूद यह मुहिम अपने पूर्ववर्तियों से कुछ फर्क है क्योंकि यह खर्च, सब्सिडी और लोकलुभावन स्कीमों को सिर्फ बजट के चश्मे से नहीं, बल्कि समावेशी विकास और सेवाओं की डिलीवरी के चश्मे से भी देखती है, जो एक बदलना हुआ नजरिया है।
सरकार अर्थव्यवस्था से खुश है पर अपने हाल से चिढ़ी हुई है। इसलिए यह बजट अर्थव्यवस्था में सुधार की नहीं, बल्कि सरकार की अपनी व्यवस्था में सुधार की बात करता है। बस मुश्किल सिर्फ इतनी है कि सरकार ने अपने इलाज का बिल, लोगों को भारी महंगाई के बीच थमा दिया। कहना मुश्किल है कि यह बदला हुआ नजरिया सिर्फ कुछ महीनों का वैराग्य है या यह परिवर्तन की सुविचारित तैयारी है। गलतियां सुधारने की मुहिम यदि गंभीर है तो इसका बिल चुकाने में कम कष्ट होगा, लेकिन अगर सरकार स्कीमों व सब्सिडी के खोल में वापस घुस गई तो? .. तो हम मान लेंगे एक बार फिर ठगे गए। फिलहाल तो सरकार की यह झुंझलाहट, ऊब और बेखुदी काबिले गौर है, क्योंकि इससे कुछ न कुछ तो निकलेगा ही..
बेखुदी बेसबब नहीं गालिब, कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है।
http://jagranjunction.com/ (बिजनेस कोच)

Thursday, March 4, 2010

बुरा न मानो बजट है!!

कंपकंपा दिया वित्त मंत्री ने... पता नहीं किस फ्रिज में घोल कर रखा बजट का यह रंग जो पड़ते ही छील गया। दादा की बजट होली झटका जरूर देगी यह तो पता था, लेकिन उनके गुलाल में इतने कांटे होंगे इसका अंदाज नहीं था। तेल वालों से लेकर बाजार वाले तक सब कीमतें बढ़ाने दौड़ पड़े। महंगाई के मौसम और मंदी की कमजोरी के बीच दादा ने अपने खजाने की सेहत सुधारने का बोझ भी हम पर ही रख दिया। उपभोक्ता, उद्योग और आर्थिक विश्लेषक व निवेशक। हर बजट के यही तीन बड़े ग्राहक होते हैं। उपभोक्ता और उद्योग बजट का तात्कालिक असर देखते हैं, क्योंकि यह उनके जीवन या कारोबार पर असर डालता है, जबकि विश्लेषक और निवेशक इसकी बारीकी पढ़ते हैं और भविष्य की गणित लगाते हैं। तीनों के लिए यह बजट दिलचस्प ढंग से रहस्यमय है। महंगाई से बीमार उपभोक्ताओं को इस बजट में नए करों का ठंडा निर्मम रंग डरा रहा है, जबकि उद्योगों को इस बजट में रखे गए विकास के ऊंचे लक्ष्यों पर भरोसा नहीं (चालू साल की तीसरी तिमाही में विकास दर लुढ़क गई है) हो पा रहा है। लेकिन विश्लेषकों और निवेशकों को इसमें राजकोषीय सुधार का एक नक्शा नजर आ रहा है। पर इन सुधारों को लेकर सरकारों का रिकार्ड जरा ऐसा वैसा ही है। यानी कि सबकी मुद्रा, पता नहीं या वक्त बताएगा.. वाली है।
पक्का रंग महंगाई का
यह बजट के पहले ग्राहक की बात है अर्थात उपभोक्ता की। महंगाई के रंग पर बजट वह रसायन डाल रहा है, जिससे खतरा महंगाई के पक्के होने का है। इस बजट में कई ऐसे काम हुए हैं जो प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर महंगाई में ईधन बनेंगे। उत्पाद शुल्क की बढ़ोतरी को सिर्फ दो फीसदी मत मानिए। कंपनियां इसमें अपना मार्जिन जोड़ कर इसे उपभोक्ताओं को सौंपेंगी। इसके बाद फिर इसमें पेट्रो उत्पादों की मूल्य वृद्घि से बढ़ी हुई लागत मिल जाएगी। ब्याज दर में बढ़ोतरी की लागत और बुनियादी ढांचे से जुड़ी सेवाओं की महंगाई भी इसमें शामिल होगी। सिर्फ इतना ही नहीं तमाम तरह की नई सेवाएं जिन पर कर लगा है या कर का दायरा बढ़ा है, उनका असर भी कीमतों पर नजर आएगा। सरकार के भीतरी आंकड़े रबी की फसल से बहुत उम्मीद नहीं जगाते और अगर बजट उसी सख्त रास्ते पर चला जो प्रणब दा ने बनाया है तो साल के बीच में कुछ और सरकारी सेवाएं महंगी हो सकती हैं। ध्यान रखिए यह सब उस 18 फीसदी की महंगाई के ऊपर होगा जो कि पहले मौजूद है। देश के करोड़ों उपभोक्ताओं में आयकर रियायत पाने वाले भाग्यशाली वेतनभोगी बहुत कम हैं और उनमें औसत को होने वाला फायदा 1000 से 1500 रुपये प्रति माह का है। महंगाई का पक्का रंग इस रियायत की रगड़ से नहीं धुलेगा। ..महंगाई से ज्यादा खतरनाक होता है महंगाई बढ़ने का माहौल। क्योंकि ज्यादातर महंगाई माहौल बनने से बढ़ती है। उपभोक्ताओं के मामले में यह बजट महंगाई की अंतरधारणा को तोड़ नहीं पाया है।
तरक्की का त्योहार
बजट के दूसरे ग्राहक यानी उद्योग, दादा के रंग से बाल-बाल बच गए यानी उन पर कुछ ही छींटे आए हैं। दादा उतने सख्त नहीं दिखे जितनी उम्मीद थी। मगर उद्योग इससे बहुत खुश नहीं हो सकते क्योंकि बजट तेज विकास से रिश्ता बनाता नहीं दिखता। महंगाई के कारण मांग घटने का खतरा पहले से है। ऊपर से सरकार के खर्च में जबर्दस्त कटौती बड़ी परियोजनाओं के लिए मांग घटाएगी। दिलचस्प है कि जब वित्त मंत्री बजट भाषण पढ़ रहे थे, ठीक उसी समय इस वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में आर्थिक विकास दर के आंकड़े सरकार की फाइलों से निकल रहे थे। तीसरी तिमाही में जीडीपी की दर घटकर छह फीसदी रह गई है। यानी कि अब अगर सरकार को मौजूदा वित्त वर्ष में 7.2 फीसदी की विकास दर फीसदी का लक्ष्य हासिल करना है तो फिर साल की चौथी तिमाही 8.8 फीसदी की विकास दर वाली होनी चाहिए। यह कुछ मुश्किल दिखता है। अर्थात बजट और तरक्की की गणित गड़बड़ा गई है। उद्योगों का पूरा ताम झाम सिर्फ इस उम्मीद पर कायम है कि अगर अर्थव्यवस्था तेज गति से दौड़ी तो उन्हें खड़े होने का मौका मिल जाएगा। वरना तो फिलहाल मांग, बाजार और माहौल तेज विकास के बहुत माफिक नहीं है। ध्यान रहे जीडीपी के अनुपात में प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च पिछले एक साल में 5.4 से घटकर 2.7 फीसदी रह गया है, जबकि निजी निवेश पिछले दो साल में 16.1 से घटकर 12.7 फीसदी पर आ गया है। इसमें से एक मांग और दूसरा निवेश का पैमाना है। क्या बजट से मांग और निवेश के उत्साह को मजबूती मिलेगी यानी कि नौ फीसदी की तरक्की का त्योहार जल्द मनाया जाएगा? फिलहाल इसका जवाब नहीं है।
उड़ न जाए रंग?
खर्चे में कटौती और सख्त राजकोषीय सुधार इस बजट का सबसे साफ दिखने वाला रंग है। उम्मीद कम थी कि वित्त मंत्री इतनी हिम्मत दिखाएंगे, लेकिन वित्त आयोग की कैंची के सहारे खर्चो को छोटा कर दिया गया। दरअसल यह इसलिए भी हुआ क्योंकि नए वित्त वर्ष से केंद्रीय करों में राज्यों को ज्यादा हिस्सा मिलेगा और इससे केंद्र के खजाने का खेल बिगड़ेगा। लेकिन राजकोषीय सुधारों का अतीत भरोसेमंद नहीं है। बजट आकलन और संशोधित अनुमानों में बहुत फर्क होता है। जब-जब करों से लैस सख्त बजट आए हैं, घाटे ने कम होने में और नखरे दिखाए हैं। दादा के इस दावे पर भरोसा मुश्किल है कि अगले साल सरकार का गैर योजना खर्च केवल चार फीसदी बढ़ेगा जो कि इस साल 16 फीसदी बढ़ा है। वित्त मंत्री सरकार के राजस्व में 15 फीसदी की बढ़ोतरी आंकते हैं जो इस साल केवल 5 फीसदी रही है। खर्च में कम और कमाई में ज्यादा वृद्घि??? भारतीय बजटों को यह गणित कभी रास नहीं आई है। साल के बीच में खर्च बढ़ता है और सारा सुधार हवा हो जाता है। इसलिए घाटे को एक फीसदी से ज्यादा घटाने और कर्ज में बढ़ोतरी रोकने पर तत्काल कोई निष्कर्ष उचित नहीं है। सुधारों के इस रंग का पक्कापन तो वक्त के साथ ही पता चलेगा।
इस बजट के तीन अलग-अलग रंग हैं और तीनों गड्डमड्ड भी हो गए हैं। महंगाई-मांग या खर्च-कमाई, निवेश-विकास या घाटा-सुधार .. एक सूत्र तलाशना मुश्किल है। दरअसल यह कई रंगों से सराबोर पूरी तरह होलियाना बजट है। होली खत्म होने और नहाने धोने के बाद पता चलता है कि कौन सा रंग कितना पक्का था? हम तो चाहेंगे इसका महंगाई वाला रंग जल्दी से जल्दी उतर जाए, जबकि विकास व सुधार वाला रंग और पक्का हो जाए? मगर हमारे आपके चाहने से क्या होता है.. वक्त के पानी में धुलने के बाद ही पता चलेगा है कि कौन सा रंग बचा और कौन सा उड़ गया? अगर अच्छा रंग बचे तो किस्मत और महंगाई बचे तो भी किस्मत। बजट और होली में सब जायज है। ..बुरा न मानो बजट है।
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अन्‍यर्थ के लिए
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Tuesday, February 23, 2010

बीस साल बाद ..!

यहां अब भी बहुत कुछ ऐसा घटता रहता है जो अबूझ, अजब और (आर्थिक) तर्को से परे है। अर्थव्यवस्था की इस इमारत से लाइसेंस परमिट राज का ताला खुले बीस साल बीत चुके हैं। कुछ हिस्सों में उदारीकरण की झक साफ रोशनी भी फैली है, मगर कई अंधेरे कोनों का रहस्य, बीस साल बाद भी खत्म नहीं हुआ है। कोई समझ नहीं पाता आखिर खेतों से हर दूसरे तीसरे साल बुरी खबर ही क्यों आती है। सब्सिडी के जाले साल दर साल घने ही क्यों होते जाते हैं। बढ़ते खर्च का खौफ बीस साल बाद भी वैसे का वैसा है और पेट्रो उत्पादों की कीमतों व बिजली दरों का पूरा तंत्र इतना रहस्यमय क्यों है। दरअसल खेती का हाल, बजट का खर्च और ऊर्जा की नीतियां पिछले बीस साल के सबसे जटिल रहस्य हैं। नए दशक के पहले बजट में इन पुरानी समस्याओं के समाधान की अपेक्षा लाजिमी है। देश यह जरूर जानना चाहेगा कि इन अंधेरों का क्या इलाज है और उत्सुकता यह भी रहेगी कि उदारीकरण की तमाम दुहाई के बावजूद बहुत जरूरी मौकों पर आखिर आर्थिक तर्को की रोशनी यकायक गुल क्यों हो जाती है।
खेती का अपशकुन
खेती पर अपशकुनों का साया बीस साल बाद भी, पहले जितना ही गहरा है। हर दूसरे तीसरे साल खेती में पैदावार गिरने की चीख पुकार उभरती है और महंगाई मंडराने लगती है। बीस साल में खेती के लिए चार कदम (चार फीसदी की वृद्धि दर) चलना भी मुश्किल हो गया है। खेती का अपशकुन कई रहस्यों से जन्मा है। कोई नहीं जानता कि आखिर हर बजट नेता नामधन्य ग्रामीण रोजगार व विकास की स्कीमों को जितना पैसा देते हैं, उसका आधा भी खेती को क्यों नहीं मिलता? हाल के कुछ बजटों में गांव के विकास को मिली बजटीय खुराक, खेती को बजट में हुए आवंटन के मुकाबले सात गुनी तक थी। 1999-2000 के बजट ने ग्रामीण रोजगार व गरीबी उन्मूलन को 8,182 करोड़ रुपये दिए तो खेती व सिंचाई को करीब 4,200 करोड़। लेकिन मार्च में पुराने हो रहे बजट में ग्रामीण विकास को मिलने वाली रकम 72,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गई और खेती को मिले केवल 11,000 करोड़। भारत की आर्थिक इमारत में यह सवाल हमेशा तैरता है कि आखिर खेतों से दूर सरकार कौन से गांव विकसित कर रही है और खेती के बिना किन गरीबों को रोजगार दे रही है। वैसे इस इमारत के खेती वाले हिस्से में और भी रहस्यमय दरवाजे हैं। दस साल में खेती को उर्वरक के नाम पर करीब 2,71,736 करोड़ रुपये की सब्सिडी पिलाई जा चुकी है। यानी खेती के पूरे तंत्र के एक अदना से हिस्से के लिए हर साल करीब 27,000 करोड़ रुपये की रकम। मगर पूरी खेती के लिए इसका आधा भी नहीं। सिंचाई, बीजों, शोध, बाजार, बुनियादी ढांचे के लिए चीखती खेती में पिछले बीस साल के दौरान विकास दर करीब छह बार शून्य या शून्य से नीचे गई है, लेकिन सरकार उसे सस्ती खाद चटाती रही है। ..उदारीकरण की रोशनी में खेती और अंधेरी हो गई है।
खर्च का खौफ
यह रास्ता बीस साल पुराना है, मगर उतना ही अबूझ और अनजाना है। क्या आपको याद है कि कांग्रेस ने 1991 में अपने चुनाव घोषणापत्र में बजट के गैर योजना खर्च को दस फीसदी घटाने का वादा किया था ???? बाद में सुधारों वाले एतिहासिक बजट भाषण में मनमोहन सिंह ने यह वादा दोहराया था। तब से आज तक खर्च घटाने की कोशिश करते कई सरकारें, समितियां और रिपोर्टे (खर्च घटाने की रंगराजन समिति की ताजी सिफारिश तक) खर्च हो चुकी हैं। मगर हर वित्त मंत्री खर्च के दरवाजे में झांकने से डरता रहा है, तभी तो पिछले दस साल में केवल राशन, खाद और पेट्रोलियम पर बजट से करीब 5,80,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी बांटी जा चुकी है। इसमें करीब 2.79 लाख करोड़ की सब्सिडी उस राशन प्रणाली पर दी गई, जिसे बीस साल में दो बार बदला गया और फिर भी उसे प्रधानमंत्री ने हाल में निराशाजनक व असफल कहा है। खाद सब्सिडी से उबरने की ताजी जद्दोजहद का भविष्य अभी अंधेरे में है। 91-92 के सुधार बजट में मनमोहन सिंह ने खाद की कीमत बढ़ाते हुए सब्सिडी व खर्च कम करने की बहस शुरू की थी। सरकारी रिपोर्टो और चर्चाओं से गुजरती हुई यह बहस छोटी होती गई और सब्सिडी बड़ी। राजकोषीय घाटा पिछले एक दशक में 5.6 फीसदी से शुरू होकर वापस सात फीसदी (चालू वर्ष में अनुमानित) पर आ गया है और बीस साल बाद भी खर्च का खौफ वित्त मंत्रियों की धड़कन बढ़ा रहा है। ..खर्च के जाले और सब्सिडी के झाड़ झंखाड़ बजट की शोभा बन चुके हैं
ऊर्जा का सस्पेंस
आर्थिक इमारत का यह हिस्सा सबसे खतरनाक और अंधेरा है। यहां से आवाजें भी नहीं आतीं और बहुत कुछ बदल जाता है। बीस साल बीत गए, मगर देश को ऊर्जा नीति की ऊहापोह से छुटकारा नहीं मिला। इस सवाल का जवाब इस इमारत में किसी के पास नहीं है कि तेल मूल्यों को बाजार आधारित करने का कौल कई-कई बार उठाने के बाद भी तेल की कीमतें राजनीति के अंधेरे में ही क्यों तय होती हैं? कमेटी और फार्मूले सब कुछ सियासत के दरवाजे के बाहर ही पड़े रह जाते हैं। यहां सस्पेंस दरअसल तेल नहीं, बल्कि ऊर्जा देने वाली दूसरी चीजों को लेकर भी है। कहीं कोई राज्य कभी बिजली की दर बढ़ा देता है तो कभी कोई मुफ्त बिजली देकर सांता क्लाज हो जाता है। बिजली कीमतें तय करने के लिए उत्पादन लागत नहीं, बल्कि वोटों की लागत का हिसाब लगता है। इसलिए वाहनों के वास्ते सस्ते किए गए डीजल से उद्योगों की मशीने दौड़ती हैं और शापिंग माल चमकते हैं। बिजली उत्पादन का लक्ष्य पंचवर्षीय योजनाओं का सबसे बड़ा मजाक बन गया है। बीस साल बाद अब बिजली क्षेत्र के सुधार आर्थिक चर्चाओं के फैशन से बाहर हैं। .. ऊर्जा नीति का अंधेरा पिछले बीस साल की सबसे रहस्यमय शर्मिदगी है।
उदारीकरण के बीस वर्षो में बहुत कुछ बदला है। बेसिक फोन के कनेक्शन के लिए जुगाड़ लगाने वाले लोग अब मोबाइल फोन से चिढ़ने लगे हैं। स्कूटरों की वेटिंग लिस्ट देखने वाला देश कारों की भीड़ से बेचैन है। बैंक खुद चलकर दरवाजे तक आते हैं और टीवी व फ्रिज कुछ वर्षो में रिटायर हो जाते हैं। नया बजट उदारीकरण के तीसरे दशक का पहला बजट है। इसलिए ... वित्त मंत्री जी .. यह सवाल तो बनता है कि जब कई क्षेत्रों में उजाला हुआ है तो बीस साल बाद भी खेती, खर्च और ऊर्जा जैसे कोने अंधेरे और रहस्यमय क्यों हैं? यह साजिशन है या गैर इरादतन? .. चली तो ठीक थी किरन, मगर कहीं भटक गई, वो मंजिलों के आसपास ही कहीं अटक गई, यह किसका इंतजाम है? कोई हमें जवाब दे? ... विश यू ए हैप्पी बजट!!!!
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Wednesday, February 17, 2010

बजट में जादू है !!

बगैर तली वाले बर्तन में पानी भरने का अपना ही रोमांच है..जादू जैसा? बर्तन में पानी जाता हुआ तो दिखता है मगर अचानक गायब। वित्त मंत्री हर बजट में यह जादू करते हैं। हर बजट में खर्च के कुछ बड़े आंकड़े वित्त मंत्रियों के मुंह से झरते हैं और फिर मेजों की थपथपाहट के बीच लोकसभा की वर्तुलाकार दीवारों में खो जाते हैं। पलट कर कौन पूछता है कि आखिर खर्च की इन चलनियों में कब कितना दूध भरा गया, वह दूध कहां गया और उसे लगातार भरते रहने का क्या तुक था? वित्त मंत्री ने पिछले साल दस लाख करोड़ रुपये का जादू दिखाया था और खर्च के तमाम अंध कूपों में अरबों रुपये डाल दिए थे। इस साल उनका जादू बारह लाख करोड़ रुपये का हो सकता है या शायद और ज्यादा का?
तिलिस्मी सुरंग में अंधे कुएं
खर्च बजट की तिलिस्मी सुरंग है। कोई वित्त मंत्री इसमें आगे नहीं जाता। खो जाने का पूरा खतरा है। खर्च का खेल सिर्फ बड़े आंकड़ों को कायदे से कहने का खेल है। पिछले दस साल में सरकार का खर्च पांच गुना बढ़ा है। 1999-2000 में यह 2 लाख 68 हजार करोड़ रुपये पर था मगर बीते बजट में यह दस लाख करोड़ रुपये हो गया। कभी आपको यह पता चला कि आखिर सरकार ने इतना खर्च कहां किया? बताते तो यह हैं कि पिछले एक दशक के दौरान सरकार अपनी कई बड़ी जिम्मेदारियां निजी क्षेत्र को सौंप कर उदारीकरण के कुंभ में नहा रही है। दरअसल खर्च में पांच गुना वृद्घि को जायज ठहराने के लिए सरकार के पास बहुत तर्क नहीं हैं। यह खर्च कुछ ऐसे अंधे कुओं में जा रहा है, जो गलतियों के कारण खोद दिए गए मगर अब उनमें यह दान डालना अनिवार्य हो गया है। दस साल पहले केंद्र सरकार 88 हजार करोड़ रुपये का ब्याज दे रही थी मगर आज ब्याज भुगतान 2 लाख 25 हजार करोड़ रुपये का है। यानी कि दस लाख करोड़ के खर्च का करीब 22 फीसदी हिस्सा छू मंतर। दूसरा ग्राहक सब्सिडी है। दस साल पहले सब्सिडी थी 22 हजार करोड़ रुपये की और आज है एक लाख 11 हजार करोड़ रुपये की। यानी बजट का करीब 11 फीसदी हिस्सा गायब। ब्याज और सब्सिडी मिलकर सरकार के उदार खर्च का 30-31 फीसदी हिस्सा पी जाते हैं। मगर जादू सिर्फ यही नहंी है और भी कुछ ऐसे तवे हैं जिन पर खर्च का पानी पड़ते ही गायब हो जाता है। तभी तो कुल बजट में करीब सात लाख करोड़ रुपये का खर्च वह है जिसके बारे में खुद सरकार यह मानती है कि इससे अर्थव्यवस्था की सेहत नहीं ठीक होती मगर फिर भी यह रकम अप्रैल से लेकर मार्च तक खर्च की तिलिस्मी सुरंग में गुम हो जाती है। सरकार के मुताबिक उसके बजट का महज 30 से 32 फीसदी हिस्सा ऐसा है जो विकास के काम का है। आइये अब जरा इस काम वाले खर्च की स्थिति देखें।
चलनियों का चक्कर
देश मे करीब 35 करोड़ ग्रामीण गरीबी की रेखा से नीचे हैं। एक दशक पहले भी इतने ही लोग गरीब थे। (जनसंख्या के अनुपात में कमी के आंकड़े से धोखा न खाइये, गरीबों की वास्तविक संख्या हर पैमाने पर बढ़ी है।) अभी भी दो लाख बस्तियों में कायदे का पेयजल नहीं है। इसे आप पुराना स्यापा मत समझिये, बल्कि यह देखिये कि सरकार ने पिछले एक दशक में सिर्फ गांव में गरीबी मिटाने की स्कीमों पर 78 हजार करोड़ रुपये खर्च किये हैं और गांवों को पीने का पानी देने की योजनाओं पर कुल 36 हजार करोड़। यानी दोनों पर करीब 11 हजार करोड़ रुपये हर साल। ... दरअसल यह कुछ नमूने हैं उन चलनियों के, जिनमें सरकार अपने योजना बजट का दूध भरती है। इन पर गांधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव जैसे बड़े नाम चिपके हैं, इसलिए सिर्फ नाम दिखते हैं काम नहीं। पिछले एक दशक में गरीबी उन्मूलन की स्कीमों में खर्च को लेकर जितने सवाल उठे हैं, उनमें आवंटन उतना ही बढ़ गया है। स्कीमों का नरेगा मनरेगा परिवार इस समय सरकार के स्कीम बजट का सरदार है। वैसे चाहे वह पढ़ाने लिखाने वाली स्कीमों का कुनबा हो या सेहतमंद बनाने वाली स्कीमों का, यह देखने की सुध किसे है कि 200 के करीब सरकारी स्कीमों की चलनियों में जाने वाला दूध नीचे कौन समेट रहा है? सीएजी से लेकर खुद केंद्रीय मंत्रालयों तक को इनकी सफलता पर शक है। लेकिन हर बजट में वित्त मंत्री इन्हें पैसा देते हैं तालियां बटोरते हैं। बेहद महंगे पैसे के आपराधिक अपव्यय से भरपूर यह स्कीमें सरकारी भ्रष्टाचार का जीवंत इतिहास बन चुकी हैं मगर यही तो इस बजट का रोमांच है।
थैले की करामात
बजट का अर्थ ही है थैला। मगर असल में यह कर्ज का थैला है। सरकार देश में कर्जो की सबसे बड़ी ग्राहक है और सबसे बड़ी कर्जदार भी। वह तो सरकार है इसलिए उसे कर्ज मिलता है नहीं तो शायद इतनी खराब साख के बाद किसी आम आदमी को तो बैंक अपनी सीढि़यां भी न चढ़ने दें। बजट के थैले से स्कीमें निकलती दिखतीं हैं, खर्च के आंकड़े हवा में उड़ते हैं मगर थैले में एक दूसरे छेद से कर्ज घुसता है। इस थैले की करामात यही है कि सरकार हमसे ही कर्ज लेकर हमें ही बहादुरी दिखाती है। सरकार के पास दर्जनों क्रेडिट कार्ड हैं यह बांड, वह ट्रेजरी बिल, यह बचत स्कीम, वह निवेश योजना। पैसा बैंक देते हैं क्योंकि हमसे जमा किये गए पैसे का और वे करें भी क्या? मगर इस थैले का खेल अब बिगड़ गया है। सरकार का कर्ज कुल आर्थिक उत्पादन यानी जीडीपी का आधा हो गया है। अगले साल से सरकार के दरवाजे पर बैंकों के भारी तकाजे आने वाले हैं। यह उन कर्जो के लिए होंगे जो पिछले एक दशक में उठाये गए थे। ऐसी स्थिति में हर वित्त मंत्री अपना सबसे बड़ा मंत्र चलाता है। वह है नोट छापने की मशीन जो रुपये छाप कर घाटा पूरा करने लगती है। कुछ वर्ष पहले तक यह खूब होता रहा है। हमें तो बस यह देखना है कि इस बजट में यह मंतर आजमाया जाएगा या नहीं?
सरकार के खर्च में वृद्घि से ईष्र्या होती है। काश देश के अधिकांश लोगों की आय भी इसी तरह बढ़ती, सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता भी इसी तर्ज पर बढ़ जाती। बुनियादी सुविधायें भी इतनी नहंी तो कम से कम थोड़ी भी बढ़ जातीं, तो मजा आ जाता। लेकिन वहां सब कुछ पहले जैसा है या बेहतरी नगण्य है। इधर बजट में खर्च फूल कर गुब्बारा होता जा रहा है और सरकार का कर्ज बैंकों की जान सुखा रहा है लेकिन इन चिंताओं से फायदा भी क्या है? बजट तो खाली खजाने से खरबों के खर्च का जादू है और जादू में सवालों की जगह कहां होती है? वहां तो सिर्फ तालियों सीटियों की दरकार होती है, इसलिए बजट देखिये या सुनिये मगर गालिब की इस सलाह के साथ कि .. हां, खाइयो मत, फरेब -ए- हस्ती / हरचंद कहें, कि है, नहीं है।
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अन्‍यर्थ के लिए
http://jagranjunction.com/ (बिजनेस कोच)

Monday, February 8, 2010

बजट की बर्छियां

मंदी के जख्म भरने लगे हैं न? तो आइए कुछ नई चोट खाने की तैयारी करें। बजट तो यूं भी स्पंज में छिपी पिनों की तरह होते हैं, ऊपर से गुदगुदे व मुलायम और भीतर से नुकीले, छेद देने वाले। मगर इस बजट के मुलायम स्पंज में तो नश्तर छिपे हो सकते हैं। पिछले एक माह के भीतर बजट की तैयारियों के तेवर चौंकाने वाले ढंग से बदल गए हैं। बात तो यहां से शुरू हुई थी कि मंदी से मुकाबले का साहस दिखाने वाली अर्थव्यवस्था की पीठ पर शाबासी की थपकियां दी जाएंगी, पर अब तो कुछ डरावना होता दिख रहा है। मौका भी है दस्तूर भी और तर्क भी। पांच साल तक राज करने के जनादेश को माथे पर चिपकाए वित्त मंत्री को फिलहाल किसी राजनीतिक नुकसान की फिक्र नहीं करनी है। दूसरी तरफ घाटे के घातक आंकड़े उन्हें सख्त होने का आधार दे रहे हैं। यानी कि इशारे अच्छे नहीं हैं। ऐसा लगता है मानो वित्त मंत्री बर्छियों पर धार रख रहे हैं। दस के बरस का बजट करों के नए बोझ वाला, तेल की जलन वाला और महंगाई के नए नाखूनों वाला बजट हो सकता है यानी कि ऊह, आह, आउच! !.. वाला बजट।
करों की कटार
कमजोर याददाश्त जरूरी है, नहीं तो बहुत मुश्किल हो सकती है। जरा याद तो करिए कि कौन सा बजट करों की कील चुभाए बिना गुजरा है? बजट हमेशा नए करों की कटारों से भरे रहे हैं। यह बात अलग है कि वित्त मंत्रियों ने कभी उन्हें दिखाकर चुभाया है तो कभी छिपाकर। यकीन नहीं होता तो यह आंकड़ा देखिए इस दशक के पहले बजट यानी 1999-2000 के बजट से लेकर दशक 2009-10 तक के बजट तक कुल 55,694 करोड़ रुपये के नए कर लगाए गए हैं। यहां तक कि चुनाव के वर्षो में भी करों में ऐसे बदलाव किए गए हैं जो बाद में चुभे हैं। पिछले दस सालों का हर बजट (08-09 के बजट को छोड़कर) कम से कम 2,000 करोड़ रुपये और अधिकतम 12,000 करोड़ रुपये तक का कर लगाता रहा है। इस तथ्य के बाद सपनीले बनाम डरावने बजटों की बहस बेमानी हो जाती है। इन करों के तुक पर तर्क वितर्क हो सकता है, लेकिन करों की कटार बजट की म्यान में हमेशा छिपी रही है। जो कंपनियों से लेकर कंज्यूमर तक और उद्योगपतियों से लेकर आम करदाताओं तक को काटती रही है। यह बजट कुछ ज्यादा ही पैनी कटार लेकर आ सकता है। बजट को करीब से देख रहे लोग बीते साल से सूंघ रहे थे कि दस का बजट सताने वाला होगा, ताजी सूचनाओं के बाद ये आशंकाएं मजबूत हो चली हैं। वित्त मंत्री को न तो दूरसंचार कंपनियों से राजस्व मिला और न सरकारी कंपनियों में सरकार का हिस्सा बेचकर। घाटा ऐतिहासिक शिखर पर पहुंचने वाला है। दादा कितने उदार कांग्रेसी क्यों न हों, लेकिन आखिर राजकोषीय जिम्मेदारी भी तो कोई चीज है? आने वाले बजट में वह इस जिम्मेदारी को हमारे साथ कायदे से बांट सकते हैं। आने वाला बजट न केवल मंदी के दौरान दी गई कर रियायतें वापस लेगा यानी कि करों का बोझ बढ़ाएगा, बल्कि नए करों के सहारे खजाने की सूरत ठीक करने की जुगत भी तलाशेगा। ऐसी स्थितियों में वित्त मंत्रियों ने अक्सर सरचार्ज, सेस और अतिरिक्त उत्पाद शुल्क या अतिरिक्त सीमा शुल्क की अदृश्य कटारें चलाई हैं और काफी खून बहाया है। संभल कर रहिएगा, वित्त मंत्री इन कटारों की धार कोर दुरुस्त कर रहे हैं।
तेल बुझे तीर
कभी आपने यह सोचा है कि आखिर पेट्रो उत्पादों की कीमतें बढ़ने के तीर बजट के साथ ही क्यों चलते हैं? बजट से ठीक पहले ही तेल कंपनियां क्यों रोती हैं, पेट्रोलियम मंत्रालय उनके स्यापे पर मुहर क्यों लगाता है और क्यों बजट की चुभन के साथ तेल की जलन बोनस में मिल जाती है? दरअसल यह एक रहस्यमय सरकारी दांव है। बजट से ठीक पहले तेल कीमतों का मुद्दा उठाना सबके माफिक बैठता है। सरकार के सामने दो विकल्प होते हैं या तो कीमतें बढ़ाएं या फिर तेल कंपनियों के लिए आयात व उत्पाद शुल्क घटाएं। अगर उदारता दिखाने का मौका हुआ तो शुल्क दरें घट जाती हैं और अगर खजाने की हालत खराब हुई तो कीमतें बढ़ जाती हैं। पेट्रो कीमतों के मामले में बरसों बरस से यही होता आया है। तेल कंपनियां व उनके रहनुमा पेट्रोलियम मंत्रालय को अब यह मालूम हो गया है कि उनका मनचाहा सिर्फ फरवरी में हो सकता है। यह महीना वित्त मंत्रियों के लिए भी माफिक बैठता है, क्योंकि वह भारी खर्च वाली स्कीमों के जयगान के बीच सफाई से यह काम कर जाते हैं और कुछ वक्त बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। रही बात तेल मूल्य निर्धारण की नीति ठीक करने की तो उस पर बहस व कमेटियों के लिए पूरा साल पड़ा है। यह तो वक्त बताएगा कि तेल बुझे तीर बजट से पहले छूटेंगे, बजट में या बजट के बाद, लेकिन दर्द का पूरा पैकेज एक साथ अगले कुछ हफ्तों में आने वाला है।
महंगाई का मूसल
इससे पहले तक हम अक्सर बजट के बाद ही यह जान पाते थे कि बजट महंगाई की कीलें कम करेगा या बढ़ाएगा, लेकिन यह बजट तो आने से पहले ही यह संकेत दे रहा है कि इससे महंगाई की आग को हवा और घी दोनों मिलेंगे। कैसे? इशारे इस बात के हैं कि वित्त मंत्री पिछले साल दी गई कर रियायतें वापस लेने वाले हैं। यह सभी रियायतें अप्रत्यक्ष करों यानी उत्पाद व सीमा शुल्कों से संबंधित थीं। मतलब यह कि आने वाले बजट में कई महत्वपूर्ण उत्पादों पर अप्रत्यक्ष कर बढेंगे। अप्रत्यक्ष कर का बढ़ना हमेशा महंगाई बढ़ाता है, क्योंकि कंपनियां बढ़े हुए बोझ को उपभोक्ताओं के साथ बांटती हैं। यानी कि महंगाई को पहला प्रोत्साहन तो दरअसल प्रोत्साहन पैकेज की वापसी से ही मिल जाएगा। साथ ही महंगाई की आग में पेट्रोल भी पड़ने वाला है यानी कि पेट्रो उत्पादों की कीमतें बढ़ने वाली हैं। यह महंगाई की कीलों को आग में तपाने जैसा है। इसके बाद बची खुची कसर सरकार का घाटा पूरा कर देगा। सरकार को अगले साल बाजार से अभूतपूर्व कर्ज लेना होगा। जो कि बाजार में मुद्रा आपूर्ति बढ़ाएगा और महंगाई के कंधे से अपना कंधा मिलाएगा।
करों की कटार के साथ तेल बुझे तीर और ऊपर से महंगाई.. लगता है कि जैसे बजट घायल करने के सभी इंतजामों से लैस होकर आ रहा है। दरअसल मंदी के होम में सरकार ने अपने हाथ बुरी तरह जला लिये हैं। वह अब आपके मलहम नहीं लगाएगी, बल्कि आपसे मलहम लेकर अपनी चोटों का इलाज करेगी। लगता नहीं कि यह बजट अर्थव्यवस्था की समस्याओं के इलाज का बजट होगा, बल्कि ज्यादा संभावना इस बात की है कि इस बजट से सरकार अपने खजाने का इलाज करेगी। जब-जब सरकारों के खजाने बिगड़े हैं तो लोगों ने अपनी बचत और कमाई की कुर्बानी दी है, यह कुर्बानी इस बार भी मांगी जा सकती है अर्थात नया बजट तोहफे देने वाला नहीं, बल्कि तकलीफ देने वाला हो सकता है।

अन्‍यर्थ
http://jagranjunction.com/ (बिजनेस कोच) SATORI

Tuesday, January 26, 2010

आपके जमाने का बजट या बाप के?

यह बजट कांग्रेसी समाजवाद पर आधारित होगा या फिर कांग्रेसी बाजारवाद पर। इस तरह से भी पूछा जा सकता है कि यह बजट प्रणब मुखर्जी का होगा या डा. मनमोहन सिंह का? ..वैसे यह सब छोडि़ए, सीधा सवाल दो टूक सवाल किया जाए कि यह बजट आपके जमाने का होगा या बाप के जमाने का? गणतंत्र का साठ बरस का हो गया है और नई अर्थव्यवस्था बीस बरस की। बहस जायज है कि आने वाला बजट साठ वालों का होगा या बीस वालों का? 1991 सुधारों के साथ बढ़ी पीढ़ी बहुत कुछ सीख कर युवा हो गई है और जबकि दूसरी तरफ गणतंत्र और अर्थतंत्र को संभालने वाले हाथ उम्रदराज हो चले हैं। दो दशक पुराने सुधारों का बहीखाता सामने है तो सियासत के पास भी इन आर्थिक प्रयोगों को लेकर अपने तजुर्बे हैं। इसलिए उलझन भारी है कि दादा यानी प्रणब मुखर्जी किस पीढ़ी के लिए बजट बनाएंगे। अपनी वाली पीढ़ी के लिए या आने वाली पीढ़ी के लिए।
बजट की तासीर और असर
अधिकांश बजट देने वाली कांग्रेस की टकसाल से समाजवादी बजट भी निकले हैं और बाजारवादी भी। बजट का रसायन हमेशा राजस्व, खर्च, घाटे और आर्थिक नीतियों के तत्वों से बनता है, सो इसकी तासीर नहीं बदलती है। अलबत्ता लगभग हर दशक में बजट की केमिस्ट्री और असर जरूर बदले हैं। पचास से साठ के अंत तक बजट अर्थव्यवस्था को सार्वजनिक उपक्रमों की उंगली पकड़ा रहे थे। समाजवाद की फैक्ट्री से निकला आर्थिक चिंतन अर्थव्यवस्था में सरकार को सरदार बनाता था। आजादी के आंदोलन में तपी पीढ़ी के सभी कल्याणकारी सपने सरकार में निहित हो गए थे। ऊंचे कर, भारी खर्च और हर कारोबार में सरकार बजट की तासीर और असर के हिस्से थे। सातवें आठवें दशक में अर्थव्यवस्था ने चुनिंदा निजी उद्योगों व सरकार की जुगलबंदी देखी जो लाइसेंस राज के साज पर बज रही थी। ऊंची कर दरें मगर कुछ खास को कर रियायतों, नियमों के मकड़जाल, लोकलुभावन स्कीमें और तरह-तरह के लाइसेंसों से बजट का यह ताजा रसायन बना था। आठवें दशक में अर्थव्यवस्था बदलाव के लिए कसमसाने लगी थी और नब्बे के दशक के बाद की कहानी अभी ताजी है। दस का बजट इन्हीं तत्वों से बनेगा, लेकिन बहस अब साठ बनाम बीस की है।
इतिहास की तर्ज पर?
साठ की पीढ़ी के हिसाब से बजट बनाने में दादा माहिर हैं। अगर वह उसी राह पर चले तो पिछले बजटों का कोई भी अध्येता बता देगा कि दादा दरअसल क्या करने वाले हैं। यह उधारवाद, कांग्रेसी समाजवाद और लोकलुभावनवाद का आजमाया हुआ बजट होगा। ऐसे बजटों में भारी खर्च पर तालियां बजवाई जाती हैं न कि बड़े सुधारों पर। इंदिरा, नेहरू, राजीव के नाम वाली स्कीमों की छेद वाली टंकियों में नया पानी, किसान, गांव, गरीब की बात, उद्योगों में जो ताकतवर होगा, उसे प्रोत्साहन और भारी घाटे की गठरी। ध्यान रखिए घाटा पहले से ही विस्फोटक बिंदु पर है। राजस्व विलासिता पर कर, कुछ कामचलाऊ कर प्रोत्साहन और रियायतों में कतर ब्योंत। ..साठ की पीढ़ी के बजट का यही नुस्खा है। चुनाव में जाने और जुलाई में जीतकर आने के बाद दादा ने इसी परिपाटी का निर्वाह किया था। अगर यह बजट दादा की अपनी पीढ़ी के फार्मूले पर बनता है तो सुधारों आदि की उम्मीद लगाकर अपना दिमाग मत खराब करिए। वैसे भी तगड़े सुधार सियासत का हाजमा खराब करते हैं और जब दुनिया में बाजारवाद व उदारीकरण के दिन जरा खराब चल रहे हों तो दादा के पास पुरानी रोशनाई से बजट लिखने का तर्क भी मौजूद है।
या इतिहास बनाने के लिए?
वैसे नए जमाने का बजट कुछ और ही तरह होना चाहिए। क्योंकि साठ के बजट चार-पांच फीसदी की ग्रोथ देते थे और अब के बजटों से आठ-नौ फीसदी की विकास दर निकली है व निकलने की उम्मीद होती है। लेकिन इस तरह के बजट से जुड़ी उम्मीदों की केमिस्ट्री ही दूसरी है। यह बहीखाते वाली नहीं, बल्कि डाटाबेस वाली पीढ़ी है। इसे तो जल्द से जल्द नया कर ढांचा यानी जीएसटी चाहिए। .. वित्त मंत्री देंगे? वह तो टल गया है। इसे नया आयकर कानून चाहिए। इसे श्रम कानूनों में बदलाव चाहिए। इसे वित्तीय बाजार का विनियमन और उदारीकरण चाहिए। इसे भरपूर बुनियादी ढांचा चाहिए। इसे महंगाई पर स्थायी काबू चाहिए ताकि वह अपनी बढ़ी हुई आय महंगी रोटी दाल लेने के बजाय अपनी जिंदगी बेहतर करने पर खर्च करे और बाजार में मांग बढ़ा सके। इसे सही कीमत पर शानदार सरकारी सेवाएं चाहिए ताकि वह उत्पादक होकर जीडीपी बढ़ा सके। इसे संतुलित, पारदर्शी बाजार चाहिए। और साथ में इसे चाहिए ऐसा बजट जिसमें घाटा हो मगर अच्छी क्वालिटी का यानी कि विकास के खर्च के कारण होने वाला घाटा, न कि फालतू और अनुत्पादक खर्च के कारण।
आर्थिक डाक्टर यानी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दो दशक पहले पुरानी पीढ़ी वाले बजट का खोल तोड़ा था और नई पीढ़ी को उसके सपनों के मुताबिक बजट दिया था। इसके बाद से नई अर्थव्यवस्था वाले जवान पीढ़ी हर बजट से ड्रीम बजट होने की उम्मीद लगाती है। उनके सपनों की सीमा नहीं है, इसलिए हर बजट को देखकर उनके सपने जग जाते हैं। इधर साठ की पीढ़ी का बजटीय हिसाब-किताब आर्थिक जरूरतों के फार्मूले से कम सियासी सूत्रों से ज्यादा बनता है। अर्थव्यवस्था संक्राति के बिंदु पर है। पिछले दो दशकों में खोए-पाए, गंवाए- चुकाए आदि का लंबा हिसाब-किताब होना है। वक्त बताएगा कि तजुर्बेकार प्रणब दादा ने उम्रदराज सियासत के लिए बजट बनाया या फिर चहकती नई पीढ़ी के लिए? ..इस बजट को बहुत ध्यान से देखिएगा। नई अर्थव्यवस्था यहां से तीसरे दशक की गाड़ी पकड़ेगी।
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और अन्‍यर्थ के लिए स्‍वागत है .....
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