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Tuesday, May 10, 2016

कुछ करते क्यों नहीं !


भ्रष्टाचार से निर्णायक मुक्ति की उम्मीद लगाए, एक मुल्क को राजनैतिक कुश्तियों का तमाशबीन बनाकर रख दिया गया है.

भ्रष्टाचार को लेकर एक और आतिशबाजी शुरू हो चुकी है. पिछले पांच-छह साल में घोटालों पर यह छठी-सातवीं राजनैतिक कुश्ती है, जो हर बार पूरे तेवर-तुर्शी और गोला-बारूद के साथ लड़ी जाती है और राजनीतिजीवी जमात को अपनी आस्थाएं तर करने का मौका देती है. लेकिन हकीकत यह है कि भ्रष्टाचार को लेकर हम एक छलावे के दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जिसमें भ्रष्टाचार से निर्णायक मुक्ति की उम्मीद लगाए, एक मुल्क को राजनैतिक कुश्तियों का तमाशबीन बनाकर रख दिया गया है.

भारत भ्रष्टाचार के सभी पैमानों पर सबसे ऊपर है, लेकिन इससे निबटने की व्यवस्था करने, संस्थाएं और पारदर्शी ढांचा बनाने में हम उन 175 देशों में सबसे पीछे हैं, जिन्होंने 2003 में संयुक्त राष्ट्र की भ्रष्टाचार रोधी संधि पर दस्तखत किए थे. हमसे तो आगे पाकिस्तान, मलेशिया, इंडोनेशिया, भूटान और वियतनाम जैसे देश हैं जिनके प्रयास, सफलताएं-विफलताएं भ्रष्टाचार पर ग्लोबल चर्चाओं में जगह पाते हैं.

चॉपरगेट के बहाने हम उन आंदोलनों और बेचैनियों को श्रद्धांजलि दे सकते हैं, जिन्होंने 2011 से 2013 के बीच देश को मथ दिया था. लगता था कि जैसे भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ इंकलाब आ गया है. कोई बता सकता है कि इस बेहद उथल-पुथल भरे दौर से निकला लोकपाल आज कहां है, जिसका कानून तकनीकी तौर पर जनवरी, 2014 से लागू है, लेकिन लोकपाल महोदय प्रकट नहीं हुए.

यह खबर किसी अखबार या टीवी के मतलब की नहीं थी कि दिसंबर, 2014 में मोदी सरकार ने लोकपाल कानून को पुनःविचार और संशोधनों के लिए कानून मंत्रालय की संसदीय समिति को सौंप दिया. एक साल बाद दिसंबर, 2015 में इस समिति ने केंद्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआइ के भ्रष्टाचार रोधी विंग को लोकपाल के दायरे में लाने की सिफारिश के साथ अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी.

भ्रष्टाचार को लेकर यह कैसी वचनबद्धता है कि तकनीकी तौर पर लोकपाल कानून बने ढाई साल हो चुके हैं, लेकिन मोदी सरकार लोकपाल पर कुछ नहीं बोली. संयुक्त राष्ट्र की संधि के मुताबिक, भारत को पांच दूसरे कानून भी बनाने हैं. इनमें एक व्हिसलब्लोअर बिल भी है. इस कानून के तहत भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले की सुरक्षा के प्रावधान ढीले करते हुए सरकार अपनी मंशा को दागी करा चुकी है.

यह विधेयक राज्यसभा में अटका है. अदालतों में पारदर्शिता के लिए जुडीशियल अकाउंटेबिलटी बिल, नागरिक सेवाओं से जुड़े अधिकारों के लिए सिटीजन चार्टर ऐंड ग्रीवांस रिड्रेसल बिल, सरकारी सेवाओं में भ्रष्टाचार रोकने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन का विधेयक और विदेशी अधिकारियों व अंतरराष्ट्रीय संगठनों में रिश्वतखोरी रोकने के विधेयकों को लेकर पिछले दो साल में सरकार में कहीं कोई सक्रियता नहीं दिखी.

किसी को यह मुगालता नहीं है कि लोकपाल या इन पांच कानूनों के जरिए हम भारत की सियासत और कार्यसंस्कृति में भिदे भ्रष्टाचार को रोक सकेंगे. यह तो सिर्फ भ्रष्टाचार पर रोक, जांच और पारदर्शिता का शुरुआती ढांचा बनाने की कोशिश है, वह भी अभी शुरू नहीं हो सकी है. 2003 में भ्रष्टाचार पर अंतरराष्ट्रीय संधि (2005 से लागू) के बाद लगभग प्रत्येक देश ने अपनी परिस्थिति के आधार पर भ्रष्टाचार से निबटने के लिए रणनीतियां, संस्थाएं, नियम, कानून और एजेंसियां बनाई हैं, जिन्हें लगातार संशोधित कर प्रभावी बनाया जा रहा है.

पिछले कुछ वर्षों में यूएनडीपी और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने भ्रष्टाचार निरोधक रणनीतियों का अध्ययन किया है, जो इस जटिल जंग में हार-जीत, दोनों की कहानियां सामने लाते हैं. मसलन, रोमानिया ने अपनी पुरानी भूलों से सीखकर एक कामयाब व्यवस्था बनाने की कोशिश की. इंडोनेशिया ने अपनी ऐंटी करप्शन रणनीतियों को गवर्नेंस सुधारों से जोड़कर ग्लोबल स्तर पर सराहना हासिल की है. ऑस्ट्रेलिया ने नेशनल ऐंटी करप्शन रणनीति बनाने की बजाए पारदर्शिता को व्यापक गवर्नेंस और न्यायिक सुधारों से जोड़कर पूरे सिस्टम को पारदर्शी बनाने की राह चुनी, जबकि मलेशिया ने भ्रष्टाचार खत्म करने की रणनीति को गवर्नेंस ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम से जोड़ा, जो इस विकासशील देश को 2020 तक विकसित मुल्क में बदलने का लक्ष्य रखता है. चीन तो दुनिया का सबसे कठोर भ्रष्टाचार निरोधक अभियान चला रहा है, जिसमें 2013 से अब तक दो लाख से अधिक अधिकारियों और कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों की जांच हो चुकी है और अभियोजन की दर 99 फीसदी है.

भ्रष्टाचार रोकने की रणनीतियां चार बुनियादी आधारों पर टिकी हैं. सबसे पहला है, मजबूत और स्वतंत्र मॉनिटरिंग एजेंसी, दूसरा, भ्रष्टाचार की नियमित और पारदर्शी नापजोख जबकि तीसरा पहलू है, जांच के लिए पर्याप्त संसाधन और विस्तृत तकनीकी क्षमताएं और चौथा है, स्पष्ट कानून व भ्रष्टाचार पर तेज फैसले देने वाली सक्रिय अदालतें.

भारत की तरफ देखिए. हमारे पास इन चारों में से कुछ भी नहीं है. भारत की एक ताकतवर स्वतंत्र एजेंसी बनाने (लोकपाल) की जद्दोजहद अब तक जारी है. केंद्रीय सतर्कता आयोग को गठन के 39 साल बाद 2003 में वैधानिक दर्जा मिला लेकिन जांच का अधिकार नहीं. जांच करने वाली सीबीआइ सरकारों के पिंजरे का तोता है. भ्रष्टाचार की नापजोख का कोई तंत्र कभी बना ही नहीं और अदालतें उन कानूनों से लैस नहीं हैं, जो जटिल भ्रष्टाचार को बांध सकें.

कीचड़ सनी कांग्रेस से तो इस सबकी उम्मीद भी नहीं थी, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ जनादेश पर बैठकर सत्ता में आई मोदी सरकार से यह अपेक्षा जरूर थी कि वह पुराने घोटालों की तेज जांच करेगी और भारत को भ्रष्टाचार से निबटने के लिए दूरगामी व स्थायी रणनीति और संस्थाएं देगी.

अगस्तावेस्टलैंड के दलाल जानते हैं कि दुनिया के विभिन्न देशों में फैले रिश्वतखोरी के तार जोड़ते-जोड़ते एक दशक निकल जाएगा. सियासत को भी पता है कि जांच में कुछ न होने का, क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार से निबटने को लेकर संस्थागत तौर पर कुछ किया ही नहीं है. वे तो बस राजनीति के कीचड़ में लिथड़ने के शौकीन हैं, जिसका सीजन कुछ वक्त बाद खत्म हो जाता है.


Wednesday, July 29, 2015

पारदर्शिता का तकाजा


एक साल में गवर्नेंस में पारदर्शिता को लेकर नए उपाय करना तो दूर, मोदी सरकार ने मौजूदा व्यवस्था से ही असहमति जता दी. नतीजतन, आज वह उन्हीं सवालों से घिरी है, जिनसे वह कांग्रेस को शर्मसार करती थी


माना कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज (संदर्भः ललित मोदी) उदारमना हैं. शिवराज सिंह चौहान व्यापम घोटाले के व्हिसलब्लोअर हैं और वसुंधरा पर लगे आरोप प्रामाणिक नहीं हैं लेकिन यह सवाल तो फिर भी बना रहता है कि मोदी सरकार को क्रिकेट की साफ सफाई से किसने रोका था? व्यापम घोटाले की जांच के लिए अदालती चाबुक का इंतजार क्यों किया गया? खेलों में फर्जीवाड़ा रोकने वाले विधेयक को कानूनी जामा पहनाने में कौन बाधा डाल रहा है? पारदर्शिता के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचा बनाने में कौन-सी समस्या है? मोदी सरकार अगर इस तरह के कदमों व फैसलों के साथ आज संसद में खड़ी होती तो एक साल के भीतर भ्रष्टाचार पर उसे उन्हीं सवालों का सामना नहीं करना पड़ता जो वह पिछले कई वर्षों से लगातार कांग्रेस से पूछती रही है. संसद की खींचतान से ज्यादा गंभीर पहलू यह है कि मोदी सरकार के पहले एक साल में उच्च पदों पर पारदर्शिता को लेकर वह बेबाक फर्क नजर नहीं आया जिसकी उम्मीद उससे की गई थी. केंद्र से लेकर राज्यों तक बीजेपी को शर्मिदगी में डालने वाले ताजे विवाद दरअसल गवर्नेंस की गलतियां हैं, सत्ताजन्य अहंकार या बेफिक्री जिनकी वजह होती है. ये गलतियां पहले ही साल में इसलिए आ धमकीं क्योंकि पिछले एक साल में गवर्नेंस में पारदर्शिता को लेकर नए उपाय करना तो दूर, सरकार ने मौजूदा व्यवस्था से ही असहमति जता दी. दागी व्यक्ति से दूरी बनाना सामान्य सतर्कता है. इसलिए जब सुषमा स्वराज जैसी तजुर्बेकार मंत्री कानून की नजर में अपराधी ललित मोदी की मदद के लिए इतने बेधड़क होकर अपने पद का इस्तेमाल करती हैं तो अचरज होना लाजिमी है. स्वराज और ललित मोदी के बीच पारिवारिक व पेशेवर रिश्तों की रोशनी में सुषमा को और ज्यादा सतर्क होना चाहिए था. पूर्व आइपीएल प्रमुख की मदद अगर विदेश मंत्री की गलती है तो यह चूक दरअसल सत्ता में होने की बेफिक्री का नतीजा है. ललित मोदी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी होने पर सुषमा ज्यादा मुश्किल में होंगी.
पंकजा मुंडे के चिक्की व खिचड़ी खरीद फैसलों को देखकर अदना-सा क्लर्क भी यह बता देगा कि इस तरह के निर्णय सत्ता की ताकत सिर चढऩे की वजह से होते हैं. राज्य सरकार के नियमों के मुताबिक, एक करोड़ रुपए से ऊपर की खरीद टेंडर से ही हो सकती है जबकि पंकजा ने एकमुश्त 206 करोड़ रु. की खरीद कर डाली. इस सप्ताह विधानसभा में उन्होंने यह गलती मान भी ली. महाराष्ट्र में खेती मशीनों की खरीद का 150 करोड़ रु. और घोटाला खुला है, जिसमें टेंडर के सामान्य नियमों का खुला उल्लंघन किया गया है. फिक्र होनी चाहिए कि अगर बीजेपी की नई सरकारों में अन्य मंत्रियों ने भी सुषमा या पंकजा की तरह मनमाने फैसले किए हैं तो फिर पार्टी और मोदी सरकार के लिए आने वाले महीनों में कई बड़ी मुश्किलें तैयार हो रही हैं. सिर्फ शांता कुमार ही नहीं, बीजेपी में कई लोग यह कहते मिल जाएंगे कि पारदर्शिता को लेकर मोदी सरकार को कहीं ज्यादा सख्त होना चाहिए था. सख्ती दिखाने के मौकों की कमी भी नहीं थी. मसलन, सत्ता में आने के बाद बीजेपी स्पोर्टिंग फ्रॉड विधेयक को पारित कर सकती थी ताकि क्रिकेट का कीचड़ साफ हो सके. सट्टेबाजी जैसे अपराधों के लिए जेल व भारी जुर्माने की सजा का प्रावधान करने वाला विधेयक दो साल से लंबित है और इसके बिना लोढ़ा समिति की सिफारिशों के तहत सजा पाए मयप्पन और कुंद्रा पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो सकती. इसी क्रम में खेल संघों को कानून के दायरे लाने की पहल भी खेलों को साफ-सुथरा बनाने के प्रति मोदी सरकार की गंभीरता का सबूत बन सकती थी. लेकिन पारदर्शिता के आग्रहों को मजबूत करने की बजाए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने न केवल सीबीआइ को यह सलाह दे डाली कि उसे फैसलों में ईमानदार गलती (ऑनेस्ट एरर) व भ्रष्टाचार में फर्क समझना होगा, बल्कि इसके लिए भ्रष्टाचार निरोधक कानून में बदलाव की तैयारी भी शुरू कर दी. बजट सत्र के अंत में सरकार व्हिसलब्लोअर कानून में संशोधन ले आई, जिसके तहत भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने को बुरी तरह हतोत्साहित करने का प्रस्ताव है. अगर यह संशोधन पारित हुआ तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लगभग असंभव हो जाएगी. अगर सूचना के अधिकार पर ताजे पहरे इस फेहरिस्त में जोड़ लिए जाएं तो गवर्नेंस में पारदर्शिता को लेकर सरकार की नीयत पर सवाल उठना लाजिमी है. ताजा विवाद यह महसूस कराते हैं कि सरकार न केवल गवर्नेंस और गलतियों बल्कि भूलों के बचाव में भी कांग्रेसी तौर-तरीकों की ही मुरीद है. मध्य प्रदेश के गवर्नर रामनरेश यादव को फरवरी में ही विदा हो जाना चाहिए था जब व्यापम घोटाले में एफआइआर हुई थी. सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद तो उनके पद पर बने रहने का मतलब ही नहीं है. यह मानते हुए कि यादव, भोपाल के राजभवन में कांग्रेस की विरासत हैं, उन्हें बनाए रखकर सरकार यूपीए जैसी फजीहत को न्योता दे रही है. सुषमा व पंकजा जैसे मंत्रियों की 'भूलें' बताती हैं कि बीजेपी की सरकारों में भी पारदर्शिता के आग्रह मजबूत नहीं हैं. ताजा विवाद, उच्च पदों पर भ्रष्टाचार को लेकर सरकार के नेतृत्व का असमंजस जाहिर करते हैं. यूपीए सरकार भी ठीक इसी तरह उच्च पदों पर भ्रष्टाचार को लेकर दो टूक फैसलों से बचती रही. नतीजतन अदालतों ने सख्ती की और सरकार अपनी साख गंवा बैठी. मोदी सरकार सत्ता में आने के बाद पहली बार रक्षात्मक दिख रही है और भ्रष्टाचार पर अदालतें फिर सक्रिय (व्यापम) हो चली हैं. प्रधानमंत्री को एहसास होना चाहिए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त हुए बिना बात नहीं बनेगी. इसके लिए उन्हें उच्च पदों पर पारदर्शिता के कठोर प्रतिमान तय करने होंगे, क्योंकि संसद में विपक्ष का गतिरोध उतनी बड़ी चुनौती नहीं है, ज्यादा बड़ी उलझन यह है कि जो सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जनादेश पर सवार होकर सत्ता में पहुंची वह एक साल के भीतर भ्रष्टाचार को लेकर बचाव की मुद्रा में है. यह नरेंद्र मोदी को लेकर बनी उम्मीदों का जबरदस्त ऐंटी-क्लाइमेक्स है.


Monday, February 16, 2015

केजरीवाल का डर

मुख्यधारा की राजनीति में केजरीवाल की आमद के बाद देश की राजनीति किस्म-किस्म के प्रतिस्पर्धी डरों से ही गुंथी-बुनी होगीजो कई बदलावों की राह खोलेगा 
ह जीत डराती है, इसे सिर पर मत चढ़ने देना!'' दिल्ली की अद्भुत जीत के बाद अरविंद केजरीवाल ने यह बात सोचकर नहीं कही होगी. यह सहज मध्यवर्गीय प्रतिक्रिया है जो बड़ी सफलता मिलने पर कुछ बिगड़ जाने की आशंका से उपजती है. डर चाहे कितना नकारात्मक हो लेकिन उसकी अपनी ताकत होती है. सियासत की दुनिया में हमेशा कुछ गहरे डर भिदे होते हैं जो रणनीतियों की बुनियाद बनते हैं. केजरीवाल का डर जायज है. उन्हें सिर्फ उनके हिस्से का सकारात्मक जनादेश नहीं मिला है. एक ताजा लहर से ऊब व उफनती उम्मीदों ने उन्हें जोखिम की चोटी पर टांग दिया है. इससे अकेले केजरीवाल ही डरे नहीं हैं, डर दूसरी तरफ भी है. दो साल तक थपेड़े खाने और रगड़ने के बाद अंतत: नई सियासत पूरी ठसक के साथ सत्ता के शिखर तक आ ही गई. पारंपरिक सियासत को इसी का तो डर था. राजनीति की बहसों से परे एक तीसरा डर भी है. लोग अब महसूस करना चाहते हैं कि केजरीवाल, गवर्नेंस व सियासत के भ्रष्ट मॉडल को कितना डरा पाते हैं. दरअसल, डर कितने भी बुरा हों, मुख्यधारा की राजनीति में केजरीवाल की आमद के बाद देश की राजनीति किस्म-किस्म के प्रतिस्पर्धी डरों से ही गुंथी-बुनी होगी, जो कई बदलावों की राह खोलेगा.  
केजरीवाल को क्यों डरना चाहिए? क्योंकि उन्हें सरकार चलानी नहीं बल्कि नई सरकार बनानी है. भारत में सरकारें खूब चलीं लेकिन नई गवर्नेंस का इंतजार खत्म नहीं हुआ. सरकारें, इस चुनाव से उस चुनाव के बीच सिमट गईं इसलिए राजनीति व गवर्नेंस का फर्क धुंधला होता चला गया. केजरीवाल अतीत नहीं पोंछ सकते, वे एक नई गवर्नेंस की उम्मीद के साथ शुरू हुए थे, आंदोलन व सियासत जिसके माध्यम बने. पुरानी राजनीति सत्ता में आने के बाद भी सियासी आग्रहों से मुक्त नहीं हो पाती, ठीक उसी तरह केजरीवाल 49 दिन के पुराने प्रयोग में आंदोलनकारी आग्रहों से मुक्त नहीं हो पाए. उम्मीद है कि वे बदले होंगे. उन्हें मिली नसीहतों में यह सबक भी शामिल होगा कि गवर्नेंस की मौजूदा सीमाओं के भीतर नए तौर-तरीके ईजाद करना कतई मुश्किल नहीं है. आम आदमी पार्टी को डरना चाहिए कि उसका भव्य जनादेश नई व कमजोर जमीन पर टिका है. सियासत अमूर्त है, गवर्नेंस जिंदगी को छूती है. यह जनादेश सियासत करने का नहीं, सरकार चलाने का है. पारंपरिक राजनैतिक दलों की जड़ें विचाराधाराओं, परंपरा, परिवार व भौगोलिक विस्तार से पोषण पाती हैं इसलिए चुनावी पराजयों के बावजूद वे फिर उग आते हैं. केजरीवाल के पास ऐसा कुछ भी नहीं है. वे उम्मीदों के शिखर पर खड़े हैं, ताकतवर व प्रतिस्पर्धी राजनीति से मुकाबिल हैं. केजरीवाल को यह डर वाकई महसूस होना चाहिए कि बस एक गलती हुई तो पुनर्मूषकोभव!
केजरीवाल से किसे डरना चाहिए? 2011 का दिसंबर याद करिए जब लोकपाल पर संसद में बहस चल रही थी. राजनीति की मुख्यधारा के सूरमा दहाड़ रहे थे कि परिवर्तनों के सभी रास्ते पारंपरिक राजनीति के दालान से गुजरते हैं. जिसे बदलाव चाहिए, उसे दलीय राजनीति के दलदल में उतर कर दो-दो हाथ करने होंगे. केजरीवाल ने दलगत और चुनावी सियासत के जरिए एक नहीं बल्कि दो बार राजनीति के पारंपरिक डिजाइन से इनकार को मुखर कर दिया. केजरीवाल हाल के दशकों में भारत के सबसे तपे हुए नेता हैं जो स्याही की बौछार और जनता से पिटते हुए, जमीनी आंदोलनों की परिपाटी के जरिए अभूतपूर्व जीत तक आए हैं. केजरीवाल की भव्य विजय, भारतीय राजनीति में मोदी युग की शुरुआत और कांग्रेस के अदृश्य होने के बाद की घटना है. इस विराट जीत को मोदी की लोकप्रियता के शोर के बीच बड़ी खामोशी के साथ गढ़ा गया है. पुराने दलों को केजरीवाल से इसलिए डरना चाहिए क्योंकि राजनीति का यह स्टार्ट अप जबरदस्त जन निवेश से शुरू हो रहा है. केजरीवाल के पास सरकार की सीमाओं के भीतर रह कर वह पारदर्शी गवर्नेंस गढ़ने का प्रचंड बहुमत है, पुरानी राजनीति जिसे रोकती रही है. केजरीवाल का यह डर हमेशा बने रहना चाहिए कि वे पारंपरिक राजनीति की लकीर छोटी कर सकते हैं.
केजरीवाल का डर कैसा होना चाहिए? दिल्ली की आम चर्चाएं यह कहती हैं कि केजरीवाल के पहले 49 दिन भ्रष्टाचार को डराने वाले थे. भ्रष्टाचार का प्रकोप घटा था या नहीं, प्रमाण नहीं मिलता लेकिन लोगों के निजी किस्से और तजुर्बे बताते हैं कि भ्रष्टाचार कम होने की ठोस उम्मीद जरूर बनी थी. इसी उम्मीद ने आम आदमी पार्टी को वापसी का आधार दिया. भारत में तमाम उत्पाद सिर्फ इसलिए महंगे हैं क्योंकि उनकी कीमत में कट-कमीशन का खर्च शामिल है. तमाम स्कूल सिर्फ इसलिए मोटी फीस वसूलते हैं क्योंकि उन्हें खोलने व चलाने की एक अवैध लागत है. विकासशील देशों में भ्रष्टाचार परियोजनाओं की लागत 20 फीसद तक बढ़ाता है और महंगाई को ताकत देता है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भ्रष्टाचार रोकने के लिए डर पैदा कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लोगों के गुस्से से डर लगता है. केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ खौफ बना सके तो उनके बहुत से काम अपने आप सध जाएंगे.
जनता माफ करना जानती है इसलिए तो सत्ता छोड़ने के बाद, दिल्ली में मकान तक न देने वाले लोगों ने केजरीवाल को 67 सीटें दे दीं. लेकिन जनता अब झटपट फैसला करती है, वह पांच साल तक इंतजार नहीं करती, पहले मौके पर ही सजा भी सुना देती है. केजरीवाल प्रतिस्पर्धी राजनीति व बेहद बेसब्र वोटर से मुखातिब हैं, जो नेताओं को डरा कर रखना चाहता है ताकि वे हमेशा वह करें जो उन्होंने कहा है. इस वोटर को आप सैडिस्ट या निर्मम कह सकते हैं लेकिन क्या करेंगे, जनता तो जनार्दन है. उसे मूर्ख समझने की बजाए उससे डरते रहने में ही समझदारी है. शुक्र है कि भारतीय नेताओं में यह समझदारी बढ़ने के सबूत मिलने लगे हैं


Monday, January 6, 2014

भ्रष्‍टाचार वाली महंगाई

भारत की कितनी मूल्‍य वृद्धि ऐसी है जो केवल भ्रष्‍टाचार की गोद में पल रही है ?

भारत में कितने उत्पाद इसलिए महंगे हैं कि क्‍यों कि उनकी कीमत में कट- कमीशन का खर्च शामिल होता है ? बिजली को महंगा करने में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का भ्रष्‍टाचार कितना जिम्‍मेदार है ? कितने स्‍कूल सिर्फ इसलिए महंगे हैं क्‍यों कि उन्‍हें खोलने चलाने की एक अवैध लागत है ? कितनी महंगाई सरकारी स्‍कीमों भ्रष्‍ट तंत्र पर खर्च के कारण बढी है जिसके लिए सरकार कर्ज लेती है और रिजर्व बैंक से करेंसी छापता  है।.... पता नहीं भारत की कितनी मूल्‍य वृद्धि ऐसी है जो केवल भ्रष्‍टाचार की गोद में पल रही है ? ताजा आर्थिक-राजनीतिक बहसों से यह सवाल इसलिए नदारद हैं क्‍यों कि भ्रष्‍टाचार व महंगाई का सीधा रिश्‍ता स्‍थापित होते ही राजनीति के हमाम में हड़बोंग और तेज हो जाएगी। अलबत्‍ता सियासी दलों की ताल ठोंक रैलियों के बीच जनता ने भ्रष्‍टाचार व महंगाई के रिश्‍ते को जोड़ना शुरु कर दिया है।
 महंगाई एक मौद्रिक समस्या है, जो मांग आपूर्ति के असंतुलन से उपजती है जबकि भ्रष्‍टाचार निजी फायदे के लिए सरकारी ताकत का दुरुपयोग है। दोनों के बीच सीधे रिश्‍ते का रसायन जटिल है लेकिन अर्थविद इस समझने पर, काम कर रहे हैं। इस रिश्‍ते को परखने वाले कुछ ग्‍लोबल पैमानों की रोशनी में भारत की जिद्दी महंगाई की जड़

Monday, April 8, 2013

अवसरों का अपहरण





लोकतंत्र का एक नया संस्‍करण देश को हताश कर रहा है जहां आर्थिक आजादी कुछ सैकड़ा कंपनियों पास बंधक है और राजनीतिक अवसर कुछ सौ परिवारों के पास

मुख्‍यमंत्री ग्रोथ के मॉडल बेच रहे हैं और देश की ग्रोथ का गर्त में है! रोटी, शिक्षा से लेकर सूचना तक, अधिकार बांटने की झड़ी लगी है लेकिन लोग राजपथ घेर लेते हैं! नरेंद्र मोदी के दिलचस्‍प दंभ और राहुल गांधी की दयनीय दार्शनिकता के बीच खड़ा देश अब एक ऐतिहासिक असमंजस में है। दरअसल, भारतीय लोकतंत्र का एक नया संस्‍करण देश को हताश कर रहा है जहां आर्थिक आजादी कुछ सैकड़ा कंपनियों पास बंधक है और राजनीतिक अवसर कुछ सैकडा परिवारों के पास। इस नायाब तंत्र के ताने बाने, सभी राजनीतिक दलों को आपस में जोडते हैं अर्थात इस हमाम के आइनों में, सबको सब कुछ दिखता है इसलिए राजनीतिक बहसें खोखली और प्रतीकात्‍मक होती जा रही हैं जबकि लोगों के क्षोभ ठोस होने लगे हैं।
यदि ग्रोथ की संख्‍यायें ही सफलता का मॉडल हैं तो गुजरात ही क्‍यों उडीसा, मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़, त्रिपुरा, उत्‍तराखंड, सिक्किम भी कामयाब हैं अलबत्‍ता राज्‍यों के आर्थिक आंकड़ों पर हमेशा से शक रहा है। राष्‍ट्रीय ग्रोथ की समग्र तस्‍वीर का राज्‍यों के विपरीत होना आंकड़ों में  संदेह को पुख्‍ता करता है। दरअसल हर राज्‍य में उद्यमिता कुंठित है, निवेश सीमित है, तरक्‍की के अवसर घटे हैं, रोजगार नदारद है और लोग निराश हैं। ग्रोथ के आंकड़े अगर ठीक भी हों तो भी यह सच सामने नहीं आता कि भारत का आर्थिक लोकतंत्र लगभग विकलांग हो गया है। 
उदारीकरण से सबको समान अवसर मिलने थे लेकिन पिछले एक दशक की प्रगति चार-पांच सौ कंपनियों की ग्रोथ में