Showing posts with label financial investment. Show all posts
Showing posts with label financial investment. Show all posts

Sunday, November 19, 2017

यह है असली कामयाबी


रेंद्र मोदी सरकार के पिछले तीन साल की सबसे बड़ी सफलता क्या है
अगर आपको नहीं मालूम तो इस बात पर मत चौंकिए कि प्रचार-वीर सरकार ने अब तक बताया क्यों नहीं ? 
आश्‍चर्य  तो यह है कि इस कामयाबी को मजबूत बनाने के लिए अब तक कुछ भी नहीं किया गया.
तमाम मुसीबतों के बावजूद छोटे-छोटे शहरों के मध्य वर्ग की छोटी बचतों ने बेहद संजीदगी से भारतीय शेयर बाजार की सूरत बदल दी है. म्युचुअल फंड पर सवार होकर शेयर बाजार में पहुंच रही बचतएक अलहदा किस्म का वित्तीय समावेशन (फाइनेंशियल इनक्लूजन) गढ़ रही है और भारत की निवेश आदतों को साफ-सुथरा बनाने का रास्ता दिखा रही है.

भारतीय शेयर बाजार में कुछ ऐसा हो रहा है जो अब तक कभी नहीं हुआ. बाजारों के विदेशी निवेशकों की उंगलियों पर नाचने की कहानी पुरानी हो रही है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2014 के बाद से घरेलू निवेशकों ने 28 अरब डॉलर मूल्य के शेयर खरीदे हैं. यह विदेशी निवेश के (30 अरब डॉलर) के तकरीबन बराबर ही है. इसने पिछले तीन साल में शेयर बाजार को बड़ा सहारा दिया है और विदेशी निवेश पर निर्भरता को कम किया है.

छोटे निवेशक अपनी मासिक बचत को कमोबेश सुरक्षित तरीके से (सिस्टेमिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी सिप) म्युचुअल फंड में लगा रहे हैं. म्युचुअल फंड उद्योग के मुताबिकपिछले तीन साल में उसे मिले निवेश ने सालाना 22-28 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की है. म्युचुअल फंड एसेट्समई 2014 में 10 लाख करोड़ रु. के मुकाबले 2017 की जुलाई में 19.97 लाख करोड़ रु. पर पहुंच गए. ज्यादातर निवेश छोटे-छोटे शहर और कस्बों से आ रहे हैंजहां फंड में निवेश में 40 फीसदी का इजाफा हुआ है.

मकान-जमीन और सोने की चमक बुझ रही है तो घरेलू निवेशकों की मदद की बदौलत शेयर बाजार (निफ्टी) ने पिछले तीन वर्ष के दौरान 11.97 फीसदी (किसी भी दूसरी बचत या निवेश से कहीं ज्यादा) का सालाना रिटर्न दिया है.

जोखिम का मोड़

इक्विटी कल्चर की कहानी रोमांचक हैलेकिन जोखिम से महफूज नहीं. शेयरों की कीमतें जितनी तेजी से बढ़ रहीं हैंबाजार की गहराई उसके मुताबिक कम है. बाजार में धन पहुंच रहा है तो इसलिए देश की आर्थिक हकीकत (ग्रोथ में गिरावटतेल की बढ़ती कीमतपटरी से उतरा जीएसटी आदि) की परवाह किए बगैर बाजार बुलंदियों के रिकॉर्ड गढ़ रहा है.

यही मौका है जब छोटी बचतों के रोमांच को जोखिम से बचाव चाहिए.

- कंपनियों के पब्लिक इश्यू बढऩे चाहिए. प्राइमरी शेयर बाजार विश्लेषक प्राइम डाटाबेस के मुताबिकपिछले तीन वर्ष में नए इश्यू की संख्या और आइपीओ के जरिए जुटाई गई पूंजी2009 और 2011 के मुकाबले कम है जो प्राइमरी मार्केट के लिए हाल के सबसे अच्छे साल थे. सरकारी कंपनियों के विनिवेश में तेजी की जरूरत है.

- शेयर बाजार की गहराई बढ़ाने के लिए नए शेयर इश्यू का आते रहना जरूरी है. औद्योगिक निवेश के संसाधन जुटाने में इक्विटी सबसे अच्छा रास्ता है.

- सेबी के नियमों के मुताबिकशेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनी के कम से कम 25 फीसदी शेयर जनता के पास होने चाहिए. अब भी 1,886 सूचीबद्ध कंपनियां इस नियम का पालन नहीं कर रही हैं. कैपिटलाइन के आंकड़ों के मुताबिकइनमें 1,795 कंपनियां निजी हैं.

- लोगों की लघु बचत दो दशक के सबसे निचले स्तर पर है. 2010 में परिवारों की बचत (हाउसहोल्ड  सेविंग्स)जीडीपी के अनुपात में 25.2 फीसदी ऊंचाई पर थी जो 2017 में 18.6 फीसदी पर आ गई. सरकारी बचत योजनाएं (एनएससीपीपीएफ) ब्याज दरों में कमी के कारण आकर्षण गंवा रही हैं.
बचत में गिरावट को रोकने के लिए वित्तीय बाजार में निवेश को प्रोत्साहन देने होंगे. आयकर नियम बदलने होंगे ताकि शेयरोंम्युचुअल फंडों और डिबेंचरों में निवेश को बढ़ावा मिले.

भारत में निवेश व संपत्ति का सृजन पूरी तरह सोना व जमीन पर केंद्रित है. क्रेडिट सुइस ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट 2017 के मुताबिकभारत में 86 फीसदी निजी संपत्ति सोने या जमीन के रूप में हैवित्तीय निवेशों का हिस्सा केवल 14 फीसदी हैजबकि ब्रिटेन में 51 फीसदीजापान में 53 फीसदी और अमेरिकी में 72 फीसदी संपत्ति वित्तीय निवेशों के रूप में है.



नोटबंदी से तो कुछ नहीं मिला. यदि छोटे निवेशकों के उत्साह को नीतियों का विटामिन मिल जाए तो संपत्ति जुटाने के ढंग को साफ-सुथरा बनाया जा सकता है. बताने की जरूरत नहीं है कि वित्तीय निवेश पारदर्शी होते हैं और सोना व जमीन काली कमाई के पसंदीदा ठिकाने हैं.

Tuesday, June 13, 2017

नोटबंदी और जीएसटी




जीएसटी और नोटबंदी में इतने गहरे अंतविरोध क्‍यों हैं ?
 

सोने की उत्पादक उपयोगिता (डिमेरिट या सिन प्रोडक्ट) नहीं है. सोने पर कम टैक्स एक  भारी सब्सिडी है जो देश के केवल दो फीसदी समृद्ध लोगों को मिलती है: आर्थिक समीक्षा 2015-16

वित्त मंत्री अरुण जेटली जब आम खपत की चीजों पर भारी टैक्स के बदले सोने पर तीन फीसदी और हीरे (अनगढ़) पर केवल 0.25 फीसदी जीएसटी लगाने का ऐलान कर रहे थे, तब शायद सबसे ज्यादा असहज स्थिति में सरकार के आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मïण्यम रहे होंगे जिन्होंने बीते साल ही सोने पर नगण्य टैक्स की नीति को सूट-बूट की सरकारों के माफिक कहा था.

वैसे, नोटबंदी के पैरोकारों की जमात, जीएसटी पर सुब्रह्मïण्यम से ज्यादा असमंजस में है. जीएसटी नोटबंदी के पावनउद्देश्यों को सिर के बल खड़ा कर रहा है. नकद से दूर हटती अर्थव्यवस्था वित्तीय निवेशों (बॉन्ड, बीमा, शेयर, बैंक जमा) के लिए प्रोत्साहन और सोने व जमीन जैसे निवेशों पर सख्ती चाहती थी ताकि काले धन की खपत के रास्ते बंद हो सकें. लेकिन सोना सरकार का नूरे-नजर है. अचल संपत्ति जीएसटी से बाहर है और वित्तीय निवेशों पर टैक्स बढ़ गया है.

भारत में अधिकांश निजी संपत्ति भौतिक निवेशों में केंद्रित है. सोना और अचल संपत्ति इनमें प्रमुख हैं. क्रेडिट सुईस की ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट (2016) बताती है कि भारत में 86 फीसदी निजी संपत्ति सोना या जमीन में केंद्रित है, वित्तीय निवेश का हिस्सा 15 फीसदी से भी कम है. अमेरिका में लगभग 72, जापान में 53 और ब्रिटेन में 51 फीसदी निजी संपîत्ति शेयर, बैंक बचत, बॉन्ड, बीमा के रूप में हैं.

नोटबंदी का सबसे सार्थक अगला कदम यही होना चाहिए था कि लोगों को सोना और जमीन में निवेश की आदत छोडऩे और वित्तीय निवेश के लिए प्रेरित किया जाए. सोना और जमीन हर तरह की कालिख पचा लेते हैं जबकि वित्तीय निवेशों की निगरानी आसान है.

सोने-हीरे पर जीएसटी का पाखंड दूर से चमकता है. गोल्ड क्रोनिज्म और सोना बेचने-खरीदने वालों की राजनीति इतनी ताकतवर थी कि सोना, हीरा, जेवरों पर केवल तीन फीसदी जीएसटी लगाया गया. इन महंगी खरीदों को विशेष दर्जा देने के लिए जीएसटी की नई दर भी ईजाद की गई.

भारत में सोने की 80 फीसदी खपत केवल 20 फीसदी जनता तक केंद्रित है. इनमें बड़े खरीदार आबादी का दो फीसदी हैं यानी कि कम टैक्स का फायदा केवल दो फीसदी लोगों को मिलेगा.

जानना जरूरी है कि दवा पर सोने से चार गुना या 12 फीसदी और उपभोक्ता सामान पर छह से नौ गुना ज्यादा जीएसटी लगेगा. हमें भूलना नहीं चाहिए कि 2015 में सरकार गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम लाई थी. तब प्रधानमंत्री ने लोगों से सोने का मोह छोडऩे को कहा था.

यदि वह आह्वान सही था तो सोने पर अधिकतम जीएसटी लगना चाहिए था ताकि लोग सोना खरीदने की बजाए गोल्ड बॉन्ड में निवेश करने को प्रेरित होते. अलबत्ता न्यूनतम टैक्स के साथ जीएसटी ने सोने को निवेश का सबसे आकर्षक विकल्प बना कर नोटबंदी के संकल्प को सिर के बल खड़ा कर दिया है.

काले धन को खपाने का सबसे बड़ा स्रोत यानी अचल संपत्ति जीएसटी से बाहर है. अगर जीएसटी वित्तीय पारदर्शिता का सबसे बड़ा अभियान है, तो जमीन-मकान के सौदों के जीएसटी के दायरे में होना ही चाहिए था.

पूरे देश में अचल संपत्ति रजिस्ट्रेशन और सर्किल दरें एक समान बनाकर रियल एस्टेट का कॉमन नेशनल मार्केट बनाना जरूरी है. जमीन-मकान की हर खरीद-फरोख्त पर डिजिटल निगरानी के बिना काले धन के इस्तेमाल पर रोक नामुमकिन है. अचल संपत्ति प्रत्येक कारोबार में आर्थिक  लागत का हिस्सा है, इस पर टैक्स क्रेडिट क्यों नहीं होना चाहिए?

राज्यों ने राजस्व को सुरक्षित रखने की गरज से अचल संपत्ति को दागी सौदों का बाजार बनाए रखना मुनासिब समझा. असंगति देखिए कि मकानों की बिक्री पर सर्विस टैक्स है लेकिन जमीन-मकान के सौदे जीएसटी से बाहर रहेंगे.

जीएसटी में नोटबंदी के शीर्षासन की एक और तस्वीर मिलती है. इस क्रांतिकारीसुधार के बाद वित्तीय सेवाओं पर सर्विस टैक्स 15 से बढ़कर 18 फीसदी हो जाएगा यानी कि वित्तीय निवेश महंगा हो जाएगा. जीएसटी के बाद म्युचुअल फंड मैनेजमेंट चार्ज बढ़ जाएगा. बीमा पर जीएसटी भारी पड़ेगा. जीएसटी से शेयर ब्रोकरेज तो महंगा हो ही जाएगा.

नोटबंदी और जीएसटी दोनों एक ही टकसाल से निकले हैं.

लेकिन तय करना मुश्किल है कि नोटबंदी के मकसद ज्यादा पवित्र थे या फिर जीएसटी के उद्देश्य ज्यादा कीमती हैं?

या फिर सरकार में एक हाथ को दूसरे हाथ का पता ही नहीं है.