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Monday, February 7, 2011

बड़े मौके का बजट

अर्थार्थ
चहत्तर साल के प्रणव मुखर्जी इकसठ साल के गणतंत्र को जब नया बजट देंगे तब भारत की नई अर्थव्यवस्था पूरमपूर बीस की हो जाएगी। ... है न गजब की कॉकटेल। हो सकता है कि महंगाई को बिसूरते, थॉमसों, राजाओं और कलमाडि़यों को कोसते या सरकार की हालत पर हंसते हुए आप भूल जाएं कि अट्ठाइस फरवरी को भारत का एक बहुत खास बजट आने वाला है। बजट यकीनन रवायती होते हैं लेकिन यह बजट बड़े मौके का है। यह बजट भारत के नए आर्थिक इंकलाब (उदारीकरण) का तीसरा दशक शुरु करेगा। यह बजट नए दशक की पहली पंचवर्षीय योजना की भूमिका बनायेगा जो उदारीकरण के बाद सबसे अनोखी चुनौतियों से मुकाबिल होगी क्यों कि खेत से लेकर कारखानों और सरकार से लेकर व्या पार तक अब उलझनें सिर्फ ग्रोथ लाने की नहीं बल्कि ग्रोथ को संभालने, बांटने और बेदाग रखने की भी हैं। हम एक जटिल व बहुआयामी अर्थव्यवस्था हो चुके हैं, जिसमें मोटे पैमानों (ग्रोथ, राजकोषीय संतुलन) पर तो ठीकठाक दिखती तस्वी्र के पीछे कई तरह जोखिम व उलझने भरी पडी हैं। इसलिए एक रवायती सबके लिए सबकुछ वाला फ्री साइज बजट उतना अहम नहीं है जितना कि उस बजट के भीतर छिपे कई छोटे छोटे बजट। देश इस दशकारंभ बजट को नहीं बलिक इसके भीतर छिपे बजटों को देखना चाहेगा, जहां घाटा बिल्कुल अलग किस्म का है।
ग्रोथ : रखरखाव का बजट
वित्त मंत्री को अब ग्रोथ की नहीं बलिक ग्रोथ के रखरखाव और गुणवत्ता की चिंता करनी है। बीस साल की आर्थिक वृद्धि ऊंची आय, असमानता, असंतुलन, निवेश, तेज उतपादन, भ्रष्टाचार, उपेक्षा, अवसर यानी सभी गुणों व दुर्गुणों के साथ मौजूद है। मांग के साथ महंगाई मौजूद है और आपूर्ति के साथ बुनियादी ढांचे की किल्लत लागत चौतरफा बढ़ रही है और ग्रोथ की दौड़ मे पिछड़ गए कुछ अहम क्षेत्र आर्थिक वृद्धि की टांग खींचने लगे हैं। कायदे से वित्त मंत्री को महंगाई से निबटने का बजट ठीक करते नजर आना चाहिए। महंगाई भारत की ग्रोथ कथा में खलनायक बनने वाली है। इस आफत को  टालने के लिए खेती को जगाना जरुरी है। यानी कि इस बजट को पूरी तरह

Monday, November 29, 2010

नीतीश होने की मजबूरी

अर्थार्थ
वोटर रीझता है मगर सड़क से नहीं (जातीय) समीकरण से, विकास से नहीं (वोटों का) विभाजन से और काम से नहीं (व्यक्तित्व के) करिश्मे से! एक पराजित मुख्यमंत्री ने कुछ साल पहले ऐसा ही कहा था। यह हारे को हरिनाम था ? नहीं ! यह भारत में विकास की राजनीति के असफल होने का ईमानदार ऐलान था। नेता जी बज़ा फरमा रहे थे,भारत की सियासत तो जाति प्रमाण पत्रों की दीवानी है। विकास के सहारे बदलते आय (कमाई)प्रमाण पत्रों की होड़ उसे नहीं सुहाती। चुनावी गणित विकास के आंकड़ो से नहीं सधती, इसलिए ठोस आर्थिक विकास से सिंझाई गई राजनीति को हमने कभी चखा ही नहीं। भारत में सियासत अपनी लीक चलती है और विकास अपनी गति से ढुलकता है। सत्ता में पहुंच कर आर्थिक प्रगति दिखाने वालों का माल भी वोट की मंडी में कायदे से नहीं बिकता तो फिर विकास की राजनीति का जोखिम कौन ले? इसलिए आर्थिक विकास दलों के बुनियादी राजनीतिक दर्शन की परिधि पर टंगा रहता है। मगर इस बार कुछ हैरतअंगेज हुआ। जनता नेताओं से आगे निकल गई। पुरानी सियासत के अंधेरे में सर फोड़ती पार्टियों को, बिहार का गरीब गुरबा वोटर धकेल कर नई रोशनी में ले आया है। बिहार के नतीजे राजनीति को उसका बुनियादी दर्शन बदलने पर मजबूर कर रहे हैं। चौंकिये मत! राजनीति हमेशा मजबूरी में ही बदली है।
प्रयोग जारी है
भारत का प्रौढ़ लोकतंत्र,उदार अर्थव्यवस्था से रिश्ते को कई तरह से परख रहा है। पूरा देश राजनीतिक आर्थिक मॉडलों की विचित्र प्रयोगशाला है। राजनीतिक स्थिरता विकास की गारंटी है लेकिन बंगाल का वोटर अब विकास के लिए ही स्थिरता से निजात चाहता है। दूसरी तरफ लंबी राजनीतिक स्थिरता के सहारे राजस्थान चमक जाता है। गठजोड़ की सरकारें पंजाब में कोई उम्मीाद नहीं जगातीं लेकिन बिहार में वोटरों को भा जाती हैं। बड़े राज्यों में पहिया धीरे घूमता है मगर छोटे राज्य विकास का रॉकेट बनते भी नजर नहीं

Monday, August 30, 2010

जागते रहो!

अर्थार्थ
नजर उतारिए सरकार की, बड़ी हिम्मत दिखाई हुजूर ने, वरना तो लोकतंत्र में सरकारें बुनियादी रूप से दब्बू ही होती हैं। बात अगर बड़ी निजी कंपनियों की हो तो फैसले नहीं, समझौते होते हैं। वेदांत के मामले जैसी तुर्शी और तेजी तो बिरले ही दिखती है। नाना प्रकार के दबावों को नकारते हुए सरकार ने जिस तेजी से वेदांत को कानूनी वेदांत पढ़ाया, वह कम से कम भारत के लिए तो नया और अनोखा ही है और इस हिम्मत पर सरकार को विकास और विदेशी निवेश के वकीलों से जो तारीफ मिली, वह और भी महत्वपूर्ण है। इसे भारत में ऐसे सुधारों की शुरुआत मानिए, जिसका वक्त अब आ गया था। जरा खुद से पूछिए कि अब से एक दशक पहले क्या आप भारत में सरकारों से इस तरह की जांबाजी की उम्मीद कर सकते थे। तब तो सरकारें विदेशी निवेश की चिंता में सांस भी आहिस्ता से लेती थीं। वेदांत को सबक सरकारी तंत्र के भीतर सोच बदलने का सुबूत है और यह बदलाव सिर्फ वक्त के साथ नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे जन अधिकारों के नए पहरुए भी हैं और, माफ कीजिए, दंतेवाड़ा व पलामू भी।
वेदांत से शुरुआत
यूनियन कार्बाइड से लेकर वेदांत तक कंपनियों के कानून से बड़ा होने की ढेरों नजीरें हमारे इर्दगिर्द बिखरी हैं। इसलिए वेदांत पर सख्ती भारत के कानूनी मिजाज से कुछ फर्क नजर आती है। उड़ीसा सरकार तो आज भी मानने को तैयार नहीं है कि नियामगिरी में बॉक्साइट खोद रही वेदांत ने वन अधिकार, वन संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों के कानूनों को अपनी खदान में दफन कर दिया। अलुमिना रिफाइनरी की क्षमता (एक मिलियन टन से छह मिलियन टन) हवा में नहीं बढ़ जाती, जैसा कि लांजीगढ़ में वेदांत ने बगैर किसी मंजूरी के कर लिया। यह कैसे हो सकता है कि सरकारों को 26 हेक्टेयर वन भूमि पर अवैध कब्जा, पर्यावरण की बर्बादी या आदिवासियों के हकों पर हमला न दिखे। खनन कंपनियां तो वैसे भी अपनी मनमानी के लिए पूरी दुनिया

Monday, December 21, 2009

छोटे होने की जिद

तो फिर भारत का हर छोटा राज्य समृद्धि में बड़ा क्यों नहीं हो जाता? क्यों छोटे राज्य विशेष श्रेणी के दर्जे यानी केंद्रीय सहायता के मोहताज हैं? वित्तीय देनदारियों में डिफाल्टर होने का खतरा इन पर ही क्यों मंडराता है? इनके पास शानदार विकास और जानदार कानून व्यवस्था दिखाने वाला कोई चमकदार अतीत क्यों नहीं है? विकास के बेहद सीमित अवसर, चुनिंदा संसाधन व सीमित आर्थिक गतिविधियां क्यों इन राज्यों की नियति बन जाती हैं? इन सवालों से ईमानदारी के साथ आंख मिलाकर तो देखिए!.. छोटे राज्यों को लेकर होने वाले बड़े-बड़े आंदोलनों का तुक-तर्क आपको असमंजस में डाल देगा। छोटे राज्यों की पूरी बहस को यदि आर्थिक संदर्भो और बदले वक्त की रोशनी में खोला जाए तो हैरत में डालने वाले निष्कर्ष निकलते हैं। दुनिया के छोटे देश, अब तो बड़े भी, इस निर्दयी बाजार में साझी आर्थिक (यूरोपीय समुदाय, आसियान) किस्मत लिख रहे हैं, तब भारत में ऐसी राज्य इकाइयां बनाने की मांग उठती है जो आर्थिक कमजोरी व जोखिम के डीएनए के साथ ही पैदा होने वाले हैं।
अतीत किसे सिखाता है?
बहस पिछड़े इलाकों के आर्थिक विकास की ही है ना! मगर गैर आर्थिक तर्को पर बांटे गए राज्यों ने तो भारत को विकास की विसंगतियों का अजायबघर बना दिया है। 28 राज्यों वाले इस मुल्क में 13 राज्य छोटे हैं। इनमें आठ तो विशेष दर्जे वाले हैं, जिन्हें मजाक में विशेष खर्चे वाले राज्य कहा जाता है। केंद्रीय मदद और अनुदान पर निर्भर, क्योंकि अपनी अर्थव्यवस्था बैसाखी भी नहीं देती। पांच राज्य जो इस दर्जे से बाहर हैं, उनमें झारखंड गरीबी और भ्रष्टाचार का स्वर्ग है। छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा का और गोवा राजनीतिक अस्थिरता का। .. पंजाब और हरियाणा? जिज्ञासा लाजिमी है क्योंकि छोटे राज्यों के समर्थन की पूरी तर्क श्रृंखला को इन्हीं से ऊर्जा मिलती है। पंजाब व हरियाणा भारतीय कृषि के स्वर्ण युग की देन हैं। वक्त बदला तो खेती आधारित विकास का माडल उदारीकरण की आंधी में उखड़ गया। जैसे-जैसे देश के आर्थिक उत्पादन में खेती का हिस्सा घटा, आबादी बढ़ी, जोतें छोटी हुई, वैसे-वैसे पंजाब और हरियाणा मुश्किलों की गांठ बनते गए हैं। भारी घाटे, असंतुलित विकास व आय में अंतर और पलायन इनकी पहचान है। हरियाणा को खेतिहर जमीन गंवाकर कुछ उद्योग मिल भी गए, लेकिन पंजाब तो बड़े उद्योगों के मामले में छोटा ही रह गया। भाषाई पहचान के लिए बना पंजाब अतीत में पहचान की संकट का एक हिंसक आंदोलन झेल चुका है और खेती का यह स्वर्ग किसानों की आत्महत्या का नर्क भी रहा है। जबकि हरियाणा में अधिकांश जमीन मुट्ठी भर लोगों के पास है। नए हो या पुराने, छोटे राज्य न आंकड़ों में कोई करिश्मा करते दिखते हैं और न जमीन पर। झारखंड अगर प्रति व्यक्ति आय में देश में पांचवें नंबर पर है तो राज्य में गरीबी की रेखा से नीचे आने वाले 42 फीसदी का आंकड़ा इसकी चुगली खाता है। उत्तर पूर्व को सात छोटे राज्यों में बांटकर भी यहां विकास की तस्वीर नहीं बदली जा सकी।
विभाजन के जोखिम
कल्पना करिए कि अगर मौसम का बदलाव किसी छोटे राज्य में खेती का ढर्रा ही बदल दे (दुनिया के कुछ देशों में यह हो रहा है) या पर्यावरण के कानूनों के कारण खानें बंद करनी पड़ें या फिर वित्तीय कानूनों में बदलावों की वजह से राज्यों के लिए बाजार से कर्ज लेना मुश्किल हो जाए?.. कुछ भी हो सकता है! लेहमन की बर्बादी या दुबई के डूबने के बारे में किसने सोचा था? वित्तीय तूफानों में थपेड़े खा रही दुनिया मान रही है कि छोटा होना अब जोखिम को बुलाना है। इसलिए देश अपनी आर्थिक सीमाओं का एकीकरण कर रहे हैं भौगोलिक तौर पर एक भले ही न हों। पिछले साल की मंदी ने यूरोप के कई छोटे मुल्कों को बर्बाद किया था। भारत में पिछले दो साल की आर्थिक कमजोरी के मद्देनजर एक अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने कहा है कि केंद्र पर निर्भर छोटे राज्यों के लिए आने वाले साल बहुत मुश्किल हैं। कर कानूनों में एक फेरबदल भी छोटे राज्य की औद्योगिक तस्वीर बदल देता है। याद कीजिए कि दो साल पहले उत्तर पूर्व के राज्यों से जब केंद्र ने कर रियायतें वापस लीं तो उद्योग भी वापस चल दिए। छोटे राज्यों का झंडा उठाने वालों को कौन यह बताए कि अब बाजार में छोटा होना ज्यादा जोखिम भरा है। निवेशक स्वतंत्र हैं, बैंक अब साख देखते हैं। बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपने व्यापक आर्थिक आधार के कारण फिर भी बच जाती हैं, मगर छोटी तो एक झटके में निबट जाती हैं। आर्थिक अतीत गवाह है कि वेतन आयोग की सिफारिशों से लेकर आपदाओं तक जब भी बोझ बढ़ा है, छोटे राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं भूलोट हो गई हैं।
यह पहाड़ा ही उलटा है
विशालता या राजधानी से भौगोलिक दूरी के कारण कोई प्रदेश या प्रदेश का हिस्सा उपेक्षित नहंी होता। इस तर्क पर उत्तर पूर्व और लद्दाख कुछ भी सोच सकते हैं। विकास में उपेक्षा की वजह सिर्फ राजनीतिक है। दूरी का तर्क तो अब हास्यास्पद है क्योंकि सूचना तकनीक के विकास के बाद एक राज्य का मुख्यमंत्री (अगर चाहे तो) राजधानी में बैठकर सुदूर जिले के डीएम से आंख में आंख डालकर विकास के सवाल कर सकता है। विकास के इस उलटे पहाड़े ने कई बार पेचीदा जनसंख्या प्रवास को भी जन्म दिया है। जातीय या क्षेत्रीय पहचान के सवाल अक्सर सक्षम मानव संसाधनों को एक राज्य की सीमा में बांध (उस राज्य विशेष के लोग बाहर से आकर वापस बसते हैं और गैर राज्य के लोग बाहर का रुख करते हैं) देते हैं या फिर बाहर रोक देते हैं। क्योंकि राज्य का बंटवारा ही मूल निवासियों को प्रमुखता देने के तर्क पर होता है, इसलिए प्रवासियों की उम्मीदें खत्म हो जाती हैं। यही वजह है कि छोटे राज्यों में उत्पादक गतिविधियां बहुआयामी नहीं हो पातीं।राजनीति की उम्र हमेशा दिनों व हफ्तों में होती है, जबकि आर्थिक विकास को वर्षो तपना पड़ता है। तेजी से बदलते बाजार और बिल्कुल नए किस्म की उलझनों ने दुनिया के सारे आर्थिक सिद्धातों को पलट दिया है। छोटे राज्यों में बस इतना फायदा जरूर है कि जो नेता कभी सामूहिक और व्यापक जनाधार की राजनीति नहीं कर सकते, उनकी सत्ताकांक्षाएं ये राज्य पूरी कर देते हैं, मगर इससे विकास के सवाल कहां हल होते हैं? छोटे राज्यों की बहस को नए संदर्भो में एक बार फिर परखना चाहिए? तर्कों व तथ्यों पर आधारित बहस में न बसें जलती हैं और न शहर थमते हैं, बल्कि काम के निष्कर्ष जरूर निकल आते हैं।