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Saturday, September 7, 2019

मंदी के आर-पार


मंदी या लंबी आर्थिक गिरावट सिर्फ इसलिए बुरी नहीं होती कि वह हमें तोड़ देती है बल्कि ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह हमें किस हाल में ले जाकर छोड़ देती हैअठारह महीने से जारी यह मंदी कब थमेगीइसके संकेत मिलने अभी बाकी हैंअगली तिमाही और मुश्किल भरी हो सकती है लेकिन मंदी से उबरने तक भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कमोबेश हमारा साथ छोड़ चुकी होगी.

·     मोबाइल नेटवर्क चाहे जितने घटिया हों लेकिन अगले कुछ माह में हमें शायद दो कंपनियों में एक को चुनना होगाबीएसएनल की बीमारी लाइलाज हो चुकी हैमंदी के बीच वोडाफोन-आइडिया संकट में है यानी कि टेलीकॉम सेवा में प्रतिस्पर्धा आखिरी सांसें ले रही है.
·     स्मार्ट फोन के बाजार में भी बहुत से विकल्प नहीं रहेंगेवहां भी चीन और कोरिया की दो कंपनियां करीब 50 फीसदी बाजार हिस्सा कब्जा चुकी हैंदेशी कंपनियां किसी गिनती में नहीं रहीं.

·     पिछले सात साल में सबसे बुरा वक्त देख रहे विमानन उद्योग में जेट एयरवेज की विदाई के बाद अब प्रतिस्पर्धा सिर्फ दो कंपनियों के बीच सिमट गई है.

·     2015 में एक दर्जन से अधिक ई-कॉमर्स कंपनियां भारत में हंस खेल रही थीं लेकिन अब पूरा रिटेल (ऑनलाइन और स्टोरबाजार अब पूरी तरह दो अमेरिकी कंपनियों के पास चला गया हैअमेरिकी ग्लोबल रिटेल स्टोर दिग्गज वालमार्ट ने फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण के साथ खुद को ई-कॉमर्स में स्थापित कर लिया तो ई-कॉमर्स की सुल्तान अमेरिकी कंपनी अमेजन ने भारतीय रिटेल दिग्गज फ्यूचर ग्रुप में हिस्सेदारी खरीद ली हैअब रिटेल बाजार वालमार्ट बनाम अमेजन में बदल गया है.

·     बीते बरस सितंबर में सेबी के चेयरमैन इस बात पर फिक्रमंद थे कि भारत के म्युचुअल फंड बाजार केवल चार कंपनियां या फंड 47 फीसदी निवेश क्यों संभाल रहे हैं जबकि (ऐसेट मैनेजमेंटकंपनियां तो 38 हैंशेयर बाजार में ताजा गिरावट के बाद तो अब दो या तीन खिलाड़ी ही बचेंगे.

भारतीय बाजार पहले से ही एकाधिकारों और कंपनियों की मिलीभगत का दर्द झेल रहा हैकोयलापेट्रो ईंधनबिजली ग्रिडबिजली उत्पादन जैसे बड़े क्षेत्रों में सरकार का एकाधिकार हैइंडियन ऑयल जल्द ही भारत पेट्रोलियम का अधिग्रहण कर लेगी यानी कि पेट्रो उद्योग में प्रतिस्पर्धा और सिमट जाएगीस्टीलदुपहिया वाहनप्लास्टिकएल्युमिनियमट्रक और बसेंकार्गोरेलवेसड़क परिवहनकई प्रमुख उपभोक्ता उत्पाद सहित करीब एक दर्जन उद्योगों या सेवाओं में एक से लेकर तीन कंपनियां (निजी या सरकारीकाबिज हैं.

लंबी खिंचती मंदी प्रतिस्पर्धा के लिए सबसे बड़ी सजा का ऐलान हैमंदी से लड़ने के तरीके बहुत सीमित हैंउद्योग सरकार से मदद की उम्मीद करते हैं लेकिन जब सरकार के पास खर्च बढ़ाने या टैक्स घटाने के मौके नहीं (जैसा कि अब हैहोते तो उद्योगों के पास कीमत कम करने का आखिरी विकल्प बचता हैत्योहारी मौसम के मद्देनजर देश में यह आखिरी कोशिश शुरू हो रही है.

मगर ठहरिएकीमतें कम होने से हालात बदल नहीं जाएंगेयहां से एक दुष्चक्र शुरू होने का खतरा हैयह मंदी कीमतें ऊंची होने की वजह से नहीं हैमहंगाई रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर पर हैजीएसटी कम हुआ हैमंदी तो आय न बढ़ने के कारण हैलोगों के पास बचत नहीं हैइसलिए खपत नहीं बढ़ी.

दुनिया के अन्य बाजारों के तजुर्बे बताते हैं कि मंदी के दौर में जब कंपनियां कीमत घटाती हैं तो सिर्फ बड़ी कंपनियां इस होड़ में टिक पाती हैंक्योंकि मंदी के बीच कीमत घटाकर उसका असर झेलने की क्षमता सभी कंपनियों में नहीं होतीटेलीकॉम इसका उदाहरण हैजहां कीमतें कम होने से कंपनियां ही मर गईं.
पिछले छह-सात वर्षों मेंभारतीय बाजार में प्रतिर्स्धा सिकुड़ गई हैविदेशी कंपनियों के आक्रामक विलयअधिग्रहण और कर्ज के कारण बड़े पैमाने पर कंपनियां बंद हुई हैंनोटबंदीजीएसटी ने मझोली कंपनियों को सिकोड़कर स्थानीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा को भी सीमित कर दियाजिसकी वजह से कई लोकल ब्रांड खेत रहे.

कहते हैं कि मंदी के बाद अमेरिकी पूंजीवाद को वापस लौटने में पांच दशक लग गएभारत भी जब इस मंदी से उबरेगा तो यहां कई क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा सिमट चुकी होगीकंपनियां हमेशा एकाधिकार चाहती हैंगूगल-फेसबुक वाली नई दुनिया तो वैसे ही एकाधिकार से परेशान है.

कंपनियों के एकाधिकार सरकारों के लिए भी मुफीद होते हैं क्योंकि राजनीति-कॉर्पोरेट गठजोड़ आसानी से चलता हैलाइसेंस परमिट राज में यही तो होता थालेकिन इस पर सवाल उठाने होंगेक्योंकि अर्थव्यवस्था को खुली होड़ चाहिएसीमित प्रतिस्पर्धा वाले क्षेत्रों में नई कंपनियों के प्रवेश की नीति जरूरी हैपांच-छह बड़ी और असंख्य छोटी कंपनियां हर क्षेत्र में होनी ही चाहिएइससे निवेश आएगा और रोजगार भी.

हैरत नहीं कि प्रसिद्ध कारोबारी बोर्ड गेम ‘मोनोपॉली’ (भारत में व्यापारअमेरिका की महामंदी के दौरान सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ थाबेकारी के दौर में लोग खेल वाले नोटों की अदला-बदली से समय काटते थे और कृत्रिम कारोबार खरीदते-बेचते थेअगर हम नहीं चेते तो बड़ी कंपनियां मंदी की बिसात पर यह खेल शुरू कर देंगीजिसकी कीमत हम रोजगार में कमीखराब सेवाएं और घटिया उत्पाद खरीद कर चुकाएंगे.

Saturday, March 23, 2019

इस तरह आई बेरोजगारी


भारत में बेरोजगारी क्या कल पैदा हुई है? ट्रक भर आंकड़े उपलब्ध हैं कि अवसरों और हाथों में फर्क हमेशा रहा है. फिर अचानक बेरोजगारी का आसमान क्यों फट पड़ा?

जुमलेबाजी से निकलकर हमें वहां पहुंचना होगा जहां आंकड़े और अनुभव एक दूसरे का समर्थन करते हैं और बताते हैं कि बेरोजगारी का ताजा सच सरकार के हलक में क्यों फंस गया है.

कई दशकों में पिछले पांच साल का वक्त शायद पहला ऐसा दौर है जब सबसे अधिक रोजगार खत्म हुए यानी नौकरियों से लोग निकाले गए. रोजगार की कमी तो पहले से थी लेकिन उसके अभूतपूर्व विनाश ने दोहरी मार की. इससे ही निकले हैं वे आंकड़े जिन्हें नकारकर सरकार ने रेत में सिर घुसा लिया है.

¨    2017-18 में बेकारी की दर 6.1 फीसदी यानी 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर: एनएएसओ (सरकारी एजेंसी) 
¨    फरवरी 2019 में बेकारी की दर 7.2 फीसदी के रिकॉर्ड पर: सीएमआइई (प्रतिष्ठित निजी एजेंसी)                                 

   रोजगार ध्वंस के परिदृश्य को समझने के लिए कुछ बुनियादी आंकड़े पकडऩे होंगे.

- - कम ही ऐसा होता हैजब किसी देश में बेरोजगारी की दर आर्थिक विकास दर के इतने करीब पहुंच जाए. मोदी सरकार के तहत देश की औसत विकास दर 7.6 फीसद रही और बेकारी की दर 6.1 फीसद (यूपीए शासनकाल में बेकारी दर 2 फीसदी थी और विकास दर 6.1 फीसद)

- -     आंकड़े ताकीद करते हैं कि भारत में बेकारी की दर 15 से 20 फीसद तक हो सकती है क्योंकि औसतन 40 फीसद कामगार मामूली पगार यानी औसतन 10-11000 रु. प्रति माह वाले हैं.

-   भारत में ग्रामीण मजदूरी की दर चार साल के न्यूनतम स्तर पर है.

      आर्थिक उदारीकरण के बाद यह शायद पहला ऐसा काल खंड है जब संगठित और असंगठित, दोनों क्षेत्रों में एक साथ बड़े पैमाने पर रोजगार खत्म हुए.

       संगठित क्षेत्र यानी बड़ी कंपनियों में नौकरियों के कम होने की वजहें थीं मंदी और मांग में कमी, कर्ज में डूबी कंपनियों का बंद होना और नीतियों में अप्रत्याशित फेरबदल. मसलन, 
- -        बैंक कर्ज में फंसी कंपनियों के लिए बने दिवालिया कानून के तहत जितने मामले सुलझे हैं उनमें से 80 फीसद (212 कंपनियां) बंद हुई हैं. केवल 52 कंपनियों को नए ग्राहक मिले हैं लेकिन नौकरियां वहां भी छंटी हैं.

- -   दूरसंचार क्षेत्र में अधिकांश कंपनियों ने कारोबार समेट लिया या विलय (आइडिया-वोडाफोन, भारती-टाटा टेली) हुए, जिससे 2014 के बाद हर साल 20-25 फीसद लोगों की नौकरियां गईं. उद्योग का अनुमान है कि करीब दो लाख रोजगार खत्म हुए. 

- -     स्वदेशी के दबाव में सरकार ने ई-कॉमर्स कंपनियों को डिस्काउंट देने से रोक दिया. फंडिंग बंद हुई और 2015 के बाद से छंटनी शुरू हो गई. अधिकांश बड़े स्टार्टअप बंद हो चुके हैं या उनका अधिग्रहण हो गया है.

- -      सॉफ्टवेयर उद्योग में मंदी, तकनीक में बदलाव, अमेरिका में आउटसोर्सिंग सीमित होने के कारण बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म हुईं. इनमें दिग्गज कंपनियां भी शामिल हैं.

- -    बैंक‌िंग में मंदी, बकाया कर्ज में फंसे बैंकों के विस्तार पर रोक के कारण रोजगार खत्म हुए.

- -   पिछले पांच साल में कई उद्योगों में अधिग्रहण (फार्मास्यूटिकल), मंदी और पुनर्गठन (भवन निर्माण, बुनियादी ढांचा) या सस्ते आयात की वजह से रोजगारों में कटौती हुई है.

- -  2015 तक एक दशक में संगठित क्षेत्र की सर्वाधिक नौकरियां कंप्यूटर, टेलीकॉम, बैंक‌िंग सेवाएं, ई-कॉमर्स, कंस्ट्रक्शन से आई थीं. इनमें बेरोजगारी के अनुभवों और छंटनी की सार्वजनिक सूचनाओं की कोई किल्लत नहीं है.

अब असंगठित क्षेत्र, जो भारत में लगभग 85 फीसदी रोजगार देता है. मुस्कराते हुए नोटबंदी (95 फीसदी नकदी की आपूर्ति बंद) और घटिया जीएसटी थोपने वाली सरकार को क्या यह पता नहीं था कि
  भारत में कुल 585 लाख कारोबारी प्रतिष्ठान हैं, जिनमें 95.5 फीसद में कर्मचारियों की संख्या पांच से कम है: छठी आर्थिक जनगणना 2014
     कुल 1,91,063 फैक्ट्री में से 75 फीसद में कामगारों की संख्या 50 से कम है: एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज (2015-16) 

नोटबंदी से बढ़ी बेकारी के कई नमूने हैं. मिसाल के तौर पर, मोबाइल फोन उद्योग के मुताबिक, नोटबंदी के बाद मोबाइल फोन बेचने वाली 60 हजार से ज्यादा दुकानें बंद हुईं. छोटे कारोबारों में 35 लाख (मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन सर्वे) और पूरी अर्थव्यवस्था में अक्तूबर, 2018 तक कुल 1.10 करोड़ रोजगार खत्म (सीएमआइई) खत्म हुए हैं.

इस हालत में नए रोजगार तो क्या ही बनते, दुनिया की सबसे तेज दौड़ती अर्थव्यवस्था हालिया इतिहास की सबसे भयानक बेरोजगारी से इसलिए जूझ रही है क्योंकि देखते-देखते सरकार के सामने पांच साल में सर्वाधिक रोजगार खत्म हुए और सरकारी एजेंसियां आंकड़े पकाने में लगी रहीं.



Monday, September 10, 2018

बाजार बीमार है !


सेबी के चेयरमैन म्युचुअल फंड उद्योग की बैठक में मानो आईना लेकर गए थे. यह उद्योग अब 23.5 लाख करोड़ रुपए (2013 में केवल 5 लाख करोड़ रु.) की निवेश संपत्तियों को संभालता है. इस उत्सवी बैठक में सेबी अध्यक्ष ने पूछा, इस कारोबार में केवल चार म्युचुअल फंड 47 फीसदी निवेश क्यों संभाल रहे हैं जबकि (एसेट मैनेजमेंट) कंपनियां तो 38 हैं. 
कारोबार तो बढ़ा पर प्रतिस्पर्धा क्यों नहीं बढ़ी?
नियामकों को ठीक ऐसे ही सवाल पूछने चाहिए. 
लेकिन टीआरएआइ चेयरमैन ने यही सवाल टेलीकॉम कंपनियों से क्यों नहीं पूछा जहां प्रतिस्पर्धा घिसते-घिसते तीन ऑपरेटरों तक सीमित हो गई है. कभी हर सर्किल में तीन ऑपरेटर थे. अब 135 करोड़ के देश में तीन मोबाइल कंपनियां हैं.  

क्या पेट्रोलियम मंत्रालय यह पूछेगा कि पूरा बाजार तीन सरकारी पेट्रोल कंपनियों के पास ही क्यों है?

2015 में एक दर्जन से अधिक ई-कॉमर्स कंपनियों से गुलजार भारत का बाजार अब पूरी तरह दो अमेरिकी कंपनियों के पास चला गया है. सबसे बड़े ई-रिटेलर फ्लिपकार्ट को अमेरिकी ग्लोबल रिटेल दिग्गज वालमार्ट ने उठा लिया. अब वालमार्ट का मुकाबला ई-कॉमर्स बाजार की सबसे बड़ी कंपनी अमेजन से है जो भारत में पहले से है. यानी देसी ई- कॉमर्स कंपनियों का सूर्य डूब रहा है.
क्या भारत की मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था एडिय़ां रगडऩे लगी है?

प्रतिस्पर्धा जमने से पहले ही बेदखल होने लगी है?

नए बाजारवादी एकाधिकार उभर रहे हैं?

क्या बाजार चुनिंदा हाथों में केंद्रित हो रहा है?

दरअसल, जो सेबी चेयरमैन ने म्युचुअल फंड उद्योग से पूछा, अगर उसका विस्तार किया जाए तो ऊपर लिखे सच को स्वीकारना होगा.
क्या सरकार बताना चाहेगी कि ऐप आधारित टैक्सी सेवा में केवल दो ही कंपनियां क्यों हैं? जेट एयरवेज अगर बीमार हुई तो विमान सेवाओं के अधिकांश बाजार पर तीन (दो निजी, एक सरकारी) कंपनियों का एकाधिकार हो जाएगा! 

स्टील, दुपहिया वाहन, प्लास्टिक रॉ मटीरियल, एल्युमिनियम, ट्रक और बसें, कार्गो, रेलवे, कोयला, सड़क परिवहन, तेल उत्पादन, बिजली वितरण, कुछ प्रमुख उपभोक्ता उत्पाद सहित करीब एक दर्जन प्रमुख क्षेत्रों का अधिकांश बाजार एक से लेकर तीन कंपनियों (निजी या सरकारी) के हाथ में केंद्रित है. केवल कार, कंप्यूटर, फार्मास्यूटिकल्स, मोबाइल का बाजार ही ऐसा है जहां पर्याप्त प्रतिस्पर्धा दिखती है.
उदारीकरण के करीब दो दशक बाद प्रतिस्पर्धा बढऩे, मंदी के झटके, नई तकनीकों की आमद, नए अवसरों की तलाश और पूंजी की कमी से बाजार में पुनर्गठन शुरू हुआ. कंपनियों के अधिग्रहण और विलय हुए. वोडाफोन-आइडिया, वालमार्ट-फ्लिपकार्ट, अडानी-रिलायंस एनर्जी, मिंत्रा-जबांग, एमटीएस-रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस-एयरसेल, कोटक-बीएसएस माइक्रोफाइनांस, फ्लिपकार्ट-ई बे, बिरला कॉर्प-रिलायंस सीमेंट... फेहरिस्त लंबी है.

2017 में भारत में 46.5 अरब डॉलर के निवेश से कंपनियां बेची और खरीदी गईं. यह विलय व अधिग्रहण अगले साल 53 अरब डॉलर से ऊपर निकल जाएगा.

बैंक कर्ज में फंसी कंपनियों की बिक्री और बंदी भी प्रतिस्पर्धा को मार रही है. करीब 34 निजी बिजली कंपनियां कर्ज में दबी हैं. कर्ज की वसूली उन्हें बंदी या बिक्री के कगार पर ले आएगी. यानी बिजली बाजार में भी कुछ ही कंपनियां ही बचेंगी.

प्रतिस्पर्धा कम होने से मोबाइल सेवाओं, स्टील, ई-कॉमर्स, विमानन में रोजगार में खासी कमी आई है. उपभोक्ताओं पर मनमानी या खराब सेवाएं थोपी जा रही हैं. प्रतिस्पर्धा की कमी से कई उत्पादों में नए प्रयोग भी सीमित हो रहे हैं. 

मुक्त बाजार में सरकारों और नियामकों की जिम्मेदारी होती है कि वे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाएं, नई कंपनियों के प्रवेश का रास्ता खोलें, कार्टेल और एकाधिकार समाप्त करें. 

गूगल-फेसबुक वाली नई दुनिया की सबसे ताजा चिंता बाजार पर निजी एकाधिकार हैं. अमेरिका की 100 प्रमुख कंपनियां देश की आधी अर्थव्यवस्था पर काबिज हैं. 1955 में अमेरिका की अर्थव्यवस्था में  फॉच्र्यून 500 कंपनियों का हिस्सा 35 फीसदी था, आज यह 72 फीसदी है.

ताकत और अवसरों का केंद्रीकरण राजनीति और बाजार, दोनों जगह खतरनाक है. लोकतंत्र में सरकार और बाजार को एक दूसरे की यह ताकत तोड़ते रहना चाहिए लेकिन अब तो राजनीति (सरकार) बाजार में एकाधिकारों को पोस रही है और बदले में बाजार राजनीति को सर्वशक्तिमान बना रहा है. यह गठजोड़ हर तरह की आजादी के लिए, शायद सबसे बड़ा खतरा है.

Wednesday, July 27, 2016

अधूरे सुधारों का अजायबघर



भारत के आर्थिक सुधार अधूरी कोशिशों का  शानदार अजायबघर हैं. 

शुरुआत अच्छी हो तो समझ लीजिए कि आधा रास्ता पार. कहावत ठीक है बशर्ते इसे भारत के आर्थिक सुधारों से न जोड़ा जाए. भारत के आर्थिक सुधार अधूरी कोशिशों का  शानदार अजायबघर हैं. उदारीकरण की रजत जयंती पर बेशक हमें फख्र होना चाहिए कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा मुल्कों में है जिसने ढाई दशक में अभूतपूर्व और अद्भुत उपलब्धियां हासिल की हैंजो बढ़ी हुई आयसेवाओंतकनीकोंउत्पादोंसुविधाओं की शक्ल में हमारे आसपास बिखरी हैं और इन सुधारों की कामयाबी की गारंटी देती हैं. लेकिन इसके बावजूद आर्थिक सुधारों की बड़ी त्रासदी इनका अधूरापन हैजो अगर नहीं होता तो हमारे फायदे शायद कई गुना ज्यादा होते और असंगतियां कई गुना कम.
सबसे नए उदारीकरण से शुरू करते हैं. इसी जून में मोदी सरकार ने महत्वाकांक्षी और दूरगामी उड्डयन (एविएशन) नीति जारी की और इसके ठीक बाद विमानन क्षेत्र में विदेशी निवेश के नियम भी उदार किए गए. यह दोनों ही फैसले आधुनिकता और साहस के पैमानों पर उत्साहवर्धक थेक्योंकि नई नीति के तहत सरकार ने भारतीय विमानन कंपनियों के लिए विदेशी उड़ानों के दकियानूसी नियमों को बदल दिया था और दूसरी तरफ विदेशी विमान कंपनियों के लिए बाजार खोलने की हिम्मत दिखाई थी. लेकिन इसके बाद भी यह सुधार अधूरा ही रह गया.
नई उड्डयन नीति का अधूरापन इसलिए और ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में विमानन क्षेत्र का उदारीकरण 1990 में प्रारंभ हुआ. 1994 की ओपन स्काई नीति और विमान सेवा में सरकारी कंपनियों (एयर इंडिया) के एकाधिकार की समाप्ति के बाद तेजी आई लेकिन 26 साल के तजुर्बों के बावजूद नई विमानन नीति में इस क्षेत्र के समग्र उदारीकरण की हिम्मत नजर नहीं आई. कई नीतियों के सफर के बावजूद विमानन क्षेत्र को अभी कुछ और नीतियों का इंतजार करना होगा.
ऊर्जा और बिजली क्षेत्र असंगतियों का शानदार नमूना है. निजी कंपनियों को बिजली उत्पादन की इजाजत 1992 में (इंडिपेंडेंट पॉवर प्रोड्यूसर्स नीति) और उत्पादक इस्तेमाल (कैप्टिव) के लिए कोयला निकालने की छूट 1993 में मिल गई थी. नब्बे के दशक में राज्य बिजली बोर्डों के पुनर्गठन और 2000 के दशक में नए बिजली कानून सहित कई कदमों के बावजूद बिजली सुधार पूरे नहीं हुए. इसी दौरान सरकार ने कोयला क्षेत्र में विदेशी निवेश की गति तेज की और कैप्टिव खदानों का आवंटन-घोटाले-पुनर्आवंटन हुए.
ऊर्जा नीतियों में तमाम फेरबदल के बावजूद बिजली और ऊर्जा सुधार अधूरे उलझे और पेचीदा रहे. सरकार ने उत्पादन का निजीकरण तो किया लेकिन बिजली वितरण अधिकांशतः सरकारी नियंत्रण में रहा. सरकारें बिजली दरें तय करने की राजनीति छोडऩा नहीं चाहती थींइसलिए बिजली क्षेत्र में नियामक खुलकर काम नहीं कर सके. दूसरी तरफ बिजली उत्पादन में निजी निवेश के बावजूद सरकार ने कोयला खनन अपने नियंत्रण में रखा. इन अजीब असंगतियों के चलते भारत का ऊर्जा क्षेत्र विवादोंघोटालों और घाटों का पुलिंदा बन गया. 1990 में बिजली बोर्ड घाटे में थे और राज्यों के बिजली वितरण निगम आज भी घाटे में हैंजिन्हें पिछले 25 साल में तीन पैकेज मिल चुके हैं. तीसरा पैकेज उदय हैजो मोदी सरकार लेकर आई है. बिजली का उत्पादन व आपूर्ति बढ़ी है लेकिन कोयला व बिजली वितरण के क्षेत्र में अधूरे सुधारों के कारण असंगतियां और ज्यादा बढ़ गई हैं.
दूरसंचार सुधारों का किस्सा भी जानना जरूरी हैजो लगभग हर दूसरे साल किसी नीतिगत बदलाव के बावजूद आज तक नतीजे पर नहीं पहुंच सके. 1993 में मोबाइल सेवा की शुरुआत से लेकर, 1995 में कंपनियों को लाइसेंस फीस से माफीटीआरएआइ का गठनसीडीएमए सेवा, 2जी लाइसेंसविदेशी निवेश का उदारीकरण, 3जी सेवा, 2जी घोटालानए स्पेक्ट्रम आवंटन और 4जी तक दूरसंचार सुधारों का इतिहास रोमांच से भरा हुआ है.
इस उदारीकरण का मकसद बाजार में पर्याप्त प्रतिस्पर्धा लाना और उपभोक्ताओं को आधुनिक व सस्ती सेवा देना था लेकिन दूरसंचार सुधारों को सही क्रम नहीं दिया जा सका. सुधारों के अधूरेपन व तदर्थवाद का नतीजा है कि स्पेक्ट्रम घोटालों के बावजूद सरकारें पारदर्शी स्पेक्ट्रम आवंटन नीति नहीं बना सकीं. टीआरएआइ एक सफल व पारदर्शी नियामक बनने में असफल रहाइसलिए 2जी से 4जी तक आते-आते बाजार में प्रतिस्पर्धा (ऑपरेटरों की संक्चया घटी) सीमित रह गई. सेवा की गुणवत्ता बिगड़ी है और सेवा दरें महंगी हो गई हैं.
खुदरा कारोबार के उदारीकरण को चौथे उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं जिसकी शुरुआत 1997 में कैश ऐंड कैरी में शत प्रतिशत विदेशी निवेश के साथ हुई थी. 2000 के दशक में सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी और मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआइ खोला गया लेकिन सियासी ऊहापोह के कारण सुधार पूरी तरह लागू नहीं हो सके. इस बीच सरकार ने हाल में ही ई-कॉमर्स और फूड रिटेल में शत प्रतिशत विदेशी निवेश खोल दिया. कागजों पर पूरा रिटेल क्षेत्र विदेशी निवेश के लिए खुला हैलेकिन प्रक्रियागत उलझनों व राजनैतिक असमंजस के चलते निवेश नदारद है.
अधूरेअनगढ़ और असंगत सुधारों के कारणन चाहते हुए भी भारत में ऐसी अर्थव्यवस्था बन गई है जिसमें खुलेपन के फायदे चुनिंदा हाथों तक सीमित हैं और बाजार का स्वस्थ और समानतावादी विस्तार कहीं पीछे छूट गया. इस खुले बाजार में अवसर बांटने वाली ताकत के तौर पर सरकार आज भी मौजूद है जबकि अवसर लेने की होड़ में लगी कंपनियां कार्टेलनेताओं से गठजोड़ और भ्रष्टाचार से इस उदारीकरण को आए दिन दागी करती हैं.

ब्रिटिश कवि जॉन कीट्स कहते थे कि अच्छी शुरुआत से आधा काम खत्म नहीं होता. दरअसल जब तक आधा रास्ता न मिल जाए तक अच्छी शुरुआत का दावा ही नहीं करना चाहिए. आर्थिक सुधारों ने भारत को बड़ी नेमतें बख्शी हैं लेकिन सुधारों के तलवे में अधूरेपन का एक बड़ा कांटा चुभा है जो एक स्वस्थ देश को हमेशा लंगड़ा कर चलने पर मजबूर करता है. काश हम यह कांटा निकाल सकते!