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Monday, February 7, 2022

क्‍या से क्‍या हो गया !

 




महंगाई का आंकड़ा चाहे जो कलाबाजी दिखाये लेकिन क्‍या आपने ध्‍यान दिया है कि बीते छह सात सालों से इलेक्‍ट्रानिक्‍स, बिजली के सामान,आटो पुर्जों और भी कई तरह जरुरी चीजें लगातार महंगी होती जा रही हैं.

यह महंगाई पूरी तरह  प्रायोज‍ित है और नीतिगत है. भारत की सरकार जिद के साथ महंगाई का आयात कर रही है यानी इंपोर्टेड महंगाई हमें बुरी तरह कुचल रही है. आने वाले बजट में एक बार फिर कई चीजों पर कस्‍टम ड्यूटी बढाये जाने के संकेत हैं. इनमें स्‍टील और इलेक्‍ट्रानिक्‍स यानी पूरी की पूरी सप्‍लाई चेन महंगी हो सकती है.

यह चाबुक हम पर क्‍यों चल रहा है ,बजट से पहले इसे समझना बहुत जरुरी है.

नई  पहचान

भारत की यह नई पहचान परेशान करने वाली है.  भारत को व्‍यापार‍िक दरवाजे बंद करने वाले, आयात शुल्‍क बढ़ाने वाले और संरंक्षणवादी देश के तौर पर संबोध‍ित कि‍या जा रहा है. देशी उद्योगों के संरंक्षण के नाम पर भारत की सरकार ने 2014 से कस्‍टम ड्यूटी बढ़ाने का अभि‍यान शुरु कर दिया था. इस कवायद से कितनी आत्‍मनिर्भरता आई इसका कोई हिसाब सरकार ने नहीं दिया अलबत्‍ता भारत सरकार की इस  कच्‍छप मुद्रा, छोटे  उद्येागों का कमर तोड़ दी और अब उपभोक्‍ताओं का जीना मुहाल कर रही है

2022 के बजट दस्‍तावेज के मुताबिक एनडीए सरकार ने बीते छह बरस में भारत के करीब एक तिहाई आयातों यानी टैरिफ लाइन्‍स पर बेसिक कस्‍टम ड्यूटी बढ़ाई . यानी करीब 4000 टैरिफ लाइंस पर सीमा शुल्‍क बढ़ा या उन्‍हें महंगा किया गया. टैरिफ लाइन का मतलब वह सीमा शुल्‍क दर जो किसी एक या अध‍िक सामानों पर लागू होती है.

इस बढ़ोत्‍तरी का नतीजा था कि उन देशों से आयात बढ़ने लगा जिनके साथ भारत का मुक्‍त व्‍यापार समझौता है या फिर व्‍यापार वरीयता की संध‍ियां है. सरकार ने और सख्‍ती की ताकि संध‍ि वाले इन देशों के रास्‍ते अन्‍य देशों का सामान  न आने लगे. करीब 80 सामानों पर कस्‍टम ड्यूटी रियायत खत्‍म की गई और 400 से अध‍िक अन्‍य सीमा शुल्‍क प्रोत्‍साहन रद कर दिये गए.

डब्लूटीओ की रिपोर्ट के अनुसार 2019 तक भारत में औसत सीमा शुल्‍क या कस्‍टम ड्यूटी दर 17.6 फीसदी हो गई थी जो कि 2014 में 13.5 फीसदी थी. जब ट्रेड वेटेड एवरेज सीमा शुल्‍क जो 2014 में केवल 7 फीसदी था वह 2018 में बढ़कर 10.3 फीसदी हो गया. ट्रेड वेटेड औसत सीमा शुल्‍क की गणना के ल‍िए क‍िसी देश के कुल सीमा शुल्‍क राजस्‍व से उसके कुल आयात से घटा दिया जाता है.

भारत के महंगा आयात अभ‍ियान का पूरा असर समझने के लिए कुछ और भीतरी उतरना होगा. डब्‍लूटीओ के तहत सीमा शुल्‍क दरों के दो बड़े वर्ग हैं एक है एमएफएन टैरिफ यानी वह रियायती दर जो डब्लूटीओ के सदस्‍य देश एक दूसरे से व्‍यापार पर लागू करते हैं. यही बुनियादी डब्‍लूटीओ समझौता था. दूसरी दर है बाउंड टैरिफ जिसमें किसी देश अपने आयातों को अध‍िकतम आयात शुल्‍क लगाने की छूट मिलती है, चाहे वह आयात कहीं से हो रहा है. भारत के बाउंड टैरिफ सीमा शुल्‍क दर बढ़ते बढ़ते 2018 में  48.5 फीसदी की ऊंचाई पर पहुंच गई  जबकि एमएफएन सीमा शुल्‍क दरें औसत 13.5 फीसदी हैं. इसके अलावा कृष‍ि उत्‍पादों आदि पर सीमा शुल्‍क तो 112 फीसदी से ज्‍यादा है.

यही वजह थी कि बीते बरसों में मोदी ट्रंप दोस्‍ती के दावों बाद बावजूद व्‍यापार को लेकर अमेरिका और भारत के रिश्‍तों में खटास बढ़ती गई जो अब तक बनी हुई है. इसी संरंक्षणवाद के कारण प्रधानमंत्री मोदी के तमाम ग्‍लोबल अभ‍ियानों के बावजूद भारत सात वर्षों में एक नई व्‍यापार संध‍ि नहीं कर सका.

किसका नुकसान

आयातों की कीमत बढ़ाने की यह पूरी परियोजना इस बोदे और दकियानूसी तर्क के साथ गढ़ी गई कि यद‍ि आयात महंगे तो होंगे  देश में माल बनेगा. पर दरअसल एसा हुआ नहीं क्‍यों कि एकीकृत दुनिया में. उत्‍पादन की चेन को पूरा करने के लिए भारत को इलेक्‍ट्रानिक्‍स, पुर्जे, स्‍टील, मशीनें, रसायन आदि कई जरुरी चीजें आयात ही करनी हैं.

उदाहरण के लिए इलेक्‍ट्रानिक्‍स को लें जहां सबसे ज्‍यादा आयात शुल्‍क बढ़ा. बीते तीन साल में इलेक्‍ट्रानिक पुर्जों जैसे पीसीबी आदि का एक तिहाई आयात तो अकेले चीन से हुआ 2019-20 ज‍िसकी कीमत करीब 1.15 लाख करोड़ रुपये थी. शेष जरुरत ताईवान फिलीपींस आद‍ि से पूरी हुई.

स्‍वदेशीवाद की इस नीति ने भारत छोटे उद्योागें के पैर काट दिये हैं जिनकी सबसे बड़ी निर्भरता आयात‍ित कच्‍चे माल पर है. इंपोर्टेड महंगाई इन्‍हें सबसे ज्‍यादा भारी पड़ रही है. स्‍टील तांबा अल्‍युम‍िन‍ियम जैसे उत्‍पादों और मशीनरी पर आयात शुल्‍क बढ़ने से भारत के बड़े मेटल उत्‍पादकों ने दाम बढ़ा दि‍ये. गाज गिरी छोटे उद्योगों पर, यह धातुएं जिनका कच्‍चा माल हैं. इधर  सीधे आयात होने वाले पुर्जें व अन्‍य सामान पर सीमा शुल्‍क बढ़ने से पूरी उत्‍पादन चेन को महंगी हो गई.

भारत में अध‍िकांश छोटे उद्योगों के 2017 से कच्‍चे माल की महंगाई से जूझना शुरु कर दिया था. अब तो इस महंगाई का विकराल रुप उन के सर पर नाच रहा है. कुछ छोटे उद्योग बढ़ी कीमत पर कम कारोबार को मजबूर हैं जब कई दुकाने बंद हो रही हैं

ताजा खबर यह है कि इंपोर्टेड महंगाई का अपशकुन सरकार की बहुप्रचार‍ित मैन्‍युफैक्‍चरिंग प्रोत्‍साहन योजना (पीएलआई) का दरवाजा घेर कर बैठ गया है. चीन वियमनाम थाईलैंड और मैक्‍सिकों के टैरिफ लाइन और भारत की तुलना पर आधार‍ित, आईसीईए और इकध्‍वज एडवाइजर्स की एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि भारत इलेक्‍ट्रान‍िक्‍स पुर्जों के आयात के मामले में सबसे ज्‍यादा महंगा है. यानी भारत की तुलना में इन देशों दोगुने और तीन गुना उत्‍पादों पुर्जों का सस्‍ता आयात संभव है. इसलिए उत्‍पादन के ल‍िए नकद प्रोत्‍साहन के बावजूद कंपनियों की निर्यात प्रतिस्‍पर्धात्‍मकता टूट रही है.

निर्यात के लिए व्‍यापार संध‍ियां करने  और बाजारों का लेन देन करने की जरुरत होती है आयात महंगा करने से आत्‍मनिर्भरता तो खैर क्‍या ही बढ़ती महंगाई को नए दांत मिल गए. उदाहरण के लिए भारत के ज्‍यादातर उद्येाग जहां पीएलआई में निवेश का दावा किया गया वहां उत्‍पादों की कीमतें कम नहीं हुई बल्‍क‍ि बढ़ी हैं. मोबाइल फोन इसका सबसे बड़ा नमूना है जहां सेमीकंडक्‍टर की कमी से पहले ही महंगाई आ गई थी.

जो इतिहास से नहीं सीखते

बात 15 वीं सदी की है. क्रिस्टोफर कोलम्बस की अटलांटिक पार यात्रा में अभी 62 साल बाकी थेमहान चीनी कप्तान झेंग हे अपने विराट जहाजी बेडे के साथ अफ्रीका तक की छह ऐतिहासिक यात्राओं के बाद चीन वापस लौट रहा था.  झेंग हे का बेड़ा कोलम्बस के जहाजी कारवां यानी सांता मारिया से पांच गुना बड़ा था. झेंग हे की वापसी तक मिंग सम्राट योंगल का निधन हो चुका थाचीन के भीतर खासी उथल पुथल थी. इस योंगल के उत्‍तराध‍िकारों ने एक अनोखा काम क‍िया. उन्‍होंने समुद्री यात्राओं पर पाबंदी लगाते हुए दो मस्तूल से अधिक बड़े जहाज बनाने पर मौत की सजा का ऐलान कर दिया

इसके बाद चीन का विदेश व्यापार अंधेरे में गुम गया. उधर स्पेन, पुर्तगाल, ब्रिटेन, डच बंदरगाहों पर जहाजी  बेड़े सजने लगे जिन्‍होंने अगले 500 साल में दुनिया को मथ डाला और व्‍यापार का तारीख बदल दी.

चीन को यह बात समझने में पांच शताब्‍द‍ियां लग गईं क‍ि कि जहाज बंदरगाह पर खड़े होने के लिए नहीं बनाए जातेदूसरी तरफ अमेर‍िका अपनी स्‍थापना के वक्‍त पर ही यानी 18 वीं सदी की शुरुआत ग्‍लोबल व्‍यापार की अहम‍ियत समझ गया था तभी तो अमेरिका के संस्‍थापन पुरखे बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा था कि व्यापार से दुनिया का कोई देश कभी बर्बाद नहीं हुआ है 

अलबत्‍ता चीन ने जब एक बार ग्लोबलाइजेशन का जहाज छोड़ा तो फ‍िर दुन‍िया को अपना कारोबारी उपन‍िवेश बना ल‍िया लेक‍िन बीते 2500 साल में मुक्त व्यापार के फायदों से बार बार अमीर होने वाले भारत ने बीते छह साल में उलटी ही राह पकड़ ली.

एक पुराने व्‍यापार कूटनीतिकार ने कभी मुझसे कहा था कि सरकारें कुछ भी करें लेक‍िन उन्‍हें महंगाई का आयात नहीं करना चाहिए. वे हमेशा इस पर झुंझलाये रहते थे कि कोई भी समझदार सरकार जानबूझकर अपना उत्‍पादन महंगा क्‍यों करेगी. लेकि‍न सरकारें कब सीखती हैं, नसीहतें तो जनता को मिलती है, इंपोर्टेड महंगाई हमारी सबसे ताजी नसीहत है.   

ये डर है क़ाफ़िले वालो कहीं गुम कर दे

मिरा ही अपना उठाया हुआ ग़ुबार मुझे 



 

Thursday, November 19, 2020

कारवां गुजर गया...

 


कहते हैं कि अमेजन वाले जेफ बेजोस और चीन के पास बदलती दुनिया की सबसे बेहतर समझ है. वे न सिर्फ यह जानते हैं कि क्या बदलने वाला है बल्कि यह भी जानते हैं कि क्या नहीं बदलेगा.

बेजोस ने एक बार कहा था कि कुछ भी बदल जाए लेकिन कोई उत्पादों को महंगा करने या डिलिवरी की रफ्तार धीमी करने को नहीं कहेगा. लगभग ऐसा ही ग्लोबलाइजेशन के साथ है जिससे आर्थिक तरक्की तो क्या, कोविड का इलाज भी असंभव है. चीन ने यह सच वक्त रहते भांप लिया है.

दुनिया जब तक यह समझ पाती कि डोनाल्ड ट्रंप की विदाई उस व्यापार व्यवस्था से इनकार भी है जो दुनिया को कछुओं की तरह अपने खोल में सिमटने यानी बाजार बंद करने के लिए प्रेरित कर रही थी, तब तक चीन ने विश्व व्यापार व्यवस्था का तख्ता पलट कर ग्लोबलाइजेशन के नए कमांडर की कुर्सी संभाल ली.

चीन, पहली बार किसी व्यापार समूह का हिस्सा बना है. आरसीईपी (रीजन कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप) जीडीपी के आधार पर दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक (30 फीसद आबादी) गुट है, जिसमें दक्षिण-पूर्व एशिया (आसियान) के देश, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड के अलावा एशिया की पहली (चीन), दूसरी (जापान) और चौथी (कोरिया) सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं. आरसीईपी अगले दस साल में आपसी व्यापार में 90 फीसद सामान पर इंपोर्ट ड‍्यूटी पूरी तरह खत्म कर देगा.

आरसीईपी के गठन का मतलब है कि

चीन जो विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में सबसे देर से दाखिल हुआ था, उसने उदारीकरण को ग्लोबल कूटनीति की मुख्य धारा में फिर बिठा दिया है. मुक्त व्यापार की बिसात पर आरसीईपी चीन के लिए बड़ा मजबूत दांव होने वाला है.

अमेरिका के नेतृत्व में ट्रांस पैसिफिक संधि‍, (ट्रंप ने जिसे छोड़ दिया था) को दुनिया की सबसे बड़ा आर्थिक व्यापारिक समूह बनना था. आरसीईपी के अब अमेरिका, लैटिन अमेरिका, कनाडा और यूरोप को अपनी संधिखड़ी करनी ही होगी.

छह साल तक वार्ताओं में शामिल रहने के बाद, बीते नवंबर में भारत ने अचानक इस महासंधिको पीठ दिखा दी. फायदा किसे हुआ यह पता नहीं लेकिन सरकार को यह जरूर मालूम था कि आरसीईपी जैसे बड़े व्यापारिक गुट का हिस्सा बनने पर भारत के जीडीपी में करीब एक फीसद, निवेश में 1.22 फीसद और निजी खपत में 0.73 फीसद  की बढ़ोतरी हो सकती थी (सुरजीत भल्ला समिति 2019). वजह यह कि आरसीईपीमें शामिल आसियान, दक्षिण कोरिया और जापान के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) हैं. इन समझौतों के बाद (आर्थिक समीक्षा 2015-16) इन देशों से भारतीय व्यापार 50 फीसद बढ़ा. निर्यात में बढ़ोतरी तो 25 फीसद से ज्यादा रही.

आत्मनिर्भरता के हिमायती स्वदेशीचिंतकमान रहे थे कि भारत के निकलने से आरसीईपी बैठ जाएगा पर किसी ने हमारा इंतजार नहीं किया. यही लोग अब कह रहे हैं कि धीर धरो, आरसीईपी में शामिल देशों से भारत के व्यापार समझौतों पर इस महासंधिका असर नहीं होगा. जबकि हकीकत यह है कि आरसीईपी के सदस्य दोतरफा और बहुपक्षीय व्यापार में अलग-अलग नियम नहीं अपनाएंगे. दस साल में यह पूरी तरह मुक्त व्यापार (ड‍्यूटी फ्री) क्षेत्र होगा. भारत को चीन से निकलने वाली कंपनियों की अगवानी की उम्मीद है लेकिन तमाम प्रोत्साहनों के चलते वे अब इस समझौते के सदस्यों को वरीयता देंगी. यानी कि भारत के और ज्यादा अलग-थलग पड़ने का खतरा है.

आरसीईपी के साथ उदार बाजार (ग्लोबाइलाइजेशन) पर भरोसा लौट रहा है. कारोबारी हित जापान और चीन को एक मंच पर ले आए हैं. नई व्यापार संधियां बनने में लंबा वक्त लेती हैं इसलिए आरसीईपी फिलहाल अगले एक दशक तक दुनिया में बहुपक्षीय व्यापार का सबसे ताकतवर समूह रहेगा. ‍

भविष्य जब डराता है तो लोग सबसे अच्छे दिन वापस पाना चाहते हैं. जीडीपी में बढ़त, गरीबी में कमी, नई तकनीकें, अंतरराष्ट्रीय संपर्क ताजा इतिहास में सबसे अच्छे दिन हैं जो ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण ने गढ़े थे. आज कोविड वैक्सीन और दवा पर अंतरराष्ट्रीय विनिमय इसी की देन है.

बीते दो दशक में मुक्त व्यापार और ग्लोबलाइजेशन ने भारत की विकास दर में करीब पांच फीसद का इजाफा किया. यानी गरीबी घटाने वाली ग्रोथ काचमत्कारदुनिया से हमारी साझेदारी का नतीजा था. इसे दोहराने के लिए अब हमें पहले से दोहरी मेहनत करनी होगी.

आरसीईपी को भारत की नहीं बल्किबल्कि भारत को दुनिया के बाजार की ज्यादा जरूरत है. कोविड की मंदी के बाद घरेलू मांग के सहारे 6 फीसद की विकास दर भी नामुमकिन है. अब विदेशी बाजारों के लिए उत्पादन (निर्यात) के बिना अर्थव्यवस्था खड़ी नहीं हो सकती.

एशिया में मुक्त व्यापार का कारवां, भारत को छोड़कर चीन की अगुआई में नई व्यवस्था की तरफ बढ़ गया है. भारत को इस में अपनी जगह बनानी होगी, उसकी शर्तों पर व्यवस्था नहीं बदलेगी.

Monday, June 18, 2018

दुनिया न माने



संकेतोंअन्यर्थों और वाक्पटुताओं से सजी-संवरी विदेश नीति की कामयाबी को बताने किन आंकड़ों या तथ्यों का इस्‍तेमाल होना चाहिए 

यह चिरंतन सवाल ट्रंप और कोरियाई तानाशाह किम की गलबहियों के बाद वापस लौट आया है और भारत के हालिया भव्य कूटनीतिक अभियानों की दहलीज घेर कर बैठ गया है.

विदेश नीति की सफलता की शास्त्रीय मान्यताओं की तलाश हमें अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन (1743-1826) तक ले जाएगीजिन्होंने अमेरिका की (ब्रिटेन से) स्वतंत्रता का घोषणापत्र तैयार किया. वे शांतिमित्रता और व्यापार को विदेश नीति का आधार मानते थे. 

तब से दुनिया बदली है लेकिन विदेश नीति का आधार नहीं बदला है. चूंकि किसी देश के लिए किम-ट्रंप शिखर बैठक जैसे मौके या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेतृत्व के मौके बेहद दुर्लभ हैंइसलिए कूटनीतिक कामयाबी की ठोस पैमाइश अंतरराष्ट्रीय कारोबार से ही होती है.

विदेश नीति की अधिकांश कवायद बाजारों के लेन-देन यानी निर्यात की है जिससे आयात के वास्ते विदेशी मुद्रा आती है. भारत के जीडीपी में निर्यात का हिस्सा 19 फीसदी तक रहा है. निर्यात में भी 40 फीसदी हिस्सा‍ छोटे उद्योगों का है यानी कि निर्यात बढ़े तो रोजगार बढ़े. 

यकीनन मोदी सरकार के कूटनीतिक अभियान लीक से हटकर "आक्रामक'' थे लेकिन पहली यह है कि विदेश व्यापार को कौन-सा ड्रैगन सूंघ गया?

- पिछले चार वर्षों में भारत का (मर्चेंडाइज) निर्यात बुरी तरह पिटा. 2013 से पहले दो वर्षों में 40 और 22 फीसदी की रफ्तार से बढऩे वाला निर्यात बाद के पांच वर्षों में नकारात्मक से लेकर पांच फीसदी ग्रोथ के बीच झूलता रहा. पिछले वित्त वर्ष में बमुश्किल दस फीसदी की विकास दर पिछले तीन साल में एशियाई प्रतिस्पर्धी देशों (थाइलैंडमलेशियाइंडोनेशियाकोरियाकी निर्यात वृद्धि से काफी कम है.

- पिछले दो वर्षों (2016-3.2%: 2017-3.7%) में दुनिया की विकास दर में तेजी नजर आई. मुद्रा कोष (आइएमएफ) का आकलन है कि 2018 में यह 3.9 फीसदी रहेगी.

- विश्व व्यापार भी बढ़ा. डब्ल्यूटीओ ने बताया कि लगभग एक दशक बाद विश्व व्यापार तीन फीसदी की औसत विकास दर को पार कर  (2016 में 2.4%2017 में 4.7% की गति से बढ़ा. 

लेकिन भारत विश्व व्यापार में तेजी का कोई लाभ नहीं ले सका.

- पिछले पांच वर्षों में चीन ने सस्ता सामान मसलन कपड़ेजूतेखिलौने आदि का उत्पादन सीमित करते हुए मझोली व उच्च‍ तकनीक के उत्पादों पर ध्यान केंद्रित किया. यह बाजार विएतनामबांग्लादेश जैसे छोटे देशों के पास जा रहा है. 

- भारत निर्यात के उन क्षेत्रों में पिछड़ रहा है जहां पारंपरिक तौर पर बढ़त उसके पास थी. क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट बताती हैकच्चे माल में बढ़त होने के बावजूद परिधान और फुटवियर निर्यात में विएतनाम और बांग्लादेश ज्यादा प्रतिस्पर्धी हैं और बड़ा बाजार ले रहे हैं. टो पुर्जे और इंजीनियरिंग निर्यात में भी बढ़ोतरी पिछले वर्षों से काफी कम रही है.





- भारत में जिस समय निर्यात को नई ताकत की जरूरत थी ठीक उस समय नोटबंदी और जीएसटी थोप दिए गएनतीजतन जीडीपी में निर्यात का हिस्सा 2017-18 में 15 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गया. सबसे ज्यादा गिरावट आई कपड़ाचमड़ाआभूषण जैसे क्षेत्रों मेंजहां सबसे ज्यादा रोजगार हैं.

- ध्यान रखना जरूरी है कि यह सब उस वक्त हुआ जब भारत में मेक इन इंडिया की मुहिम चल रही थी. शुक्र है कि भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश आ रहा था और तेल की कीमतें कम थींनहीं तो निर्यात के भरोसे तो विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर पसीना बहने लगता.

- अंकटाड की ताजा रिपोर्ट ने भारत में विदेशी निवेश घटने की चेतावनी दी है जबकि विदेशी निवेश के उदारीकरण में मोदी सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

विदेश व्यापार की उलटी गति को देखकर पिछले चार साल की विदेश नीति एक पहेली बन जाती है. दुनिया से जुडऩे की प्रधानमंत्री मोदी की ताबड़तोड़ कोशिशों के बावजूद भारत को नए बाजार क्यों नहीं मिले जबकि विश्व बाजार हमारी मदद को तैयार था?

हालात तेजी से बदलते रहते हैं. जब तक हम समझ पाते तब तक अमेरिका ने भारत से आयात पर बाधाएं लगानी शुरू कर दीं. आइएमएफ बता रहा है कि आने वाले वर्षों में अमेरिका और यूरोपीय समुदाय में आयात घटेगा. 

लगता है कि जिस तरह हमने सस्ते तेल के फायदे गंवा दिए ठीक उसी तरह निर्यात बढ़ाने व नए बाजार हासिल करने का अवसर भी खो दिया है.



क्या यही वजह है कि चार साल के स्वमूल्यांकन में सरकार ने विदेश नीति की सफलताओं पर बहुत रोशनी नहीं डाली है?

Monday, November 7, 2016

देसी मिसाइल, चीनी पटाखे

 छोटे कारखाने ही चीन की ताकत हैं जबकि हमारा भव्य मेक इन इंडिया छोटी इकाइयों को ताकत तो दूरकारोबारी इज्जत भी नहीं दे सका.

रेलू फर्नीचर, प्लास्टिक के डिब्बे, मुलायम खिलौने या छाते बनाने के लिए अरबों डालर के निवेश की जरूरत नहीं होती. दीवाली के रंगीन बल्ब, पंखे या घडिय़ां बनाने के लिए पेटेंट वाली तकनीक नहीं चाहिए. दुनिया के किसी देश में सैमसंग, माइक्रोसॉफ्ट, अंबानी, सिमेंस, टाटा, अडानी, सोनी या उनके समकक्ष पटाखे, क्रॉकरी, तौलिये, पेन, कैल्कुलेटर आदि नहीं बनाते. उस चीन में भी नहीं जिसे इस दीवाली हम जमकर बिसूरते रहे. दुनिया के प्रत्येक बड़े मुल्क की तरह चीन में भी इन चीजों का निर्माण छोटी इकाइयां ही करती हैं. यही छोटी ग्रोथ फैक्ट्रीज ही मेड इन चाइना की ग्लोबल ताकत हैं जबकि दूसरी तरफ हमारा भव्य मेक इन इंडिया है जो छोटी इकाइयों को ताकत तो दूर, कारोबारी इज्जत भी नहीं बख्श सका.

बीते सप्ताह भारत में पटाखा क्रांतिकारी जिस समय सोशल नेटवर्कों पर बता रहे थे कि किस तरह भारत में मेड इन चाइना लट्टू-पटाखों के बहिष्कार से चीन कांप उठा है! ठीक उसी दौरान वर्ल्ड बैंक ने दुनिया में कारोबार करने के लिए आसान (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) देशों की रैंकिंग जारी की. सरकार ने पिछले दो साल में सारे कुलाबे मिला दिए लेकिन कारोबार की सहजता में भारत की रैंकिंग बमुश्किल एक अंक ऊपर (131 से 130) जा सकी. भारत की इस घटिया रैंकिंग का चीन से सस्ते आयात से बहुत गहरा रिश्ता है. इसे समझने के लिए बहिष्कारों की नाटकबाजी के बजाए बाजार की हकीकत से आंख मिलाना जरूरी है.

भारत में औसत मासिक खपत में अब लगभग 70 फीसदी उत्पाद मैन्युफैक्चरिंग के हैं. फल, दूध, सब्जी जैसे कच्चे सामान भी मैन्युफैक्चरिंग (पैकेजिंग, परिवहन, प्रोसेसिंग) की मदद के बिना हम तक नहीं पहुंचते. कारें, फ्रिज, टीवी, मोबाइल रोज की खरीद नहीं हैं अलबत्ता हमारे उपभोग खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा जिन उत्पादों (कॉस्मेटिक्स, सस्ते इलेक्ट्रॉनिक्स, गारमेंट्स) में जाता है, वे सामान्य तकनीक से बनते हैं. कीमतों का प्रतिस्पर्धात्मक होना ही इनकी सफलता का आधार है जो बाजारों के करीब इकाइयां लगाकर और प्रोसेस व पैकेजिंग इनोवेशन के जरिए हासिल किया जाता है. चीन से 61 अरब डॉलर के आयात में करीब एक-तिहाई ऐसे ही उत्पाद हैं जिन्हें छोटी इकाइयां, भारत से 50 फीसदी तक कम कीमत पर बना लेती हैं.

सामान्य तकनीक और मामूली इनोवेशन वाले इन उत्पादों को हम क्यों नहीं बना सकते? इसका जवाब हमें विश्व बैंक की उस रैंकिंग में मिलेगा सरकार जिसे निगलने में हांफ रही है. 189 देशों के बीच रैंकिंग में भारत का 130वां दर्जा भारत में कारोबारी कठिनता का अधूरा सच है. पूरे सच के लिए उन दस पैमानों को देखना होगा जिन पर यह रैंकिंग बनती है. कारोबार शुरू करने की सुविधा में भारत की रैंकिंग 155वीं है, जो पाकिस्तान से भी खराब है. भारत के बाद इस रैंकिंग में गाजा, वेस्ट बैंक, लीबिया आदि आते हैं. इसी तरह भवन निर्माण की  मंजूरी में भारत की रैंकिंग 185वीं और टैक्स में 172वीं है.

हमें सवाल पूछना चाहिए कारोबार शुरू करने में मुसीबत कौन झेलता है? इंस्पेक्टर राज, टैक्स, बिजली कनेक्शन, कर्ज लेना किसके लिए मुश्किल है? ईज ऑफ डूइंग बिजनेस किसे चाहिए, छोटी इकाइयों के लिए जिनसे सस्ते आयात का विकल्प निकलना है या फिर मेक इन इंडिया के झंडे लेकर खड़ी सौ-दो सौ कंपनियों के लिए जिनके लिए हर राज्य में लाल कालीन बिछे हैं? यह जानते हुए भी बड़ी कंपनियां सभी राज्यों में निवेश नहीं करेंगी, मुख्यमंत्री झुककर दोहरे हुए जा रहे हैं. कोई मुख्यमंत्री छोटी कंपनियों के लिए कोई निवेश मेला लगाता नहीं दिखता.

पिछले दो दशकों के दौरान भारत में बड़ी कंपनियों का अधिकांश निवेश दो तरह के क्षेत्रों में आया है. एकजहां प्राकृतिक संसाधन का लाइसेंस मिलने की सुविधा है, जैसे कोयला, स्पेक्ट्रम, खनिज आदि. दोजहां प्रतिस्पर्धा बढऩे की संभावनाएं सीमित हैं और तकनीक या भारी उत्पादन क्षमता के जरिए बाजार का बड़ा हिस्सा लेने का मौका है, मसलन ऑटोमोबाइल, सॉफ्टवेयर, स्टील, सीमेंट आदि.

यकीनन, भारत को बड़े निवेश चाहिए और मिल भी रहे हैं लेकिन मुसीबत यह है कि बाल्टियां, पटाखे, गुब्बारे, खिलौने, बर्तन कौन बनाएगा और वह भी आयात से कम लागत पर. कोई अंबानी, अडानी, सैमसंग तो इन्हें बनाने से रहा. भारत के अलग हिस्सों में असंख्य उत्पादन क्षमताएं चाहिए जो बड़े पैमाने पर सामान्य तकनीक वाले उत्पाद बना सकें और देश के हर छोटे-बड़े बाजार तक पहुंचा सकें ताकि 125 करोड़ की आबादी अपनी सामान्य उत्पादों और उपभोग खपत के लिए आयात पर निर्भर न रहे. यह काम केवल छोटी इकाइयां कर सकती हैं क्योंकि उनके पास ही कम लागत पर उत्पादन का आर्थिक उत्पादन और मांग के मुताबिक तेजी से इनोवेशन की सुविधा है.

छोटी इकाइयां आत्मनिर्भरता और महंगाई पर नियंत्रण के लिए ही जरूरी नहीं हैं बल्कि बड़ी इकाइयों में बढ़ते ऑटोमेशन और रोबोटिक्स के बीच अधिकांश रोजगार भी यहीं से आने हैं. चीन के 80 फीसदी रोजगार छोटे उद्योगों में हैं यानी उन वस्तुओं के निर्माण से आते हैं जिनके बहिष्कार का नाटक हमने किया था.

हमें इस सच को स्वीकार करना होगा कि भारत में छोटे उद्योगों की बीमारी बहुत बड़ी हो चुकी है. छोटे कारोबारियों के लिए भारत दुनिया का सबसे कठिन देश है, यही वजह है कि ज्यादातर छोटे उद्यमी आयातित सामान के ट्रेडर या बड़ी कंपनियों के वितरक हो चले हैं. हमें मानना चाहिए कि मेक इन इंडिया हमें रोजगार और निवेश नहीं दे सका है और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का पाखंड केवल चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित रह गया है.

यदि हमें चीन से सस्ते आयात का मुकाबला करना है तो मेक इन इंडिया का पूरा मजमून बदलना होगा. हमें चीन से चिढऩा नहीं बल्कि सीखना होगा जो अपनी छोटी कंपनियों को माइक्रोमल्टीनेशनल में बदल रहा है. उदारीकरण के 25 बरस बाद अब भारत को दस बड़े ग्लोबल ब्रांड के बजाए पांच सौ छोटे देसी ब्रांड चाहिए, नहीं तो हमें इस असंगति के साथ जीना पड़ेगा कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था मिसाइल तो बना सकती हैं लेकिन पटाखों के लिए हम चीन पर निर्भर हैं.