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Friday, May 6, 2022

क्‍या से क्‍या हो गया ?




2022 की गर्मियों में भारत में क्‍या हो रहा है

वही जो 2021 में 2011, 2014, 2018 में हुआ था

यानी कोयले की किल्‍लत, बिजली कटौती और केंद्र और राज्‍य सरकारों के बीच आरोपों का लेन देन

इस बार नया क्‍या है?

कोयले की कमी का ताजा संस्‍करण भारत की ऊर्जा की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है. आयात‍ित कच्‍चे तेल के बाद भारत इंपोर्टेड कोयले का मोहताज होने वाला है.

एसी क्‍या मजबूरी है

इस पहले क‍ि इस संकट को कोई रुस यूक्रेन युद्ध से जोड़ दे हमें कुछ जरुरी तथ्‍य देखकर चश्‍मे साफ कर लेने चाहिए

-         भारत में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार है और दूसरा सबसे बड़ा उत्‍पादक है. 

-        भारत दुनिया में बिजली का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक हैबिजली की उत्पादन क्षमता बढ़ने की दर 8.9 फीसद है जो  जीडीपी और बिजली की औसत सालाना मांग  (पीक डि‍मांड) बढ़ने से  ज्यादा तेज है.

-         2012 के बाद से पारेषण (ट्रांसमिशनक्षमता 7% की दर से बढ़ी है

फिर भी बीते दस साल में हर दूसरे वर्ष हम बिजली को तरसते हैं

वही पुरानी कहानी

अक्‍टूबर 2021 में  बिजली घरों के पास दो तीन दिन (24 दिन का स्‍टॉक जरुरी)  का कोयला बचा था. कोल इंड‍िया से उत्‍पादन और आपूर्ति बढ़ाने को कहा गया. अक्‍टूबर के अंत में दावा किया गया बिजली घरों के पास कोयला पहुंचा दिया गया है यानी सब ठीक है

ठीक कुछ भी नहीं था. दो महीने बाद जनवरी से मार्च के दौरान बिजली की पीक डिमांड मांग औसत 187 गीगावाट पर पहुंच गई.  गर्मी शुरु होते ही अप्रैल के पहले पखवाड़े में मांग ने 197 गीगावाट की मंजिल छू ली. कोयला आपूर्ति की कमर टूट गई. बिजली उत्‍पादन यानी प्‍लांट लोड फैक्‍टर में एक फीसदी की बढत पर कोयले की मांग करीब 10 मिल‍ियन टन बढ़ जाती है. बिजली की मांग दस फीसदी से ज्‍यादा बढ चुकी है. महाकाय कोल इंडिया के पास  100 मिल‍ियन टन की आपूर्ति तुरंत बढ़ाने की क्षमता नहीं  

आयात‍ित कोयले की कीमत 280-300 डॉलर प्रति टन की ऊंचाई पर है. बिजली कंपनियां अगर इसे खरींदें तो तत्‍काल बिजली महंगी करनी होगी जो संभव नहीं है.

अप्रैल के तीसरे सप्‍ताह तक बिजली घरों के पास कोयला स्‍टॉक   सात साल के सबसे निचले स्‍तर पर आ गया. बिजली एक्‍सचेंज कीमतें  राज्‍य सरकारों की क्षमता के बाहर हो गईं.  

ऊर्जा क्रांति बैठ गई.

भारत की करीब 60 फीसदी बिजली कोयले से आती है. करीब 100  बिजली घर कोयले पर आधार‍ित हैं, 79 घरेलू कोयले पर और 11 आयात‍ित कोयले से चलते हैं.  

भारत में कुल सालाना खपत का 111 गुना ज्‍यादा कोयला भंडार है. कोल इंडिया 7.7 करोड़ टन का उत्‍पादन (2021-22) करती है. जो  8.5 फीसदी की सालाना गति से बढ़ रहा है. दो करोड टन कोयले का सालाना आयात होता है.

फिर संकट क्‍यों ?

यह न कहियेगा कि सरकार को  बिजली की मांग बढ़ने, कोयले की आपूर्ति कम पड़ने और रिकार्ड गर्मी का अंदाज नहीं था. कोयले और बिजली की कमी प्राकृतिक नहीं है. यह संकट ऊर्जा सुधारों की सालाना पुण्‍य त‍िथि‍ जैसा बन गया है. इसे समझने में लिए तीन सवालों से मुठभेड़ जरुरी है

पहला – बिजली घरों के पास कोयले के पर्याप्‍त  भंडार क्‍यों नहीं बन पाते

जवाब – बिजली वितरण कंपन‍ियां बिजली उत्‍पादकों को वक्‍त पर बिजली का पैसा नहीं चुकाती हैं. बिजली दरें सरकारें तय करती हैं. सब्‍स‍िडी का पैसा कंपनियों को मिलता नहीं. यहां तक सरकारें अपनी खपत की बिजली का पैसा भी नहीं चुकातीं. पूरा कारोबार उधार का है. बिजली दरें न बढ़ने के कारण बिजली कंपनियां करीब 5.2 लाख करोड़ के नुकसान में हैं.  राज्‍यों पर 1.1 लाख करोड़ रुपये सब्‍सिडी और मुफ्त बिजली के मद में बकाया हैं.

2001 के बाद  के बीच बिजली बोर्ड या वितरण कंपनियों  को बकाए और     कर्ज से उबरने के लिए चार बार कर्ज पैकेज दिये गए लेक‍िन बिजली वितरण कंपनियों पर इस समय बिजली उत्‍पादन कंपनियों का का करीब 1.25 लाख करोड़ बकाया है.

दूसरा सवाल – कोल इंडि‍या  वक्‍त पर आपूर्ति क्‍येां नहीं बढ़ा पाती?

जवाब - कोयले की कुल मांग का 83 फीसदी हिस्‍सा कोल इंडिया से आता है. उत्‍पादन में बढ़त नई खदानों पर निर्भर है जो नौकरशाही और पर्यावरण की मंजूरी के कारण अटकी हैं. कोल इंडिया के पास 35000 करोड़ का सरप्‍लस व रिजर्व लेक‍िन सरकार उससे लाभांश निचोड़ती है. नई खदानों में निवेश वरीयता पर नहीं है

बीते साल अक्‍टूबर में निजी ब‍िजली उत्‍पादकों ने आपूर्ति में कमी को लेकर कोल इंडिया पर जुर्माना लगाने की मांग की थी

तीसरा सवाल -  निजी खदानों का क्‍या हुआ?  

-         कोयला ब्‍लॉक आवंटन घोटाले के बाद 2014 में सब ठीक होने का दावा किया गया लेकिन 2018 में कोयला संकट फिर लौट आया.

-         2020 में
 निजी क्षेत्र को कोयला खदानें देने का फैसला हुआ. 70 फीसदी खदानों के लिए बोलियां ही नहीं आईं. जब कोल इंडिया की खदानों की मंजूरी वक्‍त पर नहीं होती तो निजी निवेशकों की कौन सुन रहा.  

-         इंटरनेशनल इनर्जी फाइनेंस एंड इकोनॉमिक एनाल‍िसिस का  अध्‍ययन बताता है कि भारत के कोयले की गुणवत्‍ता अच्‍छी नहीं है इसलिए निर्यात की संभावना सीमित है.  दुनिया के बैंकर क्‍लाइमेट चेंज की शर्तों के कारण कोयला परियोजनाओं में निवेश कम कर रहे हैं. इसलिए भारत में विदेशी निवेशक नहीं आ रहा . मेगा ग्‍लोबल कंपनी रिओ टिंटो भी 2018 में अपनी आख‍िरी खदान बेचकर भारत से रुखसत हो गई. 

सबसे बड़ी हार

फरवरी 2020 में गुजरात के केवड़‍िया में के चिंतन शि‍व‍िर में  केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने घोषणा की थी कि 2023-24 के वित्‍त वर्ष से भारत बिजली के लिए कोयले (नॉन कोकिंग कोल) का आयात बंद कर देगा लेकिन अब हाल यह है कि राज्‍यों और निजी बिजली घरों को अगस्‍त तक 19 मिल‍ियन टन कोयेल का आयात करने का लक्ष्‍य दे दिया गया है. रुस यूक्रेन युद्ध के बाद विश्‍व बाजार में कोयले की कीमत 45 फीसदी तक बढ़ चुकी है. इस बीच दुनिया की दूसरा सबसे कोयला आयातक मुल्‍क, पांच माह में इतना कोयला इंपोर्ट करने वाला है जितना पूरे साल में होता है.

सनद अभी तक हम केवल कच्‍चे तेल के लिए आयात पर निर्भरता को बिसूरते थे लेक‍िन अब दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा कोयला भंडार रखने वाले भारत के सरकारी बिजली घर भी इंपोर्टेड कोयले पर चलेंगे.

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार जो अब केवल एक साल के लिए पर्याप्‍त है उसके लिए यह बुरी खबर है. क्‍यों कि तेल और कोयला दोनों ही ईंधनों की कीमतों में लगी आग लंबी चलेगी


Monday, June 4, 2012

संकट के सूत्रधार


क थी अर्थव्‍यवस्‍था। बाशिंदे थे मेहनतीग्रोथ की कृपा हो गई। मगर आर्थिक ग्रोथ ठहरी कई मुंह वाली देवी। ऊर्जाईंधन उसकी सबसे बडी खुराक। वह मांगती गईलोग ईंधन देते गए। देश में न मिला तो बाहर से मंगाने लगे। ईंधन महंगा होने लगा मगर किसको फिक्र थी। फिर इस देवी ने पहली डकार ली। तब पता चला कि ग्रोथ का पेट भरने में महंगाई आ जमी है। ईंधन के लिए मुल्‍क पूरी तरह विदेश का मोहताज हो गया है। आयात का ढांचा बिगड़ गया है इसलिए देश मुद्रा ढह गई है। और अंतत: जब तक देश संभलता ग्रोथ पलट कर खुद को ही खाने लगी। यह डरावनी कथा भारत की ही है। एक दशक की न्‍यूनतम  ग्रोथजिद्दी महंगाईसबसे कमजोर रुपये और घटते विदेशी मुद्रा भंडार के कारण हम पर  अब संकट की बिजली कड़कने लगी है। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के लिए अपनी बुनियादी गलतियों को गिनने का वक्‍त आ गया है। बिजली भयानक कमी और ऊर्जा नीति की असफलता ताजा संकट की सबसे बड़ी सूत्रधार है।   
डरावनी निर्भरता   
भारत का आयात एक हॉरर स्‍टोरी है। पिछले एक साल में देश का तेल आयात करीब 46 फीसदी बढ़ा और कोयले का 80 फीसदी। यह दोनों जिंस आयात की टोकरी में सबसे बडा हिससा घेर रहे हैं। दरअसल प्राकृ‍तिक संसाधनों को संजोनेबांटने और तलाशने में घोर अराजकता ने हमें कहीं का नही छोड़ा है। कोयले की कहानी डराती है। भारत की 90 फीसदी बिजली कोयले से बनती है और इस पूरे उजाले व ऊर्जा की जान भीमकाय सरकारी कंपनी कोल इंडिया हाथ में है जो इस धराधाम की सबसे बड़ी कोयला कंपनी है। पिछले दो साल में जब बिजली की मांग बढ़ी तो कोयला उत्‍पादन  घट गया। ऐसा नहीं कि देश में कोयला कम है। करीब 246 अरब टन का अनुमा‍नित भंडार है जिसइसके बाद कोल इंडिया की तानाशाही और कोयला ढोने वाली रेलवे का चरमराता नेटवर्क.. बिजली कंपनियां कोयला आयात न करें तो क्‍या करें। इसलिए कोयला भारत का तीसरा सबसे बड़ा आयात है। अगले पांच साल में कोयले की कमी 40 करोड़ टन होगीयानी और ज्यादा आयात होगा। पेट्रो उत्‍पादों का हाल और भी बुरा है। भारत अपनी 80 फीसदी से ज्‍यादा पेट्रो मांग के लिए आयात पर निर्भर है।  देश में घरेलू कच्‍चा तेल उत्‍पादन पिछले दो साल में एक-दो फीसद से जयादा नहीं बढ़ा। तेल खोज के लिए निजी कंपनियों का बुलाने की पहली कोशिश (नई तेल खोज नीति 1990) कुछ सफल रही लेकिन बाद में सब चौपट। कंपनियों के उत्‍पादन में हिस्‍सेदारी की पूरी नीति सरकार के गले फंस गई है। तेल क्षेत्र लेने वाली निजी कंपनिया उत्‍पादन घटाकर सरकार को ब्‍लैकमेल करती हैं। सरकार असमंजस मे हैं कि निजी कंपनियों के साथ  उत्‍पादन भागीदारी की प्रणाली अपनाई जाए या रॉयल्‍टी टैक्‍स की। अलबत्‍ता ग्रोथ की खुराक को इस असमंजस से फर्क नहीं पड़ताइसलिए पिछले दो साल में कीमतें बढ़ने के बाद भी पेट्रो उतपादों की मांग नहीं घटी। तेल आयात बल्लियों उछल रहा है।