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Tuesday, November 23, 2021

महंगाई का संस्‍कार

 

मेरे शहर के न‍िजी अस्‍पतालों में सरकार घुस गई है. ओपीडी का पर्चा 800 रुपये से 1100 रुपये का हो गया. पूछने पर टका सा जवाब मुंह पर आ ग‍िरता है क‍ि कोव‍िड से सुरक्षा के ल‍िए सैनेटाइजेशन का खर्च बढ़ गया है!  अस्‍पतालों  से कौन पूछे क‍ि सैनेटाइज करना तो उनका सामान्‍य कार्य दाय‍ित्‍व है इसका अलग से पैसा क्‍यों ?    हम सरकार से भी यह कहां  पूछ पाते हैं क‍ि वैक्‍सीन, दवा, सस्‍ता अनाज आद‍ि देना तो उनकी स्‍वाभाव‍िक ज‍िम्‍मेदारी है, इसके ल‍िए ही तो हम गठरी भर टैक्‍स चुकाते हैं, तमाम बजटीय तामझाम का बिल उठाते हैं तो फिर पेट्रोल डीजल पर टैक्‍स बढ़ाने का क्‍या तुक?

बेवजह महंगाई भारत की  कारोबारी असंगति‍यों का हिस्‍सा है  लेक‍िन अब सरकारें टैक्‍स नीतियों में नए पहलू जोड़ कर इसे न‍ियम में बदल रही हैं. महामारी की छाया में महंगाई का नया संस्‍कार, पूरी ज‍िद के साथ सरकारी नी‍ति‍यों के फलक पर उकेरा जा रहा है. बाजार आगे बढ़ इस संस्‍कार को स्‍वीकार रहा है.

चुनावी चोट के बाद पेट्रोल डीजल पर एक्‍साइज ड्यूटी में कटौती पर सरकार को धन्‍यवाद लेक‍िन हमें यह पूछना होगा क‍ि मुफ्त अनाज व वैक्‍सीन वाली दीनदयाल मुद्रा (1.45 लाख करोड़ रुपये खर्च)  के ल‍िए, क्‍या पेट्रोल डीजल महंगा करना जरुरी था?

भोले भारतीय बजट टैक्‍स का पेंचो खम नहीं समझते. वे पश्‍च‍िमी मुल्‍कों के नागर‍िकों की तरह अपनी सरकारों का हलक पकड़ कर उनसे टैक्‍स का ह‍िसाब नहीं मांगते इसलिए उन्‍हें यह महसूस करा द‍िया जाता है क‍ि लोगों को मुफ्त वैक्‍सीन व अनाज देने के ल‍िए आपको तेल की महंगाई के अंगारों पर चलना होगा.

बजट एक दूरगामी व्‍यवस्‍था हैं, वे सभी अप्रत्‍याशि‍त आपदाओं का इंतजाम बना कर चलते हैं.  आकस्‍म‍िक न‍िधियों ( कंटेंजेंसी फंड, आपदा राहत कोष)  में करीब 31000 करोड़ (बजट 2021) का जमा है जो उसी बजट से पैसा पाते हैं जो जिसमें हमारा टैक्‍स जाता है. आपदा राहत कोष के ल‍िए चुन‍िंदा उत्‍पादों पर लगने वाले एक्‍साइज व कस्‍टम ड्यूटी पर  एक नेशनल कैलामिटी कंटेंजेंसी ड्यूटी (एनसीसीडी) लगती है. जो उनकी कीमत में जुड़कर हमारे पास आती है.  प्रधानमंत्री राहत कोष  और पीएम केयर्स भी इन्‍हीं संकटों का इंतजाम हैं.

बजट यह छूट भी देते हैं क‍ि आपदा के मारों पर टैक्‍स का चाबुक चलाने के बजाय बाजार से कर्ज बढ़ाकर राहत का इंतजाम कर ले. एसा हुआ भी. साल 20-21 में सरकार ने 13.71 लाख करोड़ रुपये का रिकार्ड कर्ज ल‍िया (7.1 लाख करोड़ 2019-20)  यह कर्ज हमारी बचत ही है जो बैंकों जर‍िये सरकार के पास पहुंचती है  फ‍िर भी हम पर टैक्‍स का नश्‍तर !

सनद रहे क‍ि व‍ित्‍त आयोग हर साल पांच साल में केंद्र व राज्‍य में आपदा राहत के ल‍िए संसाधनों के बंटवारे न‍ियम और संसाधनों का इंतजाम तय करता है. जिसमें अचानक टैक्‍स थोपना कहीं से शामि‍ल नहीं है. सेस लगाना तो हरगिज नहीं

सेस सबसे घट‍िया टैक्‍स माने जाते हैं जो टैक्‍सों के अलावा थोपे जाते हैं और भारत में वे ज‍िस काम के ल‍िए लगाये जाते हैं उसमें खर्च नहीं होते. वे उस फंड में भी नहीं जाते जो इस टैक्‍स के ल‍िए बने हैं. जैसे क‍ि सीएजी ने 2020 में अपनी रिपोर्ट में बताया क‍ि कच्‍चे तेल पर एक सेस से सरकार ने 2018 तक दस साल में 1.24 लाख करोड़ जुटाये लेक‍िन ऑयल इंडस्‍ट्रीज डेवलपमेंट बोर्ड को नहीं द‍िये गए. इस राशि‍ के इस्‍तेमाल मुफ्त अनाज व वैक्‍सीन का खर्च न‍िकल आता.

जीएसटी के जर‍िये कथि‍त टैक्‍स क्रांत‍ि के बावजूद 2018-19 तक सरकार का करीब 18 फीसदी राजस्‍व सेस व सरचार्ज से आने लगा था, जिन्‍हें टैक्‍स पारदर्शिता की दृष्‍टि‍ से संद‍िग्‍ध माना जाता है. इतने सेस और नाना प्रकार के कर्ज व टैक्‍स से मुफ्त वैक्‍सीन अनाज बांटने या अन्‍य कई खर्च चल सकते थे लेक‍िन बीते एक साल साल में केंद्र सरकार ने पेट्रोल डीजल पर एक्‍साइज ड्यूटी (ताजा कटौती से पहले) करीब 32-33 रुपये प्रति‍ लीटर के र‍िकार्ड स्‍तर पर पहुंचा दी.

 हमें यह नहीं बताया गया क‍ि इस नए टैक्‍स बोझ 3.44 लाख करोड़ रुपये कहां कैसे खर्च होंगे लेक‍िन यह महसूस करने के लिए बजट पढ़ने की जरुरत नहीं है क‍ि अब श‍िक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, पेयजल जैसी सेवायें ज‍िनके ल‍िए सरकार को टैक्‍स दे रहे हैं वह न‍िजी क्षेत्र से खरीद रहे हैं. अब सरकार हमसे न केवल सड़क बनाने के ल‍िए (रोड सेस) बल्‍क‍ि उस पर गाड़ी चलाने (वाहन पंजीकरण) के ल‍िए और उस पर चलने (टोल) के ल‍िए भी टैक्‍स लेती है.

सरकारें अब पुराने टैक्‍स का हि‍साब नहीं देतीं. वे खुद नए खर्च ईजाद करती हैं फिर उनके ल‍िए नए टैक्‍स थोपती हैं.

इसल‍िए अब यह न‍ियम सा हो जाएगा क‍ि पहले वोट के लिए राजनीत‍िक दल लोगों को बिन मांगे कुछ देंगे. बाद में सरकारें  उसका बोझ व अहसान लोगों पर ही थोप देंगी.  

च‍िरंतन भारी टैक्‍स के बीच चुनावी सबक के बाद पेट्रोल डीजल पर एक्‍साइज ड्यूटी में कमी लगभग वैसी ही  है जैसा क‍ि मंदी, लॉकडाउन, बेकारी के बीच कैब कंपनी ओला का पहला मुनाफा दर्ज करना. महामारी के बहाने कहां कहां क‍िसने क‍ितनी बेस‍िर पैर महंगाई हम पर थोपी है इसे या तो हम अपने टूटते बजट से समझ सकते हैं या फिर महामारी के बावजूद कंपन‍ियों के फूलते मुनाफे से.

लेक‍िन बाजार की क्‍या खता ! ऊंची कारोबारी लागतों के कारण भारतीय बाजार  स्‍वाभा‍व‍िक तौर पर महंगाईपरस्‍त  है. वहां मुनाफे तो कीमत बढ़ाकर ही आते हैं. सरकार अर्थव्‍यवस्‍था की महाजन (महाजनो येन गत: स पन्‍थ:) है. वह ज‍िस राह चलती है बाजार उसी को राजपथ मानता है. महंगाई असंतुल‍ित बाजार की डॉन है. मांग व कमाई के बिना आने वाली महंगाई खर्च और बचत दोनों में गरीब बनाती है.

 

महंगाई को थामना सरकारों की ज‍िम्‍मेदारी है. उन्‍हें  बाजार को संतुल‍ित करने के ल‍िए चुना जाता है. अब जब क‍ि सरकारें बेवजह टैक्‍स बढ़ाकर नीतिजन्‍य महंगाई को पैदा करने का श्रेय ले रही हैं तो हमारे मोहल्‍ले के अस्‍पताल या ट्रक वाले गुप्‍ता जी या मॉल के रेस्‍टोरेंट वाले तो आगे क्रीज से आगे बढ़कर क्‍यों न खेलें? अब तो उन्‍हें हमारी जिंदगी महंगी करने की वैक्‍सीन लगा दी गई है .

Friday, January 8, 2021

एक और अवसर

 


यह जो आपदा में अवसर नाम का मुहावरा है न, इसका मुलम्मा चाहे बिल्कुल उतर चुका हो लेकिन फिर भी आपदाओं को सलाम कि वे अवसर बनाने की ड‍्यूटी से नहीं चूकतीं.

आपको वैक्सीन कब तक मिलेगी और किस कीमत पर यह इस पर निर्भर होगा कि भारत का कल्याणकारी राज्य कितना कामयाब है? वेलफेयर स्टेट के लिए यह दूसरा मौका है. पहला अवसर बुरी तरह गंवाया गया था जब लाखों प्रवासी मजदूर पैदल गिरते-पड़ते घर पहुंचे थे और स्कीमों-संसाधनों से लंदी-फंदी सरकार इस त्रासदी को केवल ताकती रह गई थी.

विज्ञान और फार्मा उद्योग अपना काम कर चुके हैं. ताजा इतिहास में दुनिया का सबसे बड़ा सामूहिक वैक्सिनेशन या स्वास्थ्य परियोजना शुरू हो रही है. सवाल दो हैं कि एक, अधिकांश लोगों को आसानी से वैक्सीन कब तक मिलेगी और दूसरा, किस कीमत पर?

इनके जवाब के लिए हमें वैक्सीन राष्ट्रवाद से बाहर निकल कर वास्तविकता को समझना जरूरी है, ताकि वैक्सीन पाने की बेताबी को संभालते हुए हम यह जान सकें कि भारत कब तक सुरक्षित होकर आर्थिक मुख्यधारा में लौट सकेगा.

क्रेडिट सुइस के अध्ययन के मुताबिक, भारत को करीब 1.66 अरब खुराकों की जरूरत है.

विज्ञान और उद्योग ने वैक्सीन प्रोजेक्ट पूरा कर लिया है. भारत में करीब 2.4 अरब खुराकें बनाने की क्षमता है. इसके अलावा सिरिंज, वॉयल, गॉज आदि की क्षमता भी पर्याप्त है. पांच कंपनियां (अरबिंदो फार्मा, भारत बायोटेक, सीरम इंस्टीट्यूट, कैडिला और बायोलॉजिकल ई) इसका उत्पादन शुरू कर चुकी हैं. भारत के पास उत्पादन की क्षमता मांग से ज्यादा है. अतिरिक्त उत्पादन निर्यात के लिए है.

जब पर्याप्त वैक्सीन है तो समस्या क्या? सबसे बड़ी चुनौती वितरण तंत्र की है. जिन वैक्सीनों का प्रयोग भारत में होना है उन्हें 2 से -8 डिग्री पर सुरक्षित किया जाना है. चार कंपनियां, स्नोमैन, गतिकौसर, टीसीआइएल और फ्यूचर सप्लाइ चेन के पास यह कोल्ड स्टोरेज और परिहवन की क्षमता है. लेकिन वे अधिकतम 55 करोड़ खुराकों का वितरण संभाल सकती हैं जो भारत की कुल मांग के आधे से कम है.

यह कंपनियां टीकाकरण के अन्य कार्यक्रमों को सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं. वितरण की क्षमता बढ़ाए जाने की गुंजाइश कम है क्योंकि कोविड के बाद यह क्षमता बेकार हो जाएगी. अगर सब कुछ ठीक चला तो भी इस साल भारत में 40 से 50 करोड़ लोगों तक वैक्सीन पहुंचना मुश्किल होगा.

सरकारी और निजी आकलन बतात है कि वैक्सीन देने (दो खुराक) के लिए सरकारी व निजी स्वास्थ्य नेटवर्क के करीब एक करोड़ कर्मचारियों की जरूरत होगी. यानी नियमित स्वास्थ्य सेवाओं के बीच वैक्सीन के लिए लंबी कतारों की तैयारी कर लीजिए.

टीका लगने के बाद बात खत्म नहीं होती. उसके बाद ऐंटीबॉडी की जांच कोरोना वैक्सीन के शास्त्र का हिस्सा है. यानी फिर पैथोलॉजिकल क्षमताओं की चुनौती से रू--रू होना पड़ेगा.

भारत के मौजूदा वैक्सीन कार्यक्रम बच्चों के लिए हैं और सीमित व क्रमबद्ध ढंग से चलते हैं. यह पहला सामूहिक एडल्ट वैक्सीन कार्यक्रम है जिसमें कीमत और वितरण की चुनौती एक-दूसरे से गुंथी हुई हैं. यदि सरकार बड़े पैमाने पर खुद सस्ती वैक्सीन बांटती है तो वितरण की लागत उसे उठानी होगी. भारी बजट चाहिए यानी सबको वैक्सीन मिलने में लंबा वक्त लगेगा. सब्सिडी के बगैर वितरण लागत सहित दो खुराकों की कीमत करीब 5,000 रुपए तक होगी, हालांकि वितरण तंत्र पर्याप्त नहीं है. यानी कोरोना की संजीवनी उतनी नजदीक नहीं है जितना बताया जा रहा है. 

स्वास्थ्यकर्मियों के बाद वैक्सीन पाने के लिए 50 साल से अधिक उम्र के लोगों के चुनने के पैमाने में पारदर्शिता जरूरी है. वैक्सीन वितरण को भारत केवीआइपी पहलेसे बचाना आसान नहीं होगा. 

 मुमकिन है कि क्षमताओं व संसाधनों की कमी से मुकाबिल सरकार यह कहती सुनी जाए कि सबको वैक्सीन की जरूरत ही नहीं है लेकिन उस दावे पर भरोसा करने से पहले यह जान लीजिएगा कि भारत में कोविड पॉजिटिव का आंकड़ा संक्रमण की सही तस्वीर नहीं दिखाता है. अगस्त से सितंबर के बीच 21 राज्यों के 70 जिलों में हुए सीरो सर्वे के मुताबिक, कोविड संक्रमण, घोषित मामलों से 25 गुना ज्यादा हो सकता है. यानी वैक्सीन की सुरक्षा का कोई विकल्प नहीं है.

भारत की वैक्सीन वितरण योजना को अतिअपेक्षा, राजनीति और लोकलुभावनवाद से बचना होगा. यह कार्यक्रम लंबा और कठिन है. सनद रहे कि केवल 27 करोड़ की आबादी वाला इंडोनेशिया अगले साल मार्च तक अपने 50 फीसद लोगों को टीका लगा पाएगा.

हमें याद रखना चाहिए कि भारत अनोखी व्यवस्थाओं वाला देश है जो कुंभ मेले जैसे बड़े आयोजन तो सफलता से कर लेता है लेकिन लाखों प्रवासी श्रमिकों को घर नहीं पहुंचा पाता या सबको साफ पानी या दवा नहीं दे पाता. इसलिए वैक्सीन मिलने तक 2020 को याद रखने में ही भलाई है.

Friday, October 2, 2020

राहत ऐसी होती है !


मुंबई में दो साल तक काम करने के बाद, सितंबर 2019 में कीर्ति की मेहनत कामयाब हुई, जब उसे लंदन की मर्चेंट बैंकिंग फर्म में नौकरी मिल गई. वह लंदन को समझ पाती इससे पहले कोविड गया. नौकरी खतरे में थी. लेकिन अप्रैल में ही उसकी कंपनी सरकार की जॉब रिटेंशन स्कीम (नौकरी बचाओ सब्सिडी) में शामिल हो गई. पगार कुछ कटी लेकिन नौकरी बच गईबहुत नुक्सान नहीं हुआ.

भारत में उसका भाई सिद्धार्थ इतना खुशकिस्मत नहीं रहा. जि स्टार्ट-अप में वह तीन साल से काम कर रहा था अप्रैल में वह बंद हो गया. आर्किटेक्ट पिता को कोविड के कारण अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. कीर्ति की नौकरी (यूके सरकार की जॉब रिटेंशन स्कीम) ही थी जो इस आपदा में उसके परिवार के काम रही थी.

कोविड की तबाही शुरू हुए छह महीने बीतने के अब आर्थिक फैसलों के असर समझने की कोशि हो रही है. दुनिया के देशों ने अपने समग्र आर्थिक उपाय रोजगारों को बचाने पर केंद्रित कर दिए हैं, जबकि भारत सरकार छंटनी और बेरोजगारी के विस्फोट पर उपाय तो दूर, सवाल भी सुनना नहीं चाहती.

जानना जरूरी है कि इस संकट में दुनिया के अन्य देश अपने लोगों का कैसे ख्याल रख रहे हैं.

वेतन संरक्षण या पगार सब्सिडी सरकारों के रोजगार बचाओ अभियानों का सबसे बड़ा हिस्सा है. भारत में जब हर चौथे कर्मचारी की पगार कटी है तब ब्रिटेन कीफर्लो’, जर्मनी की कुर्जरबेट जैसी स्कीमों सहित फ्रांस, इटली, कनाडा, मलेशिया, हांगकांग, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, डेनमार्क और सिंगापुर सहित 35 देशों में कंपनियों को सब्सिडी और फर्लो बोनस दिए जा रहे हैं. अमेरिका में छोटे उद्योगों को तकरीबन मुफ्त कर्ज मिल रहा है ताकि कर्मचारियों की तनख्वाहें कटें. इन सभी देशों में कर्मचारियों के 70 से 84 फीसद तक वेतन संरक्षित किए गए हैं. इन स्कीमों का लाभ मध्य वर्ग को मिला है जिससे बाजार में मांग बनाए रखने में मदद मिली है. बीमारी में वेतन काटे जाने इलाज आदि की रियायतें अलग से हैं.

अमेरिका, दक्षि कोरिया, चीन (प्रवासी श्रमिकों के लिए), कनाडा, आयरलैंड, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों ने बेकार हुए लोगों और परिवारों को बेकारी भत्ते दिए हैं या मौजूदा भत्तों की दर बढ़ाई है. इसका लाभ कम आय वालों को मिला है.

अमेरिका, स्वीडन, डेनमार्क, कनाडा, आयरलैंड, फ्रांस सहित करीब दो दर्जन देशों ने अपने यहां स्वरोजगारों के लिए सब्सिडी और नुक्सान भरपाई की स्कीमें शुरू की हैं, जिनमें उनके हर माह हुए नुक्सान का 60 से 70 फीसद हिस्सा वापस हो रहा है. उनके टैक्स माफ किए गए हैं.

ज्यादातर स्कीमें छोटे उद्योगों में रोजगार बचाने पर केंद्रित हैं जबकि बड़ी कंपनियों को टैक्स रियायतें देकर नौकरियां और वेतन कटौती रोकने के लिए प्रेरित किया गया है. रोजगार बचाने की स्कीमों के कारण लोगों के वेतन संरक्षि हैं इसलि कोवि का डर बीतते ही मांग लौट आएगी. यूरोप और अमेरिका में तेज वापसी (V) का आकलन इसी पर आधारित है.

1930 की महामंदी के बाद उभरी आर्थि नीतियों (अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट को अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड केंज का खुला पत्र) की रोशनी में सरकारों ने यह गांठ बांध ली थी कि रोजगार बचाना और बढ़ाना ही मंदी से उबरने का एकमात्र तरीका है. अप्रैल से लेकर अगस्त के दौरान यूरोप में करीब 5 करोड़ रोजगार बचाए (ओईसीडी रिपोर्ट) गए हैं. अमेरिका में सितंबर के आखिरी सप्ताह तक करीब 2.6 करोड़ बेरोजगारों को बेकारी सहायता मिली. छोटे उद्योगों में वेतन संरक्षण कार्यक्रम के तहत 520 अरब डॉलर के कर्ज (इन्हें बाद में माफ कर दिया जाता है) बांटे जा चुके हैं.

दूसरी तरफ, इसी दौरान भारत में 12.2 करोड़ रोजगार खत्म हुए (सीएमआइई) जिसमें 66 लाख नौकरियां मध्य वर्गीय हैं. करीब 72 लाख करोड़ के खर्च (केंद्र और राज्य), किस्म-किस्म के टैक्स, बैंकों से मनचाहे कर्ज के बावजूद हमारी सरकारों के पास इस सबसे मुश्कि वक्त में हमारे लिए कुछ नहीं है. सरकार ने 20 करोड़ महिला जनधन खातों में तीन माह में केवल 1,500 रुपए (आठ दिन की मनरेगा मजदूरी के बराबर) दी है जिस पर मंत्री और समर्थक लहालोट हुए जा रहे हैं.

भारत में मंदी गहराने के आकलन यूं ही नहीं बरस रहे. वास्तविकता से कोसों दूर खड़ी सरकार बेकारी और महामंदी से परेशान लोगों को कर्ज लेने की राह दिखा रही है या कि भूखों को विटामिन खाने की सलाह दी जा रही है. सबको मालूम है, मांग केवल खपत से आएगी और हर महीने जब बेकारों की तादाद बढ़ रही हो तो कारोबार में नया निवेश कौन करेगा. हमें याद रखना होगा कि सरकारें हमारी बचत और टैक्स पर चलती हैं. और जीविका पर इस सबसे बड़े संकट में हमें हमारे हाल पर छोड़ रही हैं.

शेक्सपियर के जूलियस सीजर में कैसियस और ब्रूटस का संवाद याद आता हैः खोट हमारे सितारों में नहीं है / हम ही गए बीते हैं.