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Tuesday, July 5, 2016

बार बार मिलने वाला आखिरी मौका

काला धन रखने वालेे सरकार पर कभी भरोसा नहीं करते लेकिन फिर भी उन्‍हें हर दशक में एक बार बच निकलने का मौका जरुर मिल जाता है

दि आप ईमानदारी से अपना टैक्स चुकाते हैं और सरकार से किसी मेहरबानी की उम्मीद नहीं रखते तो आपको इस बात पर चिढ़ जरूर होनी चाहिए कि यह कैसा आखिरी मौका है जो बार-बार आता है और जो सिर्फ टैक्स चोरों और काली कमाई वालों को ही मिलता है. बीते सप्ताह प्रधानमंत्री ने ''न की बात" में काले धन की स्वैच्छिक घोषणा की नई स्कीम को जब आखिरी मौका कहा तो वे दरअसल इतिहास को नकार रहे थे. हकीकत यह है कि नई स्कीम काले धन (घरेलू) के पाप धोकर चिंतामुक्त होने का आखिरी नहीं बल्कि एक और नया मौका है. आम करदाताओं के लिए सहूलियतें भले न बढ़ी हों लेकिन आजादी के बाद लगभग हर दशक में एक ऐसी स्कीम जरूर आई है जो कर चोरों को बच निकलने का एकमुश्त मौका देती है.

कर चोरों को माफी देने की स्कीमों के नैतिक सवाल हमेशा से बड़े रहे हैं क्योंकि यह ईमानदार करदाताओं के साथ खुला अन्याय है. इसलिए ज्यादातर देश विशेष हालात में ही ऐसी पहल करते हैं. भारत में माफी स्कीमों के दोहराव ने नैतिकता के सवालों को तो पहले ही नेस्तनाबूद कर दिया थाअब तो इनकी भव्य विफलता कर प्रशासन की साख के लिए बड़ी चुनौती है. लेकिन इसके बाद भी सरकारें यह जुआ खेलने से नहीं हिचकतीं.

एनडीए सरकार पिछले 65 वर्षों की दूसरी सरकार (1965 में तीन स्कीमें) है जो दो साल के भीतर कर चोरों को सजा से माफी (टैक्स चुकाने के बाद) की दो स्कीमें ला चुकी है. अचरज तब और बढ़ जाता है जब हमें यह पता हो कि 2015 में विदेश में जमा काले धन की महत्वाकांक्षी स्वैच्छिक घोषणा की स्कीम सुपर फ्लॉप रही. इसमें केवल 3,770 करोड़ रु. का काला धन घोषित हुआ और सरकार के खजाने में महज 2,262 करोड़ रु. का टैक्स आया. इसके बाद एक और स्कीम समझनीयत और नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े करती है.

कर चोरों को बार-बार मिलने वाले ''आखिरी" मौकों का इतिहास बहुत लंबा है लेकिन इससे गुजरना जरूरी है ताकि हमें काली कमाई करने वालों के प्रति अक्सर उमडऩे वाली सरकारी सहानुभूति का अंदाज हो सके और यह पता चल सके कि इन स्कीमों के डीएनए में ही खोट है.

आजादी मिले चार साल ही बीते थे जब 1951 में पहली वॉलेंटरी डिस्क्लोजर स्कीम आई. त्यागी स्कीम (तत्कालीन राजस्व और खर्च मंत्री महावीर त्यागी) के नाम से जानी गई यह खिड़की केवल 70 करोड़ रु. का काला धन और 10-11 करोड़ रु. का टैक्स जुटा सकी क्योंकि लोगों को आगे कार्रवाई न होने का भरोसा नहीं था.

1965 भारत-पाक युद्ध का वर्ष था. उस साल तीन स्कीमें आई थीं. इनमें एक सिक्स फोर्टी स्कीम थी और दूसरी ब्लैक स्कीम. दोनों की कर दर ऊंची थी इसलिए केवल 49 करोड़ रु. का टैक्स मिला. उसी साल सरकार ने काला धन जुटाने के लिए नेशनल डिफेंस गोल्ड बॉन्ड जारी किए जिसमें निवेश करने वालों का ब्यौरा गोपनीय रखा गया लेकिन बॉन्ड बहुत लोकप्रिय नहीं हुए.

इमरजेंसी की छाया में 1975 में आई स्कीम में कंपनी और व्यक्तिगत आय को घोषित करने और 25 से 60 फीसदी टैक्स देने पर सजा से माफी का प्रावधान था. स्कीम से केवल 241 करोड़ रु. का राजस्व मिला. 1978 में 1,000 रु. के नोट बंद करके काले धन को सीमित करने की कोशिश हुई. काले धन के निवेश के लिए 1981 में स्पेशल बॉन्ड जारी हुए जिसमें रिटर्न कर मुक्त था जो बहुत कामयाब नहीं हुए. काली संपत्ति की घोषणा पर 1985 में आयकर विभाग ने छूट के प्रावधान किए और 1986 में इंदिरा विकास पत्र लाए गए जो काली कमाई के निवेश का मौका देते थे. 1991 की नेशनल हाउसिंग डिपॉजिट स्कीम भी काली कमाई निकालने में नाकाम रही.

1991 की फॉरेन एक्सचेंज रेमिटेंस स्कीम और नेशनल डेवलपमेंट बॉन्ड में काले धन की घोषणा पर माफी का प्रावधान था. ये बॉन्ड अपेक्षाकृत सफल रहे लेकिन 1993 की गोल्ड  बॉन्ड स्कीम को समर्थन नहीं मिला. 1997 की वीडीआइएस अकेली स्कीम थी जो 33,697 करोड़ रु. के काले धन और 9,729 करोड़ रु. के टैक्स के साथ सबसे सफल प्रयोग थी.

इतिहास प्रमाण है कि काला धन माफी स्कीमों का डिजाइन लगभग एक-सा हैकेवल टैक्स पेनाल्टी दरों में फर्क आता रहा है. यह स्कीमें सूचनाओं की गोपनीयता के प्रति कभी भी भरोसा नहीं जगा सकींबल्कि बाद के कुछ मामलों में टैक्स की पड़ताल ने विश्वास को कमजोर ही किया. कर दरें ऊंची होने के कारण भी काला धन रखने वाले स्वैच्छिक घोषणा को लेकर उत्साहित नहीं हुए. 

इन स्कीमों के बार-बार आने से काला धन तो बाहर नहीं आया और न ही काली कमाई के कारखाने बंद हुएअलबत्ता इन स्कीमों के कारण कर प्रशासन का उत्साह और रसूख टूट गया. टैक्स सिस्टम से लेकर बाजार तक सबको यह मालूम है कि हर दशक में इस तरह का आखिरी मौका फिर आएगा. इसलिए एक बार सफाई के बादकाली कमाई जुटाने वाले अगली स्कीम का इंतजार करने लगते हैं.

1971 में वांचू कमेटी ने पिछली तीन स्कीमों के अध्ययन के आधार पर कहा था कि हमें भरोसा है कि कर माफी या काला धन घोषणा की कोई स्कीम न केवल असफल होगीबल्कि ईमानदार करदाता का विश्वास और कर प्रशासन का उत्साह टूटेगा. इसलिए भविष्य में स्कीमें नहीं आनी चाहिए. 1985 में शंकर आचार्य कमेटी ने कहा कि काला धन को सीमित करने की कोशिशों को इन स्कीमों से कोई फायदा नहीं हुआ. 

असफलता को दोहराने की एक सीमा होती है लेकिन भारत मे काले धन पर माफी की स्कीमें तो विफलताओं का धारावाहिक बन चुकी हैं. पिछले छह-सात दशकों में काले धन को बाहर लाने के लगभग सभी तरीके अपनाने और असफल होने के बाद भी जब नए मौके तैयार किए गए तो क्या यह शक नहीं होना चाहिए कि ये स्कीमें सिर्फ इसलिए लाई जाती हैं कि हर दशक में एक बार काला धन रखने वालों को बच निकलने का मौका देना जरूरी हैक्योंकि इसके अलावा तो इन स्कीमों से और कुछ भी हासिल नहीं हुआ है. 

Tuesday, October 20, 2015

उलटा तीर



विदेश में जमा काला धन को लेकर एक बेसिर-पैर के चुनावी वादे को पूरा करने की कोशिश में भारतीय टैक्स सिस्टम की विश्वसनीयता पर गहरी खरोंचें लग गई हैं.

यह कहावत शायद टैक्सेशन की दुनिया के लिए ही बनी होगी कि आम माफी उन अपराधियों के प्रति सरकार की उदारता होती है जिन्हें सजा देना बहुत महंगा पड़ता है. टैक्स चोरों और काले धन वालों को आम माफी (एमनेस्टी?) का फैसला सरकारें हिचक के साथ करती हैं, क्योंकि कर चोरों को बगैर सजा के बच निकलने की सुविधा देना हमेशा से अनैतिक होता है. इसलिए अगर इस सहूलियत के जरिए पर्याप्त काला धन भी न आए तो सरकार की साख क्षत-विक्षत हो जाती है. एनडीए सरकार के साथ यही हुआ है, विदेश में जमा काला धन को लेकर एक बेसिर-पैर के चुनावी वादे को पूरा करने की कोशिश में भारतीय टैक्स सिस्टम की विश्वसनीयता पर गहरी खरोंचें लग गई हैं. आधी-अधूरी तैयारियों और जल्दबाजी में लिए गए फैसलों के कारण, सजा से माफी देकर विदेश में जमा काला धन बाहर निकालने की कोशिश औंधे मुंह गिरी है. टैक्स चोरों ने भी सरकार की उदारता पर भरोसा नहीं किया है.
आम चुनावों के दौरान विदेश से काला धन लाकर लोगों के खाते में जमा करने के वादे पर सवालों में घिरने के बाद सरकार ने बजट सत्र में संसद से एक कानून (अनडिस्क्लोज्ड फॉरेन इनकम ऐंड एसेट्स बिल, 2015) पारित कराया था, जिसके तहत सरकार ने विदेश में काला धन रखने वालों को यह सुविधा दी थी कि 1 जुलाई से 1 अक्तूबर के बीच यदि विदेश में छिपाया धन घोषित करते हुए टैक्स (30 फीसद) और पेनाल्टी (टैक्स का शत प्रतिशत) चुकाई जाती है तो कार्रवाई नहीं होगी. तीन महीने में इस अवधि के खत्म होने पर केवल 4,147 करोड़ रु. का काला धन घोषित हुआ है, जिस पर सरकार को अधिकतम 2,000 करोड़ रु. का टैक्स मिलेगा.
इस साल मार्च में इसी स्तंभ में हमने लिखा था कि 1997 की काला धन स्वघोषणा (वीडीआइएस) स्कीम में गोपनीयता के वादे के बाद भी कंपनियों पर कार्रवाई हुई थी, इसलिए कानून के तहत बड़ी घोषणाएं होने पर शक है लेकिन यह अनुमान कतई नहीं था कि विदेश में काला धन होने के अभूतपूर्व राजनैतिक आंकड़ों के बावजूद इतनी कम घोषणाएं होंगी.
एमनेस्टी स्कीम की विफलता की तह में जाना जरूरी है. काले धन को लेकर इस बड़ी पहल की नाकामी सरकार को नौसिखुआ व जल्दबाज साबित करती है. 
अंधेरे में तीर दरअसल, वित्त मंत्रालय के पास विदेश में जमा काले धन की कोई ठोस जानकारी ही नहीं थी. ऐसी कोशिशें कम ही देशों ने की है क्योंकि इनकी विफलता का खतरा ज्यादा होता है. भारत की पिछली सफल स्कीमें भी देशी काले धन पर केंद्रित थीं. हाल में इटली और अमेरिका ने विदेश में जमा काले धन पर एमनेस्टी स्कीमें सफलता से पूरी की हैं जिनके लिए विदेश से सूचनाएं जुटाकर मजबूत जमीन तैयार की गई थी जबकि अपना वित्त मंत्रालय इस मामले में बिल्कुल अंधेरे में है. सरकार ने दुनिया के तमाम देशों व टैक्स हैवेन को पिछले महीनों में करीब 3,200 अनुरोध भेजकर सूचना हासिल करने की कोशिश शुरू की है, जिनके जवाब अभी आने हैं. सरकार के पास जो जानकारियां उपलब्ध हैं, वे ठोस नहीं थीं, इसलिए तीर उलटा आकर लगा है. वह पार्टी जो विदेश में भारी काला धन जमा होने का दावा कर रही थी, उसके वित्त मंत्री को इस स्कीम की भव्य विफलता के बाद कहना पड़ा कि विदेश में भारत का काला धन है नहीं. 
रणनीतिक चूकः एमनेस्टी स्कीमों का लाभ लेने की कोशिश वही लोग करते हैं जिन्हें सजा का डर होता है. लेकिन वित्त मंत्रालय ने विदेश में जमा धन को लेकर विभिन्न मामलों में सक्रिय कार्रवाइयां, यहां तक सर्वे भी इस स्कीम से बाहर कर दिए थे. इसलिए जो लोग कार्रवाई के डर से स्कीम में आ सकते थे उन्हें भी मौका नहीं मिला. यह एक बड़ी रणनीतिक चूक है.
भरोसे का सवालः आयकर विभाग को मालूम था कि पुराने तजुर्बों की रोशनी में इस सुविधा पर लोग आसानी से विश्वास नहीं करेंगे. स्कीम को सफल बनाने के लिए कर प्रशासन पर भरोसा बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए थी, लेकिन एक तरफ सरकार काला धन घोषित करने के लिए एमनेस्टी दे रही थी तो दूसरी तरफ निवेशकों व कंपनियों को मैट (मिनिमम ऑल्टरनेटिव टैक्स) और पुराने मामलों के लिए नोटिस भेजे जा रहे थे. इस असंगति ने कर प्रशासन पर भरोसे को कमजोर किया और स्कीम की विफलता सुनिश्चित कर दी.
अधूरी तैयारीः वित्त मंत्रालय ने एमनेस्टी के लिए तैयारी नहीं की थी. स्कीम को लेकर स्पष्टीकरण देर से आए और सबसे बड़ी बात, प्रचार में बहादुर सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी स्कीम का कोई प्रचार नहीं किया, खास तौर पर विदेश में तो कतई नहीं, जहां बसे भारतीय इसके सबसे बड़े ग्राहक थे. अंतरराष्ट्रीय तजुर्बे बताते हैं कि इस तरह की स्कीमों को लेकर प्रत्यक्ष व परोक्ष अभियान चलते हैं ताकि अधिक से अधिक लोग इसका हिस्सा बन सकें और सफलता सुनिश्चित हो सके.
काले धन पर आम माफी की असफलता की तुलना 18 साल पहले की वीडीआइएस स्कीम से की जाएगी. तब इसके तहत 36,697 करोड़ रु. काले धन की घोषणा हुई थी, जो मौजूदा स्कीम में की गई घोषणाओं का दस गुना है. यही नहीं, इसे विदेश से काला धन निकालने में अमेरिका (5 अरब डॉलर) और इटली (1.4 अरब यूरो) की ताजा सफलताओं की रोशनी में भी देखा जाएगा.

चुनावी वादे पर फजीहत से लेकर निवेशकों को नोटिस और उनकी वापसी और एमनेस्टी स्कीम की विफलता तक, पिछले सोलह माह में भारत के कर प्रशासन की साख तेजी से गिरी है. बैंकों के जरिए काला धन विदेश ले जाने के ताजा मामले ने कर प्रशासन की निगहबानी के दावों को भी धो दिया है. सरकार की आम माफी पर लोगों का भरोसा न होना एक बड़ी विफलता है, जिसका असर कर प्रशासन की विश्वसनीयता व मनोबल पर लंबे अर्से तक रहेगा. भारत के टैक्स सिस्टम को इस हादसे से उबरने में लंबा वक्त लग सकता है. 

Monday, November 3, 2014

सबसे बड़ा ‘स्वच्छता’ मिशन

काले धन के खिलाफ देश में गुस्सा है। अदालतें सक्रिय हैं। पारदर्शिता के ग्‍लोबल अाग्रह बढ़ रहे हैं।  अर्थव्यवस्था से कालिख की सफाई के एक संकल्पबद्ध अभियान के लिए उपयुक्‍त मौका है लेकिन भारत के इतिहास का सबसे भव्य व महंगा चुनाव लडऩे वाली पार्टी की सरकार क्या इतनी साहसी साबित होगी? 
न् 1963. अमेरिकी सीनेट कमेटी की सुनवाई. जोसेफ वेलाची यानी अमेरिका के पहले घोषित माफिया डॉन ने जैसे ही कबूला कि मुल्क में अपराधियों की समानांतर सरकार (कोजा नोस्त्रा) चलती है तो सांसद समझ गए कि आर्थिक व सामाजिक अपराध के विशाल नेटवर्क के सामने अब मौजूदा कानून बोदे हैं. वेलाची की गवाही के बाद अमेरिका में एक तरफ माफिया की दंतकथाएं बन रहीं थी तो दूसरी तरफ नीति-निर्माता, कानूनविद रॉबर्ट ब्लेकी की मदद से, एक बड़े कानून की तैयारी में जुटे थे. मारियो पुजो के क्लासिक उपन्यास गॉड फादर (1969) के प्रकाशन के ठीक साल भर बाद 1970 में रैकेटियर इन्फ्लुएंस्ड ऐंड करप्ट ऑर्गेनाइजेशंस (रीको) ऐक्ट पारित हुआ. रीको कानून माफिया तक ही सीमित नहीं रहा. हाल में मेक्सिको की खाड़ी में तेल रिसाव से हर्जाना वसूलने से लेकर पोंजी स्कीम चलाने वाले रॉबर्ट मैडॉफ को घेरने तक में इसका इस्तेमाल हुआ है. विदेशों में जमा काले धन का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद, भारत में भी श्रीको मूमेंट्य आ गया है और अगर नहीं, तो आ जाना चाहिए. भारत में अब काले धन को थामने के उपायों की एक बड़ी मुहिम शुरू हो सकती है जिसके कारखाने व ठिकाने तमाम कारोबारों, वित्तीय संस्थानों, जमीन-जायदाद से लेकर राजनैतिक दलों के चंदे तक फैले हैं. यह सबसे बड़ा स्वच्छता मिशन होगा, जिसका इंतजार  दशकों से हो रहा है और पीढिय़ों तक याद किया जाएगा. 
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Monday, October 27, 2014

कालिख छिपाने की रवायत

काले धन की बहस को नामों में उलझा कर सख्‍त गोपनीयता बनाये रखने का रास्‍ता तलाश लिया गया है। विदेशी खातों तक पहुंचने का रास्ता देश के भीतर पारदर्शिता से होकर जाता है, जिसे बनाने का दम-खम अभी तक नजर नहीं आया है. 

जायज कामों के लिए स्विस बैंकों का इस्तेमाल करने वाले अमेरिकी भी अब एक हलफनामा भरते हैं जिसके आधार पर अमेरिकी टैक्स प्रशासन से सूचनाएं साझा की जाती हैं. दुनिया के धनकुबेरों की रैंकिंग करने वाली एक प्रतिष्ठित पत्रिका के मुताबिक ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि अमेरिकी सरकार ने बेहद आक्रामक ढंग से स्विस बैंकों से अमेरिकी लोगों के काले धन की जानकारियां निकाल ली हैं और बैंकों को सख्त शर्तों से बांध दिया है जिसके बाद अमेरिका के लिए स्विस बैंकों की मिथकीय गोपनीयता का खात्मा हो गया है.
काले धन की जन्नतों के परदे नोचने का यही तरीका है. भारत के लोग जब अपनी नई सरकार से इसी तरह के दम-खम की अपेक्षा कर रहे थे तब सरकार सुप्रीम कोर्ट में काले धन के विदेशी खातों का खुलासा करने से मुकरते हुए गोपनीयता के उस खोल में घुस गई, जिससे उसे ग्लोबल स्तर पर जूझना है. सूचनाएं छिपाना काले धन के कारोबार की अंतरराष्ट्रीय ताकत है, जिसे तोड़ने के लिए विकसित देशों के बीच कर सूचनाओं के आदान-प्रदान का नया तंत्र तैयार है. भारत को गोपनीयता के आग्रह छोड़कर इस का हिस्सा बनने की मुहिम शुरू करनी थी, ताकि काले धन के विदेशी खातों तक पहुंचा जा सके. 

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Monday, October 24, 2011

अमावस की लक्ष्मी

देवी सूक्‍त कहता है, लक्ष्‍मी श्‍वेत परिधान धारण करती है। अमृत के साथ, समुद्र से जन्‍मी शुभ व पवित्र लक्ष्‍मी सबको समृद्धि बांटती है, किंतु यह बेदाग लक्ष्मी मानो दुनिया के आंगन से रुठ ही गई है। यहां तो अमावस जैसी काली लक्षमी पूरे विश्‍व में जटा खोले अघोर नृत्‍य कर रही है। यह लक्ष्‍मी करों के स्‍वर्ग (टैक्‍स हैवेन) में निवास करती है और बड़े बड़ों के हाथ नहीं आती। काली लक्षमी का दीवाली अपडेट यह है कि कर स्‍वर्गों के दरवाजे खोलने चले दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्‍क हार कर बैठ गए हैं। खरबों डॉलर छिपाये दुनिया के 72 कर स्‍वर्ग पूरे विश्‍व को फुलझडि़यां दिखा कर बहला रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी ने बीते एक साल में इन स्‍वर्गों को धमका फुसलाकर अपनी काली लक्ष्‍मी की कुछ खोज खबर हासिल भी कर ली मगर भारत तो बिल्‍कुल गया बीता है। कर स्‍वर्गों को दबाने के बजाय हमारी सरकार काले धन की जांच रोकने के लिए अदालत के सामने गिड़गिड़ा रही है। दीपावली पर शुद्ध और पवित्र लक्षमी की आराधना करते हुए, काली लक्ष्‍मी की ताकत बढ़ने की खबरें हमें मायूस करती हैं।
ताकतवर मायाजाल
भारतीय पिछले सप्‍ताह जब महंगाई में दीवाले का हिसाब लगा रहे थे तब दुनिया को यह पता चला कि वित्‍तीय सूचनायें छिपाने वाले मुल्‍कों की संख्‍या 72 ( 2009 में 60) हो गई है। प्रतिष्ठित संगठन टैक्‍स जस्टिस नेटवर्क की ताजी पड़ताल ने यह भ्रम खत्‍म कर दिया कि कर स्‍वर्गों के खिलाफ जी20 देशों की दो साल पुरानी मुहिम को कोई कामयाबी मिली है। कर स्‍वर्ग में करीब 11.5 ट्रिलियन डॉलर छिपे हैं। काली लक्षमी के इन अंत:पुरों में करीब पचास फीसदी पैसा (1.6 ट्रिलियन डॉलर-ग्‍लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी रिपोर्ट 2006) विकासशील देशों से जाता है। इन के कारण विकासशील देश हर साल करीब एक ट्रिलियन डॉलर का टैक्‍स गंवाते हैं। पैसा भेजने वाले पांच प्रमुख देशों में भारत शामिल है। चीन इनका अगुआ है। टैक्‍स जस्टिस नेटवर्क का फाइनेंशियल सीक्रेसी इंडेक्‍स 2011 बताता है कि केमैन आइलैंड

Monday, March 14, 2011

हसन अली का स्वर्ग

अथार्थ
मुंबई की अदालत में मिंट चबा रहा हसन अली दरअसल भारत के कानून को चबा रहा था। हसन अली को जमानत देते हुए अदालत पूरी दुनिया को बता रही थी कि भारत की जांच एजेंसियों का डायनासोरी तंत्र अपने सबसे पुराने और मशहूर कर चोर व काले धन के सरगना के खिलाफ एक कायदे का मुकदमा भी नहीं बना सकता। दो माह पहले वित्त मंत्री बड़े भोलेपन के साथ विश्‍व को बता चुके हैं कि हसन अली के स्विस बैंक खाते तो खाली हैं। होने भी चाहिए, काले धन पर इतनी चिल्ल-पों के बाद के बाद कोई अहमक ही खातों में पैसा रखेगा। हसन अली हमारी व्यावस्था की  शर्मिंदगी का शानदार प्रतीक है। स्विस बैंक की गर्दन दबाकर अमेरिका अपने 2000 हसन अलियों का सच उगलवा लेता है और प्रख्यात टैक्स हैवेन केमैन आइलैंड का धंधा ही बंद करा देता है। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के डपटने पर लीचेंस्टीन, वर्जिन आइलैंड पैसा व जानकारी समर्पित कर देते हैं लेकिन हसन अली का देश यानी भारत तो दुनिया में उन देशों में शुमार है, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में जिनका रिकार्ड संदिग्ध है क्यों कि भारत ने आज तक भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय संधि पर दस्तंखत नहीं किये हैं। इस संधि के बिना किसी कर स्वर्ग से जानकारी कैसे मिलेगी। दरअसल हसन अली ने जो छिपाया है उससे ज्यादा खोल दिया है वह कालेधन, कर चोरी, हथियारों की दलाली और वित्तीय जरायम से निबटने की हमारी क्षमताओं का नंगा सच उघाड़ रहा है। हसन अलियों के लिए भारत स्वर्ग यूं ही नहीं बन गया है।
हसन अली के मौके
एक्साइज इंस्पेक्टर का बेटा हसन अली भारत में सर्वसुलभ रास्तों पर चल कर काले धन दुनिया का सितारा बना है। काले धन के उत्पादन पर उपलब्धं टनों शोध व अध्ययनों के मुताबिक कर चोरी काले धन की पैदावार का सबसे बड़ा जरिया है। याद कीजिये भारत में तस्करी की दंतकथायें कर कानूनों के कारण ही बनी थीं। कर नियमों में स्थिरता और पारदर्शिता कर चोरी रोकती है। मगर भारत में तो हर वित्त मंत्री अपने हर बजट में कर कर व्यवस्था मनचाहे ढंग से कहीं भी

Monday, January 31, 2011

हम सब काले, कालिख वाले !


अर्थार्थ
कसठ का हो चुका गणतंत्र अपनी सबसे गहरी कालिख को देखकर शर्मिंदा है। सराहिये इस शर्मिंदगी को, यही तो वह काला (धन) दाग है जो हर आमो-खास के धतकरम, चवन्नी छाप रिश्वंतखोरी से लेकर कीर्तिमानी भ्रष्टाचार और हर किस्म के जरायम अपने अंदर समेट लेता है। यह धब्बा हर क्षण बढ़ता है महसूस होता है मगर नजर नहीं आता। सरकार की साख में अभूतपूर्व गिरावट के बीच काले धन की कालिख भी चमकने लगी है। दिल्ली से स्विटजरलैंड तक भारत के काले (धन) किस्से कहे सुने जा रहे हैं। वैसे अगर टैक्स हैवेन की पुरानी और रवायती बहस को छोड़ दिया जाता तो हकीकत यह है कि काली अर्थव्यवस्था हमारे संस्कार में भिद चुकी है। आर्थिक अपराध का यह अदृश्‍य चरम अब हम हिंदुस्ता्नियों की नंबर दो वाली आदत है। अर्थव्‍यवस्था इसकी चिकनाई पर घूमती है। टैक्सन हैवेन के रहस्यों पर सरकार का असमंजस लाजिमी है क्यों कि पिछले साठ वर्षों में इस कालिख के उत्पावदन को हर तरह से बढ़ावा दिया गया है। भारत में साल दर साल काले धन के धोबी घाट( मनी लॉड्रिंग के रास्ते ) बढ़ते चले गए हैं। काला धन हमारी मजबूर और मजबूत आर्थिक विरासत बन चुका है।
कालिख के कारखाने
अब टैक्स के डर से और काली कमाई कोई नहीं छिपाता बल्कि काले धन का उत्पादन सुविधा, स्‍वभाव और सु‍नोयजित व्यवस्था के तहत होता है। भारत कुछ ऐसे अजीबोगरीब ढंग से उदार हुआ है कि एनओसी, अप्रूवल, नाना प्रकार के फॉर्म, सार्टीफिकेट, डिपार्टमेंटल क्लियरेंस, इंस्पेक्शन रिपोर्ट, तरह तरह की फाइलों, दस्तावेजों, इंसपेक्टेर राज आदि से गुंथी बुनी सरकारी दुनिया में हर सरकारी दफ्तर एक प्रॉफिट सेंटर