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Saturday, July 13, 2019

जिएं तो जिएं कैसे


प्रत्‍येक बड़ा कारोबार कभी न कभी छोटा ही होता है. इस ग्लोबल सुभाषित की भारतीय व्याख्या कुछ इस तरह होगी कि भारत में हर छोटा कारोबार छोटे रहने को अभिशप्तहोता है. आमतौर पर या तो वह घिसट रहा होता है, या फिर मरने के करीब होता है. यहां बड़ा कारोबारी होना अपवाद है और छोटे-मझोले बने रहना नियम. कारोबार बंद होने की संभावनाएं जीवित रहने की संभावनाओं की दोगुनी होती हैं.

भारत में 45 साल की रिकॉर्ड बेकारी की वजहें तलाशते हुए सरकारी आर्थिक समीक्षा को उस सच का सामना करना पड़ा है जिससे ताजा बजट ने आंखें चुरा लीं. यह बात अलग है कि बजट उसी टकसाल में बना है जिसमें आर्थिक समीक्षा गढ़ी जाती है.

सरकार का एक हाथ मान रहा है कि भारत की बेरोजगारी अर्थव्यवस्था के केंद्र या मध्य पर छाए संकट की देन है. कमोबेश स्व-रोजगार पर आधारित खेती और छोटे व्यवसाय अर्थव्यवस्था की बुनियाद हैं जो किसी तरह चलते रहते हैं जबकि बड़ी कंपनियां अर्थव्यवस्था का शिखर हैं जिनके पास संसाधनों और अवसरों का भंडार है. इन्हें कोई खतरा नहीं होता. रोजगारों और उत्पादकता का सबसे बड़ा स्रोत मझोली कंपनियां या व्यवसाय हैं जिनमें 25 से 100 लोग काम करते हैं. बड़े होने की गुंजाइश इन्हीं के पास है. इनके लगातार सिकुड़ने या दम तोड़ने के कारण ही बेरोजगारी गहरा रही है.

मध्यम आकार की कंपनियों का ताजा हाल दरअसल संख्याएं नहीं बल्कि बड़े सवाल हैं, बजट जिनके जवाबों से कन्नी काट गया.

         संगठित मैन्युफैक्चरिंग के पूरे परिवेश में 100 से कम कर्मचारियों वाली कंपनियों का हिस्सा 85 फीसद है लेकिन मैन्युफैक्चरिंग से आने वाले रोजगारों में ये केवल 14 फीसद का योगदान करती हैं. उत्पादकता में भी यह केवल 8 फीसद की हिस्सेदार हैं यानी 92 फीसद उत्पादकता केवल 15 फीसद बड़ी कंपनियों के पास है.

         दस साल की उम्र वाली कंपनियों का रोजगारों में हिस्सा 60 फीसद है जबकि 40 साल वालों का केवल 40 फीसद. अमेरिका में 40 साल से ज्यादा चलने वाली कंपनियां भारत से सात गुना ज्यादा रोजगार बनाती हैं. इसका मतलब यह कि भारत में मझोली कंपनियां लंबे समय तक नहीं चलतीं इसलिए इनमें रोजगार खत्म होने की रफ्तार बहुत तेज है. अचरज नहीं कि नोटबंदी और जीएसटी या सस्ते आयात इन्हीं कंपनियों पर भारी पड़े.

निवेश मेलों में नेताओं के साथ मुस्कराते एक-दो दर्जन बड़े उद्यमी अर्थव्यवस्था का शिखर तो हो सकते हैं लेकिन भारत को असंख्य मझोली कंपनियां चाहिए जो इस विशाल बाजार में स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं की रीढ़ बन सकें. ऐसा न होने से बेकारी के साथ दो बड़ी असंगतियां पैदा हो रही हैं:

एकहर जगह बड़ी कंपनियां नहीं हो सकतीं. विशाल कंपनियों के बिजनेस मॉडल क्रमश: उनका विस्तार रोकते हैं. भारत की स्थानीय अर्थव्यवस्था में (पुणे, कानपुर, जालंधर, कोयंबत्तूर, भुवनेश्वर आदि) इसके विकास में संतुलन का आधार हैं. मझोली कंपनियां इन लोकल बाजारों में रोजगार और खपत दोनों को बढ़ाने का जरिया हैं.

दोमध्यम आकार की ज्यादातर कंपनियां स्थानीय बाजारों में खपत का सामान या सेवाएं देती हैं और आयात का विकल्प बनती हैं. यह बाजार पर एकाधिकार को रोकती हैं. मझोली कंपनियों के प्रवर्तक अब आयातित सामग्री के विक्रेता या बड़ी कंपनियों के डीलर बन रहे हैं जिससे खपत के बड़े हिस्से पर चुनिंदा कंपनियों का नियंत्रण हो रहा है जो कीमतों को अपने तरह से तय करती हैं.

पिछले एक दशक में सरकारें प्रोत्साहन और सुविधाओं के बंटवारे में स्थानीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन नहीं बना पाईं. रियायतें, सस्ता कर्ज और तकनीक उनके पास पहुंची जो पहले से बड़े थे या प्राकृतिक संसाधनों (जमीन, स्पेक्ट्रम, खनन) को पाकर बड़े हो गए. उन्होंने बाजार में प्रतिस्पर्धा सीमित कर दी. दूसरी तरफ, टैक्स नियम-कानून, महंगी सेवाओं और महंगे कर्ज की मारी मझोली कंपनियां सस्ते आयात की मार खाकर प्रतिस्पर्धा से बाहर हो गईं और उनके प्रवर्तक बड़ी कंपनियों के एजेंट बन गए.

यह देखना दिलचस्प है कि प्रत्यक्ष अनुभव, आंकड़े और सरकारी आर्थिक समीक्षा वही उपदेश दे रहे हैं जो एक चतुर और कामयाब उद्यमी अपनी अगली पीढ़ी से कहता है कि या तो घास बने रहो या फिर जल्द से जल्द बरगद बन जाओ. घास बार-बार हरी हो सकती है और बरगदों को कोई खतरा नहीं है. हर मौसम में मुसीबत सिर्फ उनके लिए है जो बीच में हैं यानी न जिनके पास गहरी जड़ें हैं और न ही मजबूत तने.

चुनावी चंदे बरसाने वाली बड़ी कंपनियों के आभा मंडल के बीच, सरकार नई औद्योगिक नीति पर काम कर रही है. क्या इसे बनाने वालों को याद रहेगा कि गुलाबी बजट की सहोदर आर्थिक समीक्षा अगले दशक में बेकारी का विस्फोट होते देख रही है. जब कामगार आयु वाली आबादी में हर माह 8 लाख लोग (97 लाख सालाना) जुड़ेंगे. इनमें अगर 60 फीसद लोग भी रोजगार के बाजार में आते हैं तो हर महीने पांच लाख (60 लाख सालाना) नए रोजगारों की जरूरत होगी.


Saturday, July 8, 2017

जीएसटी का चीन कनेक्शन


चीन के लिए जीएसटी अच्‍छी खबर नहीं है लेकिन भारतीय उद्योगों के लिए क्‍या यह खुश खबरी है ?


इस साल दीपावली पर चीन में बने बल्‍ब और पटाखे अगर कम नजर आएं तो जीएसटी को याद कीजिएगा. चीन से जीएसटी का अनोखा रिश्‍ता बनने वाला है. यह सस्‍ते चीनी सामान के आयात पर भारी पड़ेगा. रिएक्‍टरमशीनेंटरबाइन जैसे बड़े आयात बेअसर रहेंगे लेकिन जीएसटी के चलते सस्‍ते उत्‍पादों की अंतरदेशीय बिक्री थम सकती है जिससे तात्‍कालिकमहंगाई नजर आएगी.

चीन से आने वाले सस्‍ते खिलौनेछोटे इलेक्‍ट्रॉनिक्‍समोबाइल एसेसरीजबिजली के सामानटाइल्‍सक्रलोरिंगस्‍टेशनरी व प्‍लास्टिकके कारण दिल्‍ली के गक्रफार मार्केटनेहरू प्‍लेस या मुंबई का मुसाफिर खाना मनीष मार्केट और देशभर में फैले ऐसे ही दूसरे बाजार गुलजार रहते हैं. इन बाजारों में अगले कुछ महीनों के दौरान सन्‍नाटा नजर आ सकता है.

चीन के सस्‍ते करिश्‍मे आम लोगों तकपहुंचने की शुरुआत भारतीय आयातकों के यिवू (सस्‍ते सामानों का दुनिया में सबसे बड़ा बाजार) पहुंचकर माल चुनने और ऑर्डर देने से होती है. इन आयातों पर 14 से 28 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी लगती है. 

चीन में उत्‍पादन पर सब्सिडी के चलते ज्‍यादातर सामान बेहद सस्‍ते होते हैं इसलिए कई उत्‍पादों पर काउं‍टर‍वेलिंग या ऐंटी डंङ्क्षपग ड्यूटी (0 से 150 फीसदी तकभी लगाई गई है ताकि देशी उत्‍पादको संरक्षण मिल सके. हाल में ही सरकार ने सेरमिकक्रॉकरी और सिलाई मशीन के पुर्जों पर ऐंटी डंपिंग ड्यूटी लगाई है.

सस्‍ते चीनी माल का आयात थोकमें (पूरा कंटेनर) होता है. अंतरराज्‍यीय वितरण तंत्र इनकी बिक्री की रीढ़ है‍ जिसके जरिए पलकझपकते चीन माल शहरों से कस्‍बों और गांवों तकफैल जाता है. ज्‍यादातर बिक्री नकद में होती है जो टैक्‍स नेटवर्क से बाहर है.

छोटे व्‍यापारी थोकविक्रेताओं से उपभोक्‍ताओं की तरह माल खरीदते हैं. टैक्‍स व ट्रांसपोर्ट अधिकारियों की मुट्ठी गरमाते हुए उपभोकताओं तकमाल पहुंचाते हैं. चीनी उत्‍पादों की लागत इतनी कम है कि ऊंची इंपोर्ट ड्यूटीरि‍श्‍वतों और सबके मार्जिन के बावजूद सामान बेहद सस्‍ता बिकता है।

जीएसटी चीनी सामान की अंतराज्‍यीय बिक्री के लिए बुरी खबर है

कोई गैर रजिस्‍टर्ड कारोबारी अंतरराज्‍यीय बिक्री नहीं कर सकेगा। राज्‍यों के बीच चीनी सामान की आवाजाही टैक्‍स राडार पर होगी। ई वे बिल लागू होने के बाद गैर रजिस्‍टर्ड ट्रांसपोर्ट लगभग बंद हो जाएगा

जीएसटी की छूट सीमा (20 लाख के टर्नओवर पर  छूट और 75 लाख तक कारोबार पर कंपोजीशन स्‍कीम) वाले कारोबारी भी अंतरराज्‍यीय कारोबार नहीं कर सकेंगे। यानी कि सस्‍ते चीनी माल को स्‍थानीय बाजार में ही बेचना होगा इससे  आपूर्ति सीमित हो जाएगी

खुदरा कारोबारियों के जरिये चोरी छिपे अंतरराज्‍यीय बाजारों में पहुंचने वाले सामान की मात्रा कम ही होगी

जीएसटी नेटवर्कमें पंजीकरण के बाद बिकने वाला चीनी सामान टैक्‍स के कारण खासा महंगा होगा

सरकार ने जीएसटी के तहत कई एसे सामानों पर ऊंचा टैक्‍स (18 और 28 फीसदी) लगाया है जो आमतौर पर चीन से आयात होते हैं

जीएसटी का यह तात्‍कालिक 'फायदाशुरुआत में दर्द लेकर आने वाला है

1. चीन से आना वाला सस्‍ता मांग भारत में कई चीजों की महंगाई रोकने में बड़ी भूमिका निभाता है इनमें प्‍लास्टिकइलेक्‍ट्रॉनिक्‍सलाइटिंगक्रॉकरी आदि प्रमुख हैं। इन कारोबारों में किल्‍लत और कीमतें बढऩा लगभग तय है। कीमतों में ज्‍यादा तेजी दूरदराज के बाजारों में दिखेगी जहां सीधे आयात नहीं होता।

2. भवन निर्माणइलेक्‍ट्रानिक्‍स रिपयेरिंग जैसे कई उद्योग व सेवायें चीन से सस्‍ते माल पर निर्भर हैं । देशी उत्‍पादन इनकी कमी पूरी नहीं कर सकता इसलिए कई बाजारों में लंबे समय तकसन्‍नाटा रह सकता है

3.छोटे शहरों में चीनी माल की बिक्री के कारोबार और रोजगार में खासी कमी आ सकती है

अलबत्‍ताअगर आप इसे भारतीय उद्योगों के लिए मौके के तौर पर देख रहे हैं तो  उत्‍साह को संभालिये। चीन से आयात होने वाले सामान के बदले भारत में उत्‍पादन की जल्‍दी शुरुआत मुश्किल है।

इसकी भी वजह जीएसटी ही है।

जीएसटी में उन उत्‍पादों पर ऊंचा टैक्‍स लगा है जो  छोटे व असंगठित क्षेत्र में बनते हैं और चीनी माल का विकल्‍प बन सकते हैं इसके अलावा जीएसटी नियमों को लागू करने की भी खासी ऊंची होगी। ईंधन यानी पेट्रोल डीजलबिजलीकर्ज और जमीन की महंगाई के कारण परेशान छोटे उद्योगों के लिए जीएसटी चैत की कड़ी धूप की मानिंद है

भारतीय उद्योग इतनी बड़ी मात्रा में इतने सस्‍ते सामान नहीं बना सकतेइसलिए सस्‍ते चीनी माल की आपूर्ति लौटेगी अलबत्‍ता इस बार चीनी उत्‍पाद जीएसटी के नेटवर्कमें दर्ज होकर आएंगे। उपभोक्‍ताओं के लिए कीमतें और चीनी सामान का इस्‍तेमाल करने वालों की लागत बढेगी लेकिन सरकार का राजस्‍व भी बढेगा।

क्‍या देशी उद्योग चीनी माल से टक्‍कर ले पाएंगे?

उसके लिए सरकारों को कमाई का लालच छोड़ कर टैक्‍स कम करने होंगे
जीएसटी से फायदा है या नुकसान! फिलहालयह फैसला हम आप छोड़ते हैं   गुड्स एंड सर्विसेज टैक्‍स का सफर तो अभी बस शुरु ही हुआ है




Monday, November 7, 2016

देसी मिसाइल, चीनी पटाखे

 छोटे कारखाने ही चीन की ताकत हैं जबकि हमारा भव्य मेक इन इंडिया छोटी इकाइयों को ताकत तो दूरकारोबारी इज्जत भी नहीं दे सका.

रेलू फर्नीचर, प्लास्टिक के डिब्बे, मुलायम खिलौने या छाते बनाने के लिए अरबों डालर के निवेश की जरूरत नहीं होती. दीवाली के रंगीन बल्ब, पंखे या घडिय़ां बनाने के लिए पेटेंट वाली तकनीक नहीं चाहिए. दुनिया के किसी देश में सैमसंग, माइक्रोसॉफ्ट, अंबानी, सिमेंस, टाटा, अडानी, सोनी या उनके समकक्ष पटाखे, क्रॉकरी, तौलिये, पेन, कैल्कुलेटर आदि नहीं बनाते. उस चीन में भी नहीं जिसे इस दीवाली हम जमकर बिसूरते रहे. दुनिया के प्रत्येक बड़े मुल्क की तरह चीन में भी इन चीजों का निर्माण छोटी इकाइयां ही करती हैं. यही छोटी ग्रोथ फैक्ट्रीज ही मेड इन चाइना की ग्लोबल ताकत हैं जबकि दूसरी तरफ हमारा भव्य मेक इन इंडिया है जो छोटी इकाइयों को ताकत तो दूर, कारोबारी इज्जत भी नहीं बख्श सका.

बीते सप्ताह भारत में पटाखा क्रांतिकारी जिस समय सोशल नेटवर्कों पर बता रहे थे कि किस तरह भारत में मेड इन चाइना लट्टू-पटाखों के बहिष्कार से चीन कांप उठा है! ठीक उसी दौरान वर्ल्ड बैंक ने दुनिया में कारोबार करने के लिए आसान (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) देशों की रैंकिंग जारी की. सरकार ने पिछले दो साल में सारे कुलाबे मिला दिए लेकिन कारोबार की सहजता में भारत की रैंकिंग बमुश्किल एक अंक ऊपर (131 से 130) जा सकी. भारत की इस घटिया रैंकिंग का चीन से सस्ते आयात से बहुत गहरा रिश्ता है. इसे समझने के लिए बहिष्कारों की नाटकबाजी के बजाए बाजार की हकीकत से आंख मिलाना जरूरी है.

भारत में औसत मासिक खपत में अब लगभग 70 फीसदी उत्पाद मैन्युफैक्चरिंग के हैं. फल, दूध, सब्जी जैसे कच्चे सामान भी मैन्युफैक्चरिंग (पैकेजिंग, परिवहन, प्रोसेसिंग) की मदद के बिना हम तक नहीं पहुंचते. कारें, फ्रिज, टीवी, मोबाइल रोज की खरीद नहीं हैं अलबत्ता हमारे उपभोग खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा जिन उत्पादों (कॉस्मेटिक्स, सस्ते इलेक्ट्रॉनिक्स, गारमेंट्स) में जाता है, वे सामान्य तकनीक से बनते हैं. कीमतों का प्रतिस्पर्धात्मक होना ही इनकी सफलता का आधार है जो बाजारों के करीब इकाइयां लगाकर और प्रोसेस व पैकेजिंग इनोवेशन के जरिए हासिल किया जाता है. चीन से 61 अरब डॉलर के आयात में करीब एक-तिहाई ऐसे ही उत्पाद हैं जिन्हें छोटी इकाइयां, भारत से 50 फीसदी तक कम कीमत पर बना लेती हैं.

सामान्य तकनीक और मामूली इनोवेशन वाले इन उत्पादों को हम क्यों नहीं बना सकते? इसका जवाब हमें विश्व बैंक की उस रैंकिंग में मिलेगा सरकार जिसे निगलने में हांफ रही है. 189 देशों के बीच रैंकिंग में भारत का 130वां दर्जा भारत में कारोबारी कठिनता का अधूरा सच है. पूरे सच के लिए उन दस पैमानों को देखना होगा जिन पर यह रैंकिंग बनती है. कारोबार शुरू करने की सुविधा में भारत की रैंकिंग 155वीं है, जो पाकिस्तान से भी खराब है. भारत के बाद इस रैंकिंग में गाजा, वेस्ट बैंक, लीबिया आदि आते हैं. इसी तरह भवन निर्माण की  मंजूरी में भारत की रैंकिंग 185वीं और टैक्स में 172वीं है.

हमें सवाल पूछना चाहिए कारोबार शुरू करने में मुसीबत कौन झेलता है? इंस्पेक्टर राज, टैक्स, बिजली कनेक्शन, कर्ज लेना किसके लिए मुश्किल है? ईज ऑफ डूइंग बिजनेस किसे चाहिए, छोटी इकाइयों के लिए जिनसे सस्ते आयात का विकल्प निकलना है या फिर मेक इन इंडिया के झंडे लेकर खड़ी सौ-दो सौ कंपनियों के लिए जिनके लिए हर राज्य में लाल कालीन बिछे हैं? यह जानते हुए भी बड़ी कंपनियां सभी राज्यों में निवेश नहीं करेंगी, मुख्यमंत्री झुककर दोहरे हुए जा रहे हैं. कोई मुख्यमंत्री छोटी कंपनियों के लिए कोई निवेश मेला लगाता नहीं दिखता.

पिछले दो दशकों के दौरान भारत में बड़ी कंपनियों का अधिकांश निवेश दो तरह के क्षेत्रों में आया है. एकजहां प्राकृतिक संसाधन का लाइसेंस मिलने की सुविधा है, जैसे कोयला, स्पेक्ट्रम, खनिज आदि. दोजहां प्रतिस्पर्धा बढऩे की संभावनाएं सीमित हैं और तकनीक या भारी उत्पादन क्षमता के जरिए बाजार का बड़ा हिस्सा लेने का मौका है, मसलन ऑटोमोबाइल, सॉफ्टवेयर, स्टील, सीमेंट आदि.

यकीनन, भारत को बड़े निवेश चाहिए और मिल भी रहे हैं लेकिन मुसीबत यह है कि बाल्टियां, पटाखे, गुब्बारे, खिलौने, बर्तन कौन बनाएगा और वह भी आयात से कम लागत पर. कोई अंबानी, अडानी, सैमसंग तो इन्हें बनाने से रहा. भारत के अलग हिस्सों में असंख्य उत्पादन क्षमताएं चाहिए जो बड़े पैमाने पर सामान्य तकनीक वाले उत्पाद बना सकें और देश के हर छोटे-बड़े बाजार तक पहुंचा सकें ताकि 125 करोड़ की आबादी अपनी सामान्य उत्पादों और उपभोग खपत के लिए आयात पर निर्भर न रहे. यह काम केवल छोटी इकाइयां कर सकती हैं क्योंकि उनके पास ही कम लागत पर उत्पादन का आर्थिक उत्पादन और मांग के मुताबिक तेजी से इनोवेशन की सुविधा है.

छोटी इकाइयां आत्मनिर्भरता और महंगाई पर नियंत्रण के लिए ही जरूरी नहीं हैं बल्कि बड़ी इकाइयों में बढ़ते ऑटोमेशन और रोबोटिक्स के बीच अधिकांश रोजगार भी यहीं से आने हैं. चीन के 80 फीसदी रोजगार छोटे उद्योगों में हैं यानी उन वस्तुओं के निर्माण से आते हैं जिनके बहिष्कार का नाटक हमने किया था.

हमें इस सच को स्वीकार करना होगा कि भारत में छोटे उद्योगों की बीमारी बहुत बड़ी हो चुकी है. छोटे कारोबारियों के लिए भारत दुनिया का सबसे कठिन देश है, यही वजह है कि ज्यादातर छोटे उद्यमी आयातित सामान के ट्रेडर या बड़ी कंपनियों के वितरक हो चले हैं. हमें मानना चाहिए कि मेक इन इंडिया हमें रोजगार और निवेश नहीं दे सका है और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का पाखंड केवल चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित रह गया है.

यदि हमें चीन से सस्ते आयात का मुकाबला करना है तो मेक इन इंडिया का पूरा मजमून बदलना होगा. हमें चीन से चिढऩा नहीं बल्कि सीखना होगा जो अपनी छोटी कंपनियों को माइक्रोमल्टीनेशनल में बदल रहा है. उदारीकरण के 25 बरस बाद अब भारत को दस बड़े ग्लोबल ब्रांड के बजाए पांच सौ छोटे देसी ब्रांड चाहिए, नहीं तो हमें इस असंगति के साथ जीना पड़ेगा कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था मिसाइल तो बना सकती हैं लेकिन पटाखों के लिए हम चीन पर निर्भर हैं.