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Monday, June 29, 2015

इकबाल का सवाल

मोदी सरकार के कई मिथक अचानक टूटने लगे हैं। बाहर से भव्‍य फिल्‍म सेट की तरह दिखती सरकार में पर्दे के पीछे यूपीए जैसी अपारदर्शिता और नीति शून्यता झांकने लगी है.
ई सरकार का मंत्रिमंडल बेदम है. उम्मीद है, सरकार आगे निराश नहीं करेगी.'' मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के अगले ही दिन अंतरराष्ट्रीय निवेश फर्म क्रेडिट सुइस की यह टिप्पणी बहुतों को अखर गई थी. निष्कर्ष तथ्यसंगत था लेकिन टिप्पणी कुछ जल्दबाजी में की गई लगती थी. अलबत्ता बीते सप्ताह एक बड़े विदेशी निवेशक ने दो-टूक अंदाज में मुझसे पूछा कि मोदी सरकार का प्लान बी क्या है? तो मुझे अचरज नहीं हुआ क्योंकि सियासी से लेकर कॉर्पोरेट गलियारों तक यह प्रश्न कुलबुलाने लगा है कि क्या नरेंद्र मोदी के लिए अपनी सरकार की बड़ी सर्जरी करने का वक्त आ गया है. यह सवाल केवल सरकार के कमजोर प्रदर्शन से ही प्रेरित नहीं है. सुषमा-वसुंधरा के ललित प्रेम, स्मृति ईरानी की मूर्धन्यता के विवाद और सरकार व पार्टी पर मोदी-शाह के इकबाल को लेकर असमंजस की गूंज भी इस सवाल में सुनी जा सकती है.
मोदी सरकार का एक साल पूरा होने तक यह सच लगभग पच गया था कि अपेक्षाओं व मंशा के मुकाबले नतीजे कमजोर रहे हैं. लेकिन यह आशंका किसी को नहीं थी कि नई सरकार कोई ठोस बदलाव महसूस कराए बिना अपने शैशव में ही उन विवादों में उलझ जाएगी जो न केवल गवर्नेंस के उत्साह निगल सकते हैं, बल्कि जिनके चलते सरकार और बीजेपी में नरेंद्र मोदी व अमित शाह का दबदबा भी दांव पर लग जाएगा.
पिछले एक साल में मोदी सरकार के दो चेहरे दिखे हैं. एक चेहरा भव्य और शानदार आयोजनों व प्रभावी संवाद की रणनीतियों का है.  लेकिन इसके विपरीत दूसरा चेहरा गवर्नेंस में ठोस यथास्थिति का है जो पिघल नहीं सकी. यह ठहराव खुद प्रधानमंत्री को भी बेचैन कर रहा है. सरकार की इस बेचैनी को तथ्यों में बांधा जा सकता है. मसलन, नौकरशाही में फेरबदल को लीजिए. पिछले 12 माह में केंद्र की नौकरशाही में तीन बड़े फेरबदल हो चुके हैं. यह उठापटक, सरकार चलाने में असमंजस की नजीर है. मोदी सरकार ब्यूरोक्रेसी को स्थिर और स्वतंत्र बनाना चाहती है जबकि ताबड़तोड़ फेरबदल ने उलटा ही असर किया है. ठीक इसी तरह क्रियान्वयन की चुनौतियों के चलते, तमाम बड़ी घोषणाओं के लक्ष्य व प्रावधान बदल दिए गए हैं. अगर वन रैंक वन पेंशन, खाद्य महंगाई, उच्च पदों पर पारदर्शिता जैसे बड़े चुनावी वादों पर किरकिरी को इसमें जोड़ लिया जाए तो महसूस करना मुश्किल नहीं है कि ढलान सामने है और वापसी के लिए सरकार की सूरत व सीरत में साहसी बदलाव करने होंगे, क्योंकि अभी चार साल गुजारने हैं.
नरेंद्र मोदी अब अपनी सरकार की सर्जरी किए बिना आगे नहीं बढ़ सकते. मंत्रिमंडल के पहले पुनर्गठन तक यह बात साफ हो गई थी कि तजुर्बे व पेशेवर लोगों की कमी के कारण टीम मोदी अपेक्षाओं के मुकाबले बेहद लचर है. पिछले एक साल का रिपोर्ट कार्ड इस बात की ताकीद करता है कि ज्यादातर मंत्री कोई असर नहीं छोड़ सके हैं. वजह चाहे मंत्रियों की अक्षमता हो या उन्हें अधिकार न मिलना, लेकिन मोदी का मंत्रिमंडल उनकी मंशाओं को जमीन पर उतारने में नाकाम रहा है. महत्वपूर्ण संस्थाओं में खाली शीर्ष पद बताते हैं कि एक साल बाद भी सरकार का आकार पूरा नहीं हो सका है. अगर मोदी अगले तीन माह में अपने मंत्रिमंडल में अकर्मण्यता का बोझ कम नहीं करते तो नीति शून्यता और कमजोर गवर्नेंस की तोहमतें उनका इंतजार कर रही हैं.
मोदी भले ही सलाह न सुनने के लिए जाने जाते हों लेकिन अब उन्हें अर्थव्यवस्था, विदेश नीति से लेकर अपने भाषणों तक के लिए थिंक टैंक और सलाहकारों की जरूरत है जो सरकार को नीतियों, कार्यक्रमों और कानूनों की नई सूझ दे सकें. नई पैकेजिंग में यूपीए की स्कीमों के दोहराव के कारण बड़े-बड़े मिशन छोटे नतीजे भी नहीं दे पा रहे हैं और असफलताएं बढऩे लगी हैं. मोदी सरकार को क्रियान्वयन के ढांचे में भी सूझबूझ भरे बदलावों की जरूरत है जिसके लिए उसे पेशेवरों की समझ पर भरोसा करना होगा जैसा कि दुनिया के अन्य देशों में होता है.
नरेंद्र मोदी अपनी सरकार और पार्टी में नैतिकता व पारदर्शिता के ऊंचे मानदंडों से समझौते का जोखिम नहीं ले सकते, क्योंकि उनकी सरकार को मिले जनादेश की पृष्ठभूमि अलग है. वसुंधरा, सुषमा, स्मृति, पंकजा के मामले बीजेपी से ज्यादा मोदी की राजनीति के लिए निर्णायक हैं. इन मामलों ने मोदी को दोहरी चोट पहुंचाई है. एक तो उनकी साफ-सुथरी सरकार अब दागी हो गई है. दूसरा, पद न छोडऩे पर अड़े नेता मोदी-शाह के नियंत्रण को चुनौती दे रहे हैं. गवर्नेंस और पारदर्शिता के मामले में मोदी की चुनौतियां मनमोहन से ज्यादा बड़ी हैं. मनमोहन के दौर में भ्रष्टाचार व नीति शून्यता की तोहमतें गठबंधन की मजबूरियों पर मढ़ी जा सकती थीं. यही वजह थी कि यूपीए सरकार के कलंक का बड़ा हिस्सा कांग्रेस पार्टी के खाते में गया. अलबत्ता बीजेपी में तो सरकार और पार्टी दोनों मोदी में ही समाहित हैं और उनकी अपनी ही पार्टी के नेता दागी हो रहे हैं. इसलिए सभी तोहमतें सिर्फ मोदी के खाते में दर्ज होंगी.
मुसीबत यह है कि नई सरकार के कई मिथक अचानक एक साथ टूटने लगे हैं. मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों पर मोदी की सख्त पकड़ की दंतकथाओं के विपरीत वरिष्ठ मंत्री व मुख्यमंत्री दागी होते दिख रहे हैं, जबकि जन संवाद की जबरदस्त रणनीतियों के बावजूद ठोस नतीजों की अनुपस्थिति लोगों को निराश कर रही है. सरकार एक साल के भीतर ही फिल्म सेट की तरह दिखने लगी है जिसमें बाहर भव्यता है लेकिन पीछे यूपीए जैसी अपारदर्शिता और नीति शून्यता बजबजा रही है.

मोदी जिस तरीके से बीजेपी की राष्ट्रीय राजनीति में उभरे और चुनाव जीते हैं, उसमें उनकी राजनैतिक सफलता का सारा दारोमदार उनकी गवर्नेंस की कामयाबी पर है. यदि सरकार असफल या दागी हुई तो पार्टी पर उनके इकबाल का पानी भी टिकाऊ साबित नहीं होगा. सरकार को लेकर बेचैनी बढऩे लगी है लेकिन भरोसा अभी कायम है. नरेंद्र मोदी को कुछ दो टूक ही करना होगा, उनके लिए बीच का कोई रास्ता नहीं है. सरकार व पार्टी में साहसी बदलावों में अब अगर देरी हुई तो मोदी को अगले चार साल तक एक ऐसी रक्षात्मक सरकार चलाने पर मजबूर होना होगा जो विपक्ष के हमलों के सामने अपने तेवर गंवाती चली जाएगी. यकीनन, नरेंद्र मोदी एक कमजोर व लिजलिजी सरकार का नेतृत्व कभी नहीं करना चाहेंगे.

Monday, February 13, 2012

चूके तो, चुक जाएंगे

स्‍तूर तो यही है कि बजट को नीतियों से सुसज्जित, दूरदर्शी और साहसी होना चाहिए। दस्‍तूर यह भी है कि जब अर्थव्‍यवस्‍था लड़खड़ाये तो बजट को सुधारों की खुराक के जरिये ताकत देनी चाहिए और दस्‍तूर यह भी कहता है कि पूरी दुनिया में सरकारें अपनी अर्थव्‍यवस्‍थाओं को मंदी और यूरोप की मुसीबत से बचाने हर संभव कदम उठाने लगी हैं, तो हमें भी अंगड़ाई लेनी चाहिए। मगर इस सरकार ने तो पिछले तीन साल फजीहत और अफरा तफरी में बिता दिये और देखिये वह रहे बड़े (लोक सभा 2014) चुनाव। 2012 के बजट को सालाना आम फहम बजट मत समझिये, यह बड़े और आखिरी मौके का बहुत बडा बजट है क्‍यों कि अगला बजट (2013) चुनावी भाषण बन कर आएगा और 2014 का बजट नई सरकार बनायेगी। मंदी के अंधेरे, दुनियावी संकटों की आंधी और देश के भीतर अगले तीन साल तक चलने वाली चुनावी राजनीति बीच यह अर्थव्‍यव‍स्‍था के लिए आर या पार का बजट है यानी कि ग्रोथ,साख और उम्‍मीदों को उबारने का अंतिम अवसर। इस बार चूके तो दो साल के लिए चुक जाएंगे।
उम्‍मीदों की उम्‍मीद
चलिये पहले कुछ उम्‍मीदें तलाशते हैं, जिन्‍हें अगर बजट का सहारा मिल जाए तो शायद सूरत कुछ बदल जाएगी। पिछले चार साल से मार रही महंगाई, अपने नाखून सिकोड़ने लगी है। यह छोटी बात नहीं है, इस महंगाई ने मांग चबा डाली, उपभोक्‍ताओं को बेदम कर दिया और रिजर्व बैंक ने ब्‍याज दरें बढ़ाईं की ग्रोथ घिसटने लगी। दिसंबर के अंत में थोक कीमतों वाली मुद्रास्‍फीति बमुश्मिल तमाम 7.40 फीसदी पर आई है। महंगाई में यह गिरावट एक निरंतरता दिखाती है, जो खाद्य उत्‍पाद सस्‍ते होने के कारण आई जो और भी सकारात्‍मक है। महंगाई घटने की उम्‍मीद के सहारे रिजर्व बैंक ने ब्‍याज दरों की कमान भी खींची है। उम्‍मीद की एक किरण विदेशी मुद्रा बाजार से भी निकली है। 2011 की बदहाली के विपरीत सभी उभरते बाजारों में मुद्रायें झूमकर उठ खडी हुई हैं। रुपया, पिछले साल की सबसे बुरी कहानी थी मगर जनवरी में डॉलर के मुकाबले रुपया चौंकाने वाली गति से मजबूत हुआ है। यूरोप को छोड़ बाकी दुनिया की अर्थव्‍यव्‍स्‍थाओं ने मंदी से जूझने में जो साहस‍ दिखाया, उसे खुश होकर निवेशक भारतीय शेयर बाजारों की तरफ लौट पडे। जनवरी में विदेशी निवेशकों ने करीब 5 अरब डॉलर भारतीय बाजार में डाले जो 16 माह का सर्वोच्‍च स्‍तर है। जनवरी में निर्यात की संतोषजनक तस्‍वीर ने चालू खाते के घाटे और रुपये मोर्चे पर उम्‍मीदों को मजबूत किया है। उम्‍मीद की एक खबर खेती से भी