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Tuesday, March 16, 2010

ढूंढो तो, बुनियाद कहां है?

अभी तो नौ की तैयारी . पर जल्दी ही दस की बारी.. याद कीजिये, कुछ ऐसा ही तो अंदाज था वित्त मंत्री का बजट भाषण के दौरान। मगर जब वित्त मंत्री नौ और दस फीसदी की विकास दर का रंगीन सपना बुन रहे थे ठीक उसी समय सरकार के आंकड़ा भंडार से विकास दर के ताजे आंकड़े निकल रहे थे, जिनके मुताबिक दिसंबर में खत्म तिमाही में विकास दर तेज गोता खा गई थी। वित्त मंत्री का विकास उवाच, महंगाई पर शोर करते विपक्ष की आवाजों के बीच संसद की गोल दीवारों में खो गया मगर विकास दर का गिरने का आंकड़ा रिकार्ड में पुख्ता हो गया। ऐसा इसलिए क्योंकि आर्थिक विकास मांग, निवेश और कर्ज या पूंजी से मिलकर बनी खुराक से बढ़ता है और खुद सरकार के तथ्य यह बता रहे हैं कि मौजूदा सूरते हाल में इस खुराक का कोई जुगाड़ नहंी है। यानी कि नौ दस वाली बात भरी दोपहर की झपकी वाला सपना है, जिसमें किले कंगूरे तो दिखते हैं मगर कमबख्त बुनियाद नजर नहीं आती।
वो मांग कहां से लाएं?
महंगाई में मांग?.. बात ही बेतुकी है लेकिन हम हैं कि नौ फीसदी विकास दर की बारात के लिए सज रहे हैं। सत्रह अठारह फीसदी की दर वाली महंगाई से रोज की छीन झपट के बाद किसमें इतना दम बचता है कि वह कुछ और खरीदने की सोचे। इसलिए ही तो मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 7.9 फीसदी की दर पर उछल रही विकास दर तीसरी तिमाही में छह फीसदी पर निढाल हो गई। ठीक यही वक्त था जब खरीफ के सूखे ने महंगाई को नये तेवर दिये थे। अर्थात मंदी से उबरने के बाद बाजार में जो उत्साह दिखा था उस पर जल्द ही टनों महंगाई पड़ गई। महंगाई हमेशा मांग की बड़ी दुश्मन रही है और हालत तब और बुरी हो जाती है जब हम यह देखते हैं कि मांग को बढ़ावा देने वाले बुनियादी कारक भी बदहाल हैं। यहां आंकड़ों की रोशनी जरूरी है। प्रति व्यक्ति आय बढ़ने की दर 5.3 फीसदी और प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च की दर केवल 2.7 फीसदी? शायद बढ़ी हुई आय महंगाई खा गई? क्योंकि यह आंकड़ा महंगाई यानी वर्तमान बाजार मूल्य को शामिल नहीं करता। सिर्फ यही नहीं आर्थिक विकास दर को अगर मांग के नजरिये से पढ़ें तो सरकारी दस्तावेजों में और भी हैरतअंगेज आंकड़े चमकते हैं। पिछले तीन चार वर्षो में करीब नौ फीसदी की वृद्घि दर दिखा रहा निजी उपभोग अचानक 2009-10 में घटकर चार फीसदी रह गया है जबकि सरकार उपभोग खर्च की वृद्घि दर 16 से आठ फीसदी पर आ गई है। यानी एक तो पहले से मांग कम और ऊपर से महंगाई का ढक्कन। इसके बाद तेज विकास दर की उम्मीद कुछ हजम नहीं होती।
जो निवेश को लुभाये
बाजार में मांग का नृत्य निवेश को लुभाता है। मंदी आई तो सबसे पहले यह उत्सव बंद हुआ। उद्योगों ने अपनी जेब कस कर दबा ली। पिछले करीब डेढ़ साल में देश में नया निवेश अचानक तलहटी पर आ गया है। आंकड़ों की मदद लें तो दिखेगा कि 2008-09 तक देश में नया निवेश करीब 16 फीसदी की दर से बढ़ रहा था लेकिन मंदी की धमक के साथ यह घटकर शून्य से नीचे -2.4 आ गया। आंकड़ों के और भीतर उतरें तो दिखेगा कि नए निवेश का झंडा लेकर चलने वाला उद्योग क्षेत्र तो मानो निढाल है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में निवेश 2007-08 तक 19.8 फीसदी की दर से बढ़ रहा था लेकिन अब शून्य से नीचे 21 फीसदी गिर गया। गिरावट केवल बड़ी इकाइयों तक ही सीमित नहीं है, असंगठित औद्योगिक क्षेत्र के निवेश में यह गिरावट -42 फीसदी तक है। सिर्फ दूरसंचार क्षेत्र को छोड़कर सभी सेवाओं में निवेश घटा है। यह गिरावट हर पैमाने पर बहुत बड़ी है। मांग की कमी उद्योगों का भरोसा तोड़ती है और उसे लौटाने के लिए बाजार में मांग बढ़ने के ठोस संकेत चाहिए और चाहिए सस्ती पूंजी। यह खुराक मिलने में अभी वक्त लगेगा यानी कि तेज विकास की उम्मीद को साधने के लिए निवेश की बुनियाद भी नहीं है।
मगर पूंजी महंगी होती जाए
पूंजी सस्ती हो तो निवेशक लंबे समय की उड़ान भरते हैं यानी कि मांग की उम्मीद में जोखिम उठा लेते हैं लेकिन इस पहलू पर गहरी निराशा है। दरअसल उद्योग अपने बचत और मुनाफे को भी लगाने के मूड में नहीं हैं। आंकड़े यह कलई कायदे से खोलते हैं। 2008-09 में निजी क्षेत्र में बचत की दर जीडीपी के अनुपात में 31.1 फीसदी रही जबकि निवेश की दर केवल 24.9 फीसदी। यानी कि उद्योग अपनी बचत और मुनाफे को रोक कर अभी इंतजार करेंगे। पूंजी के दूसरे स्रोत यानी कर्ज और बाजार मदद नहीं करते बल्कि मुश्किल बढ़ाते हैं। महंगाई से डरा रिजर्व बैंक ठीक उस समय सस्ते कर्ज की दुकाने बंद कर रहा है जबकि इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। जनवरी में आए नए मौद्रिक उपायों के बाद ब्याज दर बढ़ने की शुरुआत हो चुकी है और अप्रैल की शुरुआत में जब उद्योग अपने नए बहीखाते खोल रहे होंगे और निवेश की योजनायें बना रहें होंगे तब बैंकों की ब्याज दर उन्हें निवेश से दूर भगा रही होगी। बल्कि हो सकता है कि उद्योगों की चिंता अपने पुराने कर्ज हों जिन पर बढ़ी हुई ब्याज दर का असर होने वाला है। पूंजी बाजार से पैसे उठाकर नया निवेश करना सबके बस का नहीं है लेकिन जिनके बस का है वह भी सरकारी नवरत्नों को मिले कौडि़यों के भाव यानी सरकारी कंपनियों के आईपीओ की विफलता देखकर आगे आने की हिम्मत नहीं जुटायेंगे।
वित्त मंत्री के साहसी आशावादिता आश्चर्यजनक है, क्योंकि हकीकत, उनके सपनों से बिल्कुल उलटी है। अगर अर्थव्यवस्था को मंदी की गर्त से उचक कर बाहर आना है तो उसे मांग की सीढ़ी, निवेश की रोशनी और पूंजी का सहारा चाहिए। मगर इस समय यह तीनों ही उपलब्ध नहीं हैं। विकास के नौ-दस फीसदी वाले खूबसूरत नृत्य के लिए मांग, पूंजी व निवेश का नौ मन तेल जुटने में अभी एक से डेढ़ साल लग जाएंगे। तब तक वित्त मंत्री से मिली उम्मीदों को इन्ज्वाय कीजिये, महंगाई के चुभन के बीच यह सपने कुछ राहत देंगे। रही बात हकीकत की तो अभी विकास दर के लिए 6 से सात फीसदी की मंजिल ही मुमकिन और भरोसेमंद दिखती है। अलबत्ता यह बात पूरी तरह सच है कि गरीबी हटाने या आय को निर्णायक ढंग से बढ़ाने की क्रांति छह सात फीसदी के विकास दर से नहीं हो सकती। इससे कुछ अमीर, और ज्यादा अमीर हो जाएंगे बस... पिछले दो दशकों का यही तजुर्बा है।
http://jagranjunction.com/ (बिजनेस कोच)

Monday, January 18, 2010

वेताल फिर डाल पर!

भारत में आर्थिक मंदी दुनिया की मार थी या अपनी महंगाई व अपनी ही नीतियों का उपहार? उद्योगों को प्रोत्साहन देने का तुक तर्क क्या था? मंदी का डर दिखाकर उद्योगों ने जो सरकार से झटक लिया उसमें उन्होंने आम उपभोक्ताओं को क्या बांटा? प्रोत्साहन की जरूरत दरअसल किसे थी और टानिक किसे पिला दी गई?.... वक्त का वेताल फिर डाल पर है और अजीबोगरीब व बुनियादी किस्म के सवाल कर रहा है? अर्थव्यवस्था का पहिया घूम कर 2007-08 के बिंदु पर आ गया है, बल्कि चुनौतियां कुछ ज्यादा ही उलझी हैं। ब्याज दरें बढ़ने वाली हैं, मांग बढ़े या न बढ़े उत्पादन की लागत का बढ़ना तय है, महंगाई पहले से ज्यादा ठसक के साथ मौजूद है, जबकि घाटे से हलकान सरकार के सामने कर बढ़ाने और खर्च घटाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। इसलिए चलिये भूले बिसरे आंकड़ों की गुल्लक फोड़ें और मंदी व उद्योगों की रियायतों को लेकर लामबंदी के दावों को निचोड़ें।.. हकीकत दरअसल आल इज वेल के दावों से बिल्कुल उलटी है।
दिमाग पर जोर डालिये
2007-08 की पहली तिमाही याद करिये। ठीक इसी समय से भारत में आर्थिक विकास दर में गिरावट की शुरुआत हुई थी। दुनिया में उस वक्त मंदी की चर्चा भी नहीं थी। मत भूलिये कि अप्रैल 2007 में पहली बार रिजर्व बैंक ने सीआरआर दर बढ़ाई थी क्योंकि तब महंगाई आठ फीसदी का स्तर छू रही थी और सरकार की सांस ऊपर नीचे हो रही थी। कोई कैसे भूल सकता है दो साल पहले इसी वक्त चल रही उस बहस को, जिसमें रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय यह मानने लगे थे कि अर्थव्यवस्था ओवरहीट हो रही है, यानी कि कुछ ज्यादा ही तेज गति से दौड़ रही है और महंगाई बाजार में बढ़ रही अप्रत्याशित मांग का नतीजा है। मांग पर ढक्कन लगाने की चर्चायें नीतिगत समर्थन पाने लगी थीं और नतीजतन रिजर्व बैंक ने लगातार सीआरआर बढ़ाई और 2007-08 की चौथी तिमाही (औद्योगिक विकास दर पहली तिमाही के दस फीसदी से घटकर चौथी तिमाही में 6.3 फीसदी पर) से भारत में आर्थिक मंदी शुरू हो गई। यह बात हजम करना जरा मुश्किल है कि भारत में मंदी दुनिया की मंदी की देन है। लेहमैन की बर्बादी सितंबर 2008 की घटना है, जिसका असर वित्तीय बाजारों पर हुआ था। भारत में आर्थिक फिसलन तो इससे कई महीने पहले शुरू हो गई थी। अगर मंदी ने किसी को मारा था तो वह निर्यात (वह भी दिसंबर 2008 के बाद। दिसंबर तक निर्यात 17 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा था) का क्षेत्र था। मंदी के नाम पर रियायतों की लामबंदी करने वाले उद्योग यह भूल जाते हैं कि कुल आर्थिक उत्पादन में निर्यात का हिस्सा बहुत छोटा है, अधिकांश मांग तो देशी बाजार से आती है। भारत में दरअसल मंदी दुनिया से पहले आई और वह भी इसलिए क्योंकि महंगाई ने मांग का दम घोंट दिया था। बाद में बची खुची कसर ब्याज दरों ने पूरी कर दी।
इलाज, जो बन गया खुराक?
चलिये अब स्टिमुलस यानी मंदी से उबरने के लिए प्रोत्साहनों की बहस को भी कुछ तथ्यों के आईने में उतारा जाए। उद्योग जिन कर रियायतों को जारी रखने का झंडा उठाये हैं वह हकीकत में महंगाई का इलाज थीं। मंदी हटाने की खुराक नहीं। सरकार ने कभी नहीं माना कि भारत मंदी का शिकार है। पिछले साल के अंतरिम बजट भाषण में आदरणीय वित्त मंत्री के शब्द थे, 'भारत की अर्थव्यवस्था 7.1 फीसदी की वृद्घि दर के साथ अभी भी दुनिया की दूसरी सबसे तेज अर्थव्यवस्था है।' संसद में पेश सरकारी आर्थिक समीक्षा कहती है कि भारत में आर्थिक विकास दर में गिरावट सख्त मौद्रिक नीतियों की देन थी। इसलिए प्रोत्साहन भी मंदी दूर करने के लिए दिये ही नहीं गए थे। प्रोत्साहनों का दौर नवंबर 2008 से शुरू हुआ और वह भी महंगाई घटाने के लिए। सरकार ने एक मुश्त कई कृषि जिंसों के आयात पर शुल्क हटाये और घरेलू उत्पादन पर करों में रियायत दी। यह सब चुनाव सामने देख कर किया गया था। रही बात खर्च बढ़ाने की तो वह प्रोत्साहन चुनावी संभावनाओं के लिए था। खर्च बढ़ाने के पैकेज वेतन आयोग की सिफारिशों पर अमल, किसानों की कर्ज माफी और सब्सिडी में वृद्घि से बने थे। जिनका मंदी से सीधा कोई लेना देना नहीं था। सच तो यह है कि देश को पलट कर उद्योगों से पूछना चाहिए कि उन्होंने महंगाई को कम करने में क्या भूमिका निभाई? किस रियायत को उन्होंने उपभोक्ताओं से बांटा? सच यह है कि महंगाई घटाने के लिए मिली कर रियायतों को उद्योगों ने सफाई के साथ मंदी दूर करने से जोड़ दिया और सारा प्रोत्साहन पी गए। महंगाई जस की तस रही। औद्योगिक उत्पादन दरअसल इन रियायतों की वजह से पटरी पर नहीं लौटा है बल्कि वापसी तब शुरू हुई जब बाजार में रुपये का प्रवाह बढ़ा। अगस्त 2008 में रिजर्व बैंक ने सख्त मौद्रिक नीति की जिद छोड़ी और सीआरआर व रेपो रेट कम करना शुरू किया। यह कदम उठाने के ठीक एक साल 2009-10 की दूसरी तिमाही से उत्पादन पटरी पर आया है। .. मगर विसंगति देखिये कि अब बारी ब्याज दर फिर बढ़ने की है क्योंकि रिजर्व बैंक को फिर 2007-08 की तरह ब्याज दरें बढ़ाकर और कर्ज की मांग घटाकर महंगाई पर काबू करना है।
बीमार कौन और दवा किसको?
भारत में मंदी की शुरुआत अर्थात अप्रैल 2007 और हाल की उम्मीद भरी वापसी सितंबर 2009 के बीच दो कारक स्थिर रहे हैं। एक है महंगाई और दूसरी मांग में कमी। बदली है तो सिर्फ रिजर्व बैंक की मौद्रिक मुद्रायें और सरकार के असमंजस के रंग। महंगाई में वृद्घि और मांग में कमी का सीधा रिश्ता है। अप्रैल 2007 में खाद्य जिंसों व उत्पादों की महंगाई 9.4 फीसदी पर थी, अप्रैल 2008 में यह 10.7 फीसदी हो गई और पिछले सप्ताह के आंकड़ों में यह 18 फीसदी है। यानी कि महंगाई लगातार बढ़ी और मांग टूटती गई है। औद्योगिक उत्पादन में ताजे सुधार की जमीन इस तथ्य की रोशनी में खोखली दिखती है। औद्योगिक उत्पादन में यह वृद्घि हालात सुधरने की उम्मीदों और सस्ते कर्ज के सहारे आए नए निवेश की देन है, इसे बाजार में ताजी मांग का समर्थन हासिल नहीं है। प्रोत्साहन, खुराक या इलाज की जरूरत खेती को थी जहां से महंगाई पैदा हो रही है और लेागों की क्रय शक्ति व मांग को खा रही है। जबकि मंदी से मारे जाने का सबसे ज्यादा स्यापा उद्योगों ने किया और रियायतें ले उड़े। ताजा हालात में उद्योगों की एक खुराक रिजर्व बैंक के पास है अर्थात सस्ता कर्ज और दूसरी बाजार के पास अर्थात मांग में सुधार। रिजर्व बैंक सस्ते कर्जो का शटर गिराने वाला है, जबकि मांग की दुश्मन महंगाई बाजार का रास्ता घेरे बैठी है। यानी दोनों जगह मामला गड़बड़ है। ऐसे में अगर सरकार कर रियायतें देती भी रहे तो उसका कोई बड़ा फायदा नहीं होने वाला।
पिछले तीन साल के आंकड़े और तथ्य किस्म-किस्म के सवाल पूछ रहे हैं। कठघरे में उद्योग भी हैं, सरकार भी और रिजर्व बैंक भी। नीतियों को लेकर गजब का भ्रम और जबर्दस्त अफरा-तफरी है। रिजर्व बैंक मानता है कि इस महंगाई का इलाज मौद्रिक सख्ती से नहीं हो सकता मगर फिर भी वह ब्याज दरें बढ़ाकर मंदी से उबरने की कोशिशों का दम घोंटने की तैयारी कर रहा है। सरकार तो अब तक यह तय नहीं कर पाई है कि पहले वह मंदी का इलाज करे या महंगाई का या फिर बढ़ते घाटे का। तीनों का इलाज एक साथ मुमकिन नहीं है क्योंकि एक की दवा दूसरे के लिए कुपथ्य है। घाटा कम करने के लिए खर्च घटाना और कर बढ़ाना जरूरी है, लेकन इससे मंदी को अगर खुराक मिलने का खतरा है, वहीं दूसरी तरफ घाटा इसी तरह बढ़ा तो भी आर्थिक दुनिया नहीं छोड़ेगी। रही बात महंगाई की तो वहां सरकार पहले से थकी-हारी और पस्त व निढाल होकर वक्त के आसरे है।..दस के बरस का बजट हाल के वर्षो में सबसे गहरे असमंजस का बजट है। .. इक तो रस्ता है पुरखतर अपना, उस पे गाफिल है राहबर अपना। .. खुदा खैर करे।
और अन्‍यर्थ ( the other meaning ) के लिए स्‍वागत है
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