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Sunday, July 16, 2017

इंस्पेक्टर ' राज़ '


नोटबंदी की सबसे बड़ी नसीहत क्या हैयही कि सुधारों के ऊंट अब किसी भी करवट बैठ सकते हैं. सुधारों के पूरी तरह सोख लिए जाने तक उनसे सिर्फ चौंकाने वाले नतीजों की उम्मीद की जानी चाहिएजो अच्छे या बुरे या फिर दोनों हो सकते हैं. नोटबंदी काला धन दूर करने के लिए उतरी थी लेकिन बैंकों को कालिख में सराबोर कर गई और ग्रोथ व रोजगार ले डूबी.

जीएसटी टैक्स प्रशासन में इंस्पेक्टर राज खत्म करने के लिए उतरा है लेकिन अपने डिजाइन और तौर-तरीकों में जीएसटी रोमांचक और अप्रत्याशित है. इंस्पेक्टरों की ताकत के मामले में तो यह चौंकाने वाली संभावनाओं से लैस है.

शुरुआत जीएसटी के नंबर यानी 15 डिजिट के जीएसटीएन से करते हैं जो अपने आप में अनोखा प्रयोग है. इस संख्या में पहले दो नंबर राज्य के हैं जहां कारोबारी पंजीकृत होगा. अगले 10 नंबर कारोबारी का पैन नंबरबाद का एक नंबर उसकी पंजीकरण संख्या है और शेष दो नंबर तकनीकी जरूरत के लिए हैं.

जीएसटी नंबर के पैन आधारित होने के साथ भारत में आयकर प्रशासन और कारोबारी करों को आपस में जोड़ दिया गया है. मतलब यह कि जीएसटी में दर्ज प्रत्येक कारोबारी की गतिविधि पर जीएसटी के साथ आयकर विभाग की निगाहें भी रहेंगी. टैक्स अफसर उसके कारोबार के आधार पर कमाई और कमाई के आधार पर धंधे की कैफियत पूछ सकते हैं. 
पैन आधारित जीएसटीएनटैक्स चोरी रोकने की अचूक कोशिश नजर आता है लेकिन दोहरे इंस्पेक्टर राज का खतरा भी है. भारत का टैक्स प्रशासन कितना साफ-सुथरा हैयह जानने के लिए नजदीकी टैक्स ऑफिस की एक यात्रा काफी होगी.

जीएसटी और इंस्पेक्टर राज का रिश्ता दिलचस्प है. इंस्पेक्टर राज बनाए रखने के लिए ही इसे पेचीदा बनाया गया! करदाताओं के बही-खाते जांचने के अधिकार पर केंद्र और राज्यों के बीच रजामंदी मुश्किल से बनी. अंततः तय हुआ कि बेचारे करदाता केंद्र और राज्य दोनों के टैक्स इंस्पेक्टरों की सेवा करेंगे.

जीएसटी के बुनियादी प्रारूप में यह दोहरा नियंत्रण कहीं नहीं था लेकिन उसे हकीकत बनाने के लिए जो फॉर्मूला तय हुआउसके तहत 1.5 करोड़ रु. से कम के सालाना कारोबार वाले कारोबारियों की जांच व ऑडिट राज्य सरकारें करेंगी. इससे ऊपर वालों पर केंद्र का नियंत्रण होगा.

दोहरे नियंत्रण का फॉर्मूला सहज लगता है लेकिन जिनके कारोबार हर साल इस सीमा से ऊपर नीचे होते रहते हैंउनके 'साहब' हर साल बदल जाएंगे. यह दोहरा नियंत्रण केंद्र व राज्य की कर अथॉरिटी के बीच अधिकार क्षेत्रों का टकराव पैदा करेगा जिसमें कारोबारियों के फुटबॉल बनने का खतरा है.

जीएसटी के भीतर उतरने पर सात दरों और दर्जनों वर्गीकरण वाला एक जटिल ढांचा डराने आ जाता है जिसमें एक्साइज और वैट की सभी खौफनाक खामियां खूबसूरती के साथ सहेजी गई हैं. अलग-अलग राज्यों में पंजीकरणएक ही कंपनी के सभी प्रतिष्ठानों के अलग-अलग रजिस्ट्रेशन के साथ यह शर्त भी है कि पूरे देश में सर्विस देने वालों को अब हर राज्य में जीएसटी के तहत रजिस्टर होना होगा. एक उत्पाद के लिए कई टैक्स रेट की प्रणाली उन उद्योगों को इंस्पेक्टर शरण में जाने के लिए मजबूर करेगी जो तेजी से अपने प्रोडक्ट में बदलाव करना चाहते हैं और इस मौके पर उनका डिजिटल या ऑनलाइन होना काम नहीं आएगा.

जीएसटी लागू होते ही उपभोक्ता मंत्रालय ने कहा कि जो कारोबारी सही ढंग से खुदरा मूल्य नहीं बताएंगेजुर्माना या जेल उनका इंतजार कर रही है. सतर्कता को सलाम लेकिन जीएसटी में मुनाफाखोरी रोकने वाले नियम इंस्पेक्टरों को नई ताकत बख्शते हैं. जीएसटी के साथ मुनाफाखोरी रोकने वाली एक नई मशीनरी जन्म ले रही है. डायरेक्टर ऑफ सेफगाड्र्सकेंद्र व राज्यों में विशेष समितियांजांच अपील व सुनवाई का विशाल तंत्र उपभोक्ताओं को आश्वस्त करने से पहले कारोबारियों को डराने लगा है.

जीएसटी कारोबारी सुविधा या टैक्स कम करने के लिए नहीं बल्कि सरकारों के राजस्व को हर हाल में सुरक्षित रखने के लिए बना है इसलिए टैक्स विवाद निस्तारण से जुड़े नियम डरावने हैं. उन्हें चुनौती देने से पहले 10 से 25 फीसदी टैक्स जमा करने की शर्त है.

भले ही 17 टैक्स और 23 सेस जीएसटी में शामिल हो गए हों लेकिन बहुत से राज्य स्तरीय और स्थानीय टैक्स मुंह चिढ़ा रहे हैं. कई कारोबारों का एक हिस्सा किसी दूसरे टैक्स के दायरे में है जबकि दूसरे हिस्से पर जीएसटी लगा है. मसलनवाहनों पर राज्यों का ट्रांसपोर्ट टैक्स लागू है. निर्माण सामग्री और सेवाओं पर जीएसटी है लेकिन जमीन का पंजीकरण जीएसटी से बाहर है. जीएसटी की जटिलताएं और दोहरे-तिहरे नियंत्रण इंस्पेक्टर राज पर असमंजस बढ़ाते हैं.

नतीजे आने तक नोटबंदी के जले को जीएसटी का छाछ फूंक-फूंक कर पीना चाहिए.

Wednesday, September 2, 2015

जीएसटी है, कोई जादू नहीं


जीएसटी में जितनी उम्मीदें पैवस्त हैंजटिलताओं व किंतु-परंतुओं का हिस्सा उनसे ज्यादा बड़ा हैउम्‍मीदों को तर्कसंगत रखने के लिए जिन्‍हें समझना जरुरी है।
ह शायद हमारी चमत्कारप्रियता का नतीजा ही है कि हम वैसे ही सोचने लगते हैं, जैसा कि सियासत या सरकारें हमसे चाहती  हैं. जैसे, जादू-टोने के कद्रदान हम हिंदुस्तानी यह समझ रहे थे कि कांग्रेस तरक्की का कोई स्विच चुरा ले गई है नई सरकार आते ही उसे फिट कर देगी और सब कुछ चमक उठेगा. ठीक उसी तरह हमें समझाया गया कि गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) लागू होते ही विकास दर छलांगे लगाने लगेगी. यह बात अलग है कि बीजेपी को भी जीएसटी में कमजोर ग्रोथ का शर्तिया इलाज, गद्दीनशीन होने के बाद ही नजर आया. इससे पहले तक जीएसटी महज एक टैक्स सुधार था, जिसमें जल्दबाजी को लेकर बीजेपी को गहरी आपत्ति थी. फिर भी सियासत को माफ किया जा सकता है. ज्यादा बड़ा अचरज यह है कि निवेशकों से विशेषज्ञ तक, सब जीएसटी की बारात में शामिल हो गए. शुक्र है कि सरकार, जब जीएसटी के बुनियादी विधेयक को पारित कराने के लिए संसद के विशेष सत्र की तैयारी कर रही है, तब इस टैक्स सुधार को लेकर तर्कहीन उत्साह की गर्द बैठने लगी है और इसे वास्तविकता की रोशनी में देखने की कोशिश शुरू हो गई है.
जीएसटी के मामले में विपक्ष और पक्ष, दोनों ही खेमों को धन्य कर चुकी बीजेपी को सरकार में आने के बाद उम्मीदों को तर्क का आधार देना चाहिए था. जीएसटी में जितनी उम्मीदें पैवस्त हैं, जटिलताओं व किंतु-परंतुओं का हिस्सा उनसे ज्यादा बड़ा है, जिन्हें न केवल जागरूक बहस के लिए समझना जरूरी है बल्कि इसलिए भी जानना चाहिए ताकि जीएसटी की राह में आने वाले झटकों और यू टर्न के लिए पहले से तैयार रहा जा सके. जैसे कि इस प्रचार को कुछ ठहर कर निगलने की जरूरत है कि जीएसटी लागू होते ही देश की विकास दर एक से दो फीसदी बढ़ जाएगी. आइएमएफ की सूचनाओं के आधार पर एम्बिट कैपिटल का एक ताजा अध्ययन साबित करता है कि इनडायरेक्ट टैक्स सुधार और आर्थिक ग्रोथ का कोई सीधा रिश्ता नहीं है.
1986 से लेकर 2000 के बीच दुनिया के चार अलग-अलग देशों में जीएसटी लागू हुआ था. न्यूजीलैंड ने 1986 में जीएसटी अपनाया और 1989 में इसकी दर बढ़ाई. ऑस्ट्रेलिया में 2000 में जीएसटी आया जबकि कनाडा में 1991 में. कनाडा ने 2006 और 2008 में इसकी दरें बदलीं. थाईलैंड में 1991 में एकमुश्त जीएसटी लागू हुआ. इन चारों देशों में केवल न्यूजीलैंड ऐसा था जहां जीएसटी के बाद ग्रोथ तेज हुई. शेष तीन देशों में ग्रोथ में गिरावट रही. विशेषज्ञ मानते हैं कि न्यूजीलैंड में ग्रोथ की कई और दूसरी वजहें भी थीं.
तो फिर जीएसटी लागू होने के बाद भारत में विकास दर दो फीसदी बढ़ जाने का आकलन आखिर आया कहां से? दरअसल, एनसीएईआर ने 2009 में एक रिपोर्ट दी थी जिसके मुताबिक, यदि भारत में आदर्श और आधुनिक जीएसटी लागू होता है तो ग्रोथ की उम्मीद लगाई जानी चाहिए. लेकिन अब जो जीएसटी आने वाला है, उसमें पांच स्तरीय टैक्स होंगे. सीजीएसटी के तहत केंद्र के टैक्स (एक्साइज, सर्विस), एसजीएसटी के तहत राज्यों के टैक्स—अंतरराज्यीय बिक्री पर आइजीएसटी (सेंट्रल सेल्स टैक्स की जगह), अंतरराज्यीय आपूर्ति पर एक फीसदी अतिरिक्त टैक्स और पेट्रोल डीजल, एविएशन फ्यूल पर टैक्स अलग से होंगे. इस पांच मंजिला जीएसटी के बाद ग्रोथ का तर्क अपने अपने आप दुबक जाता है.
जीएसटी दोहरा-तिहरा टैक्स खत्म करता है इसलिए महंगाई में कमी का इसका रिश्ता जरूर स्थापित होता है. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, थाईलैंड और न्यूजीलैंड में जीएसटी के बाद महंगाई घटी. लेकिन भारत में जीएसटी को लेकर सबसे बड़ा असमंजस इसी पहलू पर है. जिन देशों ने हाल में इसे लागू किया है, वहां जीएसटी दर पांच (जापान) से लेकर 19.5 फीसदी (यूरोपीय यूनियन) तक है. जीएसटी में एक रेवेन्यू न्यूट्रल रेट होता है यानी कि जिस दर पर सरकार को राजस्व का नुक्सान नहीं होगा. मौजूदा आकलनों में भारत के लिए यह दर 18 फीसद आंकी गई है इससे राजस्व तो नहीं बढ़ेगा लेकिन सरकारों को नुक्सान भी नहीं होगा.
भारत में इनडायरेक्ट टैक्स की औसत दर इस समय 24 फीसदी है इसलिए जीएसटी दर इससे ऊपर ही होने की संभावना है, क्योंकि सरकारों को बढ़ते खर्च को संभालने के वास्ते राजस्व में बढ़ोतरी चाहिए. एम्बिट का अध्ययन बताता है कि 25 फीसदी का जीएसटी रेट होने पर सरकारों का टैक्स जीडीपी अनुपात एक से दो फीसदी बढ़ेगा. उनको ज्यादा राजस्व मिलेगा, जिसे वे विकास में खर्च कर सकती हैं. लेकिन 25 फीसदी की जीएसटी दर महंगाई को भड़का देगी, जिससे मांग कम हो सकती है.
जीएसटी को लेकर केवल क्रियान्वयन की उलझन ही नहीं है बल्कि व्यावहारिक पेचीदगियां हैं, जिन्हें पारदर्शिता के साथ बताया जाना चाहिए. मसलन, अगर जीएसटी दर 18 फीसदी तय होती है तो शायद कारें, उपभोक्ता सामान, भवन निर्माण सामग्री सस्ती होगी लेकिन अगर दर 25 फीसदी तक रही तो कीमतें ऊंची ही रहेंगी. भारत में टेलीफोन, शिक्षा, होटल आदि दर्जनों सेवाओं की लागत आम लोगों के खर्च का बड़ा हिस्सा है. सेवाओं को लेकर जीएसटी में हर तरह से चोट लगनी है. सर्विस टैक्स की दर 14 फीसद है, जिसे बढ़ाकर 18 फीसद (आरएनआर) तो किया ही जाना है. यानी सेवाएं महंगी होंगी और अगर जीएसटी दर 25 या उससे ऊपर हुई तो सेवाओं पर टैक्स लगभग दोगुना हो जाएगा.

आर्थिक सुधारों को लेकर उम्मीदें जायज हैं लेकिन हवाई किले औंधे मुंह ला पटकते हैं. प्रत्येक आर्थिक सुधार फायदे और चुभन साथ लेकर आता है. सुधारों की स्लेट पर पहले हस्ताक्षर को बेताब सरकार का एक संवेदनशील, बहुआयामी और पेचीदा सुधार को जादुई बनाकर पेश करना स्वीकार हो सकता है, लेकिन यह समझना मुश्किल है कि जीएसटी पर कोई चर्चा राजनैतिक दायरे से निकलकर उत्पादक, व्यापारी और उपभोक्ता तक क्यों नहीं पहुंचाई गई, जिन्हें इसे लगाना, वसूलना और चुकाना है. जीएसटी को लेकर दीवानगी का आलम तैयार करने की बजाए इस पर ठोस चर्चा जरूरी है, क्योंकि इस टैक्स सुधार में फूल और कांटों का औसत रह-रहकर बदलने वाला है.

Tuesday, May 12, 2015

यह वो जीएसटी नहीं

लोकसभा ने जीएसटी के जिस प्रारूप पर मुहर लगाई है उससे न तो कारोबार आसान होगा और न महंगाई घटेगी. देश को वह जीएसटी मिलता नहीं दिख रहा है जिसका इंतजार पिछले एक दशक से हो रहा था.

करीबन तीन साल पहले गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) पर राज्यों की एक बैठक की रिपोर्टिंग के दौरान राजस्व विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मुझसे कहा था कि पूरे भारत में उत्पादन, सेवा और बिक्री पर एक समान टैक्स दरें लागू करना लगभग नामुमकिन है! उस वक्त मुझे उनकी यह टिप्पणी झुंझलाहट से भरी और औद्योगिक राज्यों की तरफ इशारा करती हुई महसूस हुई थी, क्योंकि वह दौर जीएसटी पर गतिरोध का था और गुजरात एक दशक से इस सुधार का विरोध कर रहा था. जीएसटी पर ताजा राजनैतिक खींचतान ने उस अधिकारी को सही साबित कर दिया. देश के सबसे बड़े कर सुधार का चेहरा बदल गया है. जीएसटी के नाम पर हमें जो मिलने वाला है उससे पूरे देश में कॉमन मार्केट बनना तो दूर, महंगाई बढऩे व कर प्रशासन में अराजकता का जोखिम सिर पर टंग गया है.
टैक्स जटिल हैं लेकिन जीएसटी पर एक दशक की चर्चा के बाद लोगों को इतना जरूर पता है कि भारत में उत्पादन, बिक्री और सेवाओं पर केंद्र से लेकर राज्य तक किस्म-किस्म के टैक्स (एक्साइज, सर्विस, वैट, सीएसटी, चुंगी, एंटरटेनमेंट, लग्जरी, पर्चेज) लगते हैं जो न केवल टैक्स चोरी को प्रेरित करते हैं बल्कि उत्पादों की कीमत बढ़ने की बड़ी वजह भी हैं. जीएसटी लागू कर इन टैक्सों को खत्म किया जा सकता है ताकि पूरे देश में समान टैक्स रेट के जरिए कारोबार आसान हो सके. यह अंततः उपभोक्ताओं के लिए उत्पादों और सेवाओं की कीमत कम करेगा. लेकिन जीएसटी का प्रस्तावित ढांचा इस मकसद से उलटी दिशा में जाता दिख रहा है.
एक दशक से अधर में टंगे जीएसटी को लेकर उत्साह इसलिए लौटा था क्योंकि गुजरात उन राज्यों में अगुआ था जो जीएसटी के हक में नहीं हैं. दिल्ली पहुंचने के बाद मोदी जीएसटी के मुरीद हो गए, जिससे इस टैक्स सुधार की उम्मीद को ताकत मिल गई. लेकिन जीएसटी को लेकर मोदी का नजरिया बदलने से राज्यों के रुख में कोई बदलाव नहीं हुआ. केरल के वित्त मंत्री व जीएसटी पर राज्यों की समिति के मुखिया के.एम. मणि की मानें तो गुजरात और महाराष्ट्र ने दबाव बनाया कि सभी तरह के जीएसटी के अलावा, राज्यों को वस्तुओं की अंतरराज्यीय आपूर्ति पर एक फीसदी अतिरिक्त टैक्स लगाने की छूट मिलनी चाहिए, उत्पादकों को जिसकी वापसी नहीं होगी. यह टैक्स उस राज्य को मिलेगा जहां से सामान की आपूर्ति शुरू होती है. गुजरात का दबाव कारगर रहा. यह नया टैक्स लोकसभा से पारित विधेयक का हिस्सा है जो औद्योगिक राज्यों का राजस्व बढ़ाएगा जबकि अन्य राज्यों को नुक्सान होगा. इस तरह औद्योगिक व उपभोक्ता राज्यों के बीच पुरानी खाई फिर तैयार हो गई है. इसलिए जीएसटी विधेयक अब न केवल राज्यसभा में फंस सकता है बल्कि राज्यों के विरोध के कारण इसे अगले साल से लागू किए जाने की संभावना भी कम हो गई है.
सियासत ने जीएसटी की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है. अब इनडायरेक्ट टैक्स का एक नहीं बल्कि पांच स्तरीय ढांचा होगा. सीजीएसटी के तहत केंद्र के टैक्स (एक्साइज, सर्विस) लगेंगे और एसजीएसटी के तहत राज्यों के टैक्स. इसके अलावा अंतरराज्यीय बिक्री पर आइजीएसटी लगेगा जो सेंट्रल सेल्स टैक्स की जगह लेगा. सामान की अंतरराज्यीय आपूर्ति पर एक फीसदी अतिरिक्त टैक्स और पेट्रोल डीजल, एविएशन फ्यूल पर टैक्स अलग से होंगे. जीएसटी तो पूरे देश में एक समान टैक्स ढांचा लाने वाला था, केंद-राज्य के अलग-अलग समेकित जीएसटी तक भी बात चल सकती थी लेकिन जीएसटी के नाम पर पांच टैक्सों का ढांचा आने वाला है जो मुसीबत से कम नहीं है.
दरअसल, जीएसटी के तहत उत्पादकों और व्यापारियों को कच्चे माल पर दिए गए टैक्स की वापसी होनी है ताकि एक ही सेवा या उत्पाद पर बहुत से टैक्स न लगें. अब जबकि कई स्तरों वाला टैक्स ढांचा बरकरार है तो लाखों टैक्स रिटर्न की प्रोसेसिंग सबसे बड़ी चुनौती होगी. अगर जीएसटी अपने मौजूदा स्वरूप में आया तो हर रोज हजारों रिटर्न फाइल होंगे, जिन्हें जांचने के लिए तैयारी नहीं है. जीएसटी के लिए देशव्यापी कंप्यूटरराइज्ड टैक्स नेटवर्क बनना था, जिसकी प्रगति का पता नहीं है जबकि राज्यों के टैक्स सिस्टम पुरानी पीढ़ी के हैं. जीएसटी अगर इस तरह लागू हुआ तो अराजकता व राजस्व नुक्सान ही हाथ लगेगा.
जीएसटी की दर आखिर कितनी होगी? राज्यों की समिति 27 फीसद की जीएसटी दर (रेवेन्यू न्यूट्रल रेटिंग जिस पर राज्यों को राजस्व का कोई नुक्सान नहीं होगा) का संकेत दे रही है. यह मौजूदा औसत दर से दस फीसद ज्यादा है. अगर जीएसटी दर 20 फीसद से ऊपर तय हुई तो भारत का यह सबसे बड़ा कर सुधार महंगाई की आफत बनकर टूटेगा. दुनिया के जिन देशों ने हाल में जीएसटी लागू किया है वहां टैक्स पांच (जापान) से लेकर 19.5 फीसदी (यूरोपीय यूनियन) तक हैं. जीएसटी के मामले में सियासत को देखते हुए सरकार के लिए यह दर कम रख पाना बेहद मुश्किल होगा.
जीएसटी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हृदय बदलने के अलावा और कुछ नहीं बदला है. केंद्र से लेकर राज्यों तक कोई तैयारी नहीं है. पूरी बहस केवल सरकारों के राजस्व पर केंद्रत है. कर वसूलने व चुकाने वाले, अर्थात् व्यापारी व उपभोक्ता अंधेरे में हैं. जीएसटी, सुर्खियां बटोरू स्कीम या मिशन नहीं है, यह भारत का सबसे संवेदनशील सुधार है जो हर अमीर-गरीब उपभोक्ता की जिंदगी से जुड़ा है. सरकार को ठहरकर इसकी पर्याप्त तैयारी करनी चाहिए. प्रधानमंत्री को अपने रसूख का इस्तेमाल कर राज्यों को इस पर सहमत करना चाहिए. जीएसटी लागू न होने से जितना नुक्सान होगा, उससे कहीं ज्यादा नुक्सान इसे बगैर तैयारी के लागू करने से हो सकता है.
अधिकांश लोग टैक्स का गणित नहीं समझते. लेकिन इतना जरूर समझते हैं कि ज्यादा टैक्स होने से महंगाई बढ़ती है और अगर पूरे देश में टैक्स की एक दर हो तो कारोबार आसान होता है. लोकसभा ने जीएसटी के जिस प्रारूप पर मुहर लगाई है उससे न तो कारोबार आसान होगा और न महंगाई घटेगी. देश को वह जीएसटी मिलता नहीं दिख रहा है जिसका इंतजार पिछले एक दशक से हो रहा था.