Monday, October 13, 2014

स्वयंसेवा की सीमाएं


स्वच्छता की प्रेरणाएं सर माथे,  मगर सफाई सीवेज और कचरा प्रबंधन रोजाना लड़ी जाने वाली जंग है जिसमें भारी संसाधन लगते हैं.
ए हवाई अड्डों पर लोग खुले में शंका-समाधान नहीं करते पर रेलवे प्लेटफॉर्म पर सब चलता है. शॉपिंग मॉल्स के फूड कोर्ट में गंदगी होती तो है, दिखती नहीं. अलबत्ता गली की रेहड़ी के पास कचरा बजबजाता है. सरकारी दफ्तरों के गलियारे दागदार हैं, दूसरी ओर निजी ऑफिस कॉम्प्लेक्स की साफ-सुथरी सीढिय़ां मोबाइल पर बतियाने का पसंदीदा ठिकाना हैं. स्वच्छता अभियानों का अभिनंदन है लेकिन सफाई की बात, स्वयंसेवा की पुकारों से आगे जाती है और स्वच्छता को बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी समस्या बनाती है जो बुनियादी ढांचे की जिद्दी किल्लत से बेजार हैं. शहरों में अब साफ और गंदी इमारतें, अस्पताल और सार्वजनिक स्थल एक साथ दिखते हैं और यह फर्क लोगों की इच्छाशक्ति से नहीं बल्कि सुविधाओं की आपूर्ति से आया है. सफाई, सरकार की जिम्मेदारियों में आखिरी क्रम पर है इसलिए सरकारी प्रबंध वाले सार्वजनिक स्थल बदबूदार हैं जबकि निजी प्रबंधन वाले सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता दैनिक कामकाज का स्वाभाविक हिस्सा है. क्या खूब होता कि आम लोगों को झाड़ू उठाने के प्रोत्साहन के साथ, कर्मचारियों की कमी, कचरा प्रबंधन की चुनौतियों, बुनियादी ढांचे के अभाव और संसाधनों के इंतजाम की चर्चा भी शुरू होती, जिसके बिना सफाई का सिर्फ दिखावा ही हो सकता है.

Click the link below to read more

Tuesday, October 7, 2014

अंतरविरोधों में अवसर


मोदी असंगतियों में अवसर तलाश कर आगे बढ़े हैं तो किस्मत ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे पेचीदा अंतरविरोध उनके सामने खड़े कर दिए हैं. 

गर संकट सुधारों का सबसे उपयुक्त मौका होते हैं, यदि अंतरविरोधों से उपजे अवसर सबसे कीमती माने जाते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नियति ने भारत में कारोबार के नियम नए सिरे से लिखने का मौका दे दिया है. हकीकत यह है कि बीते सप्ताह प्रधानमंत्री जब निवेशकों को मेक इन इंडिया का न्योता दे रहे थे, तब विज्ञान भवन में बैठे उद्योगपति, दरअसल, किसी मल्टीमीडिया शो की नहीं बल्कि दूरगामी सुधारों के ठोस ऐलान की बाट जोह रहे थे. क्योंकि मेक इन इंडिया की शुरुआत के ठीक दो दिन पहले कोयला खदान आवंटन रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारत में निवेश के मौजूदा मॉडल की श्रद्धांजलि लिख दी थी. इसके बाद देश प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन के मामले में 1991 जैसे कायापलट सुधारों के लिए मजबूर हो गया है. अदालत के फैसले ने मुफ्त प्राकृतिक संसाधन, सस्ते श्रम और बड़े बाजार की भारी मांग पर केंद्रित निवेश का पुराना ढांचा ढहा दिया है और इसकी जगह एक नए कारोबारी मॉडल की स्थापना भारत में निवेश यानी मेक इन इंडिया की बुनियादी शर्त है. 

Click the link to read more 

Monday, September 29, 2014

प्रतिस्पर्धी कूटनीति का रोमांच



मोदी ने भारत की ठंडी कूटनीति को तेज रफ्तार फिल्मों के प्रतिस्पर्धी रोमांच से भर दिया है. यह बात दूसरी है कि उनके कूटनीतिक अभियान चमकदार शुरुआत के बाद यथार्थ के धरातल पर आ टिके हैं. लेकिन अब बारी कठिन अौर निर्णायक कूटनीति की है.


ताजा इतिहास में ऐसे उदाहरण मुश्किल हैं कि जब कोई राष्ट्र प्रमुख अपने पड़ोसी की मेजबानी में संबंधों का कथित नया युग गढ़ रहा हो और उसकी सेना उसी पड़ोसी की सीमा में घुसकर तंबू लगाने लगे. लेकिन यह भी कम अचरज भरा नहीं था कि एक प्रधानमंत्री ने अपनी पहली विदेश यात्रा में ही दो पारंपरिक शत्रुओं में एक की मेजबानी का आनंद लेते हुए दूसरे को उसकी सीमाएं (चीन के विस्तारवाद पर जापान में भारतीय प्रधानमंत्री का बयान) बता डालीं. हैरत तब और बढ़ी जब मोदी ने जापान से लौटते ही यूरेनियम आपूर्ति पर ऑस्ट्रेलिया से समझौता कर लिया. परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत न करने वाले किसी देश के साथ ऑस्ट्रेलिया का यह पहला समझौता, भारत की नाभिकीय ऊर्जा तैयारियों को लेकर जापान के अलग-थलग पडऩे का संदेश था. बात यहीं पूरी नहीं होती. चीन के राष्ट्रपति जब साबरमती के तट पर दोस्ती के हिंडोले में बैठे थे तब हनोई में, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मौजूदगी में भारत, दक्षिण चीन सागर में तेल खोज के लिए विएतनाम के साथ करार कर रहा रहा था और चीन का विदेश मंत्रालय इसके विरोध का बयान तैयार कर था.
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सौ दिनों में भारत की ठंडी कूटनीति को तेज रफ्तार फिल्मों के प्रतिस्पर्धी रोमांच से भर दिया है. अमेरिका उनके कूटनीतिक सफर का निर्णायक पड़ाव है. वाशिंगटन में यह तय नहीं होगा कि भारत में तत्काल कितना अमेरिकी निवेश आएगा बल्कि विश्व यह देखना चाहेगा कि भारतीय प्रधानमंत्री, अपनी कूटनीतिक तुर्शी के साथ भारत को विश्व फलक में किस धुरी के पास स्थापित करेंगे.
READ MORE 

Tuesday, September 23, 2014

सुरक्षित रहने का जोखिम


उपचुनाव नतीजों के बाद मोदी समझ गए होंगे कि बहुमत वाली सरकार के साथ अपेक्षाएं नाहक ही नहीं जोड़ी जाती हैं.
स बात की कोई गारंटी नहीं कि प्रचंड बहुमत वाली सरकार साहसी और क्रांतिकारी ही होगी. अप्रत्याशित रूप से बड़ी सफलताएं, कभी-कभी जोखिम लेने की कुव्वत को इस कदर घटा देती हैं कि ताकतवर सरकारें, अवसर और अपेक्षाओं के बावजूद, एक दकियानूसी निरंतरता की ओट में खुद को ज्यादा महफूज पाती हैं. मोदी सरकार के 100 दिनों पर मंत्रियों के बयानों से गुजरते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल नहीं कि नई सरकार के पहले 100 दिन, दरअसल पिछली सरकार की बड़ी स्कीमों को मोदी ब्रांड के सहारे नए सिरे से पेश करने की कोशिश में बीते हैं. विवादों का डर कहें या तजुर्बे की कमी लेकिन सरकार ने लीक तोडऩे और पुराने को बदलने का कोई प्रत्यक्ष जोखिम नहीं लिया. यही वजह थी कि ताजा उपचुनावों में बीजेपी विकास के वादों को प्रामाणिक बनाने वाले तथ्य पेश नहीं कर सकी और लव जेहाद जैसे मुद्दों पर वोटर रीझने को तैयार नहीं हुए.
Click the link below to read more

Tuesday, September 16, 2014

चीन का डिजिटल डिजाइन


पिछले साल नवंबर में जबभारत की सियासत बड़े परिवर्तन के लिए पर तोल रही थी, ठीक उसी वक्त बीजिंग में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपने तीसरे प्लेनम में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अर्थव्यवस्था को रिफ्रेश करने की जुगत में लगी थी. चीन के सुधार पुरोधा देंग जियाओपिंग ने आर्थिक सुधारों को चीन की (माओ की क्रांति के बाद) दूसरी क्रांति भले ही कहा हो लेकिन देंग से जिनपिंग तक आते-आते 35 साल में चीनी नेतृत्व को यह एहसास हो गया कि ज्यादा घिसने से सुधारों का मुलम्मा भी छूट जाता है. इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी की महाबैठक से सुधारों का जो नया एजेंडा निकला वह ‘‘मेड इन चाइना’’ की ग्लोबल धमक पर नहीं बल्कि देश की भीतरी तरक्की पर केंद्रित था. दुनिया अचरज में थी कि विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपनी देसी इकोनॉमी में ऐसा क्या करने वाली है जिससे 1.35 अरब लोगों की आय में बढ़ोतरी होती रहेगी? संयोग से राष्ट्रपति जिनपिंग के दिल्ली पहुंचने से पहले दुनिया को चीन की ‘‘तीसरी क्रांति’’ के एजेंडे का मोटा-मोटा खाका मिल गया है. चीन 2025 तक अपने जीडीपी को दोगुना करने वाला है. यह करिश्मा इंटरनेट इकोनॉमी से होगा
Click the link to read more ..