Sunday, December 17, 2017

ताकि बना रहे भरोसा


डर में जीने का शौक न हो तो सरकार की इस बात पर भरोसा करने में कोई हर्ज नहीं है कि बैंकों में जमाकर्ताओं का पैसा नहीं डूबेगा. लोगों को बैंकों की जितनी जरूरत है सरकार को भी लोगों की बचत की उतनी ही जरूरत है. यह बचत ही बैंकों के जरिए सरकार को कर्ज के तौर पर मिलती हैजिससे उसका खर्च चलता है.

भारत में बैंक बीमार हुए हैं लेकिन डूबे कभी नहीं. कोई सरकार बैंकों के डूबने का जोखिम नहीं ले सकती लेकिन (एफआरडीआइ—फाइनेंशियल रिजोल्यूशन ऐंड डिपॉजिट इंश्योरेंस) बिल 2017 का प्रावधान 52 का खौफ तारी हैजो कहता है कि बैंक या वित्तीय कंपनियां अगर संकट में हो तो वह अपनी देनदारियों यानी लायबेलिटी का इस्तेमाल (बेल इन) कर सकती हैं. जमाकर्ताओं (डिपॉजिटर्स) का पैसा इसमें शामिल है हालांकि जिसे डिपॉजिट को इंश्योरेंस के तहत रखा गया है वह इस प्रक्रिया से बाहर रहेगा. मौजूदा नियमों के तहत बैंक डिपॉजिट चाहे जितना भी हो उस पर अधिकतम बीमा एक लाख रुपए ही है.

इस प्रावधान की भाषा खराब हैसंदर्भ भी उलझे हैंइसके लागू होने की कोई संभावना नहीं है. सरकार सफाई दे रही है लेकिन डर है तो है.

खौफ की बुनियादी वजह यह है कि चुनिंदा लोगों की आर्थिक अनियमितताओं के लिए सामूहिक दंड देने के प्रयोग कुछ ज्यादा ही होने लगे हैं. पिछले साल नोटबंदी में कुछ लोगों के काले धन के कारण पूरे देश को सजा दे दी गई. बड़े कर्जदारों पर बकाया बैंकों की समस्या है लेकिन समाधान की कोशिशें आम लोगों को डरा रहीं हैं.

भारतीय बैंकिंग की मुसीबत अनोखी है. 

- चुनिंदा बड़े कर्जदार इसका संकट हैं. कुछ कारोबारी गलतियों के मारे हैंकुछ ने जान-बूझकर बैंकों को चूना लगाया है और कुछ को मंदी ले डूबी है. बैंकों के 86 फीसदी फंसे हुए कर्ज (जीएनपीए-8.29 लाख करोड़ रु.) बड़े कर्जदारों के नाम हैं.

- लेकिन खौफ में जमाकर्ता हैं जो छोटी बचतों (150 लाख करोड़ रु.) से देश की वित्तीय रीढ़ बनाते हैं.

- बैंकों को उबारने के लिए दो ही विकल्प हैं: एक या तो करदाताओं का पैसा लगाकर बैंकों को उबारा (बजट से बैंकों को पूंजी देना यानी बेल आउट) जाए या जमाकर्ताओं वालों की बचत से नुक्सान भरा जाए. 'बेल-इन' प्रावधान सुझाता है कि बैंकों को बजट यानी टैक्स के पैसे से उबारना गलत है. बैंकों से कारोबार (निवेश या जमा) करने वालों को यह बोझ उठाना चाहिए यानी कि छुरी किसी तरह से गिरे कटेंगे आम लोग ही.

बैंकिंग की दुविधा का इलाज 'बेल इन''बेल आउट' या 'हेयर कट' (बैंकों के पूंजी व मुनाफे में कमी) नहीं है. फिलहाल बैंकिंग परिदृश्य को तीन बड़े ढांचागत सुधार चाहिए.

- उदारीकरण को 25 साल बीत चुके हैं. परियेाजनाओं के वित्त पोषण का ढांचा बदलना चाहिए. बड़ी परियोजनाओं के लिए बैंक कर्जों पर निर्भरता कम करना जरूरी है. कंपनियों को अपनी साख पर बाजार पूंजी व कर्ज उठाना चाहिए. बैंकों के लिए छोटे उपभोक्ता कर्ज बेहतर हैंजिनकी वसूली को लेकर समस्या नहीं है. इक्विटी संस्कृति कंपनियों को पारदर्शी बनाएगी. आम लोगों को बचत व निवेश के नए मौके हासिल होंगे और जोखिम भरे बैंक कर्ज कम होंगे.

- बैंकों को संसाधनों के गैर डिपॉजिट स्रोत बढ़ाने होंगे. पिछली सदी तक अमेरिका में बैंकों के अधिकांश संसाधन डिपॉजिट से आते थे. क्रमशः बैंकों ने फेडरल रिजर्व से कर्ज और पूंजी व बॉन्ड बाजार के जरिए संसाधन संग्रह बढ़ाना प्रारंभ किया. अब आधे संसाधन गैर डिपॉजिट हैं. इससे बैंक संसाधनों की लागत भी कम हुई हैजमाकर्ताओं के लिए जोखिम घटे हैं.
जमाकर्ताओं को बेहतर बीमा सुरक्षा मिलनी चाहिए जिसकी लागत उनसे ली जा सकती है.

- बैंकों पर सरकार के नजरिए में अंतरविरोध लोगों को डरा रहा है. पहले बैंक में सोना रखकर (गोल्ड मॉनेटाइजेशन) नकद लेने के लिए कहा गयाफिर नोटबंदी हो गई. गरीबों को बैंक से जोड़ने की कोशिशें (जन धन) इसका सबसे बड़ा शिकार हुई हैं. 

- बैंक का एक अर्थ विश्वास भी होता है जो यूं ही नहीं है. किसी अर्थव्यवस्था में बैंक लोगों के भरोसे का पहला व आखिरी आधार हैं. हर देश की बैंकिंग का मिजाज अलग है. भारत में बैंकों पर पहला हक करोड़ों जमाकर्ताओं का हैजिनमें अधिकांश कभी कर्ज नहीं लेते. कर्ज लेने वाले बैंकिंग का जरूरी हिस्सा हैं लेकिन छोटा-सा हैं.




अगर सरकार चाहती है कि अधिक से अधिक लोग बैंकों से जुड़ें या जुड़े रहें तो उसे ऐसा कुछ नहीं करना होगा जो भारत में बैंकों की बुनियाद यानी जमाकर्ताओं को आशंकित करता हो. बैंकिंग के साथ एक सीमा से ज्यादा जोखिम विस्फोटक हो सकता है.

Sunday, December 10, 2017

इसलिए खास है गुजरात, इस बार


Image- The mint 2015

हार्दिक पटेल की चमत्‍कारिक लोक‍प्रियताराहुल गांधी की तुर्शीभाजपा के राज्‍य नेतृत्‍व के फीकेपन और जीएसटी की मार के बावजूद कोई समझदार राजनीतिक प्रेक्षक गुजरात में भाजपा को कमजोर आंकने की गलती नहीं कर सकता.

फिर भी इस बार गुजरात खास क्‍यों है  ऐसा क्‍या है जो गुजरात की जंग इतनी कंटीली हो गई है. ?

यह पिछले तीन साल का कमाल है जिसने गुजरात के चुनाव को भारत में पिछले पच्‍चीस सालों का सबसे रहस्‍यमय चुनाव बना दिया है  यह चुनाव तीन ऐसे सवालों के जवाब लेकर आएगा जिनसे भारतीय राजनीति पहली बार मुकाबिल है

पहला - क्‍या गहरी आर्थिक मंदी का चुनावी राजनीति से क्‍या रिश्‍ता है 

दो - क्‍या तरक्‍की के बावजूद असमानतायें बढ़ती रह सकती हैं और उनके चुनावी फलित भी हो सकते हैं

तीसरा - क्‍या खौलते जनआंदोलनों के बावजूद लोगों के चुनावी फैसले अपरिवर्तित रह सकते हैं

बीते तीन साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्‍य में जो कुछ हुआ है वह भी शेष भारत से पूरी तरह फर्क है. ठीक उसी तरह जैसे कि पिछले दो दशक में गुजरात देश से अलग चमकता रहा था. यह उठा पटक नरेंद्र मोदी के गांधीनगर से दिल्‍ली जाने के बाद हुई. राजनीतिक आबो हवा में इस बदलाव की जड़ें राज्‍य की अर्थव्‍यवस्‍था में हैं.

गुजरात में माहौल बदलने की पहली सरकारी मुनादी जुलाई 2016 में हुई थी जब देश को पता चला कि 2014-15 के दौरान गुजरात गुजरात भारत में सबसे तेज विकास दर वाले पांच राज्यों से बाहर निकल गया है वह अब दसवें नंबर पर था और गहरी मंदी में धंस गया था. यह आंकड़ा जिस वित्‍तीय साल की तस्‍वीर बता रहा था वह नरेंद्र मोदी के बाद गुजरात का पहला वर्ष था.

इस वक्‍त तक पाटीदार आंदोलन पहला साल पूरा कर चुका था. आरक्षण की मांग कर रहे बेरोजगार युवाओं का आंदोलन भाजपा को राज्‍य का मुखिया बदलने पर मजबूर करने वाला था और 2017 में गुजरात को भाजपा के लिए सबसे करीबी लड़ाई बना देने वाला था जिसे वह चुटकियों में जीतती आई थी

मंदीबेकार और पाटीदार
गुजरात अगर कोई देश होता तो उसकी मंदी दुनिया में चर्चा का विषय होती. पिछले दो दशकों में गुजरात की ग्रोथ जितनी तेज रही है ढलान उससे कहीं ज्‍यादा तेज है. औद्योगिक बुनियादतटीय भूगोल और निजी पूंजी के कारण गुजरात औद्योगिक ग्रोथ का करिश्‍मा रहा है. भारत में सिर्फ छह फीसदी जमीन और पांच फीसदी जनसंख्‍या वाला गुजरात पूरे देश से तेज (दस फीसदी तक) दौड़ा. गुजरात ने देश के जीडीपी में 7.6 फीसदी व निर्यात में 22 फीसदी हिस्‍सा ले लिया. (रिजर्व बैंक और नीति आयोग के आर्थिक आंकड़ों की हैंडबुक में गुजरात के ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट- जीएसडीपी के वित्त वर्ष 2013-14 के बाद के आंकडे उपलब्‍ध नहीं हैं.)

लेकिन मैन्‍युफैक्‍चरिंग पर आधारित अर्थव्‍यवस्‍थायें मंदी में (सेवा या कृषि वाली अर्थव्‍यवस्‍थाओं के मुकाबले) ज्‍यादा तेजी से टूटती हैं इस‍लिए गुजरात में मंदी व बेकारी शेष भारत से कहीं ज्‍यादा गहरी है. यह ढलान 2013 से शुरु हुई. पाटीदार युवा आंदोलन और गुजरात में मंदी की शुरुआत समकालीन हैं. मंदी से कराहता गुजरात का कारोबार नोटबंदी और जीएसटी की चोट से  बिलबिला उठा और चुनावी नुकसान के डर से भाजपा को पूरा जीएसटी सर के बल खड़ा करना पड़ा. 

करिश्‍मे का असमंजस
मोदी के गुजरात का करिश्‍मा उसकी खेती के पुर्नजागरण में छिपा है. 2001 से 2011-12 तक गुजरात का कृषि उत्‍पादन देश की तुलना ( 3 फीसदी के मुकाबले 11 फीसदी) में अप्रत्‍याशित रुप से तेज था. खेतिहर ग्रोथ के बावजूद ग्रामीण गुजरात में सामाजिक सुविधायें पिछड़ी रही जो गवर्नेंस की पिछले दो दशक सबसे बड़ी उलझन है. 2013 से ही खेती भी मुश्किल में है जिसकी वजह मौसम (सूखा-बाढ़) भी है बाजार भी. शहर उद्योगसेवाओं और सरकारी नौकरी के कारण किसी तरह चल रहे हैंलेकिन मंदी ने गांवों के लिए मौके खत्‍म कर दिये हैं इसलिए ग्रामीण गुजरात का गुस्‍सा इस चुनाव में भाजपा की सबसे बड़ी मुश्किल है

आंदोलनों की हुंकार
गुजरात देश से कितना से अलग है पिछले तीन साल इसके गवाह हैं जब शेष भारत केंद्र की नई सरकार के नेतृत्‍व में अच्‍छे दिनों पर चर्चा कर रहा था तब गुजरात आंदोलनों से सुलग रहा था. इस राज्‍य ने जितने आंदोलन पिछले तीन साल में देखे हैं उतने हाल के वर्षों में नहीं हुए. ज्‍यादातर आंदोलन युवाओकिसान, कामगारों और व्‍यापारियों के थे  जो मंदी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

गुजरात अपने छोटे से भूगोल में आार्थिकसामाजिक और राजनीतिक कारकों की पेचीदगी समेटे है इसलिए  गुजरात का चुनाव पिछले दो दशक का सबसे रोमांचक चुनाव हो गया है.

गुजरात के नतीजे पहली बार हमें स्‍पष्‍ट रुप से बतायेंगे कि मंदी और बेकारी के बीच लोग कैसे वोट देते हैं लिखना जरुरी नहीं है कि यह निष्‍कर्ष भारत के भविष्‍य की आर्थिक राजनीति के लिए बहुत कीमती होने वाले हैं.

Monday, December 4, 2017

माननीय सभासदो...

लोकतंत्र की सफलता को मापने का सबसे बेहतर पैमाना क्या हो सकता है
नतीजों से नीतियों की ओर चलते हैं. यह सफर हमें नौकरशाहीक्रियान्वयनमॉनिटरिंग के पड़ावों से गुजारते हुए विधायिका की दहलीज पर ले जाकर खड़ा कर देगा.
हम खुद को संसद या विधानसभा के दरवाजे पर खड़ा पाएंगेजहां से कानून निकलते हैं.

लोकतंत्र में सरकारें कितनी सफल होती हैंयह इस बात पर निर्भर करता है कि उनके कानून कितने सुविचारित और दूरदर्शी हैं. जाहिर है कि कानूनों की गुणवत्ता विधायिकाओं की कुशलता पर निर्भर है यानी हमारे कानून निर्माताओं—सांसद-विधायकों की काबिलियत पर.

दो ताजे उदाहरण हमें भारत में विधायी दक्षता की स्थिति पर सोचने को मजबूर करते हैं.

पहला है इनसॉल्वेंसी और बैंकरप्टसी (दीवालियापन) कानूनजिसमें एक साल के भीतर ही अध्यादेश के जरिए बड़ा बदलाव करना पड़ा है. पिछले साल दिसंबर से लागू हुआ कानून बीमार कंपनियों के पुनर्गठन और बकाया बैंक कर्ज की वसूली के लिए आधुनिकत्वरित कानूनी प्रक्रिया लेकर आया था. यह सुधार निवेश के माहौल को स्थायी बनाने और बैंक कर्ज का दुरुपयोग रोकने लिए जरूरी था. इसी कानून के चलते हाल में कारोबारी सहजता में भारत की रैंकिंग बेहतर हुई.

कानून लागू होते ही सरकार को पता चला कि इसका तो बेजा फायदा उठाया जा सकता है और उसका राजनैतिक नुक्सान हो सकता है इसलिए अब इसे सिर के बल खड़ा कर दिया गया. बहस जारी है कि अब यह कानून बैंकों व कंपनियों के कितने काम का बचा है और इसके बाद कर्ज वसूली और बीमार कंपनियों के पुनर्गठन की प्रक्रिया में कैसे तेजी बनी रहेगी. 

संशोधन पर तकनीकी बहस से ज्यादा बड़ा मुद्दा यह है कि सिर्फ एक साल में इतने बड़े बदलाव की जरूरत क्यों पड़ीदेश में बीमार कंपनियों से निबटने वाले कानूनों (सीका ऐक्टकंपनी कानूनसारफेसी ऐक्टकर्ज उगाही ट्रिब्यूनल) का इतिहास और इस तरह के मामलों के पर्याप्त अनुभव हैं लेकिन इसके बाद भी हम एक अचूक बैंकरप्टसी कानून क्यों नहीं बना सके?

दूसरा नमूना है जीएसटी विधायी कुशलता की हालत का. जीएसटी भी करीब एक दशक से बन रहा है ताकि उपभोक्ताओं और उद्योग पर करों का बोझ कम किया जा सकेकर प्रणाली आसान बनाई जा सके और ज्यादा करदाता टैक्स दायरे में आ सकें. लेकिन बनने के तीन माह के भीतर ही जीएसटी ध्वस्त हो गया. टैक्स रेट उलट-पलट हो गए और इस दौरान नियम इतने बदले कि उन्हें याद रखना मुश्किल हो गया. जीएसटी की विफलता ने भारत के इनडाइरेक्ट टैक्स ढांचे को गहरी चोट पहुंचाई है.

टैक्स को लेकर भी तजुर्बों की कमी नहीं है. वैट और सर्विस टैक्स लागू हो चुके हैं. वैट यानी वैल्यू एडेड टैक्स को अमल में लाने में वक्त लगा था लेकिन वह जीएसटी से ज्यादा टिकाऊ साबित हुआ. जीएसटी की जरूरतें और चुनौतियां पूरी तरह स्पष्ट थीं. राजनैतिक सहमति भी थी लेकिन लंबे इंतजार के बाद भी हमारे कानून निर्माता हमें एक कायदे का जीएसटी नहीं दे पाए.

कानूनी और नीतिगत विफलताओं की फेहरिस्त लंबी हो सकती है जो विधायिका की दक्षता पर उठने वाले सवालों को और व्यापक बना देगी. चुनावी दबावों के कारण नए बने कानूनों का ऐसा शीर्षासन (जीएसटीबैंकरप्टसी) अनोखा है. जो संसद कानून बनाती है वह इन बदलावों पर जब तक विचार करे तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

भारत में विधायी अकुशलता की चुनौती बढ़ रही है. ताजा अनुभव हमें चार निष्कर्ष देते हैं:

1. जीएसटी व बैंकरप्टसी कोड का यह हाल नहीं होता. का हाल गवाह है कि सरकार कानून बनाने से पहले पर्याप्त शोध नहीं कर रही है

2. कानून से प्रभावित होने वाले पक्षों से संवाद नहीं होता. राजनेता स्वयं को सर्वज्ञ मानते हैं.

3. संसद में कानूनों पर बहस इतिहास बन चुकी है. संसद से बहुमत के दम पर पारित कराने के बाद अधकचरे कानून जनता के माथे मढ़ दिए जाते हैं.

4. खराब कानून विवादों में बदलते हैं और तब सरकार को लगता है कि अदालतें अपनी सीमा पार कर रही हैं.

दूरदर्शिता कानूनों की पहली जरूरत है. उनमें बार-बार बदलाव उनकी कमजोरी ही साबित करते हैं. जब हमारी संसद हमें एक साल तक टिक पाने वाले कानून नहीं दे पा रही है तो राज्यों की विधानसभाओं में कैसे कानून बन रहे होंगे. 




कानूनों की अधिकता जितनी खतरनाक है, खराब कानून से उतनी ही बड़ी मुसीबतें हैं. दुर्भाग्य से हमारे पास दोनों हैं.

Sunday, November 26, 2017

आह इतिहास ! वाह इतिहास !


इतिहास से वर्तमान की जंग सबसे आसान है. जीवंत योद्धा जब काल्पनिक शत्रु से आर-पार वाली जंग लड़ते हैं तो जातीय स्मृतियों से सजा परिदृश्य, फड़कते हुए किस्से-कहानियों और जोरदार संवादों के साथ राजनैतिक ब्लॉकबस्टर की रचना कर देता है.

खोखली होती है यह रोमांचक लड़ाई. हारता-जीतता कोई नहीं अलबत्ता इतिहास बोध की शहादत का नया इतिहास बन जाता है.

इरिक हॉब्सबॉम को बीसवीं सदी के इतिहासकारों का इतिहासकार कहा जाता है. वे कहते थे, ''पहले मैं समझता था कि इतिहास ना‍भिकीय भौतिकी जैसा खतरनाक नहीं है लेकिन अब मुझे लगता है कि इतिहास भी उतना ही भयानक हो सकता है.'' 

सियासत के साथ मिलकर इतिहास के जानलेवा होने की शुरुआत बीसवीं सदी में ही हो गई थी. लंबे खून-खच्चर के बाद यूरोप ने यह वास्तविकता स्वीकार कर ली कि इतिहास के सच हमेशा कुछ मूल्यहीन तथ्यों और अर्थपूर्ण निर्णयों के बीच पाए जाते हैं. इतिहास के तथ्य अकेले कोई अर्थ नहीं रखते. इनकी निरपेक्ष या वस्तुपरक व्याख्या नहीं हो सकती. इसे संदर्भों में ही समझा जा सकता है इसलिए इनके राजनैतिक इस्तेमाल का खतरा हमेशा बना रहता है.

जिन समाजों में सांस्कृतिक इतिहास राष्ट्रीय इतिहास से पुराना और समृद्ध हो, इतिहास व मिथक के रिश्ते गाढ़े हों और परस्पर विरोधी तथ्य इतिहास का हिस्सा हों, वहां इतिहास पर राजनीति खतरनाक हो जाती है.

भारत में फिल्मों, किताबों पर गले काटने की धमकियां रुकें या नहीं. लेकिन इक्कीसवीं सदी में इतिहास को देखने के नए तरीकों पर चर्चा में कोई हर्ज नहीं है.

सांस्कृतिक स्मृतियां

उलनबटोर के पास चंगेज खान की 40 मीटर ऊंची इस्पाती प्रतिमा पिछले दशक में ही स्थापित हुई है. मंगोलिया की जातीय स्मृ‍तियों में चंगेज खान की जो छवि है, यूरोप व अरब मुल्क उसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे. जातीय स्मृतियां किसी भी इतिहास का अनिवार्य हिस्सा हैं लेकिन किसी दूसरे समाज के लिए इनके बिल्कुल उलटे मतलब होते हैं. भारत में कई राजा और सम्राट कहीं नायक तो कहीं खलनायक हैं. ऐसा इतिहास वर्तमान से काफी दूर है और भविष्य के लिए प्रासंगिक भी नहीं है, अलबत्ता राजनीति चाहे तो इसे विस्फोटक बना सकती है.

भूलने के उपक्रम

इतिहास कभी नहीं मरता लेकिन समझ-बूझकर उसे भुलाने की कोशिशें भी अतीत से संवाद के नए तरीकों का हिस्सा हैं. यूरोप मध्ययुगीन बर्बरता पर शर्मिदा होता है. चीन व ब्रिटेन के रिश्तों पर अफीम युद्ध छाया नहीं है. ब्रिटेन उपनिवेशवादी इतिहास को भुला देना चाहता है. अमेरिका, जापान पर परमाणु हमले को याद करने से बचता है. स्पेन का लैटिन अमेरिका पर हमला, स्टालिन की बर्बरताएं या हिटलर की नृशंसता! दुनिया का सबसे बड़ा नरसंहार कौन-सा था? इस पर शोध चलेंगे  लेकिन विश्व युद्धों के बाद इतिहास के कुछ हिस्सों को सामूहिक विस्मृति में सहेज देने के उपक्रम जारी हैं ताकि वर्तमान में चैन के साथ जिया जा सके. 

कीमती यादगार 

स्मृति व इतिहास में एक बड़ा अंतर है. स्मृति किसी समाज के अतीत का वह हिस्सा है जिसे बराबर याद किया जाता है या जिससे सीखा जा सकता है, जबकि इतिहास अतीत का वह आयाम है, जिसकी प्रासंगिकता वर्तमान से उसकी दूरी के आधार पर तय होती है. ताजा इतिहास को, बहुत पुराने इतिहास पर, वरीयता दी जाती है क्योंकि ताजा अतीत, वर्तमान के काम आ सकता है.

सबसे अधिक राजनैतिक विवाद उस इतिहास को लेकर है जिसे हम बार-बार याद करना चाहते हैं और वर्तमान में उससे सीखते रहना चाहते हैं. इसलिए स्मारक, संग्रहालय बनाने, इतिहास की पाठ्य पुस्तकों का विषय तय करने और कला-कल्पना में इतिहास के प्रसंगों पर गले कटने लगते हैं.

तो फिर कैसे तय हो कि वर्तमान को कौन-सा इतिहास चुनना चाहिए?

नीदरलैंड के इतिहास के प्रोफेसर विम वान मेरुस की राय गौर करने लायक है- 21वीं सदी में किसी भी समुदाय के दो लक्ष्य हैं—पहला, स्वतंत्र राष्ट्र होना और दूसरा, उस राष्ट्र का लोकतंत्र होना. इतिहास की जो भी व्याख्या राष्ट्र या जातीय पहचान को प्रकट करती है, उसे लोकतंत्र के मूल्यों की कसौटी पर भी बेहतर होना होगा, नहीं तो इतिहास हमेशा लड़ाता रहेगा.

ब्रिटिश पत्रकार और इतिहासकार, ई.एच. कार (पुस्तकः व्हाट इज हिस्ट्री) कहते थे कि इतिहास की सबसे उपयुक्त व्याख्या किसी समाज के भविष्य को निगाह में रखकर ही हो सकती है. .......

जो ऐसा नहीं कर पाते वे जॉर्ज बर्नाड शॉ को सही साबित करते हैः ''इतिहास से हम यही सीखते हैं कि हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा.''

Sunday, November 19, 2017

यह है असली कामयाबी


रेंद्र मोदी सरकार के पिछले तीन साल की सबसे बड़ी सफलता क्या है
अगर आपको नहीं मालूम तो इस बात पर मत चौंकिए कि प्रचार-वीर सरकार ने अब तक बताया क्यों नहीं ? 
आश्‍चर्य  तो यह है कि इस कामयाबी को मजबूत बनाने के लिए अब तक कुछ भी नहीं किया गया.
तमाम मुसीबतों के बावजूद छोटे-छोटे शहरों के मध्य वर्ग की छोटी बचतों ने बेहद संजीदगी से भारतीय शेयर बाजार की सूरत बदल दी है. म्युचुअल फंड पर सवार होकर शेयर बाजार में पहुंच रही बचतएक अलहदा किस्म का वित्तीय समावेशन (फाइनेंशियल इनक्लूजन) गढ़ रही है और भारत की निवेश आदतों को साफ-सुथरा बनाने का रास्ता दिखा रही है.

भारतीय शेयर बाजार में कुछ ऐसा हो रहा है जो अब तक कभी नहीं हुआ. बाजारों के विदेशी निवेशकों की उंगलियों पर नाचने की कहानी पुरानी हो रही है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2014 के बाद से घरेलू निवेशकों ने 28 अरब डॉलर मूल्य के शेयर खरीदे हैं. यह विदेशी निवेश के (30 अरब डॉलर) के तकरीबन बराबर ही है. इसने पिछले तीन साल में शेयर बाजार को बड़ा सहारा दिया है और विदेशी निवेश पर निर्भरता को कम किया है.

छोटे निवेशक अपनी मासिक बचत को कमोबेश सुरक्षित तरीके से (सिस्टेमिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी सिप) म्युचुअल फंड में लगा रहे हैं. म्युचुअल फंड उद्योग के मुताबिकपिछले तीन साल में उसे मिले निवेश ने सालाना 22-28 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की है. म्युचुअल फंड एसेट्समई 2014 में 10 लाख करोड़ रु. के मुकाबले 2017 की जुलाई में 19.97 लाख करोड़ रु. पर पहुंच गए. ज्यादातर निवेश छोटे-छोटे शहर और कस्बों से आ रहे हैंजहां फंड में निवेश में 40 फीसदी का इजाफा हुआ है.

मकान-जमीन और सोने की चमक बुझ रही है तो घरेलू निवेशकों की मदद की बदौलत शेयर बाजार (निफ्टी) ने पिछले तीन वर्ष के दौरान 11.97 फीसदी (किसी भी दूसरी बचत या निवेश से कहीं ज्यादा) का सालाना रिटर्न दिया है.

जोखिम का मोड़

इक्विटी कल्चर की कहानी रोमांचक हैलेकिन जोखिम से महफूज नहीं. शेयरों की कीमतें जितनी तेजी से बढ़ रहीं हैंबाजार की गहराई उसके मुताबिक कम है. बाजार में धन पहुंच रहा है तो इसलिए देश की आर्थिक हकीकत (ग्रोथ में गिरावटतेल की बढ़ती कीमतपटरी से उतरा जीएसटी आदि) की परवाह किए बगैर बाजार बुलंदियों के रिकॉर्ड गढ़ रहा है.

यही मौका है जब छोटी बचतों के रोमांच को जोखिम से बचाव चाहिए.

- कंपनियों के पब्लिक इश्यू बढऩे चाहिए. प्राइमरी शेयर बाजार विश्लेषक प्राइम डाटाबेस के मुताबिकपिछले तीन वर्ष में नए इश्यू की संख्या और आइपीओ के जरिए जुटाई गई पूंजी2009 और 2011 के मुकाबले कम है जो प्राइमरी मार्केट के लिए हाल के सबसे अच्छे साल थे. सरकारी कंपनियों के विनिवेश में तेजी की जरूरत है.

- शेयर बाजार की गहराई बढ़ाने के लिए नए शेयर इश्यू का आते रहना जरूरी है. औद्योगिक निवेश के संसाधन जुटाने में इक्विटी सबसे अच्छा रास्ता है.

- सेबी के नियमों के मुताबिकशेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनी के कम से कम 25 फीसदी शेयर जनता के पास होने चाहिए. अब भी 1,886 सूचीबद्ध कंपनियां इस नियम का पालन नहीं कर रही हैं. कैपिटलाइन के आंकड़ों के मुताबिकइनमें 1,795 कंपनियां निजी हैं.

- लोगों की लघु बचत दो दशक के सबसे निचले स्तर पर है. 2010 में परिवारों की बचत (हाउसहोल्ड  सेविंग्स)जीडीपी के अनुपात में 25.2 फीसदी ऊंचाई पर थी जो 2017 में 18.6 फीसदी पर आ गई. सरकारी बचत योजनाएं (एनएससीपीपीएफ) ब्याज दरों में कमी के कारण आकर्षण गंवा रही हैं.
बचत में गिरावट को रोकने के लिए वित्तीय बाजार में निवेश को प्रोत्साहन देने होंगे. आयकर नियम बदलने होंगे ताकि शेयरोंम्युचुअल फंडों और डिबेंचरों में निवेश को बढ़ावा मिले.

भारत में निवेश व संपत्ति का सृजन पूरी तरह सोना व जमीन पर केंद्रित है. क्रेडिट सुइस ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट 2017 के मुताबिकभारत में 86 फीसदी निजी संपत्ति सोने या जमीन के रूप में हैवित्तीय निवेशों का हिस्सा केवल 14 फीसदी हैजबकि ब्रिटेन में 51 फीसदीजापान में 53 फीसदी और अमेरिकी में 72 फीसदी संपत्ति वित्तीय निवेशों के रूप में है.



नोटबंदी से तो कुछ नहीं मिला. यदि छोटे निवेशकों के उत्साह को नीतियों का विटामिन मिल जाए तो संपत्ति जुटाने के ढंग को साफ-सुथरा बनाया जा सकता है. बताने की जरूरत नहीं है कि वित्तीय निवेश पारदर्शी होते हैं और सोना व जमीन काली कमाई के पसंदीदा ठिकाने हैं.