Sunday, April 1, 2018

सबसे ज़हरीली जोड़ी


फ्रिट्ज (नोबेल 1918) केमिस्ट्री का दीवाना था. वह यहूदी से ईसाई बन गया और शोध से बड़ी ख्याति अर्जित की. बीएएसएफ तब जर्मनी की सबसे बड़ी केमिकल (आज दुनिया की सबसे बड़ी) कंपनी थी. उसे नाइट्रोजन का मॉलीक्यूल तोडऩे वाली तकनीक की तलाश थी ताकि अमोनिया उर्वरक बनाकर खेती की उपज बढ़ाई जा सके. हेबर ने 1909 में फॉर्मूला खोज लिया. उसने कार्ल बॉश के साथ मिलकर अमोनिया फर्नेस तैयार की और मशहूर हेबर-बॉश पद्धति पर आधारित पहला उर्वरक संयंत्र ओप्पूक में 1913 से शुरू हो गया.

अगले ही साल बड़ी लड़ाई छिड़ गई. जर्मनी के पास गोला-बारूद की कमी थी. टीएनटी विस्फोटक बनाने के लिए नाइट्रेट का आयात मुश्किल था. सरकार के निर्देश पर हेबर-बॉश की फैक्ट्रियां खाद की जगह बम बनाने लगीं. यप्रेस की दूसरी लड़ाई (1915) में फ्रेंच और सहयोगी सेना पर नाइट्रोजन बम का इस्तेमाल हुआ. हेबरजिसकी बदौलत जर्मनी चार साल तक जंग में टिक सका थावह नाजियों के नस्लवादी कानून का शिकार होकर (1934) ट्रिबलेस्की मे तंगहाली में मरा.

हेबर-बॉश पद्धति से बने उर्वरकों के कारण ही उपज बढ़ीजिससे आज दुनिया की तीन अरब आबादी का पेट भर रहा है.

फेसबुक की डेटा चोरी में हेबर के आविष्कार का अक्स नजर आ सकता है. अभिव्यक्ति और संवाद के नए जनतंत्र पर धूर्त सियासत के पंजे गडऩे लगे हैं. हमने राजनीति का अपराधी और कारोबारियों से रिश्ता देखा था लेकिन हमारी निजी जानकारियों से लैस कंपनियों और कुटिल नेताओं का गठजोड़ सर्वाधिक विस्फोटक हैजो हमारी सोच व तर्क को मारकर लोकतांत्रिक फैसलों पर नियंत्रण कर सकता है.

हर दुश्‍मन पहले से ज्‍यादा ताकतवर होता है. यह जोड़ी हमारी नई आजादी की नई दुश्‍मन है. वेब की दुनिया में हम निचाट नंगे हैं इसलिए इनकी कुटिलताओं में अनंत खतरे पैबस्‍त हैं. 

इतिहास हमें सिखाता है कि प्रत्येक बदलाव के पीछे पूर्व निर्धारित उद्देश्य नहीं होता. हम 'जो होगा अच्छा ही होगा' के शिकार हैं. संदेह और सवाल करना छोड़ देते हैं. अनुयायी हो जाते हैं. क्या हमने कभी सोचा कि

सेवा मुफ्त तो ग्राहक बिकता हैः 2016 में जब फेसबुक भारतीय टेलीकॉम कंपनियों के साथ मुफ्त इंटरनेट सुविधा देने की कोशिश कर रहा था तो विरोध हुआ लेकिन जब रेलवे ने गूगल के साथ मुफ्त वाइ-फाइ दिया तोसेवाओं का कारोबारउत्पादों से फर्क है. कंपनियां मुफ्त सुविधाएं देकर हमारी आदतें किसी होटल या कार वाले को बेच आती हैं. राजनीति व सूचना कंपनियों को पता है कि हमारी खपत और हमारा वोटदोनों को मनमाफिक मोड़ा जा सकता है. दोनों मिलकर हमें मुफ्तखोरी की अफीम चटाते हैं. 

हमें जानना होगा कि मुफ्तखोरी का कारोबार कल्याणकारी हरगिज नहीं है.

बहुत बड़ा होने के खतरेः प्रतिस्प‍र्धा की दीवानी दुनिया को अचरज क्यों नहीं हुआ कि उसके पास दर्जनों कारफूडविमान कंपनियां हैं लेकिन अमेजनगूगल या फेसबुक इकलौते क्यों हैं. शेयर बाजार में गूगल फेसबुकएपल का संयुक्त मूल्य (कैपिटलाइजेशन) फ्रांसजर्मनीकनाडा के पूरे शेयर बाजार से ज्यादा है. हमने इन्हें इतना बड़ा कैसे होने दियाभारत में भी कई सेवाओं में कुछ कंपनियों का ही राज है.  

हमें प्रतिस्पर्धा के लिए लडऩा होगा ताकि कोई इतना बड़ा न हो सके कि हमारी आजादी ही छोटी पड़ जाए.

महानता और ताकतः राजनीति में हम महानता और ताकत के बीच अंतर करना भूल जाते हैं. सियासी ताकत के लिए लोगों को बांटना जरूरी हैजिसके लिए नेताओं को बमों से लेकर बैंक और लोगों की निजी जानकारी तक प्रत्येक ताकतवर चीज पर नियंत्रण चाहिए. हमारे निजी डेटा के लिए वे कुछ भी कर गुजरने को उत्सुक हैं. नेता आजकल यह बताते मिल जाएंगे कि आपका व्यवहार जानकर वे आपको अच्छा नागरिक बना सकते हैं. अचरज नहीं कि जापान से लेकर यूरोप तक कट्टर राजनैतिक ताकतों में सोशल नेटवर्क के प्रति गजब की दीवानगी है.

लोकतंत्र हमें यह शक्ति देता है कि हम नेताओं को यह बता सकें कि उन्हें हमारे लिए क्या करना चाहिए.

अमेरिका और एशिया में राजनीति-सोशल नेटवर्क का गठजोड़ ज्यादा विध्वंसक है. लेकिन यूरोप ने इतिहास से सीखा है कि किसी के बहुत ताकतवर होने के क्या खतरे हैं. सोशल नेटवर्क पर तैरता निजी डेटा हेबर-बॉश प्रोसेस है. इससे पहले कि राजनेता इससे बम बना लेंयूरोप के नए कानून सोशल मीडिया के लोकतंत्र को नेता-कंपनी गठजोड़ से बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं. यूरोपीय समुदाय में अगले दो माह के भीतर वहां जीडीपीआर (जनरल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स) यानी डेटा सुरक्षा के नए नियम लागू हो जाएंगे. वित्तीय उत्पादों के साथ एकत्र होने वाली निजी सूचनाएं बेचने पर भी रोक लग गई .

हमें यह सचाई कब समझ में आएगी कि नेता पहाड़ को नदी से लड़वा सकते हैं और नदी को मछलियों से. नेताओं को दुनिया की एकता का नेटवर्क दे दीजिएवे उस पर भी युद्ध करा देंगे. राजनेताओं को नियंत्रण में रखिये इससे पहले कि वह हमें ढोर-ढंगर बनाकर हांकने लगें.   

  

Tuesday, March 27, 2018

कमजोर करने वाली 'ताकत'


सरकार
नवंबर 2014: ''सरकार नियामकों की व्यवस्था को सुदृढ़ करेगी. वित्तीय क्षेत्र कानूनी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) की महत्वपूर्ण सिफारिशें सरकार के पास हैंइनमें कई सुझावों को हम लागू करेंगे.''—वित्त मंत्री अरुण जेटलीमुंबई स्टॉक एक्सचेंज
फरवरी 2018: ''रेगुलेटरों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है. भारत में नेताओं की जवाबदेही है लेकिन नियामकों की नहीं.''—अरुण जेटलीपीएनबी घोटाले के बाद

नियामक
मार्च 2018: ''घाटालों से हम भी क्षुब्ध हैं लेकिन बैंकों की मालिक सरकार हैहमारे पास अधिकार सीमित हैं. '' उर्जित पटेल गवर्नररिजर्व बैंक
''बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो और वित्त मंत्रालय के बीच संवाद ही नहीं हुआ. हम वित्त मंत्री के साथ बैठक का इंतजार करते रहे''—विनोद रायबैंकिंग बोर्ड ब्यूरो के अध्यक्ष. (यह ब्यूरो बैंकों में प्रशासनिक सुधारों की राय देने के लिए बना था जो सिफारिशें सरकार को सौंप कर खत्म हो गया है.)

किसकी गफलत   

घोटालों के बाद सरकारें नियामकों या नौकरशाहों के पीछे ही छिप जाती हैं. लेकिन गौर कीजिए कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि पटेल की नियुक्ति या बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो का गठन इसी सरकार ने किया था. वे नियामक हैं इसलिए उन्होंने सरकार के सामने आईना रख दिया.

बैंकों में घोटालों के प्रेत को नियामकों की गफलत ने दावत नहीं दी. 2014 में वित्तीय क्षेत्र में सुधारों का एक मुकम्मल एजेंडा सरकार की मेज पर मौजूद था. कांग्रेस के हाथ-पैर कीचड़ में भले ही लिथड़े थे लेकिन 2011 में उसे इस बात का एहसास हो गया था कि वित्तीय सेवाओं को नए नियामकों व कानूनों की जरूरत है. जस्टिस बी.एन. श्रीकृष्णा के नेतृत्व में एक आयोग (एफएसएलआरसी) बनाया गया. उसकी रिपोर्ट 22 मार्च, 2103 को सरकार के पास पहुंच गई. 2014 में नई सरकार को इसे लागू करना था. वित्त मंत्री ने 2014 में मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के कार्यक्रम में इसी को लागू करने की कसम खाई थी.

एफएसएलआरसी ने सुझाया कि
- एक चूक से पूरे सिस्टम में संकट को रोकने (नीरव मोदी प्रकरण में पीएनबी के फ्रॉड से कई बैंक चपेट में आ गए) के लिए फाइनेंशियल स्टेबिलिटी ऐंड डेवलपमेंट काउंसिल का गठन
- वित्तीय उपभोक्ताओं को न्याय देने के लिए फाइनेंशियल रेड्रेसल एजेंसी
वित्तीय अनुबंधोंसंपत्तिमूल्यांकन और बाजारों के लिए नए कानून
- जमाकर्ताओं की सुरक्षा के लिए नया ढांचा 

विभिन्न वित्तीय पेशेवरों के लिए नियामक बनाने के लिए प्रस्ताव भी सरकार के पास थे. पिछले चार साल में केवल बैंकिंग बोर्ड ब्यूरो बना जिसके लिए वित्त मंत्री के पास समय नहीं था. इसलिए वह बगैर कुछ किए रुखसत हो गया. चार्टर्ड अकाउंटेंट्स नियामक की सुध नीरव मोदी घोटाले के बाद आई. अगर यह बन पाया तो भी एक साल लग जाएगा.

दकियानूस गवर्नेंस

हम भले राजनेताओं को गजब का चालाक समझते हों लेकिन दरअसल वे आज भी 'मेरा वचन ही है मेरा शासन' वाली गवर्नेंस के शिकार हैंयानी कि पूरी ताकत कुछ हाथों में. आज जटिल और वैविध्यवपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में इस तरह की सरकार बेहद जोखिम भरी है. अब सुरक्षित गवर्नेंस के लिए स्वंतत्र नियामकों की पूरी फौज चाहिए. इन्हें नकारने वाली सरकार राजनैतिक नुक्सान के साथ अर्थव्यवस्था में मुसीबत को भी न्योता देती हैं. 

मोदी सरकार किसी क्रांतिकारी सुधार को जमीन पर नहीं उतार सकी तो इसकी बड़ी वजह यह है कि निवेशक उस कारोबार में कभी नहीं उतरना चाहते जहां सरकार भी धंधे का हिस्सा है. इसीलिए रेलवेकोयला जैसे प्रमुख क्षेत्रों में स्वतंत्र नियामक नहीं बने. वहां सरकार नियामक भी है और कारोबारी भी.

पिछले चार साल में न नए नियामक बनाए गए और न ही पुराने नियामकों को ताकत मिलीइसलिए घोटालों ने घर कर लिया. हालत यह है कि लोकपाल बनाने पर सुप्रीम कोर्ट की ताजा लताड़ और अवमानना के खतरे के बावजूद सरकार इस पर दाएं-बाएं कर रही है.

राजनेता ताकत बटोरने की आदत के शिकार हैं. पिछले चार साल में केंद्र और राज्यदोनों जगह शीर्ष नेतृत्व ने अधिकतर शक्तियां समेट लीं और सिर्फ चुनावी जीत को सब कुछ ठीक होने की गारंटी मान लिया गया. ताकतवर नेता अक्सर यह भूल जाते हैं कि स्वतंत्र नियामक सरकार का सुरक्षा चक्र हैं. उन्हें रोककर या तोड़कर वे सिर्फ अपने और अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बढ़ा सकते हैं. पिछले चार साल में यह जोखिम कई गुना बढ़ गया है.

घोटाले कहीं गए नहीं थे वे तो नए रहनुमाओं इंतजार कर रहे थे.

Sunday, March 18, 2018

जानना जरुरी है !



मार्च 2015एक ब्रेकिंग न्यूज कौंधी... भारत के इतिहास की सबसे सफल स्पेक्ट्रम नीलामी! सरकार को मिलेंगे 1.10 लाख करोड़ रु. मंत्रियों के चेहरे टीवी-टीवी घूमने लगे. प्रवक्ता आ डटे. 2जी घोटाले के कथित नुक्सान की भरपाई का उत्सव शुरू हो गया था. (स्पेक्ट्रमवायरलेस फ्रीक्वेंसी जिस पर मोबाइल चलता है) 

मार्च 2018केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तय किया कि टेलीकॉम कंपनियां अब सरकार को दस साल की जगह 16 साल में स्पेक्ट्रम की फीस देंगी. (मार्च 2015 में किसी ने कहा था कि 1.10 लाख करोड़ रु. सरकार को मिल गए हैं) कंपनियां अब अपनी जरूरत से ज्यादा स्पेक्ट्रम भी रख सकेंगी (इसे जमाखोरी भी कह सकते हैं). ऊंची कीमत पर सरकार से स्पेक्ट्रम खरीदने के बाद टेलीकॉम कंपनियां 7.7 लाख करोड़ रु. के कर्ज में दब गई हैं. सरकार की ताजा मेहरबानी से कंपनियों को 550 अरब रु. का फायदा होगा.

हैरत हो रही है न कि 2015 की भव्य सफलता महज तीन साल के भीतर दूरसंचार क्षेत्र की बीमारी और एक रहस्यमय इलाज में कैसे बदल गई ?

2015 से 2108 तक दूरसंचार क्षेत्र में ऐसा बहुत कुछ हुआ हैजिसे समझना उन सबके लिए जरूरी है जिनके हाथ में एक मोबाइल है.

 स्पेक्ट्रम की नीलामी 2जी घोटाले के बाद शुरू हुई. दूरसंचार के धंधे में स्पेक्ट्रम ही कच्चा माल है. 2015 की पहली बोली जोरदार रहीपर 2016 में दूसरी बोली को कंपनियों ने अंगूठा दिखा (5.64 खरब रु. के लक्ष्य के बदले केवल 65,000 करोड़ रु. की बिक्री) दिया.

 स्पेक्ट्रम प्राकृतिक संसाधन है. जिस कंपनी के पास जितना अधिक स्पेक्ट्रमउसके पास बाजार में उतनी अधिक बढ़त का मौका और निवेशकों की निगाह में ऊंची कीमत. स्पेक्ट्रम की शॉपिंग पर कंपनियों ने अपनी जेब ढीली नहीं की बल्कि इसे दिखाकर बैंकों से कर्ज लिया. जो दो साल में टाइम बम की तरह टिकटिकाने लगा और फिर सरकार की राहत बरस पड़ी.

 इस बीच जिस 2जी घोटाले के कारण यह नीलामी हुई थी वह घोटाला ही अदालत में खेत रहा. सब बरी हो गए.

 महंगे स्पेक्ट्रम का बाजार लगाते हुए सरकार ने और उसे खरीदते हुए कंपनियों ने कहा था कि स्पेक्ट्रम की कमी की वजह से नेटवर्क (कॉल ड्रॉप) बुरी हालत में हैं लेकिन 2015 के बाद से पूरे देश में हर जगह मोबाइल नेटवर्क डिजिटल इंडिया की अंतिम यात्रा निकाल रहे हैं.

 और यह किसने कहा था कि कंपनियों को फ्रीक्वेंसी मिलेंगी तो मोबाइल दरें सस्ती होंगीनए खिलाड़ी जिओ ने भी पिछले साल दरें बढ़ा दीं. 

 2015 से 2018 के बीच मोबाइल बाजार की प्रतिस्पर्धा तीन कंपनियोंएयर टेलजिओवोडाफोन (आइडिया का विलय)में सिमट गई. सरकारी बीएसएनएल बीमार है और रिटायर होने वाला है. अब तीन कंपनियों के पास अधिकांश स्पेक्ट्रम है और पूरा बाजार भी. हाल में एयरसेल के दिवालिया होने से करीब 8 करोड़ उपभोक्ता इन्हीं तीन के पास जाएंगे.

हो सकता है कि कोई इसमें घोटाला सूंघने की कोशिश करे लेकिन घोटाले अब हमें विचलित नहीं करते. हमारी सरकारें नीति नपुंसक हो चली हैं.

2014 में सत्ता में आने के बाद सरकार को यह तय करना था कि प्राकृतिक संसाधनों (स्पेक्ट्रमकोयलाजमीन) को बाजार से बांटने की नीति क्या होगी?

उसके सामने दो विकल्प थे: एकऊंची कीमत पर प्राकृतिक संसाधन बेचकर सरकारी राजस्व बढ़ता हुआ दिखाया जाएजिसके लिए कंपनियां बैंकों से कर्ज (जमाकर्ताओं का पैसा) उठाकर सरकार के खाते में रख देंगी. और कामयाबी का ढोल बज जाएगा.

दूसरासंसाधनों का सही मूल्यांकन किया जाए. उन्हें सस्ता रखा जाए ताकि उनके इस्तेमाल से निवेशमांगनौकरियां और प्रतिस्पर्धा बढ़े और उपभोक्ता के लिए दरें कम रहें.

अपनी दूरदर्शिता पर रीझ रही सरकार चार साल में स्पेक्ट्रम जैसे संसाधनों के आवंटन की स्पष्ट नीति तक नहीं बना पाई. तो किस्सा कोताह यह कि स्पेक्ट्रम की शानदार नीलामी के बाद:

 कंपनियों को स्पेक्ट्रम मिल गयाबैंकों से खूब कर्ज मिला और लाइसेंस फीस से छूट भी हासिल हुई. बाजार पर एकाधिकार बोनस में.

 सरकार की कमाई नहीं बढ़ी.

 बैंक कर्ज देकर फंस गए.

 मोबाइल नेटवर्क बद से बदतर हो गए.

 मोबाइल बाजार में प्रतिस्पर्धा तीन कंपनियों में सिमट गई. ध्यान रहे कि पूरा उदारीकरण उपभोक्ताओं को आजादी देने के लिए हुआ था.

और

भारत की सबसे चमकदार मोबाइल क्रांति में 2015 के बाद से करीब 50,000 नौकरियां जा चुकी हैं. लगभग इतने ही लोग 2018 में बेकार हो जाएंगे.

फिर कहना पड़ेगा कि सरकारों के समाधान समस्या से ज्यादा भयानक होते हैं. 

Sunday, March 11, 2018

राजनीति का 'स्वर्णकाल'


वामपंथी शासन वाले त्रिपुरा या बंगाल के गरीब और बेरोजगारों की जिंदगी, भाजपा के शासन वाले झारखंड या छत्तीसगढ़ के गरीबों की जिंदगी से कितनी अलग थी ?

क्या हरियाणा के अस्पताल कर्नाटक के अस्पतालों से बेहतर हो गए हैं?

मध्य प्रदेश का भ्रष्टाचार, पंजाब से कितना अलग है?

गुजरात का नेता-कंपनी गठजोड़, पश्चिम बंगाल या तमिलनाडु से किस तरह अलग है?

वामपंथी शासन वाले राज्यों में आर्थिक समानता का कौन-सा महाप्रयोग हो गया? भाजपा के शासन वाले राज्यों में निवेश और नौकरियों का कौन-सा वसंत उतर आया है? सर्वसमावेशी कांग्रेस ने कौन-सा आदर्श प्रशासन दिया?
इन सवालों को उठाने का यह सबसे सही वक्त है.

क्योंकि भारत के लोगों ने लाल, भगवा, हरे, नीले, सफेद सभी रंगों की सरकारें देख ली हैं.

खुद से यह पूछना जरूरी है कि किसी सियासी विचार की चुनावी सफलता से या विफलता से हमारी जिंदगी पर क्या फर्क पड़ता है? व्यावहारिक रूप से लोगों के जीवन में अंतर सिर्फ इस बात से आता है कि चुनाव से कैसी सरकार निकली.

ढहाते रहिए लेनिन की मूर्ति, खड़े करते रहिए शिवा जी और सरदार पटेल के पुतले या सजाते रहिए आंबेडकर पार्क. एक संवैधानिक लोकतंत्र में कोई राजनैतिक विचार अगर एक अच्छी सरकार नहीं दे सकता तो उसकी हैसियत किसी कबायली संगठन से ज्यादा हरगिज नहीं, जो विरोधी की मूर्तियां ढहाने या अपनी बनाने पर केंद्रित है, लोगों की जिंदगी बनाने या बेहतर करने पर नहीं.

अलग-अलग विचारों की सरकारें लोगों को उनका हक देने के मामले में एक जैसी ही क्यों पाई जाती हैं?

इसकी दो वजहें हैं:

पहलीसरकार में आने और आदर्श सरकार होने में राई-पहाड़ जैसा फर्क है. आमतौर पर राजनैतिक विचारधाराओं के पास सरकार या गवर्नेंस का कोई नया विचार नहीं होता. उदाहरण के लिए पिछले चार वर्षों में हर साल किसी न किसी राज्य में बारहवीं के पर्चे से लेकर मेडिकल और जुडिशियरी की परीक्षाओं के पर्चे लीक हुए हैं. कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा का पर्चा लीक इसी क्रम में है. हर साल लाखों युवाओं की मेहनत मिट्टी हो जाती है लेकिन किसी भी विचारधारा की सरकार के पास परीक्षाओं को निरापद बनाने की कोई नई सूझ नहीं है.

दशकों के बाद देश के 22 राज्यों और करीब 60 फीसदी जीडीपी पर एक ही दल (गठबंधन) के शासन के बावजूद बैंकों से लेकर खेती तक और अस्पताल से अदालत तक सब जगह काठ की पुरानी हांडियां नए रंग-रोगन के साथ चढ़ाई जा रही हैं. कहीं कोई गुणात्मक बदलाव नहीं दिखता.

दूसरी—सरकारों को संविधान की राजनैतिक निरपेक्षता से खासी तकलीफ होती है. संविधान ने सरकारों को किस्म-किस्म के संस्थागत परीक्षणों से गुजारने की लंबी व्यवस्था बनाई. सरकारें इन संस्थाओं को कमजोर करती हैं या फिर इन अराजनैतिक संस्थाओं पर राजनैतिक विचार थोपने की कोशिश करती हैं ताकि दूसरे विचार का खौफ दिखाकर सत्ता में रहा जा सके.

अचरज नहीं कि एक दल की दबंगई वाली सरकारों की तुलना में मिले-जुले राजनैतिक विचारों की सरकारें, कमोबेश ज्यादा उत्पादक रहीं हैं. वे शायद कोई एक विचार दिखाकर भरमाने की स्थिति में नहीं थीं.

राजनीति अब जन पक्ष का स्थायी विपक्ष हो चली है. राजनेता अंदरखाने जनता से एक लड़ाई लड़ते हैं. उनका सबसे बड़ा डर यह है कि लोग कहीं वह न समझ जाएं जो उन्हें समझना चाहिए. नेताओं की यह जंग समझ, तर्क और प्रश्न के खिलाफ है.

प्रश्न स्वाभाविक रूप से उनकी सरकार से पूछे जाएंगे जो ठोस और मूर्त है. अमूर्त विचारधारा से यह कौन पूछने जा रहा है कि बैंक में घोटाले क्यों हो रहे हैं? लोगों को अच्छी सरकार चाहिए, विचार तो विचारकों और प्रचारकों के लिए हैं.

प्रश्न साहस की सृष्टि करते हैं और भ्रम से जन्म लेता है भय. भ्रम का चरम ही राजनीति का स्वर्ण युग है.

लोग रस्सी को सांप समझ लें और विचार को सरकार, सियासत को और क्या चाहिए?

ध्यान रहे कि लेनिन की जो मूर्ति ढहाई गई, वह जनता की जमीन पर जनता के पैसे से बनी थी और पटेल की जो मूर्ति बनाई जा रही है, उसमें भी करदाताओं का पैसा लगा है.

चुनाव में हम सरकार चुनते हैं, विचार नहीं. यदि हम चाहते हैं कि हमें विध्वंसक या नपुंसक विचारों के बदले ठोस और जवाबदेह सरकारें मिलें तो क्या हर पांच साल में प्रत्येक सरकार के साथ वही करना होगा जो त्रिपुरा के लोगों ने माणिक सरकार के साथ 25 साल बाद किया?

यानी कि चलो पलटाई!


Monday, March 5, 2018

अंधेरे में मत रहिए

आपका बैंक क्या आपको यह बताता है कि उसने आपकी बचत या जमा किस उठाईगीर कारोबारी को भेंट कर दी?

लेकिन कोई कंपनी या वही बैंक अपने शेयर धारकों या निवेशकों को हर छोटी-छोटी जानकारी क्यों देता हैस्टॉक एक्सचेंज से वह कोई सूचना क्यों नहीं छिपाता?

भारत में कारोबार के लिए धन जुटाने के तीन रास्ते हैं:
एक- उद्यमी की अपनी पूंजी,
दो- बैंक कर्ज
और तीन- जनता को हिस्सेदारी देना यानी शेयर बेचना.
देश में कंपनियां तो हजारों हैं. उनमें से कुछ ही स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध हैं तो बाकी बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों को कारोबार के लिए धन कहां से मिलता है?
जाहिर है बैंक से! कर्ज के तौर पर!
तो बैंक जमाकर्ता कंपनी के कारोबार में अगर सीधे नहीं तो परोक्ष हिस्सेदार तो हुए न?
जब देश में हर काम बैंक के कर्ज से होना है और कर्ज के तौर पर दरअसल लाखों लोगों की बचत बांटी (या लुटाई) जा रही है तो बैंक जमाकर्ताओं को उतनी तवज्जो या सूचनाएं क्यों नहीं मिलनी चाहिए जो कंपनी के शेयर धारकों को मिलती हैं?

कोई फर्क नहीं पड़ता कि कंपनी का मालिक एक है या कईफर्क इससे पडऩा चाहिए कि उसके कारोबार की पूंजी कहां से आ रही है?

इन सवालों पर अब भारत में बैंकिंग की साख निर्भर हैक्यों?

आइएदो ताजे बैंक घोटालों या कर्ज डिफॉल्ट को करीब से देखते हैं.

देश को पीएनबी घोटाले का पता कैसे चला

बैंक को दिसंबर में ही अनुमान हो गया था कि नीरव मोदी और मेहुल चौकसी कर्ज नहीं चुकाने वाले हैं. जनवरी में दोनों देश से निकल लिए. एफआइआर जनवरी के अंत में हुई लेकिन भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नींद 14 फरवरी के बाद टूटी जब बैंक ने स्टॉक एक्सचेंज को बताया कि उसे एक घोटाले में 11,000 करोड़ रु. का चूना लग गया है. शेयर गिरेकोहराम मचा और फिर शुरू हुआ स्यापा.

फिर भी ले-देकर पंद्रह दिन के भीतर पूरा घोटाला सामने आ ही गया. 

अब दूसरा घोटाला देखिए.

रोटोमैक को दिए गए कर्ज का डिफॉल्ट (या धोखाधड़ी) 2015 में हो गई थी. सात महीने पहले डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल का आदेश भी आ गया लेकिन सीबीआइ को कार्रवाई करने के लिए दो साल तक मोदी के घोटाले का इंतजार करना पड़ा. सिंभावली शुगर्स लि. में बैंक कर्ज की लूट शुरू हुई 2013 में और एफआइआर हुई 2018 में. 

हम पारदर्शिता के दो ध्रुवों के बीच खड़े हैं.  

पीएनबी का घोटाला पंद्रह दिन के भीतर इसलिए खुल गया क्योंकि सेबी के नियमों के तहत कोई सूचीबद्ध कंपनी (जैसे कि पंजाब नेशनल बैंक) जरूरी जानकारी जनता यानी (शेयर बाजार) से छिपा नहीं सकती. 

लेकिन रोटोमैक का घोटाला इसलिए दो साल तक छिपा रहा कि वह एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है. उसे अपनी सूचना छिपाने और बैंकों को उसकी कारगुजारी गोपनीय रखने की छूट है.

भारत में कारोबारी पारदर्शिता का हाल अजीबोगरीब है. स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध कंपनी विस्तृत पारदर्शिता नियमों से बंधी होती है लेकिन एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी (कितनी भी बड़ी हो) कंपनी रजिस्ट्रार के पास एक सालाना रिटर्न भर कर नक्की हो जाती है. हमें यह पता नहीं चलतावह क्या और कैसे कर रही है?

बैंक कर्ज पर आधारित कारोबारों की तादाद बढऩे से यह अपारदर्शिता महंगी पडऩे लगी है. देश में दस-दस हजार करोड़ रु. के कारोबार वाली निजी कंपनियां हैं जो बैंकों से भारी कर्ज (रोटोमैक या मोदी की फायरस्टार) लेती हैं लेकिन लोगों को कर्ज डूबने के बाद ही पता चलता है कि उनके भीतर क्या हो रहा था.

इलाज क्या है

- बैंक कर्ज पर चलने वाले कारोबारों के लिए पारदर्शिता के नए नियम तय किए जाएं. जमाकर्ताओं को पता रहे कि उनका बैंक किसे और कहां कर्ज दे रहा है.
- कंपनियों के लिए पारदर्शिता नियम इस तथ्य पर आधारित होने चाहिए कि उनके निवेश का स्रोत क्या है
75 करोड़ रु. से ऊपर की कंपनियों को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराया जाए ताकि उनका कामकाज सबकी निगाह में रहे.


बैंकिंग और वाणिज्यिक कर्ज में पारदर्शिता लाने के लिए घोटालों के तमाचे चाहिए तो यकीन मानिए हमारे गाल लाल हो चुके हैं. घोटालों (हर्षद मेहता और केतन पारेख) से सबक लेकर 2001 के बादसेबी ने जनता से पूंजी जुटानेबेचने और शेयर ट्रेडिंग के नियमों को बला का सख्त और पारदर्शी कर दिया. कर्ज लेने वाली कंपनियों और बैंकों के साथ इसी तरह का कुछ करना होगा. बैंक में पैसा रखने वालों की तादाद शेयर बाजार में निवेश करने वालों से बहुत बड़ी है. कर्ज की लूट के चलते अगर उनका भरोसा डिगा तो अर्थव्यवस्था की चूलें हिल जाएंगी.