Sunday, June 10, 2018

नई पहेली


गांव क्यों तप रहे हैं?

किसान क्यों भड़के हैं?

उनके गुस्से को किसी एक आंकड़े में बांधा जा सकता है?

आंकड़ा पेश-ए-नजर हैः

गांवों में मजदूरी की दर पिछले छह माह में गिरते हुए तीन फीसदी पर आ गई जो पिछले दस साल का सबसे निचला स्तर है. यह गांवों में खुशहाली को नापने का जाना-माना पैमाना है. चार साल की गिरावट के बाद, पिछले साल के कुछ महीनों के दौरान ग्रामीण मजदूरी बढ़ती दिखी थी लेकिन वेताल फिर डाल पर टंग गया है.

ठहरिए! यह गिरावट सामान्य नहीं है क्योंकि...

Ø पिछले साल मॉनसून बेहतर रहा और रिकॉर्ड उपज भी. इस साल भी अब तक तो बादल मेहरबान हैं ही

Ø  समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी इतनी भी बुरी नहीं रही.

Ø 2014 से अब तक आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, कर्नाटक में किसानों के कर्ज माफ किए गए या किए जा रहे हैं.

Ø  पिछले एक साल में केंद्र और राज्यों ने गांवों में रिकॉर्ड (2009 के बाद सर्वाधिक) संसाधन डाले.

Ø और सस्ता आयात रोकने के लिए गेहूं, चीनी, खाद्य तेल के आयात पर कस्टम ड्यूटी (हाल में चीनी पर 100 फीसदी, चने पर 50 फीसदी, गेहूं पर 30 फीसदी) बढ़ाई गई.

फिर भी गांवों में कमाई गिर रही है!

कमाई कम होना केवल वोट वालों के लिए ही डरावना नहीं है, गांव के बाजार पर टिकी मोबाइल, बाइक, साबुन, तेल, मंजन, दवा, कपड़ा, सीमेंट बनाने वाली सैकड़ों कंपनियां भी पसीना पोछ रही हैं.

सरकार को उसके हिस्से की सराहना मिलनी चाहिए कि उसने पिछले चार साल में अन्य सरकारों की तर्ज पर खेती में जगह-जगह आग बुझाने की भरसक कोशिश की है. इन कोशिशों में समर्थन मूल्य को अधिकतम सीमा तक बढ़ाने का वादा शामिल है. किसानों की आय दोगुनी करने के इरादे के नीचे नीतियों की नींव नजर नहीं आई लेकिन यह मानने में हर्ज नहीं कि सरकार गांवों में घटती आय की हकीकत से गाफिल नहीं है. 

दरअसल, खेती की छांव में उम्मीदों को पोसती ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पिछले दो साल में एक पहेलीनुमा बदलाव हुआ है. बादलों की बेरुखी खेती को तोड़ती है लेकिन अच्छे मेघ से कमाई नहीं उगती. सरकार की मदद का खाद-पानी भी बेकार जाता है.

क्या ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण, गांव में गहरी मंदी की वजह है?

आंकड़ों के भूसे से धान निकालने पर नजर आता है कि गांवों से शहरों के बीच श्रमिकों की आवाजाही, ताजी मंदी का कारण हो सकती है. इसे समझने के लिए हमें शहरों की उन फैक्ट्रियों-धंधों पर दस्तक देनी होगी जो अधिकांशतः श्रम आधारित हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था में इनका हिस्सा काफी बड़ा है.

2005 से 2012 के बीच बड़ी संख्या में गांवों से लोग शहरों में आए थे जब भवन निर्माण, ट्रांसपोर्ट जैसे कारोबार फल-फूल रहे थे. यही वह दौर था जब गांवों की कमाई में सबसे तेज बढ़ोतरी देखी गई.

ग्रामीण आय में गिरावट का ताजा अध्याय, शहरों में श्रम आधारित उद्योगों में मंदी की वंदना से प्रारंभ होता है. चमड़ा, हस्त शिल्प, खेल का सामान, जूते, रत्न-आभूषण, लकड़ी, कागज उद्योगों में नोटबंदी और जीएसटी के बाद गहरी मंदी आई. ये उद्येाग पारंपरिक रूप से श्रमिकों पर आधारित हैं. भवन निर्माण के सितारे तो 2014 से ही खराब हैं.

शुरुआती आंकड़े हमें इस आकलन की तरफ धकेलते हैं कि शहरी मंदी, गांवों की सबसे बड़ी मुसीबत है. पिछले दो साल में बड़े पैमाने पर शहरों से गांवों की ओर श्रमिकों का पलायन हुआ है. गांव में अब काम कम और मांगने वाले हाथ ज्यादा हैं तो मजदूरी कैसे बढ़ेगी? वहां जबरदस्त गुस्सा यूं ही नहीं खदबदा रहा है.

गांवों की अर्थव्‍यवस्था का बड़ा हिस्सा यकीनन अब शहरों पर निर्भर हो गया है इसलिए जीडीपी में रिकॉर्ड बढ़ोतरी (2017-18 की चौथी तिमाही) पर रीझने से बात नहीं बनेगी.

गांवों को अपनी खुशहाली वापस पाने के लिए शहरों की पटरी पर बैठकर लंबा इंतजार करना होगा. अब गांवों के अच्छे दिन शहरों से मंदी खत्म होने पर निर्भर हैं. शहर में धंधा-रोजगार बढ़ेगा तब गांव में बारात चढ़ेगी. तेल की महंगाई, ऊंची ब्याज दरों व कमजोर रुपए के बीच शहर के रोजगार घरों का ताला खुलने में लंबा वक्त लग सकता है 

अगर अच्छी फसल, कर्ज माफी और सरकारी कोशिशों के बावजूद शहरी मंदी ने गांव को लपेट ही लिया है तो फिर दम साध कर बैठिए, क्योंकि यह उलटफेर सियासत की तासीर बदल सकता है.

Monday, June 4, 2018

सरकार बेशुमार



देश के हर बूथ पर हमारा कार्यकर्ता झंडा लेकर खड़ा रहेगा! हमारे कार्यकर्ता घर-घर तक पहुंचने चाहिए! पानी में आग लगा देने वाली इन राजनैतिक तैयारियों पर न्योछावर होने से पहले सुमेरपुर के ‘प्रधान जी’ से मिलना जरूरी है.


प्रधान जी सिखाते हैं कि जब कोई समाज अपने प्रगति के लक्ष्य बदलता है तो उसे अपनी च‌िंताओं के आयाम बदल लेने चाहिए अन्यथा बेगानगी अच्छे-खासे समाजों का तिया पांचा कर देती है.

प्रधान जी का काफिला प्रधानमंत्री से कुछ ही छोटा है. उनका पारिवारिक प्रताप पंचायत प्रमुखों से लेकर पन्ना प्रमुखों तक फैला है. मनरेगा से लेकर उज्ज्वला तक हर स्कीम के आंकड़े उनकी ड्योढ़ी का पानी पीकर अंगड़ाई लेते हैं. भाईभतीजेनातीबहुएंसब कहीं न कहीं किसी न किसी सरकार का हिस्सा हैं. त्योहारों और मुंडन-कनछेदन पर उनका घर सर्वदलीय बैठक जैसा हो जाता है.

प्रधान जी पार्टी का विस्तार हैं. 

वे सरकार के जन संपर्क मिशन का शुभंकर हैं. 

वे सरकार की सरकार हैं. 

प्रधान जी ‘मैक्सिमम गवर्नमेंट’ हैं.

प्रधान जीदरअसल‘वड़ा प्रधान’ की चार साला उम्मीदों का सजीव स्मारक हैं.

2014 में मई में उत्साह से लबरेज नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा वादा किया थाजो उनसे पहले की कोई सरकार इतने खम ठोक तरीके से नहीं कर पाई थी. मोदी ने कहा था कि वह सरकार छोटी करेंगे यानी मिनिमम गवर्नमेंट. उनका यह वादा रिझाने लायक थाक्योंकि इसमें उन मुसीबतों का इलाज भी छिपा थाजो 1991 के बाद सुधारों की खुराक से भी दूर नहीं हुईं.

सरकार को सिकोड़कर प्रधानमंत्री मोदी हजार तरह की बर्बादीसैकड़ों तरीके के भ्रष्टाचार और असंख्य नापाक नेता-अफसर गठजोड़ों को खत्म करने जा रहे थे. वे राजनैतिक भ्रष्टाचार का मर्सिया लिखने की तरफ बढ़ चले थे. लेकिन फिर वक्त ने गिरगिट होना कबूल किया और मोदी सरकार पिछली किसी सरकार से ज्यादा स्कीमें पचाकर बड़ी होती गई. लंबे उदर वाली सरकारें विकास पर बैठ जाती हैंइसलिए अब विकास महसूस कराने के लिए स्कीमों का प्रचार और ‘प्रधान जी’ का ही एक सहारा हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार को फिटनेस का मंत्र दे पातेइससे पहले भाजपा ने दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनने का बीड़ा उठा लिया और फिर वही हुआ जो पिछले 60 साल से होता आया था. पार्टी को बड़ा करने के लिए सरकार को बड़ा करना जरूरी था.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी कितने सारे कारोबारों में दखल रखती है. साम्यवादियों का यह वीभत्स पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) अब पार्टी के नेताओं और कारोबारियों में फर्क खत्म कर चुका है.

पता नहींहम भारतीय कब इस वायरस के शिकार हुए कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को राजनीति में आना चाहिए. लेकिन इस बीमारी का राजनैतिक दलों को लाभ हुआ. उनका संसार बड़ा होता चला गया. 

अलबत्तागांव से लेकर शहरों तक मेहनती और मेधावी सैकड़ों लोग अपने सबसे उत्पादक वर्षों (25 से 60) को मुट्ठी भर ‘कुर्सी चिपको’ नेताओं की खातिर यूं ही नहीं गंवाने वाले थेखासतौर जब उन्‍हें  यह मालूम  है कि सियासत में ऊपर जाने वाली हर सीढ़ी पर झुंड के झुंड लोग जमा हैं. उन्हें अपने श्रम का वाजिब मूल्य यानी अपने लिए थोड़ी-सी सरकार चाहिए. इसलिए राजनैतिक दलों का सांगठनिक विस्तारथुलथुली सरकारों का सहोदर हो जाता है.

भारतीय राजनीति एक वीभत्स बिजनेस मॉडल पर आधारित हैप्रधान जी जिसके ब्रांड एंबेसडर हैं. उनके लिए राजनीति ही उनका कारोबार है या फिर राजनीति है इसलिए कारोबार है. जो दल सत्ता में होते हैंवे संगठन बढ़ाने के लिए सरकार बढ़ाते हैं और फिर सत्ता में बने रहने को लिए संगठन व सरकार को बढ़ाते रहना होता है.

राजनीति में जितने अधिक लोग आएंगेसरकारें उतनी ही बड़ी होती जाएंगी और भ्रष्टाचार उतना ही जरूरी होगा. भाजपा को पूरे देश में फैलाते हुए प्रधानमंत्री मोदी छोटी सरकार का आदर्श संभाल नहीं सकते थेइसलिए उनकी सरकार बड़ी होती गई. आज निचले और मझोले स्‍तरों पर राजनैतिक भ्रष्टाचार पहले से ज्यादा बजबजा रहा है.

चार साल में सबसे बड़ी पार्टी सबसे बेशुमार सरकार में तब्दील हो गई है.

सब्सिडी और स्कीमों की भीड़ पहले से ज्यादा बढ़ गई है. कार्यर्ताओं की कमाई के लिए यह जरूरी है.

सियासी चंदे पारदर्शी नहीं हुए. बहुराष्ट्रीय कंपनी जैसी पार्टी को चलाने और चुनाव जीतने के लिए अकूत संसाधन चाहिए जो लाभ के अवसर बांटकर ही मिलेगा.

मैदां की हार-जीत तो किस्मत की बात है
टूटी है किसके हाथ में तलवार देखना 




Monday, May 28, 2018

... मुक्त भारत !

 
एच.डी. कुमारस्वामी की ताजपोशी के लिए बेंगलूरू में जुटे क्षत्रपों को यह समझने में लंबा वक्त लगा कि युद्ध प्रत्यक्ष शत्रु से लड़े जाते हैंसियासत तोदरअसलकिसी को निशाना बनाकर किसी को निबटा देने की कला है.

कर्नाटक तक देश की सियासत इसी कला का अनोखा विस्तार थी. इसलिए यह बात साफ होने में देर लगी कि कौन खतरे में है और किसे डराया जा रहा थारणनीति के मोहरों पर छाई धुंध अब छंटने लगी है. पाले ख‌िंच रहे हैं. भारतीय राजनीति की वास्तविक जंग का बिगुल बेंगलूरू में बजा है.

शाह-मोदी की फौज पिछले चार साल से कांग्रेस मुक्त भारत बनाने की मुहिम में मुब्तिला है मानो मरी और लद्धड़ कांग्रेस कभी भी ड्रैगन की तरह जग उठेगी और भाजपा की भीमकाय चुनावी फौज को पलक झपकते निगल जाएगी. हकीकतन, 2014 के बाद भाजपा ने खुद ही कांग्रेस के प्रतिनायकत्व को महिमामंडित कियानहीं तो वोटर इस बुजुर्ग पार्टी को कभी का 10, जनपथ में समेट चुके थे.

नेता और रणनीतिदोनों में बौनी हो चुकी कांग्रेसभाजपा के चुनावी और राजनैतिक लक्ष्यों में बाधा नहीं बल्कि सुविधा है. यह कांग्रेस ही तो है जो अध्यक्षीय तौर-तरीके वाले दो दलीय काल्पनिक भाजपाई लोकतंत्र में एक फंतासी दुश्मन की भूमिका निभा सकती है. भाजपा को खतरा तो असंख्य क्षेत्रीय ताकतों व पहचानों से हैकांग्रेस की ओट में जिन्हें समेटने की कोशिश चल रही थी. यही पैंतरा अब नुमायां हो चला है.

शत्रुताओं का अध्ययनव्यक्त‌िगत और सामूहिक शास्त्रीय मनोविज्ञान का प्रिय शगल है. किसी बम या बंदूक को बनाने से पहले उससे मरने वाले शत्रु की संकल्पना करनी होती है. यह अवधारणा आजकल प्रेरक मनोविज्ञान का हिस्सा भी है. यानी एक ऐसी ताकत की कल्पना जो हमेशा हमारे खिलाफ साजिश में लगी है और जिसे लगातार धूल चटाते रहना सफलता के लिए जरूरी है.

भाजपा ने सत्ता में आने के बाद दो काल्पनिक शत्रु गढ़ेएक था वामपंथ जो पहले ही ढूंढो तो जाने की स्थिति में पहुंच चुका था और दूसरा था कांग्रेस मुक्त भारत.

वैसेभारत को कांग्रेस से मुक्त करने का बीड़ा उठाने की कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि यह काम काफी हद तक कांग्रेस ने खुद ही कर लिया था. 2004 के आम चुनाव के बाद से 2014 तक कांग्रेस ने करीब 60 चुनाव हारे (2009 के बाद सर्वाधिक तेज रफ्तार से) और 29 चुनाव जीते. 2009 की लोकसभा जीत और 2014 की भव्य हार इनके अलावा है.

हार के आंकड़ों में कई बड़े राज्य (उत्तर प्रदेशबिहारपश्चिम बंगालतमिलनाडुगुजरातमध्य प्रदेशओडिशा) भी हैंजहां की नई पीढ़ी को गूगल से पूछना होगा कि आखिरी बार कांग्रेस ने वहां कब राज किया था.

2014 के बाद भाजपा को जो कांग्रेस मिली थीवह तो ठीक से विपक्ष होने के बोझ से भी मुक्त हो चुकी थी. 

दुश्मनों का खौफसेनाओं के प्रेरक मनोविज्ञान का हिस्सा होता है फिर चाहे वह जंग चुनावी ही क्यों न हो. अलबत्ता कांग्रेस को उसकी हैसियत से बड़ा प्रतिद्वंद्वी बनाने में भाजपा का सिर्फ यही मकसद नहीं था कि उसकी सेना हमेशा कांग्रेस के खिलाफ युद्ध के ढोल-दमामे बजाती रहे बल्कि इससे कहीं ज्यादा बड़ा मकसद उन क्षेत्रीय दलों को डराना या सिमटाना है जो उसके वास्तविक शत्रु हैं और जिन पर सीधा आक्रमण भविष्य की जरूरतों (गठबंधन) के हिसाब से मुफीद नहीं है.

अखिल भारतीय भाजपा बनाम क्षेत्रीय दलों का यह मुकाबलाअखिल भारतीय कांग्रेस बनाम क्षेत्रीय दल जैसा हरगिज नहीं है. भाजपा जिस एकरंगी राजनैतिक राष्ट्रवाद की साधना में लगी हैउसमें सबसे बड़े विघ्नकर्ता क्षेत्रीय दल हैं जो उप राष्ट्रवादी पहचानों की सियासत पर जिंदा हैं.

भाजपा के सांस्कृतिक धार्मिक राष्ट्रवाद में भी यही दल कांटा हैं जो जातीय अस्मिताओं को चमकाकर हर चुनाव को हिंदू बनाम हिंदू बना देते हैं. ध्यान रहे कि भाजपा को कर्नाटक में कांग्रेस ने नहींजनता दल (एस) ने रोका. बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमारबंगाल में ममता बनर्जीओडिशा में नवीन पटनायक उसकी राह में खड़े हो गए.

कर्नाटक में पिटी कांग्रेस को, अतीत के बोदे अहंकार पर फूलने के बजाय 1995-96 की भाजपा बनना होगा. जब भाजपा क्षेत्रीय पहचानों की छाया में गैर कांग्रेसवाद का फॉर्मूला सिंझा रही थी.

क्षत्रपों को सड़क की धूप और धूल से मिलना होगा क्योंकि भाजपा बड़ी और बहुत बड़ी हो चुकी है और उसकी कांग्रेस मुक्त भारत मुहिम का निशाना राहुल गांधी नहीं बल्कि उन सभी क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व है जिनके नेता कुमारस्वामी के सिर पर ताज रखने के लिए बेंगलूरू आए थे.




Sunday, May 20, 2018

नायाब नाकामी


 कथा सूत्र 
  • जीडीपी में 22 फीसदी का हिस्सा रखने वाला भारत का विशाल खुदरा व्यापार यानी रिटेल, खेती के बाद सबसे बड़ा रोजगार है. इसका आधुनिकीकरण तत्काल 5.6 करोड़ और 2022 तक करीब 173 करोड़ रोजगार दे सकता है 
  •  खुदरा बाजार 948 अरब डॉलर (केपीएमजी) का है जो पांच साल में 15 फीसदी की गति से बढ़ा है. इस बाजार में संगठित विक्रेताओं का हिस्सा केवल 8 फीसदी है
  •  भारत में ऑनलाइन रिटेल यानी ई-कॉमर्स का बाजार 38.5 अरब डॉलर का है
  •  संगठित या मल्टी  ब्रांड रिटेल (जैसे बिग बाजार) में वॉलमार्ट जैसी बड़ी विदेशी कंपनियों को आने की छूट नहीं है. लेकिन ई-कॉमर्स में 100 फीसदी विदेशी पूंजी की अनुमति है. इसी रास्ते से वॉलमार्ट ने फ्लिपकार्ट को खरीद लिया. इतनी पूंजी लगाकर ई-कॉमर्स कंपनियां भी अपने गोदाम या वितरण नेटवर्क (रोजगार बढ़ाने वाले काम) नहीं बना सकतीं, उन्हें बस मार्केटप्लेस बनाने यानी ग्राहकों को विक्रेताओं से जोडऩे की छूट है

और
  • ·      अमेरिकी वॉलमार्ट ने फ्लिपकार्ट (सिंगापुर) को खरीदने में जो 16 अरब डॉलर लगाए हैं उनमें करीब 14 अरब डॉलर जापान, अमेरिका, चीन और दक्षिण अफ्रीका की कंपनियों को मिलेंगे, क्रिलपकार्ट में जिनका हिस्सा वॉलमार्ट ने खरीदा है. यह निवेश भारत नहीं आएगा. 

अब कहानी...

वे दिन तेज ग्रोथ के थे. 2006 जनवरी की एक ठंडी शाम उस समय गरमा उठी जब उद्योग विभाग ने (सिंगल ब्रांड) रिटेल में विदेशी निवेश का ऐलान किया. इससे पहले खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का जिक्र कुफ्र था. इस बयान के अगले ही साल, 2007 में ही वॉलमार्ट भारती (एयरटेल) के साथ भारत आ गई. वॉलमार्ट को देखकर कार्फू और टेस्को जैसे ग्लोबल रिटेलर भी आ पहुंचे.

2010 में मल्टी ब्रांड रिटेल खोलने की पहल हुई और विभिन्न शर्तों के साथ 2012 में 51 फीसदी विदेशी निवेश खुला तो लेकिन संघ परिवार और भाजपा ने इस कदर आंदोलन खड़ा किया कि रिटेल में विदेशी निवेश जहां का तहां थम गया. वॉलमार्ट ने करीब एक दर्जन शहरों में थोक बिक्री के मेगा स्टोर भी खोले लेकिन विदेशियों के लिए मल्टी ब्रांड रिटेल पर राजनीति से ऊबकर वॉलमार्ट ने 2013 में भारती के साथ अपना उपक्रम खत्म कर दिया.

इस हड़बोंग के बीच देसी कंपनियों को संगठित रिटेल में फायदा दिखने लगा था. सुभिक्षा, स्पेंसर (आरपीजी), रिलायंस, मोर (बिरला), इजी डे (भारती), ट्रेंट (टाटा), बिग बाजार (फ्यूचर) जैसे देसी रिटेलर्स सामने आए और अनुमान लगाया गया कि 2010 से 2015 के बीच संगठित रिटेल 21 फीसदी की गति से बढऩे की उम्मीद जड़ पकडऩे लगी. लेकिन कॉमर्शियल प्रॉपर्टी, नई तकनीक और बुनियादी ढांचे के लिए इनके पास पूंजी की कमी थी इसलिए 2015 आते आते तमाम स्टोर बंद हो गए.



इसी दौरान ई-कॉमर्स की आमद हुई. नए धनाढ्यों (वेंचर कैपिटल) की पूंजी पर डिस्काउंट सेल के इस धंधे ने संगठित रिटेल को तोड़ दिया. ई-कॉमर्स की क्रांति अल्पजीवी थी. परस्पर विरोधी नीतियों और नोटबंदी व जीएसटी के कारण 2017 में देसी ई-कॉमर्स भी दम तोड़ गया. 


अब फ्लिपकार्ट अधिग्रहण के बाद इस बाजार में दो विदेशी कंपनियोंअमेजन और वॉलमार्ट  का राज होगा

आज रिटेल के उदारीकरण के 12 साल बाद ...
  • ·      खुदरा यानी रिटेल कारोबार का आधुनिकीकरण खेती, खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग, वित्तीय सेवाओं को एक साथ गति दे सकता था और प्रति 200 वर्ग फुट पर एक रोजगार के औसत वाला यह क्षेत्र हर तरह के रोजगारों का इंजन बन सकता था लेकिन इसमें विदेशी निवेश रोक दिया गया.

  • ·     मुक्त बाजार में पूंजी अपना रास्ता तलाश ही लेती है. वॉलमार्ट जिस पूंजी से रिटेल का बुनियादी ढांचा बनाकर रोजगार दे सकती थी उसके जरिए उसने पिछले दरवाजे से ई-कॉमर्स में प्रवेश कर लिया. अब वह उपभोक्ताओं को सामान बेचेगी, जिसके लिए उसे विदेशी निवेश नियमों के तहत रोका गया था. ई-कॉमर्स से बनने वाले अधिकतम नए रोजगार केवल कूरियर लाने वालों के होंगे.

  • ·     भारत के लोगों की खपत में 61 फीसद हिस्सा खाद्य उत्पादों का है. रोजगार और उपभोक्ता सुविधाएं बढ़ाने के लिए इनके उत्पादन और वितरण का आधुनिकीकरण होना था लेकिन यह पिछड़ा ही रह गया है.


यह केवल भाजपा परिवार की रूढि़वादी जिद थी जिसके चलते विशाल खुदरा बाजार को आधुनिकता और नए रोजगारों की रोशनी नहीं मिल सकी. लेकिन विदेशी पूंजी तो आ ही गई. अब इस बाजार के एक हिस्से (ई-कॉमर्स) पर विदेशी कंपनियां काबिज हो गईं हैं जबकि दूसरे बड़े हिस्से में पुराने ढर्रे का कारोबार चल रहा है. इन दोनों के बीच खड़े उपभोक्ता और बेरोजगार सरकार को बिसूर रहे हैं. 

सरकार अब भी मल्टी ब्रांड रिटेल के उदारीकरण के जरिए अवसरों की बर्बादी बचा सकती है लेकिन हम क्यों करेंगे? हम तो मौके गंवाने में महारथी हैं.  


Sunday, May 13, 2018

दूसरी लहर


कुछ लड़ाइयां युद्ध बंद होने के बाद शुरू होती हैं. यूं कह लें कि कुछ सफलताएं चुनौतियों की शुरुआत होती हैं जैसे कर्नाटक को ही लें. यकीननकर्नाटक ऊंटों के लिए मशहूर नहीं है लेकिन चुनावी ऊंट तो कहीं भी करवट ले सकते हैं. इसलिए अगर... 
·       लोगों ने कर्नाटक में कांग्रेस को पलट दिया तो क्या गारंटी कि लोग मध्य प्रदेशराजस्थानछत्तीसगढ़ में भाजपा को नहीं पलटेंगे. अगर लोग सरकारें बदलना चाहते हैं तो कहीं भी बदलेंगे. गुजरात में गोली कान के पास से निकल गई.
·      और अगर कांग्रेस बनी रह गई तो पता नहीं कौन-कौन-सी लहरों को कर्नाटक के तट पर सिर पटक कर खत्म हुआ मानना होगा क्योंकि अन्य चुनावों की तरह कर्नाटक का चुनाव प्रधानमंत्री मोदी ही लड़ रहे हैं.

कर्नाटक के बाद नरेंद्र मोदी-अमित शाह की चक्रवर्ती भाजपा उसी चुनौती से रू-ब-रू होने वाली है जिसकी मदद से भाजपा ने सिर्फ पांच साल में भारत के वृहद भूगोल को कमल-कांति से जगमगा दिया. भारत में 2013 से लोगों पर सरकार बदलने का जुनून तारी है. अपवाद नियम नहीं होते इसलिए बिहारगुजरातबंगाल और दिल्ली के जनादेश अस्वाभाविक माने जाते हैं. इनके अलावापिछले पांच साल में केंद्र से लेकर राज्यों और यहां तक कि पंचायत नगरपालिकाओं तक हर जगह लोगों ने सरकारें पलट दीं.

भाजपा ने इस जुनून पर सवारी की और राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों को रौंदते हुए वह कर्नाटक के मोर्चे पर आ डटी. अलबत्ता सरकारें पलटने वाले इस ताजा सफर का टिकटकर्नाटक में खत्म हो जाएगा क्योंकि पूरे देश में पिछले पांच साल से चल रही सत्ता विरोधी लहर का आखिरी पड़ाव है कर्नाटक.

मोदी-शाह की जोड़ी ने सरकारों को पलटने की चाह को इतना उग्र और घनीभूत कर दिया कि देश में चुनाव लडऩे का तौर-तरीका बदल गया. लेकिन अब उन्हें सरकार पलटने की दूसरी लहर से आए दिन और जगह-जगह निबटना होगा जो सीधे उनसे मुकाबिल होगी. 

सूबेदारों की बदली

बीते महीने कर्नाटक में चुनावी आतिशबाजी के बीचदिल्ली के बंद कमरों में सत्ता विरोधी लहर को थामने की कोशिश शुरू की गई. राजस्थान के मोर्चे पर सेनापति बदलने की तैयारी है. मुख्यमंत्री को रुखसत करने के शुरुआती प्रयास परवान नहीं चढ़े तो पार्टी अध्यक्ष अपने पद से हट गए. मुख्यमंत्रियों को बदलना यानी चुनाव से पहले नया चेहरा देनासरकारों के खिलाफ विरोध के तेवर कम करने का पुराना तरीका है. गुजरात में इसे आजमाया गया था.

सरकार से गुस्से की लहर में राज्य पहला निशाना होंगे. राज्य सरकारों की नाकामी केंद्र के खाते में भी जुड़ेगी. मुखिया बदल कर गुस्सा थामा जा सकता है लेकिन बदले गए मुखिया नुक्सान नहीं करेंगेइसकी कोई गारंटी नहीं है. 

नुमाइंदों से चिढ़
भाजपा के आलाकमान को अपने नुमाइंदों (सांसदों) से बढ़ती नाराजगी का एहसास गुजरात चुनाव के पहले ही हो गया था. पार्टी को सरकारी कार्यक्रमों के जमीनी क्रियान्वयन की हकीकत पता चल रही है. असंख्य सांसद व विधायक उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं. सत्ता विरोधी लहर काटने के लिए नए चेहरे चुनाव में उतारे जाते हैं. भाजपा को यह काम बड़े पैमाने पर करना होगा ताकि स्थानीय मोहभंग को कम किया जा सके. लेकिन यह बदलाव निरापद नहीं होगा. विरोध और भितरघात इसके साथ चलते हैं.

परिवर्तन का चक्र 
नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे पिछले चार साल में यथास्थिति के प्रति समग्र इनकार का प्रतीक बनकर उभरे हैं. 2014 के जनादेश के बाद पूरे देश में सत्ता विरोधी मत और परिवर्तन के तेवर उन्हें देखकर परवान चढ़े हैं. यह सरकारों को पलटने का जुनून ही था जिसने भाजपा को सफलता से सराबोर कर दिया. लेकिन चुनाव तो पांच साल पर होने ही हैं. गुजरात में भाजपा को पहली बार एहसास हुआ कि सरकार के खिलाफ लहर का रुख बदल सकता है और उत्तर प्रदेश में गोरखपुर व फूलपुर तक आते-आते यह रुख बदल भी गया.

बेचैन मतदाता परिपक्व होते लोकतंत्र की पहचान हैं. शिक्षा और सूचना जितना बढ़ती हैसरकारों से मोहभंग उतने ही प्रखर होते जाते हैं. प्रचार वीर सरकारें ज्यादा सशक्‍त  मोहभंग आमंत्रित करती हैं.



कर्नाटक के चुनाव का नतीजा चाहे जो निकले लेकिन इसके बाद सत्ता विरोधी जुनून का ग्रह गोचर बदलेगा. कर्नाटक के बाद भाजपा की जद्दोजहद (अपवादों के अलावा)सरकारें पलटने के जुनून को थामने की होगी. केवल 2019 का बड़ा चुनाव ही नहीं बल्कि 2022 तक हर प्रमुख चुनाव में भाजपा को बार-बार यह हिसाब देना होगा कि उसे ही दोबारा क्यों चुना जाए?