Monday, December 3, 2018

विरासतों की कारसेवा




पुरी में जगन्नाथ मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश और निकास दरवाजों के पास मरीजों को ले जाने वाले स्ट्रेचर रखे देखकर अचरज होना लाजिमी है. लेकिन अगर किसी भीड़ भरे दिन मंदिर के प्रांगण में कुछ वक्त बिताएं तो आपको इनका इस्तेमाल दिख जाएगा. शोर-शराबे के बीच आपको कुछ सेवादार मंदिर के भीतर से किसी बेहोश भक्त को इन पर लाते दिखेंगे.

यहां मंदिर के गर्भ गृह में भारी भीड़ और अंधेरे में दम घुटना आम बात है. भीड़-भाड़ के दिनों में रोज ऐसी चार-पांच घटनाएं होती हैं.

अगर जगन्नाथ मंदिर को भक्तों के लिए निरापद और सुविधाजनक बनाने का अभियान चलाया जाए तो क्या उसके समर्थन में वही भावनात्मक ज्वार उमड़ेगा जो किसी दूसरे मंदिर बनाओ अभियान में उबाला जाता है?

जगन्नाथ मंदिर ही क्योंदेश के किसी भी पुराने तीर्थ या विरासत को सहेजने-संवारने में राजनैतिक मूर्ति निर्माण जैसी दीवानगी नहीं दिखती?
नई विरासतों की सियासत पर लहालोट होने वाले हम लोग नए मंदिरों के लिए लड़ मरते हैं और पुराने मंदिरों की भीड़ में दब-कुचल कर मर जाते हैं. 

भारत की पुरातन संस्कृति की उपेक्षा पर फट पडऩे वाला भारतीय दक्षिणपंथ भी विरासतों के दुर्दिन दूर नहीं कर सकाबल्कि उसने कुछ उलटा ही कर दिया.

इस साल जनवरी में लोकसभा ने प्राचीन स्मारकपुरातात्विक विरासत कानून को संशोधित करते हुए प्राचीन स्मारकों के पास 100 मीटर तक निर्माण न करने की शर्त हटा दी. बावजूद इसके कि 2016 में सरकार ने लोकसभा को बताया था कि पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण के तहत आने वाले 24 स्मारक गायब हो गए हैं. इनमें मंदिर और प्रस्तर अभिलेख भी शामिल हैं.

कानून बदलने के बाद स्मारकों को ढहाने की छूट-सी मिल गई है. पता नहींअगली पीढिय़ां कितनी विरासतों की तस्वीर भी देख पाएंगी. हाल में ही बेंगलूरू में दो विरासतें (मरफी टाउन लाइब्रेरी और क्रमबीगेल हॉल) को ढहाए जाने के बाद स्वयंसेवी संस्था इनटैक ने 83 साल पुराने जनता बाजार को बचाने के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की है.

हमारे सभी पुराने तीर्थ-मंदिरों में अव्यवस्था का अंबार है. कुछ एक आधुनिक मंदिरों को छोड़ अधिकांश मंदिर नगरों के बीच या फिर दुर्गम स्थलों पर हैं और हादसों की बाट जोहते हैं. भारत के अधिकांश मंदिर अभूतपूर्व ढंग से संपन्न हैं. उनकी संपन्नता उनके भक्तों से बढ़ी है. उनके आसपास एक भरपूर अर्थव्यवस्था लहलहाती है. सरकार उनके चढ़ावे में मिले सोने से अपनी गोल्ड डिपॉजिट स्कीम को सफल बना लेती है घाटे और संसाधनों की किल्‍लत से परेशान महाराष्‍ट्र सरकार ने शिऱडी मंदिर से हाल में ही कर्ज लिया है.लेकिन इन मंदिरों का पैसा इनके भक्तों की आस्था को सुरक्षित करने के काम नहीं आता.

नियमों से लंदे-फंदे इस देश में प्राचीन स्थापित और पूजित मंदिरों के प्रबंधन को लेकर नीतियांव्यवस्थाएं नहीं बन सकीं. नए मंदिर बनाने के लिए संसद को हिलाने की तैयारी आए दिन होती है. हम मंदिरों में महिलाओं को रोकने को आस्था पर हमला बता सकते हैंमंदिर की अव्यवस्था से मरने वाले भक्तों पर हमें तरस नहीं आता.

डिजिटल इंडिया वाला देश भारत के प्राचीन साहित्य को आधुनिक ढंग से अनूदितसंरक्षित और उपलब्ध नहीं करा पाता. लेकिन केरल में ताजा बाढ़ दर्जनों पुरानी तालपत्र किताबों को और स्मारकों को जरूर निगल जाती है. इस बाढ़ के बाद दिल्ली को पता चला कि हमारी आपदा प्रबंधन नीति में विरासतों को प्राकृतिक आपदा से बचाने की व्यवस्था ही नहीं है. बाढ़ में डूबी केरल की विरासतों को स्वयंसेवी संस्थाओं का इंतजार है. कहां हैं शबरीमला में अदालत के आदेश पर बसें फूंकने का ऐलान करने वाले धर्म योद्धा?

गर्व करते रहिए कि हमारे पास दुनिया के सबसे पुराने मंदिर हैंउन मंदिरों के पास अकूत खजाना है. या हमारे पास दुनिया की सर्वाधिक विरासतें हैं लेकिन 71 साल में केवल 15,000 स्मारकों को कानूनी संरक्षण मिल सका है जबकि ब्रिटेन में इनकी संख्या 60,000 हैजिसका क्षेत्रफल उत्तर प्रदेश के लगभग बराबर है. केंद्र सरकार के बजट से सालाना एक फीसदी से भी कम हिस्सा संस्कृति मंत्रालय को मिलता है.
न हमारी आस्थाएं निरापद हैं और न ही विरासतें सुरक्षित क्योंकि हमारे रहनुमा न तो पुराने मंदिरों को शांति व सुविधा के साथ पूजा के लायक बनाना चाहते हैं और न अतीत के गौरवों को सजाना-संवारना. ऐसा करने से इतिहास पर गर्व होगा. राजनीति को वे विरासतें बनानी हैं जिन पर हम हमेशा लड़ते रह सकें. भारत की राजनीति ही उसकी विरासत के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है.

Monday, November 26, 2018

आगे ढलान है !




पिछले चार साल में मेक इन इंडिया के जरिए उद्योग के सरदारों को रिझा रही सरकार को अचानक बेचारे बेबस और नोटबंदी-जीएसटी के मारे छोटे उद्योग क्यों याद आ गए, जिन्हें सामने रखकर वित्त मंत्रालय ने रिजर्व बैंक पर तोप तान दी है. 




हम इस पर आश्चर्य कर सकते हैं, यह जानते हुए भी कि बैंक और वित्तीय प्रणाली कर्ज के फंदे में फंसकर बुरी तरह हांफ रहे हैं और छह माह बाद यह मुसीबत फट पड़ेगी, फिर भी सरकार आखिर बैंकों को कर्ज की रेवडिय़ों का बाजार खोलने के लिए क्यों कह रही है?

दरअसल, चुनाव सामने है और भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर बन आई है. मौसम बिगड़ रहा है. पिछले दो माह का घटनाक्रम बता रहा है कि बड़े चुनाव से पहले ग्रोथ के आंकड़े सरकार के चुनाव प्रचार को बदमजा कर सकते हैं. कर्ज को लेकर सरकार की ताजा बेचैनी इसी डर से उपजी है.

आर्थिक विकास दर में अब तेज गिरावट के आसार हैं. चार कमजोरियां पहले से ही मौजूद हैं. एक—नोटबंदी और जीएसटी के बाद से बाजार में मांग नदारद है क्योंकि न तो निजी निवेश में बढ़त हो रही है और न उपभोक्ता खपत में. दो—ब्याज दरों में बढ़ोतरी का दौर प्रारंभ हो चुका है. तीन—जीएसटी की चपत से सरकार के राजस्व में गिरावट है, घाटा और नतीजतन कर्ज बढ़ रहा है. और चार—बकाया कर्ज से परेशान बैंक नए कर्ज बांटने की स्थिति में नहीं हैं और न ही सरकार अपनी जेब से इन बैंकों के उद्धार का बोझ उठा सकती है.

इन तीन बुनियादी चुनौतियों के बावजूद अर्थव्यवस्था किसी तरह ढुलक रही थी लेकिन सितंबर के बाद माहौल बुरी तरह बदल गया. रुपए की कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में उफान के बीच वित्तीय बाजार में संकट का चक्र शुरू हो रहा है.

सितंबर के पहले सप्ताह में अचानक कई गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) बैंकों की तरह ही बकाया कर्ज की बीमारी की चपेट में आ गईं. ठीक यही मौका था जब बाजार में ब्याज दर भी बढऩे लगी थी इसलिए उनके लिए नया कर्ज जुटाना मुश्किल हो
गया और बाजार में पूंजी की कमी हो गई. 

अब खतरा विकास दर गिरने का है क्योंकि...

1. बैंकों के बकाया कर्ज के जाल में फंसने के बाद गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां कर्ज और पूंजी का प्रमुख स्रोत थीं. 2014-18 के बीच एनबीएफसी कर्ज पर अर्थव्यवस्था की निर्भरता पांच फीसदी से अधिक बढ़ी है. एनबीएफसी के डूबने के साथ सबसे बड़ा खतरा अचल संपत्ति के बाजार पर है जहां हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों की कर्ज की आपूर्ति 2013-18 के बीच 27 फीसदी की गति से बढ़ी है. एनबीएफसी और हाउसिंग फाइनेंस से कर्ज की आपूर्ति में कमी या महंगे कर्ज की वजह से अचल संपत्ति बाजार में गहरे संकट का अंदेशा है. खतरा है कि कई अचल संपत्ति कंपनियां और डेवलपर मुश्किल में होंगे जैसा कि आइएलएफएस के साथ हुआ है. सरकार बेतरह उलझे कर्ज बाजार में बैंकों को और ज्यादा जोखिम की तरफ धकेल रही है.

2. बाजार में मंदी के ताजा दौर ट्रैक्टर, मोबाइल फोन और दूसरे उपभोक्ता उत्पादों की खरीद एनबीएफसी के कर्ज पर निर्भर थी. यहां मांग और बिक्री बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसका असर इस बार त्योहारी मौसम की खरीद पर भी दिखा. छोटे कारोबारियों के रोजमर्रा की पूंजी और माइक्रोफाइनेंस की जरूरतें भी इस समानांतर बैंकिंग से पूरी हो रही थीं.

3. सरकार ने भले ही रिजर्व बैंक के जरिए बैंकों से कर्ज पाइप खुलवाने की कोशिश की है, बैंकों के एनपीए का इलाज रोक दिया है लेकिन कर्ज की महंगाई रोकना उसके बस का नहीं है. पिछले दो महीने में बैकों ने नए कर्ज पर ब्याज दरें बढ़ाई हैं. जमा दरें कम होने की गुंजाइश नहीं है इसलिए एनबीएफसी के साथ ही उपभोक्ताओं व कारोबारियो को मिलने वाला कर्ज भी महंगा होगा और इसके अलावा अमेरिका व यूरोप में भी ब्याज दरें बढऩे लगी हैं.

ब्याज दरों और ग्रोथ का रिश्ता संवेदनशील है. भारतीय अर्थव्यवस्था का ताजा इतिहास बताता है कि अगर छोटी अवधि के कर्ज (जैसा कि अभी है) पर ब्याज दरों में बढ़त लंबे समय तक जारी रहती है तो विकास दर में गिरावट तय है. चुनाव सामने है और सरकार का बजट बेपटरी है इसलिए नए सरकारी निवेश की गुंजाइश कम है.

अगली तिमाही से जीडीपी यानी आर्थिक विकास दर में ढलान शुरू हो सकती है. अगले साल फरवरी से मई तक जब देश में चुनाव का अश्वमेध यज्ञ चल रहा होगा तब बड़ी बात नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर ढलान की नई मंजिलें नाप रही हो. 2020 में विकास दर 6 फीसदी तक लुढ़कने के खतरे जायज हैं क्योंकि तब तक वित्तीय तंत्र में बीमारियां अपने उफान पर होंगी. यानी कि आर्थिक ग्रोथ के मामले में 2019 में हम शायद वहीं खड़े होंगे 2014 में जहां से चले थे.

Monday, November 19, 2018

तरीकों का तकाजा



बीते हफ्ते सिंगापुर में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया की वित्तीय तकनीकी (फिनटेक) कंपनियों को भारत में आने का न्योता दे रहे थे तब भारत में मोबाइलबैंकिंगबीमाम्युचुअल फंड का बाजार 'आधार' खिसकने के झटके से उबरने की कोशिश कर रहा था. आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कई सेवाओं को ग्राहकों की पहचान की उलझन ने घेर लिया है.

वित्तीय सेवा उद्योग अपने दर्द को जीएसटी के साथ साझा कर सकता है लेकिन सरकार और बाजारदोनों के फायदों की सूरत नहीं दिख रही है.

जीएसटी वाले अपनी निराशा को राफेल या फिर वायु सेना की चिंताओं से बांट सकते हैं जहां प्रतिरक्षा की एक बेहद संवेदनशील जरूरत सरकार और देश की साख पर भारी पडऩे वाले विवाद में उलझ गई है.

आधारजीएसटी और राफेल में गहरा रिश्ता है. इनकी भूमिकाएं अलग-अलग हैं लेकिन इनकी समानताएं और मुसीबत अनोखे ढंग से एक जैसी है.
इससे कौन असहमत होगा कि तीनों ही फैसले या प्रस्ताव देश के लिए जरूरी थे. अर्थव्यवस्था को वैज्ञानिक यानी बायोमीट्रिक आधार जन-पहचान प्रणाली चाहिए. जीएसटी को लागू किया ही जाना था और वायु सेना का आधुनिकीकरण अर्से से लंबित था.

दिलचस्प है कि पिछली सरकार इनका निर्णय कर चुकी थी या फिर उन्हें लागू करने की जमीन तैयार हो गई थी. इन तीनों फैसलों को नई यानी मोदी सरकार ने हाथोहाथ लिया था यानी कि तीनों फैसलों परसिद्धांततःएक किस्म की राजनैतिक सहमति थी.

लेकिन ऐसा क्या हुआ कि तीनों जरूरी सुधारसमाधान के बजाए उलझनविवाद और राजनीति की वजह बन गए.

दरअसलभारतीय लोकतंत्र इस समय कुछ अप्रत्याशित मुसीबतों से रूबरू है. यहां अब सुधार इसलिए असफल नहीं हो रहे हैं कि उन पर राजनैतिक मतभेद हैं या आम लोग इन फैसलों के साथ नहीं हैं अथवा देश खुद को बदलने की क्षमता नहीं रखता... असफलता की वजह अब यह है कि अच्छे सुधार इसलिए मुसीबत बन रहे हैं क्योंकि सरकार उचित लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अनदेखी कर रही है.

दंभ से निकला कल्याण भी घातक होता है और वही आधारजीएसटी व राफेल के साथ हुआ है.

मसलन आधार को लें...यह सहमति तो लगभग एक दशक पहले बन गई थी कि भारत को बायोमीट्रिक पहचान प्रणाली अपनानी होगी ताकि सरकारी कल्याण संसाधनों के बंटवारे में लूट बंद हो सके. यूपीए से एनडीए तक आते-आते आधार की संकल्पना पर बहस खत्म हो चुकी थीनीतिगत सवाल यह था कि भारत में नागरिकता की पहचान को आधार से जोड़ा जाए या इसे सिर्फ सरकारी स्कीमों के लाभार्थियों की पहचान तक सीमित रखा जाएइस सवाल के उत्तर में उन सभी उलझनों के जवाब छिपे थे जिनके कारण आधार विवादित हुआ.

लोकतंत्र का तकाजा था कि सरकार इस पर संवाद के बाद नीति बनाती और सहजता से इसे लागू किया जातालेकिन खुद को सही मानने की सरकारी जिद इस कदर बढ़ी कि पहले तो इसे तदर्थ तौर पर लागू किया गया और फिर सुप्रीम कोर्ट के दबाव पर आधार के कानून को मनी बिल बनाकर संसद से मंजूर करा लिया गया.

आधार का फैसला (संकल्पना नहीं) लोकतंत्र के पैमानों पर खरा नहीं था इसलिए भारी खर्च पर खड़ा हुआ आधारसुप्रीम कोर्ट में खेत रहा. अब पहचान प्रमाणों को लेकर पुरानी अराजकता लौट आई. आधार से जुडऩे के बाद अब इससे अलग होने की मुहिम चल रही है. मोबाइलबैंक और वित्तीय सेवा कंपनियों के लिए ग्राहकों की पहचान की लागत में इजाफा हुआ है. धोखाधड़ी के खतरे गई गुना बढ़ गए हैं.

ठीक इसी तरह जीएसटी भी जिद और पूर्वाग्रह में फंस कर बिखर गया. एक ऐसा सुधार जिससे जीडीपी बढऩेलागत घटने और टैक्स चोरी रुकने की उम्मीद थी उसकी तैयारी खराब थी और बदलाव पर बदलाव इसलिए हुए क्योंकि उनके साथ कोई सहमति नहीं बनाई गई जिन पर इसे लागू किया जाना था. जीएसटी को भारत जितने खराब ढंग से और कहीं नहीं लागू किया गया.

जीएसटी और आधार तो नए फैसले थे लेकिन रक्षा खरीद में विवादों के तजुर्बे के बावजूदराफेल में पारदर्शिता के लिए उन प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ जिनके जरिए इसे विवादों से बचाया जा सकता था. सुप्रीम कोर्ट में सरकारी हलफनामे बता रहे हैं कि राफेल के फैसले में कैबिनेट की समितियों या संप्रभु गारंटी जैसे नियमों की अनदेखी हुई है.


गांधी की एक बुनियादी बात अब सरकारें अक्सर भूलने लगी हैं: अच्छे लक्ष्य के लिए साधनों की पवित्रता भी जरूरी है. सरकारों को समझना पड़ेगा कि कोई भी सुधार अगर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से नहीं निकलता तो सक्रिय लोकतंत्रों में उसके समस्या बनने के खतरे बढ़ जाते हैं.  



Saturday, November 10, 2018

उन्नीस के बाद



अगर हम सियासत के गुबार से बाहर देख पाएं तो हमें कर्ज संकट से निबटने की तैयारी शुरु कर देनी चाहिए जो करीब दस-बारह महीने के बाद भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर फटने को तैयार होगा. 



भारत के वित्तीय तंत्र के लिए अब यूपीए और एनडीए में कोई बड़ा फर्क नहीं बचा है. 2008 के बाद जिस तरह यूपीए ने बैंकों से अंधाधुंध कर्ज बांटने को कहा और पूरी बैंक‌िंग में बकाया कर्जों का बारूद बिछ गया, ठीक उसी तरह आर्थिक ग्रोथ तेज करने की कोशिशों को ढहते देख मोदी सरकार को भी लगने लगा है कि कर्ज पर कर्ज देकर चुनावी संभावनाएं चमकाई जा सकती हैं. 

सरकार और रिजर्व बैंक के बीच ताजा विवाद के साथ ही कर्ज के इस टाइम बम की टिक्-टिक् भी शुरू हो गई है. भारत की छद्म बैंक‌िंग यानी एनबीएफसी (गैर बैंक‌िंग वित्तीय कंपनियों) ने पिछले चार साल में बेरोक-टोक कर्ज बाटे हैं. सरकार, रिजर्व बैंक के जरिए कर्ज के बकायों को बैंकों के गले बांधने जा रही है. बैंकों के पास बकाया कर्ज का भारी बारूद पहले से जमा है जिस पर अब नया आरडीएक्स बिछने वाला है.

रिजर्व बैंक गवर्नर रहें या जाएं लेकिन अब सरकार ने यह फरमान सुना ही दिया है कि एक-सरकारी बैंकों को एनबीएफसी के बकाया कर्ज खरीदने होंगे या नए कर्ज देने होंगे. दो-बैंकों पर बकाया कर्ज वसूली को लेकर सख्ती नहीं होगी और तीन-यूपीए की तर्ज पर बैंकों को कर्ज बांटने का अभियान शुरू करना होगा.

सब जानते हुए सरकार कर्ज से लदे बैंकों को नए बारूद पर क्यों बिठा रही है?

सरकार चुनाव के पहले एक कर्ज संकट को टालना चाहती है. एनबीएफसी या शैडो बैंक‌िंग ने बाजार से बड़े पैमाने पर (कॉमर्शियल पेपर और डिबेंचर) कर्ज लिए हैं. इन्हें जमा करने-जुटाने की छूट नहीं है. वे बैंक व बाजार से कर्ज लेकर आगे कर्ज देते हैं. एनबीएफसी के 2.3 लाख करोड़ के कर्ज दिसंबर तक चुकाए जाने हैं. कुछ बड़ी देनदारियां अगले साल सितंबर तक चलेंगी. 

इसी भुगतान की आहट के बाद अक्तूबर में बाजार में नकदी का संकट शुरू हुआ कि क्यों लेनदारों को यह पता है कि शैडो बैंक‌िंग के पैर के नीचे पूंजी की जमीन नहीं है.

सरकार की कवायद इस टाइम बम की घड़ी को आगे बढ़ाने की है ताकि चुनाव अच्छे-भले गुजर जाएं. ऐसा ही यूपीए ने किया था जब कंपनियों के बकाया कर्जों का भुगतान टाल कर उन्हें नए कर्ज दिए गए थे. सरकार के धमकाने पर रिजर्व बैंक ने बैंकों से कहा है कि वे इस शैडो बैंक‌िंग को और कर्ज दें, उनके बॉन्ड्स को गारंटी दें और यहां तक कि स्टेट बैंक तो एनबीएफसी के 45,000 करोड़ रु. के बकाया कर्ज खरीदने जा रहा है.

म्युचुअल फंड भी अपनी नकदी एनबीएफसी के बॉन्ड्स में लगाते थे. उन्हें इस शैडो बैंक‌िंग की सचाई मालूम है इसलिए पिछले दो माह में उन्होंने काफी बिकवाली की है. यानी अब इनके बकाया कर्ज की जिम्मेदारी बदहाल बैंकों पर आ गई है जिनके पास करोड़ों जमाकर्ताओं की बचत है.

रिजर्व बैंक के एनपीए फॉर्मूले के मुताबिक, एनबीएफसी यानी शैडो बैंक‌िंग के एनपीए उनके कुल उधार का 5.8 फीसदी है जबकि बैंकों का एनपीए (कुल कर्ज का प्रतिशत) 11.8 फीसदी है. इन्हें मिलने वाली ताजा राहत एक साल बाद बड़ी आफत बनकर टूटेगी और तब मुसीबत के नए दांत उग चुके होंगे.
2022 से सरकारी कर्ज की देनदारी का सबसे लंबा क्रम शुरू हो रहा है. यानी सरकार को या तो बैंकों से लिया कर्ज (ट्रेजरी बिल के जरिए) चुकाना होगा या उसे चुकाने के लिए नया कर्ज उठाना होगा. इस बीच सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ब्याज दरें बढऩे लगी हैं जो इस संकट को समय से पहले आमंत्रित कर सकती हैं.

चुनाव सामने हैं, वित्तीय संकट सबको दिख रहा है इसलिए कर्ज पर कर्ज बांटने से तत्काल न तो मांग बढऩी है और न निवेश. इसका लाभ कुछ ही बड़े शैडो बैंकों (एनबीएफसी) को ही मिलेगा. जैसा कि 2010 में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों पर संकट के दौरान अन्य वित्तीय कंपनियों पर संकट बना रहेगा.

वित्तीय तंत्र में कर्ज मिथकों के राक्षस रक्तबीज की तरह होता है. वह सिर्फ जगह बदलता है, बढ़ता है, मरता कभी नहीं. बाजार को यह अच्छी तरह पता है. बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ऐसे कर्ज संकट की स्थिति 40 साल में एक बार बनती है. क्या हम इससे बच पाएंगे?

Sunday, November 4, 2018

कायम रहे बीमारी !



कागज देखना कुछ नहींटेलीफोन आयालोन दे दो. लोन चुकाने का समय आया तो नया लोन दे दो. जो गया सो गयाजमा करने के लिए नया लोन दे दो. यही कुचक्र चलता गया और भारत के बैंक एनपीए के जंजाल में फंस गए!

यह थे प्रधानमंत्रीदो माह पहले लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान! वे बता रहे थे कि यूपीए के दौर में किस तरह बैंकों को लूटा गया था. नेतासरकारबिचैलिए मिलकर बकाया कर्ज की देनदारी टाल (रिस्ट्रक्चर कर) देते थे. सरकार बदली तो यह लूट खुली. सक्चती की जा रही है. अब किसी को माफ नहीं किया जाएगा.

साठ दिन भी नहीं बीते कि अब सरकार रिजर्व बैंक पर ही आंखें तरेर रही है कि बकाया कर्ज को लेकर बैंकों पर कुछ ज्यादा ही सख्ती हो गई. कर्ज की किल्लत हो रही है. कर्जदारों को रियायत मिलनी चाहिए. बिजली कंपनियों के बकाया कर्ज की वसूली टाली जानी चाहिए.

इस दिल बदल का सबब क्या है?

चुनाव की धमक के साथ पारदर्शिता के संकल्पों की शवयात्रा प्रारंभ हो गई है.

छह माह पहले बैंकों के स्वच्छता अभियान की कसम खा रही सरकार ने जमा बकाया कर्ज के कीचड़ को ढकने के लिए रिजर्व बैंक की स्वायत्तता पर पंजे गड़ा दिए हैं. बैंकिंग सुधारों के सारे दावे और वादे सिर के बल खड़े होकर नृत्य कर रहे हैं.

2015 में इस सरकार के वही मंत्रीजो आज नियामकों को संविधान पढ़ा रहे हैंकह रहे थे कि अगर मोदी सरकार न आई होती तो देश को पता ही नहीं चलता कि किस तरह कर्ज पर कर्ज दिए गए. सरकार को फख्र था कि उसने रिजर्व बैंक को एनपीए (बकाया कर्ज) पहचानने का फॉर्मूला बदलने को कहा ताकि सच सामने आ सके.

रिजर्व बैंक ने फॉर्मूला बदलकर बकाया कर्ज से जूझते बैंकों को एक नई व्यवस्था के तहत रखा जिसे प्रॉम्प्ट करेक्टिव ऐक्शन (पीसीए) कहते हैं. इसके तहत रखे गए 11 सरकारी बैकों को ब्रांच नेटवर्क बढ़ानेकर्ज वितरण सीमित करनेलाभांश बांटने पर रोक लगाई गई. उन्हें अपने मुनाफों का बड़ा हिस्सा बकाया कर्ज के बदले पूंजी बनाने में लगाना पड़ रहा है. उनका मुनाफा गिर रहा है. रिजर्व बैंक ने बैंकों से कहा है कि अपने मालिक या सरकार से पूंजी लेकर आएं नहीं तो उनके डूबने का खतरा है.

अचरज देखिए कि पीसीए पिछले एक साल से अमल में है. अभी कल तक सरकार इस सख्ती पर फूल कर गुब्बारा हो रही थी. उसे लगता था कि बैंकों को बचाने के लिए यह जरूरी है. जून मेंइसी पीसीए के तहत सरकारी बैंकों ने अपनी पुनरोद्धार योजना सरकार को सौंपी थी लेकिन अब सरकार के अधिकारी यह कहते सुने जा रहे हैं कि रिजर्व बैंक ने पीसीए बनाने में वित्त मंत्रालय से राय नहीं ली.

यही सरकार है जो संसद में मेज ठोक कर कह रही थी कि बैंकों के कर्जदारों को बचाने की यूपीए की नीति अब खत्म हो चुकी है. लेकिन अब उसे लगता है कि निजी बिजली कंपनियों को इससे बाहर रखा जाए. बैंक उन्हें बकाया कर्ज में रियायत दें.

दरअसलचुनावी झोंक में ईमानदारी के हलफनामों और सुधारों के कौल की चिंदिया उड़ रही हैं. बकाया कर्ज को लेकर रिजर्व बैंक की सख्ती अचानक सरकार को इसलिए खलने लगी है क्योंकि उसे अब बैंकों से सस्ते कर्ज बंटवाने यानी लोकलुभावन इस्तेमाल की जरूरत है. सरकार तो यह भी चाहती है कि रिजर्व बैंक को मुश्किल में फंसी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को भी पूंजी देनी चाहिए. लेकिन कोई भी नियामक कैसे सहमत होगा कि सुधारों की इबारत चुनाव देखकर बदल दी जानी चाहिए. अगर चुनाव है तो बैंकों को बकाया कर्ज के भंवर से निकालने के लिए सख्ती क्यों रुकनी चाहिएएनपीए के नियम सबके लिए एक जैसे होने चाहिए! कारोबारी गलतियों के लिए जमाकर्ताओं के पैसे से खैरात बांटना कैसे नैतिक है! 

दरअसलभारत में सिर्फ एक जमात ऐसी है जो सब कुछ केवल चुनाव को देखकर करती है. और शायद कोई काम या कारोबार सिर्फ पांच साल की एक्सपायरी डेट के साथ शुरू नहीं होता. राजनैतिक दल अपने चुनावी वादों से चाहे जो कॉमेडी कराएंलेकिन जब वे नीतियों को सिर के बल खड़ा करने लगते हैं तो स्वतंत्र नियामकों का यह दायित्व है कि वे सरकार को आईना दिखाएं. रिजर्व बैंक को धमका रही सरकार क्या समझ पा रही है कि लोकतंत्र में चुने प्रतिनिधि इसलिए सर्वोच्च हैं क्योंकि वे संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता की हिफाजत करने के लिए भेजे जाते हैंउन्हें डराने के लिए नहीं.