Sunday, January 6, 2019

महंगाई की दूसरी धार


अभी खुदरा महंगाई सोलह महीने के सबसे निचले स्तर पर है और थोक महंगाई चार महीने के न्यूनतम स्तर पर लेकिन..

·       महंगाई में कमी और जीएसटी दरें कम होने के बावजूद खपत में कोई बढ़त नहीं है.

·   बिक्री में लगातार गिरावट के बावजूद कार कंपनियां कीमत बढ़ा रही हैं

·       जीएसटी में टैक्स कम होने के बावजूद सामान्यतः खपत खर्च में घरेलू सामान की खरीद का हिस्सा 50 फीसदी रह गया है, जो दस साल पहले 70 फीसदी होता था

·       जीएसटी के असर से उपभोक्ता उत्पादों या सेवाओं की कीमतें नहीं घटी 
हैं. कुछ कंपनियों ने लागत बढऩे की वजह से कीमतें बढ़ाई ही हैं

·       पर्सनल लोन की मांग जनवरी 2018 से लगातार घट रही है

·       उद्योगों को कर्ज की मांग में कोई बढ़त नहीं हुई क्योंकि नए निवेश नहीं हो रहे हैं  

·      महंगाई में कमी का आंकड़ा अगर सही है तो ब्याज दरें मुताबिक कम नहीं हुई हैं बल्कि बढ़ी ही हैं

इतनी कम महंगाई के बाद अगर लोग खर्च नहीं कर रहे तो क्या बचत बढ़ रही है?

लेकिन मार्च 2017 में बचत दर पांच साल के न्यूनतम स्तर पर थी. अब 
इक्विटी म्युचुअल फंड में निवेश घट रहा है.

महंगाई कम होना तो राजनैतिक नेमत है. इससे मध्य वर्ग प्रसन्न होता है. लेकिन तेल की कीमतों में ताजा बढ़त और रुपए की कमजोरी के बावजूद महंगाई नहीं बढ़ी है.

अर्थव्यवस्था जटिल हो चुकी है और सियासत दकियानूसी. महंगाई दुधारी तलवार है. अब लगातार घटते जाना अर्थव्यवस्था को गहराई से काट रहा है. महंगाई के न बढ़ने के मतलब मांग, निवेश, खपत में कमी, लागत के मुताबिक कीमत न मिलना होता है. महंगाई में यह गिरावट इसलिए और भी जटिल है क्योंकि दैनिक खपत वस्तुओं में स्थानीय महंगाई कायम है. यानी आटा, दाल, सब्जी, तेल की कीमत औसतन बढ़ी है जिसके स्थानीय कारण हैं.



पिछले चार साल में वित्त मंत्रालय यह समझ ही नहीं पाया कि उसकी चुनौती मांग और खपत में कमी है न कि महंगाई. किसी अर्थव्यवस्था में मांग को निर्धारित करने वाले चार प्रमुख कारक होते है.

एक —निजी उपभोग खर्च जिसका जीडीपी में हिस्सा 60 फीसदी होता था, वह घटकर अब 54 फीसदी के आसपास है. 2015 के बाद से शुरू हुई यह गिरावट अभी जारी है, यानी कम महंगाई और कथित तौर पर टैक्स कम होने के बावजूद लोग खर्च नहीं कर रहे हैं.

दो—अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश खपत की मांग से बढ़ता है. 2016-17 की पहली तिमाही से इसमें गिरावट शुरू हुई और 2017-18 की दूसरी तिमाही में यह जीडीपी के अनुपात में 29 फीसदी पर आ गया. रिजर्व बैंक मान रहा है कि मशीनरी का उत्पादन ठप है. उत्पादन क्षमताओं का इस्तेमाल घट रहा है. दिसंबर तिमाही में निवेश 14 साल के निचले स्तर पर है. ऑटोमोबाइल उद्योग इसका उदाहरण है.

तीन— निर्यात मांग को बढ़ाने वाला तीसरा कारक है. पिछले चार साल से निर्यात में व्यापक मंदी है. आयात बढ़ने के कारण जीडीपी में व्यापार घाटे का हिस्सा दोगुना हो गया है.

चार—100 रुपए जीडीपी में केवल 12 रुपए का खर्च सरकार करती है. इस खर्च में बढ़ोतरी हुई लेकिन 88 फीसदी हिस्से में तो मंदी है. खर्च बढ़ाकर सरकार ने घाटा बढ़ा लिया लेकिन मांग नही बढ़ी.

गिरती महंगाई एक तरफ किसानों को मार रही है, जिन्हें बाजार में समर्थन मूल्य के बराबर कीमत मिलना मुश्किल है. खुदरा कीमतें भले ही ऊंची हों लेकिन फल-सब्जियों की थोक कीमतों का सूचकांक पिछले तीन साल से जहां का तहां स्थिर है. दूसरी ओर, महंगाई में कमी जिसे मध्य वर्ग लिए वरदान माना जाता है वह आय-रोजगार के स्रोत सीमित कर रही है.

आय, खपत और महंगाई के बीच एक नाजुक संतुलन होता है. आपूर्ति का प्रबंधन आसान है लेकिन मांग बढ़ाने के लिए ठोस सुधार चाहिए. 2012-13 में जो होटल, ई कॉमर्स, दूरसंचार, ट्रांसपोर्ट जैसे उद्योग व सेवाएं मांग का अगुआई कर रहे थे, पिछले वर्षों में वे भी सुस्त पड़ गए. मोदी सरकार को अर्थव्यवस्था में मांग का प्रबंधन करना था ताकि लोग खपत करें और आय व रोजगार बढ़ें लेकिन नोटबंदी ने तो मांग की जान ही निकाल दी.

2009 में आठ नौ फीसदी की महंगाई के बाद भी यूपीए इसलिए जीत गया क्योंकि मांग व खपत बढ़ रही थी और सबसे कम महंगाई की छाया में हुए ताजा चुनावों में सत्तारूढ़ दल खेत रहा. तो क्या बेहद कम या नगण्य महंगाई 2019 में मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है, न कि महंगाई का बढ़ना? 

Tuesday, January 1, 2019

एक था जीएसटी



99 फीसदी सामान व सेवाओं पर 18 फीसदी तक जीएसटी! 
97 फीसदी सामान सेवाएं तो पहले इसी दायरे में हैं
तो क्रांतिकारी उदारता का  यशोगान! 

कभी दूध कुछ इस तरह फट जाता है कि उससे पनीर तो दूररायता भी नहीं बनता. जीएसटी का हाल अब कुछ ऐसा ही समझिए. भारत की दूसरी आजादी (जैसा कि संसद में अर्धरात्रि इसकी शुरुआत के वक्त कहा गया था) 18 माह में ऐसी प्रणाली में बदल गई है जिसके आर्थिक मकसद ध्वस्त हो चुके हैं. जीएसटी दम तोड़ता हुआ एक सुधार हैचुनाव से पहले जिससे सियासी लाभ की बची-खुची बूंदें निचोड़ी जा रही हैं.

जीएसटी का राजस्व‍ संग्रह लक्ष्य से मीलों दूर है और खजानों का हाल खस्ता है. अगर सरकार शुरू से ही दो टैक्स दरों वाला जीएसटी लेकर चली होती तो बात दूसरी थी लेकिन अब तो जटिलताओं का अंबार गढ़ा जा चुका है.

सरकार को ठोस तौर पर यह भी पता नहीं कि गुजरात चुनाव से लेकर आज तक जीएसटी में रियायतों के बाद उत्पादों या सेवाओं की कीमतें कम हुई भी हैं क्योंकि कंपनियां लागत बढऩे के कारण मूल्य बढ़ा रही हैं. जीएसटी के तहत मुनाफाखोरी रोकने वाला तंत्र अभी शुरू नहीं हुआ जिससे पता चले कि रियायतों का फायदा किसे मिला है.

रियायतों के असर से खपत या मांग बढऩे या कंपनियों का कारोबार बढऩे के प्रमाण भी नहीं हैं.

तो फिर अचानक इस टैक्स दयालुता की वजह

·       पिछले 18 माह में सरकार को एहसास हो गया है कि राजस्व के मामले में मासिक एक लाख करोड़ रु. के संग्रह का लक्ष्य फिलहाल मुश्किल है. सेवाओं से टैक्‍स संग्रह में कमी आई है. जीएसटी अब केवल बड़े निर्माता और सेवा प्रदाता (जो पिछली प्रणाली में भी प्रमुख करदाता थे) के कर योगदान पर चल रहा है. छोटे करदाता और नए पंजीकरण वाले कारोबारी रियायतों की मदद से टैक्स चोरी के पुराने ढर्रे पर लौट आए हैं.

·       जीएसटी में अभी औसतन 60 फीसदी कारोबारी रिटर्न भर रहे हैं. ई वे बिल लागू होने के बाद पारदर्शिता आने की उम्मीदें भी खेत रही हैं. चुनाव के मद्देजनर टैक्स चोरी पर सख्ती मुश्किल है.

·       जीएसटी की प्रणालियां व नियम अभी तक स्थिर नहीं हैं. रफू-पैबंद जारी हैं. 

·       इसलिए चुनाव से पहले सरकार ने दो काम किए एकरिटर्न फॉर्म सालाना रिटर्न (9को अगले साल तक के लिए टाल दिया. इसके बिना करदाताओं के हिसाब सुचारु (इनवॉयस मैचिंग) करना और टैक्स क्रेडिट संभव नहीं है. यही वजह है कि जीएसटी का अर्थव्यवस्था पर कोई सकारात्मक असर नहीं दिखा. दोजीएसटी तो चल नहीं रहा तो इससे कम से कम चुनावी फायदा ही हो जाए.

जीएसटी के सियासी इस्तेमाल का केंद्र सरकार के पास यह आखिरी मौका था. पिछले 18 महीने में देश का राजनैतिक भूगोल बदल गया है. जीएसटी काउंसिल में अब विपक्ष के राज्यों की संख्या बढ़ चुकी है इसलिए आगे सहमति मुश्किल होने वाली है. काउंसिल की हालिया बैठक में इसके संकेत भी मिले. विपक्ष शासित राज्यजीएसटी को सिरे से बदलने की बातें करने लगे हैं.

कभी किसी मंत्री ने कहा था कि देश में हवाई चप्पल या कार पर एक जैसा कर नहीं हो सकता (अब 99 फीसदी...) या जीएसटी देश से टैक्स चोरी को मिटा देगा अथवा इससे कारोबार की लागत कम होगी या इससे जीडीपी बढ़ जाएगा. आज सरकार इन पर सवाल भी सुनना नहीं चाहती.

क्या जीएसटी राज्यों के वैट जैसे भविष्य की तरफ बढ़ रहा हैअपने शुरुआती वर्षों (2005-08में सफलता के बादराजनीति और वित्तीय दिक्कतों के चलते राज्यों ने वैट का अनुशासन तार-तार कर दिया. हालांकि जीएसटी वैट से कहीं ज्यादा सुगठित है लेकिन जब केंद्र सरकार ही चुनावी राजनीति के खातिर इसके अनुशासन का मुरब्बा बना चुकी तो राज्य भी अनुशासन तोड़ेंगे. ई वे बिल में राज्य स्तरीय रियायतें इसका नमूना हैं.

इसी फरवरी में हमने लिखा था कि जीएसटी का सुधारवाद अब इतिहास की बात है. भारत का सबसे नया सुधार सिर्फ सात माह में पुराने रेडियो की तरह हो गयाजिसे ठोक-पीट कर चलाया जा रहा है. अठारह माह बाद इस रेडियो में अब केवल चुनावी प्रसारण चल रहे हैं. कहना मुश्किल है कि अगले साल जीएसटी का क्या होगा लेकिन 2019 लगते-लगते यह साबित हो गया है कि हमारी सियासत सुधारों की समझ और साहस सिरे से दरिद्र हैं.

Sunday, December 23, 2018

माफी की सजा



गर कांग्रेस को यह लगता है कि वह मध्य प्रदेश में किसान कर्ज माफी के वादे पर जीती है तो फिर यह करिश्मा राजस्थान में क्यों नहीं हुआ, जहां इस फरवरी में 8,500 करोड़ रु. के कर्ज माफ करने का ऐलान किया गया था !

अगर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस कर्ज माफी के वादे पर जीती तो इसी पर कर्नाटक में भाजपा को बहुमत क्यों नहीं मिला. उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार ने कर्ज माफी की थी फिर भी लोगों को भरोसा नहीं हुआ !

कर्नाटक में कांग्रेस ने 2017 में सहकारी बैंकों के 8,500 करोड़ रु. के कर्ज माफ किए थे. लेकिन राज्य के लोग जद (एस) के कर्ज माफी वादे पर भी पूरी तरह बिछ नहीं गए.

बस एक बड़ी चुनावी हार या किस्मत से मिली एक जीत के असर से राजनीति बदहवास हो जाती है. देश में पिछले साल दिसंबर से अब तक सात राज्यों (पंजाब और महाराष्ट्र-जून 2017, उत्तर प्रदेश-अप्रैल 2017, राजस्थान-फरवरी 2018, कर्नाटक-जुलाई 2018, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश-दिसंबर 2018) में 1,72,146 करोड़ रु. किसान कर्ज माफ करने का ऐलान हुआ.

क्या इनसे चुनावों के नतीजे बदले?

क्या भाजपा और कांग्रेस की सरकारों की कर्ज माफी बाद में हुए चुनावों में उनके काम आई?

किसानों के कर्ज भारतीय राजनीति की सर्वदलीय ग्रंथि बन गए हैं. कर्ज माफी जरूरतमंद किसानों तक नहीं पहुंचती, इसे जानने के लिए वैज्ञानिक होने की जरूरत नहीं है लेकिन इससे वित्तीय तंत्र में बन रहे दुष्चक्र बताते हैं कि सियासत किस हद तक गैर-जिम्मेदार हो चली है.
·       मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में किसान कर्ज माफी के बाद अब देश अधिकांश कृषि आधारित राज्य इस होड़ की चपेट में हैं. बिहार, बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में इसे दोहराया जाएगा. मध्य प्रदेश और राजस्थान की कर्ज माफी बैंकों व सरकार के लिए दर्दनाक होने वाली है. बकौल रिजर्व बैंक, मध्य प्रदेश में कुल बैंक कर्ज में खेती के लिए मिलने वाले कर्ज का हिस्सा  29 फीसदी और राजस्थान में 35 फीसदी है. जो अन्य राज्यों की तुलना में काफी ऊंचा है. मध्य प्रदेश में खेती में फंसे हुए कर्ज 11 फीसदी हैं. यह स्तर राष्ट्रीय औसत से काफी ऊंचा है.

·       लोन माफी पर दस्तखत करते हुए मध्य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री ने यह भी नहीं बताया कि 35,000 करोड़ रु. का यह बिल कौन भरेगा? कर्नाटक के कुल बैंक कर्ज में खेती के कर्ज 15 फीसदी है. इनकी माफी का आधा बोझ बैंकों और आधा राज्य के बजट पर होगा. यह फॉर्मूला अभी तक बन नहीं पाया है इसलिए कर्ज माफी लागू करने में देरी हो रही है.

·       उत्तर प्रदेश (36,359 करोड़ रु.) और महाराष्ट्र  (34,022 करोड़ रु.) ने पूरी कर्ज माफी बजट पर ले ली. महाराष्ट्र को खर्च चलाने के लिए शिरडी मंदिर से कर्ज लेना पड़ा और उत्तर प्रदेश को पूंजी खर्च (निर्माण व विकास) खर्च में 33 फीसदी की कटौती करनी पड़ी. कर्ज माफी करने वाले सभी राज्यों की रेटिंग गिरी है यानी उन्हें महंगे कर्ज लेने होंगे.

·       बार बार कर्ज माफी के कारण सरकारी बैंक किसानों को कर्ज देने में हिचकते हैं. कृषि कर्ज में स्टेट बैंक का हिस्सा काफी तेजी से गिरा है जबकि निजी बैंक ज्यादा बड़ा हिस्सा ले रहे हैं, जिनसे कर्ज माफ कराना मुश्किल है. कर्नाटक में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों को नोटबंदी व कर्ज माफी के बाद गहरी चोट लगी.

·       क्या हमारे राजनेता जानना चाहेंगे कि भारत के बैंक खेती को छूने से डरने लगे हैं? 2007 से 2017 के बीच खेती को कर्ज की वृद्धि दर 33 फीसदी से घटकर 8.2 फीसदी पर आ गई. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में पिछले तीन साल में कर्ज माफी के बाद खेती को कर्ज की आपूर्ति बुरी तरह गिरी है.

बात कर्ज माफी से आगे बढ़कर बिजली बिल माफी तक पहुंच गई है. कल होम लोन माफ करने की भी राजनीति होगी.

अंतत: हम उस तरफ बढ़ रहे हैं जहां या तो किसानों को कर्ज मिलना मुश्किल हो जाएगा या फिर कर्ज माफी के बाद हर तरह का टैक्स बढ़ेगा या विकास सिकुड़ जाएगा.

अगर भारत के राज्य कोई कंपनी होते जो कमलनाथ, वसुंधरा राजे या योगी आदित्यनाथ के अपने पैसे से बनी होती तो क्या असर और फायदे जाने बगैर वे कर्ज माफी के दांव लगाते रहते? यह पूरा ड्रामा करदाताओं या जमाकर्ताओं के पैसे पर होता है और हमें  बार-बार छला जाता है. कर्ज माफ हो रहा है, अब कीमत चुकाने को तैयार रहिए.

Sunday, December 16, 2018

उन्नीस का पहाड़


अगर लोगों ने कर्नाटक में कांग्रेस को पलट दिया तो क्या गारंटी कि वे मध्य प्रदेशराजस्थानछत्तीसगढ़ में भाजपा को नहीं पलटेंगे. अगर लोग सरकारें बदलना चाहते हैं तो कहीं भी बदलेंगे. गुजरात में गोली कान के पास से निकल गई. (अर्थात्इंडिया टुडे16 मई2018)

यही हुआ न! कर्नाटक में लोगों ने कांग्रेस को नकार दिया और मध्य प्रदेशराजस्थानछत्तीसगढ़ में भाजपा को. कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता विरोधी वोट पर जीते जद (एस) की पूंछ पकड़ कर वापस लौटी है.

कुछ सवाल उभर रहे हैं

- विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस ने ऐसा क्या कर दिया कि वह हिंदी पट्टी की नूरे-नजर बन गईयही राज्य तो हैंकेंद्र में दस साल तक शासन के बाद जहां (मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) वह जीत के लिए तरस गई और जीता हुआ गढ़ (राजस्थान) गंवा बैठी थी.

- भाजपा का सूर्य तप रहा है लेकिन मोदी और उनके सूबेदार मिलकर एक और एक ग्यारह क्यों नहीं हो सकेपार्टी उन राज्यों में भी हार गई जहां उसकी सरकारें भाजपा के बुरे दिनों में भी चमकती रही थीं और उनका कामकाज भी कमोबेश ठीक ही था.

- छत्तीसगढ़ में मोबाइल फोन मुफ्त बंट रहे थे राजस्थानमध्य प्रदेश बिजली के बिल माफ कर रहे थे लेकिन कुछ भी काम क्यों नहीं आया?

- क्या एक नई सत्ता विरोधी लहर शुरू हो रही है जो किसी को नहीं बख्शेगी?

मोदी-शाह को भी नहीं!

2014 के बाद से देश अलग ढंग से वोट देने लगा है. पिछले दशकों तक मतदाता राज्यों में सरकारों को लगातार दो या तीन तक मौके दे देते थे लेकिन केंद्र में हर पांच साल पर सरकारें पलटती रहीं. 25 वर्षों में केवल यूपीए की पहली सरकार ऐसी थी जिसे लगातार दूसरा मौका मिलाजिसके कारण राजनैतिक की जगह आर्थिक थे. 1991 के बाद भारत में शायद पहली ऐसी सरकार थी जिसके पूरे पांच साल आर्थिक पैमाने पर सामन्यतः निरापद थे. 2009 की जीत में शहरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की शानदार ग्रोथ बड़ी वजह थी.

अब लोगों पर सरकार बदलने का जुनून तारी है. अपवाद नियम नहीं होते इसलिए बिहारबंगालतेलंगाना (सीमित संदर्भों में गुजरात भी) के जनादेश अस्वाभाविक हैं. इनके अलावापिछले पांच साल में केंद्रराज्यों और यहां तक कि पंचायत- नगरपालिकाओं में भी लोगों ने सत्ता पलट दी.

भाजपा ने इस जुनून पर सवारी की और लगभग हर प्रमुख चुनाव में राष्ट्रीय व क्षेत्रीय दलों को रौंद दिया. वह कर्नाटक में भी कांग्रेस को हार तक धकेलने में सफल रही. लेकिन सरकार पलटने वाली दूसरी लहर बनते ही गुजरात में लोहा दांत के नीचे आ गया और मध्य व पश्चिम के गढ़वह कांग्रेस ले उड़ी जो कल तक किसी गिनती में नहीं थी.

अगर सत्ता विरोधी मत ही पिछले चार साल का राजनैतिक स्थायी भाव है तो फिर मोदी-शाह भाजपा भारत के ताजा इतिहास की सबसे बड़ी सत्ता विरोधी लहर से मुकाबिल हो रहे हैं.

मोदी-शाह के लिए सरकारों से नाराजगी किसी पिरामिड या पहाड़ की तरह हैजिसके चार स्तर हैं.

देश का मिजाज भांपने वाले तमाम सर्वेक्षणों से इसका अंदाज होता है. इस पिरामिड के शिखर पर बैठे नरेंद्र मोदी सबसे सुरक्षित हैं. 100 में 49 लोग (इंडिया टुडे-देश का मिज़ाजजुलाई 2018 ) उनको प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वश्रेष्ठ मानते हैं लेकिन केंद्र में उनकी सरकार से खुश नहीं हैं. सरकार की स्वीकार्यता उनकी अपनी लोकप्रियता की एक-तिहाई है. भाजपा की राज्य सरकारों की स्वीकार्यता तो नगण्य है और पिरामिड की तली पर यानी सबसे नीचेजहां सांसद और विधायक आते हैं वहां तो गुस्सा खदबदा रहा है.

केंद्र व 20 राज्यों और करीब 60 फीसदी जीडीपी पर शासन कर रही भाजपा के लिए सरकार विरोधी लहर एक दुष्चक्र बनाती दिख रही है. लोकसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्रियों व चुनावी नुमाइंदों को बदलने से भितरघात के खतरे हैं. सरकार की साख बनाए रखने के लिए कर्ज माफी जैसे खजाना लुटाऊ दांवजीत की गारंटी हरगिज नहीं हैंअलबत्ता अर्थव्यवस्था की तबाही जरूर तय है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी साख झोंक कर भीसत्ता विरोधी लहर से अपनी सरकारों की हिफाजत नहीं कर पाए हैं. सरकारें पलटते मतदाता केवल 2019 के बड़े चुनाव में ही नहीं बल्कि 2022 तक हर प्रमुख चुनाव में भाजपा से बार-बार यह पूछेंगे कि उसे ही दोबारा क्यों चुना जाएभाजपा के लिए उन्नीस का पहाड़ अब और ऊंचा हो गया है.

Monday, December 10, 2018

बेचैनी की जड़


समर्थन मूल्य में रिकॉर्ड बढ़ोतरी, किसानों की कर्ज माफी, खेती की ढेर सारी स्कीमें! फिर भी तीन महीने में दूसरी बार किसान दिल्ली में आ जुटे. ताजा चुनावों में गांवों में भारी मतदान पर कहीं पसीने तो कहीं मुस्कराहटें क्यों खिल उठी हैं. गुजरात के गांवों का गुस्सा चुनावी नजीर के तौर पर पेश होने लगा.

अगर किसानों का विरोध काठ की हांडी है तो बार-बार इतनी जल्दी आग पर क्यों चढ़ रही है?

गांवों में ऐसा कुछ हो रहा है जो सरकारों की पकड़ और समझ से बाहर है. राज्यों के निजाम भी नारेबाजी के बीच खेती को लेकर उपायों का सिरा खो बैठे हैं.

सरकारें समर्थन मूल्य के पार देख नहीं पा रही हैं. लागत से 50 फीसदी ज्यादा समर्थन मूल्य समाधान होता तो किसान रह-रहकर सड़कों पर नहीं होते. इस साल दुनिया के बाजार में अनाज की कीमतें भारत से कम हैं. रूस और अर्जेंटीना में रिकॉर्ड उत्पादन के साथ रबी मौसम में भारत में भी रिकॉर्ड उत्पादन हुआ.

पिछले सितंबर के बाद से सरकार ने गेहूं पर इंपोर्ट ड्यूटी 10 से बढ़ाकर 30 फीसदी, पाम ऑयल पर 25 से 40 फीसदी, सोयाबीन पर 25 से 35 फीसदी, चने पर 25 से 50 फीसदी और चीनी पर 40 से 50 फीसदी की है लेकिन इसके बावजूद इन सभी फसलों के दाम बाजार में काफी नीचे हैं. आयातित अनाज, समर्थन मूल्य से सस्ता है इसलिए किसान को बाजार में अनाज की वह कीमत कोई नहीं दे रहा, जो सरकार देती है. यकीनन भारी अनाज भंडार पर बैठी सरकार सारा अनाज खरीद भी नहीं सकती.

पिछले एक दशक में खेती तकनीकों में सुधार के बाद अनाज का पूरा ग्लोबल कारोबार बदल चुका है. समर्थन मूल्य की राजनीति खेती का बाजार बिगाड़ रही है. किसान भी अब यह जान रहा है कि अनाज उसे केवल सरकार को बेचना है इसलिए संकट कहीं दूसरी जगह है.

अनाज, गन्ना, दलहन और तिलहन के बाजार में सीमित विकल्प, आयात के असर, साल में एक बार कमाई और जोत का आकार छोटा होने के कारण भारतीय खेती का बुनियादी गणित बदल गया है. पिछले पांच-छह साल में किसान तेजी से फल-सब्जी और दूध की तरफ मुड़े हैं जो उन्हें दैनिक नकदी उपलब्ध कराते हैं.

दूध और फल-सब्जी का उत्पादन बढऩे की रक्रतार अनाज की तुलना में चार से आठ गुना ज्यादा है. छोटे मझोले किसानों की कमाई में इनका हिस्सा 20 से 30 फीसदी है. खेती का संकट अब फल-सब्जी और दूध के उत्पादन का है.

फल-सब्जी का थोक मूल्य सूचकांक पिछले तीन साल से जहां का तहां स्थिर है. ऐसा ही 2003-04 के चुनाव के पहले हुआ था. प्याज, आलू, दूध, अनार, लहसुन, फलों की भारी पैदावार और सही कीमतें न मिलने का संकट अब हर साल आता है. कृषि उत्पादों के लिए उपभोक्ताओं को भले ही ऊंची कीमत देनी पड़ रही हो लेकिन किसानों के लिए थोक की कीमतें नहीं बढ़ी हैं.

सरकार जहां समर्थन मूल्य दे रही है वहां बाजार किसान के माफिक नहीं है और जो वह उगा रहा है वहां सरकार का कोई दखल नहीं है. कच्ची फसलों के भंडारण की सुविधा नहीं है और राजनैतिक रसूख वाले व्यापारियों व सहकारी डेयरी (दूध) के कार्टेल किसान को भी लूट रहे हैं और उपभोक्ता को भी.

भारत में खेती की नीतियां किल्लत दूर करने पर केंद्रित हैं, जरूरत से अधिक पैदावार संभालने पर नहीं. कमी आयात से पूरी हो सकती है लेकिन ज्यादा उपज बेचने का कोई रास्ता नहीं है.

1933 में अमेरिका में मंदी के बाद राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने एग्री एडजस्टमेंट ऐक्ट के तहत कुछ फसलों के अतिरिक्त पैदावार घटाने के लिए प्रोत्साहन दिए थे जबकि कुछ नई फसलों की तरफ मोड़ा था. लेकिन भारतीय राजनीति के पास कुछ नया सोचने का वक्त ही नहीं है. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की नसीहतों के बाद अगर भाजपा ने, ताजा चुनावों में, किसान कर्ज माफी के वादे से किनारा किया तो कांग्रेस उसे ले उड़ी.

गांवों में मजदूरी बढऩे की दर तीन माह के सबसे निचले स्तर पर है. 2018-19 के बीच गांवों में इसमें 60 फीसदी की कमी की आशंका है. साथ ही लगभग सभी फसलें मंदी की चपेट में हैं. लेकिन भारतीय राजनीति खेती को जो दवा दे रही है उससे खेती का भला तो दूर, सियासत का भी भला नहीं हो रहा है.

इतिहास बताता है कि गांव गुस्सा हों तो सरकारें डगमगाती हैं. चार राज्यों के विधानसभा चुनाव वस्तुतः गांवों के चुनाव हैं. इनके नतीजों से हमें पता चलेगा कि राजनीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के रिश्तों में 2014 के बाद क्या बदलाव आया है.