Monday, February 11, 2019

सुधारों की हार



चुनाव में वोट डालने से पहले सुधारों को श्रद्धांजलि देना मत भूलिएगा. अंतरिम बजट को गौर से समझिए. पच्चीस साल के सुधारों के बाद हम इस घाट फिसलेंगे! भारत में कोई सरकारी स्कीम अभी या कभी नियमित कमाई का विकल्प नहीं बन सकतीफिर भी भाजपा और कांग्रेस के बीचकिसानों व गरीबों के हाथ में राई के दाने रख महादानी बनने की आत्मघाती प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है
.
चुनावी जयघोष के बीच बजट पढऩे के बाद कोई भी निष्पक्षता के साथ दो निष्कर्ष निकाल सकता है.

एकढांचागत सुधारों की जिस अगली पीढ़ी को सामने लाने का दावा करते हुए नरेंद्र मोदी सत्ता में आए थे और सामाजिक स्कीमों का ढांचा व पहुंच ठीक करने की जो उम्मीद उन्होंने दिखाई थीउनकी याद में दो मिनट का मौन तो बनता है.

दोमोदी या राहुल भारत की राजनीति का बुनियादी चरित्र नहीं बदल सकते. यह सुधार विरोधीदकियानूस और चुनाव केंद्रित ही रहेगी.

चुनावी लोकलुभावनवाद नया नहीं हैलेकिन इस बार कुछ नया और बेहद खतरनाक हुआ है. राजनीति घातक प्रतीकवाद पर उतारू है. सरकारें किसी भी कीमत पर लोगों को सम्मानजनक सालाना कमाई नहीं दे सकतीं. लेकिन लाभार्थियों के लिए नगण्य‍ आय सहायता भी बजटों की कमर तोडऩे के लिए पर्याप्त है. मोदी-किसान का इनकम सपोर्ट केवल 500 रु. महीने (दैनिक मजदूरी का पांच फीसदी) का है. कांग्रेस की मेगा बजट वाली मनरेगा हर कोशिश के बावजूद केवल 100 दिन का सालाना रोजगार दे पाई. सरकार की दूसरी सहायतापेंशनबीमा योजनाओं के वर्तमान व संभावित लाभों को बाजार और जीने के खर्च की रोशनी से मापिएआपको सरकारों की समझ पर तरस आ जाएगा.

विशाल आबादीबजटों के घाटेभारी सरकारी कर्ज और लाभार्थ‌ियों की पहचान में बीसियों झोल के कारण इनकम सपोर्ट हर तरह से अभिशप्त है लेकिन बजट की जेब फटे होने के बावजूद नेता इस तमाशे पर उतारू हैंजिनसे लाभार्थियों की ज‌िंदगी में रत्तीभर बदलाव मुश्किल है.



मोदी सरकार की किसान इनकम सपोर्ट सुविचारित नहीं है. फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ाकर सरकार पहले ही बजट बिगाड़ चुकी थी. यह फैसला जनवरी में जन्मा जब राहुल गांधी ने गरीबों को न्यूनतम आय का वादा उछाल दिया. इसलिए मोदी-किसान पिछले साल दिसंबर से अमल में आएगी.

तेलंगाना (खर्च 120 अरब रु.)ओडिशा (खर्च 33 अरब रु.) और झारखंड (खर्च 22 अरब रु.) को इस जोखिम से रोकने के बजाए केंद्र सरकार ने भी इस चुनावी घोड़े की सवारी कर ली जो अर्थव्यवस्था को जल्द ही मुसीबत की राह पर पटक देगा.

आगे की राह कुछ ऐसी होने वाली है.

1. तीन राज्यों में किसानों को दोहरी सहायता मिलेगी. राज्य अपनी किसान-दान योजनाएं बंद नहीं करेंगे बल्कि इस के बाद कई दूसरे राज्य इसी तरह की योजनाएं ला सकते हैं. यानी एक घातक प्रतीकवादी होड़बस शुरू होने वाली है

2. अंतरिम बजट के बाद बॉन्ड बाजार ने खतरे के संकेत दे दिए. केंद्र सरकार के घाटे का आंकड़ा भरोसेमंद नहीं है. 2019-20 में सात लाख करोड़ रु. की सरकारी कर्ज योजना को देखकर बाजार को पसीने आ गए. राज्य भी इस साल और ज्यादा कर्ज लेंगे.

प्रतीकात्मक आय समर्थन इसलिए संकट को न्योता है क्योंकि सरकारें खेती को असंख्य सब्सिडी (खादपानीबिजलीउपकरणकर्ज पर ब्याज) देती हैं. 2020 में केंद्र का कृषि सब्सिडी बिल 2.84 खरब रु. होगा. इसके बाद भी संतोषजनक नियमित आय दे पाना असंभव है.

आय समर्थन का तदर्थवाद सुधारों का शोकगीत है.

1. सरकारें अर्थव्यवस्था में ढांचागत बदलाव और बाजार के विस्तार के जरिये आय बढ़ाने के लिए मेहनत नहीं करना चाहतीं.

2. वे सामाजिक कार्यक्रम में सुधार नहीं सिर्फ वोट खरीदना चाहती हैं.

3. सरकारी खैरातेंइसे बांटने वाले तंत्र को लूट के लिए प्रेरित करती हैं. तमाम स्कीमें इसका उदाहरण हैं. 

सुधारों के ढाई दशक के दौरान भारत में केंद्र की राजकोषीय सेहत कमोबेश संतुलित रही है. यह पहला मौका है जब वित्तीय तंत्र में कर्ज इतने बड़े पैमाने पर एकत्र हुआ है. केंद्र का कर्ज-जीडीपी अनुपात 70 फीसदी की ऊंचाई पर है. राज्यों की कुल देनदारियों में बाजार कर्ज का 74 फीसदी हिस्सा है. बैंकों और एनबीएफसी के कर्ज इससे अलग हैं. 2022 में केंद्र सरकार की सबसे बड़ी कर्ज अदायगी शुरू हो जाएगी.

रेटिंग एजेंसियां के पास आंकड़े मौजूद हैं. भारत की कर्ज साख को झटका लगा तो अगले छह माह के भीतर ही भारत में कर्ज संकट के अलार्म बज उठेंगे.

Sunday, February 3, 2019

मर्ज और दवा



चुनाव से 60 दिन पहले सरकारें बजट पेश नहीं करतींहिसाब देती हैं. अंतरिम बजट (तीन महीने के खर्च) की घोषणाओं की फाइलें जब तक बनेंगीतब तक तो चुनावी मैदान में धूल के गुबार उठने लगेंगे. 

मौजूदा सरकार के आखिरी महीनों में अर्थव्यवस्था के दो चेहरे हैं: एक में गुलाबी सात-आठ फीसदी की विकास दर दिखती है और दूसरी में खुली आंखों महसूस होती45 साल में सबसे ज्यादा बेकारी और बैंकों की बढ़ती मुसीबत.

तो क्या बजटों ने पैर की बीमारी के लिए बालों का इलाज किया है या कि अर्थव्यवस्था की बुनियादी बीमारियां ही बिसारने के लिए कुछ नए डमरू बजा दिएरोजगार के आंकड़ों को लेकर सरकार में मार मची है.

2014 में विशुद्ध आर्थिक गवर्नेंस या बजट के नजरिये सेसरकार को दो सबसे बड़ी चुनौतियों का हल निकालना था. बाकी अपने आप सुधरना था क्योंकि अर्थव्यवस्था का 88 फीसदी हिस्सा गैर सरकारी खर्च और निवेश पर चलता है.

ये कहां आ गए हम

सरकारों को आर्थिक बीमारियां पकडऩे के लिए वैद्य जैसा होना चाहिए. बात फरवरी 2015 की है जब पहली बार थोक कीमतों के सूचकांक ने रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की थी. भारत में आम तौर पर कीमतें नहीं घटतीं. कीमतों में बढ़ोतरी से हलकान रहने वाली अर्थव्यवस्था के लिए यह मांग घटने यानी डिफ्लेशन (लागत से कम कीमत) का पहला संकेत था.



यह मौका था जब मोदी सरकार अपना पहला पूर्ण बजट पेश कर रही थी और ठीक पहले उसने जीडीपी की गणना का फॉर्मूला बदल कर यह ऐलान कर दिया था कि सरकार बदलते ही आठ माह में अर्थव्यवस्था चमक गई है. डिक्रलेशन की मुसीबत से इत्तेफाक रखने वाले दुआएं करने लगे कि यह गिरावट केवल तत्कालीन सस्ते कच्चे तेल की वजह से होनी चाहिए...भारत को कमजोर मांग का रोग न लगे.

अलबत्ता हर माह खपतनिवेश और मांग घटती गई. और बजट कुछ और गाते बजाते रहे. फि र सरकार ने मांग और खपत पर नोटबंदी का बम फोड़ दिया और घटिया जीएसटी ने घेर लिया

2017 के दिसंबर में साल के दूसरे आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने खुद को मंदी और कीमतों में लागत से ज्यादा कमी के लिए चेताया भी था लेकिन बजटों के कान पर जूं नहीं रेंगी.

चुनाव से पहले दालचीनीफलसब्जीअंडे महीनों से मंदी में हैं. समर्थन मूल्य बढऩे के बावजूद रबी की बुआई पिछले साल के मुकाबले घटी है.

महंगाई कम होने के बावजूद निजी खपतबचतपर्सनल लोनमकानों की मांगकहीं भी उत्साह नहीं है. निजी निवेश 14 साल के न्यूनतम स्तर पर है. लेकिन सरकार माथे पर बंदूक टिकाकर यह स्वीकार करा रही है कि पिछले पांच साल में देश की विकास दर रिकॉर्ड रही है. 

दरार पर दरार

दूसरी बड़ी चुनौती थे बैंकजो बकाया कर्ज में दबे थे और मंदी की मारी कंपनियां कर्ज चुकाने में असमर्थ थीं. पहले बीमार बैंकों पर थोपी गई जनधनफिर निकला इंद्रधनुष (बैंक सुधार स्कीम) जो जल्द ही गुम हो गया. फिर बना एक बैंकिंग बोर्ड जो बीच में ही दम तोड़ गया. बैंकरप्टसी कानून के तहत आई ज्यादातर कंपनियां या तो बंद हुईं या फिर बैंकों ने खासी पूंजी गंवाई. अलबत्ता बैंकों का एनपीए (बकाया कर्ज) बढ़ता रहा.

चुनाव के करीब सरकार ने रंग बदला. बैंकों को एनपीए के इलाज में ढील के लिए रिजर्व बैंक पर दबाव बनाया और गवर्नर को जाना पड़ा. फिर छोटी कंपनियों को कर्ज पुनर्गठन करने की छूट मिल गई.

बैंकों का एनपीए 2014 में 2.24 लाख करोड़ रु. थे जो अब 9.5 लाख करोड़ रु. पर पहुंच गए हैं. जुलाई-सितंबर2018-19 में  सरकारी बैंकों का घाटा 14,716 करोड़ रु. के रिकॉर्ड स्तर पर था.  

बकाया कर्ज की बीमारी अब गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों तक फैल गई है. रिजर्व बैंक ने दिसंबर2018 में अपनी फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट में बताया कि वित्तीय तंत्र (बैंकों व बॉन्ड बाजार) से करीब 7.46 लाख करोड़ रु. के कर्ज के साथ ये कंपनियां वित्तीय तंत्र की सबसे बड़ी कर्जदार हैं और अब कंपनियों का पूंजी-कर्ज अनुपात खतरनाक स्तर तक गिर गया है.

इन दो चुनौतियों पर ताजा आंकड़ों की रोशनी में पिछले पांच बजटों का बहीखाता पढ़ जाइए. आपको महसूस होगा कि चुनावी सियासत ने संसदीय लोकतंत्र की सबसे गंभीर आर्थिक नीति यानी बजट को ऐसी सियासी शोशेबाजी में बदल दिया है जिसका जमीनी आर्थिक चुनौतियों से कोई रिश्ता ही नहीं है.

Tuesday, January 29, 2019

गरीबी की पहेली



यदि सरकारों से आप सुविचारिततर्कसंगत और लक्ष्यबद्ध होने की उम्मीद करते हैं तो अपना माथा ठोंक लीजिये...नोटबंदी और सरकारी नौकरियों तथा शिक्षण संस्थाओं में गरीबों को आरक्षण में समानता को पकडिय़ेआपको सरकार पर फिदा होना पड़ेगा.

नोटबंदी में सरकार को यह पता नहीं था कि उसे इस आर्थिक भूकंप से हासिल क्या करना है. नोटबंदी से पहले सरकार के पास देश में काले धन के आंकड़े नहीं थे और नए आरक्षण के बाद देश के गरीबों को यह पता नहीं कि उन्हें इससे कैसे और क्या मिलेगा क्योंकि सरकार ने गरीबी यानी कमाई को नापने-जोखने या गरीबों को पहचानने की योजना ही मुल्तवी कर दी.

सियासत आत्‍मघाती तौर पर तदर्थवादी है इसलिए गरीबी कम करने की योजनायें अमीरों को और अमीर करती हैं. चुनाव से पहले किसी को गरीबों के लिए न्‍यूनतम आय (मिनिमम बेसिक इनकम) की याद भी आ गई. लेकिन वे गरीब कौन से होंगे जिन्‍हें यह खैरात मिलेगी?

गरीबी की पैमाइश का ताजा किस्सा बेहद दिलचस्प है

हुआ यह कि मार्च2015 में सरकार ने नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष अरविंद पानगडिय़ा की अगुआई में 14 सदस्यीय दल बनाया जिसे 31 अगस्त2015 तक गरीबी की नई परिभाषा तय करनी थी और गरीबी कम करने की रणनीति बनानी थी. कार्यकाल विस्तार के बाद जून2017 में इसकी रिपोर्ट प्रधानमंत्री तक आ गईतब तक गरीबों को आरक्षण देने का सरकार का कोई इरादा न था और गरीबी या लोगों की आय नाप-जोख को गैर जरूरी मान लिया गया था.

इस रपट का आधार बने एक अध्ययन (यह पंक्तियां लिखे जाने तक नीति आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध) के मुताबिक...

- 2009 में सुरेश तेंदुलकर समिति ने गरीबी मापने के फार्मूले (खपत खर्च बनाम कमाई) को नए सिरे से तय कियाजिसके तहत पांच लोगों के ग्रामीण परिवार में प्रतिमाह 4,080 रुपए और शहरों में 5,000 रुपए से कम कमाई वाले लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं. रंगराजन समिति ने इसे संशोधित किया था लेकिन उससे गरीबी और ज्यादा बढ़ी हुई नजर आने लगी. इसलिएबकौल नीति आयोगसुरेश तेंदुलकर की गणना ही आधिकारिक गरीबी रेखा है. हालांकि इसमें कई खामियां हैं.

- मोदी सरकार ने सरकारी स्कीमों (उज्ज्वलाबिजलीशौचालय) के लाभार्थियों की पहचान के लिए 2011 के सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण का इस्तेमाल शुरू किया. हालांकि यह सर्वे केवल ग्रामीण आबादी के लिए है और इसमें परिवारों की पूरी आय या खर्च की गणना नहीं की जाती.

- नीति आयोग ने इस विकल्प को भी टटोला कि गरीबी की रेखा तय करने के बजाय देश की सबसे निर्धन 30 फीसदी आबादी की जिंदगी में बेहतरी पर नजर रखकर गरीबी में कमी मापी जाए जैसा कि विश्व बैंक ने हाल में किया है

- अंततः यह कहते हुए कि गरीबी की रेखा तय करने का मकसद गरीबी में कमी को नापना है न कि गरीबों की पहचान के लिए किसी फार्मूले की जरूरत नहीं है...नीति आयोग ने (बकौल दस्तावेज) गरीबों की पहचान की कोशिश को छोड़ दिया और सरकारी स्कीमों के असर पर मुखातिब हो गया.
आर्थिक आरक्षण से पहले सूरते हाल यह है

गरीबी की कोई एक पैमाइश या पहचान नहीं है. सरकार इसे जानबूझ कर भ्रम में रखना चाहती है.

·  तेंदुलकर का फार्मूला (बीपीएल को राशन) और 2011 के सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण (अन्य स्कीमें) दोनों ही आजमाये जा रहे हैं.

·  सरकारों की हाउसिंग स्कीमों के तहत 3 लाख रु. की सीमा वालों को कमजोर आर्थिक वर्ग और 3 से लाख वालों को निम्न आय वर्ग मानने का पैमाना भी चल रहा है.

·  इस बीच आर्थिक आरक्षण में 8 लाख रु. तक की सालाना कमाई वाले लोग शामिल होंगे जबकि उन्हीं के परिवार में पांच लाख रु. सालाना कमाई वाले लोग इनकम टैक्स दे रहे होंगे.



यानी कि राजा जिसे माने वही गरीब. इसलिए इस समय देश में दो तरह के गरीब हैं

एक—वे जो सच में निर्धन हैं

दूसरे—वे जिन्हें राजनीति की रोशनी में गरीब पहचाना जाएगा

सरकारें तो जन्मना सहस्रबाहु हैंबशर्ते वे कुछ करना तो चाहें. जब वे कुछ करना नहीं चाहतीं तो उनके हजार हाथ सच छिपानेभरमाने और बरगलाने में लग जाते हैं. इस काले जादू का अचूक मंतर हैं आंकड़े. संख्याएं गढ़ कर भरमाया जा सकता है. आंकड़े छिपा कर सच अंधरे में रखा जा सकता है या आंकड़ों की जरूरत ही खत्म करते हुए तथ्यतर्क और पारदर्शिता के स्मारक बनाए जा सकते हैं.

हालांकि सोलह लोकसभाएं बना चुके भारत के लोग भी अब शायद यह समझने लगे हैं: वे सरकार से झूठ बोलते हैं तो वह अपराध है पर  सरकारें या राजनीतिक दल लोगों से झूठ बोले तो...बस सियासत.

Sunday, January 20, 2019

नया समीकरण


जब किसी देश के लोग चुनाव दर चुनाव समझदार और स्मार्ट होते जाते हैं तो क्या वहां की सियासत उतनी ही बदहवास व दकियानूस होने लगती है!

2019 में जनता और नेताओं के बीच एक नया समीकरण बन रहा है. एक तरफ होंगे वे वोटर जो अपनी जिंदगी देखकर वोट देने लगे हैं और दूसरी तरफ हैं नेता जिनकी सियासत और पीछे खिसक गई है.

मोदी सरकार पूरे पांच साल अपनी मनरेगा के आविष्कार में जुटी रही, जिसके जरिए 2009 जैसा करिश्मा किया जा सके. वह भूल गई कि यूपीए की दूसरी जीत मनरेगा नहीं बल्कि 2005-08 के बीच गांव और शहरी अर्थव्यवस्था में तेज वृद्धि से निकली थी. मनरेगा ने तो आय बढ़ाने में मदद की थी. 

भाजपा अब चंद ऐसी स्कीमों (जन धन, स्वास्थ्य, बीमा, गांवों में बिजली) को करामाती बताकर चुनाव में उतरने वाली हैं जिन्हें बार-बार आजमाया गया पर नतीजे नहीं बदलते.

सरकार में 29 लाख पद खाली हैं, भर्ती करने के संसाधन नहीं हैं और आर्थिक आधार पर सरकारी नौकरियों में आरक्षण के गुब्बारे उड़ा दिए गए.
दूसरी तरफ विपक्ष के बीच गठबंधनों का वही लेन देन, अंकगणित का खेल. खजाना लुटाने के वादे और कर्ज माफी की राजनीति.

चुनावों की तैयारी में जुटे सत्ता पक्ष और विपक्ष के संवादों में भयानक भविष्यहीनता है. लगता है इनकी निगाहें एक अंधेरी सुरंग में फिट कर दी गईं, जिसके छोर पर सिर्फ चुनाव दिखते हैं और कुछ नहीं. राजनैतिक दल पिछले दशक में जिस तरह वादे करते थे जैसी स्कीमें गढ़ते थे जैसे अवसरवादी गठजोड़ करते थे, आज भी सब कुछ वैसा ही है.

जबकि मतदाता कहीं ज्यादा समझदार हो चले हैं.

नेता हमेशा मुगालते में रहते हैं कि वोटर भावनाओं, करिश्माई नेता और विभाजक सियासत पर रीझ जाता है. लेकिन 13 प्रमुख राज्यों में पिछले तीन लोकसभा चुनावों और इस दौरान हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि राज्यों का जीडीपी यानी आर्थिक विकास दर गांवों में मजदूरी की दर में कमी या बढ़ोतरी मतदान के फैसलों में निर्णायक रही है.

2004 और 2018 के बीच जिन राज्यों में आर्थिक विकास दर या मजदूरी बढ़ी वहां सत्तारुढ़ दलों को ज्यादा वोट मिले और विकास दर कम होने पर उलटा हुआ. यही वजह है कि 2018 के पहले चुनाव चक्रों में उन राज्यों (केंद्र में भी) में सरकारों को दोबारा मौका मिला जिनकी विकास दर ठीक थी.

शहरी मध्य वर्ग ही राजनैतिक बहसों का मिजाज तय करता है. भारत का मध्यम वर्ग लगातार बढ़ रहा है. अब इसमें 60 से 70 करोड़ लोग (द लोकल इंपैक्ट ऑफ ग्लोबलाइजेशन इन साउथ ऐंड साउथईस्ट एशिया) शामिल हैं जिनमें शहरों के छोटे हुनरमंद कामगार भी हैं.

पिछले दो दशकों में यह पहला मौका है जब भारत में मध्य वर्ग के लिए रोजगार, कमाई, खपत और बचत एक साथ बुरी तरह गिरे हैं. गुजरात तक, जो शहरी मध्य वर्ग सत्तारुढ़ भाजपा के साथ था वह बाद के चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के हक में आ गया.

25 साल के आर्थिक उदारीकरण में देश भली तरह से तीन बातें समझ गया है जो नेता नहीं समझ सके.
एक: बाजार जितना बड़ा और सरकार जितनी छोटी होगी रोजगार उतने ही बढ़ेंगे
दो: सरकार का खर्च रोजगार और कमाई का विकल्प नहीं है. सरकार अगर ईमानदार है तो वह हद से हद कमाई के अवसर बढ़ा सकती है
तीन: सरकारी स्कीमें केवल संकटों में मदद कर सकती हैं और सुविधा बढ़ा सकती हैं बशर्ते सरकारों के काम करने के तरीकों में तब्दीली आए.  

गौर से देखिए, चुनाव से पहले भारत की राजनीति हमें क्या थमा रही है: आरक्षण, गठबंधन और आजमाई जा चुकी स्कीमें.

पश्चिम के देश चुनावों से अच्छी सरकारें न निकलने को लेकर फिक्रमंद हो रहे हैं. उनको लगता है कि मतदाता सही फैसला नहीं कर पाते क्रिस्टोफर एचेन और लैरी बार्टेल्स की ताजा पुस्तक डेमोक्रेसी फॉर रियलिस्ट्सव्हाई इलेक्शसन्स डू नॉट प्रोड्यूस रिस्पांसिव गवर्नेमेंट खासी चर्चा में रही है जो बताती है कि चुनावों में मतदाता विभाजक राजनीति में बह जाते हैं लेकिन भारत के चुनाव नतीजे बार-बार इस बात की ताकीद करते हैं कि यहां के भोले मतदाता यूरोप और अमेरिका के वोटरों से कहीं ज्यादा समझदार हैं.

भारत पर जैसी जनता, वैसे नेता की कहावत हमेशा गलत साबित होती रही है. यह संयोग है या दुर्योग लेकिन 2019 में पहले से कहीं ज्यादा सयाना मतदाता, पहले से कहीं ज्यादा पिछड़ी राजनीति के सामने होगा. हमें जैसी राजनीति मिल रही है, हम उससे कहीं ज्यादा बेहतर नेताओं के हकदार हैं.


Saturday, January 12, 2019

खुशी से मर न जाते...


''मूर्ख बनने के दो तरीके हैं—एक जो सच नहीं है उस पर विश्वास किया जाए और दूसरा जो सच है उस पर विश्वास न किया जाए.''—सोरेन कीर्केगार्ड

नेता हमेशा इस खास आत्मविश्वास से भरे होते हैं कि लोगों को मूर्ख बनाया जा सकता है. वे जनता के बार-बार इनकारअस्वीकार और दुत्कार के बावजूद काठ की हांडियों के प्रयोग नहीं छोड़ते. बेचारे हैं वे  क्योंकि शायद इसके अलावा करने के लिए उनके पास कुछ नहीं होता.

सरकारी नौकरियों में आरक्षण (अब आर्थिक आधार पर सवर्णों के लिए) एक ऐसा फरेब है जिसे सियासत जितनी शिद्दत के साथ बार-बार रचती है, हकीकत उससे कई गुना गंभीरता के साथ उसे ध्वस्त कर देती है.

- देश में कुल 2.15 करोड़ सरकारी (केंद्र व राज्य)  स्थायी कर्मचारी हैं. इनमें करीब 90 फीसद पद ग्रुप सी व डी के हैं जो सरकारी नौकरियों में सबसे निचले वेतन वर्ग हैं.

- हर साल करीब एक करोड़ लोग (कुशलअकुशलशिक्षित) रोजगार की कतार में बढ़ जाते हैं. सरकार में सेवानिवृत्ति व नए पदों के सृजन को मिलाकर इतनी नौकरियां पांच साल में भी नहीं बनतीं जितने लोग रोजगार बाजार में हर छह माह में शामिल हो जाते हैं. केंद्र सरकार में रेलवेसेना और बैंक बड़े नियोजक हैं लेकिन इनमें किसी में सालाना नई नौकरियों की संख्या इतनी भी नहीं है कि वह 10 फीसद आवेदनों को भी जगह दे सके.
सरकारी नौकरी का सबसे बड़ा आकर्षण क्या हैस्थायित्व और पेंशन! सरकार पुरानी पेंशन स्कीम (रिटायरमेंट के वक्त वेतन की आधी तनख्वाह) बंद कर चुकी है. नए कर्मचारी अब जितना बचाएंगेउतनी पेंशन पाएंगेजो कोई भी पेंशन निवेशक करता है.

- पिछले दो वेतन आयोगों के बाद सरकारों के वेतन बजट बुरी तरह बिगड़ चुके हैं. अब ज्यादातर भर्तियां संविदा (ठेका) और अस्थायी पदों पर हो रही हैं ताकि पेंशन का बोझ न हो और वेतन सीमित रहे. जीएसटी और कर्ज माफी के बाद सरकारों के पास अब खुद को चलाने के संसाधन और कम होते जाने हैं.

- सरकार में 29 लाख पद खाली हैं जिन्‍हें भरने पर 1.27 लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे. सरकार का वेतन बिल 71 फीसदी और राजकोषीय घाटा 21 फीसदी बढ़ जाएगा 

- आरक्षण का पूरा तमाशा सालाना बमुश्किल कुछ हजार सरकारी नौकरियों को लेकर है जिसमें आरक्षित पद और भी कम होंगे.

आरक्षण के गुब्बारे सिर्फ भरमाने के लिए ही नहीं बल्कि कुछ छिपाने के लिए भी छोड़े जा रहे हैं.

देश में रोजगारों का ताजा सच सरकारों की भव्य विफलता का खुला हुआ घाव है. आरक्षण की सियासत पर रीझने से पहले इस पर एक नजर जरूरी है. वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम और आर्थिक समीक्षा 2015-16 के मुताबिकनौकरीपेशा लोगों की कुल संख्या केवल 4.9 करोड़ है और इनमें 94 फीसद लोग असंगठित क्षेत्र में नियोजित हैं.

- नेशनल सैंपल सर्वे का 2011 सर्वे सबसे ताजा और रोजगारों का सबसे अधिकृत आंकड़ा है. इसके निष्कर्षों पर सरकार बात नहीं करना चाहती.
भारी-भरकम निवेश मेलेउद्योगों से गलबहियांसरकारी खर्च के दावे याद हैं! सर्वे बताता है कि पूरे देश में फैक्टरी रोजगार तेजी से घट रहे हैं क्योंकि मझोले आकार की फर्म में रोजगार कम हुए हैं.

- ज्यादातर नियमित गैर खेती रोजगार देश के दक्षिण और पश्चिम के चुनिंदा जिलों में केंद्रित हैं. पिछले डेढ़ दशक में अन्य जिलों में गैर खेती रोजगार कम हुए हैं.

- मुंबईपुणेदिल्लीहैदराबादचेन्नैकोलकातातिरुपुरहावड़ादमनसूरत जैसे कुछ जिलों को छोड़ देश के अधिकांश जिलों में फैक्टरी रोजगार नगण्य है. सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों (उत्तर प्रदेशमध्य प्रदेशबंगाल) में नियमित रोजगार लगातार घट रहे हैं.

- खेती सबसे बड़ी जीविका हैजिसमें पिछले चार साल से आय और मजदूरी स्थिर है.

- 2017 की सरकारी आर्थिक समीक्षा ने रेलवे के आंकड़ों की मदद से बताया कि राज्यों और जिलों के बीच प्रवास अब दोगुना हो कर सालाना 90 लाख लोगों तक पहुंच गया है.

- और सीएमआइई का सबसे ताजा आंकड़ा कि दिसंबर 2018 में भारत में बेकारी की दर पंद्रह माह के सबसे ऊंचे मुकाम 7.4 फीसदी पर पहुंच गई.

सरकारें रोजगार नहीं दे सकतींयह बात हमेशा से उतनी ही सच है जितना सच यह तथ्य कि पिछले दो दशक में अधिकांश नए रोजगार बाजार और आर्थिक विकास दर से आए हैं. सरकार केवल रोजगार का माहौल बना सकती है.

इससे पहले कि वे काठ की हांडी में सरकारी नौकरियों की हवाई खिचड़ी लेकर हमारे पास पहुंचेंहकीकत हमारे सामने है; हम भोले हो सकते हैंमगर मूर्ख नहीं. 

तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूट जाना
कि खुशी से मर न जाते अगर एतबार होता- गालिब