Saturday, March 14, 2020

गठरी में लागा चोर


अगर आप यस बैंक के उन अभागे जमाकर्ताओं में हैं जिनकी करीब 2.09 लाख करोड़ रुपए की बचत, भारत के चौथे सबसे बड़े निजी बैंक की बदहाली में फंस गई है तो वजह यह है कि हम सो रहे थे, सरकार नहीं. वह तो इस घोटाले की हिफाजत कर रफ्तार दे रही थी.

यस बैंक पर बीते साल रिजर्व बैंक ने दो बार पेनाल्टी लगाई, बाजार ने बैंक को पूंजी देने से मना कर दिया, फिर भी यह बैंक डिपॉजिट कैसे लेता रहा?

बीते साल मई में रिजर्व बैंक ने अपने एक पूर्व डिप्टी गवर्नर आर. गांधी को यस बैंक के निदेशक मंडल में तैनात किया था. उन्हें बैंक में राणा कपूर के वे धतकरम क्यों नजर नहीं आए जिन्हें आज प्रवर्तन निदेशालय की बहादुरी बताकर गाया-बजाया जा रहा है ?

बैंक निदेशकों पर इनसाइडर ट्रेडिंग का आरोप था, रेटिंग एजेंसियां साख गिरा चुकी थीं. फिर भी सेबी की नाक के नीचे म्युचुअल फंड, इसके शेयर या बॉन्ड में निवेश क्यों करते रहे?

पिछले चार साल में कर्ज और खराब कॉर्पोरेट गवर्नेंस के कारण डूबी हर बड़ी कंपनी (जेट एयरवेज, अनिल अंबानी, देवान हाउसिंग, आइएलऐंडएफएस, सीजी पावर, कॉक्स ऐंड किंग) से रिश्तों के बावजूद यस बैंक को सरकार के यूपीआइ (डिजिटल पेमेंट सिस्टम) के बाजार में सबसे बड़ा हिस्सा कैसे मिल गया?

रिजर्व बैंक ने यस बैंक के एटी-1 बॉन्ड्स को कचरा घोषि कर दिया है और इनमें निवेशकों के करीब 10,800 करोड़ रुपए फंस गए हैं. सबसे तगड़ी चोट म्युचुअल फंड को लगेगी यानी छोटे निवेशकों को. मगर यस बैंक तो बीते साल तक खुदरा निवेशकों को भी यही बॉन्ड बेच रहा था, जिस पर बाजार से  महंगा ब्याज दिया जा रहा था!

स्टेट बैंक करीब 1.68 लाख करोड़ रुपए के फंसे हुए कर्ज (31 दिसंबर को खत्म तिमाही) में दबा है, यस बैंक में 20,000 करोड़ रुपए डालने के बाद उसकी क्या हालत होगी? स्टेट बैंक को 2019 के वित्त वर्ष में रिजर्व बैंक ने करीब 11,000 करोड़ रुपए के बकाया कर्ज को छिपाने के मामले में पकड़ा और बैंक को 6,968 करोड़ रुपए का घाटा हुआ.

एलआइसी के 21,624 करोड़ रुपए पचा कर भी आइडीबीआइ बैंक नहीं उबरा. स्टेट बैंक एलआइसी की कृपा जब तक असर करेगी तब तक यस बैंक के जमाकर्ता भाग चुके होंगे और तब इस मुर्दा बैंक का बोझ उद्धारक बैंकों के जमाकर्ता उठाएंगे या करदाताओं का पैसा सरकारी बैंकों की पूंजी में डाला जाएगा.

अगर आपको यह सब पता होता तो क्या यस बैंक में पैसा रखते? मुसीबत यही है कि बैंक हमारे बारे में जितना जानते हैं हम अपने बैंक के बारे में उसका दस फीसद भी नहीं जानते. बैंक यानी भरोसे पर, हमने कुछ इतना अंधा भरोसा कर लिया है कि हम ठगे जाने को ही देशभक्ति समझ बैठे हैं.
भारतीय बैंकिंग अस्तित्व के संकट में है. बैंकों का कारोबारी मॉडल दरक गया है. नियामक, चोरों के साथ गलबहियां डालते हैं,  हर नई सरकार क्रोनी बैंकिंग का नया मॉडल ईजाद करती है या कर्ज माफिया बांटती है और फिर करदाता के पैसे को डूबते बैंकों में झोंक कर सुधारों की टेर लगाती है.

यह संकट कर्ज लेने वाली कंपनियों पर नहीं, बल्कि अबोध जमाकर्ताओं पर है, यह खेल जिनकी बचत पर हो रहा है. भुगतते हैं वे छोटे निवेशक भी जिनकी बचत म्युचुअल फंड के जरिये इन बैंकों के शेयरों या बॉन्ड में लगाई जाती है. इसलिए...

शक करिए अगर कोई बैंक आपको बाजार से ऊंची ब्याज दर पर बचत या निवेश का लालच देता है. जैसा कि (एटी-1 बॉन्ड) में यस बैंक ने किया. ऐसी किसी भी पेशकश की उम्र लंबी नहीं होती.

बैंकों के लुभावने विज्ञापनों को पढ़ने से ज्यादा संकट की आहट पर कान रखना जरूरी है. आपके लिए यह जानना आवश्यक है कि बैंक ने कर्ज किसे दे रखा है और बकाया कर्ज का उसके कमाई या मुनाफों से क्या रिश्ता है.

भारतीय बैंकिंग जमाकर्ताओं के दम पर चलती है. सरकारें सस्ते कर्ज की बरसात चाहती हैं जो एक सीमा से अधि होने पर बचतों को डुबा देती है.  

आपका म्चयुचुल फंड किस बैंक में पैसा लगा रहा है, इसका पता जरूर रखिए.

याद रखिए, वित्तीय जानकारियों से लैस नागरिक, सरकारों को कभी नहीं भाते क्योंकि वे आंख मूंद कर भरोसा नहीं करते. जितना वक्त हम सियासत को समझने में लगाते हैं, उसका आधा वक्त भी अगर वित्तीय समझ में लगा दें तो यस बैंक जैसी नौबत नहीं आएगी

बैंक के बारे में हर छोटी-बड़ी बात जानना जमाकर्ताओं और निवेशकों का हक है. हम बैंक के बंधुआ नहीं हैं. बैंकों को हमारी जरूरत है. बैंकिंग पारदर्शिता के मौजूदा ढांचे में व्यापक बदलाव तभी आएंगे जब हम सरकारों को सवालों के खौलते पानी में बार-बार डुबाएंगे.

आपकी गाढ़ी कमाई संकट में है. जागिए नहीं तो डूब जाएंगे.


Thursday, March 12, 2020

बीमार की बीमारी


दंगों की आग लगाकर पीडि़तों को  राजनैतिक स्वादानुसार भूनने के बादअगर वक्त मिले तो विभाजक  बहादुरों को भारत में स्वाइन फ्लू केताजा इतिहास पर नजर  डालनी चाहिए ताकि हम समझ सकें कि नोवेल कोराना वायरस हमारा क्या हाल कर सकता है जहां स्वास्थ्य ढांचा ब्राजील और वियतनाम से भी पिछड़ा है.  

स्वाइन फ्लू इक्कीसवीं सदी की पहली घोषि आधुनिक महामारी थीभारत में 2009 से 2019 के बीच स्वाइन फ्लू से 10,614 मौतें हो चुकी हैं और 1.37 लाख लोग बीमार हुएयह तबाही अभी जारी हैस्वास्थ्य विभाग (नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोलका यह आंकड़ा सीमित सूचनाओं पर   आधारित हैअधिकांश इलाज तो नीम हकीमों या निजी डॉक्टरों के पास होता हैकेवल 2019 में ही स्वाइन फ्लू ने करीब 1,000 जिंदगियां (गुजरात और राजस्थान में सबसे ज्यादानिगल लीं. हमने टैक्स निचोड़ने वाली सरकारों से कभी नहीं पूछा कि हम इस तरह मर क्योंरहे हैं?

भारत का बीमार स्वास्थ्य ढांचा जब तक जीवन शैली से जुड़े रोगों (डायबिटीजहाइपरटेंशनकार्डिएकके महंगे इलाजों का रास्ता निकाल पातातब तक वायरल रोगों ने घाव को खोल कर रख दियादुनिया की कथि  महाशक्ति मारक रोगों के नए दौर से मुखाति हैस्वास्थ्य सेवाओं के मामले में195 देशों में जिसका दर्जा 154वां (लांसेट शोधहै.

वायरल बीमारियों से निबटने में भारत का ताजा तजुर्बा हमें कोरोना वायरसको लेकर इसलिए बहुत ज्यादा डराता है क्योंकि...

 वायरल यानी हवा में तैर कर फैलने वाले इन वायरस से पैदा हुई    महामारियों के लिए बेहद सतर्क और चुस्त प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे की  जरूरत है.बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं वाले एशियाई देश भी वायरल रोगों के विस्फोट के सामने कमजोर साबित हुए हैं क्योंकि मरीजों की संख्या  अचानक बढ़ती हैअमेरिका और यूरोप अपने मजबूत प्राथमिक तंत्र के  जरिए फ्लू वैक्सीन के सहारे इनका असर सीमित रखते हैं.

 भारत प्राथमिक सुविधाओं के मामले में पुरातत्व युग में हैस्वाइन फ्लू के सामने मशहूर गुजरात मॉडल बुरी तरह असफल (2010 से 2019 के  बीच करीब 2,000 मौतें. 22,000 से अधि पीडि़तसाबित हुआउत्तर प्रदेश जैसे बीमार अस्पतालों वाले राज्य की बात ही दूर है.


 बुनियादी सुविधाओं के मामले में भारत का प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र जच्चा-बच्चा से आगे नहीं बढ़ सका हैवायरल फ्लू श्वसन तंत्र में संक्रमण करते हैं इसलिए जिला स्तरीय अस्पतालों में त्वरित जांच और कृत्रिम श्वसन प्रणालियों की जरूरत होती हैस्वाइन फ्लू से सैकड़ों मौतों के बाद जांच की सुविधाओं पर निगाह गईइलाज तो अभी भी दूर की कौड़ी हैवैक्सीन महंगीहै और उसका मिलना सहज नहीं है.

 भारत में हर साल करीब 5.5 करोड़ लोग केवल इलाज के कारण गरीब होते हैं (पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया का शोध). इसमें अधिकांश  खर्च प्राथमिक इलाज पर होता है.

 दवाओं की लागत लोगों को सबसे ज्यादा गरीब बनाती हैकोरोना वायरसइस लिहाज से दोहरी मार लेकर आने वाला हैदवाएं आमतौर पर महंगी हैं.कोरोना वायरस के बाद चीन से कच्चे माल की आपूर्ति रुकने से उनकी कीमतें और बढ़ेंगी.

भारत की सरकार सेहत पर  केवल दुनिया में सबसे कम (जीडीपी का  केवल एक फीसदखर्च करती है बल्कि वरीयताएं भी अजीबोगरीब हैं. 70 फीसद ग्रामीण आबादी वाले मुल्क में केवल 25,000 प्राइमरी हेल्थ  सेंटर और 19,000 अस्तपाल हैंजानलेवा वायरल बीमारियों से निबटने के लिए हमें जिनकी सबसे ज्यादा जरूरत हैआयुष्मान भारत हमें कोरोना वायरस से शायद ही बचा सकेयह स्कीम अभीपिछले सरकारी बीमा प्रयोगों की तरह  बीमा कंपनियों और निजी अस्पतालों में लूटजोड़ की चपेट में है.

दिल्ली में जब ‘गोली मारो’ की आवाजें लगाई जा रही थीं तब तक कोरोना वायरस भारत पहुंच चुका था लेकिन जैसे हमारी चिंताओं में स्वाइन फ्लू सेमौतें नहीं हैंठीक उसी तरह सियासत ने हमें एक दूसरे से लड़ने में लगा दियाकोरोना से बचाने में नहीं.

1918 के स्पेनिश फ्लू (करीब 14 लाख मौतेंसे लेकर स्वाइन फ्लू तक,  भारतवायरल रोगों का सबसे बड़ा शिकार रहा हैलेकिन वायरल रोग के  वैक्सीन शोधजांच तंत्र की वरीयताएं तब आती हैं जब मौतें हमें घेर चुकी होती हैंनिजी अस्तपाल भी महंगे इलाजों के लिए तो तैयार हैं लेकिन इन महामारियों के लिए नहीं

जल्द ही भारत के विभि‍न्न शहरों में कोरोना के वायरल बम फटने लगेंगे और तब सरकारें हमें इलाज देने की बजाए यह बताएंगी कि  गर्मी बढ़ने से वायरस कमजोर होगा.  लेकिन फ्लू के पुराने तजुर्बे बताते हैं कि पुराने तजुर्बे बताते हैं कि तभी तो जो स्वाइन फ्लू दुनिया के देशों से होकर गुजरगयावह अब भारत की सालाना  महामारी है.


कोरोना इसका घातक उत्तराधिकारी हो सकता है.