Friday, August 14, 2020

आने वाला कोई तूफान है !

प्रत्येक शांति शुभ नहीं होती! जैसे तूफान से पहले की शांति. बैंक की बोर्ड मीटिंग से निकलते हुए पुराने बैंकर ने यह बात कही और फिर ऑफिस के गलियारों में गुम हो गया. उधर, बैंक के आला अफसर ताजा सुर्खियों के मतलब समझने में जुटे थे.

नीति आयोग ने तीन बैंकों (पंजाब ऐंड सिंध, यूको, बैंक ऑफ महाराष्ट्र) का तत्काल निजीकरण करने को कहा है, जिन्हें कोई बड़ा सरकारी बैंक छूने को तैयार नहीं है इसलिए इन्हें ताजा बैंक महाविलय से अलग रखा गया था

कोविड के दौरान कर्ज का भुगतान टालने से संभावित नुक्सान के बचाव (प्रॉवजिनिंग) में भारत के शीर्ष पांच निजी बैंकों के एक-चौथाई तिमाही मुनाफे गंवाने पड़े

ग्लोबल एजेंसियों को भारत के बैंकों की हालत बद से बदतर होती दि रही है

रिजर्व बैंक से लेकर दिल्ली में नॉर्थ ब्लॉक तक एक बेचैनी पसरी है. ऐसा लगता है कि नियामक, बैंकर और सुर्खियों के सरकारी महारथियों ने भारतीय बैंकों को अंधी सुरंग में फंसा दिया है.

लॉकडाउन के दौरान कर्ज वसूली को छह माह के लिए टाल देने के बाद बैंकों की सांस रुक गई है.

पूरे वित्तीय तंत्र (सरकारी, निजी बैंक, कोऑपरेटिव, एनबीएफसी) में 30 फीसद कर्जदारों ने भुगतान को पीठ दिखाई है. सरकारी बैंकों के 29 फीसद, निजी बैंकों के 22 फीसद, छोटे बैंकों के 79 फीसद, कोऑपरेटिव के 63 फीसद और एनबीएफसी 40 फीसद ग्राहकों ने कर्ज भुगतान से छूट का विकल्प चुना है (केयर रेटिंग्स रिपोर्ट)

कॉर्पोरेट कर्ज के पैमाने पर पूरे वित्तीय तंत्र की 42 फीसद लोन बुक (यानी बांटे गए कर्ज) की वसूली रुक गई. इनमें सरकारी बैंकों के 58 फीसद, एनबीएफसी के 56 फीसद, कोऑपरेटिव के 69 फीसद और निजी बैंकों के 19.6 फीसद कर्ज की वसूली फंस गई है.

नतीजतनः

बैंकों के फंसे हुए कर्ज (8.5 फीसद से बढ़कर 14.7 फीसद) कोविड के बाद 20 साल के सर्वोच्च स्तर पर (रिजर्व बैंक रिपोर्ट) पहुंच सकते हैं. इस बार होम कार लोन चूकने वाले भी बढ़ेंगे. मॉरिटोरियम तिलिस्म के बीच रिजर्व बैंक ने बकाया कर्जों का एक मुश्त (सशर्त) पुनर्गठन की छूट भी दे दी है

नियम के मुताबिक, संभावित नुक्सान से बचाव के लिए बैंकों को लंबित वसूली के 10 फीसद के बराबर की पूंजी रखनी होगी ताकि नुक्सान सीमि किया जा सके. इससे बैंकों को पहली दो तिमाही में 35,000 करोड़ रु. का मुनाफा गंवाना होगा (ब्रिकवर्क रेटिंग)

निजी बैंक भी मुसीबत में हैं. शीर्ष पांच (एचडीएफसी, आइसीआइसीआइ, एक्सिस, कोटक और इंडसइंड) बैंकों ने कोवि से नुक्सान के लिए 8,678 करोड़ रु. अलग की और बीते वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में 45 फीसद मुनाफा गंवा बैठे

फंसे कर्जों का प्रेत एलआइसी की पीठ पर भी बैठ गया है जहां इस मार्च में बीमा निगम के एनपीए कुल कर्ज का 8.17 फीसद हो गए हैं

बैंकों की जान डिपॉजिट में अटकी है. सस्ते कर्ज के जमा पर ब्याज घटने से डिपॉजिट वृद्धि दर जो 2009-16 के बीच 12-17 फीसद के बीच थी अब 10 फीसद के आसपास है. सो, नुक्सान उठाते जमाकर्ता बिदक रहे हैं

गहरी मंदी के बीच कंपनियों की साख जब सबसे ज्यादा खराब है, कर्ज डूबने के खतरे बढ़ रहे हैं तब बैंकों को लोन मेले लगाने को कहा जा रहा है. बैंकों के पास पूंजी घट रही है, मुनाफे टूट रहे  हैं और डिपॉजिट गिर रहे हैं. इसलिए सरकार की गारंटी (छोटे उद्योगों) पर भी बैंक कर्ज बांटने को तैयार नहीं हुए. कर्ज बांटने की रफ्तार 58 साल के न्यूनतम स्तर है

कर्ज अमर है

कर्ज को कभी नींद नहीं आती. रह-रह कर अपनी मौजूदगी का एहसास कराता है. 20 साल के सर्वोच्च एनपीए का मतलब यह है कि बैंकिंग संकट का तूफान क्षितिज पर घुमड़ रहा है. कोवि से पहले बैंक और वित्तीय कंपनियां 9.9 लाख करोड़ रु. के बकाया कर्ज पर बैठे थे. कोवि के दौरान टाले गए कर्जों में केवल 0.05 फीसद कर्ज भी डूबे तो एनपीए 12 लाख करोड़ रु. पर पहुंच जाएंगे और टाले गए 20 फीसद कर्ज डूबे तो एनपीए 20 लाख करोड़ रु. पर पहुंचेंगे.

सरकारी बैंकों के लिए 13 अरब डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रु. और निजी बैंकों के लिए 7 अरब डॉलर यानी करीब 5 लाख करोड़ रु. (क्रेडिट सुइस का आकलन) की पूंजी चाहिए. कहां से आएगी इतनी पूंजी? बड़े बैंकों को बचा भी लिया जाए तो तो छोटे बैंक, कोऑपरेटिव, एनबीएफसी कैसे बचेंगे? उन्हें कौन देगा पूंजी?

सरकारी बैंकों को पूंजी देने के लिए निजीकरण के अलावा सरकार के पास कोई रास्ता नहीं है. इनमें सरकार का हिस्सा बिके तो शायद बाहर की कुछ पूंजी मिलेगी. यही वजह है कि नीति आयोग आनन फानन में तीन बैंकों को बेचने का प्रस्ताव लाया है. क्या सरकार इनमें अपनी हिस्सेदारी बेचेगी? सरकारी फैसलों की खिचड़ी अक्सर देर में पकती है. बैंकों की कमजोर काया बुरी तरह कांप रही है. इस बार देरी हुई तो कुछ बैंक लुढ़क जाएंगे.

 


Friday, August 7, 2020

जागते रहो !

 

घनघोर मंदी के बीच शेयर बाजार की छलांग देखने के बाद एक नवोदित ब्रोकर ने शेयरों-शेयरों का पानी पिए अपने तपे तपाए उस्ताद के केबि‍न में जाकर खि‍लखि‍लाते हुए कहा, '', मजा आ गया, आज तो निफ्टी रॉकेट हुआ जा रहा है.'' उम्रदराज ब्रोकर ने कंप्यूटर से निगाहें हटाकर कहा, ''की फूल हो तुम.'' यानी किस्मती मूर्ख, जो मौके के सहारे मीर (फूल्ड बाई रैंडमनेस) बन जाते हैं और अपनी कामयाबी को तर्कसंगत ज्ञान मान बैठते हैं. सतर्क होकर ट्रेड करो, फंडामेंटल्स और टेक्नि‍कल्स की मर्यादा मत तोड़ना.

यकीनन अर्थव्यवस्था में जि‍तने नकारात्मक आंकडे़ हो सकते हैं वे सब एक साथ बरस रहे हों और अनि‍श्चि‍तता की ब्रह्मपुत्र कारोबारों को अपनी बाढ़ में डुबा रही हो तब शेयर बाजार में जोखि‍मों का भंवर तैयार होने के लिए यह सबसे माकूल मौका है. बाजार हमेशा वास्तविकताओं को कंबल ओढ़ाकर ख्याली तेजी में लग जाता है इसलिए अगर आप बहुत उत्साही हैं तो भी कुछ ताजा तथ्यों को समझना जरूरी है ताकि कम से कम आप अपनी गाढ़ी बचत न जला बैठें.

संयोग है कि बाजार के रंगों को परखने वाले ही नहीं बल्कि रिजर्व बैंक ने भी (फाइनेंशि‍यल स्टेबिलि‍टी रिपोर्ट 2020) अधि‍कृत तौर पर इस बात पर बेचैनी जाहिर की है कि आखि‍र बीते एक माह में सेंसेक्स 3000 अंक कैसे कूद गया जबकि आने वाला हर आकलन यह बता रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर इस पूरे साल में शून्य से 10 फीसद नीचे तक टूट सकती है. 

वित्तीय बाजार अक्सर अति आशावाद का शि‍कार हो कर मौके के मीरी को हकीकत मान लेते हैं. कुछ तथ्य हमें सतर्क करते हैः

• आमतौर पर बॉन्ड, गोल्ड और शेयर मार्केट एक साथ नहीं दौड़ते. शेयरों में तेजी के वक्त पैसा बॉन्ड बाजार से निकल कर शेयरों में जाता है क्योंकि तत्काल फायदे की उम्मीद होती है लेकिन इस समय आर्थिक अनि‍श्चतताओं के बीच जब पूंजी बॉन्ड बाजार में लग रही है. (बॉन्ड की यील्ड कम है यानी ग्राहक खूब हैं) संकट में चमकने वाला सोना भी बढ़ रहा है तो फिर शेयरों में पैसा कौन लगा रहा है?

• लॉकडाउन के बाद कंपनियों के नतीजों की हालत देखते ही बनती है. कभी भी घाटा न उठाने वाली तेल कंपनियां तक एक तिमाही में ४० फीसद का नुक्सान दर्ज कर रही हैं. दरअसल, बाजार में सूचीबद्ध करीब 1,640 प्रमुख कंपनियों (बैंक व एनबीएफसी के अलावा) के मुनाफे बीते बरस की चौथी ति‍माही में करीब 10.2 फीसद गिरे. यह गिरावट कॉर्पोरेट टैक्स में कमी के बावजूद हुई. नए वित्त वर्ष (2020-21) की दो तिमाही पूरी तरह डूबने के बाद बाजार में बड़ी सतर्कता जरूरी है.

• मंदी के कारण कंपनियों के मुनाफे ही नहीं गिरे बल्क‍ि उनके कर्ज देनदारी की भी थम गई. कंपनियों ने बड़े पैमाने कर्ज भुगतान टालने का विकल्प चुना. इससे उनकी साख पर गहरा असर पड़ा है. रिजर्व बैंक ने कंपनियों के खातों को परख कर बताया है कि ज्यादातर कर्जदारों की साख टूट (डबल ए से नीचे) रही है. इसके बाद भी किसका पैसा बाजार में लग रहा है.

• रिलायंस के बाद भारतीय शेयर बाजारों की जान भारत के बैंकिंग उद्योग में बसती है. आत्मनिर्भरता के तमाम मृदंग वादन के बावजूद बैंकों की कर्ज देने की रफ्तार अब तक केवल तीन फीसद रही है जो पिछले दशकों की न्यूनतम है. कोविड लॉकडाउन के बाद कर्ज का भुगतान टालने से बैंकों के पैर लड़खड़ा गए हैं. वहां संकट के बल्ब जल रहे हैं.

• जून में इक्विटी म्युचुअल फंड 95 फीसद कम हुआ यानी कि छोटे निवेशकों की पूंजी भी बाजार से निकल रही है. डेट फंड में तो संकट पहले से ही है.

• अर्थव्यवस्था में मांग की वापसी के दूर-दूर तक कोई सबूत नहीं हैं और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में गहरी अनि‍श्चति‍ता है. इसलिए रिजर्व बैंक को भी यह मंदी लंबी चलने का खतरा नजर आ रहा है.

इस समय भारतीय बाजार में तेजी चुनिंदा शेयरों में सीमित है, जो छोटे निवेशकों को भरमाए रखने के लिए है. रि‍जर्व को डर है यह बाजी पलट सकती है. सनद रहे कि जानवर बनना आदमी का पुराना शौक है. इसीलि‍ए वित्तीय बाजार दुनिया की सबसे दिलचस्प जगह हैं. यहां पूरी भीड़ का दिमाग शहद वाली मक्ख‍ियों की तरह एक तरफ दौड़ पड़ता (स्वार्म इंटेलिजेंस) है, यानी कभी पालकी को उठाने की होड़ तो कभी पटकने की प्रतिस्पर्धा.

बाजार में  रोज  कुछ लकी फूल्स होते हैं बकौल  नसीम तालेब (किताब- फूल्ड बाइ रैंडमनेस) इनको होने वाले 99 फीसद मुनाफे केवल मौके का नतीजा हो सकते हैं. लेकिन वे कारोबारी इसे अक्सर अपनी सफल रणनीति समझ लेते हैं और कइयों को चिपका देते हैं यानी उनकी नकल करते हुए असंख्य लोग मौके के मीर बनने की कोशि‍श करते हैं. इसलिए सतर्क रहिए क्योंकि इस मंदी के बीच, आप अपनी गाढ़ी बचत के साथ एक बार लकी (भाग्यशाली) और सौ बार (फूल) ठगे जाना झेल नहीं पाएंगे.