Monday, April 4, 2016

व्यापार कूटनीति का शून्य


भारत का निर्यात आज अगर 15 माह के न्यूनतम स्तर पर है तो शायद इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि संरक्षणवादी आग्रहों के चलते मोदी सरकार ने मुक्त बाजार समझौतों की रफ्तार तेज नहीं की.

विदेश नीति की सफलता को मापने का क्या कोई ठोस तरीका हो सकता है, ठीक उसी तरह जैसे कि आर्थिक विकास दर को देखकर आर्थिक नीतियों की कामयाबी या नाकामी मापी जाती है? कूटनीतिक संवादों में अमूर्त रणनीतियों का एक बड़ा हिस्सा होता है लेकिन इतनी अमूर्तता तो आर्थिक नीतियों में भी होती है. फिर भी आर्थिक विकास दर से आर्थिक नीतियों के असर का संकेत तो मिल ही जाता है. यदि विदेश नीति के सैद्धांतिक पहलू को निकाल दिया जाए तो विदेश व्यापार यानी निर्यात-आयात प्रदर्शन से किसी सरकार की विदेश नीति की सफलता को नापा जा सकता है, क्योंकि द्विपक्षीय व्यापार और पूंजी की आवाजाही किसी देश के ग्लोबल कूटनीतिक रिश्तों की बुनियाद है. विदेश नीति की सफलता को ठोस ढंग से नापने का फॉर्मूला शायद यह हो सकता है कि किसी सरकार के मातहत विभिन्न देशों के साथ हुए वरीयक (प्रिफ्रेंशियल) व्यापार समझौतों को देखा जाए, क्योंकि जितने अधिक समझौते, उतना अधिक विदेश व्यापार.
 यह फॉर्मूला हमने नहीं, 2015-16 की आर्थिक समीक्षा ने दिया है जो विदेश नीति की सफलता को परखने का एक नया पैमाना सुझाती है. अब जबकि मोदी सरकार के भव्य कूटनीतिक अभियानों की गर्द बैठ चुकी है और भारत का निर्यात अपनी सबसे लंबी मंदी से जूझ रहा है, तब आर्थिक समीक्षा के इस फॉर्मूले की कसौटी पर मोदी सरकार की विदेश नीति सवालों में घिरती नजर आती है.
दरअसल, बीते बरस जब प्रधानमंत्री न्यूयॉर्क, सिडनी या वेम्बले के स्टेडियमों में अनिवासियों से संवाद कर रहे थे, ठीक उसी समय उनकी सरकार के रूढ़िवादी आग्रह भारत के विदेश व्यापार में उदारीकरण की कोशिशों को श्रद्धांजलि दे रहे थे और मुक्त वरीयक व्यापार संधियों को रोक रहे थे जो ताजा अध्ययनों में भारत की व्यापारिक सफलता का आधार बनकर उभरे हैं. एफटीए को लेकर स्वदेशी दबावों और दकियानूसी आग्रहों के चलते सरकार ने पिछले साल अगस्त में यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार संधि (इंडिया-ईयू एफटीए) पर बातचीत रोक दी जिसे आसियान के बाद भारत का सबसे महत्वाकांक्षी एफटीए माना जा रहा है.
 आर्थिक समीक्षा की रोशनी में एफटीए की व्यवस्था के भारत के विदेश व्यापार पर असर की ठोस तथ्यपरक पड़ताल की जा सकती है. इस पड़ताल का एक सूत्रीय निष्कर्ष यह है कि जिन देशों के साथ भारत ने दोतरफा या बहुपक्षीय मुक्त या वरीयक व्यापार समझौते (एफटीए/पीटीए) किए हैं, उनके साथ 2010 से 2014 के बीच कुल व्यापार में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. वजहः एफटीए/पीटीए में शामिल देश दूसरे देश से होने वाले आयात के लिए कस्टम ड्यूटी में कमी करते हैं और व्यापार प्रतिबंधों को सीमित करते हैं जिसका सीधा असर व्यापार में बढ़त के तौर पर सामने आता है.
दुनिया में व्यापार समझौतों को लेकर तीन तरह के मॉडल सक्रिय हैं. पहला वर्ग डब्ल्यूटीओ, ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) जैसी बहुपक्षीय व्यापार संधियों का है. डब्ल्यूटीओ बहुत सफल नहीं रहा जबकि टीपीपी की जमीन अभी तैयार हो रही है. दूसरा वर्ग क्षेत्रीय ट्रेड ब्लॉक आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन), नाफ्टा (उत्तर अमेरिका), ईयू (यूरोपीय समुदाय) का है जो क्षेत्रीय व्यापार बढ़ाने में काफी सफल रहे हैं. तीसरा वर्ग एफटीए का है जो दुनिया में व्यापार और निवेश बढ़ाने का सबसे प्रमुख जरिया बनकर उभरे हैं. इनमें देशों के बीच द्विपक्षीय समझौते और ट्रेड ब्लॉक के साथ समझौते शामिल हैं. इस होड़ में भारत काफी पीछे है.
भारत ने एफटीए की शुरुआत 1970 में इंडिया अफ्रीका ट्रेड एग्रीमेंट के साथ की थी लेकिन 2010 तक केवल 19 एफटीए हो पाए हैं जबकि विश्व में 2004 से लेकर 2014 तक हर साल औसतन 15 एफटीए हुए हैं, बीच के कुछ वर्षों में तो इनकी संख्या 20 और 25 से ऊपर रही है. भारत के ज्यादातर एफटीए एशिया में हैं. एशिया से बाहर दो एफटीए मर्कोसूर (ब्राजील, अर्जेंटीना, उरुग्वे, पैराग्वे, वेनेजुएला) और चिली के साथ हैं.
व्यापार की मात्रा के आधार पर एशिया में भारत के सबसे महत्वपूर्ण एफटीए आसियान, कोरिया और जापान के साथ हैं. आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, इन देशों के साथ एफटीए होने के बाद भारत के व्यापार में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. इन देशों के अलावा जिन अन्य देशों से भारत के एफटीए हैं, उन देशों के साथ एफटीए से पहले, 2007 से 2014 के दौरान भारत के निर्यात की वृद्धि दर 13 फीसदी थी जो एफटीए के बाद 22 फीसदी हो गई जो मुक्त व्यापार समझौतों की सफलता का प्रमाण है.
आसियान के साथ भारत का एफटीए (2010) सबसे सफल माना जाता है. ताजा आंकड़े ताकीद करते हैं कि 2014 तक चार वर्षों में आसियान देशों को भारत का निर्यात 25 फीसदी बढ़ा जो एफटीए से पहले 14 फीसदी था. आयात में बढ़ोतरी 19 फीसदी रही जो एफटीए से पहले 13 फीसदी थी. आसियान की सफलता के बाद भारत यूरोपीय संघ के बीच एफटीए को लेकर उम्मीदें काफी ऊंची थीं क्योंकि यूरोप दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है और भारतीय निर्यात में नई ऊर्जा के लिए इस बाजार में प्रवेश जरूरी है. लेकिन अफसोस कि मोदी सरकार के असमंजस और रूढ़िवादिता के चलते यह महत्वपूर्ण पहल जहां की तहां ठहर गई. नतीजतन इस सप्ताह ब्रसेल्स में ईयू के साथ भारत का शिखर सम्मेलन तो हुआ लेकिन सबसे महत्वपूर्ण एजेंडे यानी एफटीए पर कोई बात नहीं बनी और पूरा आयोजन केवल इवेंट डिप्लोमेसी बनकर रह गया.
यदि आर्थिक समीक्षा सही है तो स्वदेशी पोंगापंथी के दबाव में ईयू एफटीए को रोकना सरकार की गलती है. दरअसल, किसी भी तरह वरीयक व्यापार समझौतों को रोकना या उन पर अपनी तरफ से पहल नहीं करना एक बड़ी कूटनीतिक चूक है जो पिछले दो साल में सरकार ने बार-बार की है. भारत का निर्यात आज अगर 15 माह के न्यूनतम स्तर पर है तो शायद इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि संरक्षणवादी आग्रहों के चलते मोदी सरकार ने मुक्त बाजार समझौतों की रफ्तार तेज नहीं की. प्रधानमंत्री को यह समझना होगा कि किसी भी देश के विदेश व्यापार की सफलता अब प्रिफ्रेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट्स पर निर्भर है और यह एग्रीमेंट कूटनीतिक अभियानों से निकलते हैं. उनके कूटनीतिक अभियानों का जादू इसलिए उतरने लगा है क्योंकि उनकी डिप्लोमेसी में मुक्त और उदार बाजार की चेतना नदारद है.



Monday, March 28, 2016

न सर्विस मिली, न हर्जाना


खराब नेटवर्क को ठीक करने के लिए प्रशासनिकतकनीकी और कानूनीतीनों क्षेत्रों से पहल जरूरी थी जो अभी तक नजर नहीं आई और इस बीच ऑपरेटरों ने मामले को अदालत में फंसा दिया.

पके मोबाइल फोन पर क्या पर्याप्त नेटवर्क है? क्या आपको पूरी डाटा स्पीड मिलती है? क्या आपको मोबाइल कंपनियों ने कॉल ड्रॉप हर्जाना देना शुरू किया है? अगर आपके जवाब में हैं, जाहिर है जो होंगे ही, तो इसके लिए सरकार से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं. दरअसल, हम भारतीय एक अजीब किस्म के विस्मरण के शिकार हैं. हम अक्सर उन सुर्खियों को भूल जाते हैं जो हमें अपने जेहन में छाप कर रखनी चाहिए क्योंकि ऐसा करना नागरिक और उपभोक्ता होने के नाते हमारे हितों के लिए अनिवार्य है. जब हम ही उन्हें भूल जाते हैं तो सरकार के लिए इन्हें भुलाना और भी सुविधाजनक हो जाता है. इसके बदले वह सियासत में हमें भारत माता की जय जैसी बेसबब बहसें पकड़ा देती है जो हमें कहीं नहीं ले जातीं.

पिछले साल अगस्त में एक बड़ी सुर्खी बनी थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टेलीकॉम क्षेत्र की समीक्षा बैठक के दौरान कॉल ड्रॉप पर गहरी नाराजगी जताते हुए इसे अर्जेंटली ठीक करने का निर्देश दिया था. पीएमओ से जारी बयान में कहा गया था कि वॉयस नेटवर्क पर कॉल ड्रॉप की समस्या डाटा नेटवर्क तक नहीं जानी चाहिए. हम इस सुर्खी को भूल गए और ट्विटर, फेसबुक पर और टीवी स्टुडियो में बेजा बहसों में उलझ गए. 
कॉल ड्रॉप की समस्या कमजोर डाटा नेटवर्क तक फैल चुकी है जहां 3जी के नाम पर 2जी की स्पीड भी मुश्किल है. मार्च में आए एक नेटवर्क सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत में कॉल ड्रॉप बढ़कर 4.73 फीसदी पर पहुंच रहे हैं जो टीआरएआइ के मानक दो फीसदी और ग्लोबल मानक तीन फीसदी से भी ऊंचा है. इस बीच मोबाइल कंपनियों ने खराब सर्विस पर उपभोक्ताओं को पैसे वापस करने के नियम को मानने से इनकार करते हुए मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया, जहां कमजोर पैरवी और अजीबोगरीब आदेशों के लिए मशहूर टीआरएआइ, पूरे मामले पर कानूनी व तकनीकी अंतर्विरोधों के चलते अदालत की फटकार सुन रही है. यह पेनाल्टी अमल में आने की संभावना फिलहाल कम ही है.
बीते साल इसी स्तंभ में हमने लिखा था कि मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे विशाल ग्लोबल अभियानों को शुरू करने वाली सरकार के लिए खराब मोबाइल नेटवर्क इतनी बड़ी समस्या नहीं है जिसे संभालने के लिए संसद में सहमति बनानी पड़े. खराब नेटवर्क को ठीक करने के लिए प्रशासनिक, तकनीकी और कानूनी, तीनों क्षेत्रों से पहल जरूरी थी जो अभी तक नजर नहीं आई और इस बीच ऑपरेटरों ने मामले को अदालत में फंसा दिया.
कॉल ड्रॉप के समाधान के संकल्प में सबसे बड़ी कमी ऑपरेटरों पर सख्ती को लेकर नजर आती है. 2014 में स्पेक्ट्रम नीलामी को अपनी सबसे बड़ी सफलता बताते हुए सरकार ने दावा किया था कि दूरसंचार क्षेत्र अब छलांगे लगाएगा, क्योंकि कंपनियों को पर्याप्त स्पेक्ट्रम मिल गया है. कंपनियां स्पेक्ट्रम आपस में बांट सकती हैं और अपने टावर पर दूसरी कंपनी को जगह दे सकती हैं. पर्याप्त स्पेक्ट्रम के बावजूद अगर कॉल ड्रॉप बढ़ रहे हैं तो उसकी वजह यह है कि कंपनियों ने नेटवर्क में निवेश नहीं किया है. जनवरी 2013-मार्च 2015 के बीच वॉयस नेटवर्क का इस्तेमाल 12 फीसदी बढ़ा लेकिन नेटवर्क (बीटीएस) क्षमता में केवल 8 फीसदी का ही इजाफा हुआ. टीआरएआइ के मुताबिक, पिछले दो साल में 3जी पर डाटा नेटवर्क का इस्तेमाल 252 फीसदी बढ़ा लेकिन कंपनियों ने नेटवर्क में केवल 61 फीसदी की बढ़ोतरी की. सरकार चाहती तो नेटवर्क और उपभोक्ताओं की संख्या के बीच सक्चत संतुलन बनाने के नियम तय कर सकती है. ताकि कंपनियां सिर्फ ग्राहक जुटाने की होड़ में ही न लगी रहें बल्कि नेटवर्क में पर्याप्त निवेश के लिए भी बाध्य हों.
टीआरएआइ खुद मान रही है कि टावरों में कमी कॉल ड्रॉप की बड़ी वजह है. मोबाइल कंपनियों के मुताबिक, नेटवर्क को बेहतर करने और कॉल ड्रॉप रोकने के लिए फिलहाल एक लाख टावरों की जरूरत है. इसमें ज्यादातर टावर महानगरों में चाहिए. अगर सरकार गंभीर होती तो राज्यों के सहयोग से छोटे-छोटे टावरों के लिए कुछ गज जमीन या छतें भी जुटाने का काम महज एक प्रशासनिक आदेश से हो सकता था. 
इसके साथ ही कॉल ड्रॉप समाधान के नए तकनीकी प्रयासों की भी जरूरत है. बाजार में ऐसी तकनीकें उपलब्ध हैं जो इमारतों के भीतर मोबाइल एक्सचेंज जैसी प्रणालियां तैयार कर सकती हैं जो बंद परिसरों में स्पेक्ट्रम की कमजोरी का विकल्प हैं. दुनिया के अन्य शहरों में टेलीकॉम नेटवर्क लैंडलाइन और मोबाइल के बीच संतुलन स्थापित करते हैं ताकि स्पेक्ट्रम की खपत सीमित हो सके. सरकार को लैंडलाइन की वापसी और अंतरपरिसर संचार के लिए नई तकनीकों की पहल करनी चाहिए जो मोबाइल नेटवर्क पर दबाव कम करने के लिए अनिवार्य है.
ऑपरेटरों को दंडात्मक प्रावधानों में कसने के लिए मजबूत कानूनी पेशबंदी जरूरी थी. दूरंसचार क्षेत्र में नियामक व ऑपरेटरों के बीच अदालती लड़ाई का लंबा इतिहास ताकीद करता है कि अक्सर नियामक अपनी कमजोर तैयारियों के कारण हार जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने कॉल ड्रॉप पर पेनाल्टी के आदेश को लेकर टीआरएआइ को ही कठघरे में खड़ा किया है. टीआरएआइ ने कॉल ड्रॉप के लिए पेनाल्टी देने का नियम बना दिया तो दूसरी तरफ बीते नवंबर में अपने एक शोध पत्र में यह भी कह दिया कि खराब नेटवर्क के लिए स्पेक्ट्रम की कमी व टावरों की किल्लत जैसे तकनीकी कारण भी जिम्मेदार हैं. ऑपरेटर अब इस तर्क के सहारे सेवा ठीक करने और खराब सेवा पर दंड भरने से बचने की जुगत में हैं.
नेटवर्क कंजेशन भारत के डिजिटल होने की राह में सबसे बड़ी समस्या होने वाला है लेकिन प्रधानमंत्री के दखल के बावजूद, सरकार, कॉल ड्रॉप खत्म करने की लड़ाई लगभग हार चुकी है. संचार मंत्रालय पूरी तरह मोबाइल ऑपरेटरों के रहमोकरम पर है, जो अदालती लड़ाइयों में हमेशा जीतते रहे हैं. सरकार को हार इसलिए मिली क्योंकि इस समस्या को संभालने में अपेक्षित साहस और गंभीरता नजर नहीं आई. आज हमारे पास न अच्छी सर्विस है और न ही उसके खराब होने पर नुक्सान की भरपाई की व्यवस्था. हम बाजार और सरकार, दोनों के हाथों ठगे गए हैं.  

Monday, March 21, 2016

नौकरियों के बाजार में आरक्षण


जातीय आरक्षण की समीक्षा पर सरकार का इनकारदरअसलबीजेपी और संघ के बीच सैद्धांतिक असहमतियों का प्रस्थान बिंदु है


सके लिए राजनैतिक पंडित होने की जरूरत नहीं है कि बिहार के चुनाव में बड़े नुक्सान के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जातीय आरक्षण की समीक्षा की बहस क्यों शुरू की ताज्जुब संघ के डिजाइन पर नहीं बल्कि इस बात पर है कि सरकार ने रेत में सिर धंसा दिया और एक जरूरी बहस की गर्दन संसद के भीतर ही मरोड़ दी जबकि कोई हिम्मती सरकार इसे एक मौका बनाकर सकारात्मक बहस की शुरुआत कर सकती थी. संघ का सुझाव उसके व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक एजेंडे से जुड़ता है, जो विवादित है, लेकिन इसके बाद भी हरियाणा के जाट व गुजरात के पाटीदार आंदोलन की आक्रामकता और समृद्ध तबकों को आरक्षण के लाभ की रोशनी में, कोई भी संघ के तर्क से सहमत होगा कि जातीय आरक्षण की समीक्षा पर चर्चा तो शुरू होनी ही चाहिए. खास तौर पर उस वक्त जब देश के पास ताजा आर्थिक जातीय गणना के आंकड़े मौजूद हैं, जिन पर सरकार चुप्पी साधे बैठी है.
 जातीय आरक्षण में यथास्थिति बनाए रखने के आग्रह हमेशा  ताकतवर रहे हैं, जिनकी वजह से बीजेपी और सरकार को संघ का सुझाव खारिज करना पड़ा. जातीय आरक्षण की समीक्षा पर सरकार का इनकार, दरअसल, बीजेपी और संघ के बीच सैद्धांतिक असहमतियों का प्रस्थान बिंदु है जो संघ के सांस्कृतिक एजेंडे को बीजेपी की राजनीति के रसायन से अलग करता है. आर्थिक व धार्मिक (राम मंदिर) एजेंडे पर ठीक इसी तरह की असहमतियां अटल बिहारी वाजपेयी व संघ के बीच देखी गई थीं.
सरकार भले ही इनकार करे लेकिन आरक्षण की समीक्षा की बहस शुरू हो चुकी है जो जातीय पहचान की नहीं बल्कि रोजगार के बाजार की है. इस तथ्य से कोई इनकार नहीं करेगा कि आरक्षण ने चुनी हुई संस्थाओं (पंचायत से विधायिका तक) और राजनैतिक पदों पर जातीय प्रतिनिधित्व को सफलतापूर्वक संतुलित किया है और इस आरक्षण को जारी रखने में आपत्ति भी नहीं है. आरक्षण की असली जमीनी जद्दोजहद तो सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी को लेकर है. अगर रोजगारों के बाजार को बढ़ाया जाए तो सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बेसिर-पैर की दीवानगी को संभाला जा सकता है.
आरक्षण की बहस के इस गैर-राजनैतिक संदर्भ को समझने के लिए रोजगारों के बाजार को समझना जरूरी है. भारत में रोजगार के भरोसेमंद आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं इसलिए आरक्षण जैसी सुविधाओं के ऐतिहासिक लाभ की पड़ताल मुश्किल है. फिर भी जो आंकड़े (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और आर्थिक समीक्षा 2015-16) मिलते हैं उनके मुताबिक, नौकरीपेशा लोगों की कुल संख्या केवल 4.9 करोड़ है जो 1.28 अरब की आबादी में बेकारी की भयावहता का प्रमाण है. इनमें 94 फीसदी लोग असंगठित क्षेत्र में नियोजित हैं, जबकि केवल चार फीसदी लोग संगठित क्षेत्र में हैं जिसमें सरकारी व निजी, दोनों तरह के रोजगार शामिल हैं. ताजा आर्थिक समीक्षा बताती है कि 2012 में संगठित क्षेत्र में कुल 2.95 करोड़ लोग काम कर रहे थे, जिनमें 1.76 करोड़ लोग सरकारी क्षेत्र में थे. 
सरकारी रोजगारों के इस छोटे से आंकड़े में केंद्र व राज्य की नौकरियां शामिल हैं. केंद्र सरकार में रेलवे, सेना और बैंक सबसे बड़े रोजगार हब हैं लेकिन इनमें किसी की नौकरियों की संख्या इतनी भी नहीं है कि वह 10 फीसदी आवेदनों को भी जगह दे सके. केंद्र सरकार की नौकरियों में करीब 60 फीसदी पद ग्रुप सी और करीब 29 फीसदी पद ग्रुप डी के हैं जो सरकारी नौकरियों में सबसे निचले वेतन वर्ग हैं. सरकारी क्षेत्र की शेष नौकरियां राज्यों में हैं और वहां भी नौकरियों का ढांचा लगभग केंद्र सरकार जैसा है.
इस आंकड़े से यह समझना जरूरी है कि आरक्षण का पूरा संघर्ष, दो करोड़ से भी कम नौकरियों के लिए है जिनमें अधिकांश नौकरियां ग्रुप सी व डी की हैं जिनके कारण वर्षों से इतनी राजनीति हो रही है. गौर तलब है कि सरकारों का आकार कम हो रहा है जिसके साथ ही नौकरियां घटती जानी हैं. आर्थिक समीक्षा बताती है कि सरकारी नौकरियों में बढ़ोतरी की गति एक फीसदी से भी कम है, जबकि संगठित निजी क्षेत्र में नौकरियों के बढऩे की रफ्तार 5.6 फीसदी रही है. लेकिन संगठित (सरकारी व निजी) क्षेत्र केवल छह फीसदी रोजगार देता है इसलिए रोजगार बाजार में इस हिस्से की घट-बढ़ कोई बड़ा फर्क पैदा नहीं करती.
सबसे ज्यादा रोजगार असंगठित क्षेत्र में हैं जिसका ठोस आंकड़ा उपलब्ध नहीं है अलबत्ता इतना जरूर पता है कि असंगठित क्षेत्र जैसे व्यापार व रिटेल, लघु उद्योग, परिवहन, भवन निर्माण, दसियों की तरह की सेवाएं भारत में किसी भी सरकारी तंत्र से ज्यादा रोजगार दे रहे हैं. यह सभी कारोबार भारत के विशाल जीविका तंत्र (लाइवलीहुड नेटवर्क) का हिस्सा हैं जो अपनी ग्रोथ के साथ रोजगार भी पैदा करते हैं.  

नौकरियां बढ़ाने के लिए भारत में विशाल जीविका तंत्र को विस्तृत करना होगा जिसके लिए भारतीय बाजार को और खोलना जरूरी है क्योंकि भारत में नौकरियां या जीविका अंततः निजी क्षेत्र से ही आनी हैं. यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरक्षण की बहस को कायदे से शुरू करना चाहता है तो उसे इस तथ्य पर सहमत होना होगा कि भारत में व्यापक निजीकरण, निवेश और विदेशी निवेश की जरूरत है ताकि रोजगार का बाजार बढ़ सके और मुट्ठीभर सरकारी नौकरियों के आरक्षण की सियासत बंद हो सके, जो अंततः उन तबकों को ही मिलती हैं जो कतार में आगे खड़े हैं. 

Sunday, March 6, 2016

ग्रोथ के सूरमा


2016 के बजट में खेती की गलती सुधारने के साथ ही सेवा क्षेत्र को उम्मीदों का केंद्र बनाना जरुरी था। 

 पिछले कई दशकों में सबसे अधिक युवा स्फूर्ति व अरमानों से चुनी सरकार अपने निर्धारित समय से करीब दो साल पीछे चल रही है. अरुण जेटली ने फरवरी, 2016 में जिस बजट को पेश किया, वह तो जुलाई, 2014 में आना चाहिए था, जब सरकार सत्ता में आई थी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संकट के पहले लक्षण दिखने लगे थे. अलबत्ता उस दौर में तो नरेंद्र मोदी सरकार किसानों को यह समझाने की जिद ठाने बैठी थी कि भूमि अधिग्रहण उनके लिए सुख, वैभव व समृद्धि लेकर आने वाला है. इसलिए बीजेपी ने बिहार में अपनी पूंछ कटने, तीन फसलों की बर्बादी व ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गहरे संकट के पैठ जाने का इंतजार किया और अपने तीसरे बजट को अर्थव्यवस्था की बुनियादी चुनौतियों पर केंद्रित किया.
बहरहाल, अब जबकि देश मोदी सरकार के इस लेट-लतीफ बजट को पचा चुका है . यह देखना बेहतर होगा कि 2016 में दरअसल कैसा बजट चाहिए था और अभी कुछ करने की कितनी उम्मीद कायम है. 
बेहद विपरीत माहौल में भी जीडीपी को सात फीसदी से ऊपर रखने वाले सूरमा तलाशने हों तो वह आपको मुंबई, दिल्ली के शानदार कॉर्पोरेट दफ्तरों में नहीं बल्कि अपने आसपास के बाजार में मिल जाएंगे जो होटल से लेकर रिपेयरिंग तक छोटी-छोटी दर्जनों सेवाएं व सुविधाएं देकर हमारी जिंदगी को आसान करते हैं. यह भारत की वह तीसरी ताकत है जिसने मंदी के बीच तरक्की व रोजगार को आधार देते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था का डीएनए बदल दिया है. मोदी सरकार की उंगली अगर नब्ज पर होती, तो 2016 के बजट में खेती की गलती सुधारने के साथ सेवा क्षेत्र को भविष्य की उम्मीदों का केंद्र बनाना चाहिए था.
कृषि और उद्योग (मैन्युफैक्चरिंग) अब अर्थव्यवस्था में केवल 34 फीसदी हिस्सा रखते हैं. समग्र आर्थिक उत्पादन में 66 फीसदी सेवा क्षेत्र का है, जिसमें देश का विशाल खुदरा व थोक व्यापार, होटल व रेस्तरां, ट्रांसपोर्ट, संचार, स्टोरेज, वित्तीय सेवाएं, कारोबारी सेवाएं, भवन निर्माण व उससे जुड़ी सेवाएं, सामाजिक सेवाएं और सामुदायिक सेवाएं आती हैं. 2015 की आर्थिक समीक्षा बताती है कि केंद्र व राज्यों की आय यानी राजस्व, रोजगार, विदेशी निवेश और भारत से निर्यात में अब ग्रोथ का परचम सर्विसेज क्षेत्र के हाथ में है.
भारत में जब बड़े उद्योगों और कृषि ने निवेश से किनारा कर लिया है, तब केवल सेवा क्षेत्र है जिसमें वैल्यू एडिशन हो रहा है. वैल्यू एडिशन एक आर्थिक पैमाना है जो यह साबित करता है कि किस आर्थिक क्षेत्र में कितना नया निवेश आ रहा है. केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने हाल में ही वैल्यू एडिशन के आंकड़े जारी किए हैं, जिनके मुताबिक, 2014-15 में सेवा क्षेत्र में सकल वैल्यू एडिशन की ग्रोथ दर 7.8 फीसदी से बढ़कर 10.3 फीसदी हो गई. आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, 2014-15 के दौरान देश में जब सामान्य पूंजी निवेश बढऩे की गति केवल 5.6 फीसदी थी, तब सर्विसेज में यह 8.7 फीसदी की दर से बढ़ा. अर्थात् अगर भारत में विशाल सेवा क्षेत्र का इंजन न चल रहा होता तो शायद हम बेहद बुरी हालत में होते. यही वजह है कि भारत में विदेशी निवेश आकर्षित करने वाले क्षेत्रों में सेवा क्षेत्र ऊपर है. आर्थिक समीक्षा के आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 में सेवा क्षेत्र की दस शीर्ष सेवाओं में विदेशी निवेश 70.4 फीसदी बढ़ा. यह रफ्तार 2015-16 में जारी रही है.
सर्विसेज की ग्रोथ भारतीय बाजार के बुनियादी और पारंपरिक हिस्सों से आई है. पिछले साल ट्रेड, रिपेयरिंग, होटल और रेस्तरां, प्रोफेशनल सर्विस, ट्रांसपोर्ट में 8 से 11.5 फीसदी तक ग्रोथ देखी गई. देश के 21 राज्यों के सकल घरेलू उत्पादन में 40 फीसदी हिस्सा सेवाओं का है. जिन राज्यों में औद्योगिक निवेश सीमित है, वहां भी राज्य की अर्थव्यवस्था की इमारत सेवाओं पर टिकी है. अगर इन सेवाओं में ग्रोथ न होती तो शायद केंद्र से ज्यादा बुरी हालत राज्यों की होती जिनके पास राजस्व के स्रोत बेहद सीमित हैं.
यदि रोजगार, खपत, शहरीकरण और ग्रोथ की संभावनाओं के नजरिए से देखा जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था अपना चोला बदल चुकी है. इस बदलाव की रोशनी में बजट कुछ असंगत लगते हैं. यही वजह है कि दो साल की कोशिश के बाद भी मेक इन इंडिया यानी मैन्युफैक्चरिंग ने गति नहीं पकड़ी जबकि जहां गति थी, वहां सरकार ने ध्यान नहीं दिया. उलटे सबसे तेजी से विकसित होते सर्विसेज क्षेत्र पर करों का बोझ अब सबसे ज्यादा है.
सरकार और बजटों की वरीयताओं में यह गलती शायद इसलिए होती है क्योंकि हम ग्रोथ को नापने के पुराने तरीके नहीं बदल पाए. सबसे आधुनिक और व्यावहारिक पैमाना रोजगार में कमी या बढ़ोतरी को नापना है. ग्रोथ या मंदी का दूसरा बड़ा संकेतक खपत में कमी-बेशी होता है. अमेरिका में तरक्की को नापने के लिए शेयर बाजारों और विशेषज्ञों की निगाह जीडीपी के जटिल आंकड़ों पर नहीं बल्कि हर महीने आने वाले रोजगार और खपत के आंकड़ों पर होती है. रोजगार के जरिए ग्रोथ को नापने का तरीका भारत जैसे देश के लिए भी बेहतर है, जहां विशाल युवा आबादी एक तथाकथित डेमोग्राफिक डिविडेंड का चेक लिये घूम रही है, जिसे कोई भुनाने को तैयार नहीं है.
 अगर सरकार ग्रोथ को नापने के तरीकों की नई रोशनी में भारत के ताजा आर्थिक बदलाव को देखती तो शायद हम बजटों को ज्यादा व्यावहारिक, सामयिक व आर्थिक हकीकत के करीब पाते. इस पैमाने पर 2014 का बजट खेती के लिए होना चाहिए था जबकि 2015 के बजट में मेक इन इंडिया जैसे नारे की बजाए उन चुनिंदा उद्योगों पर फोकस हो सकता था जहां ग्रोथ व रोजगार की गुंजाइश है, और यह बजट सेवा क्षेत्र पर फोकस करता जो भारत की नई उद्यमिता का गढ़ है और जिसे नए टैक्स नहीं बल्कि प्रोत्साहन और सुविधाओं की जरूरत है.
2016 का बजट बताता है कि दो साल की उड़ान के बाद, देर से ही सही, सरकार हकीकत की जमीन पर उतर आई है, हालांकि दो बेहद कीमती बजट गंवाए जा चुके हैं लेकिन फिर भी बड़े बदलावों की शुरुआत कभी भी की जा सकती है.



Wednesday, February 24, 2016

तीस बनाम सत्तर




थ्री स्पीड इकोनॉमी एक अजीब तरह की विकलांगता है जिसे संभालने के लिए सूक्ष्म उपायों की जरूरत है.

स्सी के दशक वाली रीगनॉमिक्स के पुरोधा और ट्रिकल डाउन थ्योरी के प्रवर्तक आज के भारत में आ जाएं तो उन्हें शायद एक नई थ्योरी की ईजाद करनी होगी जिसे ट्रिकल अप थ्योरी कहेंगे. ट्रिकल डाउन थ्योरी वाले कहते थे कि समाज के ऊपरी तबके यानी उद्योग-कारोबार को रियायतें देकर मांग बढ़ाई जा सकती है जो निचले तबके तक रोजगार व कमाई पहुंचाएगी. लेकिन इस सिद्धांत के पुरोधाओं को आज के भारत में यह साबित करने में कतई दिक्कत नहीं होगी कि कभी-कभी किसी देश की इकोनॉमी में ग्रोथ ऊपर से नीचे नहीं बल्कि नीचे से ऊपर चल देती है, जहां एक विशाल अर्थव्यवस्था की ग्रोथ इसके सबसे बड़े हिस्सों को छोड़कर मुट्ठी भर धंधों में सिमट जाती है भारतीय अर्थव्यवस्था अब एक थ्री स्पीड इकोनॉमी है, जिसमें तेज ग्रोथ अर्थव्यवस्था के ऊपरी 30 फीसदी हिस्से में रह गई है, जहां ई- कॉमर्स, ट्रैवेल, स्टॉक मार्केट आदि है. उद्योगों वाला दूसरा 30 फीसदी हिस्सा इकाई की ग्रोथ में है और खेती, भवन निर्माण आदि का तीसरा हिस्सा तो पूरी तरह नकारात्मक ग्रोथ में है. यह परिदृश्य देश में पहली बार देखा गया है. जो एक जगह ग्रोथ बनाए रखने, दूसरी जगह बढ़ाने और तीसरी जगह ग्रोथ वापस लाने की बेहद पेचीदा चुनौती लेकर पेश हुआ है. इस चुनौती की रोशनी में 2016 का बजट बड़ा संवेदनशील हो जाता है.
तीन अलग-अलग रफ्तारों वाली अर्थव्यवस्था के इस माहौल को समझना जरूरी है क्योंकि इस परिदृश्य पर अगले एक-दो साल की ग्रोथ, निवेश और रोजगारों का बड़ा दारोमदार है. मुंबई की रिसर्च फर्म एम्बिट कैपिटल का ताजा अध्ययन थ्री स्पीड इकोनॉमी को गहराई से समझने में हमारी मदद करता है. यह अध्ययन जीडीपी में योगदान करने वाले विभिन्न हिस्सों के ग्रोथ के आंकड़ों पर आधारित है. अर्थव्यवस्था में सबसे तेज दौडऩे वाले तीन क्षेत्रों में तेज रफ्तार वाला पहला हिस्सा वह है जिसमें परिवहन (खास तौर पर एविऐशन), होटल, कॉमर्शियल प्रॉपर्टी, ई-कॉमर्स और कारोबारी सेवाएं आती हैं. दो अंकों की गति से दौड़ रहे इस क्षेत्र का जीडीपी में 30 फीसदी हिस्सा है. गौर तलब है कि भले ही भवन निर्माण उद्योग में मंदी हो लेकिन कॉमर्शियल प्रॉपर्टी बिक रही है. ठीक इसी तरह उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार में मंदी के बावजूद ई-कॉमर्स में सक्रियता है. इस तेज दौडऩे वाली अर्थव्यवस्था में वेंचर कैपिटल और पीई फंड के जरिए निवेश आया है. इसके अलावा ऊंची आय वाले निवेशक भी इसमें सक्रिय हैं. इस हिस्से में जल्दी मंदी की उम्मीद भी नहीं है.
मझोली गति वाला दूसरा हिस्सा भी जीडीपी में 30 फीसदी का हिस्सेदार है. एम्बिट का अध्ययन बताता है कि इसमें वाणिज्यिक वाहन यानी ऑटोमोबाइल, मैन्युफैक्टरिंग, आवासीय भवन निर्माण और खनन क्षेत्र आते हैं. इस क्षेत्र में इकाई की गति से मरियल ग्रोथ दर्ज हो रही है. यहां कर्ज में दबी कंपनियां बैलेंसशीट रिसेसशन से जूझ रही हैं, जिसमें कर्ज के कारण नया कॉर्पोरेट निवेश नहीं हो पाता. इसलिए मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के कुछ हिस्सों में मामूली ग्रोथ दिखती है. जैसे पिछली दो तिमाहियों में बंदरगाह परिवहन और रेलवे माल भाड़े की ढुलाई में स्थिरता है जबकि कोयला व बिजली में गिरावट दर्ज की गई है.
शून्य या नकारात्मक ग्रोथ वाला तीसरा हिस्सा खेती, समग्र भवन व इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण, प्रशासनिक सेवाएं व बैंकिंग है. इन सबका जीडीपी में हिस्सा 40 फीसदी है. सरकारी खर्च, सीमेंट, स्टील आदि की मांग व उत्पादन और आय व रोजगारों में वृद्धि के आंकड़े साबित करते हैं कि इन चार क्षेत्रों में हालत सबसे बुरी है. तीन फसलों की बर्बादी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संकट के चलते ग्रामीण मजदूरी की वृद्धि दर 2013-15 के 13.7 फीसदी से घटकर अब -5.5 फीसदी पर आ गई है. बैंकों की हालत बुरी है, मुनाफे गोता खा रहे हैं और कर्ज की मांग पूरी तरह खत्म हो चुकी है. दूसरी तरफ सरकारी खर्च में कटौती के कारण बुनियादी ढांचा निवेश न बढऩे से सीमेंट स्टील की मांग नहीं बढ़ी है. गैर बिके मकानों की भीड़ और प्रॉपर्टी मूल्यों में तेज गिरावट बताती है कि रियल एस्टेट में निवेश का बुलबुला फूट गया है. 
थ्री स्पीड इकोनॉमी ने गवर्नेंस और नीतिगत स्तर पर दो तरह की असंगतियां पैदा की हैं. इसने सरकार को भ्रमित कर दिया है. पिछले दो बजट इसी असमंजस में बीत गए कि दौड़ते को और दौड़ाया जाए, फिर उसके सहारे मंदी दूर की जाए या फिर असली मंदी से सीधे मुठभेड़ की जाए. दूसरी असंगति यह है कि जीडीपी के 30 फीसदी हिस्से में चमक और 70 फीसदी में सुस्ती के कारण अर्थव्यवस्था की सूरते-हाल को बताने वाले आंकड़ों को लेकर गहरी ऊहापोह है.
थ्री स्पीड इकोनॉमी की सबसे व्यावहारिक मुश्किल यह है कि अर्थव्यवस्था के जिस 70 फीसदी हिस्से में सुस्ती या गहरी मंदी छाई है उसमें खेती, भवन निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग आते हैं जो रोजगारों का सबसे बड़े स्रोत हैं. सिर्फ 30 फीसदी अर्थव्यवस्था की चमक 'सूट-बूट की सरकार' जैसी राजनैतिक बहसों को ताकत दे रही और आर्थिक गवर्नेंस को दकियानूसी सब्सिडीवाद की तरफ धकेल रही है जो और बड़ी समस्या है.
इस तीन रफ्तार वाली अर्थव्यवस्था के बाद हमें जीडीपी को खेती, उद्योग, सेवा क्षेत्रों में बांटकर देखना बंद करना चाहिए और उन मिलियन इकोनॉमीज को देखना होगा जो इन तीन बड़े हिस्सों में भीतर छिपी हैं और मंदी, ग्रोथ व रोजगार में नायक व प्रतिनायक की भूमिका निभा रही हैं.
थ्री स्पीड इकोनॉमी एक अजीब तरह की विकलांगता है जिसे संभालने के लिए सूक्ष्म उपायों की जरूरत है. यकीनन इस तरह की आर्थिक चुनौतियों के इलाज एकमुश्त बजटीय रामबाण में नहीं बल्कि छोटे-छोटे उपायों में छिपे हैं जो सरकार से मैक्रो मैनेजमेंट छोड़कर विशेषज्ञों की तरह क्षेत्र विशेष के इलाज की अपेक्षा रखते हैं. अरुण जेटली, हाल के इतिहास में पहले वित्त मंत्री होंगे जो इस तरह की पेचीदा ग्रोथ गणित से मुकाबिल हैं. इस समस्या के समाधान से पहले उन्हें 2016 के बजट में यह साबित करना होगा कि सरकार समस्या को समझ भी पा रही है या नहीं. चलिए, बजट का इंतजार करते हैं.


Wednesday, February 17, 2016

इक्यानवे के फेर में रेलवे



अगर रेलवे कोई कंपनी होती तो निवेशक इससे पूरी तरह किनारा कर चुके होते और इसे बीमार घोषित कर दिया जाता

सुरेश प्रभु क्या रेलवे के लिए मनमोहन सिंह हो सकते  हैं? इक्यानवे वाले मनमोहन सिंह! यह सवाल वित्त मंत्री अरुण जेटली के लिए इसलिए नहीं उठता क्योंकि उनकीट्रेन तो स्टेशन छोड़ चुकी है. अलबत्ता 2016 रेल मंत्री प्रभु का साल हो सकता है.
बजट हमेशा बड़े, महत्वपूर्ण और निर्णायक होते हैं लेकिन सभी बजट हरगिज नहीं. कुछ ही बजटों को 1991 जैसा होने का मौका मिलता है जो कि किसी देश की अर्थव्यवस्था का चेहरा-मोहरा कौन कहे, पूरा डीएनए ही बदल दे. वक्त, मौके और दस्तूर के मुताबिक, सुरेश प्रभु रेलवे के मामले में ठीक वहीं खड़े हैं जहां डॉ. मनमोहन सिंह 1991 में खड़े थे. और रेलवे भी ठीक उसी हाल में है जहां भारतीय अर्थव्यवस्था इक्यानवे में थी. जैसे 1991 में क्रांतिकारी सुधारों पर आगे बढऩे के अलावा कोई रास्ता नहीं था ठीक उसी तरह प्रभु के पास रेलवे को जैसे का तैसा बनाए रखने का विकल्प भी खत्म हो गया है.

1991 में भारत के आर्थिक हालात से आज की रेलवे के हालात की तुलना हमें उसके संकट और प्रभु के लिए अवसर को समझने में मदद कर सकती है. 1991 में भारत प्रतिस्पर्धा रहित, वित्तीय संकट से भरपूर, सरकारी एकाधिकार से लदा-फदा मुल्क था जिसमें नई तकनीक और तेज रफ्तार बदलावों का प्रवेश वॢजत था. इस दकियानूसी ढांचे ने भारत को देशी से लेकर विदेशी मोर्चों तक कई आर्थिक दुष्चक्रों से घेर दिया था. रेलवे ऐसे ही दुष्चक्र का शिकार है.

कुछ आंकड़े जानना जरूरी है. माल भाड़ा और यात्री परिवहन रेलवे का मुख्य कारोबार है. अर्थव्यवस्था में ग्रोथ और लोगों की आय बढऩे के साथ दोनों ही तरह का परिवहन बढ़ रहा है लेकिन परिवहन बाजार में रेलवे का हिस्सा 1990 में 56 फीसदी से घटकर 2012 में 30 फीसदी हो गया. माल भाड़े के बाजार में रेलवे का हिस्सा तीन दशक में 62 से 36 फीसदी और यात्री कारोबार में 28 से घटकर 14 फीसदी रह गया. एक्सिस डायरेक्ट रिसर्च की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रेल प्रति किलोमीटर यात्री परिवहन पर 54 पैसे खर्च करती है और 26 पैसे का राजस्व कमाती है. इसकी तुलना में चीन की रेलवे का राजस्व 63 फीसदी ज्यादा है. रेलवे ने घाटे की भरपाई के लिए लगतार भाड़ा बढ़ाकर माल परिवहन बाजार से खुद को बाहर कर लिया है.
माल ढुलाई और यात्री परिवहन की मांग के बावजूद रेलवे पिछले 20 साल में अपना नेटवर्क नाम को भी नहीं बढ़ा पाई. भारतीय रेल दुनिया की सबसे धीमी रेल है जहां मालगाडिय़ों की औसत स्पीड 25 किमी और यात्री ट्रेनों की गति 70 किमी है. इसकी कुल कमाई का 91 फीसदी हिस्सा वेतन भत्तों, कर्ज पर ब्याज और पुराने तरीके के कामकाज पर खर्च हो जाता है. आधुनिकीकरण के अभाव में इसका पूरा नेटवर्क चरमरा चुका है, जहां दुर्घटनाओं की संख्या विश्व में सबसे ज्यादा है.  
दरअसल, अगर रेलवे कोई कंपनी होती तो निवेशक इससे पूरी तरह किनारा कर चुके होते और इसे बीमार घोषित कर दिया जाता, इसलिए प्रभु के आने तक रेलवे दरअसल कर्ज हासिल करने में भी चूकने लगी थी और फिलहाल भारतीय जीवन बीमा निगम से मिले कर्ज पर चल रही है.
1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधारों की शुरुआत व्यापक पुनर्गठन और कुछ बड़ी परियोजनाओं से हुई थी जिन्हें बनने-बैठने में करीब पांच साल का वक्त लगा था. इस मामले में प्रभु मनमोहन के मुकाबले किस्मत के धनी हैं. उनके पास सुधारों का एजेंडा मौजूद है और यह भी पता है कि किस वरीयताक्रम पर क्या करना है.
रेलवे की सबसे बड़ी तात्कालिक जरूरत इसके नेटवर्क पर भीड़ कम करना है. अगर किसी रेल मंत्री को सचमुच सुधारक साबित होना है तो उसे सब कुछ छोड़कर सिर्फ एक परियोजना पर पूरी ताकत झोंक देनी चाहिए और वह परियोजना है मुंबई को दिल्ली (1,500 किमी) और लुधियाना को कोलकाता (1,800 किमी) से जोडऩे वाला डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी), जो रेलवे से माल परिवहन की पूरी तस्वीर बदल देगा. दोनों कॉरिडोर के लिए क्रमशः 90 और 75 फीसदी भूमि अधिग्रहण पूरा हो चुका है और जापान व विश्व बैंक से मदद मिलना भी तय हो गया.
डीएफसी भले ही माल परिवहन की परियोजना हो लेकिन इसका असली फायदा रेलवे के यात्री परिवहन को मिलेगा. डीएफसी बनते ही मालगाडिय़ों का पूरा नेटवर्क इस कॉरिडोर के हवाले होगा, जिससे रेलवे को अपनी यात्री गाडिय़ों के लिए पटरियां खाली करने, ट्रेनों की गति बढ़ाने और नई ट्रेनें चलाने में मदद मिलेगी. डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर को इस सरकार में वैसे ही वरीयता मिलनी चाहिए थी जैसी कि सड़क परियोजनाओं को वाजपेयी सरकार में मिली थी.
डीएफसी के लिए संसाधनों का जुगाड़ हो रहा है लेकिन रेल के वर्तमान नेटवर्क को इससे ज्यादा संसाधन चाहिए. रेलवे दुनिया की सबसे बड़ी परिवहन कंपनी है, जिसे कर्ज पर चलाना नामुमकिन है. प्रभु अगर सच में साहसी हैं तो यह बजट रेलवे के पुनर्गठन का सबसे माकूल मौका है. जिस तरह 1991 में मनमोहन सिंह ने रुपए को एकमुश्त नियंत्रण मुक्त कर भारत को आधुनिक देशों की श्रेणी में पहुंचा दिया था, ठीक उसी तरह प्रभु रेलवे का पुराना ढांचा ढहाकर इसे एक आधुनिक रेलवे कंपनी बनाने का सफर शुरू कर सकते हैं. एक ऐसी कंपनी जो सही कीमत पर शानदार सेवा देती हो न कि स्कूल और दवाखाने चलाने से लेकर पहिया और धुरा सब कुछ खुद बनाती हो.

रेलवे का पुनर्गठन ही उसे बचाने का जरिया है, जो रेलवे मैन्युफैक्चरिंग के निजीकरण और रेलवे संपत्तियों की बिक्री का रास्ता खोलेगा. इससे रेलवे को संसाधन मिलेंगे ताकि वह अपने नेटवर्क को आधुनिक बना सके.

रेल मंत्री प्रभु चाहें तो किराया, माल भाड़ा बढ़ाकर और कुछ प्रतीकात्मक सुविधाओं का ऐलान करके एक और बजट को जाया कर सकते हैं या फिर सचमुच क्रांतिकारी हो सकते हैं. रेलवे भारत की सबसे बड़ी परिवहन प्रणाली है. सूझ-बूझ और संसाधनों की कमी रेलवे की बदहाली की उतनी बड़ी वजह नहीं है जितना कि राजनैतिक नेतृत्व के असमंजस व दकियानूसीपन. 2016 का रेल बजट सूझ-बूझ पर नहीं, सुरेश प्रभु के साहस के पैमाने पर कसा जाएगा.


Monday, February 8, 2016

सबसे बड़े मिशन का इंतजार


खेती को लेकर पिछले छह दशकों की नसीहतें बताती हैं कि बहुत सारे मोर्चे संभालने की बजाए खेती के लिए एक या दो बड़े समयबद्ध कदम पर्याप्त होंगे. 

बीते सप्ताह प्रधानमंत्री जब फसल बीमा पर मन की बात कह रहे थे तो खेती को जानने-समझने वालों के बीच एक अजीब-सा अनमनापन था. इसलिए नहीं कि सरकारी कोशिशें उत्साह नहीं बढ़ातीं बल्कि इसलिए कि कृषि का राई-रत्ती समझने वाली भारतीय राजनीति खेती को लेकर अभी भी कितनी आकस्मिक है और तीन फसलें बिगडऩे के बाद भी आपदा प्रबंधन की मानसिकता से बाहर नहीं निकल सकी.
पिछले साल खरीफ व रबी की फसल खराब होने और किसान आत्महत्या की खबरों (दिल्ली के जंतर मंतर पर किसान की आत्महत्या) के साथ खेती में गहरे संकट की शुरुआत हो गई थी. मई में इसी स्तंभ में हमने लिखा था कि खेती को लेकर नीतिगत और निवेशगत सुधार शुरू करने के अलावा अब कोई विकल्प नहीं है. अफसोस कि सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के और बिगडऩे का इंतजार किया.
कृषि बीमा की पहल सिर माथे लेकिन अगर खेती की चुनौतियों को वरीयता में रखना हो तो शायद कुछ और ही करना होगा. फसल बीमा जरूरी है और नई स्कीम पिछले प्रयोगों से बेहतर है, फिर भी भारत में फसल बीमा का अर्थशास्त्र, स्कीमों की जटिलताएं और तजुर्बा, इनकी सफलता को लेकर बहुत मुतमइन नहीं करता.
खेती को लेकर पिछले छह दशकों की नसीहतें बताती हैं कि बहुत सारे मोर्चे संभालने की बजाए खेती के लिए एक या दो बड़े समयबद्ध कदम पर्याप्त होंगे. अगर अगला बजट खेती के प्रति संवेदनशील है तो उसे सिंचाई क्षमताओं के निर्माण को मिशन मोड में लाना होगा. सिर्फ 35 फीसदी सिंचित भूमि और दो-तिहाई खेती की बादलों पर निर्भरता वाली खेती बाजार तो छोड़िए, किसान का पेट भरने लायक भी नहीं रहेगी.
बारहवीं योजना के दस्तावेज के मुताबिक, देश में करीब 337 सिंचाई परियोजनाएं लंबित हैं, जिनमें 154 बड़ी, 148 मझोली और 35 विस्तार व आधुनिकीकरण परियोजनाएं हैं. केंद्र सरकार इस बजट से नेशनल इरिगेशन फंड (बारहवीं योजना में प्रस्तावित) बनाकर या समग्र सिंचाई व निर्माण कार्यक्रम लाकर इन परियोजनाओं को समयबद्ध ढंग से पूरा कर सकती है. मनरेगा को सिंचाई निर्माणों से जोड़कर ग्रामीण रोजगार के लक्ष्य भी संयोजित हो सकते हैं. सिंचाई ही दरअसल एक ऐसा क्षेत्र है जहां अभी बड़े निर्माणों की गुंजाइश है. इन निर्माणों से सीमेंट, स्टील, तकनीक व रोजगार की मांग बढ़ाई जा सकती है. 
सरकार के लिए दूसरा मिशन कृषि उत्पादों का घरेलू मुक्त बाजार होना चाहिए. याद कीजिए कि 2014 में सरकार ने राज्यों से मंडी कानून बदलने को कहा था लेकिन विपक्ष को तो छोड़िए, बीजेपी के राज्य भी कानून बदलने को राजी नहीं हुए. कृषि उत्पादों का मुक्त देशी बाजार खेती का संकटमोचक है, इसके बिना 125 करोड़ उपभोक्ताओं की ताकत खेती तक नहीं पहुंच सकती. वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, भारत का खाद्य और किराना कारोबार दुनिया में छठा सबसे बड़ा बाजार है जो 104 फीसदी की ग्रोथ के साथ 2020 तक 482 अरब डॉलर हो जाएगा.
छोटे-छोटे किसानों को मिलाकर बनी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनियां सामूहिक उत्पादन के जरिए छोटी जोतों का समाधान निकाल रही हैं. लोकसभा में 2014 में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 235 फार्मर प्रोड्यूसर कंपनियां पंजीकृत हो चुकी हैं. करीब 4.33 लाख किसान इसका हिस्सा होंगे. ठीक इसी तरह बिहार और मध्य प्रदेश में अनाज व तिलहन की रिकॉर्ड उपज, उत्तर प्रदेश में नई दुग्ध क्रांति, देश के कई हिस्सों में फल-सब्जी उत्पादन के नए कीर्तिमान और गुजरात में लघु सिंचाई क्षेत्रीय सफलताएं हैं.
इन सफलताओं को पूरे देश में कृषि उत्पादों का मुक्त बाजार चाहिए. भारत में मंडी कानून बदलने और एक कॉमन नेशनल एग्री मार्केट बनाने के लिए इससे बेहतर और कोई मौका नहीं हो सकता. केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन 12 राज्यों की सत्ता में मौजूद है. अगर एक दर्जन राज्य अपने मंडी कानून बदल लें तो बाकी राज्यों को राजी करना मुश्किल नहीं होगा.
नेताओं के लिए कृषि बेचारगी और सियासत का जरिया हो लेकिन किसानों की नई पीढ़ी इस तथ्य से वाकिफ है कि 125 करोड़ लोगों का पेट भरना नुक्सान का धंधा नहीं है. नए नजरिए से खेती को देखा जाए तो यह ऐसी आर्थिक गतिविधि बन चुकी है जिसे अपने बाजार की जानकारी है और पिछले एक दशक में उत्पादन (दोगुना), आय, विविधता बढ़ाकर, देश के किसानों ने अपने आधुनिक होने का सबूत दिया है. खेती को किसानों की उद्यमिता में चूक या मांग की कमी नहीं बल्कि सीमित सिंचाई और बंद बाजार मारते हैं. अगर इनका समाधान हो सके तो उभरते उपभोक्ता बाजार में खेती नई ताकत बन सकती है. 
भारत के इतिहास में 2007 में पहली बार ऐसा हुआ था जब केंद्र और राज्य सरकारों ने विशेष रूप से बैठक कर खेती पर व्यापक चर्चा की थी. यह बैठक राष्ट्रीय विकास परिषद के तहत हुई थी जो योजना आयोग की व्यवस्था में देश के विकास पर फैसले करने वाली सर्वोच्च संस्था थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खेती पर कुछ ऐसी ही बड़ी पहल करनी होगी, और राज्यों को साथ लेकर खेती पर समयबद्ध और ठोस रणनीति बनानी होगी.
आर्थिक और राजनैतिक, दोनों मोर्चों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बदहाली के नतीजे आ चुके हैं. कंपनियों के आंकड़े बता रहे हैं कि गांवों में ग्रोथ के बिना औद्योगिक अर्थव्यवस्था भी नहीं चल सकती. बिहार के चुनाव नतीजों ने भी बता दिया है कि गांवों को हल्के में लेना महंगा पड़ता है.

खेती मौसमी कारणों से दो दशकों के सबसे बुरे हाल में है लेकिन पिछले अच्छे दिन बताते हैं कि भारतीय कृषि अपना चोला बदलने को तैयार है. ताजा संकट से निबटने के लिए सब्सिडी बढ़ाने और कर्ज माफी के पुराने तरीके चुने जा सकते हैं या फिर बीमा स्कीमों या सॉयल हेल्थ कार्ड जैसे छोटे प्रयोगों को बड़ा बताया जा सकता है. दूसरा विकल्प यह है कि सिंचाई और मुक्त बाजार जैसे बड़े सुधारों की राह खोल कर खेती को चिरंतन आपदा प्रबंधन की श्रेणी से निकाल लिया जाए. ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण मोदी सरकार का सबसे बड़ा मिशन होना चाहिए, और 2016 का बजट इस मौके के सबसे करीब खड़ा है बशर्ते...!