Monday, October 2, 2017

हाथी की बीमारी बकरी का इलाज


सरकार के साथ सहानुभूति रखिए.

वह कभी-कभी सवालों के अनोखे जवाब ले आती है.

जैसे मंदी और बेकारी दूर करने के लिए गांवों में बिजली के खंभे लगाना. यह पानी की कमी दूर करने के लिए रेल की पटरी बिछाने जैसा है.
देश जब मंदी के इलाज का इंतजार कर रहा था जो किसी अंतरराष्ट्रीय आपदा के कारण नहीं बल्कि पूरी तरह सरकार के गलत फैसलों से आईतब मुफ्त में बिजली कनेक्शन बांटने की योजना का त्योहार शुरू हो गया. यह स्कीम उन राज्यों में लागू होगी जहां बिजली वितरण नेटवर्क बुरे हाल में हैबिजली बोर्ड घाटे में हैंकर्ज से उबरने की कोशिश कर रहे हैं और बिजली सप्लाई के घंटे गिने-चुने ही हैं. 

सरकारें अक्सर यह भूल जाती हैं कि अर्थव्यवस्था के मामले में आत्मविश्वास और दंभ की विभाजक रेखा बहुत बारीक होती है. देश में व्याप्त मंदी इसी गफलत की देन है. लेकिन दंभ के बाद अगर दुविधा आ जाए तो जोखिम कई गुना बढ़ जाते हैंक्योंकि तब घुटने की चोट के लिए आंख में दवा डालने जैसे अजीबोगरीब फैसले लिए जाते हैं. मंदी के मौके पर सब्सिडी का 'सौभाग्य' महोत्सव इसी दुविधा से निकला है.

सरकारी स्कीमों का हाल बुरा है. इसे खुद सरकार से बेहतर भला कौन जानता है. सरकार का एक मंत्रालय है जो स्कीमों के क्रियान्वयन का हिसाब-किताब रखता है. इस साल की शुरुआत में उसने जो रिपोर्ट जारी की थी उसके मुताबिकमोटे खर्च और बजट वाली सरकार की 12 प्रमुख स्कीमें 2016-17 में बुरी तरह असफल रहीं. मसलनग्रामीण सड़क योजना 14 राज्यों में लक्ष्य से पीछे रही. प्रधानमंत्री आवास योजना 27 राज्यों में पिछड़ गई.

इस रिपोर्ट में दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना भी है जो 14 राज्यों में ठीक ढंग से नहीं चली. सौभाग्य योजना इसी का विसतार है. नोटबंदी के बाद जनधन को लकवा मार गया है. फसल बीमा योजना के बारे में तो सीएजी ने बताया है कि इसका फायदा बीमा कंपनियों ने उठा लियाकुदरत के कहर के मारे किसानों को कुछ नहीं मिला. 

गरीबों को मुफ्त गैस कनेक्शन देने वाली योजना उज्ज्वला भी अब दुविधा की शिकार है. केंद्रीय पेट्रो कंपनियों के कारण स्कीम की शुरुआत ठीक रही लेकिन सिलेंडर भरवाने के लिए 450 रुपए देना उज्ज्वला धारकों के लिए मुश्किल है. ग्रामीण इलाकों में मंदी के पंजे ज्यादा गहरे हैं. केरोसिन और लकड़ी हर हाल में एलपीजी से सस्ती है.

उत्तर प्रदेशमध्य‍ प्रदेशबिहारओडिशाराजस्थान जैसे राज्यों में एलपीजी धारकों की संख्या और एलपीजी की खपत में बड़ा झोल है. पेट्रो मंत्रालय के रिसर्च सेल की रिपोर्ट बताती है कि उज्ज्वला के बाद यहां जिस रफ्तार से कनेक्शन बढ़े हैंउस गति से एलपीजी की मांग या खपत नहीं बढ़ी.

सिर्फ आंकड़े ही नहींलोगों का नजरिया भी स्कीमों को लेकर बहुत उत्साहवर्धक नहीं है. इस साल अगस्त में इंडिया टुडे के 'देश का मिज़ाज सर्वे' ने बताया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का आंकड़ा जितना ऊंचा हैउनकी स्कीमों की अलोकप्रियता उतनी ही गहरी है. इनमें जन धनडिजिटल इंडिया जैसी बड़ी स्कीमें शामिल हैं. यह स्थिति तब है जबकि प्रधानमंत्री देश से लेकर विदेश तक लगभग हर दूसरे भाषण में इनका नाम लेते हैं और पिछले तीन साल में इन स्कीमों के प्रचार पर क्‍या खूब खर्च हुआ है ?

मोदी सरकार मनरेगा जैसे किसी बड़े करिश्मे की तलाश में है जिसकी पूंछ पकड़ कर चुनावों की लंबी वैतरणी पार हो सके. दिलचस्प है कि मनरेगा की सफलता उसके जरिए मिले रोजगारों में नहीं बल्कि उसके जरिए बढ़ी मजदूरी की दरों में थी. मनरेगा लागू होते समय आर्थिक विकास की गति तेज थी इसलिए मनरेगा के सहारे मजदूरी दरों का बाजार पूरी तरह श्रमिकों के माफिक हो गया. मजदूरों को गांव में भी ज्यादा मजदूरी मिली और शहरों में भी. अगर मंदी के दौर में मनरेगा आती तो शायद ये नतीजे नहीं मिलते.

दरअसलसरकारी स्कीमें गरीबी का समाधान हैं ही नहीं. 1994 से 2012 तक कुल आबादी में निर्धनों की तादाद 45 फीसदी से घटकर 22 फीसदी रह गई. 2005 से 2012 के बीच गरीबी घटने की रफ्तारइससे पिछले दशक की तुलना में तीन गुना तेज थी. ध्यान रखना जरूरी है कि यही वह दौर था जब भारत की आर्थिक विकास दर सबसे तेजी से बढ़ी.

हम इतिहास से यह सीखते हैं कि हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा. हम इतिहास से यह भी सीखते हैं कि नसीहतें न लेने के मामले में सरकारें सबसे ज्यादा जिद्दी होती हैं. वे ऐसे इलाज लाती हैं जिसमें हाथी की दवा चींटी को चटाई जाती है. तभी तो बेकारी दूर करने के लिए अब गांवों में एलईडी बल्ब टांगे जाएंगे.



Monday, September 25, 2017

भारत की शिंकानसेन


व्यजगमगाती या तेज रफ्तार दुविधा क्या  होती हैइसे समझने के लिए बुलेट ट्रेन में बैठकरभीमकाय बांध और परमाणु बिजली घर की यात्रा कर आइए.

तीनों ही बुनियादी ढांचा वंश की कामयाब लेकिन विवादित संतानें हैं.

बुलेट ट्रेन की मेट्रो से तुलना असंगत है. नगरीय व उपनगरीय रेल परिवहन की तीन पीढिय़ां (ट्राम—मुंबई लोकल—दिल्ली रिंग रेलवे—कोलकता मेट्रो) भारत में पहले से हैं. दिल्ली की मेट्रो इनका नया संस्करण है. हालांकि मेट्रो राजनीति पर सवार होकर ऐसे शहरों में भी पहुंच गई जहां इसकी आर्थिक सफलता संदिग्ध है.

बुलेट ट्रेन भारत में अंतर्देशीय परिवहन की नीति के लिए असमंजस की चिट्ठी है. यह असमंजस रफ्तार और विस्तार के बीच समन्वय का है. यूरोप का विमानन उद्योग भी (1970 से 2003) रफ्तार की दीवानगी में सुपरसोनिक कांकॉर्ड विमान सेवाएं लेकर आया. सन् 2000 की जुलाई में एयरफ्रांस की कांकॉर्ड दुर्घटना के बाद यह सेवा बंद हुई और विमानन उद्योग ने एक नई करवट ली. अब होड़ रफ्तार की नहींबल्कि विस्तार की थी. नए शहरों के लिए सस्ती उड़ानें शुरू हुईं.विमानों का आकार (एयरबस 380) बढ़ाया गया. विस्तार व सस्ती सेवा से यात्री बढ़े और एविएशन उद्योग को सफलता के सुपरसोनिक पंख लग गए.

भारत की बुलेट ट्रेन को अंतर्देशीय परिवहन के अंतरराष्ट्रीय प्रयोगों के संदर्भ में देखना जरूरी हैः 

- अमेरिका में बुलेट ट्रेन नहीं हैं. भौगोलिक विशालता के कारण रेलवे को माल परिहवन पर केंद्रित यात्रियों के लिए निजी वाहनों और विमान सेवा को वरीयता दी गई. इसलिए ऑटोमोबाइल और विमानन उद्योग विकसित हुआ.

- यूरोपीय देशों ने छोटे भूगोल के मुताबिक रेलवे (कुछ देशों में हाइ स्पीड रेल भी) को यात्री और सड़कों को माल परिवहन का जरिया बनायाहालांकि सस्ती विमान सेवएं अंतरयूरोपीय यात्राओं में रेलवे के लिए चुनौती हैं.

- बेहद घनी बसावट वाले छोटे जापान (केवल 20 फीसदी भूगोल रहने लायक) 'शिकानसेन' (भारत की बुलेट ट्रेन का आधार) ने और छोटा कर दिया. जापानी बुलेट ट्रेन आम लोगों के लिए खासी महंगी है. कर्मचारी अपनी कंपनियों के खर्च पर शिंकानसेन के जरिए बड़े शहरों तक आते-जाते हैं. जापान की विमान सेवाएंबाजार के लिए बुलेट ट्रेन से लड़ रहीं हैं.

- चीन ने पिछले दो दशकों में दुनिया का सबसे बड़ा हाइ स्पीड ट्रेन नेटवर्क (दुनिया से 40 फीसदी कम लागत पर) बना लिया है लेकिन बुलेट ट्रेन के कारण तीनों सरकारी विमान सेवाओं का मुनाफा पिघल रहा है.

बुलेट ट्रेन अपनी लागत लाभ (कॉस्ट बेनीफिट) असंगति को लेकर खासी विवादित हैं. चीन व जापान सरकारें निजी जमीन लेने को स्वतंत्र हैंप्रोजेक्ट को खूब सब्सिडी भी देती हैं. यूरोप में महंगी जमीन के कारण हाइ स्पीड रेल की लागत ऊंची है. अमेरिका में लॉस एंजेलिस-सैन फ्रांसिस्को और डलास-ह्यूस्टन के हाइ स्पीड रेल प्रोजेक्ट जमीन अधिग्रहण के झगड़ों और लागत बढऩे के कारण लंबित हैं.

हम बुलेट ट्रेन को चुनावी शोशा नहीं बल्कि एक गंभीर परियोजना मानते हैं जो अंतर्देशीय परिवहन नीति और रेलवे के पुनर्गठन का संदेश होनी चाहिए. 

1. माल परिवहन के कारोबार में रेलवेसड़क से हार चुकी है. रेलवे की ढुलाई कोयलालोहासीमेंट तक सीमित है. रेलवे का कारोबार अब यात्री परिवहन से ही चलेगा. डेडिकेटेड फ्रेट (माल) कॉरिडोर को लंबी दूरी के हाइ स्पीड यात्री परिवहन कॉरिडोर में बदलना चा‍हिए जबकि पुराना नेटवर्क माल परिवहन के लिए इस्तेमाल होना चाहिए. रेलवे को यात्री परिवहन के नए राजस्व मॉडल की जरूरत है जिसे निजी भागीदारी के साथ विकसित किया जा सकता है.

2. पिछले दशकों में सड़कों पर रेलवे से ज्यादा निवेश हुआ है. यहां अब हाइ स्पीड फ्रेट कॉरिडोर बनाने की जरूरत है ताकि बड़े ट्रक बगैर रुके लंबी यात्रा कर सकें. फायदा ऑटोमोबाइल उद्योग को होगा.

3. भारत में नगरों की बहुतायत है. छोटी दूरियों को परिवहन को बेहतर सड़कों और निजी वाहनों पर केंद्रित किया जा सकता है.  

4. सस्ती विमान सेवाएं और लंबी दूरी की हाइ स्पीड ट्रेनें मिलकर अंतर्देशीय परिवहन को आधुनिक बना सकती हैं.



रेलवे के सामाजिक और वणिज्यिक दायित्वों को अलग करना होगा. सामाजिक दायित्वों को बजट से वित्त पोषण मिलना चाहिए. बुलेट ट्रेन के साथ भारत की अंतर्देशीय परिवहन नीति बदलना जरूरी है. नहीं तो यह महंगी (रेलवे के सालाना बजट का ढाई गुना) परियोजना जापान के कर्ज से, अगर बन भी गई तो यह पर्यटकों के लिए हाइ स्पीड पैलेस ऑन व्हील्स हो जाएगी. आम रेल यात्रियों की जिंदगी में इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

Sunday, September 17, 2017

जीएसटी का इलाज


यदि कोई बंदर कंप्यूटर के की बोर्ड को लंबे वक्त तक लगातार मनचाहे ढंग से पीटता रहे तो वह कभी न कभी अक्षरों का ऐसा पैटर्न बना लेगा जो शेक्सपियर की कविता के करीब होगा.

बीसवीं सदी की शुरुआत में फ्रांस के गणितज्ञ जब इनफाइनाइट मंकी थ्योरी बना रहे थे (जिसे 2011 में अमेरिकी कंप्यूटर प्रोग्रामर ने वर्चुअल बंदरों की मदद से सही सिद्ध कर दिया) तब उन्हें यह कतई अंदाज नहीं रहा होगा कि 21वीं सदी में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा टैक्स सुधार इस थ्योरी का उदाहरण बन जाएगा.

प्रधानमंत्री का गुड ऐंड सिंपल टैक्ससरकार और कारोबारियों के लिए इनफाइनाइट मंकी थ्योरी की साधना बन गया है. तीन महीने बाद पहला रिटर्न भरने के तरीकों पर शोध जारी है. आए दिन बदलते नियमों से जीएसटी की गुत्थी और उलझ जाती है.

वन नेशनवन टेंशन

भारत का सबसे बड़ा टैक्स सुधार गहरी मुश्किल में है जीएसटी खुद बीमार हो गया है और इससे कारोबार में भी बीमारी फैल गई है। 
  •  जीएसटी के सूचना तकनीक नेटवर्क (जीएसटीएन) के बिना जीएसटी लागू होना नामुमकिन है. यह नेटवर्क असफल सा‍बित हो गया है. रिटर्न भरने की भी तारीखें आगे बढ़ा दी गई हैं. इस नेटवर्क के भरोसे लाखों इनवॉयस मिलानेटैक्स  क्रे‍डिटमाल ले जाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक परमिट देनेकेंद्र और राज्य के बीच राजस्व बंटवारे का काम मुश्किल दिख रहा है.
  • जीएसटीएन की असफलता की पड़ताल के लिए राज्यों के वित्त मंत्रियों की समिति बनानी पड़ गई है. सनद रहे कि इस नेटवर्क की तैयारी को लेकर देश को लगातार गुमराह किया गया. शनिवार को बंगलौर में जीएसटी 'उपचार'  समिति की बैठक के बाद सरकार ने स्वीकार किया कि नेटवर्क में समस्‍यायें हैं जिन्‍हें दूर करने की कोशिश हो रही है.
  • उत्पादों और सेवाओं को विभिन्न दरों में बांटने वाली जीएसटी (फिटमेंट) कमेटी ने पर्याप्त तैयारीशोध और उद्योगों से संवाद नहीं किया. इसी गफलत के चलते जुलाई के तीसरे सप्ताह में सिगरेट कंपनी आइटीसी का शेयर एक दिन में 13 फीसदी टूट गया यानी निवेशकों को करीब 50,000 करोड़ रुपए का नुक्सान. यह हुआ सिगरेट पर जीएसटी लगाने की गलती से. पहले सिगरेट पर जीएसटी की दर कम रखी गई फिर गलती समझ में आई तो उसे बढ़ा दिया गया. यह पहला मामला नहीं था इसके बाद जीएसटी काउंसिल लगातार उत्पादों और सेवाओं पर टैक्स की दरें बदल रही है.
  •  नेटवर्क की विफलता और नियमों के फेरबदल से राजस्व संग्रह पर खतरा बढ़ गया है. राज्यों ने केंद्रीय जीएसटी में हिस्सा न मिलने की शिकायत की है. नाराज व्या‍पारी अदालतों से गुहार लगाने लगे हैं.
 विफलता के नतीजे  
  •  ऑनलाइन नेटवर्क की असफलता के कारण नियम पालन और टैक्स चोरी रोकने का मॉडल लडख़ड़ा गया है. अब अधिकांश कारोबार नकद और कच्चे बिल में हो रहा है.
  •   जटिलता और नेटवर्क की उलझनों के कारण जीएसटीकारोबारी सहजता (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) पर आतंकी हमले की तरह सामने आया है.
  •    उत्पादन और बिक्री बेहद सुस्त है. जीडीपी में गिरावट गहरी और लंबी हो सकती है.

सहजता ही इलाज है
इसी स्तंभ में हमने लिखा था जीएसटी बेहद जटिल है. 24 से लेकर 36 रिटर्न की शर्तों और पेचीदा नियमों से लंदे फंदे जीएसटी को ऐसे सूचना तकनीक नेटवर्क के हवाले किया गया है जिसका कायदे से परीक्षण भी नहीं हुआ. यह गठजोड़ की विफलता अर्थव्यवस्था के लिए विस्फोटक हो सकती है. अफसोस कि हम गलत साबित नहीं हुए.  
·   जीएसटी एक ऐसा सुधार है जो तीन माह में ही खुद बीमार हो गया है. इसका ढांचा बदले बिना इसे खड़ा कर पाना अब मुश्किल लगता है.
  •   जीएसटी को चलाना है तो रिटर्न और तमाम प्रक्रियाओं में बड़े पैमाने पर कमी की जरूरत है. सरकार को कारोबारियों पर हमेशा शक करने की आदत छोडऩी होगी. सरकार को यह तय करना होगा कि उसे कितनी सूचना चाहिए. हर छोटी-बड़ी सूचना हासिल करने की जिद हटाकर प्रक्रिया को आसान करना पड़ेगा.
  • छोटे और बड़े कारोबारियों के लिए नियम अलग-अलग तय करने नहीं तो गैर जीएसटी कारोबार बढऩे लगेगा या फिर छोटे कारोबार और व्यापार बंद होने की नौबत आ जाएगी. 
  • कर नियमों में आए दिन बदलाव रोकना होगा ताकि कारोबारी स्थायित्व को लेकर आश्वस्त हो सकें.
याद कीजिए 30 जून की मध्यरात्रि को संसद में हुए जीएसटी उत्सव को. उस जलसे को याद करने पर जीएसटी का ताजा हाल हमें शर्मिंदा करता है. सुधारों की शुरुआत कोई उत्सव नहीं होतीत्योहार तो उनकी सफलता पर मनाया जाता है.




मिल्टन फ्रीडमैन ठीक ही कहते थे: ‘‘सरकारें नसीहत नहीं लेतीसबक तो सिर्फ जनता को मिलते हैं.’’

Sunday, September 10, 2017

खर्च करेंगे तो बचेंगे

हम सरकार से सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन अर्थव्यवस्था में ढलान से तो गाफिल नहीं होंगे.

माना कि सरकार ने टैक्स (जीएसटी) थोपने में कोई मुरव्वत नहीं की फिर भी ढहती अर्थव्यवस्था की मदद की खातिर अब शॉपिंग बैग उठाना ही पड़ेगा.

नोटबंदी के बाद आर्थिक विकास दर क्‍यों 
ढह गई! 

सरकारें जब खुद को सर्वशक्तिमान मान लेती हैं तो नोटबंदी जैसे हादसे होते हैं.

जीडीपी यानी आर्थिक उत्पादन बाजार में उपलब्ध  कुल करेंसी और उस करेंसी के इस्तेमाल (करेंसी इन सर्कुलेशन+वेलॉसिटी ऑफ मनी) की दोस्ती से बनता है. इस फॉर्मूले से हम समझ पाते हैं कि प्रत्येक रुपया कितना आर्थिक उत्पादन (जीडीपी) करता है.

वेलॉसिटी ऑफ मनी यानी रुपए का बार-बार इस्तेमाल खासा दिलचस्प है. एक डॉक्टर ने टैक्सी वाले को सौ रुपए दिए. टैक्सी वाले ने वह सौ रुपए देकर खाना खाया. होटल वाले ने उस सौ रुपए से मोबाइल चार्ज करा लिया और मोबाइल वाला वह सौ रुपए इलाज के लिए वापस उसी डॉक्टर को दे आया. डॉक्टर के पास वापस आने तक वह सौ रुपए, चार सौ रुपए का कारोबार कर चुके थे. 

वेलॉसिटी ऑफ मनी की जटिल गणना में नकद लेन-देन ही नहीं, बैंक अकाउंट से भुगतान और निवेश भी शामिल होता है. नकदी तेजी से हाथ बदलती है, जबकि वित्तीय निवेश धीमे चलते हैं. भारत में मनी की वेलॉसिटी, करेंसी के प्रवाह की तुलना में लगभग आठ गुना ज्यादा है. हर नोट औसतन सात से आठ (ज्यादा भी) बार विनिमय में इस्तेमाल होता है.

सरकार नोट छापकर या उन्हें कागज का टुकड़ा बनाकर (नोटबंदी), करेंसी के प्रवाह को तो नियंत्रित कर सकती है लेकिन सौ रुपए का एक नोट कितनी बार (वेलॉसिटी) इस्तेमाल होगा, इस पर सरकार का कोई बस नहीं है.

मनी की वेलॉसिटी अर्थव्यवस्था में डांडिया नाच की तरह है, जिसमें हर नाचने वाला दूसरे के साथ अपने उत्साह को चटकाता है. वेलॉसिटी खरीद, उपभोग, निवेश से बढ़ती है. यह अर्थव्यवस्था में विश्वास का उत्सव है जिससे मांग बढ़ती है.

सरकारें कभी-कभी ऐसे समाधान लाती हैं जो समस्या से ज्यादा खतरनाक होते हैं. कुछ चूहों को निकालने के लिए पूरे डांडिया पंडाल में नोटबंदी की जहरीली गैस छोड़ दी गई. नाचने वाले निढाल होकर गिर गए. करेंसी के साथ ही वेलॉसिटी भी गई और जीडीपी ढह गया. 

करेंसी तो धीमे-धीमे वापस लौट रही है लेकिन गैस का असर इतना गहरा हुआ कि वेलॉसिटी का डांडिया दोबारा चटकाने यानी खर्च करने का उत्साह खत्म (कंज्यूमर सर्वे-रिजर्व बैंक) हो गया है. आज भी नकदी (करेंसी) की उपलब्धता नोटबंदी के पहले के स्तर से 20 फीसदी कम है. डिजिटल पेमेंट काफी धीमे पड़ गए हैं लेकिन हैरत है कि नकदी की कमी सरकार के लिए नोटबंदी की सफलता है! 

सरकारें अर्थव्यवस्था नहीं चलातीं. भारत का जीडीपी देश के लोगों की मेहनत और उपभोग से बढ़ता है. निजी उपभोग के लिए होने वाला खर्च जीडीपी में 60 फीसदी का हिस्सेदार है. जिन वर्षों में भारत ने सबसे अच्छी विकास दर दर्ज की है, उनमें लोगों का उपभोग खर्च शानदार ऊंचाई पर था. 

पिछले साल नोटबंदी के दौरान, इसी कॉलम में हमने लिखा था कि जीडीपी के अनुपात में नकदी करीब 12 फीसदी है, जिसके अधिकांश हिस्से का इस्तेमाल उपभोग खर्च में होता है. नोटबंदी, जीडीपी की सांस घोंटकर भारत की आर्थिक रफ्तार तोड़ देगी.

नोटबंदी के बाद जीडीपी इसलिए ढहा क्योंकि देश के करोड़ों लोगों ने अपनी खपत सिकोड़ ली. नवंबर के धमाके से पहले, अर्थव्यवस्था की ढलान शुरू हो चुकी थी. नोटबंदी के तत्काल बाद खपत को जीएसटी ने दबोच लिया इसलिए संकट गहरा गया है.

सरकार दो काम करते-करते लगभग थक चुकी है.

·       बजट से खूब खर्च किया गया ताकि किसी तरह ढलान रोकी जा सके लेकिन करोड़ों उपभोक्‍ताओं के उपभोग का विकल्प नहीं है.
·       आर्थिक आंकड़ों को खूब प्रोटीन पिलाया गया ताकि अर्थव्यवस्था को बढ़ता दिखाया जा सके .लेकिन सूरत संवारने में बिगड़ती चली गई.

चीनी दार्शनिक लाओत्सु कहते थे, किसी महान देश में सरकार चलाना छोटी मछली को पकाने जैसा होता है. ज्यादा हस्तक्षेप व्यंजन को बिगाड़ देता है. नोटबंदी में यही हाल हुआ है.

अब जीडीपी को न सस्ता कर्ज उबार सकता है और न सरकारी खर्च और विदेशी निवेश. ढहती अर्थव्यवस्था को हमारे आपके खर्च की जरूरत है. हमारा उत्साह ही इसका इलाज है. 

अपने आर्थिक भविष्य के लिए खर्च करिए.

सरकार के भरोसे मत बैठिए, सरकार अब आपके भरोसे बैठी है.


Monday, September 4, 2017

हस्ती कायम रहे हमारी


शंख और लिखित परम तपस्वी ऋषि थे. दोनों सगे भाई. एक दिन लिखितशंख के आश्रम पर पहुंचे. शंख कहीं गए हुए थे. भूखे लिखितआश्रम के वृक्षों से फल तोड़कर खाने लगे. इतने में शंख आ गए. उन्होंने फल तोडऩे से पहले किसी की अनुमति ली थी लिखित ?
लिखित निरुत्तर थे.

शंख ने कहायह चोरी है. आपको राजा सुद्युम्न से दंड मांगने जाना होगा. 

लिखित दरबार में पहुंचे और पूरा प्रकरण बताकर दंड देने की याचना की. राजा ने कहाअपराध को मैं क्षमा करता हूं. लिखित ने कहानहींमुझे दंड भुगतना ही होगा.

ऋषि के आग्रह पर राजा ने उनके दोनों हाथ कटवा दिएजो चोरी के अपराध की सजा थी.

हाथ गंवाकर लिखित पुनः शंख के पास पहुंचे. शंख ने उन्हें नदी में स्नान और तप करने के लिए कहा और (जैसा कि मिथकों में होता है) स्नान करते ही लिखित के हाथ वापस आ गए.

लिखित फिर शंख के पास आए और पूछा कि जब आप अपने तप से मुझे पवित्र कर सकते थे तो फिर दंड क्यों

शंख ने कहा कि हम तपस्वी हैंलोग हमें आदर्श मानते हैं इसलिए हमारा छोटा-सा अपराध भी क्षम्य नहीं है. रही बात दंड की तो वह मेरा अधिकार नहीं है इसलिए आपको राजा के पास भेजा.

महाभारत के शांति पर्व की यह कथा इसके बाद शंख और लिखित के बारे में कुछ नहीं कहती बल्कि यह बताती है कि न्याय के मानकों पर ऋषि को भी सजा देने वाला राजा सुद्युम्न सशरीर स्वर्ग चला गया.

यह कहानी व्यास ने युधिष्ठिर को सुनाई थी जो युद्ध के बाद न्यायधर्म के अंतर्गत यह सीख रहे थे किः
एकः जो समाज में जितना ऊंचा हैउसका अपराध उतना ही बड़ा होता है.
दोः अपराधी ऋषि को भी सजा देने वाला राजा पूज्य  होता है.

गुरमीत सिंह पर अदालत के फैसले को गौर से पढऩा चाहिए. पूरे निर्णय में विस्मय से भरा क्षोभ गूंजता है. मानो कहना चाहता हो कि संत और बलात्कार! यह कैसे सहन हो सकता हैधर्म को जीवन मूल्य और न्याय मानने वाले समाज के लिए यह बर्दाश्त करना असंभव है कि उसके अनन्य विश्वास का कर्णधार कोई संत यौनाचारी भी हो सकता है.

इंसाफ करना सबसे कठिन तब होता है जब समाज के विश्वास के शिखर पर बैठा कोई व्यक्ति कठघरे में होता है. आसान नहीं रहा होगा एक दंभी-लंपट संत पर फैसला करना जो लाखों भोले अनुयायियों और राजनैतिक रसूख की ताकत से डकारता हुआ न्याय को मरोडऩा चाहता था. फैसले के बाद हिंसा की आशंका को जानते हुए भीन्यायाधीश गुरमीत को सजा इसलिए दे पाए क्योंकि वे उस बेचैनी को सुन पा रहे थे जो हमें एक धार्मिक समाज के रूप में शर्मिंदा कर रही थी.

क्या भारत की अदालतें लंपट साधुओं के प्रति अतिरिक्त कठोर हो रही हैंलोकप्रियता के शिखर पर बैठे लोगों के अपराध को लेकर अदालतें ज्यादा ही आक्रामक हैंयदि हकीकत में ऐसा है तो हमें स्वयं पर गर्व करना चाहिए. यही तो वह बात है जिसकी वजह से हस्ती मिटती नहीं हमारी. कहीं न कहींकोई न कोई आगे आकर हमें उम्मीद का दीया पकड़ा जाता है.  

यदि बलात्कारी बाबाओं या उच्च पदस्थ अपराधियों को लेकर अदालतें बेरहम हो रही हैं तो यह न्याय व्यवस्था में एक गुणात्मक बदलाव है जिसे लाने के लिए हमें सड़क पर मोमबत्तियां नहीं जलानी पड़ीं.

अदालतों की सक्रियता पर चिंतित होने की बजाए यह जानना बेहतर होगा कि 21वीं सदी में चर्च की सबसे बड़ी उलझन दरअसल यौन कुंठित व बलात्कारी बिशप और पुजारी हैं. इसी साल जून में पोप फ्रांसिस के वित्तीय सलाहकार और वेटिकन के एक सर्वोच्च कार्डिंनल जॉर्ज पेल को मेलबर्न की अदालत ने यौन अपराधों (जब वे ऑस्ट्रेलिया के आर्कबिशप थे) में सजा सुनाई है. कैथोलिक चर्च में यौन और बाल शोषण के मामले लगातार सुर्खियों में है. इस तरह की करीब 2000 शिकायतों पर लंबे समय से बैठा वेटिकन लंबे अरसे से पश्चिमी प्रेस के निशाने पर है.

चर्च भारत की अदालतों से कुछ सीखना चाहेगा?

वैसेभारत की अदालतें एक तरह का प्रायश्चित भी कर रही हैं. अपराधी और भ्रष्ट राजनेताओं पर उन्होंने इतनी सख्ती नहीं की थी. अपराधी संतों के मामले में यह गलती नहीं दोहराई जा रही है.

क्या राजनेता लंपट गुरुओं से दूरी बनाएंगेक्या समाज सेवा दिखाकर अवैध साम्राज्य बनाने वाले बाबा-फकीरों को रोकने के लिए कानून बनेगाक्या हिंदुत्व के पुरोधा भारतीय आध्यात्मिकता को कलंकित करने वालों से सहज भारतीयों की रक्षा करेंगे?

पता नहीं!

लेकिन गुरमीत हम सब आम लोगों को यह बड़ी नसीहत दे कर जेल गया है कि  

अनुयायियों की भीड़ गुरु की पवित्रता की गारंटी नहीं है.




Monday, August 28, 2017

आइये, चीन से लड़ते हैं

कहांडोकलाम पठार पर?
नहीं. चावड़ी बाजार में.
दुआ कीजिए कि भूटान के पठार पर चीन से दो-दो हाथ न हो (तनाव घटने लगा है) लेकिन चावड़ी बाजार में चीन से जंग करनी ही होगी. इस की अपनी कीमत होगी लेकिन फायदे भी हैं 

यदि हम इसे न्यूयॉर्क के मैनहटन या लंदन के ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट में भी लडऩा चाहते हैं यानी ग्लोबल बाजार में भी चीन के दांत खट्टे करना चाहते हैं तो फिर ज्यादा बड़ी फौज चाहिए.

चीन के प्राचीन युद्ध गुरु सुन त्जु ने कहा था कि शत्रु की ताकत के बारे में जानकारी भूत-प्रेतों से नहीं मिलतीन ही बातें या कयास काम आते हैंदुश्मन की हकीकत जानने वाले लोग ही बता सकते हैं कि उसके खेमे में कितनी ताकत है... इसलिए एक नजर चीन की कारोबारी ताकत पर.

- दुनिया को 2,097 अरब डॉलर (लगभग 13 खरब रु.) का निर्यात, 1,587 अरब डॉलर का आयात, 509 अरब डॉलर का व्यापार सरप्लस (2016 के आंकड़े) लेकिन इसके बाद भी दुनिया के कुल व्यापार में चीन का हिस्सा केवल 14 फीसदी है. चीन इसे बढ़ाते जाने की ताकत से लैस है.

- चीन में कुल विदेशी निवेश 126 अरब डॉलर और 3,000 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है.

- एक खरब डॉलर की वन बेल्टवन रोड परियोजना जो 60 देशों में बुनियादी ढांचा बनाएगी. ये मुल्क बाद में चीन के लिए सस्ते उत्पादन का केंद्र बनेंगे. इसमें पाकिस्तान में 46 अरब डॉलर का निवेश शामिल है.

- चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक 'दोस्त' है. हर साल करीब 61 अरब डॉलर का चीनी सामान भारत आता है और भारत बमुश्किल 10 अरब डॉलर का निर्यात चीन को करता है. 51 अरब डॉलर का फायदा चीन के हक में है.

- भारत के कई प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र अपनी अधिकांश आपूर्तियों के लिए चीन के मोहताज हैं टेलीकॉम इक्विपमेंटइलेक्ट्रॉनिक्सदवाएंकंप्यूटर हार्डवेयरलोहा-इस्पात बड़े आयात हैं. बताते चलें कि चीन से लंबी तनातनी के बावजूद दोतरफा व्यापार जारी है और वहां से सप्लाई रुकने से कई भारतीय उद्योग लडख़ड़ा जाएंगे.

चीन से जंग लंबी और मुश्किलों भरी होगी. पिछले तीन साल में सरकार ने इसकी तैयारी के लिए कुछ भी नहीं किया है.

चीनी पुर्जे इस्तेमाल कर रही इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकॉम कंपनियों सेसरकार ने हाल में ही सुरक्षा पर सवाल-जवाब किए हैं. 2012 में इसी तरह के सवालों के जरिए राष्ट्रीय मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी तैयार की गई थी जो चुनिंदा उद्योगों में चीन पर निर्भरता घटाने की कोशिश थी. यह नीति 'मेक इन इंडिया' का आधार है. 'मेक इन इंडिया' को नारेबाजी से निकाल कर उन उद्योगों (टेलीकॉम इक्विपमेंटइलेक्ट्रॉनिक्सदवाएंकंप्यूटर हार्डवेयर) को रियायतें देने पर केंद्रित करना होगाजहां हम चीन के बिना सांस नहीं ले सकते.

स्वदेशी वाले कुछ समय तक शांत रहें. जिन उत्पादों में हम चीन पर निर्भर हैं उनकी तकनीक भारत में नहीं है. इसलिए यूरोपीय और अमेरिकी कंपनियों को खास प्रोत्साहन देकर बुलाना होगा और घरेलू तकनीकों के विकास में निवेश करना होगा.

सस्ते चीनी सामान का जवाब लघु उद्योग देंगेजिन्हें चीन में माइक्रो मल्टीनेशनल्स कहा जाता है. इन्हें आत्मनिर्भरता के सिपाही बनाने के लिए बजट से संसाधन देने होंगे.

जीएसटी बनाते समय क्या हमने चीन के बारे में सोचा थाजीएसटी में उन सभी उद्योगों पर भारी टैक्स थोपा गया हैजहां मुकाबला चीन से है. जीएसटी ने चीन के सस्ते सामान के मुकाबले भारत को कहीं ज्यादा महंगा उत्पादन केंद्र बना दिया है.

चीन को हराना है तो रुपए की ताकत घटानी होगी. जोरदार निर्यात के लिए रुपए का अवमूल्यन चाहिए.

युद्ध कोई भी होउसकी अपनी एक कीमत होती है. चीन से जो जंग हमें लडऩी होगी यह रही उसकी कीमतः

- विदेशी निवेश (गैर चीनी) और उद्योगों को प्रत्यक्ष प्रोत्साहन यानी बजट से खर्चा यानी ज्यादा घाटा
- जीसटी में फेरबदल और रियायतें अर्थात् कम राजस्व
- चीन से आयात पर सख्ती अर्थात् सप्लाई में कमी यानी महंगाई
- सस्ता रुपया यानी महंगे आयात
- देश की आर्थिक नीतियों में समग्र बदलावसरकारी खर्च पर नियंत्रण

सुन त्जु ने कहा था कि युद्ध के बगैर ही शत्रु को हराना ही सबसे उत्तम युद्ध कला है. यह कला आर्थिक ताकत से ही सधती है. चीन की ताकत उसकी विशाल सेना या साजो-सामान में नहीं बल्कि 3,000 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार में छिपी है.

चलिएचीन से लड़ते हैं.



यह लड़ाई हमें बेरोजगारी से जीत की तरफ ले जाएगी.