Monday, April 30, 2018

दक्षिण का उत्तर



अगर सब कुछ ठीक रहा होता तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शायद इस महीने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर रहे होते. बीते साल अप्रैल में नीति आयोग के बुलावे पर आखिरी बार दिल्ली में मुख्यमंत्री जुटे थे. प्रधानमंत्री खुश थे कि जीएसटी की छाया में उनका सहकारी संघवाद जड़ पकडऩे लगा है. उन्होंने न्यू इंडिया के लिए केंद्र व राज्य के नए रिश्तों की आवाज लगाई थी.

...लेकिन एक साल में बहुत कुछ बदल गया.

दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की दूसरी जुटान नहीं हुई अलबत्ता तिरुवनंतपुरम में दक्षिणी राज्यों के वित्त मंत्रियों की बैठक हुई जिसके बाद पूरा दक्षिण मिलकर केंद्र से पूछने लगा कि नवगठित 15वें वित्त आयोग को केंद्र और राज्य के बीच संसाधनों के बंटवारे में दक्षिण के राज्यों के साथ भेदभाव का फॉर्मूला बनाने की इजाजत क्यों दी गई हैवित्त आयोग प्रस्तावित फॉर्मूले में 1971 की बजाए 2011 की आबादी को आधार बनाएगाजिससे बेहतर गवर्नेंस वाले दक्षिणी राज्यों (तेलंगाना के अलावा) को आबादी बहुल उत्तरी राज्यों की तुलना में केंद्र से कम पैसा मिलेगा.

इसी मुद्दे की छाया में चंद्रबाबू नायडू एनडीए से अलग हुए. चुनावों के लिए गरमा रहे दक्षिण भारत में आम लोग भी अब एक दूसरे को बता रहे हैं कि तमिलनाडु-कर्नाटक जैसे राज्यों को केंद्र के खजाने में प्रति सौ रु. के योगदान पर केंद्र से औसतन 30-40 रु. मिलते हैं जबकि उत्तर प्रदेशबिहार को उनके योगदान का दोगुना पैसा मिलता है. 

इस मुहिम में चुनावी सियासत का छौंक जरूर लगा है लेकिन राजनीति के अलावा भी कुछ ऐसा हुआ है जिसके कारण जीएसटी पर केंद्र के साथ खड़े राज्यों ने आर्थिक हितों को लेकर उत्तर बनाम दक्षिण की दरार खोल दी हैजो बड़ी राजनैतिक खाई में बदल सकती है.

जीएसटी की विफलता राज्यों के खजाने पर बुरी तरह भारी पड़ी है. विपक्षी मुख्यमंत्री अब खुलकर बोल रहे हैं जबकि अनुशासन के मारे भाजपा के मुख्यमंत्री चुपचाप नए टैक्स लगाने और उद्योगों को रोकने के लिए सब्सिडी बांटने की जुगत में लगे हैं.

यह रही बानगी

·  असम सरकार राज्य की औद्योगिक इकाइयों को जीएसटी की वापसी करेगी. मध्य प्रदेश भी ऐसा ही करने की तैयारी में है. नए निवेश की बात तो दूरजीएसटी के बाद राज्यों के लिए मौजूदा कंपनियों को रोकने के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया है.
 नतीजेघाटे में नया घाटाफर्जी उत्पादन दिखाकर रिफंड की लूट

·       पंजाब सरकार ने इनकम टैक्स भरने वाले प्रोफेशनलकारोबारियों और कर्मचारियों पर 200 रु. प्रति माह का नया टैक्स लगाया है. जीएसटी के बाद महाराष्ट्र ने वाहन पंजीकरण और तमिलनाडु ने मनोरंजन कर बढ़ा दिया है.
   नतीजेकारोबार की लागत में बढ़ोतरी

जीएसटी आने के बाद राज्यों को पांच तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है:
·       अपने राजस्व को जरूरत के मुताबिक संतुलित करने की आजादी जाती रही. उद्योगों को आकर्षित करने के लिए रियायतें देने के रास्ते बंद हो गए हैं
·  निवेश को रोकने के लिए केवल टैक्स सब्सिडी यानी चुकाए टैक्स (एसजीएसटी) की वापसी ही एक रास्ता हैजिससे बजट घायल होंगे और फर्जी रिफंड बढ़ेंगे
·      राज्यों के लिए चाहकर भी डीजल-पेट्रोल सस्ता करने का विकल्प खत्म हो गया है जबकि तेल की बढ़ती कीमतें राजनैतिक मुसीबत बनने वाली हैं. 
·   राज्यों को नए टैक्स लगाने या ऐसे टैक्स बढ़ाने पड़ रहे हैं जिनसे सियासी अलोकप्रियता का खतरा है
·       राजस्व की कमी के चलते राज्यों का बाजार कर्ज इस साल नया रिकॉर्ड बनाने वाला है
   प्रधानमंत्री मोदी का सहकारी संघवाद (कोऑपरेटिव फेडरिलज्म) दरक रहा है. वह सुधारों की असंगतिहकीकत से दूरी और दिखावटी गवर्नेंस का शिकार हो गया है. मोदी राज्यों के अधिकारों की वकालत करते हुए दिल्ली आए थे. योजना आयोग खत्म करने तक सब ठीक चला लेकिन उसके बाद सब गड्डमड्ड हो गया.

   राज्यों को ज्यादा अधिकार देने की बजाए जीएसटी ने उनके अधिकार छीन लिए. 

  मोदी ब्रांड केंद्रीय स्कीमों ने राज्यों की विकास वरीयताओं को पीछे धकेल दिया. 

-   और ठीक उस समय जब राज्यों के खजाने बुरी हालत में थेतब न केवल विफल जीएसटी टूट पड़ा बल्कि वित्त आयोग ऐसा फॉर्मूला बना रहा है जो सैद्धांतिक रूप से भले ही दुरुस्त हो लेकिन मौके और दस्तूर के माफिक नहीं है.

मोदी आज अगर गुजरात के मुख्यमंत्री होते तो शायद उनका नजरिया बेचैन राज्यों से फर्क नहीं होता. भाजपा के लिए राजनैतिक हालात बदलने का मतलब यह नहीं है कि राज्यों के भी अच्छे  दिन आ गए हैं. (एक मुख्यमंत्री की अनौपचारिक टिप्प्णी)

Saturday, April 21, 2018

आईने से चिढ़



- पिछले महीने मध्य प्रदेश की विधानसभा के सदस्यों की एक बड़ी आजादी जाते-जाते बची. राज्य विधानसभा में सवाल पूछने के अधिकार सीमित किए जा रहे थे और माननीयों को पता भी नहीं था. प्रस्ताव चर्चा के लिए अधिसूचित हो गया. लोकतंत्र की फिक्र की पत्रकारों ने. सवाल उठे और अंतत: पालकी को लौटना पड़ा.

- एक और पालकी दिल्ली में लौटी. राजीव गांधी के मानहानि विधेयक की तर्ज पर सूचना प्रसारण मंत्रालय ने गलत खबरों को रोकने के बहाने खबरों की आजादी पर पंजे गड़ा दिए. विरोध हुआ और प्रधानमंत्री ने भूल सुधार किया.

- राजस्थान सरकार भी चाहती थी कि अफसरों और न्यायाधीशों पर खबर लिखने से पहले उससे पूछा जाए. लोकतंत्र की बुनियाद बदलने की यह कोशिश भी अंतत: खेत रही.

- और सबसे महत्वपूर्ण कि बहुमत के बावजूद विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव से डरी सरकार ने संसद का पूरा सत्र गवां दिया लेकिन विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव रखने के हक का इस्तेमाल नहीं करने दिया.

लोकतंत्र बुनियादी रूप से सरकार से प्रश्न, उसकी आलोचना, विरोध और निष्पक्ष चुनाव (जिसमें इनकार या स्वीकार छिपा है) पर टिका है. ऊपर की चारों घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि लोकतंत्र की छाया में पले-बढ़े लोग उन्हीं मूल्यों का गला दबाना चाहते हैं जो उन्हें सत्ता तक लाए हैं.

प्रश्न
मध्य प्रदेश सरकार के चुने हुए प्रतिनिधि अपनी आजादी को सूली पर चढ़ाने जा रहे थे. सरकार चाहती थी कि वे वीआइपी सुरक्षा (खास तौर से मुख्यमंत्री की सुरक्षा), सांप्रदायिक राजनीति आदि पर सवाल न पूछें.

क्यों?

अगर जनता के नुमाइंदे भी सवाल नहीं पूछेंगे, तो भला कौन पूछेगा?

अमेरिका के अध्यक्षीय लोकतंत्र में प्रश्नोत्तरकाल नहीं है. अमेरिकी कांग्रेस इसे शुरू करने पर चर्चा कर रही है ताकि सांसद सरकार से सीधे सवाल पूछ सकें. संसदीय लोकतंत्र इस मामले में ज्यादा आधुनिक है. इसमें सदन का पहला सत्र ही प्रश्नकाल होता है यानी दिन की शुरुआत सरकार को सवालों में कठघरे में खड़ा करने से होती है.

संविधान निर्माता चाहते थे कि सरकारें हर छोटे-बड़े सवालों का सामना करें. उनसे मौखिक ही नहीं, लिखित जवाब भी मांगे जाएं. सवालों पर कोई रोक न हो. संसद की एक (आश्वासन) समिति सवालों में सरकार के झूठ सच पर निगाह रखती है.

अभी तक  सरकारें प्रश्न से जुड़ी सूचनाएं अभी एकत्रित की जा रही हैं कहकर बच निकलती थीं लेकिन अब तो उन्हें  सवालों से ही डर लग रहा है. कोई गारंटी नहीं कि मध्य प्रदेश जैसी कोशिश फिर नहीं होगी.

शायद इससे हमारे नुमाइंदों पर कोई फर्क नहीं पड़ता! उनके लिए लोकतंत्र का मतलब बदल चुका है.

विपक्ष
संसद में पहला अविश्वास प्रस्ताव 1963 में नेहरू के खिलाफ आया था. अब तक कुल 26 बार अविश्वास प्रस्ताव आए हैं जिनमें 25 असफल रहे. सिर्फ एक प्रस्ताव ऐसा था जिस पर मतदान से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने इस्तीफा दे दिया था.

इसके बावजूद संसद की परंपरा है, सभापति अविश्वास प्रस्ताव को किसी दूसरे कामकाज पर वरीयता देते हैं. यह सिद्ध करना संसद का दायित्व है कि देश को सरकार पर भरोसा है. सरकारें भी इस प्रस्ताव पर मतदान में देरी नहीं करतीं क्योंकि इसके गिरने से उन्हें ताकत मिलती है.

अचरज है कि इस बार बहुमत वाली सरकार जिसे कोई खतरा नहीं था, वह अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने से डर गई. उसने एक नई परंपरा शुरू कर दी. अब अगली सरकारें अविश्वास प्रस्ताव को रोकने के लिए खुद ही संसद नहीं चलने देंगी. दिलचस्प है कि विधायकों को सवाल पूछने से रोकने वाले मध्य प्रदेश सरकार के प्रस्ताव में यह प्रावधान भी था कि सत्ता पक्ष के विधायक विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ विश्वास प्रस्ताव ला सकते हैं.

हम विपक्ष या विरोध के बिना लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं कर सकते. यह समझना जरूरी है कि जिन्होंने तेजतर्रार विपक्ष के तमगे जुटाए थे, वे ही अब हर विरोध में षड्यंत्र देखते हैं और सरकार पर उठे हर सवाल को पाप मानते हैं.

सत्तारूढ़ राजनैतिक दलों के नेतृत्व को खुशफहमी की बीमारी सबसे पहले घेरती है. उन्हें वही बताया या सुनाया जाता है जो वे सुनना चाहते हैं. यह बीमारी उन्हें अधिनायक में बदलने लगती है. सवाल, आलोचनाएं, विरोध और निगहबानी वे आईने हैं जिनमें हर सरकार को अपना अक्स बार-बार देखना चाहिए, इन्‍हें तोडऩे वाले तुझे ख्याल रहे, अक्स तेरा भी बंट जाएगा कई हिस्सों में.


Sunday, April 15, 2018

हंगामा है यूं बरपा


- किस दूसरी पार्टी के पास होंगे इतने दलित सांसद और विधायकआंबेडकर स्मारकों से लेकर राष्ट्रपति बनाने तकदलित अस्मिता प्रतीकों को साधने में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी. फिर भी दलित समुदाय में भाजपा के खिलाफ गुस्सा खौल रहा है.

- नरेंद्र मोदी ने 2014 चुनाव का बिगुल फूंकने के साथ ही किसान रटना शुरू कर दिया था. सत्ता में आने के बाद फसल बीमाखाद की आपूर्तिजनधन से लेकर कर्ज माफी तक वह सब कुछ किया गया जो किसानों को राजनैतिक रूप से करीब रखने के लिए जरूरी था. लेकिन गुजरात और महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश तक किसान भाजपा सरकारों को सिर के बल खड़ा करने को बेताब हैं.

- मुद्रास्टार्ट अपस्किल इंडियामाइक्रोफाइनेंस... युवाओं का भला न भी हुआ हो लेकिन मोदी सरकार ने इस संवेदनशील राजनीतिक समूह को नीतियों को केंद्र में रखने की भरसक कोशिश की है लेकिन देश में युवा और छात्र सरकार के खिलाफ बगावत की मशालें जला रहे हैं. 

पोस्ट ट्रुथ (जब सार्वजनिक समझ अकाट्य तथ्यों पर आधारित न होकर भावनात्मक या आस्थाजन्य प्रचार से प्रभावित होती है) समय का पहला चरण नेताओं के नाम था. वे तथ्यहीन भावनात्मक उभार से जनमत बदल कर फलक पर छा गए. लेकिन क्या लोग अब भावना के क्षितिज से उतर कर सचाई की जमीन पर आने लगे हैंसरकार के चाणक्य यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जिन्हें उन्होंने सबसे ज्यादा दुलारा-पुचकारावे ही क्यों बागी हो चले हैं?

भाजपा सरकारों के विरोध में तनी दलितकिसान और युवा (पाटीदारमराठाजाटगूजर) मुट्ठियों को. सरकारी पार्टी विपक्षी साजिश की कथाओं में लपेट रही है लेकिन यह तर्क विपक्ष में अचानक इतनी ताकत भर देता है जो उसमें है ही नहीं. केंद्र से लेकर 20 राज्यों में बहुमत की ताकत से लैस सरकारों के सामने विपक्ष इतने सारे आंदोलन कैसे पैदा कर पा रहा है?

कुछ ऐसी आवाजें भी सुनाई पड़ती हैं कि सरकार लोगों तक अपनी बात नहीं पहुंचा पा रही है. ध्यान रखिए यह तर्क उस सरकार की तरफ से आ रहा हैअभी हाल तक जिसकी संवाद प्रयोगशालाओं पर अभिनंदन बरस रहे थे.

इस बहुआयामी घनीभूत विरोध की वजहें कुछ दूसरी हैं जो अपनी बांसुरी की बेसुरी धुन में मुग्ध सरकारों को शायद ही सुनाई दें. 

- जातीय और धार्मिक विभाजनों की परत के ऊपर आर्थिक विभाजन परत चढ़ी है. पिछले करीब एक दशक की मंदी ने भारतीय समाज को आर्थिक रूप से सुरक्षित और असुरिक्षत वर्गों में बांट दिया है. सरकारी कर्मचारीनिजी रोजगारीमझोले कारोबारीबड़े उद्योगपतिपेंशनयाफ्ता पहले वर्ग में हैं. मंदी से इनका कारोबार व कमाई भले ही न बढ़ी हो लेकिन उनका काम चल रहा है. इनका संगठित रसूख वेतन आयोग या जीएसटी की रियायतों में दिख जाता है. 

किसान और बेरोजगार युवा असुरक्षित आर्थिक तबके का हिस्सा हैंनई सरकार बनने के बाद जिनकी दुश्वारियां कई गुना बढ़ी हैं. जैसे कि पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा नई नौकरियां लाने वाले दूरसंचार उद्योग में 2015 के बाद से करीब 50,000 नौकरियां जा चुकी हैं. लगभग इतने ही लोग 2018 में बेकार हो जाएंगे. किसानों की मुसीबत ने ही सरकार को समर्थन मूल्य पर शीर्षासन करा दिया है.

सामाजिक अर्थशास्त्र बताता है कि मंदी हमेशा सबसे पहले सबसे निचले तबके को मारती है और ग्रोथ सबसे पहले सबसे ऊंचे तबके को फलती है. नोटबंदी व जीएसटी से सबसे पहले अकुशल लोगों का रोजगार गया. जातीय ढांचे में जो सबसे नीचे हैंआर्थिक क्रम में भी उनकी वही जगह है. इसलिए आर्थिक नाउम्मीदी का दर्द जातीय पहचानों के गुस्से में फूट रहा है.

- राजनीति में प्रतीकवाद बढ़ रहा है. पिछले तीन-चार साल में भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों ने दलितयुवाकिसान प्रतीकों को चमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. आंबेडकर के नाम पर इतना अधिक प्रचार कभी नहीं हुआ होगा.

एक सीमा से अधिक प्रतीकवाद गवर्नेंस के लिए राजनैतिक जोखिम बन जाता है. जमीन पर जब स्थितियां विपरीत हों और बदलाव न दिखे तो प्रतीकों को चमकाना चिढ़ पैदा करता है. भाजपा सरकारों का अति प्रचार और शून्य बदलाव झुंझलाहट और क्षोभ पैदा कर रहा है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बार आंदोलनों का चरित्र बदला हुआ है. सरकार से कुछ मांगा नहीं जा रहा है बल्कि जद्दोजहद हक को बचाने की है. दलितोंकिसानों और युवाओं को यह महसूस हो रहा है कि जो उन्हें  मिला थाउसे भी छीना जा सकता है. इसलिए सरकारों को बार-बार यथास्थिति बनाए रखने की दुहाई देनी पड़ रही है.

यह मोहभंग है या सरकारों पर अविश्वासलेकिन जो भी हैबेहद खतरनाक है. 

Monday, April 9, 2018

सूबेदारों पर दारोमदार



एक राजा था. उसके सिपहसालार धुरंधर थे. वे राजा के लिए जीत पर जीत लाते रहते थे. राजा नए सूबेदारों को जीते हुए सूबे सौंप कर अगली जंग में जुट जाता था.

फिर शुरू हुई सबसे बड़ी जंग की तैयारी. कवच बंधने लगे. सिपहसालारों ने जीते हुए मोर्चों का दौरा किया और थके से वापस लौट आए. राजा ने पूछा कि माजरा क्या है? एक पके हुए सलाहकार ने कहा कि हुजूर, यह जंग अब सिपहसालारों की नहीं रही. लोग अब सूबेदारों से जवाब मांग रहे हैं.

इस कहानी के पात्र रहस्यमय नहीं हैं. सरकारी पार्टी में यह किस्सा अलग-अलग संदर्भों के साथ बार-बार कहा-सुना जा रहा है. गुजरात से गोरखपुर तक वाया राजस्थान, मध्य प्रदेश सत्ता विरोधी तापमान बढऩे लगा है. पेशानी पर पसीना सवालों की इबारत में छलक रहा है. सूबेदार दिल्ली तलब होने लगे हैं.

तो सरकार से नाराजगी ने दिग्विजयी भाजपा को भी घेर लिया! 

लोकसभा चुनाव की भव्य जीत लेकर गुजरात तक, जीत पर जीत (बिहार व दिल्ली को छोड़कर) में झूमती भाजपा में किसी ने नहीं सोचा था कि लोग उनकी सरकारों से भी नाराज हो सकते हैं. गुजरात की हार जैसी जीत और उपचुनावों में बेजोड़ हार के बाद सरकार में ऐसे सवाल घुमड़ रहे हैं जिनका सामना हाल के वर्षों में किसी पार्टी ने नहीं किया. जाहिर है, इस तरह की निरंतर चुनावी विजय भी तो दुर्लभ थीं.

आर्थिक उदारीकरण के बाद पहली बार देश ने यह देखा कि पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं यानी कि क्लब फाइव (महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक) में तीन और उभरते हुए तीनों प्रमुख राज्यों (राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश) पर उस पार्टी का शासन है जो केंद्र में भी राज कर रही है. भारत के जो 11 राज्य (महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, केरल, बिहार, ओडिशा और संयुक्त आंध्र) 2020 तक देश की जीडीपी में 76 फीसदी के हिस्सेदार होंगे, उनमें सात (आंध्र प्रदेश अभी तक एनडीए में था) पर भाजपा का शासन है. इसके बाद तीन प्रमुख छोटी अर्थव्यवस्थाएं झारखंड, हरियाणा और असम भी भाजपा के नियंत्रण में हैं.

यह ऐसा अवसर था, जिसके लिए यूपीए सरकार दस साल तक तरसती रही. सुधारों के कई अहम प्रयोग इसी वजह से जमीन नहीं पकड़ सके क्योंकि बड़े और संसाधन संपन्न राज्यों से केंद्र के राजनैतिक रिश्तों में गर्मजोशी नहीं थी.

लेकिन क्या केंद्र व राज्यों में राजनैतिक रिश्तों के रसायन से मोदी सरकार के मिशन परवान चढ़ सके? मोदी सरकार पिछले एक दशक की पहली ऐसी सरकार है जिसने 'स्वच्छता' से 'उड़ान' यानी जमीन से लेकर आसमान तक कार्यक्रमों और मिशनों की झड़ी लगा दी, फिर भी सरकारों से नाराजगी ने घेर ही लिया! 

क्यों नहीं उम्मीदों पर खरी उतरी मोदी की टीम इंडिया?

1. राज्यों में पहले से ही मुख्यमंत्रियों के पास खासी ताकत थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पीएमओ केंद्रित राजनैतिक गवर्नेंस राज्यों का आदर्श बन गई. सत्ता का विकेंद्रीकरण न होने से जमीनी क्रियान्वयन और संवाद जड़ नहीं पकड़ सका जबकि दूसरी तरफ घोषणाओं का अंबार लगा दिया गया. अब बारी मोहभंग की है. उदाहरण के लिए गोरखपुर.

2. राज्यों का प्रशासनिक ढांचा थक चुका है. इसे कहीं ज्यादा कठोर और नए सुधारों की जरूरत है. लेकिन पिछले चार साल में किसी राज्य में कोई नया बड़ा क्रांतिकारी सुधार या प्रयोग नजर नहीं आया. योजना आयोग को समाप्त करने से फायदा नहीं हुआ. राज्यों के आर्थिक फैसलों में आजादी मिलने की बजाए नया स्कीम राज मिला जिसे पुराने ढांचे पर लाद दिया गया.

3. पिछले तीन साल में राज्यों की वित्तीय स्थिति बिगड़ी है. बिजली घाटों की भरपाई, कर्ज माफी और राजस्व में कमी के कारण राज्यों का समेकित घाटा बारह साल और बाजार कर्ज दस साल के सर्वोच्च स्तर पर है. यह हालत चौदहवें वित्त आयोग से अधिक संसाधन मिलने के बाद है. जीएसटी की असफलता ने राज्यों के खजाने की हालत और बिगाड़ दी है.

केंद्र व 20 राज्यों और करीब 60 फीसदी जीडीपी पर शासन के बाद भी भाजपा को अगर अपनी सरकारों से नाराजगी का डर है और कुछ राज्यों में सूबेदारों की तब्दीली के जरिए नाराजगी को कम करने की नौबत आन पड़ी है तो मानना चाहिए कि लोकतंत्र मजबूत हो रहा है. सरकारों से नाराजगी लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण है. 

गुजरात से गोरखपुर तक मतदाता यह एहसास कराने लगे हैं कि प्रत्येक चुनावी जीत अगली जीत की गारंटी नहीं है. क्या लोग सियासत और सरकार का फर्क समझने लगे हैं अगर ऐसा है तो फिर याद रखना होगा कि इन लाखों अनाम लोगों की एक उंगली में बला की ताकत है. 


Sunday, April 1, 2018

सबसे ज़हरीली जोड़ी


फ्रिट्ज (नोबेल 1918) केमिस्ट्री का दीवाना था. वह यहूदी से ईसाई बन गया और शोध से बड़ी ख्याति अर्जित की. बीएएसएफ तब जर्मनी की सबसे बड़ी केमिकल (आज दुनिया की सबसे बड़ी) कंपनी थी. उसे नाइट्रोजन का मॉलीक्यूल तोडऩे वाली तकनीक की तलाश थी ताकि अमोनिया उर्वरक बनाकर खेती की उपज बढ़ाई जा सके. हेबर ने 1909 में फॉर्मूला खोज लिया. उसने कार्ल बॉश के साथ मिलकर अमोनिया फर्नेस तैयार की और मशहूर हेबर-बॉश पद्धति पर आधारित पहला उर्वरक संयंत्र ओप्पूक में 1913 से शुरू हो गया.

अगले ही साल बड़ी लड़ाई छिड़ गई. जर्मनी के पास गोला-बारूद की कमी थी. टीएनटी विस्फोटक बनाने के लिए नाइट्रेट का आयात मुश्किल था. सरकार के निर्देश पर हेबर-बॉश की फैक्ट्रियां खाद की जगह बम बनाने लगीं. यप्रेस की दूसरी लड़ाई (1915) में फ्रेंच और सहयोगी सेना पर नाइट्रोजन बम का इस्तेमाल हुआ. हेबरजिसकी बदौलत जर्मनी चार साल तक जंग में टिक सका थावह नाजियों के नस्लवादी कानून का शिकार होकर (1934) ट्रिबलेस्की मे तंगहाली में मरा.

हेबर-बॉश पद्धति से बने उर्वरकों के कारण ही उपज बढ़ीजिससे आज दुनिया की तीन अरब आबादी का पेट भर रहा है.

फेसबुक की डेटा चोरी में हेबर के आविष्कार का अक्स नजर आ सकता है. अभिव्यक्ति और संवाद के नए जनतंत्र पर धूर्त सियासत के पंजे गडऩे लगे हैं. हमने राजनीति का अपराधी और कारोबारियों से रिश्ता देखा था लेकिन हमारी निजी जानकारियों से लैस कंपनियों और कुटिल नेताओं का गठजोड़ सर्वाधिक विस्फोटक हैजो हमारी सोच व तर्क को मारकर लोकतांत्रिक फैसलों पर नियंत्रण कर सकता है.

हर दुश्‍मन पहले से ज्‍यादा ताकतवर होता है. यह जोड़ी हमारी नई आजादी की नई दुश्‍मन है. वेब की दुनिया में हम निचाट नंगे हैं इसलिए इनकी कुटिलताओं में अनंत खतरे पैबस्‍त हैं. 

इतिहास हमें सिखाता है कि प्रत्येक बदलाव के पीछे पूर्व निर्धारित उद्देश्य नहीं होता. हम 'जो होगा अच्छा ही होगा' के शिकार हैं. संदेह और सवाल करना छोड़ देते हैं. अनुयायी हो जाते हैं. क्या हमने कभी सोचा कि

सेवा मुफ्त तो ग्राहक बिकता हैः 2016 में जब फेसबुक भारतीय टेलीकॉम कंपनियों के साथ मुफ्त इंटरनेट सुविधा देने की कोशिश कर रहा था तो विरोध हुआ लेकिन जब रेलवे ने गूगल के साथ मुफ्त वाइ-फाइ दिया तोसेवाओं का कारोबारउत्पादों से फर्क है. कंपनियां मुफ्त सुविधाएं देकर हमारी आदतें किसी होटल या कार वाले को बेच आती हैं. राजनीति व सूचना कंपनियों को पता है कि हमारी खपत और हमारा वोटदोनों को मनमाफिक मोड़ा जा सकता है. दोनों मिलकर हमें मुफ्तखोरी की अफीम चटाते हैं. 

हमें जानना होगा कि मुफ्तखोरी का कारोबार कल्याणकारी हरगिज नहीं है.

बहुत बड़ा होने के खतरेः प्रतिस्प‍र्धा की दीवानी दुनिया को अचरज क्यों नहीं हुआ कि उसके पास दर्जनों कारफूडविमान कंपनियां हैं लेकिन अमेजनगूगल या फेसबुक इकलौते क्यों हैं. शेयर बाजार में गूगल फेसबुकएपल का संयुक्त मूल्य (कैपिटलाइजेशन) फ्रांसजर्मनीकनाडा के पूरे शेयर बाजार से ज्यादा है. हमने इन्हें इतना बड़ा कैसे होने दियाभारत में भी कई सेवाओं में कुछ कंपनियों का ही राज है.  

हमें प्रतिस्पर्धा के लिए लडऩा होगा ताकि कोई इतना बड़ा न हो सके कि हमारी आजादी ही छोटी पड़ जाए.

महानता और ताकतः राजनीति में हम महानता और ताकत के बीच अंतर करना भूल जाते हैं. सियासी ताकत के लिए लोगों को बांटना जरूरी हैजिसके लिए नेताओं को बमों से लेकर बैंक और लोगों की निजी जानकारी तक प्रत्येक ताकतवर चीज पर नियंत्रण चाहिए. हमारे निजी डेटा के लिए वे कुछ भी कर गुजरने को उत्सुक हैं. नेता आजकल यह बताते मिल जाएंगे कि आपका व्यवहार जानकर वे आपको अच्छा नागरिक बना सकते हैं. अचरज नहीं कि जापान से लेकर यूरोप तक कट्टर राजनैतिक ताकतों में सोशल नेटवर्क के प्रति गजब की दीवानगी है.

लोकतंत्र हमें यह शक्ति देता है कि हम नेताओं को यह बता सकें कि उन्हें हमारे लिए क्या करना चाहिए.

अमेरिका और एशिया में राजनीति-सोशल नेटवर्क का गठजोड़ ज्यादा विध्वंसक है. लेकिन यूरोप ने इतिहास से सीखा है कि किसी के बहुत ताकतवर होने के क्या खतरे हैं. सोशल नेटवर्क पर तैरता निजी डेटा हेबर-बॉश प्रोसेस है. इससे पहले कि राजनेता इससे बम बना लेंयूरोप के नए कानून सोशल मीडिया के लोकतंत्र को नेता-कंपनी गठजोड़ से बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं. यूरोपीय समुदाय में अगले दो माह के भीतर वहां जीडीपीआर (जनरल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स) यानी डेटा सुरक्षा के नए नियम लागू हो जाएंगे. वित्तीय उत्पादों के साथ एकत्र होने वाली निजी सूचनाएं बेचने पर भी रोक लग गई .

हमें यह सचाई कब समझ में आएगी कि नेता पहाड़ को नदी से लड़वा सकते हैं और नदी को मछलियों से. नेताओं को दुनिया की एकता का नेटवर्क दे दीजिएवे उस पर भी युद्ध करा देंगे. राजनेताओं को नियंत्रण में रखिये इससे पहले कि वह हमें ढोर-ढंगर बनाकर हांकने लगें.