Tuesday, January 27, 2015

जिनपिंग का स्वच्छता मिशन

जिनपिंग का शुद्धिकरण अभियानग्लोबल कूटनीति को गहरे रोमांच से भर रहा है.
शी जिनपिंग को क्या हो गया है? ग्रोथ को किनारे लगाकर भ्रष्टाचार के पीछे क्यों पड़ गए हैं? यह झुंझलाहट एक बड़े विदेशी निवेशक की थी जो हाल में बीजिंग से लौटा था और चीन के नए आर्थिक सुधारों पर बुरी तरह पसोपेश में था. कोई सरकार अपनी ही पार्टी के 1.82 लाख पदाधिकारियों पर भ्रष्टाचार को लेकर कार्रवाई कर चुकी हो, यह किसी भी देश के लिए सामान्य बात नहीं है. उस पर भी अगर चीन की सरकार अपनी कद्दावर कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेताओं व सेना अधिकारियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वच्छता अभियान चला रही हो तो अचरज कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि भ्रष्टाचार चीन की विशाल आर्थिक मशीन का तेल-पानी है.
निवेशकों के लिए यह कतई अस्वाभाविक है कि चीन बाजार में एकाधिकार रोकने व पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बड़े जतन से हासिल की गई ग्रोथ को न केवल 24 साल के सबसे कम स्तर पर ला रहा है बल्कि इसे सामान्य (न्यू नॉर्मल) भी मान रहा है. यकीनन, भारतीय प्रधानमंत्री की कूटनीतिक करवट दूरगामी है. अमेरिका व भारत के रिश्तों की गर्मजोशी नए फलसफे लिख रही है, अलबत्ता ग्रोथ की तरफ लौटता अमेरिका दुनिया में उतनी उत्सुकता नहीं जगा रहा है जितना कौतूहल, पारदर्शिता के लिए ग्रोथ को रोकते चीन को लेकर है. चीन की महाशक्ति वाली महत्वाकांक्षाएं रहस्य नहीं हैं, हालांकि सुपर पावर बनने के लिए जिनपिंग का भीतरी शुद्धिकरण अभियान, ग्लोबल कूटनीति को गहरे रोमांच से भर रहा है.
चीन में भ्रष्टाचार मिथकीय है. बीते मार्च में जब चाइना पीपल्स आर्मी के कद्दावर जनरल ग्यु जुनशान को भ्रष्टाचार में धरा गया तो चीन को निओहुलु होशेन (1799) याद आ गया. सम्राट क्विएनलांग का यह आला अफसर इतना भ्रष्ट था कि उसके यहां छापा पड़ा तो चांदी के 80 करोड़ सिक्के मिले जो सरकार के दस साल के राजस्व के बराबर थे, 53 साल की उम्र में उसे मौत की सजा हुई. चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, जनरल ग्यु जुनशान के यहां 9.8 करोड़ डॉलर की संपत्ति मिली और अगर पश्चिमी मीडिया की खबरें ठीक हैं तो जुनशान के घर से बरामद नकदी, शराब, सोने की नौका और माओ की स्वर्ण मूर्ति को ढोने के लिए चार ट्रक लगाए गए थे.
मुहावरा प्रिय भारतीयों की तरह, 2013 में शी जिनपिंग ने कहा था कि भ्रष्टाचार विरोधी अभियान सिर्फ मक्खियों (छोटे कारकुनों) के खिलाफ नहीं चलेगा बल्कि यह शेरों (बड़े नेताओं-अफसरों) को भी पकड़ेगा. जाहिर है, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता, सरकारी मंत्री, सेना और सार्वजनिक कंपनियों के प्रमुख विशाल भ्रष्ट तंत्र के संरक्षक जो हैं. बड़े रिश्वतखोरों को पकड़ता और नेताओं को सजा देता, सेंट्रल कमिशन फॉर डिसिप्लनरी ऐक्शन (सीसीडीआइ) पूरे चीन में खौफ का नया नाम है. इसने चीनी राजनीति के तीन बड़े गुटों—'पेट्रोलियम गैंग’, 'सिक्योरिटी गैंग और 'शांक्सी गैंग’ (बड़े राजनैतिक नेताओं का गुट) पर हाथ डाला है, जो बकौल शिन्हुआ 'टाइगर्स कहे जाते हैं. दिलचस्प है कि जिनपिंग के करीबी वैंग क्विशान के नेतृत्व में सीसीडीआइ का अभियान गोपनीय नहीं है बल्कि खौफ पैदा करने के लिए यह अपने ऐक्शन का खूब प्रचार कर रहा है और भ्रष्टाचार को लेकर डरावनी चेतावनियां जारी कर रहा है. ग्लोबल निवेशकों की उलझन यह है कि जिनपिंग, निर्यात आधारित ग्रोथ मॉडल को जारी रखने को तैयार नहीं हैं. वे अर्थव्यवस्था से कालिख की सफाई को सुधारों के केंद्र में लाते हैं. पिछले नवंबर में जी20 शिखर बैठक के बाद बीजिंग लौटते ही जिनपिंग ने कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल इकोनॉमिक वर्क कॉन्फ्रेंस में नया आर्थिक सुधार कार्यक्रम तय किया था, जो कंपनियों का एकाधिकार खत्म करने, सही कीमतें तय करने, पूंजी व वित्तीय बाजारों के उदारीकरण, निजीकरण और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता पर केंद्रित होगा.
मंदी से उबरने की जद्दोजहद में जुटी दुनिया के लिए चीन के ये शुद्धतावादी आग्रह मुश्किल बन रहे हैं. चीन दुनिया की सबसे बड़ी फैक्ट्री है जो ग्लोबल ग्रोथ को अपने कंधे पर लेकर चलती है और इस समय दुनिया में मांग व तेज विकास की वापसी का बड़ा दारोमदार चीन पर ही है. जबकि मूडीज के मुताबिक पारदर्शिता की इस मुहिम से शुरुआती तौर पर चीन में खपत, निवेश व बचत घटेगी. महंगे रेस्तरांओं की बिक्री गिर रही है, बैंकों में सरकारी कंपनियों का जमा कम हुआ है और अचल संपत्ति में निवेश घटा है. चीनी मीडिया में राष्ट्रपति की ऐसी टिप्पणियां कभी नहीं दिखीं कि वे 'भ्रष्टाचार की सेना’ से लडऩे को तैयार हैं और इसमें 'किसी व्यक्ति को जिंदगी-मौत अथवा यश-अपयश की फिक्र’ नहीं होनी चाहिए. लेकिन जिनपिंग की टिप्पणियों (भ्रष्टाचार पर उनके भाषणों का नया संग्रह इसी माह जारी) को देखकर यह समझा जा सकता है कि चीन के राष्ट्रपति इस तथ्य से पूरी तरह वाकिफ हैं कि भ्रष्टाचार महंगाई बढ़ाता है और अवसर सीमित करता है, इसलिए आर्थिक तरक्की का अगला दौर इसी स्वच्छता से निकलेगा और इसी राह पर चलकर चीन को महाशक्ति बनाया जा सकता है.
भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान, जिनपिंग की सबसे बड़ी ग्लोबल पहचान बन रहा है जैसे कि देंग श्याओ पेंग आर्थिक उदारीकरण से पहचाने गए थे. हू जिंताओ ने राष्ट्रपति के तौर पर अपने अंतिम भाषणों में चेताया था कि लोगों के गुस्से की सबसे बड़ी वजह सरकारी लूट है. जिनपिंग को पता है कि यह लूट रोककर न केवल ग्रोथ लाई जा सकती है बल्कि अकूत सियासी ताकत भी मिलेगी.
ग्लोबल कूटनीति और निवेश के संदर्भ में नरेंद्र मोदी का भारत और जिनपिंग का चीन कई मायनों में एक जैसी उम्मीदों व अंदेशों से लबरेज है. ओबामा ग्लोबल राजनीति से विदा होने वाले हैं, दुनिया की निगाहें अब मोदी और जिनपिंग पर हैं. आकाश छूती अपेक्षाओं के शिखर पर सवार मोदी, क्या पिछले नौ माह में ऐसा कुछ कर सके हैं, जो उन्हें बड़ा फर्क पैदा करने वाला नेता बना सके? दूरदर्शी नेता हमेशा युगांतरकारी लक्ष्य चुनते हैं. मोदी को अपने लक्ष्यों का चुनाव करने में अब देर नहीं करनी चाहिए.


Monday, January 19, 2015

भूमिहीन मेक इन इंडिया

जमीन की सहज सप्लाई में वरीयता किसे मिलनी चाहिएनिरंतर रोजगार देने वाले मैन्युफैक्चरर को या फिर दिहाड़ी रोजगार देने वाले ‘‘बॉब द बिल्डर’’ को?
दि आप मामूली यूएसबी ड्राइव बनाने की फैक्ट्री लगाना चाहते हैं, जो चीन से इस कदर आयात होती हैं कि सरकार के मेक इन इंडिया का ब्योरा भी पत्रकारों को चीन में बनी पेन ड्राइव में दिया गया था, तो जमीन हासिल करने के लिए आपको कांग्रेसी राज के उसी कानून से जूझना होगा, जो वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक इक्कीसवीं सदी की जरूरतों के माफिक नहीं है. अलबत्ता अगर आप सरकार के साथ मिलकर एक्सप्रेस-वे, इंडस्ट्रियल पार्क अथवा लग्जरी होटल-हॉस्पिटल बनाना चाहते हैं तो नए अध्यादेश के मुताबिक, आपको किसानों की सहमति या परियोजना के जीविका पर असर को आंकने की शर्तों से माफी मिल जाएगी. यह उस बहस की बानगी है जो वाइब्रेंट गुजरात और बंगाल के भव्य आयोजनों के हाशिए से उठी है और निवेश के काल्पनिक आंकड़ों में दबने को तैयार नहीं है. इसे मैन्युफैक्चरिंग बनाम इन्फ्रास्ट्रक्चर की बहस समझने की गलती मत कीजिए, क्योंकि भारत को दोनों ही चाहिए. सवाल यह है कि जमीन की सहज सप्लाई में वरीयता किसे मिलनी चाहिए, निरंतर रोजगार देने वाले मैन्युफैक्चरर को या फिर दिहाड़ी रोजगार देने वाले ‘‘बॉब द बिल्डर’’ को? मेक इन इंडिया के तहत तकनीक, इनोवेशन लाने वाली मैन्युफैक्चरिंग को या टोल रोड बनाते हुए, कॉलोनियां काट देने वाले डेवलपर को?
जमीनें जटिल संसाधन हैं. एक के लिए यह विशुद्ध जीविका है तो दूसरे के लिए परियोजना का कच्चा माल है जबकि किसी तीसरे के लिए जमीनें मुनाफे का बुनियादी फॉर्मूला बन जाती हैं. जमीन अधिग्रहण के नए कानून और उसमें ताबड़तोड़ बदलावों ने इन तीनों हितों का संतुलन बिगाड़ दिया है. पुराने कानून (1894) के तहत मनमाने अधिग्रहण होते थे जिनमें किसानों को पर्याप्त मुआवजा भी नहीं मिलता था. पिछली सरकार ने विपह्न की सहमति से नए कानून में 21वीं सदी का मुआवजा तो सुनिश्चित कर दिया लेकिन नया कानून किसानों की सियासत पर केंद्रित था इसलिए विकास के लिए जमीन की सप्लाई थम गई. बीजेपी ने अध्यादेशी बदलावों से कानून को जिस तरह उदार किया है उससे फायदे चुनिंदा निवेशकों की ओर मुखातिब हो रहे हैं, जिससे जटिलताओं की जमीन और कडिय़ल हो जाएगी. 
खेती के अलावा, जमीन के उत्पादक इस्तेमाल के दो मॉडल हैं. एक बुनियादी ढांचा परियोजनाएं है जहां जमीन ही कारोबार व मुनाफे का बुनियादी आधार है. दूसरा ग्राहक मैन्युफैक्चरिंग है जहां निवेशकों के लिए भूमि, परियोजना की लागत का हिस्सा है, क्योंकि फैक्ट्री का मुनाफा तकनीक और प्रतिस्पर्धा पर निर्भर है. सड़क, बिजली, आवास, एयरपोर्ट की बुनियादी भूमिका और जरूरत पर कोई विवाद नहीं हो सकता लेकिन स्वीकार करना होगा कि सरकारी नीतियां इन्फ्रास्ट्रक्चर ग्रंथि की शिकार भी हैं. आर्थिक विकास की अधिकांश बहसें बुनियादी ढांचे की कमी से शुरू होती हैं. रियायतों, कर्ज सुविधाओं और परियोजनाओं में सरकार की सीधी भागीदारी (पीपीपी-सरकारी गारंटी जैसा है) का दुलार भी महज एक दर्जन उद्योग या सेवाओं को मिलता है. सरकार की वरीयता बैंकों की भी वरीयता है इसलिए, इन्फ्रास्ट्रक्चर और पीपीपी परियोजनाओं में भारी कर्ज फंसा है.
संशोधित भूमि अधिग्रहण कानून से जमीन की सप्लाई में आसानी होगी लेकिन सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर उद्योगों के लिए. इन उद्योगों में चार गुना कीमत देकर खरीदी गई जमीन से भी मुनाफा कमाना संभव है क्योंकि मकान, एयरपोर्ट और एक्सप्रेस-वे इत्यादि बनाने में जमीन के कारोबारी इस्तेमाल की अनंत संभावनाएं हैं. अलबत्ता मैन्युफैक्चरिंग उद्योग के लिए सस्ती जमीन तो दूर, उन्हें वह सभी शर्तें माननी होंगी, जिनसे इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपर को मुक्ति मिल गई है. इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए सुविधाएं और रियायतें पहले से हैं, मैन्युफैक्चरिंग को लेकर उत्साह, मोदी के मेक इन इंडिया अभियान के बाद बढ़ा है. मैन्युफैक्चरिंग स्थायी और प्रशिक्षित रोजगार लाती है जबकि कंस्ट्रक्शन उद्योग दैनिक और अकुशल श्रमिक खपाता है. निवेशक यह समझ रहे थे कि सरकार स्थायी नौकरियों को लेकर गंभीर है इसलिए मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा. ध्यान रखना जरूरी है कि मैन्युफैक्चरिंग के दायरे में सैकड़ों उद्योग आते हैं जबकि जिन उद्योगों के लिए कानून उदार हुआ है, वहां मुट्ठी भर बड़ी कंपनियां ही हैं. इसलिए बदलावों का फायदा चुनिंदा उद्योगों और कंपनियों के हक में जाने के आरोप बढ़ते जाएंगे.

बीजेपी की मुश्किल यह है कि पिछले भूमि अधिग्रहण कानून में कई बदलाव सुमित्रा महाजन, वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष, के नेतृत्व वाली संसदीय समिति की सिफारिश से हुए थे. सर्वदलीय बैठकों से लेकर संसद तक बीजेपी ने बेहद सक्रियता के साथ जिस नए भूमि अधिग्रहण कानून की पैरवी की, नए संशोधन उसके विपरीत हैं. कांग्रेस सरकार ने नए कानून पर सर्वदलीय सहमति बनाई थी, बीजेपी ने तो इन संवेदनशील बदलावों से पहले सियासी तापमान परखने की जरूरत भी नहीं समझी. दरअसल, मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण कानून को तर्कसंगत बनाने का मौका चूक गई है. मैन्युफैक्चरिंग सहित अन्य उद्योगों को इसमें शामिल कर कानून को व्यावहारिक बनाया जा सकता था ताकि रोजगारपरक निवेश को प्रोत्साहन मिलता. वैसे भी इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए जमीन का  व्यापक और एकमुश्त अधिग्रहण चाहिए जिनमें समय लगता है. मैन्युफैक्चरिंग के लिए जमीन की आपूर्ति बढ़ाकर रोजगार सृजन के सहारे विरोध के मौके कम किए जा सकते थे. कांग्रेस ने नया कानून बनाते हुए और बीजेपी ने इसे बदलते हुए इस तथ्य की अनदेखी की है कि जमीन का अधिकतम उत्पादक इस्तेमाल बेहद जरूरी है. कांग्रेस का भूमि अधिग्रहण कानून, विकास की जरूरतों के माफिक नहीं था लेकिन बीजेपी के बदलावों के बाद यह न तो मेक इन इंडिया के माफिक रहा है और न किसानों के. भूमि अधिग्रहण कानून 21वीं सदी का तो है मगर न किसान इसके साथ हैं और न बहुसंख्यक उद्योग. अब आने वाले महीनों में जमीनें विकास और रोजगार नहीं, सिर्फ राजनीति की फसल पैदा करेंगी.

Tuesday, January 13, 2015

संयम की नियंत्रण रेखा

भारत ग्लोबल कूटनीति में जब निर्णायक करवट की दहलीज पर खड़ा हैतब पाकिस्तान सबसे बड़ी दुविधा बन गया है।

पाकिस्तान को लेकर मोदी का आशावाद, उनकी सरकार के शपथ ग्रहण के साथ ही खत्म हो जाना स्वाभाविक ही था. हैरत तो, दरअसल, उस वक्त हुई जब पाकिस्तान को लेकर मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी साबित नहीं हुए. कश्मीर के अलगाववादी नेता शब्बीर शाह और पाकिस्तानी राजदूत अब्दुल बासित के बीच मुलाकात के बाद अगस्त में दोनों मुल्कों की सचिव स्तरीय वार्ताएं न केवल रोक दी गईं बल्कि सरकार ने रिश्तों की रूल बुक यानी शिमला समझौते व लाहौर घोषणा को सामने रखते हुए सख्ती के साथ स्पष्ट कर दिया कि कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान ही बात करेंगे, कोई तीसरा पक्ष नहीं रहेगा. मोदी सरकार का रुख साफ था कि इस अहमक पड़ोसी को लेकर न तो कांग्रेस की परंपरा चलेगी और न वाजेपयी की. पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देने की नीति तय करने के बाद मोदी ग्लोबल अभियान पर निकल गए थे क्योंकि उम्मीद थी कि पाकिस्तान बदलाव को समझते हुए संतुलित रहेगा. लेकिन पिछले छह माह में पाकिस्तान के पैंतरों ने भारत को चौंकाया है. कूटनीतिक व प्रतिरक्षा नियंता लगभग मुतमईन हैं कि पाकिस्तान, भारत को लंबे वार गेम में उलझना चाहता है. पसोपेश यह है कि ऐसे में सरकार के संयम की नियंत्रण रेखा क्या होनी चाहिए? वाजपेयी या कांग्रेस की तरह प्रतिरक्षात्मक रहना कितना कारगर साबित होगा?
भारत -पाक रिश्तों के इतिहास में भाजपाई नेतृत्व वाला हिस्सा छोटा जरूर है लेकिन बेहद निर्णायक रहा है. इसकी तुलना में राजीव-बेनजीर समझौते यानी अस्सी के दशक के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में, दोतरफा रिश्तों का रसायन ठंडा ही रहा. वाजपेयी वैचारिक रूप से पाकिस्तान बनाने के सिद्धांत के विपरीत थे लेकिन पड़ोसी को लेकर उनकी सदाशयता और सकारात्मकता ने उन्हें कभी दो-टूक नहीं होने दिया, जिसका नुक्सान भी हुआ. फरवरी 1999 में वाजपेयी के नेतृत्व में अमन की बस लाहौर पहुंची तो दोस्ती के गीत बजे लेकिन मई आते आते करगिल हो गया और पूरा देश पाकिस्तान के खिलाफ घृणा से भर गया. 2001 में आगरा की शिखर बैठक में दोस्ती की एक असफल कोशिश हुई लेकिन 2002 में संसद पर हमले के बाद माहौल और बिगड़ गया. वह पहला मौका था जब वाजपेयी दो-टूक हुए, भारतीय सेना सीमा की तरफ बढ़ी और मुशर्रफ ने नरम पड़ते हुए, आतंक पर रोकथाम का वादा किया जो कभी पूरा नहीं हुआ
मोदी के शपथग्रहण में नवाज शरीफ की मौजूदगी, वाजपेयी मॉडल का हिस्सा थी लेकिन जब अगस्त में दो-टूक तेवरों के साथ पाकिस्तान से वार्ता रोकी गई तो साफ हो गया कि मोदी खुद को वाजपेयी की तरह पाकिस्तान से उलझए नहीं रखेंगे. पाकिस्तान से रिश्ते, उनकी ग्लोबल डिजाइन का एक छोटा-सा हिस्सा हैं.
मोदी की वैश्विक महत्वाकांक्षाएं रहस्य नहीं हैं. उन्होंने घरेलू गवर्नेंस की अनदेखी का जोखिम उठा कर खुद को विश्व मंच पर स्थापित करने की कोशिश की है. अलबत्ता उनकी कोशिशों में पड़ोसी ही बाधा बने हैं. चीन ने आंख में आंख डालकर घुसपैठ की और पाकिस्तान ने तो बारूदी मोर्चा ही खोल दिया. गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा, मोदी के नए नवेले ग्लोबल कूटनीतिक अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है और मोदी इसे हर तरह से भव्य व निरापद रखना चाहते थे. लेकिन यह आयोजन आतंक, असुरक्षा और अंदेशों का साये में आ ही गया है जो पाकिस्तान की डिजाइन का मकसद है. दरअसल, मोदी ने जब अगस्त में पाकिस्तान से वार्ताएं रोकीं थीं तब तक न तो उनकी ग्लोबल योजनाएं स्पष्ट थीं और न ही ओबामा के भारत आने का कार्यक्रम था. लेकिन अब जब भारत अपनी ग्लोबल कूटनीति में निर्णायक करवट की दहलीज पर खड़ा है, तब विदेश और प्रतिरक्षा संवादों से गुजरते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि पाकिस्तान को लेकर भारत की दो-टूक रणनीति को दुविधाओं ने घेर लिया है.
 पाकिस्तान को लेकर मोदी के तेवर उनके चुनाव अभियान के माफिक हैं, जो पिछली सरकार की पाकिस्तान नीति को लचर साबित करता था. यही वजह है कि जब पाकिस्तान की हरकतों से मोदी की सख्त छवि सवालों में घिरी, तो सीमा पर प्रतिरक्षा तंत्र ने ऐलानिया जवाबी कार्रवाई की. रक्षा और गृह मंत्रियों के बेलाग लपेट बयान भी यह बताते हैं कि रक्षा तंत्र, कांग्रेस व वाजपेयी के दौर की प्रतिरक्षात्मक रणनीति से आगे निकल आया है. अरब सागर में आग लगने के बाद डूबी नौका में आतंकी थे या नहीं, यह बात दीगर है लेकिन इसे लेकर सुरक्षा बलों ने जो सक्रियता दिखाई वह बताती है कि करगिल व 26/11 के बाद रक्षा बल किसी तरह का जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं. कूटनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि अगर ओबामा की यात्रा से पहले या बाद में भी, पाकिस्तान प्रेरित बड़ा दुस्साहस होता है तो भारत के लिए फैसले की कठिन घड़ी होगी क्योंकि सीमा पर बात काफी आगे बढ़ चुकी है. 
 मोदी ने वहीं से शुरुआत की है जहां वाजपेयी ने छोड़ा था. वाजपेयी का अंतिम बड़ा निर्णय आक्रामक ही था जब संसद पर हमले के बाद सेना को सीमा की तरफ बढ़ाया गया था. वाजपेयी से मोदी तक आते पाकिस्तान ज्यादा आक्रामक, विघटित और अविश्वसनीय हो गया है. पाकिस्तान को लेकर वाजपेयी जैसी सदाशयता मोदी की, ग्लोबल महत्वाकांक्षाओं के माफिक है और  घरेलू राजनीति में लोकप्रिय बने रहने के लिए इंदिरा गांधी वाला हॉट परस्यूट कारगर है.  दोनों विकल्पों के अपने नुक्सान हैं लेकिन मोदी कांग्रेस की तरह बीच में नहीं टिक सकते, क्योंकि पाकिस्तान से उनके रिश्तों की शुरुआत दो-टूक हुई है. उन्हें वाजपेयी बनना होगा या इंदिरा गांधी. 2015 में मोदी के इस चुनाव का नतीजा भी आ ही जाएगा और देश को उसके असर के लिए तैयार रहना होगा.

Monday, January 5, 2015

बेहद सख्त है यह जमीन

लगभग हर राज्य भूमि अधिग्रहण विवादों की बारूदी सुरंगों पर बैठा है। मोदी की मुश्किल यह है कि खाद्य उत्पादों की कीमतें घटने और समर्थन मूल्यों में बढ़त पर रोक से माहौलअबखेती के खिलाफ हो रहा  है 

 माम लोकप्रियता के बावजूद मोदी सरकार के लिए किसानों को यह समझ पाना शायद सबसे मुश्किल होगा कि जमीन का अधिग्रहण तर्कसंगत है, ठीक उसी तरह जैसे कांग्रेस सरकार निवेशकों को समझने में नाकाम रही थी कि वह आर्थिक सुधारों की राह पर आगे बढ़ रही है. जमीन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनैतिक कौशल की सबसे कड़ी परीक्षा लेने वाली है.
भूमि अधिग्रहण को उदार करने के साथ जमीन, गांव, किसान, खेती और स्वयंसेवी संगठन राजनैतिक बहसों के केंद्र में वापस लौट रहे हैं, जो बीजेपी के हाइ-प्रोफाइल चुनावी विमर्श से बाहर थे. कानून में अध्यादेशी बदलाव साहसिक हैं लेकिन शुरुआत सहमति से होती तो बेहतर था, क्योंकि जमीन को लेकर संवेदनशीलता चरम पर है. भूमि की जमाखोरी व मनमाने कब्जे माहौल बिगाड़ चुके हैं और लगभग हर राज्य भूमि अधिग्रहण विवादों की बारूदी सुरंगों पर बैठा है. इस संवेदनशील कानून को उदार करते हुए किस्मत, सरकार के साथ नहीं है. देशी व विदेशी माहौल में बदलाव से खेती के अच्छे दिन कमजोर पड़ रहे हैं. 2008 से 2014 के बीच फसलों का समर्थन मूल्य 130 फीसदी बढ़ा जबकि इससे पहले आठ वर्षों में बढ़ोतरी केवल 30 फीसदी थी. 2009 से 2013 के बीच सरकार ने बफर स्टॉक की जरूरत से दोगुना-तिगुना अनाज खरीद डाला. समर्थन मूल्यों में इस कदर इजाफा और अनाज की भारी सरकारी खरीद तर्कसंगत नहीं थी. लेकिन इससे बाजार खेती माफिक हो गया. मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद समर्थन मूल्य पर बोनस तय करने में राज्यों के अधिकार सीमित कर दिए. यह पाबंदी भी व्यावहारिक थी लेकिन बीजेपी के भीतर और संसद में भी इसका विरोध हुआ है. पिछले एक दशक में खेती में चार फीसदी की औसत ग्रोथ के बावजूद 2009 से 2014 तक खाद्य उत्पादों में महंगाई का गणित खेती के पक्ष में था. कृषि उत्पादों का ग्लोबल बाजार बढऩे से 2010 से 2013 के बीच भारत का कृषि निर्यात भी तिगुना हो गया. नेशनल सैंपल सर्वे की ताजा रिपोर्ट बताती है कि बेहतर खेती और ग्रामीण रोजगार गारंटी पर भारी खर्च के चलते कृषि मजदूरी छह फीसदी (महंगाई निकाल कर) सालाना की दर से बढ़ी है जो पिछले एक दशक में सर्वाधिक है. हालांकि सर्वे यह भी बताता है कि खेती के लिए सबसे अच्छे दशक के दौरान करीब 52 फीसदी किसान कर्ज में दब गए. उन पर बकाया कर्ज में 26 फीसदी हिस्सा सूदखोर महाजनों का है. खाद्य उत्पादों की कीमतें घटने, समर्थन मूल्यों में बढ़त पर रोक और कमॉडिटी के ग्लोबल बाजार में गिरावट के बीच माहौल, अब, खेती के खिलाफ है और किसान आत्महत्याएं इसे और पेचीदा बना रही हैं. इसलिए भूमि अधिग्रहण को लेकर संवेदनशीलता कई गुना बढऩे वाली है. ग्रामीण, किसान और स्वयंसेवी संगठनों की राजनीति के लिए जमीन पूरी तरह तैयार है क्योंकि अध्यादेश के बाद कई पैमानों पर भूमि अधिग्रहण की व्यवस्था, 2013 के कानून से पहले वाली स्थिति में होगी. जहां निजी-सरकारी भागीदारी की परियोजनाओं सहित लगभग सभी बड़े निर्माणों के लिए भू-स्वामियों की अनुमति या अधिग्रहण के जीविका पर असर के आकलन की शर्त हटा ली गई है.
इस विरोध को थामने के लिए बीजेपी का राजनैतिक हाथ जरा तंग है. भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव पर पार्टी के सांसदों व संघ परिवार को टटोलते हुए, इस असमंजस को खुलकर महसूस भी किया जा सकता है. मोदी का पूरा चुनाव अभियान शहरों से संवाद करता था, गांव चर्चा में नहीं थे. संघ परिवार से मदद की गुंजाइश कम ही है क्योंकि स्वदेशी जागरण मंच तो यूपीए से भी सख्त अधिग्रहण कानून का मसौदा बनाकर बैठा था. बीजेपी शहरों की पार्टी है, चहेते उद्योगों को नवाजने के आरोप उसकी पीठ पर लदे हैं जो भूमि अधिग्रहण को उदार बनाने के तर्कों की चुगली खाएंगे. कांग्रेस चुनाव के खौफ में थी इसलिए उसने सभी पक्षों से मशविरा किए बगैर एक बेतुका भूमि अधिग्रहण कानून देश पर थोप दिया, जिससे न किसानों को फायदा मिला और न उद्योगों को. ठीक उसी तरह बीजेपी आर्थिक सुधारों पर अपनी साख बचाने के लिए अध्यादेश लेकर कूद पड़ी है जिसके आधार पर न तो अधिग्रहण होगा और न ही निवेश. संसद से मंजूरी व सहमति के बाद ही बात आगे बढ़ेगी.
सरकार इस कानून में बदलावों पर आम राय की कोशिश के जरिए संभावित विरोध की धार को कुछ कम कर सकती थी. दिलचस्प है कि सरकार के इस बड़े राजनैतिक जोखिम के बावजूद उद्योग खुश नहीं है क्योंकि गैर बुनियादी ढांचा निवेश के लिए अधिग्रहण की शर्तें जस की तस हैं और ज्यादातर निवेश मैन्युफैक्चरिंग में ही होना है. दरअसल, अध्यादेश का दंभ दिखाकर सरकार ने भूमि अधिग्रहण की जमीन को और पथरीला कर लिया है. मोदी उस समय गुजरात के मुखिया थे जब सितंबर 2012 में सुरेंद्रनगर व मेहसाणा जिलों के 44 गांवों को मिलाकर मंडल बेचराजी स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन बनाने की अधिसूचना जारी हुई थी. एक साल तक चला विरोध अंतत: गांधीनगर तक पहुंचा और अगस्त 2013 में स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन का दायरा घटाते हुए में 36 गांवों को अधिग्रहण से बाहर किया गया. गुजरात बीजेपी के नेता भी मानते हैं कि 12 वर्ष में पहली बार किसी जनांदोलन के सामने मोदी सरकार को हथियार डालने पड़े थे. भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के साथ मोदी सरकार, राजनीति के महत्वपूर्ण मोड़ पर आ खड़ी हुई है. विकास के लिए जमीन की आपूर्ति और भूमि अधिकारों की हिफाजत के बीच संतुलन बेहद नाजुक है.
मोदी को अब न केवल संघ परिवार और विपक्ष की भरपूर मदद चाहिए बल्कि व्यापक जनसमर्थन की भी जरूरत है. कोई शक नहीं कि अगर मोदी, भूमि अधिग्रहण के फायदे किसानों को समझ सके तो उनकी सफलता का परचम खेत से कारखानों तक लहराएगा. लेकिन फिलहाल तो भूमि अधिग्रहण की कडिय़ल और बारूदी जमीन उनकी राजनैतिक दक्षता का इम्तिहान लेने को बेताब है.


Monday, December 29, 2014

लोकलुभावनवाद की ‘घर वापसी’

आक्रामक हिंदुत्व का प्रेत और सुधारों की नई क्रांतिकारी सूझ की कमी सरकार को सहज व सुरक्षित गवर्नेंस विकल्पों की तरफ ढकेल रही है मोदी सरकार भी संसाधनों की बर्बादी वाली इन्क्लूसिव ग्रोथ की ओट में छिप जाना चाहती है.
र्म बदल करने वालों का तो पता नहीं लेकिन मोदी सरकार के आर्थिक प्रबंधन की घर वापसी का ऐलान जरूर हो गया है. भारी सरकारी खर्च, केंद्रीय स्कीमों का राज, सरकार का जनलुभावन शृंगार और भारी घाटे के साथ, मोदी सरकार का आर्थिक दर्शन उसी घर में बसने वाला है जिस पर कांग्रेस ने इन्क्लूसिव ग्रोथ का बोर्ड लगा रखा था. मोदी सरकार इसकी जगह सबका साथ, सबका विकास का पोस्टर लगा देगी. नई सरकार का पहला बजट जल्दबाजी में बना था, जो टीम मोदी के वित्तीय और आर्थिक दर्शन को स्पष्ट नहीं करता था लेकिन धर्मांतरण के हड़बोंग के बीच जारी हुई तिमाही आर्थिक समीक्षा ने मोदी सरकार की आर्थिक रणनीति से परदा हटा दिया है. मोदी सरकार दकियानूसी और लोकलुभावन आर्थिक प्रबंधन की तरफ बढ़ रही है, जिसकी एक बड़ी झलक आने वाले बजट में मिल सकती है.
विकास के लिए सरकारी खर्च का पाइप खोलने की सूझ जिस इलहाम के साथ आई है वह और भी ज्यादा चिंताजनक है. समीक्षा ने स्वीकार किया है कि निजी कंपनियां निवेश को तैयार नहीं हैं. नई सरकार आने के बाद निजी निवेश शुरू होना चाहिए था लेकिन हकीकत यह है कि सरकारी उपक्रम दो लाख करोड़ रु. की नकदी पर बैठे हैं जबकि निजी कंपनियां करीब 4.6 लाख करोड़ रु. की नकदी पर. इसके बाद निजी निवेश न होना दरअसल मेक इन इंडिया की शुरुआती असफलता पर वित्त मंत्रालय की मुहर जैसा है. केंद्र में सरकार बदलने के बाद सारा दारोमदार निजी कंपनियों के निवेश पर था, जिससे रोजगार और ग्रोथ लौटने की उम्मीद बनती थी. लेकिन सरकार को पहले छह माह में ही यह एहसास हो गया है कि निजी निवेश को बढ़ावा देने की ज्यादा कवायद करने की बजाए सरकारी खर्च के पुराने मॉडल की शरण में जाना बेहतर होगा.
भारी सरकारी खर्च की वापसी उत्साहित नहीं करती बल्कि डराती है क्योंकि केंद्र सरकार के भारी खर्च से उभरी विसंगतियों का दर्दनाक अतीत हमारे पास मौजूद है. सरकार के पास उद्योग, पुल, सड़क, बंदरगाह बनाने लायक न तो संसाधन हैं और न मौके. यह काम तो निजी कंपनियों को ही करना है. आम तौर पर सरकारें जब अच्छी गुणवत्ता की ग्रोथ और रोजगार पैदा नहीं कर पातीं तो अपने खर्च को सब्सिडी और लोकलुभावन स्कीमों में बढ़ाती हैं, जैसा कि हमने यूपीए राज के पहले चरण की कथित इन्क्लूसिव ग्रोथ में देखा था, जो बाद में बजट, ग्रोथ और निवेश को ले डूबी. मोदी सरकार का खर्च रथ भी उसी पथ पर चलेगा. नई-नई स्कीमों को लेकर मोदी का प्रेम जाहिर हो चुका है. योजना आयोग के पुनर्गठन में पुरानी केंद्रीय स्कीमों को बंद करना फिलहाल एजेंडे पर नहीं है इसलिए एनडीए की नई स्कीमों से सजे इस मोदी के रथ पर कांग्रेस सरकार की स्कीमें पहले से सवार होंगी.
केंद्र सरकार का खर्च अभियान एक कांटेदार गोला है जो अपनी कई नुकीली बर्छियों से जगह-जगह छेद करता है. सरकार का राजस्व सीमित है और औद्योगिक मंदी खत्म होने तक राजस्व में तेज बढ़ोतरी की उम्मीद भी नहीं है. सरकार के सामने भारी खर्च का बिल आने वाला है जिसमें सब्सिडी, वित्त आयोग की सिफारिशों के तहत राज्यों के करों में ज्यादा हिस्सा, केंद्रीय बिक्री कर में हिस्सेदारी का राज्यों का भुगतान और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों पर अंतरिम राहत शामिल होंगे. इसलिए अगले बजट में घाटे की ऊंचाई देखने लायक होगी. ब्याज दरों में कमी के लिए रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को कोसने से फायदा नहीं है. अब सरकार जमकर कर्ज लेगी, जिससे ब्याज दरों में कमी के विकल्प बेहद सीमित हो सकते हैं. 
मोदी सरकार के सामने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए दो विकल्प थे. एक है सस्ता कर्ज. महंगाई में कमी से इसकी जमीन तैयार हो गई है. बैंकिंग सुधार का साहस और बजट घाटे पर नियंत्रण दो और जरूरतें थीं जो अगर पूरी हो जातीं तो अगले साल से ब्याज दरों में तेज कटौती की शुरुआत हो सकती थी. दूसरा था सरकार का भारी खर्च, जो ऊंचे घाटे, कर्ज व महंगे ब्याज की कीमत पर होगा. अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए सस्ता कर्ज, सरकार के खर्च से बेहतर विकल्प होता है क्योंकि वह निजी उद्यमिता को बढ़ावा देता है, लेकिन मोदी सरकार ने दूसरा विकल्प यानी भारी खर्च का रास्ता चुना है. इससे सरकार का लोकलुभावन मेकअप तो ठीक रहेगा लेकिन घाटे में बढ़ोत्तरी और भ्रष्टाचार व घोटालों का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा. 
मोदी सरकार, वाजपेयी की तरह भगवा ब्रिगेड को आक्रामक सुधारों से जवाब नहीं देना चाहती बल्कि यूपीए की तरह संसाधनों की बर्बादी वाली इन्क्लूसिव ग्रोथ की ओट में छिप जाना चाहती है. आक्रामक हिंदुत्व का प्रेत, संसद में गतिरोध और सुधारों की नई क्रांतिकारी सूझ की कमी मोदी सरकार को सहज और सुरक्षित गवर्नेंस विकल्पों की तरफ ढकेल रही है. आर्थिक समीक्षा इशारा कर रही है कि आने वाला बजट स्कीमों से भरपूर होगा, जो घाटे को नियंत्रित करने का संकल्प नहीं दिखाएगा. उम्मीदों से रची-बुनी, बहुमत की सरकार का इतनी जल्दी ठिठक कर लोकलुभावन हो जाना यकीनन, निराश करता है लेकिन हकीकत यह है कि मोदी सरकार को अपने साहस की सीमाओं का एहसास हो गया है.

अगले साल भारत को 6 फीसदी के आसपास की विकास दर पर मुतमईन होना पड़ सकता है, जो आज की आबादी और विश्व बाजार से एकीकरण की रोशनी में, सत्तर-अस्सी के दशक की 3.5 फीसद ग्रोथ रेट के बराबर ही है, जिसे हिंदू ग्रोथ रेट कहा जाता था. गवर्नेंस बनाम उग्र हिंदुत्व के विराट असमंजस में बलि तो आर्थिक ग्रोथ की ही चढ़ेगी.