Sunday, September 16, 2018

तेल निकालने की नीति


पेट्रोल-डीजल की कीमतों की आग आसमान छू रही है!

छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनावों से पहले सरकारी खर्च पर मोबाइल बांटे जा रहे हैं!

अगर महंगे पेट्रोल-डीजल की जड़ तलाशनी हो तो हमें इन दो अलग-अलग घटनाक्रमों का रिश्ता समझना होगा.

हम फिजूल खर्च सरकारों यानी असंख्य मैक्सिमम गवर्नमेंट’ के चंगुल में फंस चुके हैं. जो बिजलीपेट्रोल-डीजल और गैस सहित पूरे ऊर्जा क्षेत्र को दशकों से एक दमघोंट टैक्स नीति निचोड़ रही हैं. कच्चे तेल की कीमत बढ़ते ही यह नीति जानलेवा हो जाती है. पेट्रो उत्पादों पर टैक्स की नीति शुरू से बेसिर-पैर है. कच्चे तेल की मंदी के बीच लगातार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर मोदी सरकार ने इसे और बिगाड़ दिया.

भारत में राजस्व को लेकर सरकारें (केंद्र व राज्य) आरामतलब हैं और खर्च को लेकर बेफिक्र. उनके पास देश में सबसे ज्यादा खपत वाले उत्पाद को निचोडऩे का मौका मौजूद है. चुनाव के आसपास उठने वाली राजनैतिक बेचैनी के अलावा पेट्रो उत्पाद हमेशा से टैक्स पर टैक्स का खौफनाक नमूना है जो भारत को दुनिया में सबसे महंगी ऊर्जा वाली अर्थव्यवस्था बनाता है.

पेट्रोलियम उद्योग पर टैक्स की कहानी एक्साइज व वैट (पेट्रोल-डीजल पर 25 से 38 रुपए प्रति लीटर का टैक्स) तक सीमित नहीं है. डीजल पर रोड सेसपेट्रो मशीनरी पर कस्टम ड्यूटी व जीएसटीतेल कंपनियों पर कॉर्पोरेट टैक्सउनसे सरकार को मिलने वाले लाभांश पर टैक्सऔर तेल खनन पर राज्यों को रायल्टीज! यह सभी तेल की महंगाई का हिस्सा हैं.

तो फिर कच्चे तेल की महंगाई और रुपए की छीजती ताकत के बीच कैसे कम होंगी कीमतें?

न घटाइए एक्साइज और वैटलेकिन यह तो कर सकते हैं:

•   तेल व गैस का पूरा बाजार सरकारी तेल कंपनियों के हाथ में है. पांचों पेट्रो कंपनियां (ओएनजीसीआइओसीएचपीसीएलबीपीसीएलगेल) सरकार को सबसे अधिक कॉर्पोरेट टैक्स देने वाली शीर्ष 20 कंपनियों में शामिल हैं. ये कंपनियां हर साल सरकार को 17,000 करोड़ रु. का लाभांश देती हैं. टैक्स और लाभांश को टाल कर कीमतें कम की जा सकती हैं.

•   सरकारी तेल कंपनियों में लगी पूंजी करदाताओं की है. अगर पब्लिक सेक्टर पब्लिक का है तो उसे इस मौके पर काम आना चाहिए.

भारत में पेट्रो उत्पाद हमेशा से महंगे हैंअंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी के साथ बस वे ज्यादा महंगे हो जाते हैं. पेट्रो (डीजलपेट्रोलसीएनजीएटीएफ) ईंधन भारत में सबसे ज्यादा निचोड़े जाने वाले उत्पाद हैं. यूं ही नहीं केंद्र सरकार का आधा एक्साइज राजस्व पेट्रो उत्पादों से आता है. कुल इनडाइरेक्ट टैक्स में इनका हिस्सा 40 फीसदी है. राज्यों के राजस्व में इनका हिस्सा 50 फीसदी तक है. राज्यों के खजाने ज्यादा बदहाल हैं इसलिए वहां पेट्रो उत्पादों पर टैक्स और ज्यादा है.

अगर तेल पर लगने वाले सभी तरह के टैक्स को शामिल किया जाए तो दरअसल पांच प्रमुख तेल कंपनियां केंद्र व राज्य सरकारों के लगभग आधे राजस्व की जिम्मेदार हैं और हम सुनते हैं कि सरकारों ने राजकोषीय सुधार किए हैं.

भारत में सरकारों के खजाने वस्तुत: पेट्रो उत्पादों से चलते हैं. सरकारों की तकरीबन आधी कमाई उन पेट्रो उत्पादों से होती है जिनका महंगाई और कारोबारी लागत से सीधा रिश्ता है. सुई से लेकर जहाज तक उत्पा‍दन और बिक्री आधे राजस्व में सिमट जाती है.

2004 में जीएसटी की संकल्पना इस बुनियाद पर टिकी थी कि सरकारें टैक्स कम करेंगी और अपना खर्च भी. सरकारों को घाटे नियंत्रित करने थे और टैक्स कम होने से खपत बढ़ाकर राजस्व बढ़ाना था. कांग्रेस और तब की राज्य  सरकारें (भाजपा सहित) पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में शामिल करने पर सहमत नहीं थीं और वही हालात आज भी हैं क्योंकि सरकारें अपने राजस्व के सबसे बड़े स्रोत पर मनमाना टैक्स‍ लगाना चाहती हैं. जीएसटी में टैक्सों को लागत का हिस्सा मानकर उनकी वापसी (इनपुट टैक्स क्रेडिट) होती है. अगर पेट्रो उत्पाद इस व्यवस्था के तहत आए तो फिर एक तरफ टैक्स घटाना होगा और दूसरी ओर रिफंड भी देने होंगे क्योंकि ईंधन तो हर कारोबारी लागत में शामिल है.

भूल जाइए पेट्रोल-डीजल और बिजली निकट भविष्य में भी जीएसटी में शामिल हो पाएंगे क्योंकि भारत की ऊर्जा ईंधन टैक्सेशन नीति क्रूरनिर्मम और तर्कहीन है. ध्यान रखिए कि हमारा तेल निकालने के लिए वेनेजुएला जिम्मेदार नहीं है. अगर सरकारों ने खर्च नहीं घटाया तो तेल और महंगाई हमें हमेशा निचोड़ती रहेगी.



Monday, September 10, 2018

बाजार बीमार है !


सेबी के चेयरमैन म्युचुअल फंड उद्योग की बैठक में मानो आईना लेकर गए थे. यह उद्योग अब 23.5 लाख करोड़ रुपए (2013 में केवल 5 लाख करोड़ रु.) की निवेश संपत्तियों को संभालता है. इस उत्सवी बैठक में सेबी अध्यक्ष ने पूछा, इस कारोबार में केवल चार म्युचुअल फंड 47 फीसदी निवेश क्यों संभाल रहे हैं जबकि (एसेट मैनेजमेंट) कंपनियां तो 38 हैं. 
कारोबार तो बढ़ा पर प्रतिस्पर्धा क्यों नहीं बढ़ी?
नियामकों को ठीक ऐसे ही सवाल पूछने चाहिए. 
लेकिन टीआरएआइ चेयरमैन ने यही सवाल टेलीकॉम कंपनियों से क्यों नहीं पूछा जहां प्रतिस्पर्धा घिसते-घिसते तीन ऑपरेटरों तक सीमित हो गई है. कभी हर सर्किल में तीन ऑपरेटर थे. अब 135 करोड़ के देश में तीन मोबाइल कंपनियां हैं.  

क्या पेट्रोलियम मंत्रालय यह पूछेगा कि पूरा बाजार तीन सरकारी पेट्रोल कंपनियों के पास ही क्यों है?

2015 में एक दर्जन से अधिक ई-कॉमर्स कंपनियों से गुलजार भारत का बाजार अब पूरी तरह दो अमेरिकी कंपनियों के पास चला गया है. सबसे बड़े ई-रिटेलर फ्लिपकार्ट को अमेरिकी ग्लोबल रिटेल दिग्गज वालमार्ट ने उठा लिया. अब वालमार्ट का मुकाबला ई-कॉमर्स बाजार की सबसे बड़ी कंपनी अमेजन से है जो भारत में पहले से है. यानी देसी ई- कॉमर्स कंपनियों का सूर्य डूब रहा है.
क्या भारत की मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था एडिय़ां रगडऩे लगी है?

प्रतिस्पर्धा जमने से पहले ही बेदखल होने लगी है?

नए बाजारवादी एकाधिकार उभर रहे हैं?

क्या बाजार चुनिंदा हाथों में केंद्रित हो रहा है?

दरअसल, जो सेबी चेयरमैन ने म्युचुअल फंड उद्योग से पूछा, अगर उसका विस्तार किया जाए तो ऊपर लिखे सच को स्वीकारना होगा.
क्या सरकार बताना चाहेगी कि ऐप आधारित टैक्सी सेवा में केवल दो ही कंपनियां क्यों हैं? जेट एयरवेज अगर बीमार हुई तो विमान सेवाओं के अधिकांश बाजार पर तीन (दो निजी, एक सरकारी) कंपनियों का एकाधिकार हो जाएगा! 

स्टील, दुपहिया वाहन, प्लास्टिक रॉ मटीरियल, एल्युमिनियम, ट्रक और बसें, कार्गो, रेलवे, कोयला, सड़क परिवहन, तेल उत्पादन, बिजली वितरण, कुछ प्रमुख उपभोक्ता उत्पाद सहित करीब एक दर्जन प्रमुख क्षेत्रों का अधिकांश बाजार एक से लेकर तीन कंपनियों (निजी या सरकारी) के हाथ में केंद्रित है. केवल कार, कंप्यूटर, फार्मास्यूटिकल्स, मोबाइल का बाजार ही ऐसा है जहां पर्याप्त प्रतिस्पर्धा दिखती है.
उदारीकरण के करीब दो दशक बाद प्रतिस्पर्धा बढऩे, मंदी के झटके, नई तकनीकों की आमद, नए अवसरों की तलाश और पूंजी की कमी से बाजार में पुनर्गठन शुरू हुआ. कंपनियों के अधिग्रहण और विलय हुए. वोडाफोन-आइडिया, वालमार्ट-फ्लिपकार्ट, अडानी-रिलायंस एनर्जी, मिंत्रा-जबांग, एमटीएस-रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस-एयरसेल, कोटक-बीएसएस माइक्रोफाइनांस, फ्लिपकार्ट-ई बे, बिरला कॉर्प-रिलायंस सीमेंट... फेहरिस्त लंबी है.

2017 में भारत में 46.5 अरब डॉलर के निवेश से कंपनियां बेची और खरीदी गईं. यह विलय व अधिग्रहण अगले साल 53 अरब डॉलर से ऊपर निकल जाएगा.

बैंक कर्ज में फंसी कंपनियों की बिक्री और बंदी भी प्रतिस्पर्धा को मार रही है. करीब 34 निजी बिजली कंपनियां कर्ज में दबी हैं. कर्ज की वसूली उन्हें बंदी या बिक्री के कगार पर ले आएगी. यानी बिजली बाजार में भी कुछ ही कंपनियां ही बचेंगी.

प्रतिस्पर्धा कम होने से मोबाइल सेवाओं, स्टील, ई-कॉमर्स, विमानन में रोजगार में खासी कमी आई है. उपभोक्ताओं पर मनमानी या खराब सेवाएं थोपी जा रही हैं. प्रतिस्पर्धा की कमी से कई उत्पादों में नए प्रयोग भी सीमित हो रहे हैं. 

मुक्त बाजार में सरकारों और नियामकों की जिम्मेदारी होती है कि वे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाएं, नई कंपनियों के प्रवेश का रास्ता खोलें, कार्टेल और एकाधिकार समाप्त करें. 

गूगल-फेसबुक वाली नई दुनिया की सबसे ताजा चिंता बाजार पर निजी एकाधिकार हैं. अमेरिका की 100 प्रमुख कंपनियां देश की आधी अर्थव्यवस्था पर काबिज हैं. 1955 में अमेरिका की अर्थव्यवस्था में  फॉच्र्यून 500 कंपनियों का हिस्सा 35 फीसदी था, आज यह 72 फीसदी है.

ताकत और अवसरों का केंद्रीकरण राजनीति और बाजार, दोनों जगह खतरनाक है. लोकतंत्र में सरकार और बाजार को एक दूसरे की यह ताकत तोड़ते रहना चाहिए लेकिन अब तो राजनीति (सरकार) बाजार में एकाधिकारों को पोस रही है और बदले में बाजार राजनीति को सर्वशक्तिमान बना रहा है. यह गठजोड़ हर तरह की आजादी के लिए, शायद सबसे बड़ा खतरा है.

Monday, September 3, 2018

पर्दा अभी उठा नहीं है


वह 2016 नवंबर का दूसरा सप्ताह था. नोटबंदी को केवल दस दिन बीते थे और जनता के पास मौजूद बड़े नोटों का लगभग 40 फीसदी हिस्सा बैंकों में पहुंचा चुका था. बची हुई नकदी पेट्रोल पंपोंस्कूलोंअस्पतालों में पहुंच रही थी जहां उसे स्वीकार करने की इजाजत थी. इसी दौरान रिजर्व बैंक ने यह बताना बंद कर दिया कि बैंक खातों में जमा किस तरह बढ़ रहा है और इसके साथ ही यह तय हो गया कि शायद अधिकांश नकदी बैंकों में वापस हो रही है.

बंद किए गए 99 फीसदी नोटों की बैंकों में वापसी का संकेत तो पिछले साल जून में ही मिल गया था. अब इन खिसियाये स्पष्टीकरणों का कोई अर्थ नहीं है कि नोटबंदी के बाद आयकर रिटर्न या टैक्स भरने वाले बढ़े हैं. क्या नोटबंदी जैसे विराट और मारक जोखिम का मकसद आयकर रिटर्न भरने की आदत ठीक करना था?

और बाजार में नकदी तो इस कदर बढ़ चुकी है कि कैशलेस या लेसकैश अर्थव्यवस्था की बहस ही अब बेसबब हो गई.

दरअसलनोटबंदी के बड़े रहस्य अभी भी पोशीदा हैं. रिजर्व बैंक व सरकार अगर देश को कुछ सवालों के जवाब देंगे तो हमें पता चल सकेगा कि भारत के आर्थिक इतिहास की सबसे बड़ी उथल पुथल के दौरान क्या हुआ था और शायद इसी में हमें काले धन के कुछ सूत्र मिल जाएंजिन के लिए यह इतना जान-माललेवा जोखिम उठाया गया था.

- कौन थे वे "गरीब'' जिन्होंने लाखों की तादाद में जनधन खाते खोले और नोटबंदी के दौरान पुराने और नए खातों में करोड़ों रुपए जमा किएनोटबंदी के ठीक बाद 23.30 करोड़ नए जन धन खाते खोले गए. इनमें से 80 फीसदी सरकारी बैंकों में खुले. नोटबंदी के वक्त (9 नवंबर 2016) को इन खातों में कुल 456 अरब रुपए जमा थे जो 7 दिसंबर 2016 को 746 अरब रुपए पर पहुंच गए.

जनधन खातों के दुरुपयोग की खबरों के बीच सरकार ने 15 नवंबर 2016 को जनधन खातों में रकम जमा करने के लिए 50,000 रुपए की ऊपरी सीमा तय कर दी थी. वित्त मंत्री ने पिछले साल फरवरी में संसद को बताया था कि विभिन्न खाताधारकों (जनधन सहित) को आयकर विभाग ने 5,100 नोटिस भेजे हैंइसके बाद नोटबंदी में जनधन के इस्तेमाल की जांच कहीं गुम हो गई!

- क्या हमें कभी यह पता चल पाएगा कि नोटबंदी के दिनों में सरकारी (केंद्र और राज्य) खजानों और  बैंकों में सरकारी/पीएसयू खातों के जरिए कितनी रकम का लेनदेन हुआसनद रहे कि सरकारी विभागों और सेवाएं नोटबंदी या नकद लेनदेन की तात्कालिक सीमा से मुक्त थे. कई सरकारी सेवाओं को प्रतिबंधित नोटों में भुगतान लेने की इजाजत दी गई थी. सरकारी सेवाओं के विभागों के नेटवर्क जरिए कितनी पुरानी नकदी बदली गईक्या इसका आंकड़ा देश को नहीं मिलना चाहिए?

 नोटबंदी के दौरान बड़ी कंपनियों व कारोबारियों के चालू खातों और नकद लेनदेने के जरिए बैंकों में कितने पुराने नोट पहुंचेइसकी हमें कोई जानकारी नहीं है. बाद की पड़ताल में कई छद्म (शेल) कंपनियां मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल पाई गईं. ऐसे में यह उम्मीद करना जायज है कि सरकार के पास कारोबारी नकद खातों के इस्तेमाल के बारे में काफी जानकारी होगी. नोटबंदी के दौरान बड़ी कंपनियों में नकदी की आवाजाही की पड़ताल की जानकारी उन लोगों को मिलनी चाहिए जो अपने कुछ सैकड़ा रुपए बदलवाने के लिए नोटबंदी की लाइनों में बिलख रहे थे. 

- क्या देश को यह जानने का हक नहीं है कि नोटबंदी के दौरान राजनैतिक पार्टियों के खातों में कितने लेनदेन हुए और उस वक्त जब लोगों के पास  अस्पतालों में दवा खरीदने के लिए नकदी नहीं थीतब सियासी धूम-धड़ाकों पर कहां और कैसे खर्च किया गयासनद रहे कि आम लोग जब नोटबंदी की अग्निपरीक्षा दे रहे थे तब सरकार ने सियासी पार्टियों को अपने खातों में 500 रुपए और 1,000 रुपए के पुराने नोट जमा करने की इजाजत दी थीजिसे हर तरह का जांच से बाहर रखा गया था.

- देश के लिए यह भी जानना जरूरी है कि नोटबंदी के दौरान बैंकों में जो भ्रष्टाचार हुआ उसकी जांच आखिर कहां रुकी हुई है.

रिजर्व बैंक ने अपनी बात कह दी है. अब सरकार को सवालों से आंख मिलाना ही होगा. ऐसा कहां लिखा है कि सरकारें गलत नहीं हो सकतीं. दुनिया के हर देश में सरकारें किस्म-किस्म की गलतियां करती हैं लेकिन वे उन्हें स्वीकार भी करती हैं. भारत के करोड़ों आम लोगों ने नोटबंदी में तपकर अपनी ईमानदारी साबित की है. अब अग्नि परीक्षा से गुजरने की बारी सरकार की है.



Monday, August 27, 2018

कुछ बात है कि...



भारत के व्यंजन, चीन के हॉटपॅाट से ज्यादा मसालेदार हो सकते हैं और भारत की अर्थव्यवस्था का तापमान भी चीन से अधिक हो सकता है. इस समय जब चीन में जरूरत से ज्यादा तेज आर्थिक विकास (ओवरहीटिंग) की चर्चा है तो भारत में भी अर्थव्यवस्था की विकास दर खौल रही है. (द इकोनॉमिस्ट, नवंबर 2006)

कांग्रेस जो एनडीए के जीडीपी आंकड़ा बदल फॉर्मूले के बाद यूपीए के दौर में विकास दर की चमकार पर नृत्यरत है, उसके नेता क्या याद करना चाहेंगे कि जब 2006-07 की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर 8.9 फीसदी पहुंच गई थी, तब वे क्या कह रहे थे? यूपीए सरकार आशंकित थी भारत की विकास दर कुछ ज्यादा ही तेज हो गई है. इसलिए कर्ज की मांग कम करके ब्याज दर बढ़ाना गलत नहीं है. जीडीपी के नए ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक, इसी दौरान भारत की विकास दर ने पहली बार दस फीसदी की मंजिल पर हाजिरी लगाई थी.

और भाजपा का तो कहना ही क्या! फरवरी 2015 में जब उसने जीडीपी (आर्थिक उत्पादन की विकास दर) की गणना का आधार और फॉर्मूला बदला था तभी हमने इस स्तंभ में लिखा था इन आंकड़ों को जब भी इनका अतीत मिलेगा तो यूपीए का दौर चमक उठेगा यानी कि मंदी और बेकारी के जिस माहौल ने 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा की अभूतपूर्व जीत का रास्ता खोला था वह इन नए आंकड़ों में कभी नजर नहीं आएगा.

जीडीपी के नए फॉर्मूले और बेस इयर में बदलाव से जो आंकड़े हमें मिले हैं उनके मुताबिक यूपीए के दस साल के दो कार्यकालों में आर्थिक विकास दर 8.1 फीसदी गति से बढ़ी जिसमें दो साल (2007-08, 2010-11) दस फीसदी विकास दर के थे और दो साल पांच फीसदी और उससे नीचे की विकास दर के. मोदी सरकार के नेतृत्व में औसत विकास दर 7.3 फीसदी रही.

जीडीपी गणना का नया तरीका वैज्ञानिक है. कांग्रेस इस आंकड़े पर इतराएगी और भाजपा इस बहस को हमेशा के लिए खत्म करना चाहेगी कि उसकी विकास दर का फर्राटा यूपीए से तेज था क्योंकि नए आंकड़े आने से एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री ने लाल किले के शिखर से, अपने नेतृत्व में भारत की रिकार्ड आर्थिक विकास दर पर जयकारा लगाया था.

लेकिन सियासत से परे क्या हमारे नेता यह सीखना चाहेंगे कि आर्थिक आंकड़े अनाथ नहीं होते, उनका अतीत भी होता है और भविष्य भी और ये आंकड़े उनकी सियासत के नहीं इस देश की आर्थिक चेतना के हैं. नई संख्याएं हमें ऐसा कुछ बताती हैं जो शायद पहले नहीं देखा गया था.

- पिछले दो दशकों में भारत आर्थिक जिजीविषा और वैश्विक संपर्क की अनोखी कहानी बन चुका है. दुनिया की अर्थव्यवस्था में जब विकास दर तेज होती है तो भारत दुनिया के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ता है जैसा यूपीए-एक के दौर में हुआ. लेकिन जब दुनिया की विकास दर गिरती है तो भारत झटके से उबर कर सबसे तेजी से सामने आ जाता है. 2008 में लीमैन संकट के एक साल बाद ही भारत की विकास दर दोबारा दस फीसदी पर पहुंची.
- पिछले दो वर्षों में दुनिया की विकास दर में तेजी नजर आई. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) का आकलन है कि 2018 में यह 3.9 फीसदी रहेगी. एक दशक बाद विश्व व्यापार भी तीन फीसदी की औसत विकास दर को पार कर (2016 में 2.4 प्रतिशत) 2017 में 4.7 प्रतिशत की गति से बढ़ा. यदि पिछले चार साल में भारत का उदारीकरण तेज हुआ होता तो क्या हम दस फीसदी का आंकड़ा पार कर चुके होते?

- भारतीय अर्थव्यवस्था की समग्र विकास दर अब उतनी बड़ी चुनौती नहीं है. अब फिक्र उन दर्जनों छोटी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं (क्षेत्र, राज्य, नगर) की करनी है जो भारत के भीतर हैं. क्या यह आर्थिक योजना को बदलने का सबसे सही वक्त है?

- जीडीपी आंकड़ों का नवसृजित इतिहास बताता है कि दस फीसदी विकास दर की छोटी-छोटी मंजिलें पर्याप्त नहीं. देश को लंबे वक्त तक दस फीसदी की गति से भागना होगा. इसमें 12-14 फीसदी की मंजिलें भी हों. निरंतर ढांचागत सुधार, सरकार का छोटे से छोटे होता जाना और विकास का साफ-सुथरा होना जरूरी है.

हमारे नेता तेज विकास पर सार्थक बहस करें या नहीं, उनकी मर्जी लेकिन उन्हें उदारीकरण जारी रखना होगा. यह आंकड़े जो बेहद उथल-पुथल भरे दौर (2004-2018) के हैं, बताते हैं कि सियासत के असंख्य धतकरमों, हालात की उठापटक और हजार चुनौतियों के बावजूद यह देश अवसरों को हासिल करने और आगे बढऩे के तरीके जानता है.

Tuesday, August 21, 2018

मध्य में शक्ति


आधुनिक राजनैतिक दर्शन के ग्रीक महागुरु भारत में सच साबित होने वाले हैं. अरस्तू ने यूं ही नहीं कहा था कि किसी भी देश में मध्य वर्ग सबसे मूल्यवान राजनैतिक समुदाय हैजो निर्धन और अत्यधिक धनी के बीच खड़ा होता है. बीच के यही लोग संतुलित और तार्किक शासन का आधार हैं.

सियासत पैंतरे बदलती रहती है लेकिन अरस्तू से लेकर आज तक मध्य वर्ग ही राजनैतिक बहसों का मिज़ाज तय करता है. 2014 में कांग्रेस की विदाई का झंडा इन्हीं के हाथ था. भारत का मध्यम वर्ग लगातार बढ़ रहा है. अब इसमें 60 से 70 करोड़ लोग (द लोकल इंपैक्ट ऑफ ग्लोबलाइजेशन इन साउथ ऐंड साउथईस्ट एशिया) शामिल हैं जिनमें शहरों के छोटे हुनरमंद कामगार भी हैं.

मध्य और पश्चिम भारत के तीन प्रमुख राज्यों और फिर सबसे बड़े चुनाव की तैयारियों के बीच क्या नरेंद्र मोदी मध्य वर्ग के अब भी उतने ही दुलारे हैं?

इंडिया टुडे ने देश के मिज़ाज के सर्वेक्षण में पाया कि जनवरी 2018 में करीब 57 फीसदी नगरीय लोग नरेंद्र मोदी के साथ थे यह प्रतिशत जुलाई में घटकर 47 फीसदी पर आ गयाजबकि ग्रामीण इलाकों में किसान आंदोलनों के बावजूद उनकी लोकप्रियता में केवल एक फीसदी की कमी आई है.

यह तस्वीर उन आकलनों के विपरीत है जिनमें बताया गया था कि भाजपा की मुसीबत गांव हैंशहर तो हमेशा उसके साथ हैं. 

क्या भाजपा की सियासत मध्य वर्ग की उम्मीदों से उतर रही है?

कमाई
यूरोमनी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक1990 से 2015 के बीच भारत में 50,000 रुपए से अधिक सालाना उपभोग आय वाले लोगों की संख्या 25 लाख से बढ़कर 50 लाख हो गई. 2015 के बाद यह आय बढऩे की रफ्तार कम हुई है.



कमाई बढऩे के असर को खपत या बचत में बढ़ोतरी से मापा जाता है. 2003 से 2008 के बीच भारत में खपत (महंगाई रहित) बढऩे की गति 7.2 फीसदी थी जो 2012 से 2017 के बीच घटकर 6 फीसदी पर आ गई.

कम खपत यानी कम मांग यानी कम रोजगार यानी कमाई में कमी या आय में बढ़त पर रोक! 

मध्य वर्ग के लिए यह एक दुष्चक्र था जिसे मोदी सरकार तोड़ नहीं पाई. उलटे नोटबंदी और जीएसटी ने इसे और गहरा कर दिया. 2016 के अंत में महंगाई नियंत्रण में थी तो बढ़े हुए टैक्स के बावजूद दर्द सह लिया गया. लेकिन अब महंगे तेलफसलों की बढ़ी कीमत और कमजोर रुपए के साथ महंगाई इस तरह लौटी है कि रोकना मुश्किल है.

रोजगार और कमाई में कमी के घावों पर महंगाई नमक मलेगी और वह भी चुनाव से ठीक पहले. मध्य वर्ग का मिज़ाज शायद यही बता रहा है. 

बचत
पिछले चार वर्ष में कमाई न बढऩे के कारण मध्य वर्ग की खपतउनकी बचत पर आधारित हो गई. या तो उन्होंने पहले से जमा बचत को उपभोग पर खर्च कियाया फिर बचत के लिए पैसा ही नहीं बचा. नतीजतनभारत में आम लोगों की बचत दर जीडीपी के अनुपात मे बीस साल के न्यूनतम स्तर पर है.

मध्य वर्ग के लिए यह दूसरा दुष्चक्र है. महंगाई बढऩे का मतलब हैएक-बचत के लिए पैसा न बचना और दूसरा—बचत पर रिटर्न कम होना.

लोगों की बचत कम होने का मतलब है सरकार के पास निवेश के संसाधनों की कमी यानी कि सरकार का कर्ज बढ़ेगा मतलब और ज्यादा महंगाई बढ़ेगी.

पिछले दो दशकों में यह पहला मौका है जब भारत में मध्य वर्ग की खपत और बचतदोनों एक साथ बुरी तरह गिरी हैं.

नोटबंदी के बाद न तो लोगों ने बैंकों से पैसा निकाल कर खर्च किया और न ही कर्ज की मांग बढ़ी. इस बीच कर्ज की महंगाई भी शुरू हो गई है. 

क्या यही वजहें हैं कि शहरी इलाकों में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में गिरावट दिख रही है?

अचरज नहीं कि प्रधानमंत्री ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से मध्य वर्ग को आवाज दीजो इससे पहले नहीं सुनी गई थी.

अरस्तू ने ही हमें बताया था कि दुनिया के सबसे अच्छे संविधान (सरकार) वही हैं जिन्हें मध्य वर्ग नियंत्रित करता है. इनके बिना सरकारें या तो लोकलुभावन हो जाएंगी या फिर मुट्ठी भर अमीरों की गुलाम. जिस देश में मध्य वर्ग जितना बड़ा होगावहां सरकारें उतनी ही संतुलित होंगी.

2019 में भारत की राजनीति आजाद भारत के इतिहास के सबसे बड़े मध्य वर्ग से मुकाबिल होगी. इस बार बीच में खड़े लोगों की बेचैनी भी अभूतपूर्व है.

Sunday, August 12, 2018

सवाल हैं तो आस है


 
गूगल 2004 में जब अपना पहला पब्लिक इश्यू (पूंजी बाजार से धन जुटाना) लाया था तब मार्क जकरबर्गफेसमैश (फेसबुक का पूर्वज) बनाने पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का गुस्सा झेल रहे थेक्योंकि उन्होंने यूनिवर्सिटी के डेटाबेस से छात्रों की जानकारियां निकाल ली थीं. इंटरनेट, गूगल के जन्म (1998) से करीब दस साल पहले शुरू हुआ. मोबाइल तो और भी पहले आया1970 के दशक की शुरुआत में.

आज दुनिया की कुल 7.5 अरब आबादी में (55 फीसदी लोग शहरी) करीब 4.21 अरब लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और 5.13 अरब लोगों के पास मोबाइल है. (स्रोतः आइटीयूग्लोबल वेब इंडेक्स)

पांच अरब लोगों तक पहुंचने में मोबाइल को 48 साल और इंटरनेट को चार अरब लोगों से जुडऩे में 28 साल लगेलेकिन सोशल नेटवर्क केवल एक दशक में 3.19 अरब लोगों तक पहुंच गए.

सोशल नेटवर्क के फैलने की रफ्तारइंटरनेट पर खोज की दीवानगी से ज्यादा तेज क्यों थी?

क्या लोग खोजने से कहीं ज्यादा पूछनेबताने के मौके चाहते थेयानी संवाद के?

सोशल नेटवर्कों की अद्भुत रफ्तार का रहस्यइक्कीसवीं सदी के समाजराजनीतिअर्थशास्त्र की बनावट में छिपा है. इंटरनेट की दुनिया यकीनन प्रिंटिंग प्रेस वाली दुनिया से कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक हो गई थीफिर भी यह संवाद लोकतंत्र के जन्म (16-17वीं सदी) से आज तक एकतरफा ही तो था. 
सोशल नेटवर्क दोतरफा और सीधे संवाद की सुविधा लेकर आए थे. और लोकतंत्र पूरा हो गया. लोग अब सीधे उनसे सवाल पूछ सकते थे जो जिम्मेदार थे. वे जवाब न भी दें लेकिन लोगों के सवाल सबको पता चल सकते हैं.

प्रश्न पूछने की आजादी बड़ी आजादी क्यों है?

संवैधानिक लोकतंत्रों के गठन में इसका जवाब छिपा है. संसदीय लोकतंत्र आज भी इस बात पर रश्क करता है कि उसके नुमाइंदे अपने प्रधानमंत्री से सीधे सवाल कर सकते हैं. 

इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र के एक से अधिक मॉडल विकसित हो चुके हैं. लेकिन इनके तहत आजादियों में गहरा फर्क है. रूस हो या सिंगापुरचुनाव सब जगह होते हैं लेकिन सरकार से सवाल पूछने की वैसी आजादी नहीं है जो ब्रिटेनअमेरिका या भारत में है. इसलिए अचरज नहीं कि जैसे ही सोशल नेटवर्क फैलेभाषाएं आड़े नहीं आईं और उन देशों ने इन्हें सबसे तेजी से अपनाया जिनमें लोकतंत्र नगण्य या सीमित था. अरब मुल्कों में प्रिंटिंग प्रेस सबसे बाद में पहुंची लेकिन फेसबुक ट्विटर ने वहां क्रांति करा दी. चीन सोशल नेटवर्क का विस्तार तो रोक नहीं सका लेकिन अरब जगत से नसीहत लेकर उसने सरकारी सोशल नेटवर्क बना दिए.

संसदीय लोकतंत्र के संविधान सरकार को चैन से न बैठने देने के लिए बने हैं. सत्ता हमेशा टी बैग की तरह सवालों के खौलते पानी में उबाली जाती है. चुनाव लडऩे से पहले हलफनामेसंसद में लंबे प्रश्न कालसंसदीय समितियांऑडिटर्सऑडिटर्स की रिपोर्ट पर संसदीय समितियांविशेष जांच समितियांहर कानून को अदालत में चुनौती देने की छूटसवाल पूछती अदालतेंविपक्षमीडिया...इन सबसे गुजरते हुए टी बैग (सरकार) को बदलने या फेंकने (चुनाव) की बारी आ जाती है.

भारत की अदालतों में लंबित मुकदमों को देखकर एक बारगी लगेगा कि लोग सरकार पर भरोसा ही नहीं करते! लोग सरकार को कठघरे में खड़ा करते रहते हैं. यानी कि जो सवाल कानून बनाते समय नुमांइदे नहीं पूछ पातेउन्हें लोगों की ओर से अदालतें पूछती हैं.

लोकतंत्र में प्रश्नों का यह चिरंतन आयोजन केवल सरकारों के लिए ही बुना गया है. वजह यह कि लोग पूरे होशो-हवास में कुछ लोगों को खुद पर शासन करने की छूट देते हैं और अपनी बचतें व टैक्स उन्हें सौंप देते हैं. सरकारें सवालों से भागती हैं और लोकतंत्र की संस्थाएं उन्हें रह-रह कर सवालों से बेधती रहती हैं. 

इक्कीसवीं सदी में अब चुनाव की आजादी ही लोकतंत्र नहीं हैचुने हुए को सवालों में कसते रहने की आजादी अब सबसे बड़ी लोकशाही है इसलिए जैसे ही सोशल नेटवर्क फैलेलोगों ने समूह में सवाल पूछने प्रारंभ कर दिए.

प्रश्नों का तंत्र अब पूरी तरह लोकतांत्रिक हो रहा है. क्यों केवल पत्रकार ही कठोर सवाल पूछेंलोकतंत्रों में अब ऐसी संस्कृति विकसित करने का मौका आ गया है जब प्रत्येक व्यक्ति को सरकार से कठोर से कठोर प्रश्न पूछने को प्रेरित किया जाए.

सत्ता का यह भ्रम प्रतिक्षण टूटते रहना चाहिए कि जो उत्सुक या जिज्ञासु हैंवे मूर्ख नहीं हैं. और कई बार सवालजवाबों से कहीं ज्यादा मूल्यवान होते हैं.