Monday, November 10, 2014

गवर्नेंस का राजनैतिक असमंजस

राज्य सरकारें नौकरशाही की चुस्ती से काम चला सकती हैं लेकिन केंद्र सरकार के निर्णय राजनैतिक शिखर से निकलते हैंजिनसे गवर्नेंस की दिशा तय होती है.कई महत्वपूर्ण नीतियों की राजनैतिक दिशा अब तक धुंधली है इसलिए प्रशासनिक असमंजस बढ़ रहा है।

रकारी तंत्र में बैठे हुए लोग उसके लिए क्या उपाय करेंगे, जो गंदगी पुरानी है. यह बहुत बड़ी चुनौती है. राष्ट्र के नाम रेडियो संबोधन मन की बात में प्रधानमंत्री ने गवर्नेंस के जिस असमंजस को स्वच्छता अभियान के संदर्भ में जाहिर किया था, वही बात वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से कही कि आर्थिक स्थिति सुधरने में वक्त लगेगा. मोदी-जेटली के इशारे साफ हैं. उम्मीदों की उड़ान के पांच माह बाद सरकार में यथार्थवाद थिरने लगा है. कई महत्वपूर्ण नीतियों की राजनैतिक दिशा अब भी धुंधली है इसलिए प्रशासनिक गलियारों में जन कल्याण की स्कीमों से लेकर आर्थिक सुधारों तक संशय जड़ें जमाने लगा है. सरकार और बीजेपी संगठन के के साथ ताजा संवादों में भी यह तथ्य उभरा है कि अब सरकारी नीतियों की राजनैतिक दिशा निर्धारित करनी होगी ताकि वह फर्क नजर आ सके, जिसे लाने की आवाज बड़े जोर से लगाई गई थी.
ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम (मनरेगा) को जारी रखने को लेकर अर्थशास्त्रियों का खत इसी संशय की उपज था कि मोदी सरकार जनकल्याण की स्कीमों को लेकर कौन-सा मॉडल अपनाएगी? सरकार का अधकचरा जवाब आया कि मनरेगा कुछ बदलावों के साथ बनी रहेगी. इसने जनकल्याण की स्कीमों के मोदी मॉडल को लेकर ऊहापोह और बढ़ा दी. सवाल मनरेगा का नहीं बल्कि उस मॉडल के स्वीकार या नकार का है जिसे कांग्रेस ने
पिछले एक दशक में ईजाद किया था. कानूनी गारंटियों से सजा-धजा यह मॉडल, रोजगार, शिक्षा और खाद्य सुरक्षा में लागू हो गया था और इसकी सफलता-विफलता भी सामने आ चुकी है. यह फैसला अफसरों को नहीं बल्कि राजनैतिक नेतृत्व को करना है कि क्या संवैधानिक गारंटियां जारी रहेंगी? अगर इन्हें जारी रखना है तो इनके रोग-दोष और सीमाओं को स्वीकारना होगा और यदि इससे इनकार है तो नए ढांचे की तैयारी करनी होगी. सामाजिक विकास से जुड़े मंत्रालय पांच माह से इसी उधेड़बुन में उलझे हैं. 
काले धन पर पिछली सरकार का हलफनामा दोहराकर किरकिरी कराने की जरूरत नहीं थी. इस संवेदनशील मसले पर राजनैतिक नेतृत्व की कमी साफ नजर आई है. प्रधानमंत्री को मन की बात के प्रसारण में कहना पड़ा कि उन्हें नहीं पता कि कितना काला धन कहां है. यह बयान चुनाव के दौरान किए गए संकल्प को कुछ कमजोर करता है. सियासी नुक्सान से बचने के लिए उन्हें अपनी साख का तकाजा देते हुए लोगों से भरोसा बनाए रखने की अपील करनी पड़ी.
कोयला घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कोई भी सरकार ऐसा ही अध्यादेश लाती जो यह सरकार लेकर आई. सिर्फ 74 खदानों की नीलामी होगी. कैप्टिव इस्तेमाल (निर्धारित संयंत्रों में प्रयोग) के लिए खदानें आवंटित करने की नीति बरकरार है, यानी पिछले दरवाजे से खदान लेने का रास्ता अब भी खुला है जैसा कि यूपीए राज में हुआ था. अध्यादेश पूरी तरह अफसरों ने गढ़ा. जबकि घोटालों के बाद प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन को लेकर राजनैतिक दिशा-निर्देश की जरूरत थी. कैप्टिव नीति को खत्म करना पारदर्शिता का तकाजा है. कोल इंडिया के निजीकरण का निर्णय सियासी नेतृत्व को लेना है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. राजनैतिक दिशा न होने से प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में कांग्रेसी अपारदर्शिता और तदर्थवाद बदस्तूर कायम है.
राज्य सरकारें नौकरशाही की चुस्ती से काम चला सकती हैं लेकिन केंद्र सरकार के निर्णय राजनैतिक शिखर से निकलते हैं, जिनसे गवर्नेंस की दिशा तय होती है. 1991 के आर्थिक सुधार राजनैतिक निर्णय थे. वाजपेयी के दौर में नई दूरसंचार नीति, निजीकरण और राजकोषीय सुधार का कानून सियासी नेतृत्व की ही देन थे. मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल में यह नेतृत्व नदारद था. राजनीति व प्रशासन के अलग-अलग केंद्र उभरे, जिसके चलते गवर्नेंस तदर्थवाद से भर गई. निवेशक और उद्यमी नई सरकार में राजनैतिक दिशा शून्य को महसूस कर रहे हैं. नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च को इस साल सिर्फ 5 फीसद विकास दर की उम्मीद है. नई सरकार के आने के बाद जुलाई में इस एजेंसी ने 5.7 फीसदी ग्रोथ का आकलन दिया था.
मोदी सरकार की मेज पर रखे ज्यादातर प्रस्ताव राजनैतिक दिशा का इंतजार कर रहे हैं. भूमि अधिग्रहण में किसानों व उद्योगों के हितों में संतुलन, जीएसटी में राज्यों को ज्यादा अधिकार, रेलवे का पुनर्गठन, कर संधियों का भविष्य, खनन क्षेत्र का निजीकरण पर सरकार का निर्णय भविष्य की नीतियां व गवर्नेंस की दिशा तय करेगा. इनमें से कई प्रस्ताव पिछली सरकार के हैं इसलिए उनका स्वीकार या इनकार भी राजनैतिक ही होगा और राज्यों की नीतियां भी इससे प्रभावित होंगी.
वित्त मंत्रालय का सालाना बजट सर्कुलर एक कीमती दस्तावेज होता है. सरकार का नीतिगत दर्शन बताने वाला यह सर्कुलर हर साल बजट से पहले मंत्रालयों को भेजा जाता है जिसके आधार पर विभाग बजट प्रस्ताव बनाते हैं. नई सरकार का पहला बजट सर्कुलर इस कदर पिछली सरकार जैसा है कि इसमें बीजेपी के चुनावी वादों से जुड़ी नीतियों का भी जिक्र नहीं है. दूसरी ओर, मोदी के तमाम आह्वान के बावजूद उद्यमी और निवेशक अगले बजट के इंतजार में ही ठिठके हुए हैं. अब उनकी बेचैनी नए सुधारों के लिए नहीं है बल्कि सरकार के पांच माह देखने के बाद निवेशक यह जानने को ज्यादा उत्सुक हैं कि नई सरकार पिछली सरकार से कहां और कैसे अलग होगी? प्रधानमंत्री चुनावी राजनीति में चतुर, निर्णायक और सफल साबित हुए हैं. लेकिन नीतियों की राजनीति उससे बड़ा इम्तिहान है क्योंकि नजर आने वाला फर्क गवर्नेंस की सियासत से ही पैदा होता है. 

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