Monday, July 19, 2010

पूंजी बदले पैंतरा

अर्थार्थ
क्या खरीदना चाहेंगे आप.?? ब्रिटेन की हाई स्पीड यूरोपियन रेल सेवा या ग्रीस के कैसिनो, जापान की डाक सेवा (दुनिया की सबसे बड़े बचत बैंक की मालिक) या फ्रांस व जर्मनी में सरकारी जमीन-मकान अथवा पोलैंड की सरकारी टकसाल और फोन कंपनी में हिस्सेदारी।... दमघोंट घाटे से घिरे यूरोप और जापान ने दुनिया में एक से नायाब सरकारी संपत्तियों का बाजार सजा दिया है। सरकारों के रत्‍‌न ( कंपनियां व प्रतिष्ठान) ग्राहकों के इंतजार में वित्तीय बाजारों के शो केस में बिठा दिये गए हैं। ..घाटा जो न कराये सो थोड़ा !!!. कर्ज पाटने और घाटा काटने के लिए सरकारी संपत्तियों की बिक्त्री तो तीसरी दुनिया का सहारा थी मगर अब तो बड़े बड़े इस बाजार में आवाज लगा रहे हैं। यह भारत के लिए फिक्त्रमंद होने मौका है। दुनिया भर के सरकारी रत्‍‌नों के इस व्यापार मेले में उसके जवाहर लालों ( सार्वजनिक उपक्त्रम विनिवेश) को कितने ग्राहक मिलेंगे? दरअसल विदेशी पूंजी अब पैंतरे बदल रही है। विदेशी निवेशकों को उनके अपने वतन बुला रहे हैं। संकट में घिरे यूरोप और अमेरिका अपने निजी क्षेत्र को उनका क‌र्त्तव्य याद दिला रहे हैं। इन कंपनियों का राष्ट्रप्रेम तीसरी दुनिया को परेशान कर सकता है। यानी कि भारत को अब विदेशी पूंजी की चिंता करनी चाहिए। उस कायर पूंजी की नहीं जो शेयर बाजार में संकट आते ही उड़ जाती है बल्कि उस विदेशी निवेश की जो अर्थव्यवस्था की जड़ों में उतर कर देश का हिस्सा हो जाता है।
सरकारों का बाजार
दुनिया के इस सबसे खास बाजार में आपका स्वागत है। इसे सरकारों के घाटे ने तैयार किया है। 232 बिलियन डॉलर के रिकार्ड घाटे से परेशान, ब्रिटेन, यहां मशहूर यूरोपियन हाई स्पीड ट्रेन सेवा बेचने (1.5 बिलियन डॉलर का जुगाड़ संभव) के लिए खड़ा है। यह ट्रेन इंग्लिश चैनल के समुद्र के नीचे से गुजरती है। ब्रितानी आकाश में विमानों की निगहबान, नेशनल एयर ट्रैफिक सर्विसेज (नैट्स) का निजीकरण हो रहा है। डाक कंपनी रॉयल मेल में भी सरकारी हिस्सेदारी बिक रही है। ब्रिटेन ने इस बिक्त्री अभियान से एक दशक में करीब 53 बिलियन डॉलर जुटाने का मीजान लगाया है। ग्रीस 3.7 बिलियन डॉलर जुटाने के लिए कई सरकारी रत्‍‌न बेचने निकल पड़ा है। शिपिंग के स्वर्ग इस मुल्क में कई बंदरगाह, रेलवे, हवाई अड्डे, डाक सेवा और एथेंस में पेयजल की आपूर्ति करने वाले प्रतिष्ठान तक, आंशिक या पूर्ण निजीकरण के लिए ग्राहक तलाश रहे हैं। कतर जैसे अमीर अरब मुल्क ग्रीस के नेशनल बैंक में हिस्सेदारी लेने की कोशिश में हैं। ग्रीस के मशहूर कैसिनो भी इस बाजार में सजे हैं। पूर्वी यूरोप में पौलेंड की सरकार दस बिलियन डॉलर के जुगाड़ के लिए अपनी टकसाल (मेनिका पोलस्का), बीमा, रसायन व फोन कंपनियों हिस्सेदारी बेच रही है। घाटा घटाने के लिए जर्मनी की सरकारी संपत्ति बिक्त्री कंपनी 'बीमा' करीब 3.4 बिलियन यूरो की संपत्तियां बेचने को तैयार है तो फ्रांस अपने छह फीसदी सरकारी भवन बेच डालेगा। घाटे में घिरी जापानी सरकार ,जापान पोस्ट का हिस्सा बेचने को तैयार है। डाक सेवा चलाने वाली यह कंपनी निवेशकों के 117 ट्रिलियन येन संभालती है। दुनिया का यह सबसे बड़ा बचत बैंक, जापान सरकार के बांडों में सबसे बड़ा निवेशक भी है। .. अर्थात सभी को मोटी जेब वाले कुछ निजी ग्राहकों का इंतजार है।
बांटने वालों की मुश्किल
यूरोप व अमेरिका में निजी क्षेत्र से ऐसी उम्मीदें कम दिखती हैं। इन क्षेत्रों में नए निवेश के स्त्रोत बाकी दुनिया से फर्क रहे हैं। बुनियादी ढांचा बनाने का जिम्मा आमतौर पर सरकारों का है। इनके संसाधनों की नदी अरबों खरबों के बांड बाजार से निकलती है। स्थांनीय निकाय और रेलवे, पेयजल, बिजली, कचरा प्रबंधन आदि से जुड़ी सरकारी कंपनियां बांड बाजार से पैसा उठा कर शहरों व देशों को रहने लायक बनाती हैं। इनके बांडों पर मिलने वाली कर छूट निवेशकों को आकर्षित करती है। मगर ताजे संकट ने सब बदल दिया। 2.7 ट्रिलियन डॉलर का अमेरिकी स्टेट व म्युशनिसिपल बांड बाजार ढह गया है। इस बाजार में कैलीफोर्निया को 'अमेरिका का ग्रीस' कह रहे हैं। जाहिर है जब देशों की साख कचरा हो रही हो तो स्थानीय निकायों के बांड कौन खरीदे। अमेरिका में पिछले छह माह में 1.5 बिलियन डॉलर के म्युनिसिपिल बांड डिफाल्ट हो चुके हैं। नतीजतन सरकारी संपत्तियां खरीदने व निवेश के लिए निजी क्षेत्र की टेर लग रही है। ब्रिटेन के नए वित्त मंत्री जॉर्ज ऑसबोर्न ने कहते हैं कि सरकारी खर्च घट रहा है, निजी क्षेत्र को अब आर्थिक विकास का इंजन संभालना होगा।
उलटी धार निवेश की
मंदी और संकट का विस्फोट दुनिया में निवेश की धारा उलट सकता है। जो मुल्क आज परेशान हैं उन्हीं की कंपनियां तीसरी दुनिया के देशों में निवेश उड़ेल रही थीं। अब इनके संसाधन इनके अपने ही देश में ही रुकने का खतरा है। स्वतंत्र आकलनों के मुताबिक अगले कुछ वषरें में दुनिया में 132 बिलियन डॉलर तक की सरकारी संपत्तियां बिकेंगी। इस नक्कारखाने में भारत के सार्वजनिक उपक्त्रम विनिवेश की तूती मुश्किल से ही सुनाई देगी। विदेशी निवेश के लिए बाजार को खोलना अमेरिका की सबसे ताजी बहस है। अमेरिका की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में विदेशी कंपनियां बिरले ही निवेश करती हैं। लेकिन संसाधनों की किल्लत पुराने नियम बदल रही है। अब अगर कैलीफोर्निया या लुइजियाना अथवा एथेंस या मानचेस्टर में निवेश के मौके निकले तो उत्तर प्रदेश अथवा पटना, जयपुर को कौन पूछेगा? आउटसोर्सिंग या कंपनियों के अधिग्रहण को लेकर हाल के प्रसंग गवाह है कि पश्चिम की सरकारें गजब की संरंक्षणवादी हैं, वह कर रियायतों से लेकर तमाम नियमों के जरिये निजी निवेश को अपने देश में रोकने की कुव्वत रखती हैं। कई झंझावातों के बाद जब भारत ने जब निवेशकों का भरोसा हासिल किया तो निवेश की हवायें ही बदलने लगीं हैं।
भारत की उलझन बड़ी दिलचस्प है। उभरती अर्थव्यवस्था से आकर्षित होकर निवेशकों के झुंड शेयर बाजारों में उतर रहे हैं। मगर यह डरपोक निवेश है, जो जरा से संकट पर बोरिया बिस्तर समेट लेता है। देश को वह विदेशी पूंजी चाहिए जो तकनीक, रोजगार व उत्पादन लेकर आए। सरकारी लक्ष्यों के मुताबिक 2012 तक देश को हर साल ऐसे 50 बिलियन डॉलर चाहिए, जो यहां की आर्थिक जमीन में उतर जाएं। अलबत्ता अच्छे वषरें में भी इस किस्म की विदेशी पूंजी 25-26 बिलियन डॉलर से ऊपर नहीं गई है। अब जबकि निवेश के उद्गम क्षेत्रों के इर्दगिर्द ही सूखा पड़ा है तो पूंजी की धारायें की भारत जैसे दूरदराज के इलाकों तक मुश्किल से ही पहुंचेंगी। हैरत नहीं कि दुनिया के अन्यं इलाकों से भी निवेशक यूरोप अमेरिका का रुख कर लें क्यों कि वहां के बाजारों में भारत जैसे रोड़े नहीं हैं। ..भारत को अब विदेशी निवेश के संभावित सूखे से निबटने के लिए तैयारी शुरु कर देनी चाहिए।
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Monday, July 12, 2010

घट-घट में घाटा

अर्थार्थ
छि:
! इतना घाटा! ..संभालो नहीं तो बीमार हो जाओगे। बजट घाटा बड़ा महंगा पड़ता है। ..टोरंटो की जी 20 बैठक में दुनिया के बड़ों को कुछ इस अंदाज में नसीहत दे रहे थे भारतीय प्रधानमंत्री। यह दरअसल उन उलाहनों या झिड़कियों की सूद समेत वापसी थी, जो घाटे को लेकर अगड़े देशों ने पिछले दशक में कई बार भारत को दी हैं, लेकिन तब भारत इस मर्ज के चुनिंदा मरीजों में एक था। ताजा दौर तो बिलकुल अलग है। सरकारों के घाटे अब सर्वव्यापी हैं। क्या बड़ा क्या छोटा, क्या अगड़ा और क्या पिछड़ा.. हर नामचीन देश की सरकार खाली खजानों और बदसूरत बजट को लेकर हलकान है। अमेरिका के स्थानीय निकाय घाटे को घटाने के लिए पुलिस जैसी जरूरी सेवाएं भी रोकने लगे हैं। यूरोप में सरकारें पेंशन काटकर अपनी बुढ़ाती आबादी से कुर्बानी मांग रही हैं। पहाड़ जैसे घाटे से डरा जापान सरकारी कर्ज की सीमा बांध रहा है। अगर सिर्फ सरकारों के बजट घाटे के आधार पर दुनिया का कोई नक्शा बनाया जाए तो हर महाद्वीप के हर दिग्गज देश के खजाने पर घाटे का लाल झंडा टंगा दिखेगा। ..राजकोषीय घाटे का यह साम्यवाद अभूतपूर्व है। अब इस हमाम में कौन किससे लजाए और कौन किसको चादर ओढ़ाए?
तीन साल में यह हाल
भारत जैसों को जाने दीजिए, यहां तो बजट घाटे वित्तीय संस्कृति का हिस्सा हैं मगर यूरोप व अमेरिका तो चुस्त राजकोषीय प्रबंधन की नजीर थे। किसी को भी यह जानकार हैरत होगी कि 2007 में विकसित मुल्कों का औसत घाटा जीडीपी के अनुपात में केवल 1.1 फीसदी था, मगर 2010 में यह 8.4 फीसदी हो गया। 2007 में विकसित मुल्कों की सरकारें जीडीपी के अनुपात में 73 फीसदी का औसत कर्ज दिखा रही थीं। अब यह इनके कुल जीडीपी से ज्यादा (सौ फीसदी से ऊपर) हो गया है। सिर्फ तीन साल की आर्थिक समस्याओं के फेर में इनके पूरे वित्तीय प्रबंधन का कचूमर निकल गया। इससे यह सिद्ध हुआ है कि इन मुल्कों का ढांचा कितने नाजुक तारों से बंधा था। इनके बजट अर्थव्यवस्थाओं को नए खर्च की थोड़ी सी खुराक देने में कंगाल हो गए। बची खुची कसर मंदी के कारण कमाई में कमी ने पूरी कर दी। दुनिया में मुस्कराती इठलाती अर्थव्यवस्थाएं सिर्फ 36 माह के भीतर घाटे में गले तक धंस गई हैं।
डॉलर वालों की ढाल
अमेरिका में दक्षिण कैलिफोर्निया का शहर मेवुड अपनी पुलिस फोर्स बंद कर रहा है। अधिकांश सरकारी कर्मचारी नौकरी गंवा चुके हैं। मेवुड अमेरिका के भीतर घाटे की भयानक हालत का उदाहरण है। हालांकि बाहर की दुनिया के लिए अमेरिका के पास अनोखी ढाल है। दरअसल घाटे व कर्ज के जिस स्तर पर ग्रीस डूबा है या यूरोप में हाय तौबा मची है, उससे कहीं ज्यादा फटी जेब के साथ अमेरिका मुस्करा सकता है क्योंकि उसके पास डॉलर है। यानी दुनिया के वित्तीय तंत्र की केंद्रीय मुद्रा। यूरो ढहने लगा तो अमेरिका के घाटे को बिसरा कर दुनिया डॉलर समेटने लगी। हर मुल्क का विदेशी मुद्रा खजाना डॉलर में है। इसलिए कमजोर वित्तीय हालत के बावजूद अमेरिका के बांड बिक जाते हैं। यानी कि डॉलर के सहारे अमेरिका घाटे को घटाने की गति धीमी रख सकता है और जीडीपी की तुलना में 100 फीसदी से ज्यादा कर्ज लेकर भी खड़ा रह सकता है। .. लेकिन नतीजा निकालने से पहले जरा ठहरिए। डॉलर का यह सहारा अमेरिका के भीतर किसी काम का नहीं है। अमेरिकी राज्यों का संयुक्त घाटा अगले साल 112 बिलियन डॉलर हो जाएगा। कर्ज में डूबे स्थानीय निकाय पुलिस, शिक्षा, अस्पताल जैसी जरूरी सेवाओं पर खर्च रोकने लगे हैं। अमेरिकी व्यवस्था में स्थानीय निकायों पर बहुत कुछ निर्भर है। उनका संकट आम लोगों पर भारी पड़ने लगा है। म्युनिसिपल बांड मार्केट ध्वस्त है यानी स्थानीय निकायों के लिए पूंजी का स्रोत बंद है। नतीजतन अमेरिका में सड़क, पुल, पार्किग आदि में विदेशी निवेश खोलने की बहस शुरू हो गई है। अमेरिका के लिए यह अनोखी स्थिति है। डॉलर की अम्मा भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खैर मना ले, लेकिन देश के भीतर तो घाटा नाक तक आ गया है।
यूरो वालों का कौन पुरसाहाल
यूरोपीय देशों के खजाने पूरी दुनिया की मुश्किल हैं। उनके पास तो डॉलर जैसा, खोखला ही सही, सहारा भी नहीं है। यूरोप का घाटा यहां के देशों व इनकी मुद्रा अर्थात यूरो दोनों को डुबा रहा है। मगर यूरो से दूरी बनाने वाले ब्रिटेन जैसे भी कम संकट में नहीं हैं। ब्रिटेन की नई सरकार का बजट वहां के लोगों पर आफत बन कर टूटा। घाटा जीडीपी का 10.1 फीसदी है। वित्त मंत्री ऑसबोर्न जब सालाना 44 बिलियन डॉलर का खर्च घटाएंगे, तब भी घाटे की बाढ़ उतरने में पांच साल लग जाएंगे। जीडीपी के अनुपात में करीब 80 फीसदी कर्ज के साथ ब्रिटेन सबसे ज्यादा खतरे में है। ग्रीस, स्पेन, हंगरी, इटली, पुर्तगाल, जर्मनी, आयरलैंड सबके सब भारत वाली बीमारी के बड़े मरीज हैं। यहां घाटों को ठीक करने के दो मॉडल काम कर रहे हैं। जिनकी रीढ़ कुछ मजबूत है वह देश खर्च घटा रहे हैं और जो बुरी तरह बदहाल हैं वह भारी टैक्स लगा रहे हैं।
मंदी की शुरुआत से पहले तक दुनिया के नीति निर्माताओं ने लगभग एक दशक का बसंत देखा था, यानी भरे हुए खजाने, नियंत्रण में घाटे, दिल खोलकर कर्ज देता बाजार आदि। मगर एक वित्तीय संकट व छोटी सी मंदी ने बाजी पलट दी और बजटीय घाटों ने सबको धर दबोचा। सरकारों को घाटे से बचाने या उबारने की इस भूमंडलीय बीमारी का कोई टीका नहीं है यानी कि हर देश को अपना फटा खुद अपनी तरह से सीना है। इस सूरत में कोई नहीं जानता कि किसका रफू कितना लंबा चलेगा। मसलन जापान ने कर्ज की सीमा तय की है। अलबत्ता सरकार मानती है कि घाटा कम होते-होते पांच साल लग जाएंगे। दुनिया के ज्यादातर देशों के घाटा नियंत्रण कार्यक्रम पांच-छह साल बाद ही नतीजे देंगे, क्योंकि घाटे ही इतने बड़े हैं, और वह भी तब जब कि कोई नया संकट न आ धमके।
दुनिया भर के हाकिम अब अपनी तलवारें बांधकर घाटे से जंग के लिए मैदान में कूद पड़े हैं। इस अभूतपूर्व समस्या के इलाज के लिए हर पैंतरा इस्तेमाल में है। मगर नतीजों को लेकर असमंजस है। बस पूरी दुनिया इस बात पर आश्वस्त है कि बजट के गड्ढों को भरने में मंदी से उबरने की उम्मीद काम आ जाएगी। यानी किघाटे का कचरा साफ होने तक दुनिया की आर्थिक मशीन खिच-खिच करते हुए ही चलेगी। मोटी बात यह कि टैक्स बढ़ेगा कमाई नहीं और खर्च घटेगा महंगाई नहीं। ..यह बात ठीक है कि घाटा काटने वाली तलवारें अंतत: आम लोगों की जेब पर ही चलती हैं, लेकिन सरकारें यह तलवारें हमारे भले के लिए ही तो उठाती हैं? है न?
हाकिम की तलवार मुकद्दस होती है।
हाकिम की तलवार के बारे मत लिक्खो।
(अहमद फराज)
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Thursday, July 8, 2010

चीन को 'यलोकेक' मांगता !!

चाईनीज चेकर (An Artharth E-xclusive)
फ्रांस हार गया !!.... बात फीफा वर्ल्‍ड कप की नहीं है। .. वह तो मैदान का खेल है। हम उस खेल की बात कर रहे हैं‍ जिसमें आज जीतने वाला एक दशक बाद सिकंदर होगा। जंग है दुनिया की सबसे अहम पीली धातु हथियाने की ! .... बिल्‍कुल सही समझे आप, हम सोने की नहीं यूरेनियम ( यूरेनियम को यलोकेक भी कहते हैं। अयस्‍क से पीले रंग का यूरोनियम कंसट्रेट पाउडर बनता है, जिसे बाद में यूरेनियम ईंधन में बदला जाता है) की बात कर रहे हैं। यूरेनियम की होड़ में चीन ने फ्रांस के दांत खट्टे कर दिये हैं और वह भी उसके अपने इलाके में। दुनिया जब अफ्रीका में बुवुजेला बजाने की तैयारी कर रही थी या मैक्सिको की खाड़ी में बीपी का कीचड़ साफ कर रही थी तब चीन ने फ्रांस को उसके अफ्रीकी आंगन में पटक दिया। चीन ने पश्चिम अफ्रीका में फ्रांस के पुराने उपनिवेश नाइजर में यूरेनियम की एक बड़ी खान हथिया ली। यह सौदा फ्रांस को हिला गया है।
नाइजर और पेरिस से दूर बैठे या यूरेनियम को लेकर दुनिया में चल रही होड़ से बेखबर लोग इस सौदे को हल्‍के में ले सकते हैं मगर फ्रांस के लिए यह सीधी हार है। साम दाम दंड भेद की सभी कलाओं में माहिर चीन ने नाइजर में फ्रांस का पूरा खेल ही पलट दिया है। चीन की सिर्फ कुछ वर्ष की मेहनत से चीनी कंपनियां गृह युद्ध के कारण चिथड़ा हो रहे नाइजर के सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों की नाक का बाल बन गई हैं। नाइजर की एजिलेक नामक खान को हथियाकर चीन ने दुनिया के दूसरे सबसे बड़े यूरेनियम उत्‍पादक देश नाइजर में फ्रांस और उसकी मशहूर यूरेनियम ऊर्जा कंपनी अरेवा का चालीस साल पुराना एकाधिकार तोड़ दिया है।
नाइजर पर चर्चा बाद में.... पहले एक जायजा, चीन की यूरेनियम भूख का। जिसके कारण वह फ्रांस जैसे पुराने खिलाडि़यों को उनके उपनिवेश में धूल चटा रहा है। चीन अपने भविष्‍य को बहुत नपे तुले ढंग से ऊर्जावान कर रहा है। आणविक हथियारों की बहस से परे पूरी दुनिया जानती है कि आबो हवा को साफ सुथरा रखने वाली ऊर्जा भविष्‍य में यूरेनियम से ही निकलेगी। आणविक ऊर्जा में दुनिया में सबसे बड़ा देश बनना चीन का नया सपना है। चीन अपने डॉलरों की गठरी लेकर पूरी दुनिया में यूरेनियम खोदने, खरीदने व हथियाने निकल पड़ा है। चीन में आणविक ऊर्जा की ताजा क्षमता दस गीगावाट के करीब है। लेकिन 2020 तक यह 40 गीगावाट पहुंच जाएगी। चीन में 11 न्‍यूक्लियर ( भारत में रिएक्‍टर तो 19 हैं मगर चीन भारत से पांच गुना ज्‍यादा नाभिकीय बिजली बनाता है।) रिएक्‍टर काम कर रहे हैं। 24 बन रहे हैं और 150 बनने वाले हैं। इसके बाद दुनिया में सबसे ज्‍यादा रिएक्‍टर चीन के पास होंगे और 2050 तक 1000 गीगावाट की नाभिकीय बिजली बना रहा होगा। चीन को मालूम है कि अगले दो दशक में उसे वर्तमान से दस गुना ज्‍यादा यूरेनियम चाहिए। वर्ल्‍ड न्‍यूक्लियर एसोसिशन इस पर मुहर लगाती है जिसके मुताबिक अगले दो दशक में चीन दुनिया में इस पीली धातु का सबसे अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्‍ता होगा।
चीन के पास डॉलरों से भरा भंडार है, जिसके बूते वह अफ्रीका से लेकर आस्‍ट्रेलिया तक हाथ मार रहा है। चीन की दोनों नाभिकीय ऊर्जा कं‍पनियां चाइना नेशनल न्‍यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन और चाइना गुआनडांग न्‍यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन पूरी दुनिया में यूरेनियम की खाने बटोरने के अभियान पर निकली हैं। चाइना गुआनडांग, कजाकस्‍तान ( दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्‍पादक), उज्‍बेकिस्‍तान, आस्‍ट्रेलिया और नामीबिया में यूरेनियम खोद कर चीन का भंडार भर रही हैं तो चाइना नेशनल न्‍यूक्लियर, मंगोलिया व नाइजर में सक्रिय है। चाइना गुआनडांग ने पिछले साल एक यूरेनियम खान हथियाकर आसट्रेलिया के पूरे खनन उद्योग को हैरत में डाल दिया था। चीन की निगाह दक्षिण आस्‍ट्रेलिया में सिथ‍त ओलंपिक के विशाल भंडार ओलंपिक डैम माइन पर भी हैं।
...... मगर चीन की चालों से आस्‍टे्लिया से ज्‍यादा फ्रांस परेशान है। नामीबिया व नाइजर जैसे अपने पुराने गुलाम देशों की जमीन के नीचे भरे यूरेनियम के सहारे फ्रांस की अरेवा दुनिया की सबसे बड़ी यूरेनियम उत्‍पादक बन गई। 1.2 बिलियन डॉलर के कारोबार वाली अरेवा को चीन का मिशन यूरेनियम मुश्किल में डाल रहा है। अरेवा नाइजर की पुरानी बाशिंदा है। उसकी इमोयूरारेन खान तैयार हो रही है जिससे 2013 तक 5000 टन यलोकेक निकलेगा। लेकिन अपने दशकों की मौजूदगी अरेवा चीन की कंपनी को एजिलेक खान लेने से नहीं रोक सकी। दरअसल अफ्रीका की भ्रष्‍ट राजनीति को चीन की दोस्‍ती रास आ रही है। भारी बोनस , नेताओं को हर तरह की सुविधा, देश में सड़कें पुल और गृह युद्ध में जरुरत के मुताबिक मदद.... चीन ने एक तरह से नाइजर को फ्रांस से काट सा दिया है। हिंसा और संघर्ष से भरे पूरी तरह स्‍थलीय (लैंडलॉक्‍ड) नाइजर में चीनी कंपनियां के पास तेल रिफाइनरी है, एक तेल ब्‍लॉक है और ....... यूरेनियम भी है। यानी बात पश्चिम अफ्रीका में फ्रांस के दबदबे पर बन आई है।
गृह युद्धों और हथियारबंद गिरोहों से भरे अधिकांश अफ्रीका में चीन खुलकर खेल रहा है। यूरेनियम हथियाने के लिए वह बोत्‍सवाना में जापान को पीछे धकेल रहा है तो नाइजर में फ्रांस को। ...... इस बेहद संवेदनशील धातु की बिसात पर चीन के पैंतरे बड़े नपे तुले हैं। एक दशक बाद चीन की नाभिकीय उत्‍पादन क्षमता दुनिया के लिए ईर्ष्‍या का सबब बन जाएगी।

यही तो है चाइनीज चेकर !!!!!!
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Monday, July 5, 2010

सियासत के सलीब

अर्थार्थ
दोषियों से दोस्ती भी और पीडि़तों की अगुआई भी। दोनों काम एक साथ। चिढ़ते रहिए आप, मगर यह विशेषाधिकार सिर्फ सियासत और सत्ता को मिला है। माहौल बदलते ही सियासत गलती करने वालों से गलबहियां छोड़कर, मुंसिफ बन जाती है। दुनिया भर की सरकारें आजकल इसी भूमिका में हैं। अमेरिका में व्हाइट हाउस से लेकर लंदन में टेन डाउनिंग स्ट्रीट और ऑस्ट्रेलिया तक सलीबों की सप्लाई अचानक बढ़ गई है। ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने बैंकों को अरबों पौंड के नए टैक्स की सूली पर टांग दिया है। अमेरिका, जर्मनी व फ्रांस भी बैंकों के लिए यही सजा मुकर्रर करने वाले हैं। व्हाइट हाउस ने पेट्रोल कंपनी बीपी को आर्थिक जुर्माने की सलीब पर चढ़ा दिया है। टोयोटा पहले से कठघरे में खड़ी है। दरअसल यह सूलियां सजाने का मौसम है, जिसमें बाजार के बादशाहों के खजाने निशाने पर हैं। मगर अपना मुल्क इस मामले में कुछ अलग है। घोटालों में झुलसे लोगों का दर्द गवाह है कि हम कायदे से सजा भी नहीं दे पाते। 26 साल पुराने भोपाल हादसे का दाग भी अपने ही बजट से धोने जा रहे हैं यानी कि करदाता सूली पर चढ़ेंगे। शर्मिदगी से बचने के लिए हम बस, खुद को सजा दे लेते हैं।
बुरे फंसे बैंक
सरकारें इस समय ताजा वित्तीय संकट के मुजरिम तय करने में जुटी हैं। कोशिश जल्द से जल्द सजा देने की है ताकि अपना दामन बचा रहे। बैंक व वित्तीय संस्थाएं पुराने पापी हैं। सरकारों की निगाह में इनका एडवेंचर दुनिया को महंगा पड़ा है। बैंकों को डूबने से बचाने पर सरकारें नौ ट्रिलियन (सोलह शून्य वाली संख्या) डॉलर तक खर्च चुकी हैं। इसलिए सजा भी माकूल होनी चाहिए। ब्रिटेन की नई सरकार के चांसलर जॉर्ज ऑसबोर्न ने ताजा बजट में बैंकों से दो बिलियन पौंड वसूलने का इंतजाम कर दिया है। जर्मनी व फ्रांस के शिकंजे भी बन चुके हैं। अमेरिका में कानून तैयार है, हालांकि लामबंदी जारी है, मगर टैक्स लगना तय है क्योंकि बैंक व वित्तीय संस्थाएं लामबंदी व रसूख में चाहे जितने मजबूत हों, सियासत में राजनेताओं को नहीं पछाड़ सकते। नेताओं ने बहुत सफाई के साथ टैक्स लगा भी दिया और टैक्स लगाने की सामूहिक (जी 20 की बैठक) तोहमत भी नहीं ली। अंतरराष्ट्रीय मंच से कर लगने का ऐलान शेयर बाजारों को तोड़ कर बैंकों की चीख पुकार को ऊंचा कर देता। इसलिए जी 20 ने बैंक टैक्स पर खुलकर बात ही नहीं की और देशों को टैक्स लगाने के लिए आजाद कर दिया। वैसे भी अमेरिका व यूरोप के प्रमुख देशों में इसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी थी। इसके बदले बैंकों पर दूसरा सामूहिक शिकंजा कसा जा रहा है। बैंकिंग के कामकाज को सख्त पाबंदियों में बांधने वाले बेसिल नियमों की तीसरी पीढ़ी तैयार है। टैक्स के बाद बचा हुआ काम ये नियम कर देंगे। इसके बाद बैंक व वित्तीय संस्थाओं के लिए जोखिम लेकर मुनाफा कमाने के रास्ते बहुत संकरे हो जाएंगे।
माफी का मौका नहीं
अमेरिका नामक सबसे उदार बाजार ने पिछले कुछ महीनों में प्रमुख कार कंपनी टोयोटा के अध्यक्ष अकीयो टोयोदा को वस्तुत: आठ आठ आंसू रुला दिए। शेयरधारकों ने बाकायदा बैठक में झिड़का कि टोयोदा महोदय आप सुबकते हुए अच्छे नहीं लगते। टोयोटा की कारों के एक्सीलरेटर पैडल खराब थे। कारें अचानक तेज दौड़ पड़ती थीं। अमेरिका में हादसे हुए तो मामला गरमाया और टोयोदा को अपराधियों की तरह अमेरिकी संसद की समिति के सामने पेश होना पड़ा। पूरी दुनिया में एक करोड़ कारें वापस ली गई। कंपनी मुकदमे लड़ रही है और हर्जाना दे रही है। कमाई को दो बिलियन डॉलर की चपत लग चुकी है। टोयोटा के कर्मचारियों का वेतन दस फीसदी घटाया गया है। मैक्सिको की खाड़ी में बहते तेल में डूब रही बीपी का किस्सा सबको मालूम है। ओबामा ने कंपनी की गर्दन पकड़कर 20 बिलियन डॉलर का चेक ले लिया। बीपी अब लंबी मुकदमेबाजी के लिए तैयार हो रही है। सजा देने का यह मानसून ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच चुका है। प्रधानमंत्री केविन रड ने मंदी को देखते हुए देश के सबसे ताकतवर खनन उद्योग पर 40 फीसदी टैक्स लगाया तो कुर्सी खिसक गई। नई प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने कुछ रियायत दी है, मगर टैक्स कायम है। बाजार को याद है कि जब मौका आया तो अमेरिका ने 246 बिलियन डॉलर का हर्जाना वसूल लिया और सिगरेट कंपनियां मिमियाती रह गई।
सजा की सियासत
सिगरेट कंपनियों से वसूली गई मोटी रकम में कितनी लोगों की सेहत सुधारने पर खर्च हुई या बीपी से मिले 20 बिलियन डॉलर कहां जाएंगे, इस पर अमेरिका में भी दर्जनों सवाल हैं। आप बेशक कह सकते हैं कि अमेरिकी सरकार ने पिछले साल एआईजी, फेनी मे और फ्रेडी मैकजैसी कंपनयिों को बचा लिया था। जबकि आज गोल्डमैन सैक्श, बीपी आदि को सजाएं सुनाई जा रही है। जी हां, यही तो सियासत है। वक्त बदला तो दुनिया का सबसे उदार बाजार कंपनियों के लिए सबसे क्रूर हो गया। मगर भारत को तो सजा देते हुए दिखना भी नहीं आता। सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार को लपेट में आता देख हमारी सरकार ने अचकचाकर भोपाल का हर्जाना 26 साल बाद अपने ही गले बांध लिया। कार्बाइड तो गई, अब गलती का बिल (1500 करोड़ रुपये का पैकेज) बजट यानी करदाता चुकाएंगे। उदारीकरण के बाद भारत में एक दर्जन से ज्यादा बड़े घोटालों में हजारों लोगों ने अपने हाथ जलाए हैं, लेकिन हर्जाना दिलाने का यहां कोई रिवाज नहीं है। दूसरी तरफ जमीन मकान के बाजार में फर्जीवाड़ा खुलने और जनता के गुस्साने के बाद ओबामा का प्रशासन सब प्राइम प्रॉपर्टी बाजार में धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ ऑपरेशन स्टोलेन ड्रीम चला रहा है। 191 मामले दर्ज हो चुके हैं और 147 मिलियन डॉलर की रिकवरी हो चुकी है। मतलब यह कि बात जब राजनीति के दामन तक पहुंचे किसी को भी टांगा जा सकता है।
दुनिया में कोई यह कभी नहीं जान पाएगा कि लीमन ब्रदर्स सहित दर्जनों बैंक अपनी गलती से डूबे या सरकारों अर्थात नियामकों की लापरवाही से। बीपी के कुएं से तेल का बहना कंपनी की चूक थी या सरकारी देखभाल की। जनता चाहे कहीं की भी हो, अपनी कमजोर याददाश्त की वजह से सिर्फ हादसे या घोटाले और उनके नतीजे या उपचार याद रख पाती है। यही वजह है कि पश्चिम की सियासत का इंसाफ बीपी, टोयोटा पर जुर्माने या बैंक टैक्स के तौर पर दुनिया को दिख जाता है। जबकि हमारे यहां दोषी नहीं, बल्कि पीडि़त ही सजा पाता है। दरअसल हम जरा कच्चे हैं। भारत की व्यवस्था न तो हादसे या घोटाले रोक पाती है और न ही इंसाफ देती नजर आती है। हमारी सियासत बस पूरे मामले में अपने हाथ काले कर लेती है और बाद में उन्हीं हाथों के पीछे मुंह भी छिपा लेती है। ..हमें कुछ सीखना चाहिए।
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Monday, June 28, 2010

तौबा, तेरा सुधार !!

अर्थार्थ
चास पार का पेट्रोल और चालीस पार का डीजल खरीदते हुए कैसा लग रहा है? सुधारों की पैकिंग में कांटो भरा तोहफा। पेट्रो उत्पादों के मामले में सरकारें हमेशा से ऐसा करती आई हैं। कीमतें बढ़ाते हुए हमें (सब्सिडी आंकड़ा दिखा कर) सब्सिडीखोर होने की शर्मिदगी से भर दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों की रोशनी में तेल कंपनियों की बेचारगी देखकर हम मायूस हो जाते हैं। अंतत: सुधारों का तिलक लगा कर उपभोक्ता यूं बलिदान हो जाते हैं कि मानो कोई दूसरा जिम्मेदार ही न हो। यह सरकारों का आजमाया हुआ इमोशनल अत्याचार है। वैसे चाहें तो ताजा फैसले की रोशनी में इसे पेट्रो मूल्य प्रणाली में नया सुधार भी कह सकते हैं। मगर पेट्रो उत्पादों को दुगने तिगुने टैक्स से निचोड़ती राज्य सरकारों को कुछ मत कहिए। सब्सिडी का डीजल पी रहे जेनसेटों से घरों बाजारों को चमकने दीजिए, बिजली की कमी की शिकायत मत कीजिए। सार्वजनिक परिवहन की मांग मत करिए, क्या ऑटो कंपनियों की प्रगति से जलते हैं? यह सब सुधार के एजेंडे में नहीं आते हैं। ताजा सुधार तेल कंपनियों को सिर्फ पेट्रोल की कीमत तय करने की आजादी देता है। डीजल को लेकर रहस्य और केरोसिन व एलपीजी पर सब्सिडी कायम है। साथ ही सियासत के दखल का शाश्वत रास्ता भी खुला है, जिसके कारण पेट्रो मूल्य प्रणाली में सुधारों का इतिहास बुरी तरह दागदार रहा है।
मांग के बदले महंगाई
मांग तलाश रही अर्थव्यवस्था को सरकार ने महंगाई व ऊंची लागत थमा दी है। नीति निर्माता इस वित्त वर्ष की शुरुआत से ही महंगाई बनाम तेज विकास बनाम घाटे की तितरफा ऊहापोह में घिरे हैं। अब बारी बाजार व निवेशकों के भ्रमित होने की है। महंगे पेट्रो उत्पादों के बाद आने वाले महीनों में मांग बढ़ते रहने की कोई गारंटी नहीं है। अर्थव्यवस्था की हालिया चमक की मजबूती पर दांव लगाना अब जोखिम भरा है। आखिर मंदी से घायल व महंगाई से लदी अर्थव्यवस्था पेट्रो कीमतों की टंगड़ी फंसने के बाद कितना तेज चल पाएगी? बाजार को दिखने लगा है कि खेत से लेकर फैक्ट्री तक पहले से फैली महंगाई मांग को समूचा निगल जाएगी। कच्चे तेल की वायदा कीमतें आने वाले वक्त में पेट्रो उत्पाद और महंगे होने का वादा कर रही हैं। तभी तो रिजर्व बैंक ब्याज दरों में वृद्धि के कागज पत्तर संभालने लगा है। मुद्रास्फीति की आग पर उसे पानी डालना है। चीन के नए मौद्रिक दांव से अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिंसों की कीमत बढ़ने वाली है। महंगा ईधन, महंगी पूंजी या कर्ज और महंगा कच्चा माल। महंगाई की मारी और मंदी से उबरती अर्थव्यवस्था को फिलहाल ऐसे सुधार की दरकार नहीं थी।
साफ सियासत, रहस्यमय फार्मूले

कल्पना कीजिए, बिहार (अक्टूबर 2010) या बंगाल (मई 2011) में चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है। तभी ईरान को अमेरिका अचानक परमाणु कार्यक्रम का नया पिन चुभो देता है या फिर इजरायल हाल के फ्लोटिला हमले जैसी कोई कारगुजारी कर बैठता है। दुनिया में तेल की कीमतें सातवें आसमान पर हैं, तब क्या होगा? सरकार तेल कंपनियों से कीमतें तय करने की आजादी तत्काल छीन लेगी। पेट्रो मूल्य प्रणाली के ताजा क्रांतिकारी सुधार में यह प्रावधान शामिल है। यही पेंच पेट्रो मूल्य ढांचे में सुधारों की साख को हमेशा से दागी करते हैं। 2002 में भी सरकार ने पेट्रो मूल्यों के नियंत्रण से तौबा की थी। बजट में ऐलान हुआ भी था लेकिन कीमतें सरकार की जकड़ से कभी आजाद नहीं हुई। बस केरोसिन व एलपीजी का घाटा तेल पूल खाते की जगह बजट में पहुंच गया। सुधारों के नए कार्यक्रम में भी सरकार के हस्तक्षेप की जगह और राजनीतिक ईधनों यानी डीजल, केरोसिन और एलपीजी की कीमतों में पुराना असमंजस बरकरार है। कीमतें कब कैसे कितनी बढ़ेंगी या सरकार कब किस मौके पर कैसे दखल देगी, इसके फार्मूले रहस्य के रवायती आवरण में हैं। ऐसी सूरत में सुधारों पर भरोसा जरा मुश्किल है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि सुधार की रोशनी राज्यों के टैक्स ढांचे तक नहीं पहुंचती जो पेट्रो उत्पादों की कीमत दोगुनी कर देते हैं। महंगी कारों में सस्ते ईधन के खेल, तेल कंपनियों की दक्षता, केरोसिन व डीजल की मिलावट के अर्थशास्त्र, संरक्षण की कोशिशों और वैकल्पिक ईधनों की जरूरत जैसे मुद्दों की तरफ भी सुधारों की नजर नहीं जाती। पेट्रो मूल्यों में सुधार का मतलब सियासत के हिसाब से कीमतों में कतर ब्योंत है बस। और इस पैमाने पर यह वक्त सबसे मुफीद था।
बाजार बदला, पैमाने नहीं
सरकार का सस्ता डीजल कहां खप रहा है? सबको पता है कि सस्ता केरोसिन देश में किस काम आता है? पिछले बीस साल में इस देश में ईधन की खपत का पूरा ढांचा बदल गया मगर सरकार के पैमाने नहीं बदले। बुनियादी ढांचे और बुनियादी सेवाओं में कई बुनियादी खामियों की कीमत पेट्रो उत्पाद चुकाते हैं। डीजल दुनिया के लिए ट्रांसपोर्ट फ्यूल है मगर भारत में यह एनर्जी फ्यूल भी है। आवासीय भवनों व शॉपिंग मॉल को रोशन करने वाले दैत्याकार किलोवाटी जनरेटर बिजली कमी से उपजे हैं। शहरों से लेकर गांवों तक अब जरूरत की तिहाई रोशनी डीजल से निकलती है। नए उद्योग सरकारी बिजली भरोसे नहीं बल्कि सस्ते डीजल की बिजली भरोसे आते हैं। पिछले चार साल में डीजल 30 से 40 रुपये प्रति लीटर हो गया लेकिन डीजल की मांग करीब नौ फीसदी सालाना की रिकार्ड दर से बढ़ रही है। देश के ज्यादातर शहर सार्वजनिक परिवहन के मामले में आदिम युग में हैं मगर ऑटो कंपनियां वक्त को पछाड़ रही हैं। कामकाजी आबादी से भरे शहर निजी वाहनों से अटे पड़े हैं और पेट्रोल की मांग 14 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है। बावजूद इसके पेट्रोल चार साल में 43 से 50 रुपये लीटर पर पहुंच गया। सस्ते डीजल और सस्ती बिजली दोनों की तोहमत खेती के नाम है लेकिन खेती में सिंचाई के फिर भी लाले हैं। दरअसल, बढ़ती अर्थव्यवस्था और कमाई ने बिजली, परिवहन सुविधाओं की कमी का इलाज सस्ते पेट्रो उत्पादों में खोज लिया है। इसलिए कीमत बढ़ने से मांग घटने का सिद्धांत यहां सिर के बल खड़ा है।
सरकार ठीक कहती है कि पेट्रो उत्पादों की महंगाई के मामले हम अभी सिंगापुर व थाईलैंड के करीब ही पहुंचे हैं। ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस तो बहुत आगे हैं। यह भी सच है कि अरब के कुओं, मैक्सिको की खाड़ी और नार्वे के समुद्र से निकला तेल कीमत के मामले में उपभोक्ताओं के बीच फर्क नहीं करता। लेकिन जरा ठहरिये.. सरकारें चाहें तो फर्क पैदा कर सकती हैं क्योंकि ईधन के मूल्य महंगाई, जनता की आय और अर्थव्यवस्था की स्थिति देखकर ही तय होते हैं। मगर यहां तो सियासत का फार्मूला सब पर भारी है। अब छोड़ भी दीजिये, महंगाई से राहत की उम्मीद का दामन। बेनियाज और बेफिक्र सरकार ने एक नया धारदार सुधार आप पर लाद दिया है। इसलिए .. जोर लगा के हईशा!

बेनियाजी हद से गुजरी, बंदा परवर कब तलक
हम कहेंगे हाले दिल और आप फरमायेंगे क्या
(गालिब )
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Monday, June 21, 2010

मांग के कंधे पर बैठी महंगाई

अर्थार्थ
कदम रुके थे, पैर में बंधा पत्थर तो जस का तस था। महंगाई गई कहां थी? अर्थव्यवस्था मंदी से निढाल होकर बैठ गई थी इसलिए महंगाई का बोझ बिसर गया था। कदम फिर बढ़े हैं तो महंगाई टांग खींचने लगी है। मुद्रास्फीति का प्रेत नई ताकत जुटा कर लौट आया है। मंदी के छोटे से ब्रेक के बीच महंगाई और जिद्दी, जटिल व व्यापक हो गई है। यह खेत व मंडियों से निकल कर फैक्ट्री व मॉल्स तक फैल गई है। मानसून का टोटका इस पर असर नहीं करता। gमौद्रिक जोड़ जुगत इसके सामने बेमानी है। महंगाई ने मांग में बढ़ोतरी से ताकत लेना सीख लिया है। तेज आर्थिक विकास अब इसे कंधे पर उठाए घूमता है। भारत में आर्थिक मंदी का अंधेरा छंट रहा है। उत्पादन के आंकड़े अच्छी खबरें ला रहे हैं लेकिन नामुराद महंगाई इस उजाले को दागदार बनाने के लिए फिर तैयार है।
लंबे हाथ और पैने दांत
महंगाई अब खेत खलिहान से निकलने वाले खाद्य उत्पादों की बपौती नहीं रही। बीते छह माह में यह उद्योगों तक फैल गई है यानी आर्थिक जबान में जनरलाइज्ड इन्फलेशन। महंगाई मौसमी मेहमान वाली भूमिका छोड़कर घर जमाई वाली भूमिका में आ गई है। उत्पादन का हर क्षेत्र इसके असर में है। कुछ ताजे आंकड़ों की रोशनी में महंगाई के इस नए चेहरे को पहचाना जा सकता है। पिछले साल दिसंबर तक भारत में महंगाई खाद्य उत्पादों की टोकरी तक सीमित थी। गैर खाद्य उत्पाद महज दो ढाई फीसदी की मुद्रास्फीति दिखा रहे थे लेकिन अब सूरत बदल गई है। गैर खाद्य और गैर ईधन (पेट्रोल डीजल) उत्पादों में भी मुद्रास्फीति 8 फीसदी से ऊपर निकल गई है। खाद्य उत्पादों में तो पहले से 11-12 फीसदी की मुद्रास्फीति है। खासतौर पर लोहा व स्टील, कपड़ा, रसायन व लकड़ी उत्पाद के वर्गो में कीमतों में अभूतपूर्व उछाल आया है। यह सभी क्षेत्र कई उद्योगों को कच्चा माल देते हैं इसलिए महंगाई का इन्फेक्शन फैलना तय है। यह महंगाई का नया व जिद्दी चरित्र है। बजट में कर रियायतें वापस हुई तो कीमतें बढ़ाने को तैयार बैठे उद्योगों को बहाना मिल गया। महंगाई का फैक्ट्रियों (मैन्यूफैक्चर्ड उत्पादों) में घर बनाना बेहद खतरनाक है। तभी तो रिजर्व बैंक भी मुद्रास्फीति के बढ़ने को लेकर मुतमइन है। बाजार मान रहा है कि थोक कीमतों वाली महंगाई दहाई के अंकों का चोला फिर पहन सकती है, फुटकर कीमतों की मुद्रास्फीति तो पहले से ही दहाई में हैं। मैन्यूफैक्चर्ड और खाद्य उत्पादों की कीमतें साथ-साथ बढ़ने का मतलब है कि महंगाई के हाथ लंबे और दांत पैने हो गए हैं।
इलाज नहीं खुराक
महंगाई अब मांग के पंखों पर सवारी कर रही है। याद करें कि दो साल पहले 2007-08 की तीसरी तिमाही में जब मुद्रास्फीति ने अपना आमद दर्ज की थी तब भी भारत में आर्थिक विकास दर तेज थी और महंगाई बढ़ने की वजह मांग का बढ़ना बताया गया था। बात घूम कर फिर वहीं आ पहुंची है। आर्थिक वृद्घि का तेज घूमता पहिया महंगाई को उछालने लगा है जबकि आपूर्ति के सहारे महंगाई घटाने की गणित फेल हो गई है। अंतरराष्ट्रीय कारकों के मत्थे तोहमत मढ़ना भी अब नाइंसाफी है। ताजी मंदी के बाद से पिछले कुछ माह में पूरे विश्व के बाजारों में जिंसों यानी कमोडिटीज की कीमतें गिरी हैं लेकिन भारत में कीमतें बढ़ रही हैं। माना कि पिछली खरीफ को सूखा निगल गया था लेकिन रबी तो अच्छी गई। रबी में गेहूं की पैदावार 2009 के रिकॉर्ड उत्पादन 80.68 मिलियन टन से ज्यादा करीब 81 मिलियन टन रही। सरकार ने कहा कि इससे खरीफ का घाटा पूरा हो गया है मगर महंगाई वैसे ही नोचती रही। अंतत: सरकार ने पैंतरा बदला और अब खरीफ पर उम्मीदें टिका दीं। मानसून का आसरा देखा जाने लगा है। दरअसल आर्थिक विकास के पलटी खाते ही मांग बढ़ी है जिसने पूरा गणित उलट दिया। आपूर्ति बढ़ने से महंगाई कुछ हिचकती इससे पहले उसे मांग ने नए सिरे से उकसा दिया है।
सारे तीर अंधेरे में

महंगाई को लेकर सरकार और रिजर्व बैंक के सारे तीर दरअसल अंधेरे में चलते रहे हैं इसलिए महंगाई का इलाज करने के जिम्मेदार भी अब अटकल और अंदाज के सहारे हैं। आंकड़ों में अगर कमी दिखी तो सरकार ने भी ताली बजाई और अगर आंकड़े ने कीमतें बढ़ती बताईं तो सरकार ने भी चिंता की मुद्रा बनाई। सरकार के ं महंगाई नियंत्रण कार्यक्रम में अगला टारगेट दिसंबर है और मानसून ताजा बहाना है। हालांकि अच्छी खरीफ महंगाई का इलाज शायद ही करे। दरअसल पिछले चार फसली मौसमों से जारी महंगाई ने कृषि उपज के बाजार में मूल्य वृद्घि की नींव खोद कर जमा दिया है। खरीफ का समर्थन मूल्य बढ़ाना सियासी मजबूरी थी इसलिए खरीफ में पैदावार के महंगे होने का माहौल पहले से तैयार है। इधर अर्थव्यवस्था में आमतौर पर मांग बढ़ने के साथ ही रबी की बेहतर फसल ने ग्रामीण क्षेत्र में भी उपभोग खर्च बढ़ा दिया है। तभी तो रबी की फसल आते ही उपभोक्ता उत्पादों व दोपहिया वाहनों का बाजार अचानक झूम उठा है। यानी कि अगर बादल कायदे से बरसे तो भी खरीफ की अच्छी फसल महंगाई को डरा नहीं सकेगी। इसके बाद बचती है रिजर्व बैंक की मौद्रिक कीमियागिरी। तो इस मोर्चे पर दिलचस्प उलझने हैं। मंदी से उबरती अर्थव्यवस्था को सस्ते कर्ज का प्रोत्साहन चाहिए और सरकारी उपक्रमों व निजी कंपनियों की ताजी इक्विटी खरीदने के लिए बाजार को भरपूर पैसा चाहिए। इधर यूरोप के बाजारों से जले निवेशक डॉलर यूरो लेकर भारत की तरफ दौड़ रहे हैं। उनके डॉलर आएंगे तो बदले में रुपया बाजार में जाएगा। इसलिए रिजर्व बैंक गवर्नर सुब्बाराव का इशारा समझिये। वह बाजार और उद्योग की नहीं सुनने वाले। उन्हें मालूम है कि बाजार में इस समय पैसा बढ़ाना महंगाई को लाल कपड़ा दिखाना है। अर्थात कर्ज महंगा होकर रहेगा और महंगा कर्ज उद्योगों की लागत बढ़ाकर महंगाई के नाखून और धारदार करेगा।
भारत की अर्थव्यवस्था ने मंदी की मारी दुनिया में सबसे पहले विकास की अंगड़ाई ली है। अर्थव्यवस्था में कई मोर्चो पर सुखद रोशनी फूट पड़ी है। आर्थिक उत्पादन के ताजे आंकड़े उत्साह भर रहे हैं तो सरकारी घाटे को कम करने के सभी दांव (थ्रीजी व ब्रॉडबैंड स्पेक्ट्रम की बिक्री और विनिवेश) भी बिल्कुल सही पड़े हैं। रबी के मौसम में खेतों से भी अच्छे समाचार आए हैं और मानसून आशा बंधा रहा है। लेकिन महंगाई इस पूरे उत्सव में विघ्न डालने को तैयार है। और जिस अर्थव्यवस्था में महंगाई मेहमान की जगह मेजबान यानी कि मौसमी की जगह स्थायी हो जाए वहां कोई भी उजाला टिकाऊ नहीं हो सकता। क्योंकि महंगाई का अंधेरा अंतत: हर रोशनी को निगल जाता है।

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Monday, June 14, 2010

दाग और दुर्गंध की दोस्ती

अर्थार्थ
भारत और अमेरिका में दोस्ती अब बहुत गाढ़ी हो चली है। दोनों शर्मिदगी को साझा कर रहे हैं। पेट्रोल कंपनी बीपी के कुएं से रिस कर मैक्सिको की खाड़ी में बहता तेल व्हाइट हाउस को दागदार करने लगा है, तो भारत सरकार 26 साल बाद 15 हजार मौतों वाले भोपाल गैस हादसे के गुनहगार तलाश रही है और शर्मिंदगी की दुर्गध से बचने के लिए सियासत के पीछे छिप रही है। रसूखदार कंपनियों के बेफिक्र कामकाज और बोदे कानूनों के कारण औद्योगिक हादसे बार-बार होते हैं और घोंघे से होड़ करती न्याय व्यवस्था के कारण पूरी बहस आपराधिक उपेक्षा बनाम भूल-चूक की कानूनी धुंध में गुम हो जाती है। अंतत: पहाड़ जैसी तबाही के बदले राई जैसी राहत पर बात समाप्त हो जाती है। अमेरिकी राज्य लुइसियाना अपने वर्तमान को, भोपाल के ढाई दशक पुराने अतीत के साथ बांट सकता है, क्योंकि भारत और अमेरिका दोनों के पास औद्योगिक हादसों को रोकने के मजबूत कानून नहीं हैं। दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों की यह नई और हैरतअंगेज साझीदारी है। ..क्या कहा आपने? यूनियन कार्बाइड का पूर्व प्रमुख एंडरसन तो अमेरिका में ही है? अब जाने दीजिए, दोस्ती इतनी भी गाढ़ी नहीं है?
हादसों का ‘टॉप किल’
टॉप किल, कॉफर डैम, टॉप हैट? ये अनसुने तकनीकी जुमले लुइसियाना तट से उठकर दुनिया के अखबारों में तैर रहे हैं। ये उन तकनीकी उपायों के नाम हैं, जो बीपी मैक्सिको की खाड़ी में बहते नर्क को रोकने के लिए कर रही है। इसी तरह भोपाल हादसे के बाद मिथाइल आइसोनाइट, गैस स्क्रबर व फ्लेयर टॉवर, आम लोगों की जुबान पर थे। अमेरिका के दक्षिणी तट पर गहरे समुद्र में बीपी का 5,000 फीट गहरा तेल कुआं मैकोंडो पिछले करीब पचास दिनों से रोजाना समुद्र में करीब 19,000 से एक लाख बैरल (30 लाख लीटर से डेढ़ करोड़ लीटर तक) तेल उगल रहा है और पूरी दुनिया बेबसी के साथ टॉप किल (समुद्री तेल कुएं में मिट्टी भरने) जैसी बेहद महंगी तकनीकों की पराजय देख रही है। 20 अप्रैल को बीपी के ऑयल प्लेटफॉर्म में धमाके के बाद से करीब 46 हजार वर्ग मील समुद्री क्षेत्र में मीथेन और कच्चे तेल की मोटी चादर तैर रही है, जो अलबामा और फ्लोरिडा के तटों तक पहुंच चुकी है। कैटरीना से बुरी तरह तबाह लुइसियाना के लिए यह दोहरी मार है। इलाके के मछली व पर्यटन उद्योग को 5.5 अरब डॉलर का नुकसान होना तय है। इस इलाके में दूसरे तेल कुएं भी बंद होंगे, जिससे 20 हजार नौकरियां अलग से जाएंगी। फ्लोरिडा तट की तेज समुद्री धाराएं इस तेल को पूरे अटलांटिक क्षेत्र में फैलाकर अब तक की सबसे बड़ी पर्यावरण त्रासदी बनाने को बेताब हैं। यदि ऐसा हुआ तो उबरने में वर्षो लग जाएंगे जैसे कि कार्बाइड फैक्ट्री में पड़ा 390 टन जहरीला कचरा आज भी भोपाल के भूजल को प्रदूषित कर रहा है।
अपराध या चूक?
बराक ओबामा पिछले दस दिन में तीन बार मैक्सिको खाड़ी तट पर जा चुके हैं। फिर भी यह तेल व्हाइट हाउस तक पहुंच ही गया है। नियमों को तोड़कर तेल कंपनियों को मंजूरी देने के आरोप बड़े हो रहे हैं। तेल खोज से संबंधित अमेरिकी कानून नार्वे से भी लचर पाए गए हैं। ओबामा के मुल्क में भी बड़ी कंपनियां कानून से ऊपर हैं। उनकी किलेबंदी के भीतर जाकर सुरक्षा जांच नहीं होती। चेतावनियां बाहर नहीं आतीं और नसीहतें खो जाती हैं। इसी मैक्सिको खाड़ी में 1979 में पेट्रोलॉस मेक्सिकॉना के आइक्सोटॉक्स वन और 1989 में अलास्का में एक्सॉन के कुएं से भयानक तेल रिसाव हुआ था, लेकिन अमेरिका में कोई सबक नहीं लिया गया। याद कीजिए कि कार्बाइड से भोपाल में 1981 से लेकर 1984 तक गैस रिसने के आधा दर्जन मामले सामने आए थे।कंपनी के अपने विशेषज्ञों ने बड़ा खतरा बताया था, लेकिन यह अमेरिकी दिग्गज तो हर पड़ताल से ऊपर थी और इसलिए बाद में भी कायदे से जांच नहीं हुई। अमेरिका के लोग डरते हैं कि बीपी का रसूख उन्हें इंसाफ नहीं मिलने देगा। औद्योगिक हादसे, आमतौर पर आपराधिक लापरवाही बनाम अनजाने में चूक की, खींचतान में उलझते हैं और फिर भोपाल जैसा एक बड़ा हादसा कानून की निगाह में छोटी सी तकनीकी चूक साबित हो जाता है। पिछले साल छत्तीसगढ़ में एक निजी कंपनी के संयंत्र में चिमनी गिरने से 45 लोगों के मारे जाने की घटना सबसे ताजी है। इसमें कुछ छोटे अधिकारियों की गर्दनें कलम हुई और बात खत्म हो गई। तभी तो यूनियन कार्बाइड की वेबसाइट पर भोपाल त्रासदी आज भी एक सैबोटाज यानी तोड़फोड़ की घटना के तौर पर दर्ज है और बीपी के लिए मैक्सिको का हादसा बस एक मशीन की असफलता है।
कैसे-कैसे नतीजे?
भोपाल को लेकर छब्बीस साल बाद राजनीति के अलावा और क्या हो सकता है? लेकिन मेक्सिको की खाड़ी में बाजार को एक नए तेल संकट के साए दिख रहे हैं। पूरे विश्व में गहरे समुद्र से तेल निकालने पर सख्ती शुरू हो गई है। अमेरिका ने छह माह के लिए मैक्सिको की खाड़ी में तेल की खोज रोक (80 हजार बैरल प्रतिदिन का उत्पादन नुकसान) दी है। नार्वे सहित अन्य तेल उत्पादक देश भी इसी राह पर हैं। जबकि अगले दस साल में आधा समुद्री तेल उत्पादन गहरे सागरों से ही आना है, जिसके लिए चार सालों में 167 बिलियन डॉलर लगाए जाने हैं। लेकिन बीपी की चूक पूरे उद्योग को पटरी से उतार कर तेल की कीमतों को आसमान पर चढ़ा सकती है। वैसे भी गहरे समुद्र में तेल का रिसाव रोकना बहुत मुश्किल है। रूस में, कथित तौर पर, दशकों पहले हुए प्रयोग के सहारे इस कुएं को बंद करने के लिए परमाणु विस्फोट की बात भी चल पड़ी है। विस्फोट हो या न हो, लेकिन बीपी की बैलेंस शीट में भारी नुकसान का धमाका तय है। कंपनी के लिए हादसे की ताजा लागत 1.25 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई है। 80 मिलियन डॉलर का हर्जाना भर चुकी बीपी के सामने मुकदमों की फौज तैयार है। कंपनी को 20 बिलियन डॉलर तक की चपत लग सकती है, जो इसके अस्तित्व पर भारी पड़ेगी। इसलिए अधिग्रहण की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। भोपाल हादसे के बाद यूनियन कार्बाइड भी बंटती बिखरती अंतत: 1999 में डाउ केमिकल्स में समा गई थी। सियासत अमेरिका में भी कम गरम नहीं है। बीपी अचानक विदेशी कंपनी कही जाने लगी है। इसे जानबूझकर ब्रिटिश पेट्रोलियम (एक दशक पुराना नाम) के नाम से बुलाया रहा है। लंदन की सियासत भी जवाब देने लगी है।
भोपाल की गैस अमेरिका तक नहीं पहुंची थी, मैकोंडो कुएं से निकल कर समुद्र में तैरता तेल भारत नहीं आएगा। इसलिए लुइसियाना व भोपाल के लिए बस संकट का ही साझा है। इसके बादतो पैमाने दोहरे तिहरे हो जाते हैं। भारत अब महसूस कर रहा है कि कार्बाइड सस्ते में छूट गई और एंडरसन का प्रत्यर्पण होना चाहिए। लेकिन अमेरिका बीपी से तगड़ी कीमत वसूलने की तैयारी में है। भोपाल हादसे पर ताजा अदालती फैसले के बाद अमेरिका के लिए दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी की फाइल अब बंद हो गई है, मगर मैक्सिको खाड़ी को देखकर गुस्से में भरे बराक ओबामा बीपी के प्रमुख टोनी हेवार्ड को किक (ताजा विवादित बयान) करना चाहते हैं। ....तीसरी और पहली दुनिया में इतना फर्क तो होता ही है न!
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Monday, June 7, 2010

सिद्धांतों का शीर्षासन

अर्थार्थ
नकल्याण के रास्ते अगर आपदा के गर्त में पहुंचा दें तो? एकजुट होने से सुविधा व सुरक्षा के बजाय समस्या व संकट बढ़ने लगे तो? दुनिया के अमीर पहलवान यदि अपनी खुराक के लिए पिद्दी पिछड़ों पर निर्भर हो जाएं तो? तो क्या करेंगे आप? यही न कि, सिद्धांतों को फिर से लिखने की सोचेंगे? जरा गौर से आसपास देखिए, इस समय कई सिद्धांत एक साथ शीर्षासन कर रहे हैं। यूरोप का प्रसिद्ध कल्याणकारी राज्य (वेलफेयर स्टेट) कर्ज के ढेर में सर के बल खड़ा है। विकासशील चीन की एक करवट वित्तीय बाजार में अब परमाणु ताकतों के घुटने कंपा देती है। दुनिया को जीतने के लिए यूरो करेंसी के जहाज पर सवार हुए यूरोप के मुल्कों का अब यह जजीरा खुद डूबता व उन्हें डुबोता नजर आ रहा है। यह शक्ति संतुलन, आर्थिक एकजुटता और राज्य व्यवस्था से जुड़े सिद्धांतों का बिल्कुल ही नया चेहरा है। स्थापित परिभाषाएं और मान्यताएं बड़ी निर्ममता के साथ बदल रही हैं।
कल्याण की कीमत
मोटे बेकारी भत्ते, तनख्वाह सहित साल भर लंबी छुट्टी, सुरक्षित नौकरी, तरह तरह की सरकारी रियायतें, पचास साल के बाद सेवानिवृत्ति, मोटी पेंशन, मुफ्त चिकित्सा और शानदार व सस्ता रहन सहन! यूरोप के पास दुनिया को जलाने व चिढ़ाने के लिए बहुत कुछ है। यूरोप यूं ही, रोटी व दवा को तरसते अफ्रीका के लिए जन्नत और बेहतर जीवन स्तर के लिए बेकरार एशिया के लिए आदर्श नहीं बन गया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद यहां की सरकारों ने अपनी आबादी को मुफ्त शिक्षा, चिकित्सा, मोटी पेंशन जैसी रियायतों व सामाजिक सुरक्षा की छांव में रखा। वेलफेयर स्टेट या कल्याणकारी राज्य के पालने में बैठी यूरोप की जनता अपने वर्तमान व भविष्य से इतनी बेफिक्र और बेलौस थी कि अभी हाल तक यूरोप में कल्याणकारी राज्य के नॉर्डिक (डेनमार्क, स्वीडन) कॉन्टीनेंटल (जर्मनी, फ्रांस, ऑस्टि्रया), एंग्लोसैक्सन (ब्रिटेन व आयरलैंड) और मेडीटरेनियन (ग्रीस, इटली, पुर्तगाल) मॉडलों के तहत दी जा रही सुविधाओं के बीच होड़ चलती थी। मसलन जर्मनी में अगर नौकरी जाने के बदले सरकार की तरफ से बेकारी भत्ते के तौर पर 60 फीसदी तनख्वाह मुकर्रर है तो ग्रीस में नौकरी हर हाल में सुरक्षित थी। यूरोप की जनता को अब पता चला कि सरकारों की उदारता का (सरकारों के कुल खर्च का 25 से 40 फीसदी तक जल कल्याण स्कीमों पर) यह करिश्मा कर्ज पर आधारित है। बस एक छोटी सी मंदी और वित्तीय संकट ने इस कल्याणकारी राज्य को कर्ज के गटर में घसीट लिया। यूरोप में पेंशन वेतन घट रहे हैं, नौकरियां जा रही हैं, सरकार कंजूस हो रही है और वेलफेयर स्टेट बिखर रहा है। आशावादी कहते हैं कि 70-80 के दशक की राजकोषीय सख्ती की तरह कुछ नुकसान के साथ यह तूफान भी गुजर जाएगा लेकिन आंकड़े बताते हैं कि बेशुमार कर्ज, कमजोर विकास दर और यूरो की कमजोरी से घिरे वेलफेयर स्टेट का अब फेयरवेल हो सकता है। नतीजा तो वक्त बताएगा, अलबत्ता नसीहतें लेनी हों तो कल्याणकारी राज्य से इस समय यूरोप की सड़कों पर मिला जा सकता है जहां वह जनता का गुस्सा झेल रहा है
संकट बढ़ाने वाली एकता
दक्षेस व आसियान में एकल मुद्रा के पैरोकार आजकल चुप हैं। अगले साल यूरोजोन में शामिल होने की बारात सजाए बैठे आइसलैंड व एस्टोनिया भी सन्नाटा खींच गए हैं। विश्व के देश जिस अनोखी यूरोपीय मौद्रिक एकता को भविष्य का सफल मॉडल माने बैठे थे , वही देश अब इसके पतन की तारीख गिन रहे हैं। यूरो जोन के संकट ने इस सिद्धांत को औंधे मंुह पटक दिया है कि आर्थिक या मौद्रिक एकजुटता संकट से बचाव है। यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं को लगता था कि उनकी साझी मुद्रा उनका कवच बन जाएगी और एक के संकट के समय दूसरे की साख काम आएगी लेकिन यहां तो सबने मिल कर यूरो की साख को ही संकट में डाल दिया। ग्रीस, इटली, पुर्तगाल, स्पेन ने एक दूसरे के बीच कर्ज-कर्ज का खेल खेला था। जर्मनी फ्रांस सहित दूसरे भी इस खेल में शामिल थे। तभी तो ग्रीस कर्ज में यूरोजोन के बैंकों का हिस्सा 150 हिस्सा तक है। इसलिए एक के डूबते ही यूरो के डूबने की नौबत आ जाएगी। बचाव के लिए कोई आजादी नहीं है क्योंकि सबकी मुद्रा एक है। अर्थात कोई नोट छाप कर घाटा नहीं भर सकता। अब यूरोजोन में शामिल होने की नहीं बल्कि इसे छोड़ने की मुहिम शुरू होने वाली है। अफ्रीकी व कैरेबियाई दुनिया से बाहर यह पहली बड़ी व अहम मौद्रिक एकता थी। यूरोजोन के बिखरते ही आर्थिक एकजुटता का सिद्धांत नई व्याख्या मांगने लगेगा।
ताकत की नई परिभाषा
बीते सप्ताह बाजारों में अफवाह दौड़ी कि चीन यूरोजोन के बांडों में 630 बिलियन डॉलर के निवेश पर अपना रुख बदल रहा है और यूरो चार साल के सबसे निचले स्तर पर आ गया। बाजार भरभरा गए। चीन ने अगले दिन इस बात को नकारा तो बाजारों की सांस लौटी लेकिन दो दिन बाद बाजार इस खबर पर फिर कांप गया कि चीन में उत्पादन घट रहा है। 2447 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार (विश्व के गैर स्वर्ण विदेशी मुद्रा भंडार का 31 फीसदी) पर बैठे चीन ने दुनिया में आर्थिक ताकत का संतुलन बदल दिया है। चीन की डॉलर तिजोरी दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में पांच सबसे बड़े देशों के कुल भंडार से भी बड़ी है। इस ताकत के जरिए चीन दुनिया के दोनों बड़े वित्तीय बाजारों, अमेरिका और यूरोप के बीच दिलचस्प ढंग से कूटनीतिक व आर्थिक संतुलन बना रहा है। चीन का जरा सा गर्दन हिलाना इन दोनों बाजारों की धड़कनें बढ़ा देता है। यूरोप को उसने पहले डराया और फिर अभयदान दे दिया। इधर अमेरिकी सरकार के ट्रेजरी बांडों में भी चीन का निवेश 780 बिलियन डॉलर के करीब है। ताकत की इसी नाप तौल के बाद अमेरिका ने चीन की मुद्रा युआन की कमजोरी के खिलाफ अपनी मुहिम फाइलों में बंद कर दी है। यह दुनिया में शक्ति का अनदेखा और अनोखा संतुलन है। बताते चलें कि चीन दुनिया की परिभाषाओं में अभी विकासशील देश है!
यह स्तंभ लिखते-लिखते हंगरी में कर्ज संकट और डिफॉल्ट के खतरे की खबर भी आ गई। ग्रीक त्रासदी पूर्वी यूरोप तक पहुंच गई है। पूर्वी यूरोप को मदद देने वाले वैसे भी कम हैं। यूरोप का वर्तमान देख कर तीसरी दुनिया को सबसे ज्यादा डरना चाहिए। जहां अभी कल्याणकारी राज्य की कायदे से शुरुआत भी नहीं हुई है, और बाजार इसकी ऊंची लागत को अस्वीकृत करने लगा है। इन मुल्कों की गरीब आबादी को इज्जत की जिंदगी देने की ऊंची लागत बड़ी उलझन बनने वाली है। अगर यूरोजोन ढहा तो छोटे मुल्कों के आर्थिक भविष्य और दुनिया की व्यापारिक एकजुटता के सवाल और बडे़ हो जाएंगे। रही बात चीन को तो इसे अब बहुत गौर से देखने की जरूरत है। हमारा यह पड़ोसी आने वाले एक दशक में दुनिया में बहुत कुछ बदलने की कुव्वत रखता है।
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Monday, May 31, 2010

पछतावे की परियोजनायें

अर्थार्थ......
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रबूजा हमेशा से बदकिस्मत है। कभी तो वह खुद चाकू पर टपक जाता है, तो कभी चाकू को उस पर प्यार आ जाता है। लेकिन इससे नतीजे में कोई फर्क नहीं पड़ता। कटता खरबूजा ही है, ठीक उस तरह जैसे कि आर्थिक संकट में फंसे देशों के आम लोग कटते हैं। पहले वित्तीय आपदाएं जनता को झुलसाती हैं और फिर इन संकटों के इलाज या प्रायश्चित खाल उतार लेते हैं। यूरोजोन में वित्तीय कंजूसी और टैक्स बढ़ाने की अभूतपूर्व मुहिम शुरू हो चुकी है। अमेरिका व शेष दुनिया भी इस पाठ को दोहराने वाली है। सरकारें ताजा संकट पर प्रायश्चित कर रही हैं, मगर पछतावे की ये परियोजनाएं जनता की पीठ पर लाद दी गई हैं। मंदी की मारी जनता के जख्मों पर करों में बढ़ोतरी और वेतन-पेंशन में कटौती की तीखी मिर्च मली जा रही है। बुढ़ाते यूरोप के लिए तो यह एक ऐसा दर्दनाक इलाज है, जिसके सफल होने की कोई शर्तिया गारंटी भी नहीं है। इधर मंदी से घुटने तुड़वा चुकी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए भी यह सबसे चिकने रास्ते के जरिए पहाड़ चढ़ने जैसा है। इस सफर में प्रोत्साहनों, सस्ते कर्ज, अच्छी खपत जैसी सुविधाओं पर सख्त पाबंदी है।
चादर तो बढ़ने से रही
कर्ज संकट में फंसे देशों का इलाज सिर्फ शायलाकों के साथ सौदेबाजी यानी कर्ज पुनर्गठन से ही नहीं हो जाता। इस सौदेबाजी की साख के लिए उन्हें जनता पर नए टैक्स लादने होते हैं और वेतन-पेंशन जैसे खर्चो को क्रूरता के साथ घटाना होता है। दरअसल कर्ज संकट चादरें छोटी होने और पैर बाहर होने का ही नतीजा है। बस एक बार यह पता भर चल जाए कि अमुक देश में खर्च और कमाई का हिसाब-किताब ध्वस्त हो गया और कर्ज चुकाने के लाले हैं तो सरकारों के लिए संसाधनों के स्रोत सबसे पहले सूखते हैं। साख गिरते ही वित्तीय बाजार को उस देश से घिन आने लगती है। अपने ही बैंक सरकार को नखरे दिखाते हैं यानी कि कर्ज मिलना मुश्किल हो जाता है। ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल इसके वर्तमान और अर्जेटीना, रूस, पाकिस्तान, उरुग्वे हाल के ताजे उदाहरण हैं। जाहिर है कि संसाधन न मिलें तो सरकारी मशीनरी बंद हो जाएगी। इसलिए कर्ज संकट आते ही एक पीड़ादायक प्रायश्चित शुरू हो जाता है। नए और मोटे टैक्स लगाकर राजस्व जुटाया जाता है, वेतन, पेंशन काटे जाते हैं, सामाजिक सेवाओं पर खर्च घटता है। घाटा कम करने के आक्रामक लक्ष्य रखे जाते हैं। यह सब इसलिए होता है कि अब कम से कम चादर और तो न सिकुड़े और बाजार को यह भरोसा रहे कि पछतावा शुरू हो गया है।
..तो पैर छोटे करो
ब्रिटेन के मंत्री अब पैदल या बस से दफ्तर जाएंगे! देश की सरकार बच्चों को तोहफे नहीं देगी! सरकारी यात्राओं में कटौती होगी! आदि आदि। करीब 6.2 बिलियन पाउंड बचाने के लिए ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के इस नुस्खे पर आप बेशक मुस्करा सकते हैं, लेकिन इस तथ्य पर हंसना शायद मुश्किल है कि ग्रीस ने अपने यहां अगले तीन साल के लिए पेंशन-तनख्वाहें और त्यौहारी बोनस व अन्य भत्त्‍‌ो रोक या घटा दिए हैं। यूरोजोन में सरकारी भर्तियों पर पाबंदी लग गई है। पुर्तगाल, स्पेन व आयरलैंड सरकारी कर्मचारियों के वेतन घटा रहे हैं। फ्रांस दस फीसदी खर्च कम करने की तैयारी में है तो पुर्तगाल सरकारी उपक्रम बेचकर पैसा कमाने की जुगाड़ में है। पर जरा ठहरिए! इस तलवार की दूसरी धार और भी तीखी है। कर्ज चुकाने के लिए संसाधन तलाश रहे यूरो जोन में नए टैक्सों की बाढ़ सी आ गई है। पुर्तगाल, ग्रीस, स्पेन आदि ने सभी तरह के कर बढ़ा दिए हैं। ग्रीस कंपनियों पर नया कर थोप रहा है, तो स्पेन ऊंची आय वालों पर टैक्स बढ़ा रहा है। पूरे यूरोजोन में सभी मौजूदा करों की दरें बढ़ गई हैं। वित्तीय कंजूसी और घाटे कम करने के नए लक्ष्य तय किए गए हैं। ब्रिटेन, फ्रांस सहित सभी प्रमुख देशों को अगले दो साल में अपने घाटे तीन से पांच फीसदी तक घटाकर इस इलाज की सफलता साबित करनी है। यह बात दीगर है कि यूरोप के लोग सरकारों की गलतियों का बिल भरने को तैयार नहीं है। पेंशन, वेतन कटने और टैक्स बढ़ने से खफा लोग ग्रीस में लाखों की संख्या में सड़कों पर हैं। इटली व पुर्तगाल के सबसे बडे़ श्रमिक संगठनों ने हड़ताल की धमकी दे दी है। पूरे यूरोप में श्रम आंदोलनों का एक नया दौर शुरू हो रहा है।
गारंटी फिर भी नहीं
यूरोप के इन नाराज लोगों को लाटविया और आयरलैंड के ताजे उदाहरण दिख रहे हैं। जिनका मर्ज करों में बढ़ोत्तरी और खर्च में कटौती की तगड़ी सर्जरी के बाद भी ठीक नहीं हुआ। आयरलैंड ने 2008 में वित्तीय कंजूसी शुरू की, लेकिन इसके बावजूद घाटा दो गुना हो गया। यानी कि मुर्गी जान से गई और बात फिर भी नहीं बनी। यूरोप की चिंताएं शेष दुनिया से कुछ फर्क हैं। यूरोप बुजुर्ग हो रहा है। जहां 39 फीसदी आबादी 50 साल से ऊपर की उम्र वाली हो, उसके लिए पेंशन में कटौती और करों का बोझ बुढ़ापे में बड़ी बीमारी से कम नहीं है। विशाल बुजुर्ग आबादी वाले इटली जैसे मुल्कों के लिए तो यह संकट बहुत बड़ा है। इस पर तुर्रा यह कि आम जनता की यह कुर्बानी तेज विकास की गारंटी नहीं है। यूरोप के परेशान हाल मुल्कों में अगले दो साल के दौरान विकास दर शून्य से नीचे ही रहनी है। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे बड़े मुल्कों सहित पूरे यूरोप में अगले दो साल के लिए आर्थिक विकास दर के आकलन 1.2 फीसदी से ऊपर नहीं जा रहे। यूरोप के देश जिन बांड निवेशकों को मनाने के लिए यह कठिन योग साध रहे हैं, उन देवताओं को भी भरोसा नहीं कि इलाज कारगर होगा। बल्कि उनकी राय में यूरोजोन की साख और कमजोर हो सकती है। अर्जेटीना, यूक्रेन, रूस आदि के ताजे अतीत गवाह हैं कि कर्ज, मुद्रा और बैंकिंग संकटों का यह मिला-जुला महामर्ज तीन से पांच साल तक सताता है। कुछ मामलों में यह आठ साल तक गया है। ..यूरोप की आबादी मोटी पेंशन, सस्ती चिकित्सा और ढेर सारी दूसरी रियायतों के साथ कल्याणकारी राज्य का भरपूर आनंद ले रही थी कि अचानक मेला उखड़ गया है।
मंदी और वित्तीय संकट जितनी तेजी से फैलते हैं, उनके इलाज भी उतनी ही तेजी से अपनाए जाते हैं। दुनिया भर की सरकारें अपनी लाड़ली जनता के लिए नए करों की कटारें तैयार कर रही हैं। अमेरिका का केंद्रीय बैंक फेड रिजर्व लोगों को करों के बोझ व खर्चो में कमी को सहने के लिए सतर्क कर रहा है। वहां के डिफाल्टर राज्यों में टैक्स बढ़ने लगे हैं। भारत का ताजा कठोर बजट भी इसी तर्ज पर बना था। मंदी से कमजोर हुई अपनी अर्थव्यवस्थाओं को प्रोत्साहन का टानिक देते-देते सरकारें अचानक जनता से रक्तदान मांगने लगी हैं। एक साल पहले तक लोग मंदी के कारण नौकरियां गंवा रहे थे, अब वे वित्तीय बाजारों में अपनी सरकारों की साख को बचाने के लिए वेतन और पेंशन गंवाएंगे। ..सजा हर हाल में आम लोगों के लिए ही मुकर्रर है।
हमको सितम अजीज, सितमगर को हम अजीज
ना मेहरबां नहीं हैं, अगर मेहरबां नहीं
---गालिब
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Friday, May 28, 2010

चाईनीज चेकर ....Chinese Checker

An Artharth e-xlusive
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( ????? ….. ठीक समझे आप यह साप्‍ताहिक स्‍तंभ अर्थार्थ नहीं है। लेकिन यह खास आपके लिए है अर्थात इस ब्‍लॉग पर अर्थार्थ पढ़ने वालों के लिए विशेष। ताजा और एक्‍सलूसिव। इसे न्‍यूज, तथ्‍य, संदर्भ, प्रसंग, परिFont sizeप्रेक्ष्‍य और विश्‍लेषण का अनोखा हाइब्रिड समझिये। यह कोशिश है खबरों की भीड़-भाड़ के बीच खो जाने वाली बड़ी असर की छोटी सी खबर को तलाशने, उसका खोल तोड़ने, गांठें खोलने और आने वाले वक्‍त की आहटों को भांपने की। अर्थार्थ तो प्रति सोमवार इसके साथ मिलेगा ही।
मगर चीन ही क्‍यों या
चाइनीज चेकर ही क्‍यों.???... क्‍यों कि आने वाले दौर में चीन के कदम बहुत गौर से देखने चाहिए। चीन हर तरह से तैयार है। चीन नपे तुले दांव चलता है। चीन दिलचस्‍प है । चीन आर्थिक खबरों में कम दिखता है। मगर चीन चुपचाप छा जाता है। चीन अमीर, आक्रामक और अबूझ है। हर आर्थिक घटनाक्रम की ,पीछे दुनिया, अमेरिका और यूरोप को तलाशती है मगर इस गुल गपाड़े में चतुर चीन चुपचाप सम्‍मोहन फैला कर अपना काम कर जाता है। चाइनीज चेकर में आप समय समय पर पढ़ेंगे दुनिया की आर्थिक बिसात पर चीन की चालों का विश्‍लेषण। चीन के बारे में ताजा मालूम-नामालूम खबरों की रोशनी में।)
तो ड्रैगन की रहस्‍यमय दुनिया में आपका स्‍वागत है। बताइयेगा जरुर कि यह नया Artharth e-xlusive आपको कैसा लगा।

यह रहा पहला चाइनीज चेकर।....

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चीनी नुस्‍खे, खास यूरोप के लिए

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र्ज की बीमारी से बुरी तरह कमजोर और टूटे यूरोप को अब क्‍या चीन की दवा चाहिए ? ... उसी चीन ,की जिसे 18-19 वीं सदी में ओपियम युद्ध हार कर यूरोप (ब्रिटेन) के सामने घुटने टेकने पड़े थे। मालूम है, डिफाल्‍ट होने के करीब पहुंच चुके ग्रीस को इस समय कौन मदद करने पहुंचा है ?....अपना पड़ोसी चीन। ग्रीस के प्रधानमंत्री जॉर्ज पापेंद्रो अपने देश को उबारने के लिए चीन की शरण में हैं। .... चीन खुशी खुशी तैयार है। चीन की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनी कॉस्‍को ग्रीस के शिपिंग उद्योग को संकट के तूफान से निकाल कर किनारे तक लाएगी। लबालब भरी तिजोरियों के सहारे चीन की यह कंपनी ग्रीस के लिए 200 मिलियन यूरो की दवा लेकर पहुंच गई है। कॉस्‍को एथेंस के करीब चीन एक लॉजिस्टिक्‍स सेंटर बनाने वाली है। डूबते ग्रीस को यह निवेश बड़ा सहारा देगा।
ग्रीस के लिए शिपिंग नमक है और पर्यटन रोटी। ग्रीस के अमीरों की नई पीढ़ी अपनी शिपिंग कंपनी खोलने के सपने देखकर कर बड़ी होती है। लाजिमी भी है आखिर शिपिंग पर्यटन के बाद ग्रीस का दूसरा बड़ा उद्योग जो है। ग्रीस के जीडीपी में करीब पांच फीसदी का हिस्‍सेदार, करीब दो लाख लोगों को रोजगार देने वाला। एक देश के पास 3079 मालवाहक जहाज !!! हैरत की तो बात है ही। यह किसी एक देश के पास मालवाहक जहाजों का सबसे बड़ा बेड़ा है। ग्रीस दुनिया में टैंकर व बल्‍क कैरियर परिवहन में पहले नंबर पर है। प्राचीन यूनान से लेकर आज के ग्रीस तक दुनिया के जबर्दस्‍त जहाजी इसी मुल्‍क से आते हैं। दुनिया के सबसे एतिहासिक समुद्री मार्गों के चौराहे पर स्थित ग्रीस के लिए शिपिंग स्‍वाभाविक है इसलिए तभी तो ग्रीस के नए पुराने (गैलिक्सिडी, कोर्फू और मैसोलांग आदि) शहर समुद्री परिवहन में दुनिया की ताकत रहे हैं। इसके बाद बताने की जरुरत नहीं ग्रीस में शिपिंग टायकून्‍स की क्‍या हैसियत है और ग्रीस के लिए शिपिंग उद्योग कितना जरुरी है।
मगर बात तो हम ड्रैगन की कर रहे थे। दुनिया को पता भी नहीं चला और ड़ैगन ने बीते साल अकटूबर में चुपचाप एथेंस के बंदरगाह पाइरियस पर एक कंटेनर टर्मिनल खरीद लिया। यह मानो ग्रीस के सबसे अहम उद्योग पर दांत गड़ाने की तैयारी थी। अपनी जहाजी दुनिया में चीन के प्रवेश के एक साल के भीतर ही मंदी का मारा और कर्ज संकट से घिरा ग्रीस, शिपिंग उद्योग को लेकर ड़ैगन के सामने खड़ा है। दरअसल एक तरह से ग्रीस का शिपिंग उद्योग चीन का अहसानमंद है। बीते कुछ वर्षों में ग्रीस के इस सबसे अहम कारोबार को चीन ने ही पाला पोसा है। चीन ने ग्रीस की शिपिंग कंपनियों को लोहा अयस्‍क ढोने के बड़े बड़े ठेके दिये हैं, जिनके सहारे ग्रीस में शिपिंग रईसों की बाढ़ आ गई। यानी कि चीन ग्रीस से दूर जरुर है मगर सिर्फ नक्‍शे पर । ग्रीस की आर्थिक रीढ़, शिपिंग अब ड्रैगन की नई पसंद है। ....
800 आधुनिक जलयान, 400 मिलियन टन का परिवहन, 1500 बंदरगाहों से संपर्क और 160 देशों से कारोबार करने वाली चीन की महाकाय शिपिंग कंपनी कॉस्‍को इस समय ग्रीस के लिए रेस्‍क्‍यू बोट यानी जीवन रक्षक जहाज लेकर पहुंची है। यह दांव बड़ा गहरा है। चीन अच्‍छी तरह जानता है कि जो मौके पर मारे वही मीर.........


ड्रैगन बीमार यूरोप पर अपना मंत्र फेंक रहा है। .....


यूरोप में चीन की चालें बड़ी सधी और दिलचस्‍प होने वाली हैं.... गौर से देखियेगा !!


यही तो है चाइनीज चेकर !!

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Monday, May 24, 2010

शायलाकों से सौदेबाजी

शुतुरमुर्ग एक समस्या का नाम भी है। इसके शिकार लोग अक्सर लैला और कैटरीना जैसे चक्रवातों से बचने के लिए छतरी लगा लेते हैं। संप्रभु कर्ज संकट में फंसे देशों में यह रोग बहुत आम है। इन्हें कभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की ऑक्सीजन में जिंदगी नजर आती है तो कभी वह टैक्स से जनता को निचोड़ कर ताकत जुटाने की कोशिश करते हैं। मगर इससे न तो संकट टलता है और न खत्म होता है। कर्ज में चूकना और देनदारी को नए सिरे से तय करने का दर्द भरा इलाज ही वस्तुत: इनकी नियति होती है। कर्जदार देशों को अंतत: उस निर्मम दुनिया से निबटना होता है जिस पर दर्जनों शायलॉक (मर्चेट आफ वेनिस- शेक्सपियर) राज करते हैं। कर्ज देने वाले बैंकों व देशों के साथ देनदारी के पुनर्गठन का मतलब ऐसी लंबी सुरंग से गुजरना है, जिससे क्षत विक्षत हुए बिना बाहर आना मुश्किल है। हाल का सबसे बड़ा (2002 में 141 बिलियन डॉलर) डिफॉल्टर अर्जेटीना पिछले आठ साल से इस सुरंग में भटक रहा है। इस खतरनाक रास्ते पर किसी अंतरराष्ट्रीय संधि या व्यवस्था की रोशनी भी नहीं है।
....और सूद में चिडि़यों की बीट
र्ज व्यक्ति पर हो या देश पर, वसूली गलादाब ही होती है। 1890 के करीब दक्षिण अमेरिकी मुल्क पेरु जब कर्ज चुकाने में चूका तो कर्जदारों से सौदा दो मिलियन टन गुआनो (चिडि़यों की उर्वर बीट), 66 साल के लिए रेलवे पर नियंत्रण और टिटिकाका झील में बोट चलाने के अधिकारों के बदले छूटा। दुनिया के ताकतवर महाजन अभी पिछली सदी के मध्य तक कर्जो के बदले दक्षिण अमेरिकी व अफ्रीकी देशों के रेलवे, नौवहन, टैक्स तंत्र जैसे आय के मुख्य स्रोत कुर्क करते रहे हैं। मैक्सिको कर्ज न चुकाने के कारण 1861 में फ्रांस के हमले (स्पेन व ब्रिटेन की मदद से) का शिकार होकर गुलाम बना था। वेनेजुएला के समुद्री परिवहन पर जर्मनी, ब्रिटेन व इटली का प्रतिबंध हो या निकारागुआ और डोमनिकन रिपब्लिक के सीमा शुल्क प्रशासन पर अमेरिका का कब्जा, पिछली सदी की इन चर्चित घटनाओं के मूल में संप्रभु कर्जो से चूकने की ही कहानी है। वैसे यह बातें कुछ पुरानी सी लगती हैं क्योंकि आधुनिक दुनिया अब कर्ज के बदले चिडि़यों की बीट और रेलवे पर कब्जे जैसे सौदे नहीं करती। मगर यकीन मानिए कि कर्ज में चूकने वालों के प्रति वह उतनी ही निर्मम है। यही वजह है कि देशों को दिए जाने वाले कर्ज के बाजार में आज भी महाजनों का ही राज है।
महाजनों के क्लब
यूरोप के पिग्स (पुर्तगाल, इटली, ग्रीस, स्पेन आदि) अगर कर्ज देने में चूके तो हो सकता है कि दुनिया को एक बार फिर संप्रभु कर्ज की समस्या के अंतरराष्ट्रीय तंत्र (सॉवरिन डेट रिस्ट्रक्चरिंग मेकेनिज्म-एसआरडीएम) की याद आए लेकिन हकीकत यह है कि पिछली दो सदियों से संप्रभु कर्ज के बाजार पर महाजनों का ही राज है। दुनिया चाहे जितनी काबिल हो गई हो लेकिन वह कर्ज के फेर में बर्बाद होने वाले देशों को पारदर्शी ढंग से कर्ज चुकाने का तंत्र नहीं दे सकी है। इसके बदले दुनिया को मिले हैं पेरिस क्लब और लंदन क्लब। यकीनन, यही नाम हैं कर्ज देने वाले पक्षों के दो समूहों के। लंदन क्लब सातवें दशक में बना, जबकि पेरिस क्लब उसे बीस साल पहले बन चुका था। यह समूह तदर्थ हैं। इनका कोई कानूनी आधार नहीं है लेकिन कर्ज देने वाले इनके जरिए ही सौदेबाजी करते रहे हैं। लंदन क्लब वाणिज्यिक कर्जो के लिए सौदेबाजी करता है। जबकि पेरिस क्लब सरकारों के स्तर से दिए गए संप्रभु कर्जो की। संप्रभु कर्ज के खेल में विश्व बैंक व आईएमएफ की भूमिका केवल परेशान देश को ऑक्सीजन देने तक है। कर्ज देने वाले अपनी शर्तो पर कर्ज का पुनर्गठन करते हैं। 2002 में अर्जेटीना के कर्ज संकट के बाद दुनिया संप्रभु कर्जो को लेकर कुछ सतर्क हुई है। संप्रभु बांड जारी करने वाले देशों के अधिकारों की फिक्र होने लगी है और निर्मम हेज फंड (वल्चर फंड) की मनमानी को रोकने के कुछ नए नियम बनाए गए हैं लेकिन यह सब कोई अंतरराष्ट्रीय संधि या कानून नहीं है। अर्जेटीना का इतिहास बताता है कि वह अपना 75 फीसदी कर्ज ही पुनर्गठित कर सका। 20 बिलियन डॉलर के मूलधन, 10 बिलियन डॉलर काब्याज और कुछ अन्य विवादित कर्ज दक्षिण अमेरिका के इस मुल्क के हलक में अभी भी फंसा है।
कर्ज का 'हेयरकट' साख का मुंडन
डिफॉल्टर देश जब कर्ज देने वालों के सामने लेन देन पूरा करने के लिए कर्ज घटाने का प्रस्ताव करता है तो उसे वित्तीय बाजार हेयरकट कहता है। मगर कर्ज पुनर्गठन की यह प्रक्रिया उस देश की साख का मुंडन कर देती है। अर्जेटीना के 141 बिलियन डॉलर के डिफॉल्ट में करीब 82 बिलियन डॉलर मूलधन था और हेयरकट कर्ज समायोजन प्रस्ताव का हिस्सा था। संप्रभु कर्ज के पुनर्गठन की लंबी व पेचीदा सौदेबाजी के बाद कर्जो की देनदारी आगे खिसकाई जाती है और कर्जदारों को नए बांड दिए जाते हैं, जिसमें कर्ज देने वाले पक्षों को नुकसान भी होता है। कई देश वाणिज्यिक कर्जदारों को अपनी कंपनियों में इक्विटी देकर स्वैप करते हैं। चिली इसका ताजा और सफल उदाहरण है। मगर पूरी प्रक्रिया डिफॉल्टर देश को वित्तीय बाजार में दागी कर देती है। अर्जेटीना ने इसी अप्रैल में अपने कर्जदारों को हेयरकट का नया प्रस्ताव दिया है। अर्जेटीना की पेशकश है कि कर्जदार पिछले कर्ज के बदले नए बांडों को डिस्काउंट पर खरीदकर बात नक्की करें। अर्जेटीना अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार में अभी भी कालेपानी की सजा झेल रहा है। वह निर्वासन दूर करने व सामान्य देश बनने के लिए गिड़गिड़ा रहा है।
शायलॉक याद है आपको? शेक्सपियर के मशहूर नाटक मर्चेट ऑफ वेनिस का खलनायक, सूदखोर (लोन शार्क) महाजन, जो एंटोनियो से कर्ज के बदले उसके शरीर का एक हिस्सा मांगता है। कर्ज की दुनिया शेक्सपियर के जमाने से आज तक लगभग वैसी ही बेढंगी है। यहां रंग और ढंग बदला है लेकिन तासीर नहीं। अब तो यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने खुद बाजार से यूरोपीय देशों के कचरा रेटिंग वाले बांड (16 बिलियन डॉलर के सौदे) खरीद रहा है। यह यूरो जोन के केंद्रीय बैंक का (बाजार की भाषा में न्यूक्लियर ऑप्शन) ब्रह्मास्त्र है। इसके बावजूद वित्तीय बाजार मान रहा है कि यूरोपीय बैंक का मंत्र, आईएमएफ की मदद और जर्मनी की दया ग्रीस को उबार नहीं सकती। महाजनों की दुनिया, 130 बिलियन डॉलर के कर्जदार ग्रीस को कर्ज पुनर्गठन की कीलों भरी कुर्सी पर बैठाने के लिए बेताब है। स्पेन, पुर्तगाल भी शायद इसी कतार में हैं।
इतनी बारिश हो चुकी है रात इस दीवार पर
कल सुबह जो धूप निकली तो भी यह गिर
जाएगी
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Monday, May 17, 2010

ऐसा भी हो सकता है?

ग्री का अपशकुन अब किसका घर घेरेगा? ऋण संकट का वेताल अब किस के आंगन में उतरेगा?.. यही तो सोच रहे हैं न आप? जवाब इस पहेली में छिपा है। आगे लिखी पंक्तियां पढि़ए और सवाल का जवाब दीजिए.. आईएमएफ की निगाह में ये देश ऋण संकट के वायरस का स्वागत करने को तैयार बैठे हैं। इनकी राज्य सरकारें डिफाल्ट होने लगी हैं। इनका कुल सार्वजनिक कर्ज इनके जीडीपी के मुकाबले 100 से 250 फीसदी तक हैं। इनके बजट अब कर्ज का बोझ नहीं संभाल सकते।
जरा बताइए तो यह इशारा किन देशों की तरफ है???
स्पेन, पुर्तगाल, आयरलैंड !!!!
नहीं.. इनके बारे में तो सबको पता है
यह बात अमेरिका, यूके (ब्रिटेन), जापान और कुछ हद तक जर्मनी की है !!!
चौंक गए न? ग्रीस के तूफान ने मजबूत दिखने वाले बड़ों के नकाब खींच दिए हैं। वित्तीय बाजार अब रेत से सर निकालकर यह निर्मम सच बोलने की हिम्मत जुटा रहा है कि बड़े भीतर से बड़े खोखले हैं। अमीर देशों के क्लब जी 20 के आधा दर्जन महारथी ऋण संकट के टाइम बम पर बैठे हैं। इनके सरकारी कर्ज खतरे के हर निशान से ऊपर हैं। वित्तीय बाजार इन्हें नया कर्ज देने में हिचक रहा है। वित्तीय संस्थाएं जल्द ही ट्रिपल ए रेटिंग के अवसान का ऐलान कर सकती हैं। मतलब उस सुनहरी साख का खात्मा होने वाला है जो दिग्गज देशों के सरकारी (सावरिन) बांड्स को मिलती है और इन्हें हर तरह से सुरक्षित होने का तमगा देती है। बताने की जरूरत नहीं कि वित्तीय बाजार निहायत कायर है। खतरे के एक अलार्म पर यहां कोई किसी की चिंता नहीं करता, बस सारी भेड़ें खाई में कूद पड़ती हैं।
कितनी दूर तक जाएगी बात?
सरकारों पर तंज करने वाले कहते हैं कि आम लोग अगर सरकारों की तरह व्यवहार करने लगें तो आप पुलिस को बुला लेंगे.. बात भी ठीक है, खाली जेब हो तो कोई कर्ज नहीं देता, लेकिन सरकारें खूब ऐसा करती हैं। अंतरराष्ट्रीय पैमाने के मुताबिक अगर किसी देश का कर्ज जीडीपी से 60 फीसदी ऊपर हो और ऊपर से वह विदेशी कर्ज हो तो उस मुल्क को कर्ज संकट रोग कभी भी पकड़ सकता है। मगर मूडी के आकलन के मुताबिक सिर्फ 2007 से 2009 के बीच दुनिया के जीडीपी के अनुपात में सरकारों का संप्रभु कर्ज 62 फीसदी से बढ़कर 85 फीसदी हो गया है। इनमें भी जी 20 के सदस्य नौ प्रमुख देशों में सात का संप्रभु कर्ज उनके जीडीपी की तुलना में दस फीसदी बढ़ गया है। जब कि इस दौरान जी 20 में औसत बजट घाटे एक फीसदी से बढ़कर करीब आठ फीसदी हो गए। निवेशकों को खतरा साफ दिख रहा है और संप्रभु डिफाल्ट तो छूत का रोग है। इसे देखते ही वित्तीय बाजार नाक मुंह पर सतर्कता का मास्क बांध लेता है।
इनका हाल तो देखो!
न्यूयार्क के मैनहट्टन में सिक्स्थ एवेन्यू पर लगी अमेरिका की राष्ट्रीय कर्ज घड़ी में नौ अक्टूबर, 2008 को कर्ज की वास्तविक स्थिति दिखाने के लिए अंक कम पड़ गए थे। अमेरिका के कर्ज ने तब दस ट्रिलियन डालर के आंकड़े को पार किया था। यह शायद अमेरिका में कर्ज संकट की उलटी गिनती की शुरुआत थी। यह घड़ी 16 मई रविवार को करीब 12.9 ट्रिलियन डालर का सार्वजनिक कर्ज दिखा रही थी। अमेरिका में केंद्रीय स्तर पर भले ही सब कुछ ढंका छिपा हो, मगर नीचे तो शुरुआत हो चुकी। अमेरिका का सबसे बड़ा राज्य, अर्नाल्ड श्वार्जनेगर का कैलिफोर्निया कर्ज चुकाने में चूकने वाला है और ओबामा से मदद की गुहार कर रहा है। 2009 में अमेरिकी नगर निकायों ने दीवालियेपन के 11000 मामले दायर किए हैं। जबकि 1937 से अब तक ऐसे केवल 600 मामले आए थे। चर्चा हैरिसबर्ग व डेट्रायट जैसे शहरी निकायों के दीवालिया होने की भी है। इससे 2800 बिलियन डालर का म्युनिसिपल बांड बाजार गर्त में है। अमेरिकी की फेडरल सरकार का संप्रभु कर्ज जीडीपी का करीब 85 फीसदी है और सकल कर्ज 150 फीसदी पर है। अमेरिका को इस साल बाजार से 1.6 ट्रिलियन डालर जुटाने हैं, वित्तीय बाजार डरा हुआ है, कोई नहीं जानता कि कैलिफोर्निया का हाल देख लोगों को अंकल सैम के बांडों पर कब तक भरोसा रहेगा।
और इनका क्या होगा?
दुनिया के अगुआ बांड हाउस पिमोको के ब्रिटेन के बाजार से हाथ खींचने की चर्चा लंदन के वित्तीय बाजारों में ठीक उस समय उभरी, जब ब्रितानी सरकार चुनाव से इंच भर दूर थी और करीब 200 बिलियन पौंड सरकारी कर्ज कार्यक्रम सर पर खड़ा था। पिमोको जैसे कई अन्य निवेशक भी यूके की हालत देख कर उखड़ रहे हैं। 1.5 ट्रिलियन पौंड का कुल सरकारी कर्ज और पूरे यूरोपीय समुदाय में सबसे ऊंचा बजट घाटा (जीडीपी के मुकाबले 12 फीसदी) किसी भी निवेशक को डरायेगा। ब्रिटेन यूरो जोन से बाहर है, इसलिए वह मुद्रा का अवमूल्यन कर रहा है, जो हालत और खराब करेगी। इस अमीर मुल्क को अगले तीन साल में 550 बिलियन पौंड का कर्ज चाहिए, लेकिन वित्तीय बाजार तो उसकी ट्रिपल ए रेटिंग वापस लेने की चर्चा कर रहा है। जर्मनी भी जीडीपी के अनुपात में करीब 78 फीसदी कर्ज के साथ खतरे के निशान से ऊपर है। वहां कई राज्यों में कर्ज का हाल कैलिफोर्निया से पांच गुना ज्यादा बुरा है।

पूरब तक फैला अंधियारा
दुनिया के अर्थशास्त्री इस समय इस बहस में जुटे हैं कि पहले यूके डिफाल्ट होगा या जापान। दरअसल जापान कुछ ज्यादा ही नाजुक हालत में है। आईएमएफ मानता है कि वहां इस साल सरकार का कर्ज जीडीपी की तुलना में 227 फीसदी पर पहुंच जाएगा। जापान को 213 ट्रिलियन येन के कर्ज चुकाने के लिए इस साल नया कर्ज चाहिए। पूरब के इस दिग्गज मुल्क में बचत दर नवें दशक के 15 फीसदी से घटकर अब दो फीसदी पर आ गई है। जापान के लोग सरकार के बांडों में पैसा लगाने की स्थिति में नहीं हैं। जापान का स्टेट पेंशन फंड (दुनिया का सबसे बड़ा पेंशन फंड) सरकारी बांड बेच रहा है। बैंकिंग उद्योग पहले से बेहाल है। आर्थिक विकास दर बहुत कमजोर है। दुनिया को मालूम है कि जापान का इतिहास भयंकर आर्थिक भूलों से भरा है।
यह सारा ब्यौरा अगर आपको किसी हारर स्टोरी की तरह लगे तो माफ करिएगा। लेकिन हकीकत छिपाने से फायदा भी क्या? सिटी ग्रुप के अर्थशास्त्री विलियम ब्यूटर तो और भी मुंहफट हैं। वह कहते हैं कि ''कुत्तों की जो नस्लें आज सबसे अच्छी मानी जा रही हैं, वह कभी दुनिया की सबसे खराब नस्लों में गिनी जाती थीं।'' उनका इशारा बड़ों के हाल की तरफ है, वित्तीय पैमानों पर दुनिया के कई पिछड़े मुल्क आज इन अगड़ों से ज्यादा बेहतर हैं। दिसंबर में हमने इसी स्तंभ में लिखा था महासंकट की उलटी गिनती शुरू होने वाली है। ग्रीस से शुरू होकर यह अपशकुन अब दुनिया के कई मुल्कों का दरवाजा खटखटाने लगा है। हर अमीर मुल्क कर्ज का डायनामाइट लपेटे नाच रहा है और भारी घाटों व राजस्व में कमी का पलीता हाथ में है। कोई नहीं जानता कौन किसका कितना कर्ज चुका पाएगा और जनता से क्या-क्या वसूला जाएगा? इलाज की कोशिशें भी जारी हैं, मगर इलाज भी संकट जितना ही भारी है। .. दानिशमंदों (बुद्धिमानों ) की नादानी दुनिया को अक्सर बहुत महंगी पड़ी है। यह संकट इसी की नजीर है।
बूदो बाश क्या पूछो लोगों हम उस शहर से आए हैं
नादानी दानाई जहां है दानाई नादानी है .. फिराक
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Monday, May 10, 2010

महात्रासदी का ग्रीक कोरस

व धुएं में घिरे एथेंस के मार्फिन बैंक की खिड़की पर एक महिला का शव टंगा है। ..ग्रीस के शहरों में अराजकता दौड़ रही है, दंगे जानलेवा हो चले हैं। . इस देश पर आतंकवाद, युद्ध या प्रकृति का कहर नहीं टूटा है। एक चुनी हुई सरकार भी है, लेकिन लोकतंत्र और ओलंपिक का जन्मदाता देश जल रहा है। सड़कों पर दंगा करती भीड़ को समझ में नहीं आता कि उनके प्यारे फलते-फूलते ग्रीस (यूनान) में अचनाक क्या हो गया है? ..यही बात तो 2001 में ब्यूनस आयर्स (अर्जेटीना) की सड़कों पर मरते-मारते लोग भी समझ नहीं पा रहे थे कि वह नौकरियां गंवाकर अचानक सड़कों पर कचरा क्यों बीनने लगे? ..पूरा विश्व देख रहा है कि देशों का कर्ज संकट में फंसना या देनदारी में चूकना (सावरिन डिफाल्ट) कितनी दर्दनाक विपत्ति है। एक ऐसी आपदा जो गुस्साई प्रकृति, सिरफिरे आतंकी या युद्धखोर राजनेताओं के चलते नहीं, बल्कि सरकारों और स्मार्ट व ज्ञानी गुणी वित्तीय कारोबारियों के चलते आती है। देशों का कर्ज संकट गलतियों का पीड़ादायक दोहराव है, जिसने सिर्फ कुछ महीनों में एक संपन्न देश को वस्तुत: भिखारी बना दिया है। ऊपर से दुनिया यह मान रही है कि ग्रीस दरअसल वित्तीय महात्रासदी का कोरस (ग्रीक रंगमंच की परंपरा में ट्रेजडी से पहले गाया जाने वाला सहगान) मात्र है। इस ट्रेजडी के कई अंक अभी बाकी हैं।
जब देश डूबते हैं..!!
अंतरिक्ष में मानव की पहली उड़ान (अपोलो 8) के कमांडर फ्रैंक बोरमैन मजाक में कहते थे कि नर्क की संकल्पना के बिना जैसे ईसाइयत नहीं रह सकती, ठीक उसी तरह दीवालियेपन के बिना पूंजीवाद भी मुश्किल है। अमेरिकी मानते रहें कि व्यक्ति के लिए दीवालिया होना नई शुरुआत का मौका है, मगर जरा ग्रीस से पूछिए वह किस नई शुरुआत के बारे में सोच रहा है? किसी देश के लिए संप्रभु कर्ज संकट दरअसल घोर नर्क है जो देश की वित्तीय साख, उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति, वित्तीय तंत्र की मजबूती और देश में निवेश की उम्मीदें आदि सब कुछ लील जाता है। दरअसल जब देश डिफाल्टर होते हैं, और वह भी विदेशी बाजारों से लिए गए कर्जो में तो ग्रीस जैसे उदाहरण बनते हैं। एक बार बस बाजार को पता भर चले कि देश की हालत नरम-गरम है तो कर्ज की रेटिंग गिरने लगती है और बात नए कर्जो पर रोक, बैंकों की बर्बादी से होती मुद्रा अवमूल्यन, दीवालियेपन तक तक आ जाती है। अंतत: अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी संस्थाएं अनुदान देती हैं और देश संकट की एक लंबी सुरंग में चला जाता है। इस महाव्याधि का इलाज भी कम मारक नहीं होता, लेकिन उस पर चर्चा फिर कभी। फिलहाल तो यह देखें कि ग्रीस ने यह नया इतिहास कैसे बनाया?
ग्रीक व्यथा की अंतर्कथा
यूरोप में कहावत है कि ग्रीस अपनी क्षमता से अधिक इतिहास बनाता है। संप्रभु दीवालियेपन की शायद सबसे पहली घटना ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में ग्रीस में ही घटी थी, जब इसकी दस नगरपालिकाएं कर्ज चुकाने में चूक गई थी। वैसे ग्रीस के ताजा इतिहास में ज्यादा रोमांच है। अमीर देशों में शुमार ग्रीस 2000 से 2007 तक यूरो जोन की सबसे तेज दौड़ती (4.2 फीसदी विकास दर) अर्थव्यवस्थाओं में एक था। मगर 2008 की मंदी ने ग्रीस के दो सबसे बड़े उद्योगों पर्यटन व शिपिंग को तोड़ दिया और सरकार का राजस्व बुरी तरह घट गया। पर इसमें अचरज क्या? यह तो लगभग हर देश के साथ हुआ था, दरअसल ग्रीस में असली लोचा यहीं पर था। घाटा बढ़ने के बावजूद ग्रीस कर्ज लेता रहा और अपना वित्तीय सच दुनिया से छिपाता रहा। पिछले साल के अंत में दुनिया को पता चला कि ग्रीस में घाटे व कर्ज के आंकड़े झूठ हैं। इस मुल्क ने 216 बिलियन यूरो का कर्ज ले रखा है, जो कि उसके जीडीपी का 120 फीसदी है। दुनिया को पता था कि ग्रीस सरकार के बांडों में 70 फीसदी निवेश विदेशी है, इसलिए 2009 के अंत से ग्रीस में महासंकट की उलटी गिनती शुरू हो गई थी। इस साल मार्च में जब ग्रीस की सरकार ने वित्तीय पाबंदियों का कानून बनाकर खतरे का बटन दबाया तो वित्तीय बाजार में ग्रीस के बांडों की रेटिंग जंक यानी कचरा होने लगी और दुनिया समझ गई कि ग्रीस तो अब गया।
फिर भी तो नहीं सीखते !!
2010 का पहला सूरज चढ़ने तक दुनिया यह जान गई थी कि ग्रीस डूबेगा, लेकिन यह अब भी एक रहस्य है कि डूबते ग्रीस के बांड इस साल की शुरुआत में ओवरसब्सक्राइब कैसे हो गए? दरअसल दुनिया ने कभी वक्त पर उस पूर्व चेतावनी तंत्र की नहीं सुनी है, जिसे इतिहास कहा जाता है। वित्तीय बाजार के विस्तार के साथ देशों का कर्ज में चूकना तेजी से बढ़ा है। 1824 से 2006 के बीच दुनिया में संप्रभु दीवालियेपन की 257 घटनाएं हुई थीं, लेकिन अकेले 1981 से 1990 के बीच देशों के कर्ज में चूकने की 74 और 1998 से 2004 के बीच 16 घटनाएं हुई। 1500 से 1900 ईसवी के बीच फ्रांस आठ बार और स्पेन 13 बार दीवालिया हुआ। हालांकि इतना पीछे जाने की जरूरत नहीं है। अर्जेटीना, मेक्सिको, रूस, थाइलैंड इस मर्ज के सबसे ताजे उदाहरण हैं। पिछले करीब 220 साल में छह बार दीवालिया हुआ अर्जेटीना तो दुनिया के अर्थशास्त्रियों के बीच मजाक का विषय है। देशों के दीवालियेपन पर आर्थिक शोध का अंबार लगा है, लेकिन इसे पढ़े बिना भी यह जाना जा सकता है कि यह आर्थिक नर्क जब भी बना है तब बेतहाशा खर्च, राजकोषीय असंतुलन और वित्तीय अपारदर्शिता व विदेशी बाजारों से अंधाधुंध कर्ज इसके मूल में रहे हैं। शोध बताते हैं कि बैंकों व मुद्राओं के संकट अंतत: देशों को दीवालियेपन पर आकर रुके हैं। अर्जेटीना, उरुग्वे, यूक्रेन, इंडोनेशिया और ग्रीस के ताजे संकट इसकी नजीर हैं। जानकार कहेंगे कि ग्रीस तकनीकी तौर पर डिफाल्टर नहीं है, क्योंकि वह आईएमएफ की आक्सीजन पर है, लेकिन बाजार मुतमइन है कि ग्रीस व्यावहारिक रूप से डिफाल्टर है। जैसे ही ग्रीस अपने कर्ज की देनदारी को टालेगा या कर्जो का पुनर्गठन करेगा। उस पर आधिकारिक डिफाल्टर की मुहर लग जाएगी।
ग्रीस की रंगमंचीय परंपरा में दशकों से मार्च अप्रैल के महीनों में थियेटरों में ट्रेजडी का मंचन का होता है। ..ग्रीस ने अपनी यह परंपरा नहीं छोड़ी, इस समय वहां एक सुपर ट्रेजडी का मंचन हो रहा है। यह बात दीगर कि ग्रीस के लोग इस त्रासदी का हिस्सा बनना कतई नहीं चाहते थे, लेकिन वह करें भी क्या? सरकारें हमेशा मनमाना कर गुजरती हैं, बाद में आम जनता मरती व भरती है। ग्रीस जैसे संकट की कल्पना भी किसी देश के लिए डरावनी है, लेकिन हकीकत बड़ी जालिम है। वित्तीय बाजार ग्रीस को महात्रासदी का पहला अध्याय मान रहे हैं। ग्रीस यूरोप में अकेला बीमार नहीं है और जो दूसरे बीमार हैं उन्होंने ही ग्रीस को कर्ज भी दे रखा है। यानी कि त्रासदी के लिए अगले मंच तैयार हो रहे हैं, ऊपर से इस संप्रभु कर्ज संकट का इलाज भी किसी आपदा से कम नहीं है। यूरोप के समृद्ध मुल्क कर्ज के खेल में देशों की बर्बादी को तीसरी दुनिया की आपदा बताते थे, मगर इस अपशकुन ने अब उनका घर भी देख लिया है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार कोई अमीर देश इस तरह डूब रहा है। ..मेरे डूब जाने का बाइस तो पूछो, किनारे से टकरा गया था सफीना।
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( विनम्र संदर्भ: इसी स्‍तंभ में आठ दिसंबर 2009 में लिखा गया था कि महासंकट की उलटी गिनती प्रारंभ हो गई है। तब भारत में इसकी चर्चा मुश्किल से सुन पड़ती थी। वह तो बजट के कयास और मंदी खत्‍म होने खूबूसरत ख्‍यालों का मौसम था। ग्रीक की समस्‍या के साथ सॉवरिन डिफाल्‍ट की महात्रासदी शुरु हो गई है। आंच हम तक आ रही है। .............. और मजा देखिये कि आज 10 मई 2010 के अखबारों में सरकार के मुख्‍य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु कह रहे हैं कि यूरोप का संकट भारत के पूंजी बाजार में विदेशी निवेश की बाढ़ लाने वाला है। 12 अप्रैल 2010 को आप पढ़ चुके हैं कि सुरक्षित होने के खतरे सर पर हैं। ..... आमीन.!!!! दोनों स्‍तंभ बायें तरफ आर्काइव में हैं। )

Monday, May 3, 2010

ऊंटों के सर पर पहाड़

यूरोपीय बैंकरों के सपने में आज कल राबिन हुड आता है, घोड़े पर सवार, टैक्स का चाबुक फटकारता हुआ!! हेज फंड मैनेजरों को पिछले कुछ महीनों से बार-बार टोबिन टैक्स वाले जेम्स टोबिन (विदेश मुद्रा कारोबार पर टैक्स) की आवाजें सुनाई पड़ने लगी हैं!! नया कर लगाकर ओबामा अमेरिकी बैंकों के लिए उद्धारक की जगह अब मारक हो गए हैं! भारतीय रिजर्व बैंक भी विदेशी निवेशकों को टोबिन टैक्स का खौफ दिखाता है!! और पूरी दुनिया की वित्तीय संस्थाओं के प्रमुख तो अब आईएमएफ का नाम सुनकर सोते से जाग पड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष विश्व के महाकाय वित्तीय कारोबार पर टैक्स की कटार चलाने को तैयार है। ..यह बदलाव हैरतअंगेज है। उदार पूंजी के आजाद परिंदों के लिए पूरी दुनिया मिलकर तरह-तरह के जाल बुनने लगी है। हर कोई मानो वित्तीय संस्थाओं से उनकी गलतियों और संकटों की कीमत वसूलने जा रहा है। वित्तीय बाजार के सम्राट कठघरे में हैं और खुद को भारी जुर्माने व असंख्य पाबंदियों के लिए तैयार कर रहे हैं। यकीनन, एक संकट ने बहुत कुछ बदल दिया है।
और बिल कौन चुकाएगा?
वित्तीय बाजार के ऊंट अब पहाड़ के नीचे हैं। दुनिया के दिग्गज बैंकों व वित्तीय संस्थाओं की पारदर्शिता कसौटी पर है। इनके ढहते समय राजनीतिक नुकसान देखकर सरकारों ने इन्हें जो संजीवनी दी थी, अब उसका बिल वसूलने की बारी है। ताजा हिसाब बताता है कि दुनिया के भर के बैंकों व वित्तीय संस्थाओं ने डेरीवेटिव्स के खेल में करीब 1.5 ट्रिलियन डालर गंवाए हैं। जबकि बैलेंस शीट से बाहर जटिल वित्तीय सौदों का नुकसान दस ट्रिलियन डालर तक आंका जा रहा है। एक आकलन के मुताबिक संकट से पहले तक दुनिया भर बैंकों की शेयर पूंजी दो ट्रिलियन डालर के करीब थी। यानी कि बैंकों के पास घाटा है पूंजी नहीं। वित्तीय विश्लेषक मान रहे हैं कि बैंकों को उबारने पर दुनिया की सरकारें 9 ट्रिलियन डालर तक खर्च कर चुकी हैं। इस रकम को उंगलियों पर गिनना (डालरों के हिसाब में ट्रिलियन बारह शून्य वाली रकम है। रुपये में बदलने के बाद यह और बड़ी हो जाती है) बहुत मुश्किल है। बेचैनी इसलिए है कि बैंकों के साथ देश भी दीवालिया होने लगे हैं। आइसलैंड ढह गया है, संप्रभु कर्जो में डिफाल्टर बर्बाद ग्रीस को यूरोपीय समुदाय और आईएमएफ ने रो झींक कर 60 बिलियन डालर की दवा दी है। सरकारों को यह पता नहीं आगे कितनी और कीमत उन्हें चुकानी होगी। इसलिए वित्तीय खिलाडि़यों या संकट के नायकों पर नजला गिरने वाला है। दिलचस्प है कि जिस अमेरिका ने पिछले साल नवंबर में जी 20 देशों की बैठक में इस टैक्स को खारिज कर दिया था, उसी ने बैंकों पर नया कर थोप कर करीब 90 बिलियन डालर निकाल लिये है। ..अमेरिका को देखकर अब पूरी दुनिया वित्तीय कारोबार पर तरह-तरह के करों का गणित लगाने लगी है।
हमको राबिन हुड मांगता!
यूरोप के लोग वित्तीय संस्थाओं के लिए राबिन हुड छाप इलाज चाहते हैं। अमीरों से छीनकर गरीबों को बांटने वाला इलाज। आक्सफैम जैसे यूरोप के ताकतवर स्वयंसेवी संगठनों ने वित्तीय संस्थाओं पर राबिन हुड टैक्स लगाने की मुहिम चला रखी है। मांग है कि बैंकों व वित्तीय संस्थाओं के आपसी सौदों पर 0.05 फीसदी की दर से कर लगाकर हर साल करीब 400 बिलियन डालर जुटाए जाने चाहिए। पूरे प्रसंग में राबिन हुड का संदर्भ प्रतीकात्मक मगर बेहद अर्थपूर्ण है। दरअसल आंकड़ों वाली वित्तीय दुनिया भी नैतिकता के सवालों में घिरी है। अमेरिकन एक्सप्रेस, सिटीग्रुप, एआईजी, गोल्डमैन, मोरगन, बैंक आफ अमेरिका, वेल्स फार्गो से लेकर यूरोप के आरबीएस, लायड्स और बर्बादी के नए प्रतीक ग्रीस के एप्सिस बैंक तक, पूरी दुनिया का लगभग हर बड़ा बैंक दागदार है और कर्जदार है अपने देश की आम जनता का, जिसके टैक्स की रकम से इन्हें उबारा गया है। मुनाफे तो इनके अपने थे, लेकिन इनकी बर्बादी सार्वजनिक हो गई है। जाहिर है, कोई सरकार आखिर कब तक इनकी गलतियों का बोझ ढोएगी? इसलिए यह सवाल अब बडे़ होने लगे हैं कि बैंक दुनिया में सबसे ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। यहां अन्य उद्योगों की तुलना में प्रति कर्मचारी मुनाफा 26 गुना ज्यादा है। तो फिर इन्हें अपनी बर्बादी से बचाने का बिल चुकाना चाहिए। राबिन हुड टैक्स का आंदोलन चलाने वाले कहते हैं कि यह संकट एक अवसर है। इनके अकूत मुनाफे से कुछ हिस्सा निकलेगा तो भूखे-गरीबों और बिगड़ते पर्यावरण के काम आएगा। ..यह वित्तीय सूरमाओं से प्रायश्चित कराने की कोशिश है।
गलती करने का. तो टैक्स भरने का
वित्तीय अस्थिरता का इलाज निकालने के लिए अधिकृत आईएमएफ ने ताजी रिपोर्ट में अपना फंडा साफ कर दिया है। मतलब यह कि जोगलती करें, वे टैक्स भरें। क्योंकि सरकारों के पास खैरात नहीं है। मुद्राकोष दो तरह के टैक्स लगाने की राय दे रहा है। पहला कर इस मकसद से कि आगे अगर कोई बैंक डूबे तो उसे उबारने के लिए पहले से इंतजाम हो। यह कर बैंकों की कुल देनदारियों पर लगेगा। बकौल आईएमएफ इससे हर देश को अपने जीडीपी आकारके कम से कम दो फीसदी के बराबर की राशि जुटानी होगी। अमेरिका में इससे 300 अरब डालर मिलने का आकलन है। जबकि दूसरा कर वित्तीय कामकाज कर कहा जा रहा है। यह बैंकों के अंधाधुंध मुनाफों और अधिकारियों दिए जाने वाले मोटे बोनस पर लगेगा। इसके अलावा विभिन्न देशों में वित्तीय कारोबार पर कर से लेकर विदेशी मुद्रा वापस ले जाने पर टोबिन टैक्स जैसी कई तरह की चर्चाएं हैं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कारोबार का आकार (बैंक आफ इंटरनेशनल सेटलमेंट के आंकड़े के अनुसार सालाना 60 ट्रिलियन डालर का शेयर, 900 ट्रिलियन डालर का विदेशी मुद्रा, 2200 ट्रिलियन डालर का डेरीवेटिव्स, 950 ट्रिलियन डालर का ओटीसी डेरीवेटिव्स और स्वैप कारोबार) इतना बड़ा है कि छोटा सा टैक्स भी बहुत बड़ा हो जाता है। हिसाब किताब लगाने वाले कहते हैं कि विश्व का सालाना वित्तीय कारोबार पूरी दुनिया के जीडीपी से 11 गुना ज्यादा है !!! .. एक तो इतना बड़ा कारोबार, ऊपर से खतरे हजार और डूबने पर सरकार से मदद की गुहार... ओबामा लेकर गार्डन ब्राउन और एंजेला मर्केल तक सब कह रहे हैं ..बहुत नाइंसाफी है।
वित्तीय बाजार में ग्रीस की साख जंक यानी कचरा हो गई है। दीवालियेपन की दंतकथाएं बना चुका मशहूर स्पेन फिर आंच महसूस कर रहा है। इसलिए वित्तीय संस्थाएं भले ही कुनमुनाएं लेकिन माहौल उनके हक में नहीं है, क्योंकि देशों का दीवालिया होना बहुत बड़ी आपदा है। मुमकिन है कि एक माह बाद जून में कनाडा में होने वाली बैठक में जी 20 देशों के अगुआ मिलकर वित्तीय जगत के सम्राटों के लिए टैक्स की सजा मुकर्रर कर दें। कोई नहीं जानता कि बैंकों को मिलने वाली सजा बाजारों को उबारेगी या डुबाएगी? पता नहीं बैंक इन करों का कितना बोझ खुद उठायेंगे और कितना उपभोक्ताओं के सर डाल कर बच जाएंगे? ..दो साल पहले तक वित्तीय सौदों पर टैक्स व सख्ती की बात करने गंवार और पिछड़े कहाते थे, मगर आज हर तरफ पाबंदियों की पेशबंदी है। पता नहीं तब का खुलापन सही था या आज की पाबंदी। असमंजस में फंसी दुनिया अपने नाखून चबा रही है। ..बाजार की जबान में सब कुछ बहुत 'वोलेटाइल' है। ..''देखे हैं हमने दौर कई अब खबर नहीं, पैरों तले जमीन है या आसमान है।''
अन्‍यर्थ .... http://jagranjunction.com/ (बिजनेस कोच)

Monday, April 26, 2010

झूठ के पांव

आईपीएल, ग्रीस, गोल्डमैन सैक्श और आइसलैंड में क्या समानता है? यह सभी बड़े, चमकदार, जटिल और विशाल झूठ व फर्जीवाड़े की ताजी नजीरें हैं जो भारत से लेकर यूरोप व अमेरिका तक फैली हैं। यकीनन इन्हें शानदार कुशलता से गढ़ा गया था, लेकिन मंजिल तक ये भी नहीं पहुंच पाए।.. रास्ते में ही बिखर गए। झूठ का सबसे बड़ा सच यही है कि यह किसी तरह से नहीं छिपता। न राष्ट्रीय झंडे और सरकारी मोहर की ओट में, न बड़े नाम और ऊंची साख की छाया में और न लोकप्रियता और सितारों की चमक में। यहां तक कि आंकड़ों की भूल भुलैया भी झूठ को ढक नहीं पाती। ग्रीस की सरकार ने अपने कर्ज को छिपाने के लिए जो झूठ बोला था, उसने देश को आर्थिक त्रासदी में झोंक दिया है। दुनिया के सबसे बड़े निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्श का झूठ वित्तीय बाजारों को नए सिरे से हिला रहा है। आइसलैंड झूठ बोलकर बर्बाद हो चुका है और आईपीएल का झूठ भारत के क्रिकेट धर्म को पाप के पंक में डुबो रहा है। यकीनन यह धतकरम चुनिंदा लोगों ने खातों में खेल, कंपनियों के फर्जीवाड़े, वित्तीय अपारदर्शिता, आंकड़ों के जंजाल के जरिए किया था, लेकिन अब इनके झूठ की कीमत बहुत बड़ी और नतीजा बड़ा शर्मनाक होने वाला है।
सरकारी झूठ की ग्रीकगाथा
सरकारें जब सच छिपाती हैं तो कयामत आती है। ग्रीस के दीवालियेपन और बदहाली की संकट कथा का निचोड़ यही है। ग्रीस को यूरोमुद्रा अपनाने वाले देशों के संगठन में इस शर्त पर प्रवेश मिला था कि वह घाटे और कर्ज को निर्धारित स्तर पर रखने की शर्ते (ग्रोथ एंड स्टेबिलिटी पैक्ट) पूरी करेगा। ग्रीसने यह सब शर्ते पूरी करने के लिए सच पर पर्दा डाल दिया। ताजा आर्थिक संकट आने के बाद दुनिया को पता चला कि ग्रीस ने खातों में खेल किया था। 2009 में देश का घाटा जीडीपी के अनुपात में 12.5 फीसदी पाया गया, जबकि सरकार ने अपने पहले आकलन में इसे 3.7 फीसदी माना था। यूरोपीय समुदाय के आधिकारिक आंकड़ा संगठन (यूरोस्टैट) ने ग्रीस के इस फरेब को प्रमाणित कर दिया कि वहां की सरकार ने कई तरह के ब्याज भुगतान, कर्जो की माफी, स्वास्थ्य सब्सिडी आदि को अपने नियमित खातों से छिपाया और सब घाटे को नियंत्रित दिखाते हुए बाजार से कर्ज उठाया। यह झूठ बहुत बड़ा था, इसलिए अब ग्रीस की साख खत्म हो गई है। देश पूरी तरह दीवालिया है और यूरोजोन के नियामकों का सर शर्म से झुक गया है। ग्रीस की जनता इस झूठ की कीमत नए टैक्स, गरीबी, महंगाई और संकट से ठीक उसी तरह चुकाएगी जैसा कि आइसलैंड में हुआ है। बैंकों के झूठ के कारण दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में एक आइसलैंड देखते-देखते राहत का भिखारी हो गया। पूरे संकट की जांच करने वाले आइसलैंड के ट्रुथ कमीशन की हाल में आई रिपोर्ट बताती है कि केंद्रीय बैंक के पास केवल 1.2 अरब डालर का विदेशी मुद्रा भंडार था, लेकिन बैंकों ने 14 अरब डालर का विदेशी कर्ज ले डाला। हकीकत खुली तो वित्तीय बाजारों में बैंकों और देश की साख कचरा और प्रतिभूतियां मिट्टी हो गई। इस बर्बादी का बिल देश की जनता टैक्स देकर चुका रही है।
खातों में खेल की ललित कला
क्रिएटिव अकाउंटिंग ???... ग्रीस से लेकर अमेरिका तक इस शब्द का अब एक ही अर्थ है- खातों में खेल और सच पर पर्दा। यूरोप में चर्चा है कि ग्रीस की सरकार को खातों में स्याह सफेद करने की ललित कला गोल्डमैन सैक्श ने सिखाई थी। पता नहीं कि इस प्रतिष्ठित निवेश बैंक ने दुनिया को और क्या-क्या सिखाया है? गोल्डमैन पिछले साल आए वित्तीय संकट पर अपने झूठ को लेकर कठघरे में है। अमेरिकी सरकार और गोल्डमैन सैक्श में ठन चुकी है। अमेरिका में सेबीनुमा और बेहद ताकतवर सरकारी नियामक सिक्योरिटी एक्सचेंज कमीशन ने हाल में गोल्डमैन पर निवेशकों को आने वाले संकट से धोखे में रखकर प्रतिभूतियां बेचने का आरोप लगाया है। ब्रिटेन व जर्मनी के वित्तीय नियामक और अमेरिका की सरकारी बीमा कंपनी एआईजी भी गोल्डमैन को कठघरे में खड़ा करने की तैयारी कर रही है। यह निवेश बैंकिंग उद्योग लिए नए संकट की शुरुआत है। निवेश बैंकों पर उनका झूठ अब भारी पड़ने लगा है। लेकिन निवेश बैंक ही क्यों खातों में खेल निजी कंपनियों का भी पुराना शगल रहा है, बीसीसीआई बैंक, जेराक्स, एनरान, सीआरबी से लेकर सत्यम तक खातों में खेल की कलाओं के तमाम उदारहण हमारे इर्द-गिर्द हैं। आईपीएल भी इसी वित्तीय झूठ का नमूना है, जिसमें क्रिकेट का खेल मैदान में हो रहा था मगर असली खेल पेंचदार कंपनियों, बेनामी निवेश, विदेश में लेन-देन और काले धन के निवेश का था।
पहरेदारों की लंबी नींद
अपनी बेईमानी को स्वाभाविक (बकौल मैकियावेली) मानते हुए आदमी ने ही तमाम नियामक बनाए हैं कि ताकि वे उसकी बेइमानी पकड़ें और पारदर्शिता तय करें, लेकिन इन नियामकों में भी भी तो मैकियावेली वाले आदमी ही हैं न? सो इनकी नींद ही नहीं टूटती। दुनिया में ज्यादातर वित्तीय घोटाले, खातों में गफलत और हिसाब किताब में हेरफेर या तो किसी संकट के बाद सामने आया है या फिर उस खेल और घोटाले में शामिल किसी खिलाड़ी ने ही पर्दा उठाया है। अमेरिका के नियामक ऊंघते रहे और मेरिल लिंच जैसे बैंकर झूठ बेचकर पैसा कूटते रहे। ग्रीस व आइसलैंड जब अपने खाते स्याह सफेद कर रहे थे, तब यूरोपीय नियामक सपनों में तैर रहे थे। वित्तीय फरेब की एनरान व सत्यम जैसी कथाएं प्राइस वाटर हाउस, आर्थर एंडरसन जैसे आडिटरों की निगहबानी में लिखी गई हैं। आयकर विभाग, कंपनी मामलों के मंत्रालय व तमाम नियामकों के सामने आईपीएल ने एक विराट झूठ का संसार रच दिया, जो अब ढह रहा है और वित्तीय धोखेबाजी का हर दांव इसमें चमकता दिख रहा है।
पूरी दुनिया में इस समय बड़े बडे़ झूठ खुलने का मौसम है, लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है। इस समय भी जब आप यह पढ़ रहे हैं, तब भी दुनिया में कहीं न कहीं कोई वित्तीय बाजीगरी, खातों में कोई खेल चल रहा होगा और झूठ अपने पांव जमाने की कोशिश कर रहा होगा। झूठ रचने वाले हमेशा हिटलर का यह मंत्र साधते हैं कि झूठ बड़ा हो और बार बार कहा जाए तो लोग विश्वास कर लेते हैं। ..हिटलर सच था .. आम लोगों ने बड़े झूठ पर हमेशा भरोसा किया है और बाद में उसकी कीमत भी चुकाई है। .जब ग्रीस चमक रहा था, आइसलैंड अमीरी दिखा रहा था, गोल्डमैन गरज रहा था और आईपीएल झूम रहा था तब लोग कैसे जान पाते कि यह सब वित्तीय झूठ के करिश्मे हैं। ..दरअसल फरेब का फैशन बड़ा मायावी है और आम लोग बहुत भोले हैं। ..वह झूठ बोल रहा था इस कदर करीने से, कि मैं एतबार न करता तो और क्या करता?
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http://jagranjunction.com/ (बिजनेस कोच, सातोरी)

Thursday, April 22, 2010

बजट की षटपदी (दो) – खर्च प्रसंग

यह अर्थार्थ स्‍तंभ का हिस्‍सा नहीं है लेकिन इसे एक तरह से अर्थार्थ भी माना जा सकता है। बजट के भीतर कर और खर्च को दो अलग-अलग दिलचस्‍प जगत हैं। बजट के अंतर्जगत की यात्रा पर दैनिक जागरण में दो चरणों मे प्रकाशित छह खबरों को लेकर कई स्‍नेही पाठकों काफी उत्‍सुकता दिखाई थी इसलिए लगा कि बजट की इस दिलचस्‍प दुनिया का ब्‍योरा सबसे बांट लिया जाए। सो बजट की यह षटपदी आप सबके सामने प्रस्‍तुत है। खुद ही देख लीजिये कि हमारी सरकारें कैसे कर लगाती है और कैसे खर्च करती हैं।
खातों में खेल-1
(केंद्र सरकार के खातों में दिलचस्प खेल जारी हैं। सरकार के पास विनिवेश फंड के खर्च का हिसाब- किताब रखने का खाता तक नहीं है।)

विनिवेश की रकम, बजट में गुम
-किस सामाजिक विकास के काम आई सरकारी रत्न बेचकर की गई कमाई?
-बजट में नहीं है विनिवेश की रकम के इस्तेमाल का ब्यौरा
-राष्ट्रीय निवेश फंड के इस्तेमाल का खाता तक नहीं
(अंशुमान तिवारी) सरकारी रत्नों को बेचकर की गई कमाई सरकार ने किस सामाजिक विकास में लगाई? सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश से आया पैसा किसके काम आया? विनिवेश का पूरा हिसाब-किताब बजट के भीतर शायद कहीं खो गया है। न सही खाता है न बही। वित्त मंत्रालय को बस विनिवेश से मिली रकम मालूम है। मगर इस रकम का इस्तेमाल कहां और कितना हुआ, यह जानकारी देने वाला खाता या हिसाब-किताब बजट में है ही नहीं।
पूरा मामला सरकारी खातों में गंभीर अपारदर्शिता का है। सरकार ने विनिवेश की रकम को सामाजिक विकास स्कीमों और सरकारी उपक्रमों के सुधार में लगाने का नियम तय किया था। लेकिन सरकारी खातों की ताजी पड़ताल बताती है कि विनिवेश की रकम के इस्तेमाल का ब्यौरा ही उपलब्ध नहीं है। सूत्रों के मुताबिक नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (कैग) विनिवेश से मिली राशि को लेकर सरकार के खातों की पड़ताल कर रहा है और वित्त मंत्रालय से मामले की कैफियत भी पूछी गई है। मंत्रालय के अधिकारी इसके आगे कुछ बताने को तैयार नहीं है। बताते चलें कि सरकार ने पिछले वित्त वर्ष 2009-10 में विनिवेश से 25,958 करोड़ रुपये जुटाए हैं और इस साल 40,000 करोड़ रुपये जुटाने का कार्यक्रम है। जब पिछला हिसाब-किताब ही गफलत में है तो इसके इसके निर्धारित इस्तेमाल को लेकर भी संदेह है ।
सरकार ने विनिवेश से मिली रकम को रखने के लिए नेशनल इन्वेस्टमेंट फंड बनाया है। वर्ष 2008-09 के आंकड़े बताते हैं कि इसमें करीब 1,814.45 करोड़ रुपये की रकम है। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। भारत की समेकित निधि में इस विनिवेश की राशि से 84.81 करोड़ रुपये की कमाई भी दिखाई गई, लेकिन इसके बाद इस रकम के इस्तेमाल और खर्च का कोई खाता या हिसाब बजट में उपलब्ध नहीं है। जबकि नियमों के तहत इस इस फंड से खर्च और कमाई का हर छोटा-बड़ा ब्यौरा बजट के हिस्से के तौर पर संसद के सामने होना चाहिए।
गौरतलब है कि विनिवेश से आई राशि को शेयर व ऋण बाजार में लगाया जाता है। यूटीआई एसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी), एसबीआई फंड्स और जीवन बीमा सहयोग एएमएसी विनिवेश से मिली रकम का निवेश एक पोर्टफोलियो मैनेजमेंट स्कीम के तहत शेयर बाजार में करती हैं। यह स्कीम सेबी के नियंत्रण मे है, लेकिन इस निवेश पर होने वाली कमाई या नुकसान का ब्यौरा भी सरकार के खातों में तलाशने पर नहीं मिलता।
एक जानकार के मुताबिक विनिवेश की राशि तो बजट में ही है, लेकिन इस खर्च का खाता न होने का मतलब है कि शायद इसका इस्तेमाल उन मदों में नहीं हुआ है जहां होना चाहिए था। अर्थात रत्नों की कमाई शायद बजट का घाटा कम करने में ही काम आई है। जिसे टालने के लिए सरकार ने यह तय किया था कि यह रकम स्पष्ट रूप से सामाजिक विकास व सार्वजनिक उपक्रमों के सुधार पर खर्च होगी।
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खातों में खेल-2
(सरकार के बजट का 'अन्य' खाता बहुत बड़ा हो गया है। करीब 30 फीसदी खर्च अन्य में डाल कर छिपा लिया जाता है, जो बजट में नजर नहीं आता। )

पूरी-पूरी स्कीमें निगल जाता है बजट का 'बेनामी' खाता
-अन्य खर्चो की छोटी सी मद हुई बहुत बड़ी
-हज सब्सिडी से लेकर इंदिरा आवास योजना तक अन्य खर्च में
-बड़ी मदों का आधा खर्च अन्य के खाते में
(अंशुमान तिवारी) बजट के खातों की खर्च की सबसे उपेक्षित और छोटी मद खर्च 'छिपाने' की शायद सबसे बड़ी मद बन चुकी है। बजट की खर्च सूची में सबसे नीचे छिपा नामालूम सा 'अन्य खर्च' पूरी-पूरी स्कीमें, भारी भरकम अनुदान और मोटी सब्सिडी तक निगल जाता है। पिछले कुछ वर्षो दौरान बजट में 'अदर एक्सपेंडीचर' दरअसल एक ब्लैक होल बन गया है। जिसमें हज सब्सिडी और इंदिरा आवास योजना जैसे बड़े-बड़े खर्चे भी गुम हो जाते हैं। और ऊपर से तुर्रा यह कि इस भीमकाय अन्य खर्च का कोई ब्यौरा बजट के जरिए देश को बताया भी नहीं जाता।
सरकार के खातों में इतने बड़े-बड़े गुन हैं कि दांतों तले उंगली दबानी पड़ती है। ताजा बजट 7,35,657 करोड़ रुपये के गैर योजना खर्च में 2,07,544 करोड़ रुपये अर्थात करीब 30 फीसदी खर्च अन्य के खाते में डाल कर निकल गया है। इस अन्य में राज्यों की पुलिस को चुस्त करने के लिए अनुदान जैसे अहम खर्च भी हैं। सूत्रों के मुताबिक सीएजी यानी नियंत्रक व महालेखा परीक्षक पिछले साल से इस अन्य के रहस्य से जूझ रहा है। पिछले साल आई सीएजी की रिपोर्ट में इस पर सरकार से जवाब मांगा गया था, लेकिन वित्त मंत्रालय सवालों से किनारा कर रहा है।
वर्ष 2007-08 और 08-09 में सरकारी खर्च की गहरी पड़ताल बताती है कि 29 प्रमुख खर्चो के मामले में क्रमश: करीब 20,000 करोड़ रुपये और 28,000 करोड़ रुपये का खर्च अन्य की छोटी मद में दिखा दिया गया। सूत्रों के मुताबिक वर्ष 2008-09 के बजट में 8,799 करोड़ रुपये की इंदिरा आवास योजना, 620 करोड़ रुपये की हज सब्सिडी और सफाई कर्मियों के लिए 100 करोड़ रुपये की योजना जैसे खर्च अन्य के अंधे कुएं में खो गए। वर्ष 2007-08 के बजट में हज सब्सिडी के अलावा गांवों में गोदाम बनाने और अनुसूचित जातियों के कल्याण की स्कीम भी अन्य खर्चो का हिस्सा बन गई।
अपारदर्शी हिसाब-किताब की यह बीमारी ग्रामीण विकास, आवास, स्वास्थ्य व परिवार कल्याण, नागरिक विमानन और कृषि जैसे बड़े मंत्रालयों के खर्च में और बढ़ी है। आकलन बताता है कि 29 बड़ी मदों में कुल खर्च का आधा से ज्यादा हिस्सा अन्य खर्च में खो गया है। दरअसल सरकार अन्य खर्चो के हिसाब को बजट के जरिए देश को नहीं बताती। इसलिए यह पता भी नहीं चलता कि इस अन्य की मद में क्या-क्या छिपा है। केंद्र के बजट में खर्च को कुछ बड़ी मदें (मेजर हेड) और एक छोटी मद (माइनर हेड) में बांटा जाता है। अन्य खर्च बजट की छोटी मद है। सिर्फ बड़ी मदों का खर्च बजट के जरिए संसद और देश के सामने रखा जाता है। छोटी मदों के खर्च को सरकारी खातों के नियंत्रक (सीजीए) अलग से हिसाब लगाकर फाइलों में दाखिल दफ्तर कर देते हैं। अन्य खर्चो की यह छोटी सी मद हर मंत्रालय के खर्च के साथ चिपकी रहती है और जाहिर है कि अब सरकार के लिए बड़े काम की साबित हो रही है।
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खातों में खेल (अंतिम)
केंद्र सरकार अब पंचायती राज संस्थाओं व स्थानीय निकायों को पैसा दे रही है। बजट का एक मोटा हिस्सा इन्हें सीधे मिलता है, लेकिन इन तक नहीं पहुंचती आडिट की रोशनी।

खर्च के अधिकार, हिसाब पर अंधकार
-स्वायत्त संस्थाओं को सीधे मिलने वाले हजारों करोड़ सरकार के राडार से बाहर
-मनरेगा, ग्राम सड़क सहित कुल योजना खर्च का 40 फीसदी आवंटन निचले निकायों व स्वायत्त संस्थाओं को
(अंशुमान तिवारी) प्रदेश व जिलों में स्वायत्त संस्थाओं, सोसाइटी और स्वयंसेवी संस्थाओं को सीधा आवंटन सरकार के बजट का अंधा कोना बन गया है। इन संस्थाओं को खर्च के अधिकार तो मिल गए हैं, लेकिन हिसाब को लेकर अंधेरा है। आवंटन होने के बाद खर्च और इनके खातों में बचत को जांचने का कोई तंत्र नहीं है, क्योंकि इन्हें मिला पैसा सरकारी खातों के राडार से बाहर हो जाता है। मनरेगा, ग्रामीण पेयजल, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी हाई प्रोफाइल स्कीमों सहित केंद्र के योजना खर्च का करीब 40 फीसदी हिस्सा इसे 'अंधेरे' में डूबा है।
सरकारी स्कीमों पर अमल की प्रणाली पिछले दशक में आमूलचूल बदल गई है। केंद्र की बड़ी-बड़ी सामाजिक विकास स्कीमें कभी राज्य सरकारें लागू करती थीं, लेकिन अमल सुनिश्चित कराने के लिए केंद्र प्रदेशों में स्वायत्त संस्थाओं और स्वयंसेवी संगठनों को सीधे पैसा देता है। इन संस्थाओं को बजट से सीधे मिलने वाला धन बढ़ते-बढ़ते ताजे बजट में 1,07,551.53 करोड़ रुपये पर जा पहुंचा है। लेकिन आवंटन के बाद इस खर्च की गली बंद हो जाती है। इन के खर्च मामले में सीएजी के भी हाथ बंधे हैं, क्योंकि इन स्वायत्त संस्थाओं के संचालन सरकारी खातों का हिस्सा नहीं हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी इस मामले में सरकार से जवाब-तलब कर रहा है।
सीधे आवंटन की यह प्रणाली जबर्दस्त असंगति और अपारदर्शिता का शिकार हो गई है। स्थानीय संस्थाओं को वित्तीय ताकत देते हुए केंद्र यह सुनिश्चित नहीं कर पाया कि इनके खाते सरकार की निगाह में रहने चाहिए। सूत्रों के मुताबिक स्वायत्त संस्थाओं को दी गई राशि आवंटन के बाद सरकारी खातों से निकलकर इन संस्थाओं के अपने अकाउंट में चली जाती है। निश्चित तौर पर पूरा आवंटन उसी वर्ष खर्च नहीं होता और इनके खातों में पड़ा रहता है। जबकि सरकार का बजट उसे खर्च मान लेता है और अगले साल संस्थाओं को नया आवंटन हो जाता है।
इन संस्थाओं को दिया जाने वाला यह पैसा केंद्र प्रायोजित स्कीमों का है जो कि विभिन्न मंत्रालय चलाते हैं। करीब 40,000 करोड़ रुपये के बजट वाली मनरेगा पूरी तरह इन संस्थाओं के हवाले है। 9,000 करोड़ रुपये इंदिरा आवास योजना, इतनी ही राशि वाले ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम, 12,000 करोड़ की ग्राम सड़क योजनाओं का 90 फीसदी आवंटन सीधे निचली संस्थाओं को होता है। इसी तरह स्कूली शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि की कई स्कीमों में भी बड़ा हिस्सा अब इन्हीं संस्थाओं के जरिए खर्च होता है।
इस सीधे आवंटन की राशि वित्त वर्ष 2007-08 में करीब 51,000 करोड़ रुपये थी, जो कि वर्ष 08-09 में बढ़कर 83,000 करोड़ रुपये और 09-10 में 95,000 करोड़ रुपये हो गई है। निचली संस्थाओं को सीधे आवंटन की प्रणाली एक नए तरह की वित्तीय विसंगति की वजह बन रही है और खर्च के एक बहुत बडे़ हिस्से को स्थापित मानीटरिंग प्रक्रिया से बाहर निकाल रही है।
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