Monday, July 1, 2013

महंगाई की नई मुनादी

 ग्रोथ व आय बढ़ने का आसरा छोड़ कर नई महंगाई से बचने का इंतजाम शुरु करना होगा, जो ऊर्जा क्षेत्र के रास्‍ते पूरी अर्थव्‍यस्‍था में पैठने वाली है।

म यह शायद कभी नहीं जान पाएंगे कि वक्‍त पर आर्थिक सुधार न होने से किस राजनेता को क्‍या और कितना फायदा पहुंचा या दौड़ती अर्थव्‍यवस्‍था थमने और रुपये के टूटने का जिम्‍मेदार कौन है। लेकिन देश बहुत जल्‍द ही यह जान जाएगा कि लापरवाह व अदूरदर्शी सरकारें अपनी गलतियों के लिए भी जनता से किस तरह कुर्बानी मांगती हैं। सियासत की चिल्‍ल पों के बीच भारत में दर्दनाक भूल सुधारों का दौर शुरु हो चुका है, जो पूरी अर्थव्‍यवस्‍था में नई महंगाई की मुनादी कर रहा है। ऊर्जा क्षेत्र में मूल्‍य वृद्धि का नया करंट दौड़ने वाला है जो कमजोर रुपये के साथ मिल कर महंगाई-मंदी के दुष्‍चक्र की गति और तेज कर देगा। कोयला व गैस से जुडे़ फैसलों के दूरगामी नतीजे भले ही ठीक हों लेकिन फायदों के फल मिलने तक आम लोग निचुड़ जाएंगे।

Monday, June 24, 2013

वो उबरे और डूबे हम


2014 के मध्‍य तक ग्‍लोबल बाजारों से अतिरिक्‍त पूंजी उड़ जाएगी और भारत को   महंगाई में स्‍थायी कमी व आर्थिक ग्रोथ लौटने तक कमजोर रुपये व अस्थिर बाजार के साथ जीना होगा। 


मेरिकी फेड रिजर्व के मुखिया बेन बर्नाके बीते सप्‍ताह उत्‍साह के साथ दुनिया को जब यह बता रहे थे कि मंदी व बेकारी से घिसटता अमेरिका वापसी कर रहा है, तब भारत के नीति नियामक अमेरिका में मंदी लंबी चलने की दुआ कर रहे थे। ग्‍लोबल बाजारों के लिए इससे अचछी खबर क्‍या होगी कि दुनिया का सबसे बड़ा बाजार यानी अमेरिका मंदी से उबर रहा है लेकिन भारत के लिए फिलहाल यह सबसे बुरी खबर है क्‍यों कि ग्‍लोबल बाजारों में सस्‍ती अमेरिकी पूंजी की सप्‍लाई रोकने का कार्यक्रम घोषित होते ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से वापसी शुरु कर दी  है। डॉलर 65-70 रुपये की नई तलहटी तलाश रहा है और वित्‍तीय बाजार रोज की उठा पटक के लिए तैयार हो रहे हैं। फेड रिजर्व के फैसले से किसी को अचरज नहीं है, हैरत तो इस बात पर है कि भारत के नीति निर्माताओं के पास इस आपदा के लिए कोई आकस्मिक प्रबंधन नहीं था। अब हम ग्‍लोबल पूंजी के चक्रवात में फंस गए हैं क्‍यों कि मंदी से उबरने के बाद जापान भी यही राह पकड़ेगा जिससे बाजार में सस्‍ती पूंजी की अतिरिक्‍त आपूर्ति और घट जाएगी। 
भारत के बाजारों पर आपदा का बादल अचानक नहीं फटा। दुनिया को इस बात का इलहाम था कि अमेरिका में मंदी उबरने के संकेत मिलते ही ईजी मनी यानी सस्‍ती पूंजी की पाइप लाइन बंद होने लगेगी। अप्रैल मई में बाजारों को इसका इशारा भी

Monday, June 17, 2013

रुपये की ढलान


डॉलर के 65-70 रुपये तक जाने के आकलन सुनकर कलेजा मुंह को आ सकता है लेकिन ऐसा होना संभव है। हमें कमजोर रुपये की यंत्रणा के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए

देश को यह कड़वा कंटीला अब सच निगल लेना चाहिए कि रुपया जोखिम के खतरनाक भंवर में उतर गया है और विदेशी मुद्रा की सुरक्षा उन सैलानी डॉलरों की मोहताज है जो मौसम बदलते ही वित्‍तीय बाजारों से उड़ जाते हैं। यह सच भी अब स्‍थापित है कि भारत संवेदनशील जरुरतों के लिए आयात पर निर्भर है इसलिए डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी रोजमर्रा का दर्द बन गई है। वर्तमान परिदृश्‍य की बुनियाद 1991 जैसी है और लक्षण 1997 के पूर्वी एशियाई संकट जैसे, जब पूरब के मुल्‍कों की मुद्रायें ताबड़तोड़ टूटीं थीं। ताजी छौंक यह है कि अमेरिका व जापान की अर्थव्‍यवस्‍थायें जितनी तेजी से मंदी से उबरेंगी और बाजारों में पूंजी का प्रवाह सीमित करेंगी, भारत के वित्‍तीय बाजारों में डॉलरों की कमी बढ़ती जाएगी। इसलिए सिर्फ कमजोर रुपये से ही नहीं, विनिमय दर अस्थिरता से भी जूझना होगा।
रुपये की ताजा रिकार्ड गिरावट को तातकालिक कहने वाले हमारे सर में रेत घुसाना चाहते हैं। दरअसल देशी मुद्रा की जड़ खोखली हो गई और हवा खिलाफ है। मंदी व महंगे कर्ज का दुष्‍चक्र महंगाई की जिस धुरी पर टिका है, रुपये की कमजोरी उसे ऊर्जा दे रही है। रुपया पिछले वर्षों में बला की तेजी से ढहा है। सितंबर 2008 में ग्‍लोबल संकट शुरु होते वक्‍त डॉलर

Monday, June 10, 2013

सत्‍ता के नए सुल्‍तान


 नेता केंद्रित गवर्नेंस के मॉडल का अवसान अब करीब है। स्‍वतंत्र नियामक यानी रेगुलेटर सत्‍ता के नए सुल्‍तान हैं 

पांच साल बाद देश को शायद इससे बहुत फर्क न पडे कि सियासत का ताज किसके पास है लेकिन यह बात बहुत बड़ा फर्क पैदा करेगी कि संसाधनों के बंटवारे व सेवाओं की कीमत तय करने की ताकत कौन संभाल रहा है। यकीनन, कुर्सी के लिए मर खप जाने वाले नेताओं के पास यह अधिकार नहीं रहने वाला है। भारत में एक बड़ा सत्‍ता हस्‍तांतरण शुरु हो चुका है। स्‍वतंत्र नियामक यानी रेगुलेटर सत्‍ता के नए सुल्‍तान हैं जो वित्‍तीय सेवाओं से बुनियादी ढांचे तक जगह जगह फैसलों में सियासत के एकाधिकार को तोड़ रहे हैं। नियामक परिवार के विस्‍तार के साथ अगले कुछ वर्षों में अधिकांश आर्थिक राजनीति, मंत्रिमंडलों से नहीं बल्कि इनके आदेश से तय होगी। भारत में आर्थिक सुधार, विकास, बाजार, विनिमयन के भावी फैसले, बहसें व विवाद भी इन ताकतवर नियामकों के इर्द गिर्द ही केंद्रित होने वाले हैं जिनमें राजनीति को अपनी जगह

Monday, June 3, 2013

घिसटते भारत का निर्माण


दस वर्ष की सबसे कमजोर विकास दर के साथ भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था अब विशुद्ध स्‍टैगफ्लेशन में है।  इस माहौल में भारत निर्माण का प्रचारतरक्‍की के खात्‍मे पर खलनायकी ठहाके जैसा लगता है। 

भारत के पास अगर बेरोजगारी नापने का भरोसेमंद पैमाना होता या हम जिंदगी जीने की लागत को संख्‍याओं में बांध पाते तो दुनिया भारत का वह असली चेहरा देख रही होती जो विकास दर के आंकडों में नजर नहीं आता। पिछले कई दशकों में सबसे ज्‍यादा रोजगार, आय, निवेश, खपत, राजस्व, तकनीक व  खुशहाली देने वाली ग्रोथ फैक्‍ट्री के ठप होने के बाद भारत अब रोजगार व आय में साठ सत्‍तर के दशक और आर्थिक संकटों में इक्‍यानवे जैसा हो गया है। दस वर्ष की सबसे कमजोर विकास दर के साथ भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था अब विशुद्ध स्‍टैगफ्लेशन में है। जहां मंदी व महंगाई एक साथ आ बैठती हैं। बदहवास सरकार के सिर्फ किस्‍मत के सहारे आर्थिक सूरत बदलने का इंतजार कर रही है। इस माहौल में भारत निर्माण का प्रचार, तरक्‍की के खात्‍मे पर खलनायकी ठहाके जैसा लगता है। 
आर्थिक विकास के ताजे आंकडे़ बेबाक हैं। इनमें ग्रोथ के टूटने का विस्‍तार व गहराई दिखती है।  संकट पूरी दुनिया में था, लेकिन हमारा ढहना सबसे विचित्र है। सभी क्षेत्रों में ग्रोथ माह दर माह लगातार

Monday, May 27, 2013

कालिख के चियर लीडर



दुनिया कभी एक कैरी पैकर के पीछे पड़ गई थी  आईपीएल ने तो ग्‍लोबल क्रिकेट को नौ कैरी पैकर दे दिये हैं। इतिहास लिखेगा कि भारत ने दुनिया के क्रिकेट को दागी बनाने में सराहनीय योगदान किया है। 
स शहर के लोग कुश्तियों के दीवाने थे। एक सयाने को नायाब बिजनेस प्‍लान सूझा। उसने  शहर के नौ पहलवान तैयार किये। वह हर साल उनकी कुश्तियां कराता था और कद्रदानों से खूब पैसा कमाता था। कमाई पहलवानों व आयोजक के बीच बंट जाती। खेल चल निकला। लेकिन तब तक पहलवानों को कमाई के दूसरे रास्‍ते भी दिखने लगे। उन्‍होंने कुश्‍ती पर दांव लगाने वाले से जरायमों से दोस्‍ती कर ली और मिली कुश्‍ती का यह खेल मनोरंजन से अपराध तक फैल गया। इस कहानी में कुश्‍ती की जगह क्रिकेट रख दें तो आईपीएल बन जाएगा जिसने भद्रजनों के खेल को भद्द पिटाने वाले खेल में बदल दिया है। क्रिकेट के मुरीद, जो आईपीएल में फिक्सिंग से ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं उन्‍हें तब और गहरा सदमा पहुंचेगा जब वह यह जान पाएंगे कि फिक्सिंग तो इसका बाहरी दाग है दअरसल इस कारोबारी क्रिकेट की पूरी दाल ही काली है, जो पंटरों बुकीज की सुर्खियों में छिप जाती है और अंतत: फिक्सिंग की जांच भी अंधेरे में गुम हो जाती है।
2007 में ललित मोदी, इंटरनेशनल स्‍पोर्ट्स मैनेजमेंट ग्रुप (आईएमजी) के साथ जब इस आयोजन का खाका खींच रहे थे तब इरादा क्रिकेट के भले का कोई इरादा नहीं था। मोदी ने इस मॉडल को क्रिकेट के सियासी प्रशासकों, बड़ी कंपनियों और ऊंची कमाई वाले सेलेब्रिटीज को यह कहकर ही बेचा था कि भारतीय क्रिकेट में पैसे की नदी

Monday, May 20, 2013

संकट की सफलता



ब्रिटेन ने आधा दर्जन टैक्‍स हैवेन पर नकेल डाल दी है। लक्‍जमबर्ग व आस्ट्रिया कर गोपनीयता बनाये रखने की जिद छोड़ने पर मजबूर हुए हैं। यह पारदर्शिता के ग्‍लोबल आग्रहों की पहली बड़ी जीत है।
माज यदि जागरुक व संवेदनशील है तो संकट सुधारों को जन्‍म देते हैं। सितंबर 2011 में अमेरिका पर अलकायदा का हमला न हुआ होता तो दुनिया आतंक को पोसने वाले वित्‍तीय तंत्र से गाफिल ही रहती। डब्‍लूटीसी के ढहने के साथ ही संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ से लेकर फाइनेंशियल एक्‍शन टास्‍क फोर्स जैसी संस्‍थाओं के नेतृत्‍व में आतंक की ग्‍लोबल आर्थिक नसें काट दी गईं और आतंक की रीढ़ काफी हद तक टूट गई। ठीक इसी तरह अगर कर्ज संकट न आया होता तो शायद यूरोप टैक्‍स हैवेन को हमेशा की तरह पालता रहता।  यूरोप की सरकारें खुद ब खुद काली कमाई के जमाघरों के पर्दे नोच रही है। ब्रिटेन ने आधा दर्जन टैक्‍स हैवेन पर नए नियमों की नकेल डाल दी है और यूरोपीय संघ ने अपने दिग्‍गज सदस्‍यों लक्‍जमबर्ग व आस्ट्रिया को कर गोपनीयता बनाये रखने की जिद छोड़ने पर मजबूर किया है। यह पारदर्शिता के ग्‍लोबल आग्रहों की पहली बड़ी जीत है।
यूरोप में नैतिक दबावों और वित्‍तीय गोपनीयता के बीच के निर्णायक रस्‍साकशी शुरु हो चुकी है। टैक्‍स हैवेन, यूरोप की सरकारों को एक गहरी ग्‍लानि में धकेल रहे हैं। कर्ज संकट के कारण जनता की सुविधायें काटते और टैकस लादते हुए यूरोप के हाकिमो को  यह स्‍वीकार करना पड़ा है कि काले धन के टैक्‍स फ्री जमाघरों को संरंक्षण और जनता पर सख्‍ती एक साथ नहीं चल सकतीं, क्‍यों कि ताजे आंकडों के मुताबिक इन जन्‍नतों में करीब 32 खरब डॉलर की काली कमाई जमा है। टैक्‍स हैवेन यूरोपीय वित्‍तीय तंत्र के अतीत व वर्तमान  का मजबूत हिस्‍सा हैं। स्विटजरलैंड ने टैक्‍स हैवेन का धंधा, 1930 की मंदी से डर कर शुरु किया था। ऑस्ट्रिया व स्विटजरलैंड के बीच मौजूदा छोटी सी रियासत लीचेंस्‍टीन भी तब तक अपने कानून बदल कर टैक्‍स हैवेन बन चुकी थी। ज्‍यूरिख-जुग-लीचेंस्‍टीन की तिकड़ी को

Monday, May 13, 2013

अधिकारों के दाग



संवैधानिक गारंटियों और कानूनी अधिकारों देश को रोजगार व शिक्षा के बदले एक नई राजनीतिक नौकरशाही और जवाबदेही से मुक्‍त खर्च का विशाल तंत्र मिला है।

भ्रष्‍टाचार व दंभ से भरी एक लोकतांत्रिक सरकार, सिरफिरे तानाशाही राज से ज्‍यादा घातक होती है। ऐसी सरकारें उन साधनों व विकल्‍पों को दूषित कर देती हैं, जिनके प्रयोग से व्‍यवस्‍था में गुणात्‍मक बदलाव किये जा सकते हैं। यह सबसे सुरक्षित दवा के जानलेवा हो जाने जैसा है और देश लगभग इसी हाल में हैं। भारत जब रोजगार या शिक्षा के लिए संवैधानिक गारंटियों और कानूनी अधिकारों के सफर पर निकला था तब विश्‍व ने हमें उत्‍साह मिश्रित अचरज से देखा था। यह नए तरह का वेलफेयर स्‍टेट था जो सरकार के दायित्‍वों को, जनता के अधिकारों में बदल रहा था। अलबत्‍ता इन प्रयोगों का असली मकसद दुनिया को देर से पता चला। इनकी आड़ में देश को एक नई राजनीतिक नौकरशाही से लाद दिया गया और जवाबदेही से मुक्‍त खर्च का एक ऐसा विशाल तंत्र खड़ा किया गया जिसने बजट की लूट को वैधानिक अधिकार में बदल दिया। मनरेगा व शिक्षा के अधिकारों की भव्‍य विफलता ने सामाजिक हितलाभ के कार्यक्रम बनाने व चलाने में भारत के खोखलेपन को  दुनिया के सामने खोल दिया है और संवैधानिक गारंटियों के कीमती दर्शन को भी दागी कर दिया है। इस फजीहत की बची खुची कसर खाद्य सुरक्षा के अधिकार से पूरी होगी जिसके लिए कांग्रेस दीवानी हो रही है।
रोजगार गारंटी, शिक्षा का अधिकार और प्रस्‍तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक, जनकल्‍याण के कार्यक्रमों की सबसे नई पीढ़ी है। ग्राम व भूमिहीन रोजगार, काम के बदले अनाज, एकीकृत ग्राम विकास मिशन आदि इन स्‍कीमों के पूर्वज हैं जो साठ से नब्‍बे दशक के अंत तक आजमाये गए।  संसद से पारित कानूनों के जरिये न्‍यूनतम रोजगार, शिक्षा व राशन का अधिकार देना अभिनव प्रयोग इसलिए था क्‍यों कि असफलता की स्थि‍ति में लोग कानूनी उपचार ले सकते थे। भारत के पास इस प्रजाति के कार्यक्रमों की डिजाइन व मॉनीटरिंग को लेकर नसीहतें थोक में मौजूद थीं

Monday, May 6, 2013

महंगाई का ग्लोबल बाजार


 इन्‍फेलशन बनाम  डिफ्लेशन की बहस हमेशा, दोनों की गुणवत्‍ता व संतुलन पर ही खत्‍म होती है जो अब ग्‍लोबल स्‍तर पर बिगड़ गया है। 


बीते सप्‍ताह जब सोना औंधे मुंह गिर रहा था और भारत में इसके मुरीदों की बांछें खिल रही थीं तब विकसित देशों में निवेशक ठंडा पसीना छोड़ रहे थे। सोने के साथ, अन्‍य धातुयें व कच्‍चा तेल जैसे ढहा उसे देखकर यूरोप अब डिफ्लेशन के खौफ से बेजार हो रहा है। मुद्रास्‍फीति के विपरीत डिफ्लेशन यानी अपस्‍फीति मांग, कीमतों में बढोत्‍तरी व मुनाफे खा जाती है। यूरोप में इसकी आहट के बाद अब दुनिया सस्‍ते व महंगे बाजारों में बंट गई हैं। यूरोप, अमेरिका व जापान जरा सी महंगाई बढ़ने के लिए तरस रहे हैं ताकि मांग बढे। मांग तो भारत व चीन भी चाहिए लेकिन वह महंगाई में कमी के लिए बेताब हैं, ताकि लोग खर्च करने की जगह बना सकें। यूरोप, अमेरिका व जापान के केंद्रीय बैंकों ने डिफ्लेशन थामने के लिए बाजार में पूंजी का पाइप खोल दिया है तो महंगाई से डरे भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी मुट्ठी खोलने से मना कर दिया है। ग्‍लोबल बाजारों के इस ब्रांड न्‍यू परिदृश्‍य में एक तरफ सस्‍ती पूंजी मूसलाधार बरस रही है, तो दूसरी तरफ कम लागत वाली पूंजी का जबर्दस्‍त सूखा है। यह एक नया असंतुलन है जो संभावनाओं व समस्‍याओं का अगला चरण हो सकता है।
यह बहस पुरानी है कि कीमतों का बढ़ना बुरा है या कम होना। वैसे इन्‍फेलशन बनाम  डिफ्लेशन की बहस हमेशा, दोनों की गुणवत्‍ता व संतुलन पर ही खत्‍म होती है जो अब ग्‍लोबल स्‍तर पर बिगड़ गया है। उत्‍पादन, प्रतिस्‍पर्धा या तकनीक बढ़ने से कीमतों कम होना अच्‍छा है। ठीक इसी तरह मांग व खपत बढने से कीमतों में कुछ बढोत्‍तरी आर्थिक सेहत के लिए

Monday, April 29, 2013

उभरते बाजारों की नई पीढ़ी



टिम्‍प अर्थात टर्कीइंडोनेशियामैक्सिको और फिलीपींस। यह उभरते बाजारों की नई पीढ़ी है जो पूंजी के प्रवाह का ग्‍लोबल संतुलन बदलने वाली हैं।
बाजार बडा बेताब है। उसने उभरती दुनिया यानी भारत, ब्राजील, रुस, चीन, दक्षिण अफ्रीका को ज्‍यादा  वक्‍त नहीं दिया। पिछले महीने डरबन में जब, ब्रिक्‍स को तस्‍वीरी आयोजन से बाहर निकालने की पहली गंभीर कोशिश चल रही थी,  ठीक उसी वक्‍त ग्‍लोबल निवेशक लंदन व न्‍यूयार्क के बाजारों में टिम्‍प की ताजपोशी का ऐलान कर रहे थे। टिम्‍प अर्थात टर्की, इंडोनेशिया, मैक्सिको और फिलीपींस। यह उभरते बाजारों की नई पीढ़ी है जो पूंजी के प्रवाह का ग्‍लोबल संतुलन बदलने वाली हैं। इस बदलाव की रोशनी में भारत के लिए मंदी से उबरना अब अनिवार्यता बन गया है। यह संयोग ही है कि महंगाई लेकर विदेशी मुद्रा बाजार तक, आर्थिक उदासी टूटने की ताजा उम्‍मीदें उभरने लगी हैं। सियासत चाहे जितनी भी नकारात्‍मक हो लेकिन उसे इन उम्‍मीदों को सहारा देना ही होगा  क्‍यों कि शेयर बाजारों में विदेशी निवेश ही है जिसने भारत के लिए उम्‍मीदों की बची खुची डोर को थाम रखा था, अब उस पर भी खतरा मंडरा रहा है।  
डरबन की पांचवीं शिखर बैठक में क्षेत्रीय बैंक बनाने को लेकर ब्रिक्‍स की बेचैनी बेसबब नहीं थी।  ब्रिक्‍स की जुटान ठीक पहले टर्नर इन्‍वेस्‍टमेंट की रिपोर्ट से नए उभरते बाजार यानी टर्की, इंडोनेशिया, मैक्सिको और फिलीपींस (टिम्‍प) बाहर आ चुके थे। करीब 11 अरब डॉलर का निवेश संभालने वाली अमेरिकी फर्म टर्नर इन्‍वेस्‍टमेंट ने बताया कि 25 मार्च तक बारह महीने के दौरान ब्रिक्‍स बाजारों का सूचकांक 6.5 फीसदी गिरा है, दूसरी तरफ टिम्‍प के बाजारों ने करीब दस फीसदी से लेकर 37.7 फीसदी तक की बढ़त

Monday, April 22, 2013

लम्‍हों की खता और सदियों की सजा



महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के ताजा कानून के पीछे संवेदना और सजगता की राजनीतिक चेतना नहीं थी बस कानून फेंककर लोगों को किसी तरह चुप करा दिया गया। इसलिए डरावने बताये गए कानून से कोई दुष्‍कर्मी नहीं डरा।


इंसाफ कोई बेरोजगारी भत्‍ता, लैपटॉप या साइकिल नहीं है जिसे बांटकर वोट लिये जा सकें। न्‍याय विशेष राहत पैकेज भी नहीं हैं जिनसे सियासत चमकाई जा सके। इंसाफ में समाज का भरोसा कानून के शब्‍दों से नहीं बल्कि कानून की चेतना से तय होता है। एक कथित सख्‍त कानून से कुछ भी बदला। महिलाओं के खिलाफ अपराध और जघन्‍य हो गए और लोग फिर सड़क पर उतर कर इंसाफ के लिए नेताओं का घर घेर रहे हैं। कानून बेअसर इसलिए हुआ है क्‍यों कि कानून बनाने वालों की सोच ने उसकी भाषा से ज्‍यादा असर किया है। एक बिटिया की हत्‍या के खिलाफ उबले जनआक्रोश के बदले जो कानून मिला उसके पीछे दर्द, संवेदना और सजगता की राजनीतिक चेतना नहीं थी बल्कि कानून फेंकर लोगों को किसी तरह चुप करा दिया गया। पूरे देश ने देखा कि क्रूर अपराधी को अविस्‍मरणीय दंड की बहस, चलाकी के साथ  सहमति से सेक्‍स की उम्र की बहस में बदल गई। नतीजतन इस कथित सख्‍त कानून के शब्‍दों से न अपराधी डरे, न तेज फैसले हुए और  न न्‍याय मिला। हम वहीं खड़े हैं जहां से चले थे।

Monday, April 15, 2013

तीसरी ताकत की वापसी



शिंजो एबे ग्‍लोबल बाजारों के लिए सबसे कीमती नेता हैं। दुनिया की तीसरी आर्थिक ताकत यदि जागती है तो ग्‍लोबल बाजारों का नक्‍शा ही बदल जाएगा। विश्‍व की आर्थिक मुख्‍यधारा में जापान की वापसी बहुत मायने रखती है।

कोई दूसरा मौका होता तो जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे दुनिया में धिक्‍कारे जा रहे होते। लोग उन्‍हें जिद्दी और मौद्रिक तानाशाह कहते क्‍यों कि विश्‍व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था और चौथा सबसे निर्यातक, जब निर्यात बढ़ाने के लिए अपनी मुद्रा का अवमूल्‍यन करने लगे तो मंदी के दौर किसे सुहायेगा। लेकिन हठी व दो टूक शिंजों इस समय दुनिया के सबसे हिम्मती राजनेता बन गए हैं। उन्‍होंने येन के अवमूल्‍यन के साथ जापान की पंद्रह साल पुरानी जिद्दी मंदी के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है और मुद्रा कमजोरी को ताकत बनाने में हिचक रहे अमेरिका व यूरोप को नेतृत्‍व दे दिया है। परंपरावादी, जटिल और राजनीतिक अस्थिरता भरे जापान में सस्‍ता येन, महंगाई और मुक्‍त आयात जैसे रास्‍ते वर्जित हैं अलबत्‍ता शिंजों की एबेनॉमिक्‍स ने इन्‍हीं को अपनाकर जापानी आर्थिक दर्शन को सर के बल खड़ा कर दिया है। यहां से मुद्राओं के ग्‍लोबल अवमूल्‍यन यानी मुद्रा संघर्ष की शुरुआत हो सकती है लेकिन दुनिया को डर नहीं है क्‍यों कि शिंजो मंदी से उबरने की सूझ लेकर आए हैं।
याद करना मुश्किल है कि जापान से अच्‍छी आर्थिक खबर आखिरी बार कब सुनी गई थी। पंद्रह साल में पांच मंदियों का मारा जापान डिफ्लेशन यानी अपस्‍फीति  का शिकार है। वहां कीमतें बढती ही नहीं, इसलिए मांग व मुनाफों में कोई ग्रोथ नहीं है। बीते दो दशक में चौतरफा ग्रोथ के बावजूद जापान की सुस्‍ती नहीं टूटी। 1992 में जापान ने भी, आज के सपेन या आयरलैंड की तरह कर्ज संकट

Monday, April 8, 2013

अवसरों का अपहरण





लोकतंत्र का एक नया संस्‍करण देश को हताश कर रहा है जहां आर्थिक आजादी कुछ सैकड़ा कंपनियों पास बंधक है और राजनीतिक अवसर कुछ सौ परिवारों के पास

मुख्‍यमंत्री ग्रोथ के मॉडल बेच रहे हैं और देश की ग्रोथ का गर्त में है! रोटी, शिक्षा से लेकर सूचना तक, अधिकार बांटने की झड़ी लगी है लेकिन लोग राजपथ घेर लेते हैं! नरेंद्र मोदी के दिलचस्‍प दंभ और राहुल गांधी की दयनीय दार्शनिकता के बीच खड़ा देश अब एक ऐतिहासिक असमंजस में है। दरअसल, भारतीय लोकतंत्र का एक नया संस्‍करण देश को हताश कर रहा है जहां आर्थिक आजादी कुछ सैकड़ा कंपनियों पास बंधक है और राजनीतिक अवसर कुछ सैकडा परिवारों के पास। इस नायाब तंत्र के ताने बाने, सभी राजनीतिक दलों को आपस में जोडते हैं अर्थात इस हमाम के आइनों में, सबको सब कुछ दिखता है इसलिए राजनीतिक बहसें खोखली और प्रतीकात्‍मक होती जा रही हैं जबकि लोगों के क्षोभ ठोस होने लगे हैं।
यदि ग्रोथ की संख्‍यायें ही सफलता का मॉडल हैं तो गुजरात ही क्‍यों उडीसा, मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़, त्रिपुरा, उत्‍तराखंड, सिक्किम भी कामयाब हैं अलबत्‍ता राज्‍यों के आर्थिक आंकड़ों पर हमेशा से शक रहा है। राष्‍ट्रीय ग्रोथ की समग्र तस्‍वीर का राज्‍यों के विपरीत होना आंकड़ों में  संदेह को पुख्‍ता करता है। दरअसल हर राज्‍य में उद्यमिता कुंठित है, निवेश सीमित है, तरक्‍की के अवसर घटे हैं, रोजगार नदारद है और लोग निराश हैं। ग्रोथ के आंकड़े अगर ठीक भी हों तो भी यह सच सामने नहीं आता कि भारत का आर्थिक लोकतंत्र लगभग विकलांग हो गया है। 
उदारीकरण से सबको समान अवसर मिलने थे लेकिन पिछले एक दशक की प्रगति चार-पांच सौ कंपनियों की ग्रोथ में

Monday, April 1, 2013

सर पर टंगा टाइम बम




विदेशी मुद्रा सुरक्षा ही हमारी सबसे कमजोर नस है जो बुरी तरह घायल है। इक्‍यानवे में हम इसी घाट डूबे थे।

भारत अगर डॉलर छाप सकता या आयात का भुगतान रुपये में हो जाता तो सियासत आर्थिक चुनौतियों को किसी भाव नहीं गिनती। शुक्र है कि हम गंजों को ऐसे नाखून नहीं मिले। लेकिन अब तो राजनीति नशा उतरना चाहिए क्‍यों कि भारत विदेशी मुद्रा संकट से बस कुछ कदम दूर है और इस आफत को रुपये छापकर या आंकडों के खेल से रोका नहीं जा सकता। देश के पास महज साढे छह महीने के आयात के लायक विदेशी मुद्रा बची है। विदेशी मुद्रा की आवक व निकासी का फर्क बताने वाले चालू खाते का घाटा फट पड़ने को है। डॉलर के मुकाबले रुपया तीखी ढलान पर टिका है, जहां नीचे गिरावट की गर्त है। दरअसल, भारत अब विदेशी मुद्रा संकट के टाइम बम पर बैठ गया है और उत्‍तर कोरिया में चमकती मिसाइलों से लेकर दरकते यूरोजोन और खाड़ी की चुनौतियों जैसे तमाम पलीते आसपास ही जल रहे हैं।

Sunday, March 31, 2013

उलटा चलो रे !


 ठसक के साथ रुढि़वादी होने की सुविधा और पिछड़ेपन को ब्रांड बनाने का मौका  राजनीति में ही मिल सकता है। हम फिर साबित करने जा रहे हैं कि हम इतिहास से
यही सीखते हैं कि हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा।

तिहास से बचने और अर्थशास्‍त्र से नजरें चुराने एक सिर्फ एक ही रास्‍ता है कि  सियासत की रेत में सर गड़ा दिया जाए। क्‍यों कि ठसक के साथ रुढि़वादी होने की सुविधा और पिछड़ेपन को ब्रांड बनाने का मौका  राजनीति में ही मिल सकता है। पिछडापन तय करने के नए तरीकों और विशेष राज्‍यों के दर्जे की मांग के साथ भारत में सत्‍तर अस्‍सी का दशक जीवंत हो रहा है जब राज्‍यों के बीच बहसें तरक्‍की को लेकर नहीं बल्कि केंद्रीय मदद में ज्‍यादा हिस्‍सा लेने को लेकर होती थीं जिसमें खुद पिछड़ेपन का बहादुर साबित करना जरुरी था।
राज्‍यों के आर्थिक पिछड़ेपन लेकर भारत में अचछी व बुरी नसीहतों का भरपूर इतिहास मौजूद है जो उदारीकरण व निजी निवेश की रोशनी में ज्‍यादा प्रामाणिक हो गया है। उत्त्‍तर पूर्व का ताजा हाल, भौगोलिक पिछड़ापन दूर करने के लिए विशेष दर्जें वाले राज्‍यों की प्रणाली की असफलता का इश्तिहार है। छोटे राज्‍य बनाने की सूझ भी पूरी तरह कामयाब नहीं हुई। पिछड़े क्षेत्रों के लिए विशेष अनुदानों के बावजूद मेवात, बुंदेलखंड, कालाहांडी की सूरत नहीं बदली जबकि राज्‍यों को केंद्रीय सहायता बांटने का फार्मूला कई बार बदलने से भी कोई फर्क नहीं पड़ा। यहां तक कि राज्‍यों को किनारे रखकर सीधे पंचायतों तक मदद भेजने की कोशिशें भी अब दागी होकर निढाल पड़ी हैं। 


केंद्रीय सहायता में आरक्षण यह नई बहस तब शुरु हो रही है जब राज्‍यों में ग्रोथ के ताजा फार्मूले ने पिछड़ापन के दूर करने के सभी पुराने प्रयोगों की श्रद्धांजलियां प्रकाशित कर दी हैं। पिछले एक दशक में यदि उड़ीसा, राजसथान, मध्‍य प्रदेश जैसे बीमारुओं ने महाराष्‍ट्र, पंजाब या तमिलनाडु को पीछे छोड़ा है तो इसमें केंद्र सरकार की मोहताजी नहीं बलिक सक्षम गर्वनेंस, निजी उद्यमिता को प्रोत्‍साहन और दूरदर्शी सियासत काम आई। इसलिए विशेष दर्जे वाले नए राजयों की मांग के साथ न तो इतिहास खड़ा है और न ही उलटे चलने की इस सूझ को अर्थशास्‍त्र का समर्थन मिल रहा है।
इतिहास का सच
1959 में मिजोरम की पहाडि़यों पर बांस फूला था, जिसे खाने के लिए जुटे चूहे बाद में मिजो किसानों के अनाज का बीज तक खा गये। मिजोरम की पहाडि़यों पर अकाल की मौत नाचने लगी। सेना के हवलदार और बाद में आइजोल में क्‍लर्क की नौकरी करने वाले

Monday, March 25, 2013

साइप्रस का सच



साइप्रस काली कमाई की ग्‍लोबल पनाहगाह है और एक टैक्‍स हैवेन को उदारता से उबारने के लिए यूरोप में कोई तैयार नहीं था। 

नैतिक तकाजे अब राजनीतिक और आर्थिक तकाजों पर कम ही भारी पडते हैं। लेकिन जब भी नैतिकता ताकतवर होती है तो सच को छिपाना मुश्किल हो जाता है। कई व्‍यावहारिक झूठ गढते हुए यूरोप अपने आर्थिक ढांचे के उस सच को छिपाने की कोशिश कर रहा था जिसे दुनिया टैक्‍स हैवेन के नाम से जानती है। साइप्रस के संकट के साथ काली कमाई को छिपाने वाले यूरोपीय अंधेरे खुल गए हैं। यह वही साइप्रस है जिसे यूरोपीय संघ में शामिल कराने के लिए ग्रीस ने 2004 में बाकायदा ब्‍लैकमेल किया था और संघ के विस्‍तार की योजना को वीटो कर दिया था। अंतत: इस टैक्‍स हैवेन को एकल यूरोपीय मुद्रा के चमकते मंच पर बिठा लिया गया। लेकिन अब जब साइप्रस डूबने लगा तो यूरो जोन के नेता इसे बचाने के लिए ग्रीस, इटली या स्‍पेन जैसे दर्दमंद इसलिए नहीं हुए क्‍यों कि नैतिकता भी कोई चीज होती है। साइप्रस काली कमाई की ग्‍लोबल पनाहगाह है और एक टैक्‍स हैवेन को उदारता से उबारने के लिए यूरोप में कोई तैयार नहीं है। इसलिए साइप्रस पर सख्‍त शर्तें लगाई गईं और यूरोपीय संकट में पहली बार यह मौका आया जब यूरोपीय संघ अपनी एकता की कीमत पर साइप्रस को संघ से

Monday, March 18, 2013

पिछड़ने का पुरस्‍कार



विशेष राज्‍य की श्रेणी के लिए बेताब राज्‍य सरकारें अपनी दयनीयता के पोस्‍टर बांटना शुरु  करेंगी और ज्‍यादा संसाधनों के लिए केंद्र सरकार के राजनीतिक अहंकार को सहलायेंगी। 

भारत की आर्थिक राजनीति में एक नए दकियानूसी दौर का आगाज हो गया है। केंद्र सरकार पिछड़े राज्‍य चुनने का पैमाना बदलने वाली है यानी कि राज्‍यों के बीच खुद को दूसरे से ज्‍यादा पिछड़ा और दरिद्र साबित करने की प्रतिस्‍पर्धा शुरु होने वाली है। विशेष राज्‍य की श्रेणी के लिए बेताब राज्‍य सरकारें अब अपनी दयनीयता के पोस्‍टर बांटना शुरु कर करेंगी और ज्‍यादा संसाधनों के लिए केंद्र सरकार के राजनीतिक अहंकार को सहलायेंगी। बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार का अभियान शुरु हो गया है, उड़ीसा व बंगाल को इस जुलूस में बुलाया जा रहा है। हकीकत यह है कि केंद्र से राज्‍यों को संसाधन देने का ढांचा पिछले एक दशक में इस कदर बदला है कि केंद्र अब पिछडेपन का तमगा तो दे सकता है लेकिन ज्‍यादा संसाधन नहीं। उत्‍तर पूर्व की हालत, चार दशक पुरानी विशेष राज्‍य प्रणाली की समग्र असफलता का दस्‍तावेजी प्रमाण हैं। इसलिए नए गठबंधन जुगाड़ने का यह कांग्रेसी पैंतरा अंतत: राज्‍यों की मोहताजी और विभाजक सियासत की नई नुमाइश शुरु करने वाला है।  
भारत में 1969 तक राज्‍यों के बीच आम व खास कोई फर्क नहीं था। पांचवे वित्‍त आयोग ने जटिल भौगोलिक स्थिति, कम व बिखरी जनसंख्‍या, सीमित राजस्‍व और अंतरराष्‍ट्रीय सीमा पर स्थिति को देखते हुए