Monday, December 15, 2014

वाजपेयी,गवर्नेंस और मोदी


वाजपेयी की गवर्नेंस की रोशनी में मोदी सरकार को परखनाकीमती निष्कर्ष उपलब्ध कराता है.
ह अक्तूबर 1998 की दोपहर थी. वाजपेयी सरकार की दूसरी पारी को कुछ महीने बीते थे और मेल-मोबाइल से परे उस दौर में सरकार की रणनीति के सूत्रधार प्रमोद महाजन से मिलने के लिए अशोक रोड के बीजेपी दफ्तर में बाट जोहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. कमरे में घुसते ही महाजन मुस्कराए, टेलीकॉम! मैंने तुरंत सवाल दागा कि लाइसेंसों का क्या होगा? महाजन ने कुछ सोचते हुए कहा, ''नई दूरसंचार नीति लाएंगे और क्या?” दूरसंचार के उदारीकरण को पहले दिन से रिपोर्ट कर रहे मेरे जैसे पत्रकार के लिए महाजन की टिप्पणी, सनसनीखेज से कम कुछ भी नहीं थी. नेशनल टेलीकॉम पॉलिसी (1994) को सिर्फ चार साल बीते थे. टेलीकॉम क्षेत्र विवादों का एक्सचेंज बन गया था. ऊंची बोली लगाकर बुरी तरह फंस चुकी कंपनियां लाइसेंस फीस देने की स्थिति में नहीं थीं. इस बीच केंद्र में तीन सरकारें गुजर चुकी थीं और वाजपेयी सरकार की दूसरी पारी में भी दो संचार मंत्री (बूटा सिंह और सुषमा स्वराज) रुखसत हो चुके थे. संचार मंत्रालय तब प्रधानमंत्री के पास था और महाजन उनके सलाहकार थे. मैंने महाजन से पूछा कि अभी तो पिछली नीति ही लागू नहीं हुई है? उन्होंने कहा, ''वाजपेयी जी चाहते हैं विवादों का कीचड़ साफ करने के लिए नई नीति बनाई जाए. हम बजट तक इसे ले आएंगे.मार्च,1999 में नई दूरसंचार नीति लागू हो गई और उसके बाद भारत की टेलीकॉम क्रांति दुनिया के लिए अध्ययन का सबब बन गई.
वाजपेयी की गवर्नेंस की रोशनी में मोदी सरकार को परखना, कीमती निष्कर्ष उपलब्ध कराता है. दूरसंचार निजीकरण के पहले दौर (1995) में लाइसेंसों के लिए ऊंची बोली लगाना कंपनियों की गलती थी. लेकिन गठजोड़ की सरकार के लिए अस्थिर राजनैतिक माहौल में इस फैसले को पलटना, लाइसेंस फीस माफ करना और नई नीति लाना सियासी जोखिम का चरम था क्योंकि 50,000 करोड़ रु. के घोटाले (लाइसेंस फीस माफी) के आरोप सरकार का इंतजार कर रहे थे.
तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने अपनी किताब कन्फेशंस ऑफ अ स्वदेशी रिफॉर्मर में स्वीकार किया कि ''यह फैसला नैतिक रूप से कठिन था.यह संवेदनशील फैसला सिर्फ वाजपेयी के राजनैतिक साहस से निकला था कि दूरसंचार क्षेत्र में तरक्की के लिए कंपनियों का 'बेल आउटजरूरी है. यह फैसला न सिर्फ संसद और अदालत में सही साबित हुआ बल्कि करोड़ों हाथों में मौजूद मोबाइल फोन आज भी इसकी तस्दीक करते हैं.
राजनैतिक साहस का इम्तिहान चुनाव नहीं, सरकारें लेती हैं, जब संकट प्रबंधन की चुनौती मेज पर होती है. मोदी सरकार को दो संकट विरासत में मिले. एक कोयला और प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन और दूसरा डूबते कर्ज से दबे बैंक. इन दोनों को ठीक किए बिना ग्रोथ और नई नौकरियां नामुमकिन हैं. इन संकटों के समाधान के जरिए प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन और बैंकिंग में दूरदर्शी बदलाव हो सकते हैं, जो टेलीकॉम में हुआ था.
कोयला खदानों का आवंटन रद्द हुए चार माह बीत रहे हैं. हमारे पास सिर्फ एक कामचलाऊ फैसला है जिसके जरिए रद्द की गई खदानें अगले साल मार्च तक आवंटित हो जाएं तो बड़ी बात होगी. समग्र खनन सुधार चर्चा में नहीं है और सड़ती बैंकिंग पर जन-धन का पोस्टर लगा दिया गया है. वाजपेयी के पास मोदी जैसा संख्या बल नहीं था. तेरह माह बाद अप्रैल, 1999 में जयललिता ने समर्थन खींचकर सरकार को कार्यवाहक बना दिया लेकिन नई दूरसंचार नीति सिर्फ तीन माह (दिसंबर,1998-मार्च,1999) में बन गई. एक कमजोर सरकार में गवर्नेंस की यह साहसी रफ्तार हर तरह से अनोखी थी.
सरकारें, सूझ-बूझ, दूरदर्शिता और कालजयी फैसलों से परखी जाती हैं. आर्थिक सुधारों के सूत्रधार डॉ. मनमोहन सिंह के दस साल और नरेंद्र मोदी के छह माह देखने के बाद ऐसा लगता है कि वाजपेयी सरकार मानो, दूरदर्शिता के शून्य से भरे अगले दस साल और छह माह के लिए ही नीतियों का ईंधन जुटा रही थी. घाटे नियंत्रित करने वाला बजट मैनेजमेंट कानून, कम्पीटिशन कानून, स्वदेशी के आग्रहों को नकार कर डब्ल्यूटीओ नियमों के तहत भारतीय बाजार के दरवाजे खोलना, सरकारी उपक्रमों का सबसे बड़ा निजीकरण, फेरा की समाप्ति और नया कानून, पेट्रोलियम सुधार, सड़क परियोजनाएं, कंपनियों को विदेशी कर्ज की छूट, दूरसंचार और सूचना तकनीक सेवाओं में सिलसिलेवार उदारीकरण...साहस और सूझ-बूझ की फेहरिस्त वाकई बड़ी लंबी है.
गठजोड़ की सरकार में वाजपेयी इतना कुछ कैसे कर सके? शायद इसलिए कि उनके पास गवर्नेंस के लक्ष्यों का रोड मैप था और दंभ रहित, जिंदादिल और ठहाकेबाज वाजपेयी ने अपने मंत्रियों को दूर की सोचने तथा फैसले करने की छूट दी थी. जबरदस्त बहुमत वाली मोदी सरकार में इन दोनों की कमी बुरी तरह खलती है. वाजपेयी ऐसा इसलिए भी कर सके क्योंकि उन्होंने प्रचार के कंगूरे नहीं बल्कि गवर्नेंस की बुनियाद गढ़ी थी. चुनाव तब भी होते थे. अलबत्ता वाजपेयी गवर्नेंस के लिए राजनीति कर रहे थे, राजनीति के लिए गवर्नेंस नहीं.
एक वरिष्ठ उद्योगपति ने मई में चुनाव नतीजों के बाद मुझसे कहा था कि वाजपेयी सरकार ने पांच साल में जितना काम किया, अगर मोदी उसका 30 फीसदी भी कर दें तो देश की ग्रोथ को 15 साल का ईंधन मिल जाएगा. अपनी तीसरी पारी के पहले स्वाधीनता दिवस (2000) पर लाल किले से वाजपेयी ने आह्वान किया था कि भारत को अगले एक दशक में अपनी प्रति व्यक्ति आय दोगुनी करनी होगी. 2007-08 में यह लक्ष्य हासिल हो गया. महंगाई को निकाल दें तो भी प्रति व्यक्ति आय 50 फीसदी बढ़ी है जो 125 करोड़ की आबादी के लिए छोटी बात नहीं है. क्या नरेंद्र मोदी के पहले छह महीनों से यह भरोसा मिलता है कि अगले एक दशक में यह करिश्मा दोहराया जाएगा? प्रचार भरे छह माह के साथ मोदी सरकार के कार्यकाल का दस फीसदी हिस्सा गुजर गया है लेकिन सरकार में वह हिम्मत, सूझ और दूरदर्शिता अब तक नदारद है जो वाजपेयी सरकार के पहले हफ्तों में ही नजर आ गई थी.

Monday, December 8, 2014

सियासत के झूठे सच

पैसे के बाद अगर कोई दूसरी चीज राजनीति के साथ गहराई तक गुंथी हैतो वह नेताओं के झूठ व बड़बोलापन है. चुनावों की प्रतिस्पर्धी राजनीति में दूरदर्शिता और दूर की कौड़ी के बीच विभाजक रेखा पतली है. नेता अक्सर इसे लांघ कर चांद-तारे बांटने लगते हैं

विदेश में जमा काला धन वापस लाने के वादे पर मोदी सरकार की किरकिरी को समझने के लिए खोजी पत्रकार होने की जरूरत नहीं है. कोई भी सर्च इंजन, एक क्लिक पर आपके सामने मोदी के चुनावी भाषणों के दर्जनों वीडियो उगल देगा, जो यह बताते हैं कि काले धन पर तब क्या-क्या कहा गया था और अब क्या फरमाया जा रहा है? गूगल की थोड़ी-सी मदद से अब, नेताओं के झूठ, अर्धसत्य व कुछ भी बोल देने के नमूनों का पिटारा खुल जाता है और सियासत कुछ ज्यादा ही खोखली नजर आने लगती है. राजनीति ही इकलौता पेशा है जिसमें झूठ बोलना, वादे करना और मुकर जाना, कानूनी तौर पर मान्य है. इसलिए अगर तकनीक की मदद न आती तो, सियासत के झूठे सचों पर लगाम के बारे में सोचना भी मुश्किल था. तकनीक, शोध और खोजी पत्रकारिता ने, अमेरिका में सियासी भाषणों और बयानों के झूठ उघाड़कर नेताओं को शर्मिंदा करने का अभियान एक दशक पहले ही शुरू कर दिया था. भारत में नेताओं के मनमाने बयानों की तासीर परखने का प्रचलन इसलिए जड़ें नहीं पकड़ पाया क्योंकि इस हमाम में कपड़े न पहनने की रवायत सभी सियासी दलों ने मिलकर बनाई है. लेकिन अब मौका भी है और साधन भी, जिनके जरिए भारत में भी नेताओं के लिए कुछ भी बोल-बताकर बच निकलने के रास्ते बंद किए जाने चाहिए.
‘‘
धोखा देने और झूठ बोलने के मामले में अव्वल कौन है? मोअम्मर गद्दाफी, होस्नी मुबारक, सद्दाम हुसैन जैसे तानाशाह या जिमी कार्टर, जॉर्ज डब्ल्यू. बुश या बराक ओबामा जैसे लोकतांत्रिक दिग्गज?’’
वाशिंगटन पोस्ट ने यह सवाल, अप्रैल 2011 में एक किताब की समीक्षा में पूछा था. किताब थी व्हाइ लीडर्स लाइ? ट्रूथ अबाउट लाइंग इन इंटरनेशनल पॉलिटिक्स (नेता झूठ क्यों बोलते हैं? अंतरराष्ट्रीय राजनीति में झूठ का सच) शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रो. जॉन जे. मर्शेइमर की यह दिलचस्प और अनोखी पुस्तक मानती है कि गलतबयानी करने में लोकतांत्रिक नेता, तानाशाहों से कहीं आगे हैं. राजनीति और खास तौर पर चुनावी सियासत में कुछ भी कह देना या आसमान के सितारे तोडऩे छाप वादे करना गैर-कानूनी नहीं हैं, इसलिए नेताओं के झूठ सियासत का स्वभाव बन गए हैं. बड़े और प्रभावशाली झूठ के उदाहरण जुटाते हुए मर्शेइमर की किताब यह भी बताती है कि नेताओं के झूठ की एक नहीं, कई किस्में हो सकती हैं. ग्रीस (यूनान) का हाल बताता है कि नेताओं के झूठ कितने महंगे पड़ते हैं. ग्रीस ने यूरोपीय संघ का हिस्सा बनने के लिए अपने बजट घाटों को छिपाया और बाद में पूरा देश ही दिवालिया हो गया. यही वजह है कि जैसे ही बयानों व दस्तावेजों को संजोने और वापस तलाशने की तकनीक हाथ आई, दुनिया के कई देशों में जनता नेताई वचनों का सच जांचने के लिए उतावली हो उठी. पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका में सियासी बयानों की फैक्ट चेकिंग एक अभियान बन गई है. अखबारों से लेकर स्वयंसेवी संस्थाएं तक फैक्ट चेकर और ट्रुथ-ओ-मीटर पर सियासी बयानों की सच्चाई नापती हैं, चुनावी वादों का क्रियान्यावन परखती हैं और भाषणों व वादों को ‘‘सफेद झूठ’’, ‘‘आधा सच’’ और ‘‘सच’’ जैसी रेटिंग देती हैं. अमेरिका में चुनावी विज्ञापनों को रोकने पर मजेदार कानूनी लड़ाई शुरू हो चुकी है. चुनावी बयानबाजी के पैरोकार नेताओं के बड़बोले भाषणों को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ रहे हैं जबकि विरोधी इसे जनता के साथ धोखा मानते हैं.
चुनावों की प्रतिस्पर्धी राजनीति में दूरदर्शिता और दूर की कौड़ी के बीच विभाजक रेखा पतली है. नेता अक्सर इसे लांघ जाते हैं और चांद-तारे तोड़कर बांटने लगते हैं. भारत की सियासत ने भी गरीबी हटाने व हर हाथ को काम जैसे सपने बांटे हैं, तल्ख, धीमी व कठिन गवर्नेंस ने जिन्हें हमेशा झूठा साबित कर दिया है क्योंकि मौजूदा शहरों का इंतजाम ठीक करते हुए ही स्मार्ट सिटी का प्रयोग हो सकता है, ट्रेनों का सुरक्षित चलना तय करने के साथ बुलेट ट्रेन सोची जा सकती है, कमाई का स्तर बढ़ाकर सबके सिर पर छत का सपना संजोया जा सकता है. फिर भी शुक्र है कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में है जहां लोग लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं में भरोसा करते हैं. विज्ञापन एजेंसी एडलमैन का ग्लोबल ट्रस्ट सर्वे इस साल जनवरी में आया था जो बिजनेस, सरकार, मीडिया और स्वयंसेवी संस्थाओं पर, सजग लोगों के भरोसे की पैमाइश करता है. यह सर्वे भारत को उन पांच शीर्ष देशों में रखता है, जो विश्वास से भरपूर हैं, अलबत्ता सरकार पर भरोसा घटने के कारण भारत 2014 में इस रैंकिंग में तीसरे से पांचवें स्थान पर खिसक गया है. सरकार पर विश्वास में यह कमी नेताओं के बड़बोलेपन से उपजी है. चुनाव अभियानों के वादे ढहने से पहले केवल एक निराशा फैलती थी लेकिन अब पढ़ा-लिखा समाज के वादे पूरे न होने के बाद इनके पीछे के षड्यंत्र तलाशता है, ऊबता है और संदेह से भर उठता है. पैसे के बाद अगर कोई दूसरी चीज राजनीति के साथ गहराई तक गुंथी है, तो वह नेताओं के झूठ व बड़बोलापन है. इस झूठ की वजहें खंगालने वाले मर्शेइमर का दिलचस्प निष्कर्ष है कि नेता आपस में एक-दूसरे से उतना झूठ नहीं बोलते जितना कि वे जनता से बोलते हैं. ये झूठ बड़े मिथकों, तरह-तरह के वादों (लिबरल लाइज) और खौफ फैलाने के तरीकों में लपेटे जाते हैं और चुनावों में इनका भरपूर इस्तेमाल होता है. भारत का ताजा लोकसभा चुनाव भी इससे अलग नहीं था. यह चुनाव वादों, घोषणाओं और अपेक्षाओं का सबसे मुखर उत्सव तो था ही लेकिन किस्मत से इस बार तकनीक हर कदम पर साथ थी, अब यही तकनीक हमारे दुलारे नेताओं को उनके बोल-वचन दुरुस्त करने पर मजबूर करेगी. क्योंकि नेता इस चुनाव में जिस आधुनिक समाज से मुखातिब थे वह ठगे जाने के एहसास से सबसे ज्यादा चिढ़ता है.


Monday, December 1, 2014

छह महीने और तीन प्रतीक


सरकारों को हमेशा उलटी तरफ से देखना बेहतर होता है. सरकार के छह माह नहीं बीते हैं बल्कि प्रधानमंत्री के पास केवल साढ़े चार साल बचे हैं 

मोदी सरकार के पहले मंत्रिमंडल विस्तार, अडानी की विवादित ऑस्ट्रेलियाई परियोजना को स्टेट बैंक से कर्ज की मंजूरी और ‘‘प्रागैतिहासिक’’ किसान विकास पत्र की वापसी के बीच क्या रिश्ता है? यह तीनों ही नई सरकार और उसके प्रभाव क्षेत्र के सबसे बड़े फैसलों में एक हैं, अलबत्ता इन्हें आपस में जोडऩे वाला तथ्य कुछ दूसरा ही है. इनके जरिए सरकार चलाने का वही दकियानूसी मॉडल वापस लौटता दिख रहा है, जिसे बदलने की उम्मीद और संकल्पों के साथ नई सरकार सत्ता में आई थी और उपरोक्त तीनों फैसले अपने अपने क्षेत्रों में नई बयार का प्रतीक बन सकते थे.
बड़े बदलावों की साख तभी बनती है जब बदलाव करने वाले उस परिवर्तन का हिस्सा बन जाते हैं. मोदी सरकार के पहले मंत्रिमंडल विस्तार ने नई गवर्नेंस में बड़े बदलाव की उम्मीद को छोटा कर दिया. बड़े मंत्रिमंडलों का आविष्कार गठबंधन की राजनीति के लिए हुआ था. महाकाय मंत्रिमंडल न तो सक्षम होते हैं और न ही सुविधाजनक. बस, इनके जरिए सहयोगी दलों के बीच सत्ता को बांटकर सरकार के ढुलकने का खतरा घटाया जाता था. नरेंद्र मोदी गठबंधनों की राजनीति की विदाई के साथ सत्ता में आए थे. उनके सामने न तो, कई दलों को खपाने की अटल बिहारी वाजपेयी जैसी मजबूरियां थीं न ही मनमोहन सिंह जैसी राजनैतिक बाध्यताएं, जब राजनैतिक शक्ति 10 जनपथ में बसती थी. सरकार और पार्टी पर जबरदस्त नियंत्रण से लैस मोदी के पास एक चुस्त और चपल टीम बनाने का पूरा मौका था. 
मनमोहन सिंह कई विभाग और बड़ी नौकरशाही छोड़कर गए थे, मोदी सरकार में भी नए विभागों के जन्म की बधाई बजी है. कुछ विभागों में तो एक मंत्री के लायक भी काम नहीं है जबकि कुछ विभाग चुनिंदा स्कीमें चलाने वाली एजेंसी बन गए हैं. कांग्रेस राज ने मनरेगा, सर्वशिक्षा जैसी स्कीमों से एक नई समानांतर नौकरशाही गढ़ी थी, वह भी जस-की-तस है. दरअसल, स्वच्छता मिशन, आदर्श ग्राम, जनधन जैसी कुछ बड़ी स्कीमें ही सरकार का झंडा लेकर चल रही हैं, ठीक इसी तरह चुनिंदा स्कीमों का राज यूपीए की पहचान था. अब वित्त मंत्री, विभागों के खर्चे काट रहे हैं जबकि प्रधानमंत्री ने सरकार का आकार बढ़ा दिया है. लोग कांग्रेस की ‘‘मैक्सिमम’’ गवर्नेंस को ‘‘मिनिमम’’ होते देखना चाहते थे, एक नई ‘‘मेगा’’ गवर्नेंस तो कतई नहीं.
बीजेपी इतिहास का पुनर्लेखन करना चाहती है, लेकिन इसके लिए हर जगह इतिहास से दुलार जरूरी तो नहीं है? किसान विकास पत्र 1 अप्रैल, 1988 को जन्मा था जब बहुत बड़ी आबादी के पास बैंक खाते नहीं थे और निवेश के विकल्प केवल डाकघर तक सीमित थे. अगर बचतों पर राकेश मोहन समिति की सिफारिशें लागू हो जातीं, तो इसे 2004 में ही विश्राम मिल गया होता. रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर श्यामला गोपीनाथ की जिन सिफारिशों पर 2011 में यह स्कीम बंद हुई थी उनमें केवल किसान विकास पत्र के मनी लॉन्ड्रिंग में इस्तेमाल का ही जिक्र नहीं था बल्कि समिति ने यह भी कहा था कि भारत की युवा आबादी को बचत के लिए नए आधुनिक रास्ते चाहिए, प्रागैतिहासिक तरीके नहीं.
किसान विकास पत्र से काले धन की जमाखोरी बढ़ेगी या नहीं, यह बात फिर कभी, फिलहाल तो इस 26 साल पुराने प्रयोग की वापसी सरकार में नई सूझ की जबरदस्त कमी का प्रतीक बनकर उभरी है. नए नए वित्तीय उपकरणों के इस दौर में वित्त मंत्रालय, रिजर्व बैंक और तमाम विशेषज्ञ मिलकर एक आधुनिक बचत स्कीम का आविष्कार तक नहीं कर सके. बचत को बढ़ावा देने के लिए उन्हें उस उपकरण को वापस अमल में लाना पड़ा जिसे हर तरह से इतिहास का हिस्सा होना चाहिए था क्योंकि यह उन लोगों के लिए बना था जिनके पास बैंक खाते नहीं थे. अब तो लोगों के पास जन धन के खाते हैं न?
‘‘भारत का सिस्टम बड़ी कंपनियों के हक में है. मंदी के दौरान किस बड़े कॉर्पोरेट को अपना घर बेचना पड़ा?’’ वर्गीज कुरियन लेक्चर (रूरल डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट, आणंद-25 नवंबर) में रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन की बेबाकी उस पुरानी बैंकिंग की तरफ संकेत था, जहां से अडानी की ऑस्ट्रेलियाई कोयला खदान परियोजना को कर्ज की मंजूरी निकली थी. इस परियोजना को कर्ज देने के लिए स्टेट बैंक का अपना आकलन हो सकता है तो दूसरी तरफ उन छह ग्लोबल बैंकों के भी आकलन हैं जो इसे कर्ज देने को जोखिम भरा मानते हैं.
वित्तीय बहस से परे, सवाल बैंकिंग में कामकाज के उन अपारदर्शी तौर तरीकों का है जिसके कारण रिजर्व बैंक को यह कहना पड़ा कि बैंक फंसे हुए कर्जे छिपाते हैं, बड़े कर्जदारों पर कोई कार्रवाई नहीं होती जबकि छोटा कर्जदार पिस जाता है. भारत की बैंकिंग गंभीर संकट में है, इसे अपारदर्शिता और कॉर्पोरेट बैंकर गठजोड़ ने पैदा किया है, जो बैंकों को डुबाने की कगार पर ले आया है. ग्रोथ के लिए सस्ता कर्ज चाहिए, जिसके लिए पारदर्शी और सेहतमंद बैंक अनिवार्य हैं. मोदी सरकार ने पहले छह माह में भारतीय बैंकिंग में परिवर्तन का कौल नहीं दिखाया, अलबत्ता देश के सबसे बड़े बैंक ने विवादित बैंकिंग को जारी रखने का संकल्प जरूर जाहिर कर दिया.

मोदी पिछले तीन दशक में भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिनके पास किसी भी परिवर्तन को साकार करने का समर्थन उपलब्ध है लेकिन बदलाव के बड़े मौकों पर परंपरा और यथास्थितिवाद का लौट आना निराशाजनक है. मोदी प्रतीकों के महारथी हैं. उनके पहले छह माह प्रभावी प्रतीक गढऩे में ही बीते हैं लेकिन नई गवर्नेंस, फैसलों की सूझ और पारदर्शिता का भरोसा जगाने वाले ठोस प्रतीकों का इंतजार अभी तक बना हुआ है. सरकारों को हमेशा उलटी तरफ से देखना बेहतर होता है. सरकार के छह माह नहीं बीते हैं बल्कि प्रधानमंत्री के पास केवल साढ़े चार साल बचे हैं और वक्त की रफ्तार उम्मीदों का ईंधन तेजी से खत्म कर रही है.
http://aajtak.intoday.in/story/six-months-and-three-symbols-1-789686.html

Monday, November 24, 2014

मोदी के भारतवंशी


भारतवंशियों पर मोदी के प्रभाव को समझने के लिए शेयर बाजार को देखना जरुरी है. यहां इस असर की ठोस पैमाइश हो सकती है. इन अनिवासी भारतीय पेश्‍ोवरों की अगली तरक्की, अब प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत की सफलता से जुड़ी है.
मोदी सरकार बनाने जा रहे हैं इसमें रत्ती भर शक नहीं है. आप यह बताइए कि आर्थिक सुधारों पर स्वदेशी के एजेंडे का कितना दबाव रहेगा?” यह सवाल भारतीय मूल के उस युवा फंड मैनेजर का था जो इस साल मार्च में मुझे हांगकांग में मिला था, जब नरेंद्र मोदी का चुनाव अभियान में देश को मथ रहा था. वन एक्सचेंज स्क्वायर की गगनचुंबी इमारत के छोटे-से दफ्तर से वह, ऑस्ट्रेलिया और जापान के निवेशकों की भारी पूंजी भारतीय शेयर बाजार में लगाता है. हांगकांग की कुनमुनी ठंड के बीच इस 38 वर्षीय फंड मैनेजर की आंखों में न तो भावुक भारतीयता थी और न ही बातों में सांस्कृतिक चिंता या जड़ों की तलाश, जिसका जिक्र विदेश में बसे भारतवंशियों को लेकर होता रहा है. वह विदेश में बसे भारतवंशियों की उस नई पेशेवर पीढ़ी का था जो भारत की सियासत और बाजार को बखूबी समझता है और एक खांटी कारोबारी की तरह भारत की ग्रोथ से अपने फायदों को जोड़ता है. भारतवंशियों की यह प्रोफेशनल और कामयाब जमात प्रधानमंत्री मोदी की ब्रांड एंबेसडर इसलिए बन गई है क्योंकि उनके कारोबारी परिवेश में उनकी तरक्की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत की सफलता से जुड़ी है. यही वजह है कि भारत को लेकर उम्मीदों की अनोखी ग्लोबल जुगलबंदी न केवल न्यूयॉर्क मैडिसन स्क्वेयर गार्डन और सिडनी के आलफोंस एरिना पर दिखती है बल्कि इसी फील गुड के चलते, शेयर बाजार बुलंदी पर है. इस बुलंदी में उन पेशेवर भारतीय फंड मैनेजरों की बड़ी भूमिका है जिनमें से एक मुझे हांगकांग में मिला था.
भारत के वित्तीय बाजारों में विदेशी निवेश की एक गहरी पड़ताल उन मुट्ठी भर भारतीयों की ताकत बताती है जो मोदी की उम्मीदों के सहारे

Monday, November 17, 2014

मोदी की कूटनीतिक करवट


अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत ने अपना हमसफर चुन लिया है. जी 20 की बैठक के बाद अगर भारत और अमेरिका की दोस्ती देखने लायक होगी तो भारत और चीन के रिश्तों का रोमांच भी दिलचस्‍प रहेगा

मेरिकी अभियान की सफलता के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सलाहकारों को यह एहसास हो गया था कि तमाम पेचोखम से भरपूर, व्यापार की ग्लोबल कूटनीति में भारत कुछ अलग-थलग सा पड़ गया है. चीन और अमेरिका की जवाबी पेशबंदी जिस नए ग्लोबल ध्रुवीकरण की शुरुआत कर रही है, दो विशाल व्यापार संधियां उसकी धुरी होंगी. अमेरिका की अगुआई वाली ट्रांस पैसिफिक नेटवर्क (टीपीपी) और चीन की सरपरस्ती वाली एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक) अगले कुछ वर्षों में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को निष्प्रभावी कर सकती हैं. इन दोनों संधियों में भारत का कोई दखल नहीं है और रहा डब्ल्यूटीओ तो वहां भी एक बड़ा समझैता रोक कर भारत हाशिए पर सिमटता जा रहा था. यही वजह थी कि जी20 के लिए प्रधानमंत्री के ब्रिस्बेन पहुंचने से पहले भारत के कूटनीतिक दस्ते ने न केवल अमेरिका के साथ विवाद सुलझकर डब्ल्यूटीओ में गतिरोध खत्म किया बल्कि दुनिया को इशारा भी कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत ने अपना हमसफर चुन लिया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र् मोदी की कूटनीतिक वरीयताएं स्पष्ट होने लगी हैं. राजनयिक हलकों में इसे लेकर खासा असमंजस था कि चीन के आमंत्रण के बावजूद, प्रधानमंत्री एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग शिखर बैठक के लिए बीजिंग क्यों नहीं गए?

Monday, November 10, 2014

गवर्नेंस का राजनैतिक असमंजस

राज्य सरकारें नौकरशाही की चुस्ती से काम चला सकती हैं लेकिन केंद्र सरकार के निर्णय राजनैतिक शिखर से निकलते हैंजिनसे गवर्नेंस की दिशा तय होती है.कई महत्वपूर्ण नीतियों की राजनैतिक दिशा अब तक धुंधली है इसलिए प्रशासनिक असमंजस बढ़ रहा है।

रकारी तंत्र में बैठे हुए लोग उसके लिए क्या उपाय करेंगे, जो गंदगी पुरानी है. यह बहुत बड़ी चुनौती है. राष्ट्र के नाम रेडियो संबोधन मन की बात में प्रधानमंत्री ने गवर्नेंस के जिस असमंजस को स्वच्छता अभियान के संदर्भ में जाहिर किया था, वही बात वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से कही कि आर्थिक स्थिति सुधरने में वक्त लगेगा. मोदी-जेटली के इशारे साफ हैं. उम्मीदों की उड़ान के पांच माह बाद सरकार में यथार्थवाद थिरने लगा है. कई महत्वपूर्ण नीतियों की राजनैतिक दिशा अब भी धुंधली है इसलिए प्रशासनिक गलियारों में जन कल्याण की स्कीमों से लेकर आर्थिक सुधारों तक संशय जड़ें जमाने लगा है. सरकार और बीजेपी संगठन के के साथ ताजा संवादों में भी यह तथ्य उभरा है कि अब सरकारी नीतियों की राजनैतिक दिशा निर्धारित करनी होगी ताकि वह फर्क नजर आ सके, जिसे लाने की आवाज बड़े जोर से लगाई गई थी.
ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम (मनरेगा) को जारी रखने को लेकर अर्थशास्त्रियों का खत इसी संशय की उपज था कि मोदी सरकार जनकल्याण की स्कीमों को लेकर कौन-सा मॉडल अपनाएगी? सरकार का अधकचरा जवाब आया कि मनरेगा कुछ बदलावों के साथ बनी रहेगी. इसने जनकल्याण की स्कीमों के मोदी मॉडल को लेकर ऊहापोह और बढ़ा दी. सवाल मनरेगा का नहीं बल्कि उस मॉडल के स्वीकार या नकार का है जिसे कांग्रेस ने

Monday, November 3, 2014

सबसे बड़ा ‘स्वच्छता’ मिशन

काले धन के खिलाफ देश में गुस्सा है। अदालतें सक्रिय हैं। पारदर्शिता के ग्‍लोबल अाग्रह बढ़ रहे हैं।  अर्थव्यवस्था से कालिख की सफाई के एक संकल्पबद्ध अभियान के लिए उपयुक्‍त मौका है लेकिन भारत के इतिहास का सबसे भव्य व महंगा चुनाव लडऩे वाली पार्टी की सरकार क्या इतनी साहसी साबित होगी? 
न् 1963. अमेरिकी सीनेट कमेटी की सुनवाई. जोसेफ वेलाची यानी अमेरिका के पहले घोषित माफिया डॉन ने जैसे ही कबूला कि मुल्क में अपराधियों की समानांतर सरकार (कोजा नोस्त्रा) चलती है तो सांसद समझ गए कि आर्थिक व सामाजिक अपराध के विशाल नेटवर्क के सामने अब मौजूदा कानून बोदे हैं. वेलाची की गवाही के बाद अमेरिका में एक तरफ माफिया की दंतकथाएं बन रहीं थी तो दूसरी तरफ नीति-निर्माता, कानूनविद रॉबर्ट ब्लेकी की मदद से, एक बड़े कानून की तैयारी में जुटे थे. मारियो पुजो के क्लासिक उपन्यास गॉड फादर (1969) के प्रकाशन के ठीक साल भर बाद 1970 में रैकेटियर इन्फ्लुएंस्ड ऐंड करप्ट ऑर्गेनाइजेशंस (रीको) ऐक्ट पारित हुआ. रीको कानून माफिया तक ही सीमित नहीं रहा. हाल में मेक्सिको की खाड़ी में तेल रिसाव से हर्जाना वसूलने से लेकर पोंजी स्कीम चलाने वाले रॉबर्ट मैडॉफ को घेरने तक में इसका इस्तेमाल हुआ है. विदेशों में जमा काले धन का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद, भारत में भी श्रीको मूमेंट्य आ गया है और अगर नहीं, तो आ जाना चाहिए. भारत में अब काले धन को थामने के उपायों की एक बड़ी मुहिम शुरू हो सकती है जिसके कारखाने व ठिकाने तमाम कारोबारों, वित्तीय संस्थानों, जमीन-जायदाद से लेकर राजनैतिक दलों के चंदे तक फैले हैं. यह सबसे बड़ा स्वच्छता मिशन होगा, जिसका इंतजार  दशकों से हो रहा है और पीढिय़ों तक याद किया जाएगा. 
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Monday, October 27, 2014

कालिख छिपाने की रवायत

काले धन की बहस को नामों में उलझा कर सख्‍त गोपनीयता बनाये रखने का रास्‍ता तलाश लिया गया है। विदेशी खातों तक पहुंचने का रास्ता देश के भीतर पारदर्शिता से होकर जाता है, जिसे बनाने का दम-खम अभी तक नजर नहीं आया है. 

जायज कामों के लिए स्विस बैंकों का इस्तेमाल करने वाले अमेरिकी भी अब एक हलफनामा भरते हैं जिसके आधार पर अमेरिकी टैक्स प्रशासन से सूचनाएं साझा की जाती हैं. दुनिया के धनकुबेरों की रैंकिंग करने वाली एक प्रतिष्ठित पत्रिका के मुताबिक ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि अमेरिकी सरकार ने बेहद आक्रामक ढंग से स्विस बैंकों से अमेरिकी लोगों के काले धन की जानकारियां निकाल ली हैं और बैंकों को सख्त शर्तों से बांध दिया है जिसके बाद अमेरिका के लिए स्विस बैंकों की मिथकीय गोपनीयता का खात्मा हो गया है.
काले धन की जन्नतों के परदे नोचने का यही तरीका है. भारत के लोग जब अपनी नई सरकार से इसी तरह के दम-खम की अपेक्षा कर रहे थे तब सरकार सुप्रीम कोर्ट में काले धन के विदेशी खातों का खुलासा करने से मुकरते हुए गोपनीयता के उस खोल में घुस गई, जिससे उसे ग्लोबल स्तर पर जूझना है. सूचनाएं छिपाना काले धन के कारोबार की अंतरराष्ट्रीय ताकत है, जिसे तोड़ने के लिए विकसित देशों के बीच कर सूचनाओं के आदान-प्रदान का नया तंत्र तैयार है. भारत को गोपनीयता के आग्रह छोड़कर इस का हिस्सा बनने की मुहिम शुरू करनी थी, ताकि काले धन के विदेशी खातों तक पहुंचा जा सके. 

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Tuesday, October 21, 2014

अब अकेले नहीं बनेगी बात



मोदी के सुधार एजेंडे में राज्‍य सबसे कीमती कड़ी हैं। जिसे जोड़ने के लिए मोदी को, कामकाज के अपने तरीके के विपरीत, केंद्र के अधिकारों में कमी और राज्यों के रसूख में बढ़ोत्तरी करनी होगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मेक इन इंडिया जल्द ही फलक से इसलिए उतर गया क्योंकि निवेश राज्यों में होना है और सिंगल विंडो क्लियरेंस सूबों की सरकारों से मिलेगा, केंद्र से नहीं. उद्योगों की सबसे बड़ी आस यानी गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) राज्यों के साथ असहमति के कारण ही अधर में टंगा है. आलू-प्याज की कीमतें कम होने को राजी नहीं हैं तो वजह यह है कि राज्यों ने मंडी कानून बदलने में रुचि ही नहीं ली. स्वच्छता मिशन अगर केंद्र सरकार के विभागों का कर्मकांड बनकर रह गया तो इसलिए क्योंकि स्थानीय निकायों को अधिकार देना राज्यों की जिम्मेदारी है. मोदी के सुधार एजेंडे में राज्य सबसे कीमती कड़ी हैं और अब तक यह कड़ी मजबूती से जुड़ी नहीं है. अलबत्ता, महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के बाद इसे जोडऩे का मौका जरूर आ गया है. पश्चिम और उत्तर के दो प्रमुख औद्योगिक राज्यों में बीजेपी सत्ता में है। लंबे समय के बाद ऐसा हुआ है कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी या उसके सहयोगी दल, उत्तर और पश्चिम और मध्य भारत के उन सभी प्रमुख राज्यों की सत्ता संभाल रहे होंगे, जो अगले एक दशक में ग्रोथ का इंजन बनने वाले हैं. इसके बाद अब मोदी के लिए तेज सुधारों को टालने कोई कारण नहीं बचा है.
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Monday, October 13, 2014

स्वयंसेवा की सीमाएं


स्वच्छता की प्रेरणाएं सर माथे,  मगर सफाई सीवेज और कचरा प्रबंधन रोजाना लड़ी जाने वाली जंग है जिसमें भारी संसाधन लगते हैं.
ए हवाई अड्डों पर लोग खुले में शंका-समाधान नहीं करते पर रेलवे प्लेटफॉर्म पर सब चलता है. शॉपिंग मॉल्स के फूड कोर्ट में गंदगी होती तो है, दिखती नहीं. अलबत्ता गली की रेहड़ी के पास कचरा बजबजाता है. सरकारी दफ्तरों के गलियारे दागदार हैं, दूसरी ओर निजी ऑफिस कॉम्प्लेक्स की साफ-सुथरी सीढिय़ां मोबाइल पर बतियाने का पसंदीदा ठिकाना हैं. स्वच्छता अभियानों का अभिनंदन है लेकिन सफाई की बात, स्वयंसेवा की पुकारों से आगे जाती है और स्वच्छता को बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी समस्या बनाती है जो बुनियादी ढांचे की जिद्दी किल्लत से बेजार हैं. शहरों में अब साफ और गंदी इमारतें, अस्पताल और सार्वजनिक स्थल एक साथ दिखते हैं और यह फर्क लोगों की इच्छाशक्ति से नहीं बल्कि सुविधाओं की आपूर्ति से आया है. सफाई, सरकार की जिम्मेदारियों में आखिरी क्रम पर है इसलिए सरकारी प्रबंध वाले सार्वजनिक स्थल बदबूदार हैं जबकि निजी प्रबंधन वाले सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता दैनिक कामकाज का स्वाभाविक हिस्सा है. क्या खूब होता कि आम लोगों को झाड़ू उठाने के प्रोत्साहन के साथ, कर्मचारियों की कमी, कचरा प्रबंधन की चुनौतियों, बुनियादी ढांचे के अभाव और संसाधनों के इंतजाम की चर्चा भी शुरू होती, जिसके बिना सफाई का सिर्फ दिखावा ही हो सकता है.

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