Tuesday, June 6, 2017

हकीकत से इनकार

बेकारी की आपदा के बीच रोजगार सृजन की जिम्मेदारी को पीठ दिखाना कई नीतियों की असफलता का स्वीकार है.

रकार की तीसरी सालगिरह पर गायराजनीति के केंद्र में स्थापित हो गई और रोजगारों की फिक्र सियासी व गवर्नेंस चर्चाओं से बाहर हो गई.
ठीक कहते हैं भाजपा के हाकिमसरकार सबको रोजगार नहीं दे सकती. वैसे मांगा भी किसने था? सरकार ने कभी ऐसा कहा भी नहीं. श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने तो सिर्फ यह बताया था कि हर साल एक करोड़ रोजगारों के सृजन की कोशिश होगी ाकि ताकि2020 तक पांच करोड़ लोगों को रोजी मिल सके. जाहिर है, हर साल एक करोड़ नए लोग रोजगारों की कतार में आ जाते हैं.
राजनीति का तो पता नहीं लेकिन रोजगारों को लेकर हाकिमों की यह 'साफगोई' जले पर जहर जैसी हैः
1. लेबर ब्यूरो बता रहा है कि कपड़ाचमड़ारत्न-आभूषणधातुऑटोमोबाइलट्रांसपोर्ट,सूचना तकनीक और हैंडलूम इन आठ प्रमुख क्षेत्रों में रोजगार सृजन सात साल के सबसे निचले स्तर पर है.
2. नए रोजगारों की उम्मीद बनकर उभरे ई-कॉमर्स और स्टार्ट-अप बेकारी का कब्रिस्तान हैं.
3. आइटी दिग्गज कंपनियों की ताजा घोषणाओं के मुताबिकसूचना तकनीक क्षेत्र10,000 नौकरियां काट चुका है और दो लाख रोजगार खतरे में हैं.
4. नोटबंदी के बाद इस साल की चैथी तिमाही में आर्थिक विकास दर घटकर6.1 फीसदी (पिछली तिमाही में सात फीसदी) रह गई है जो नोटबंदी के चलते  असंगठित क्षेत्र में करीब चार लाख अस्थायी/स्थायी रोजगार खत्म होने की आशंकाओं को आधार देती है.
बेकारी की आपदा के बीच रोजगार सृजन की जिम्मेदारी को पीठ दिखाना कई नीतियों की असफलता का स्वीकार है.
आखिर निवेशउद्योगीकरणशिक्षाकौशलसूचना तकनीकसामाजिक विकासइन सभी नीतियों के केंद्र में रोजगारों के अलावा और क्या है?
दरअसल, 2014 में नई सरकार अगर कोई एक मिशन शुरू कर सकती थी तो वह'सबके लिए रोजगार' होना चाहिए थाजो न केवल युवा जनादेश की उम्मीदों के माफिक होता बल्कि भारत के पूरे आर्थिक नियोजन को नए ढांचे में ढालने के लिए भी अनिवार्य था. हकीकत यह है कि सामाजिक-आर्थिक विकास के बाकी क्षेत्र साफ-सफाई,तेल-पानी और ओवरहॉलिंग मांग रहे थेकेवल रोजगार ही एक ऐसा क्षेत्र है जो कई अनपेक्षित जटिलताओं से रू-ब-रू था और जिसे मिशन बनाने की जरूरत थी.
रोजगारों के ग्लोबल परिदृश्य की वर्ल्‍ड इकोनॉमिक फोरम की एक ताजा रिपोर्ट कुछ कीमती सूत्र सौंपती है जिनकी रोशनी में लगता है कि एक गंभीर सरकार रोजगारों से मुंह फेरने से पहले बहुत कुछ कर सकती हैः
1. इन्फ्रास्ट्रक्चर और निर्माणउपभोक्ता सामानऊर्जावित्तीय सेवाएंस्वास्‍थ्यसूचना तकनीकमीडिया और मनोरंजनमोबिलिटीपेशेवर सेवाएं और कृषिदस प्रमुख क्षेत्र हैं जहां अधिकांश संगठित और असंगठित रोजगार बनने हैं.
2. काम के नए तरीकेनगरीकरणमोबाइल इंटरनेटबिग डाटानया मध्य वर्गइंटरनेट ऑफ थिंग्स  (इंटरनेट से जुड़े उत्पाद)शेयरिंग इकोनॉमीरोबोटिक्स  और आधुनिक ट्रांसपोर्टएडवांस मैन्युफैक्चरिंगथ्री-डी प्रिंटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस वह प्रमुख ताकतें हैं जो ऊपर के दस क्षेत्रों में रोजगारों को अलग-अलग ढंग से प्रभावित कर रही हैं.
मसलनकाम करने के तरीकों के बदलाव से सबसे ज्यादा असर प्रोफेशनल सेवाओं और इन्फ्रास्ट्रक्चर के रोजगारों पर पड़ा है तो मोबाइल इंटरनेटस्वास्थ्यसूचना तकनीक और मीडिया में रोजगारों की सीरत बदल रहा है. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और रोबोटिक्समोबिलिटी में रोजगारों के लिए गेम चेंजर हैं.
3. रोजगार की रणनीतियां अब हर क्षेत्र के लिए अलग-अलग होंगीजिन्हें निवेशशिक्षा,उद्योग की नीतियों का आधार होना चाहिए.
4. भविष्य के रोजगारों का दारोमदार पुनप्रशिक्षणमैनेजमेंट के तरीकों में बदलाव,कामकाज के लचीले नियमबहुरोजगार पर होगा जिसके लिए शिक्षा की पूरी प्रणाली बदलेगी.
5. सरकारों को वस्तुतः साफ-सफाई से लेकर अंतरिक्ष तक प्रत्येक नीति के केंद्र में रोजगारों को रखना     होगा तब जाकर बेरोजगारी की चुनौतियों का कुछ समाधान मिलेगा.
क्‍या आपको महसूस नहीं होता कि यह सब तो हो सकता था फिर भी तीन साल में रोजगारों पर नीतिगत चर्चा तो छोडि़ये कहीं कोई सुई भी गिरी !
सरकार शायद इसे लेकर ज्यादा फिक्रमंद है कि हमें क्या नहीं खाना चाहिए बजाए इसके कि हमें खाने के लिए कमाना कैसे चाहिए.
कोई फर्क नहीं पड़ता कि अर्थशास्त्री जीडीपी की अमूर्त गणना छोड़कर रोजगारों की गिनती को विकास मापने का आधार बना रहे हैं. यहां तो सरकार जल्द ही आपको यह बताने वाली है कि रोजगारों में कोई कमी नहीं हुई है. दरअसलउलटा-सीधा खाने के कारण बेकारी को लेकर हमारी समझ ही प्रदूषित हो गई है!

Tuesday, May 30, 2017

जीएसटी के फूल-कांटे


क्या हम यही गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स चाहते थे
                            
                                जीएसटी की पाती आ गई है.
किस पर कितना टैक्स, क्या नियम, कौन से कायदे, अब सभी कुछ तय हो गया है.
जीएसटी की पावती भेजने के बाद खुद से यह जरुर पूछियेगा कि क्या हम यही गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स चाहते थे
क्या‍ इसी के लिए 16 साल इंतजार किया गया?
जीएसटी का रोमांच सन् 2000 से बनने लगा था तब तक तो वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) भी पूरी तरह लागू भी नहीं हो पाया था.
रोमांच की तीन वजहें थीं:
एक: भारत को रियायती इनडाइरेक्ट टैक्स चाहिए. अधिकतम दो टैक्स और दो दरें, ताकि लोग खर्च करें, मांग बढ़े, निवेश बढ़े और बढ़े रोजगार. जीएसटी वाले मुल्कों में टैक्स रेट औसत 15 से 18 फीसदी है.
दोः कम टैक्स और छूट बिल्कुल नहीं. सभी कारोबारी टैक्स के दायरे में.
तीनः बेहद आसान कर नियम ताकि कारोबार करना मुश्किल न बन जाए.
जीएसटी से देश का जीडीपी कम से दो फीसदी बढऩे की उम्मीद इसी उत्सुकता की देन थी.
....और जीएसटी मानो अलादीन का चिराग हो गया.
जीएसटी, जो हमें मिला
- तारीफ करनी होगी कि उत्पादों और सेवाओं पर दरें तय करने में पूरी पारदर्शिता रही. जीएसटी काउंसिल ने जो फॉर्मूला तय किया था उस पर वह अंत तक कायम रही. कॉर्पोरेट लॉबीइंग नहीं चली.
इस फॉर्मूले के चलते ही राज्यों से सहमति बनी जो राजस्व नुकसान को लेकर आशंकित थे, यानी अगर पारदर्शिता रहे तो विश्वास बन सकता है.
लेकिन
वन टैक्स, वन नेशन के बदले आठ जीएसटी दरें (5,12,18, 28%) मिली हैं, गुड्स की (एक्साइज/ वैट) चार और चार दरें सर्विसेज की, सेस अलग से.

आम खपत के कई उत्पादों (स्किन केयर, हेयर केयर, डिटर्जेंट, आयुर्वेद, कॉफी) पर टैक्स रेट अपेक्षा से अधिक है. बिल्डिंग मटीरियल और बिजली के सामान पर भी बोझ बढ़ा है.

बेहतर जिंदगी की उम्मीद से जुड़े उत्पादों-सेवाओं पर 28 फीसदी का टैक्स है जो काफी ऊंचा है.

ऊंचे टैक्स वर्ग में आने वाली कंपनियों को अपने मार्जिन गंवाने होंगे या फिर मांग. निवेश की बाद में सोची जाएगी.

हिसा‍ब-किताब
टैक्स को लेकर सरकार का बुनियादी नजरिया नहीं बदला है. अच्छी जिंदगी की उम्मीद को महंगा रखने की जिद कायम है.

जिन उत्पादों व सेवाओं (उपभोक्ता उत्पाद, भवन निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल) पर सबसे ज्यादा टैक्स है वहीं नया निवेश, नई तकनीक, इनोवेशन और रोजगार आने हैं. यह मेक इन इंडिया की उम्मीदों के विपरीत है.

इनपुट टैक्स क्रेडिट (लागत में शामिल टैक्स की वापसी) जीएसटी का एकमात्र नयापन है. सफलता इस निर्भर होगी कि जीएसटी का नेटवर्क कितनी तेजी से निर्माता-विक्रेताओं को इनपुट टैक्स की वापसी करता है.

बहुत सी कर दरें, ढेर सारे रिटर्न और केंद्र व राज्य की दोहरी ब्यूरोक्रेसी के कारण करदाताओं, खासतौर पर छोटे-मझोले कारो‍बारियों के लिए यंत्रणा से कम नहीं होगा. दो की जगह 37 रिटर्न भरने होंगे. कर नियमों के पालन की लागत पहले से ज्यादा होगी.

जीएसटी के बाद

महंगाई नहीं बढ़ेगी या बेहद मामूली बढ़ो‍तरी होगी.

कर ढांचा यथावत है इसलिए मांग भी नहीं बढ़ेगी.

जीएसटी के चलते अगले दो साल में जीडीपी में किसी खास तेजी की उम्मीद नहीं है.

केंद्र या राज्‍यों को तत्‍काल बड़ा राजस्‍व नहीं मिलने वाला.

इनडाइरेक्‍ट टैक्‍स देने वालों की संख्या बढ़ेगी जो शायद भविष्‍य में राजस्‍व में बढ़ा सके.

केंद्र सरकार को 2018 में करीब 500 अरब रुपए (0.3प्रतिशत जीडीपी) का नुक्सान उठाना पड़ सकता है जो राज्‍यों को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति की वजह से होगा.

ज्यादातर केंद्रीय क्षतिपूर्ति महाराष्‍ट्र, गुजरात, तमिलनाडु आदि सप्‍लायर राज्‍यों को मिलेगी.

राज्‍यों में तैयारियां सुस्‍त हैं. लागू होने में एक से दो माह की देरी हो सकती है.

कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे पास मजबूत सरकार है, लोकप्रिय प्रधानमंत्री है या अधिकांश देश में एक ही दल की सरकार है, जीएसटी, राजनैतिक-आर्थिक रूप से दकियानूसी ही है क्रांतिकारी या चमत्कारी नहीं.

हद से हद हमने अपने टैक्स ढांचे की ओवरहॉलिंग कर ली है. करीब 16 साल (2000 से 2017) घिसटने के बावजूद हम ऐसा टैक्स ढांचा नहीं बना पाए जिसे देखकर दुनिया बरबस कह उठे,  'यह हुआ सुधार!'' 

दुआ कीजिए कि यह जीएसटी जैसा भी है अब ठीक ढंग से लागू हो जाए, शायद वही इसकी सफलता होगी.


Monday, March 27, 2017

विकास का हठयोग


उत्‍तरप्रदेश को विकास की प्रयोगशाला बनाने के लिए योगी आदित्‍यनाथ कौन सा जटिल दुष्‍चक्र तोड़ना होगा ?

योगी आदित्यनाथ क्या उत्तर प्रदेश को विकास की प्रयोगशाला बना सकते हैं?
विकास सिर्फ साफ सुथरा विकास ही पढि़ए और कुछ नहीं.
योगी को इस हठयोग की शुरुआत अपनी पार्टी से ही करनी होगी.
राजनीति के साथ गुंथकर, राज्यों में विकास का मॉडल टेढ़ा-मेढ़ा और बुरी तरह दागी हो चुका है. विकास कार्यों की कमान सियासी कार्यकर्ता ही संभालते हैं. यह पार्टी की तरफ से उनकी सेवाओं के बदले उनको मिलने वाली मेवा है. भाजपा के पास पहली बार विशाल कार्यकर्ता और समर्थक समूह जुटा है. इस मेवाको लेकर जिनकी उम्मीदें बल्लियों उछल रहीं हैं.

राज्यों में विकास को देखना अब उतना दुर्लभ भी नहीं रहा है. वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद राज्यों के पास संसाधनों की कमी नहीं है. उत्तर प्रदेश के लगभग हर जिले में सरकारी पैसे से कुछ न कुछ बन रहा है. यही हाल देश के अन्य राज्यों में भी है. 

राज्यों में विकास पर अधिकांश खर्च सरकार करती है. सबसे बड़ा हिस्सा कंस्ट्रक्शन का है. मसलन, उत्तर प्रदेश में इस साल करीब 40,000 करोड़ रु. बुनियादी ढांचा निर्माणों के लिए रखे गए हैं

केंद्र और राज्य की परियोजनाओं की सीरत में बड़ा फर्क है. केंद्रीय परियोजनाएं अपेक्षाकृत बड़ी या बहुत बड़ी होती हैं, जिनमें निजी कंपनियों की निजी भागीदारी के नियम अपेक्षाकृत पारदर्शी हैं. इन पर ऑडिट एजेंसियों व नियामकों की निगहबानी रहती है.

राज्यों में परियोजनाएं छोटी होती हैं. मसलन, ग्रामीण सडक़ें, नलकूप, सिंचाई, बुनियादी ढांचा, सरकारी भवन, शहरों में छोटे पुल, सडक़ों का निर्माण और मरम्मत के ढेर सारे काम. लागत के आधार पर परियोजनाएं छोटी लेकिन संख्‍या यह परियोजनाएं वस्तुत: ठेके हैं, जिनमें पारदर्शी टेंडरिंग, जांच, ऑडिट की कोई जगह नहीं है. राज्यों का अधिकांश निर्माण विशाल कॉन्ट्रैक्टर राज के जरिए होता है. कॉन्ट्रैक्ट सत्तारूढ़ दल के लोगों या उनके शुभचिंतकों को मिलते हैं. समाजवादी पार्टी के दौर में अधिकांश निर्माण पार्टी के लोगों के हाथ में थे. बसपा के दौर में वर्ग विशेष के लिए ठेके आरक्षित कर दिए गए थे.

सरकार के विभागों को सामान की आपूर्ति और सरकार के बदले नागरिक सेवाओं (टोल, पार्किंग, राजस्व वसूली, बिजली बिल वसूली) का संचालन कारोबारों का अगला बड़ा वर्ग है, जिसके जरिए सत्तारूढ़ राजनैतिक दल अपने खैरख्वाहों को उनका मेहनताना देते हैं. करीब 29 गैर धात्विक खनिज राज्यों के मातहत हैं, जिनकी बिक्री में अकूत कमाई है. इनके ठेके हमेशा सत्ता के राजनैतिक चहेतों को मिलते हैं

निर्माण, सेवाओं और खनन के ठेके राज्यों में सबसे बड़े कारोबार हैं. राज्यों की राजनीति का बिजनेस मॉडल इन्हीं पर आधारित है. इन अवसरों को हासिल करने के लिए किसी को किसी भी पार्टी में जाने में कोई गुरेज नहीं है. राज्यों की राजनीति में समर्थक जुटाने, बढ़ाने और पालने का सिर्फ यही एक जरिया है.

राज्यों की राजनीति का बिजनेस मॉडल पिरामिड जैसा है, जिसमें शिखर पर चुने हुए प्रतिनिधि यानी सांसद और विधायक हैं. भाजपा के पास 323 विधायक और 71 सांसद हैं. व्यावहारिक सच यह है कि हर सांसद, विधायक और प्रमुख नेता के पास 15 से 20 लोग ऐसे हैं जिनकी मदद के बिना उनकी राजनीति मुमकिन नहीं है. यानी कि उत्तर प्रदेश भाजपा में लगभग 5 से 10,000 लोग सत्ता से सीधे फायदों की तरफ टकटकी लगाए हैं. इनके नीचे वे लोग आते हैं जिन्हें छोटे फायदों और अवसरों की उम्‍मीद है

सपा और बसपा ने उत्तर प्रदेश में अब तक इसी मॉडल के जरिए राजनीति की है जिसने राज्य के विकास को हर तरह से दागदार कर दिया. ध्यान रहे कि भाजपा से जुड़ रहे अधिकांश नए लोग इन्हीं अवसरों से आकर्षित हो रहे हैं. 

योगी आदित्यनाथ की शुरुआत भव्य थी लेकिन चमकदार नहीं. दूसरे दलों से आए प्रमुख नौ नेता एक मुश्त मंत्री बन गए, जो भाजपा को लेकर पिछले नजरिए और बयानों के बारे में पूछने पर बेशर्मी से हंस देते हैं. यह नेता सिर्फ नए अवसरों की तलाश में या अवसरों को बचाने की गरज से भाजपा में आए और रेवडिय़ां पा गए.

क्या योगी उत्तर प्रदेश में सियासी कॉन्ट्रैक्टर राज खत्म कर पाएंगे?

क्या वे भाजपा के नेताओं-कार्यकर्ताओं को ठेका, पट्टा कारोबार और सरकारी मेवे से दूर रख पाएंगे?

योगी ने सरकारी निगमों व समितियों से सपा के लोगों को बेदखल कर दिया है. क्या भाजपा के लोगों को इन पर बिठाने से खुद को रोक पाएंगे?
दरअसल, उन्हें उत्तर प्रदेश में विकास के इस मॉडल को शीर्षासन कराना होगा.


योगी आदित्यनाथ यदि ऐसा कर सके तो उत्तर प्रदेश विकास के उस आंदोलन की पहली प्रयोगशाला बन जाएगा जिसकी पुकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगाई है. 

Monday, March 20, 2017

न्यू इंडिया, न्यू डेमोक्रेसी!


नए और भव्‍य जनादेश संसदीय लोकतंत्र के बुनियादी रसायन बदलाव का संकेत देते लग रहे हैं

सोच के खोल आसानी से नहीं टूटते. उन्हें तोडऩे के लिए बदलावों का बहुत बड़ा होना जरूरी है. उत्तर प्रदेश का जनादेश भारतीय लोकतंत्र की पारंपरिक सोच के धुर्रे बिखेर रहा है.

याद कीजिएपहले कब ऐसा हुआ था जब मणिपुरीबुंदेलीमुंबईकरओडिय़ाकोंकणीपुरबियापर्वतीयमैदानी सभी एक ही राजनैतिक दिशा में सोचने लगे हों.

इतिहास में उतरना बेकार हैक्योंकि आजादी के बाद किसी भी काल खंड में इस तरह का दौर नहीं मिलेगा जिसमें भारत की जटिल क्षेत्रीय पहचानें और राजनैतिक अस्मिताएं किसी एक नेता में इस कदर घनीभूत हो गई होंजैसा कि नरेंद्र मोदी के साथ हुआ है. मोदी से जुड़ी उम्मीदों के अभूतपूर्व उछाह ने पंचायत से लेकर विधानसभाओं तक फैली वैविध्यपपूर्ण भारतीय राजनीति को गजब का एकरंगी कर दिया है.

जनता के यह नए आग्रह संसदीय लोकतंत्र के बुनियादी रसायन को तब्दील कर रहे है. भारी जनादेशों और अपेक्षाओं से भरे समाज की ताकत लेकर नरेंद्र मोदीसंसदीय लोकशाही के भीतर अध्यक्षीय लोकतंत्र गढ़ते नजर आने लगे हैं.

अध्यक्षीय लोकतंत्र की अपनी खूबियां हैंसंसदीय लोकतंत्र जैसी. 2014 के चुनाव के बाद से ही भारत में लोकतंत्र के इस स्वरूप की आमद के संकेत मिलने लगे थे जो ताजा चुनावों के बाद स्पष्ट हो चले हैं.

एकअध्यक्षीय लोकतंत्र राजनैतिक दलों को अपने सर्वश्रेष्ठ प्रत्याशी को चुनाव मैदान में उतारने को बाध्य करता है. राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता जिसकी पहली शर्त है.

चुनावी समर में नरेंद्र मोदी की सिलसिलेवार जीत न केवल भौगोलिक रूप से पर्याप्त विस्तृत है बल्कि जातीय पहचानों के व्यापक आयाम समेटती है. इन भव्य चुनावी विजयों के साथ उन्होंने यह तय कर दिया है कि विपक्ष को अब उनके जितना लोकप्रिय और अखिल भारतीय नेतृत्व सामने लाना होगा. इससे कम पर उन्हें चुनौती देना नामुमकिन है.

दोअध्यक्षीय लोकतंत्र में पूरा देश सीधे राष्ट्रपति को चुनता हैजिसकी सरकार स्थिर होती हैकामकाज पूरे देश की नजर में होता है.

मोदी केंद्र में स्थायी सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं और राज्यों में स्थायी सरकारों का गठन कर रहे हैं. सहयोगी दलों पर निर्भरता न के बराबर है. मोदी के नेतृत्व में सरकार के प्रचार तंत्र को गौर से देखिएजो रह-रहकर पूरे देश को उनकी सरकार के कामों की याद दिलाता है. केंद्र सरकार के प्रचार अभियान इतने बड़ेव्यापक और राष्ट्रीय कभी नहीं रहे जैसे मोदी के नेतृत्व में दिखते हैं. मोदी जानते हैं कि पूरा देश उनके काम की हर पल समीक्षा कर रहा हैठीक अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह. 

तीनअध्यक्षीय लोकतंत्र में संसद सिर्फ कानून बनाती है. राष्ट्रपति कार्यपालिका यानी सरकार का मुखिया होता है जो संसद से बहुत बंधा नहीं होता. इसलिए अमेरिका में मंत्री बनने के लिए चुनाव जीतना जरूरी नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति प्रोफेशनल्स को अपने साथ रखते हैं और सीधे फैसले करते हैं.

अचरज नहीं कि मोदी संसद से बहुत मुखातिब नहीं होतेवे जनता से सीधा संवाद करते हैं. पिछली सरकारों की तुलना में मोदी की मंत्रिपरिषद अधिकार संपन्न नहीं है. प्रधानमंत्री कार्यालय ही बड़े निर्णय करता हैजिसमें नौकरशाहों की प्रमुख भूमिका है जैसे कि नोटबंदी.

चारअध्यक्षीय व्यवस्था में दलों की संख्या सीमित होती है और राष्ट्रपति पद के आम तौर पर दो ही प्रत्याशी होते हैं.

2014 के बाद राज्यों में क्षेत्रीय दलों की संख्या. घटती जा रही है. नरेंद्र मोदी केंद्र से लेकर राज्यों तक,  दो दलों या दो गठबंधनों के बीच चुनावी संघर्ष का मॉडल स्थापित करने में लगे हैंइसलिए वे राज्य के मुख्यमंत्री के स्तर तक जाकर प्रचार करते हैं. समझना मुश्किल नहीं है कि मोदी सरकार राज्यों और केंद्र के चुनाव एक साथ चाहती है.

अस्सी के दशक में कांग्रेस के क्षरण के साथ भारत का लोकतंत्र प्रखर बहुदलीय हो चला था. क्षेत्रीय दलों के उभार के साथ केंद्र कमजोर हुआ और राज्यों को अपने आप ही अधिक ताकत मिलने लगी. मोदी युग के प्रारंभ के साथ संघीय लोकतंत्र का यह मॉडल तब्दील हो रहा है. मोदी के राजनैतिक ढांचे में राज्यों को केंद्रीय नीतियों के क्रियान्वयक की भूमिका में रहना होगा. भाजपा में भी अब क्षेत्रीय नेतृत्व की ऊंची उड़ानों पर पाबंदी रहेगी.

प्रधानमंत्री मोदी यह समझ चुके हैं कि लोग राज्यों में बहुदलीय ढपली और परिवारों की सियासत से इस कदर ऊब चुके हैं कि उन्हें केंद्र में ताकतवर नेतृत्व और अध्यक्षीय लोकतंत्र जैसे तौर-तरीकों से फिलहाल दिक्कत नहीं है. मोदी की गवर्नेंस अब रह-रहकर संसदीय लोकतंत्र के पुराने मुहावरों से बगावत करेगी और लोग उनका समर्थन करेंगे.

विपक्ष को मोदी के नियमों के तहत चुनाव लडऩा होगा. 2019 का आम चुनाव अमेरिकी तर्ज पर होगाभारतीय मॉडल पर नहीं.

न्यू इंडिया यही चाहता है! 

Monday, March 6, 2017

ठगे जाने का एहसास


अगर चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा सालाना प्रोजेक्ट है तो कम से कम इन्हें तो ठीक कर ही लिया जाना चाहिए. 

उल्हासनगरपुणे और नासिक सहित महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों के लोगों ने ताजा नगर निकाय चुनावों के बाद जो महसूस किया हैवैसा ही कुछ एहसास, 11 मार्च को उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड में लोगों को होगा. चुनाव अब एक किस्म का पूर्वानुभव लेकर आते हैं. पांच साल बाद लोग अपने नुमाइंदे बदलना चाहते हैं लेकिन चालाक नुमाइंदे अपनी पार्टियां बदल कर फिर चिढ़ाने आ जाते हैं.

नासिक से लेकर उत्तरकाशी और गोवा से गोरखपुर तक लोकतंत्र बुरी तरह गड्डमड्ड हो गया है. प्रतिनिधित्व आधारित लोकशाही सिर के बल खड़ी है. पुणे नगरपालिका चुनाव में भाजपा के आधे से अधिक पार्षदों को कांग्रेसएनसीपीशिवसेना से आयात किया गया. नासिक में पूरी की पूरी मनसे भाजपा में समा गई और भाजपा जीत गई. उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में बसपासपाकांग्रेस और रालोद के कई नुमाइंदे दूसरे दलों का लेबल माथे पर चिपका कर चुनाव मैदान में हाजिर हैं. दुनिया के किसी बड़े बहुदलीय लोकतंत्र में इस कदर दलबदल नहीं होताजितना कि भारत में है.

भारत में चुनाव पूरे साल होते हैं. यही एक काम है जिसे राजनैतिक दल पूरी गंभीरता के साथ करते हैंगवर्नेंस तो बचे हुए समय का इस्तेमाल है. मुंबई में जब नगर निकायों के चुनाव के नतीजे आ रहे थेतब दिल्ली में निकाय चुनावों के प्रत्याशियों की सूची जारी हो रही थी. उत्तर प्रदेश में वोट करते हुए लोग ओडिशा में पंचायत चुनावों के नतीजे देख रहे थे. छोटे-छोटे चुनावों के दांव इतने बड़े हो चले हैं कि ओडिशा में पंचायत चुनावों के प्रचार में भाजपा ने छत्तीसगढ़ और झारखंड के मुख्यमंत्रियों को उतार दिया जबकि बीजू जनता दल (बीजेडी) फिल्मी सितारों को ले आया. सनद रहे कि पंचायत चुनावों के बड़े हिस्से में प्रत्यक्ष रूप से दलीय राजनीति का दखल नहीं होता.

अगर चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा सालाना प्रोजेक्ट है तो कम से कम इन्हें तो ठीक कर ही लिया जाना चाहिए. इसी में सबका भला है.

काला धनदबंगों का दबदबावोटों की खरीद तो चुनावों की बाहरी सडऩ हैभीतरी इससे ज्यादा गहरी है. राजनैतिक दल और चुने हुए प्रतिनिधि (प्रत्याशी),  संसदीय लोकतंत्र की बुनियादी संस्थाएं हैं. दोनों ने मिलकर चुनावों को इस हालत में पहुंचा दिया है जहां लोकतंत्र के महापर्व जैसा कोई धन्य भाव नहीं बचा है.

प्रत्याशी पहले सुधरें या राजनैतिक दलबहसपहले मुर्गी या अंडा जैसी है.

प्रतिनिधित्व आधारित लोकतंत्र का शायद यह, सबसे बुरा दौर है. राजनीति में अपराधीकरण को खत्म करने के प्रधानमंत्री के 2014 के चुनावी वादे का तो पता नहीं उलटे अब दलबदल कानून निढाल पड़ा है. पार्टियां बदलने की आदत चुनावों से लेकर सरकारों तक फैल गई. अरुणाचल और उत्तराखंड को गिनिए या फिर महाराष्ट्र के निकाय चुनावों से लेकर ताजा विधानसभा चुनावों तक दलबदलुओं का हिसाब लगाइएचुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने के लिए कुछ भी किया जा सकता है. चुनिंदा लोगों को ही वोट देना अगर मजबूरी बन गई तो मतदान का मकसद खत्म हो जाएगा.

संसद या विधानसभाएं नहीं बल्कि राजनैतिक दल लोकतंत्र की बुनियादी संस्था हैं जो लोकशाही की बीमारियों का कारखाना हैं. सियासी दलों पर एक छोटी पार्टनरशिप फर्म जितने नियम भी लागू नहीं होते. खराब प्रत्याशीदलबदलअलोकतांत्रिक ढर्रे और चंदे तक लगभग सभी धतकरम सियासी दलों से निकलकर व्यापक लोकतंत्र में फैलते हैं. गवर्नेंस को राजनैतिक दलों से अलग करना मुश्किल हैक्योंकि सरकारी नीतियों के ब्लू प्रिंट राज करने वाली पार्टी की सियासी फैक्ट्री में बनते हैं

लोकतंत्र की नींव में इस दरार के कारण 

- राजनीति का अपना एक बिजनेस मॉडल बन गया है जिसमें किसी न किसी तरह से जीतना पहली जरूरत है.

- सियासी वंशवाद संसद से पंचायतों तक पसर गया है. हर राज्य  में नए राजनैतिक परिवार उभरे हैंजिन्हें पहचानना मुश्किल नहीं है. उत्तर प्रदेश में 50 से अधिक सियासी कुनबे इस चुनाव में खुलकर सक्रिय हुए. छोटे कुनबों ने निचले स्तर के चुनावों पर कब्जा कर रखा है.

- जीत की गारंटी के लिए ये परिवार हर चुनाव में बड़ी सहजता से दलों के बीच आवाजाही करते हैं और अच्छे प्रत्याशियों का विचार उभरने से पहले ही मर जाता है.

दिलचस्प है कि चुनावों के नजरिए से दो प्रस्ताव चर्चा में हैंएक लोकतंत्र की जड़ के लिए और दूसरा शिखर के लिए.

पहलादलीय राजनीति को प्रत्यक्ष रूप से पंचायतों चुनाव तक लागू कर दिया जाए.
दूसरासंसद-विधानसभा के चुनाव साथ कराए जाएं.

क्या इन दोनों से पहले यह जरूरी नहीं है कि लोकतंत्र की बुनियादी संस्था यानी विभिन्न राजनैतिक दलों को ठीक किया जाए?


आखिर कब तक हम लोकतंत्र के प्रति दायित्व की कसम खाकर उन्हें  वोट डालते रहेंगे जो लोकतंत्र को सड़ाने के नए कीर्तिमान बनाना चाहते हैं