Saturday, July 8, 2017

जीएसटी का चीन कनेक्शन


चीन के लिए जीएसटी अच्‍छी खबर नहीं है लेकिन भारतीय उद्योगों के लिए क्‍या यह खुश खबरी है ?


इस साल दीपावली पर चीन में बने बल्‍ब और पटाखे अगर कम नजर आएं तो जीएसटी को याद कीजिएगा. चीन से जीएसटी का अनोखा रिश्‍ता बनने वाला है. यह सस्‍ते चीनी सामान के आयात पर भारी पड़ेगा. रिएक्‍टरमशीनेंटरबाइन जैसे बड़े आयात बेअसर रहेंगे लेकिन जीएसटी के चलते सस्‍ते उत्‍पादों की अंतरदेशीय बिक्री थम सकती है जिससे तात्‍कालिकमहंगाई नजर आएगी.

चीन से आने वाले सस्‍ते खिलौनेछोटे इलेक्‍ट्रॉनिक्‍समोबाइल एसेसरीजबिजली के सामानटाइल्‍सक्रलोरिंगस्‍टेशनरी व प्‍लास्टिकके कारण दिल्‍ली के गक्रफार मार्केटनेहरू प्‍लेस या मुंबई का मुसाफिर खाना मनीष मार्केट और देशभर में फैले ऐसे ही दूसरे बाजार गुलजार रहते हैं. इन बाजारों में अगले कुछ महीनों के दौरान सन्‍नाटा नजर आ सकता है.

चीन के सस्‍ते करिश्‍मे आम लोगों तकपहुंचने की शुरुआत भारतीय आयातकों के यिवू (सस्‍ते सामानों का दुनिया में सबसे बड़ा बाजार) पहुंचकर माल चुनने और ऑर्डर देने से होती है. इन आयातों पर 14 से 28 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी लगती है. 

चीन में उत्‍पादन पर सब्सिडी के चलते ज्‍यादातर सामान बेहद सस्‍ते होते हैं इसलिए कई उत्‍पादों पर काउं‍टर‍वेलिंग या ऐंटी डंङ्क्षपग ड्यूटी (0 से 150 फीसदी तकभी लगाई गई है ताकि देशी उत्‍पादको संरक्षण मिल सके. हाल में ही सरकार ने सेरमिकक्रॉकरी और सिलाई मशीन के पुर्जों पर ऐंटी डंपिंग ड्यूटी लगाई है.

सस्‍ते चीनी माल का आयात थोकमें (पूरा कंटेनर) होता है. अंतरराज्‍यीय वितरण तंत्र इनकी बिक्री की रीढ़ है‍ जिसके जरिए पलकझपकते चीन माल शहरों से कस्‍बों और गांवों तकफैल जाता है. ज्‍यादातर बिक्री नकद में होती है जो टैक्‍स नेटवर्क से बाहर है.

छोटे व्‍यापारी थोकविक्रेताओं से उपभोक्‍ताओं की तरह माल खरीदते हैं. टैक्‍स व ट्रांसपोर्ट अधिकारियों की मुट्ठी गरमाते हुए उपभोकताओं तकमाल पहुंचाते हैं. चीनी उत्‍पादों की लागत इतनी कम है कि ऊंची इंपोर्ट ड्यूटीरि‍श्‍वतों और सबके मार्जिन के बावजूद सामान बेहद सस्‍ता बिकता है।

जीएसटी चीनी सामान की अंतराज्‍यीय बिक्री के लिए बुरी खबर है

कोई गैर रजिस्‍टर्ड कारोबारी अंतरराज्‍यीय बिक्री नहीं कर सकेगा। राज्‍यों के बीच चीनी सामान की आवाजाही टैक्‍स राडार पर होगी। ई वे बिल लागू होने के बाद गैर रजिस्‍टर्ड ट्रांसपोर्ट लगभग बंद हो जाएगा

जीएसटी की छूट सीमा (20 लाख के टर्नओवर पर  छूट और 75 लाख तक कारोबार पर कंपोजीशन स्‍कीम) वाले कारोबारी भी अंतरराज्‍यीय कारोबार नहीं कर सकेंगे। यानी कि सस्‍ते चीनी माल को स्‍थानीय बाजार में ही बेचना होगा इससे  आपूर्ति सीमित हो जाएगी

खुदरा कारोबारियों के जरिये चोरी छिपे अंतरराज्‍यीय बाजारों में पहुंचने वाले सामान की मात्रा कम ही होगी

जीएसटी नेटवर्कमें पंजीकरण के बाद बिकने वाला चीनी सामान टैक्‍स के कारण खासा महंगा होगा

सरकार ने जीएसटी के तहत कई एसे सामानों पर ऊंचा टैक्‍स (18 और 28 फीसदी) लगाया है जो आमतौर पर चीन से आयात होते हैं

जीएसटी का यह तात्‍कालिक 'फायदाशुरुआत में दर्द लेकर आने वाला है

1. चीन से आना वाला सस्‍ता मांग भारत में कई चीजों की महंगाई रोकने में बड़ी भूमिका निभाता है इनमें प्‍लास्टिकइलेक्‍ट्रॉनिक्‍सलाइटिंगक्रॉकरी आदि प्रमुख हैं। इन कारोबारों में किल्‍लत और कीमतें बढऩा लगभग तय है। कीमतों में ज्‍यादा तेजी दूरदराज के बाजारों में दिखेगी जहां सीधे आयात नहीं होता।

2. भवन निर्माणइलेक्‍ट्रानिक्‍स रिपयेरिंग जैसे कई उद्योग व सेवायें चीन से सस्‍ते माल पर निर्भर हैं । देशी उत्‍पादन इनकी कमी पूरी नहीं कर सकता इसलिए कई बाजारों में लंबे समय तकसन्‍नाटा रह सकता है

3.छोटे शहरों में चीनी माल की बिक्री के कारोबार और रोजगार में खासी कमी आ सकती है

अलबत्‍ताअगर आप इसे भारतीय उद्योगों के लिए मौके के तौर पर देख रहे हैं तो  उत्‍साह को संभालिये। चीन से आयात होने वाले सामान के बदले भारत में उत्‍पादन की जल्‍दी शुरुआत मुश्किल है।

इसकी भी वजह जीएसटी ही है।

जीएसटी में उन उत्‍पादों पर ऊंचा टैक्‍स लगा है जो  छोटे व असंगठित क्षेत्र में बनते हैं और चीनी माल का विकल्‍प बन सकते हैं इसके अलावा जीएसटी नियमों को लागू करने की भी खासी ऊंची होगी। ईंधन यानी पेट्रोल डीजलबिजलीकर्ज और जमीन की महंगाई के कारण परेशान छोटे उद्योगों के लिए जीएसटी चैत की कड़ी धूप की मानिंद है

भारतीय उद्योग इतनी बड़ी मात्रा में इतने सस्‍ते सामान नहीं बना सकतेइसलिए सस्‍ते चीनी माल की आपूर्ति लौटेगी अलबत्‍ता इस बार चीनी उत्‍पाद जीएसटी के नेटवर्कमें दर्ज होकर आएंगे। उपभोक्‍ताओं के लिए कीमतें और चीनी सामान का इस्‍तेमाल करने वालों की लागत बढेगी लेकिन सरकार का राजस्‍व भी बढेगा।

क्‍या देशी उद्योग चीनी माल से टक्‍कर ले पाएंगे?

उसके लिए सरकारों को कमाई का लालच छोड़ कर टैक्‍स कम करने होंगे
जीएसटी से फायदा है या नुकसान! फिलहालयह फैसला हम आप छोड़ते हैं   गुड्स एंड सर्विसेज टैक्‍स का सफर तो अभी बस शुरु ही हुआ है




Saturday, July 1, 2017

जल्दी बड़े हो जाइये

जीएसटी आ गया है, छोटे रहना अब जोखिम भरा है...

जीएसटी का यह सबसे कीमती संदेश है जिसे लाखों छोटे उद्यमियों और व्यापारियों को पूरे ध्यान से सुनना चाहिएनहीं तो बड़ी गफलत हो सकती है. अब बड़े होने में पूरा जतन लगा देना होगा क्योंकि सरकार छोटे रहने और छोटा कारोबार करने के लिए ज्यादा सुविधाओं के हक में हरगिज नहीं है.
आप असहमत हो सकते हैं लेकिन जीएसटी लगा रही सरकार मुतमइन है कि ...
1. लघुअनौपचारिकअसंगठित कारोबारों में टैक्स चोरी होती है. छोटे रहना टैक्स चोरी को सुविधाजनक बनाता है.
2. छोटी इकाइयों से टैक्स कम मिलता है और उसे जुटाने की लागत बहुत ज्यादा है.
3. इन्हें टैक्स के अलावा सस्तेे कर्ज जैसी कई तरह की रियायतें मिलती हैं जिनकी लागत बड़ी है.
इसलिए जीएसटी ने देश के करीब पंद्रह करोड़ छोटे उद्योगों और व्या‍पारियों को एक झटके में बड़े उद्योगों के बराबर खड़ा कर दिया है. जीएसटी चर्चा से पहलेकुछ तथ्यों पर निगाह डाल लेना बेहतर होगा.
एडेलवाइस रिसर्च की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिकदेश में लगभग 17 उद्योगसेवाएं या कारोबार ऐसे हैं जो 30 फीसदी से लेकर 90 फीसदी तक असंगठित क्षेत्र में हैं. खुदरा (रिटेल)यार्न व फैब्रिक और परिधान में 90 से 70 फीसदी उत्पाद या व्यापार असंगठित क्षेत्र में है. डेयरीज्वेलरीप्लाइवुडएयर कूलरडाइज पिगमेंट्ससैनिटरीवेयरफुटवियर और  पैथोलॉजी सेवा का 50 से 70 फीसदी और लाइटिंगपंप्सबैटरीज में करीब 30 फीसदी उत्पादन छोटी इकाइयों में होता है.
आइएजीएसटी में छोटों के मतलब के तथ्य तलाशते हैं:
  - जीएसटी से पहले लागू व्यवस्था के तहत 1.5 करोड़ रु. तक के सालाना कारोबार वाली उत्पादन इकाइयां एक्साइज ड्यूटी से बाहर थीं जबकि 10 लाख रु. के सालाना कारोबार पर सर्विस टैक्स से छूट थी.
  - जीएसटी के तहत केवल 20 लाख रु. तक सालाना कारोबार करने वाली सेवा और उत्पादन इकाइयों को रजिस्ट्रेशन और रिटर्न से छूट मिलेगी.
  - 75 लाख रु. तक कारोबार करने वाले कंपोजिशन स्कीम का हिस्सा बन सकते हैंइसके तहत निर्माताओंव्यापारियों और रेस्तरांवालों को रियायती दर पर टैक्स देना होगा. तिमाही और सालाना रिटर्न भरने होंगे.
  - जीएसटी के तहत अगर कोई रजिस्टर्ड इकाईगैर रजिस्टर्ड इकाई से सामान लेती है तो उसका टैक्स और रिटर्न रजिस्टर्ड इकाई ही भरेगी.
जीएसटी के इन तीन प्रावधानों में छिपे संदेश को समझना जरूरी है.
- 20 लाख रु. की छूट सीमा के जरिए बहुत ही छोटे कारोबारी जीएसटी से बाहर रहेंगे. कस्बों या शहरों के औसत कारोबारियों को जीएसटी अपनाना होगा.
छूट और कंपोजिशन स्कीम का सबसे कीमती पहलू यह है कि इन्हें अपनाने वाले कारोबारियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट की सुविधा नहीं मिलेगी यानी कि अपने उत्पादन के कच्चे माल या सेवा पर जो टैक्स उन्होंने चुकाया हैउसकी वापसी नहीं होगी.

 जीएसटी के तहतइनपुट टैक्स क्रेडिट कारोबारी सफलता की बुनियाद बनने वाला है. चुकाए गए टैक्स की वापसी कारोबार के फायदे और प्रतिस्पिर्धा में टिकने का आधार होगी. जो उद्यमी या व्यापारी जीएसटी से बाहर होंगे उनके उत्पाद या सेवाएंजीएसटी अपनाने वालों की तुलना में प्रतिस्पर्धात्मक नहीं रहेंगी. यह उम्‍मीद करना बेकार है कि बड़े टैक्सपेयर छोटी इकाइयों से माल खरीदकर उनका टैक्स (रिवर्स चार्ज) भरेंगे

हकीकत यह है कि जीएसटी के तहत पूरी उत्पाद चेन और वैल्यू एडिशन को संयोजित करने वाले ही फायदे में रहेंगेइसलिए बड़ी कंपनियां सब कुछ चाक-चौबंद कर चुकी हैं.

सरकार को अच्छी तरह से मालूम है कि छोटे कारोबारी तकनीकआदतों और सूचनाओं के नजरिए से जीएसटी के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन आपकी दुकान तक पहुंचते-पहुंचते जीएसटी की परिभाषा बदल चुकी होगी. कारोबारी सहजता और मांग बढ़ाने के मकसद से शुरू हुआ यह सुधार टैक्स सतर्कता और चोरी रोकने की सबसे बड़ी कोशिश में बदल रहा है.

कोई फर्क नहीं पड़ता कि जो आप यह निष्कर्ष निकालें कि जीएसटी बड़ी कंपनियों के लिए सुविधाजनक और फायदेमंद है. सरकार चाहती भी यही है कि असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र सिकुड़े और बड़ा बाजार बड़ों के ही पास रहे.  
इसलिएजीएसटी को लेकर बिसू‍रना छोडि़ए.

जल्द बड़े हो जाने में ही समझदारी है! 

Tuesday, June 27, 2017

सही साबित होने का अफसोस

नोटबंदी या डिमॉनेटाइजेशन बहुत बड़ा उलटफेर था. इसकी विफलता से उठने वाले सवाल नोटबंदी के फैसले से ज्‍यादा बडे हो गए हैं 

लत सिद्ध होने का संतोष, कभी-कभी सही साबित होने से ज्यादा कीमती होता है. सरकारी नीतियों के बनते या लागू होते वक्त जोखिमों को रोशनी में लाना और चेतावनियों की टेर लगाना जरूरी है. नीतियों के नतीजे यदि आशंकाओं के विपरीत अर्थात् अच्छे आएं तो लोकतंत्र में पत्रकारिता की यह विफलता शुभ और श्रेयस्कर ही होगी.

नोटबंदी के दौरान इस स्तंभ को पढ़ते रहे लोग याद करेंगे इस फैसले को लेकर जितनी आशंकाएं जाहिर की गईंवे एक-एक कर सच साबित हुईं.

काशनोटबंदी से जुड़े डर सच न होते और हम गलत साबित होते!

नोटबंदी या डिमॉनेटाइजेशन बहुत बड़ा उलटफेर था. इसकी भव्य विफलता ने बहुत कुछ तोड़ दिया है.

नोटबंदी की बैलेंस शीट
  - इस साल जनवरी से मार्च के दौरान भारत की आर्थिक विकास दर घटकर 6.1 फीसद (इससे पिछली तिमाही में 7 फीसदी) रह गई. यह नोटबंदी के बाद पहली तिमाही थी. पूरे वित्त वर्ष (2016-17) की विकास दर आठ फीसदी की बजाए 7.1 फीसदी रह गई. भारत ने दुनिया की सबसे तेज दौड़ती अर्थव्यवस्था का दर्जा गंवा दिया. जब संगठित औपचारिक अर्थव्यवस्था इस कदर टूट गई तो नकद पर काम करने वाली छोटी इकाइयोंकारोबारों और रोजगारों का क्या हाल हुआ होगा?
  - याद कीजिए गरीब कल्याण योजना जो नोटबंदी के साथ आई थीजिसमें पुराने नोटों में काला धन घोषित करने पर 50 फीसदी टैक्स और घोषित धन का एक-चौथाई चार माह सरकार के पास जमा रखने की शर्त थी. इस योजना में केवल 5,000 करोड़ रु. जमा हुए. सरकार ने मान लिया कि स्कीम ढह गई.
  - नोटबंदी के छह माह पूरे होने से पहले ही लोग वापस नकदी की तरफ लौट आए. बकौल रिजर्व बैंक केडिजिटल माध्यमों से वित्तीय लेन-देननोटबंदी के पहले वाले स्तर पर पहुंच गया. पता नहीं कि ''भीम" और यूपीआइ कहां गए?
  - रिजर्व बैंक में पुराने नोटों की गिनती सतयुग आने तक चलेगी. वित्त मंत्रालय काले धन की फिक्र छोड़ जीएसटी की उधेड़बुन में है. 
  - नोटबंदी के जरिए काले धन के बारे भरपूर सूचनाएं मिली थीं लेकिन उत्तर प्रदेश का चुनाव शुरू होते ही छापेमारी और पड़ताल बंद हो गई.
  - नोटबंदी के बाद रिजर्व बैंक ने भी कर्ज सस्ते करने से तौबा कर ली.

इस हिसाब-किताब में हमें उन वादों की श्रद्धांजलि मिल जाएगी जो नोटबंदी के दौरान सरकारी मंत्रियों के बड़बोले उच्छवासों से फूटते थे.

नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था को कई गुप्त चोटें दी हैं जिनके ठीक होने में बहुत लंबा वक्त लगेगा.

  - काले धन के खिलाफ या तो सख्ती की जा सकती है या फिर लोगों को कालिख धोने के मौके यानी टैक्स माफी की स्कीमें उपलब्ध कराई जा सकती हैं. नोटबंदी पहला ऐसा अभियान था जिसमें दोनों पैंतरे आजमाए गए. तीन साल में तीन (एक विदेशी कालाधन के लिए और दो देशी) ऐसी स्कीमें आईं जो काले धन वालों को पवित्र होने का मौका देती थींलेकिन तीनों ही नाकाम रहीं. नोटबंदी के चाबुक से कितना काला धन निकलासरकार यह बताने को तैयार नहीं है. इस कौतुक में न तो सरकारी सख्ती की साख बची और न रियायतों की. काले धन को लेकर सरकारी कोशिशों पर आगे कोई आसानी से भरोसा करेगाइस पर शक है.

  - नोट बदलने के दो महीनों ने बैंकिंग तंत्र को भ्रष्ट कर दिया. लोगों का जमा बैकों की बैलेंस शीट पर बोझ बन गया. नोटबंदी के दौरान कर्ज चुकाने से मिली रियायतों ने फंसे हुए कर्जों के बोझ को और बढ़ा दिया. पहले से हलाकान बैंक अब ज्यादा मुसीबत में हैं. सरकार के पास उन्हें उबारने के लिए संसाधन नहीं हैं.

  - रिजर्व बैंक की साख और स्वायत्तता पुराने नोटों के ढेर में दब गई है.

 - हमें शायद ही कभी यह पता चल सके कि नोटबंदी से उन ''खास" लोगों की जिंदगी पर क्या असर पड़ा जिन्हें सजा देने के लिए आम लोगों को गहरी यंत्रणा से गुजरना पड़ा था.

  - और अंत में.. नोटबंदी के साथ सरकार के नए चेहरे से हमारा परिचय हुआ है जो एक क्रांतिकारी कदम के लिए पूरे देश को सिर के बल खड़ा कर देती है पर नतीजे बताने का मौका आने पर पीठ दिखा देती है. 

हम नहीं मानते कि नोटबंदी यूपी के चुनावों से प्रेरित थी. राजनीति इतनी गैर जिम्मेदार कैसे हो सकती है ??   

नोटबंदी सिद्ध करती है कि सरकार साहसी फैसले लेने में सक्षम है लेकिन विफलता बताती है कि हकीकत से कटा साहस आत्मघाती हो जाता है.

हमें अपने सही साबित होने का अफसोस है.



Monday, June 19, 2017

चुनाव से चुनाव तक


राजनीति का चुनावी त‍दर्थवाद किसानों पर भारी पड़ रहा है जो उत्‍पादक तंत्र के आखिरी छोर पर खड़े हैं 

न्‍य लोगों का तो पता नहीं लेकिन किसानों के लिए केंद्र की सरकार कई चेहरों वाले निजाम में बदल चुकी है. एक चेहरा चुनाव से पहले मुनाफे वाले समर्थन मूल्‍य के वादे में दिखा था लेकिन भूमि अधिग्रहण के साथ दूसरा चेहरा सामने आ गयाकिसानों के नाम पर टैक्‍स तीसरा चेहरा था तो कर्ज माफी का वादा अलग ही सूरत की नुमाइश थी.

सरकार का यह चेहरा बदल उस चुनावी कौतुक का हिस्सा है जो गवर्नेंस की सबसे बड़ी चुनौती बन रहा है. पिछले तीन साल के बड़े और हिंसक आंदोलनों (पाटीदारमराठाजाटकिसान) को गौर से देखिएसभी चुनाव वादों और उनसे मुकर जाने के खिलाफ खड़े हुए हैं.

सरकारें इस कदर दीवानगी के साथ सब कुछ दांव पर लगाकर चुनाव लड़ती पहले नहीं देखी गई थीं. मध्य प्रदेश में फसल का मूल्य मांग रहे किसानों को जब पुलिस की गोलियां मिल रहीं थीं उस वक्त भाजपा छत्तीसगढ़ व तेलंगाना में चुनावी वादों की जुगत में लगी थी. ठीक इसी तरह बीते बरस जब लाखों मराठा किसान महाराष्ट्र की सड़कों पर थे तब उस समय भाजपा उत्तर प्रदेश में चुनावों के लिए कर्ज माफी के वादे की तैयारी कर रही थी.

अपनी बुनियादी जटिल और मौसमी समस्याओं के बावजूद तात्कालिक तौर पर खेती ने ऐसा बुरा प्रदर्शन नहीं किया जिसके कारण किसानों को सड़क पर गोली खानी पड़े. यह कृषि नीतियों में चुनावी छौंक का ही नतीजा है कि तीन साल में कृषि के नीतिगत अंतरविरोध बदहवास किसानों को सड़क पर ले आए हैं.

भाजपा से किसी ने यह नहीं कहा था कि वह चुनाव प्रचार के दौरान फसलों के समर्थन मूल्य पर 50 फीसदी मुनाफे का वादा करे. इतने बड़े नीतिगत बदलाव का दम भरने से पहलेभाजपा के भीतर सब्सिडीफसल पैटर्नउपज के उतार-चढ़ाव का कोई अध्ययन हरगिज नहीं हुआ था.

सत्ता में आने के बाद सरकार को समर्थन मूल्य  कम करने की नीति ज्यादा बेहतर महसूस हुई. अगस्त 2014 में संसद को बताया गया कि राज्य अब समर्थन मूल्य पर मनमाना बोनस नहीं दे सकेंगे क्योंकि सरकार कृषि का विविधीकरण करना चाहती है और समर्थन मूल्यों की प्रणाली जिसमें सबसे बड़ी बाधा है.

अलबत्ता मौसम की मार से जब फसल बिगड़ी और भूमि अधिग्रहण पर किसान गुस्साए तो समर्थन मूल्य सुधारों को किनारे टिकाकर सरकार पुराने तरीके पर लौट आई.

भारतीय खेती में कमजोर और भरपूर उपज का चक्र नया नहीं है. पिछले साल दालों का आयात हो चुका था इस बीच समर्थन मूल्य बढऩे से उत्साहित किसानों ने पैदावार में भी कोई कमी नहीं छोड़ी. नतीजतन दलहन की कीमतें बुरी तरह टूट गईं. लागत से कम बाजार मूल्य और नकदी के संकट के बीच समर्थन मूल्य पर 50 फीसदी मुनाफे का वादा याद आना लाजिमी है.

समर्थन मूल्य पर पहलू बदलती सरकार चुनावों की गरज में कर्ज के घाट पर बुरी तरह फिसल गई. किसान की कर्ज माफी के नुक्सानों पर नसीहतों का अंबार लगा है लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान भाजपा नेता इस कदर मुतमइन थे कि मानो उनके हाथ कर्ज माफी का कोई ऐसा गोपनीय फॉर्मूला लग गया हो जो सरकारों के बजट व बैंकों को इस बला से महफूज रखेगा. हकीकत ने पलटवार में देरी नहीं की. बेसिर-पैर के चुनावी वादे के कारण कर्ज माफी को लेकर बड़ा दुष्चक्र शुरू हो रहा हैजिसमें राज्य सरकारें एक-एक कर फंसती जाएंगी.

क्या आपको मंडी कानून खत्म करने की कोशिशें याद हैं जो मोदी सरकार आने के साथ ही शुरू हुई थीं. देश में निर्बाध कृषि बाजार बनाने की पहल सराहनीय थी लेकिन प्रधानमंत्री अपनी ही सरकारों को इस सुधार के फायदे नहीं समझा सके इसलिए कृषि के बाजार में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ.

याद रखना भी जरूरी है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने भारतीय खाद्य निगम के पुनर्गठन की जो सिफारिश की थी उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद पता नहीं कहां गुम हो गई.

चिरंतन चुनावी अभियानों के बीच किसान सरकार के कई चेहरे देखकर बेचैन हैं जबकि टैक्स चुकाने वाले यह समझ नहीं पा रहे हैं कि खेती के हितों के लिए उनसे वसूला जा रहा टैक्स (कृषि कल्याण सेस - 2016-17 और 2017-18 में करीब 19000 करोड़ रुपये का संग्रह का अनुमान) आखिर किस देश के किसानों के काम आ रहा है.

अतीत से ज्यादा डराता है भविष्य‍ क्योंकि चुनावों की कतार अंतहीन है और हम चुनाव से चुनाव तक चलने वाली गवर्नेंस में धकेल दिए गए हैं. चुनाव जीतने के लिए होते हैं लेकिन हमें यह तय करना होगा इस जीत को पाने की अधिकतम कीमत क्या होगी?
चुनाव गवर्नेंस का साधन हैं साध्य नहीं. अगर सब कुछ चुनावों को देखकर होने लगा तो नीतियों की साख और सरकार चुनने का क्या मतलब बचेगा?

याद रखना जरूरी हैः

राजनेता अगले चुनाव के बारे में सोचते हैं और राष्ट्र नेता अगली पीढ़ी के बारे में: जेम्स फ्रीमैन

Tuesday, June 13, 2017

नोटबंदी और जीएसटी




जीएसटी और नोटबंदी में इतने गहरे अंतविरोध क्‍यों हैं ?
 

सोने की उत्पादक उपयोगिता (डिमेरिट या सिन प्रोडक्ट) नहीं है. सोने पर कम टैक्स एक  भारी सब्सिडी है जो देश के केवल दो फीसदी समृद्ध लोगों को मिलती है: आर्थिक समीक्षा 2015-16

वित्त मंत्री अरुण जेटली जब आम खपत की चीजों पर भारी टैक्स के बदले सोने पर तीन फीसदी और हीरे (अनगढ़) पर केवल 0.25 फीसदी जीएसटी लगाने का ऐलान कर रहे थे, तब शायद सबसे ज्यादा असहज स्थिति में सरकार के आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मïण्यम रहे होंगे जिन्होंने बीते साल ही सोने पर नगण्य टैक्स की नीति को सूट-बूट की सरकारों के माफिक कहा था.

वैसे, नोटबंदी के पैरोकारों की जमात, जीएसटी पर सुब्रह्मïण्यम से ज्यादा असमंजस में है. जीएसटी नोटबंदी के पावनउद्देश्यों को सिर के बल खड़ा कर रहा है. नकद से दूर हटती अर्थव्यवस्था वित्तीय निवेशों (बॉन्ड, बीमा, शेयर, बैंक जमा) के लिए प्रोत्साहन और सोने व जमीन जैसे निवेशों पर सख्ती चाहती थी ताकि काले धन की खपत के रास्ते बंद हो सकें. लेकिन सोना सरकार का नूरे-नजर है. अचल संपत्ति जीएसटी से बाहर है और वित्तीय निवेशों पर टैक्स बढ़ गया है.

भारत में अधिकांश निजी संपत्ति भौतिक निवेशों में केंद्रित है. सोना और अचल संपत्ति इनमें प्रमुख हैं. क्रेडिट सुईस की ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट (2016) बताती है कि भारत में 86 फीसदी निजी संपत्ति सोना या जमीन में केंद्रित है, वित्तीय निवेश का हिस्सा 15 फीसदी से भी कम है. अमेरिका में लगभग 72, जापान में 53 और ब्रिटेन में 51 फीसदी निजी संपîत्ति शेयर, बैंक बचत, बॉन्ड, बीमा के रूप में हैं.

नोटबंदी का सबसे सार्थक अगला कदम यही होना चाहिए था कि लोगों को सोना और जमीन में निवेश की आदत छोडऩे और वित्तीय निवेश के लिए प्रेरित किया जाए. सोना और जमीन हर तरह की कालिख पचा लेते हैं जबकि वित्तीय निवेशों की निगरानी आसान है.

सोने-हीरे पर जीएसटी का पाखंड दूर से चमकता है. गोल्ड क्रोनिज्म और सोना बेचने-खरीदने वालों की राजनीति इतनी ताकतवर थी कि सोना, हीरा, जेवरों पर केवल तीन फीसदी जीएसटी लगाया गया. इन महंगी खरीदों को विशेष दर्जा देने के लिए जीएसटी की नई दर भी ईजाद की गई.

भारत में सोने की 80 फीसदी खपत केवल 20 फीसदी जनता तक केंद्रित है. इनमें बड़े खरीदार आबादी का दो फीसदी हैं यानी कि कम टैक्स का फायदा केवल दो फीसदी लोगों को मिलेगा.

जानना जरूरी है कि दवा पर सोने से चार गुना या 12 फीसदी और उपभोक्ता सामान पर छह से नौ गुना ज्यादा जीएसटी लगेगा. हमें भूलना नहीं चाहिए कि 2015 में सरकार गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम लाई थी. तब प्रधानमंत्री ने लोगों से सोने का मोह छोडऩे को कहा था.

यदि वह आह्वान सही था तो सोने पर अधिकतम जीएसटी लगना चाहिए था ताकि लोग सोना खरीदने की बजाए गोल्ड बॉन्ड में निवेश करने को प्रेरित होते. अलबत्ता न्यूनतम टैक्स के साथ जीएसटी ने सोने को निवेश का सबसे आकर्षक विकल्प बना कर नोटबंदी के संकल्प को सिर के बल खड़ा कर दिया है.

काले धन को खपाने का सबसे बड़ा स्रोत यानी अचल संपत्ति जीएसटी से बाहर है. अगर जीएसटी वित्तीय पारदर्शिता का सबसे बड़ा अभियान है, तो जमीन-मकान के सौदों के जीएसटी के दायरे में होना ही चाहिए था.

पूरे देश में अचल संपत्ति रजिस्ट्रेशन और सर्किल दरें एक समान बनाकर रियल एस्टेट का कॉमन नेशनल मार्केट बनाना जरूरी है. जमीन-मकान की हर खरीद-फरोख्त पर डिजिटल निगरानी के बिना काले धन के इस्तेमाल पर रोक नामुमकिन है. अचल संपत्ति प्रत्येक कारोबार में आर्थिक  लागत का हिस्सा है, इस पर टैक्स क्रेडिट क्यों नहीं होना चाहिए?

राज्यों ने राजस्व को सुरक्षित रखने की गरज से अचल संपत्ति को दागी सौदों का बाजार बनाए रखना मुनासिब समझा. असंगति देखिए कि मकानों की बिक्री पर सर्विस टैक्स है लेकिन जमीन-मकान के सौदे जीएसटी से बाहर रहेंगे.

जीएसटी में नोटबंदी के शीर्षासन की एक और तस्वीर मिलती है. इस क्रांतिकारीसुधार के बाद वित्तीय सेवाओं पर सर्विस टैक्स 15 से बढ़कर 18 फीसदी हो जाएगा यानी कि वित्तीय निवेश महंगा हो जाएगा. जीएसटी के बाद म्युचुअल फंड मैनेजमेंट चार्ज बढ़ जाएगा. बीमा पर जीएसटी भारी पड़ेगा. जीएसटी से शेयर ब्रोकरेज तो महंगा हो ही जाएगा.

नोटबंदी और जीएसटी दोनों एक ही टकसाल से निकले हैं.

लेकिन तय करना मुश्किल है कि नोटबंदी के मकसद ज्यादा पवित्र थे या फिर जीएसटी के उद्देश्य ज्यादा कीमती हैं?

या फिर सरकार में एक हाथ को दूसरे हाथ का पता ही नहीं है.