Monday, November 13, 2017

जो नहीं जानते ख़ता क्या है

जो पीडि़त हैं वही क्यों पिटते हैं?

काली कमाई और भ्रष्टाचार पर गुर्राई नोटबंदी अंतत: उन्हीं पर क्यों टूट पड़ी जो कालिख और लूट के सबसे बड़े शिकार हैं.

जवाबों के लिए चीन चलते हैं.

इसी अक्तूबर के दूसरे सप्ताह में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं सालाना बैठक में राष्ट्रपति शी जिनपिंग को एक अनोखा दर्जा हासिल हुआ. उपलब्धि यह नहीं थी कि कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में बदलाव के साथ शी को माओ त्से तुंग और देंग श्याओ की पांत में जगह दी गई बल्कि शी ताजा इतिहास में दुनिया के पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने संगठित राजनैतिक और कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जीतकर खुद को दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं की पांत में पहुंचा दिया.

बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ पीपल में जब कम्युनिस्ट पार्टी शी का अभिनंदन कर रही थी, तब तक उनका भ्रष्टाचार विरोधी अभियान अपनी ही पार्टी के 13 लाख पदाधिकारियों व सरकारी अफसरों और 200 मंत्री स्तर के 'टाइगरों को सजा दे चुका था. शी ने अपनी ही पार्टी के भ्रष्ट नेताओं और दिग्गजों को सजा देकर ताकत पाई और लोकप्रिय हो गए! 

असफल नोटबंदी के दर्द की छाया में भ्रष्टाचार के विरुद्ध चीन का अभियान जरूरी सूत्र दे सकता है.

         इस अभियान के लक्ष्य आम चीनी नहीं बल्कि नेता, सरकारी मंत्री, सेना और सार्वजनिक कंपनियों के अफसर थे जो चीन के कुख्यात वोआन-जोआन (नेता-अफसर-कंपनी गठजोड़) भ्रष्टाचार की वजह हैं. 2013 में शी जिनपिंग ने कहा था कि सिर्फ मक्खियां (छोटे कारकुन) ही नहीं, शेर (बड़े नेता-अफसर) भी फंदे में होंगे. इसने चीनी राजनीति के तीन बड़े गुटोंपेट्रोलियम गैंग, सिक्योरिटी गैंग और  शांक्सी गैंग (बड़े राजनैतिक नेताओं का गुट) पर हाथ डाला, जो टाइगर्स कहे जाते हैं.

 भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान का नेतृत्व सेंट्रल कमिशन फॉर डिसिप्लिनरी ऐक्शन (सीसीडीआइ) कर रहा है. स्वतंत्र और अधिकार संपन्न एजेंसी के जरिए राजनैतिक व आर्थिक भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का मॉडल दुनिया के अन्य देशों, खासतौर पर लोकतंत्रों से मेल खाता ही है.

    किसी भी दूसरे देश की तरह शी की यह मुहिम भी विवादित थी लेकिन चीन की अपेक्षाओं से कहीं ज्यादा पारदर्शी भी थी. नियमित सूचनाओं का प्रवाह और यहां तक कि राजदूतों को बुलाकर इस स्वच्छता मिशन की जानकारी देना इस अभियान का हिस्सा था.

  अभियान की सफलता शी की राजनैतिक ताकत में दिखती है. स्वतंत्र प्रेक्षक (खासतौर पर ताजा चर्चित किताब चाइनाज क्रोनी कैपिटलिज्म के लेखक और कैलिफोर्निया में क्लैरमांट मैककेना कॉलेज के प्रोफेसर मिनक्सिन पे) मानते हैं कि बड़े व संगठित भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार से निचले स्तर पर भ्रष्टाचार में कमी महसूस की जा सकती है. हालांकि चीन में कानून कमजोर हैं और स्वतंत्र मीडिया अनुपलब्ध है, इसलिए जन अभियानों का विकल्प नहीं है. 

अब वापस नोटबंदी पर

1. नोटबंदी से कालिख के दिग्गजों को सजा मिलनी थी लेकिन नौकरियां गईं आम लोगों की, धंधे बंद हुए छोटों के. भ्रष्ट और काले धन के राजनैतिक-आर्थिक ठिकानों पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

2. लोकतंत्र के पैमानों पर, नोटबंदी के फैसले और नतीजों में सरकार अपेक्षित पारदर्शी नजर नहीं आई.

3. राजनैतिक मकसद से चुनिंदा जांच के अलावा उच्च पदों पर भ्रष्टाचार पर कोई संगठित अभियान नजर नहीं आया. चीन की तो छोडि़ए, भारत में पाकिस्तान की तरह भी कोई मजबूत व स्वतंत्र जांच संस्था नहीं बन पाई. पनामा (टैक्स हैवेन) से रिश्तों में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का नाम आने के बाद, उनके खिलाफ अदालत व जांच एजेंसी की सक्रियता देखने लायक है. भारत में पनामा पेपर्स के मामलों में एक नोटिस तक नहीं भेजा गया है जबकि टैक्स हैवन के भारतीय रिश्तों पर सूचनाओं की दूसरी खेप (पैराडाइज पेपर्स) आ पहुंची है.

4. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की इस साल आई दो रिपोर्टों के मुताबिक, भारत आज भी एशिया प्रशांत क्षेत्र में सबसे भ्रष्ट देश है. यहां औसतन 70 फीसदी लोगों को रिश्वत देनी पड़ती है.

चलते-चलते एक तथ्य और पकडि़ए.

उपभोक्ताओं पर भारत के प्रमुख सर्वेक्षण, आइसीई 3600 सर्वे (2016) के अनुसार, भारत में केवल 20 फीसदी परिवार ऐसे हैं जिनका मासिक उपभोग खर्च औसतन 15,882 रु. या उससे ज्यादा है. सबसे निचले 40 फीसदी परिवारों का मासिक खर्च तो केवल 7,000-8,500 रु. के बीच है.

काला धन किसके पास है

नोटबंदी के दौरान लाइनों में कौन लगे थे?


आप खुद समझदार हैं. 

Monday, November 6, 2017

ताकि, सनद रहे !

लत सिद्ध होने का संतोष कभी कभी, सही साबित होने से ज्यादा कीमती होता है. सरकारी फैसलों पर  सवाल उठाना और आगाह करना कोई क्रांति नहीं है. यह तो पत्रकारिता का सहज  दायित्‍व है. नीतियों के नतीजे अच्‍छे रहें तो  लोकतंत्र में पत्रकारिता की यह असफलता श्रेयस्कर ही होगी.
नोटबंदी के नतीजे सामने हैं।
यह रहा नोटबंदी और उसके बाद पिछले एक वर्ष में सवालों, विश्‍लेषणों का Hyperlinked संकलन।
काश! हम गलत सिद्ध होते.
  •     नोटबंदी का तिलिस्मी खाता (5 नवंबर 2017https://goo.gl/BNrBDW
  •         सोचा न था...(8 अक्‍टूबर 2017)  https://goo.gl/ryyQVY
  •         खर्च करेंगे तो बचेंगे  (10.अक्‍टूबर 2017https://goo.gl/E3MYHm
  •         सही साबित होने का अफसोस (27जून 2017https://goo.gl/kgvQkB
  •         नोटबंदी और जीएसटी (13 जून 2017https://goo.gl/LUEhZ3
  •         बड़ी मछलियां  (20 फरवरी 2017https://goo.gl/a46rmB
  •         नोटबंदी का बजट  (12फरवरी 2017https://goo.gl/ZTGJW9
  •         नींव का निर्माण फिर (09 जनवरी 2017https://goo.gl/eKN9ey
  •         कल क्या होगा? (31.दिसंबर 2016https://goo.gl/3LDc6H
  •         न होती नोटबंदी तो .. (26 दिसंबर 2016https://goo.gl/vufudv
  •         नोटबंदी की पहली नसीहत  (19 दिसंबर 2016https://goo.gl/oPavbu
  •         8.11.16 बनाम 6.6.66 और 1.7.91 (12 दिसंबर 2016) https://goo.gl/NNpKEd
  •        कैशलेस कतारों का ऑडिट  (04 दिसंबर 2016https://goo.gl/gLBQgk
  •        मैले हाथों से सफाई!  (28 नवंबर 2016https://goo.gl/3ZCJHa
  •        नोटबंदी की बैलेंस शीट (20 नवंबर 2016https://goo.gl/w25yTF
  •        काले धन की नसबंदी (14 नवंबर2016https://goo.gl/qXnFL6

पत्रकारिता कभी चुप नहीं हो सकती. यही उसका सबसे बड़ा गुण है और उसका बड़ा दोष भी. उसे हमेशा बोलना चाहिए. चाहे लोग आश्‍चर्य में डूबे हों या कि जीत की दुंदुभि बज रही या फिर खौफ का सन्‍नाटा पसर चुका हो. पत्रकारिता को तुरंत बोलना चाहिए - Henry Anatole Grunwald 

Sunday, November 5, 2017

नोटबंदी का तिलिस्मी खाता


चलिएकाला धन तलाशने में सरकार की मदद करते हैं. 

नोटबंदी को गुजरे एक साल गुजर गया. कोई बड़ी फतह हाथ नहीं लगी. ले-देकर गरीब कल्याण योजना में आए 5,000 करोड़ रुपए ही हैं जिन्हें अधिकृत तौर पर नोटबंदी का हासिल काला धन माना जा सकता है. शेष सब कुछ जांच युग में है या दावों पर सवार है.

तो कहां मिलेगा काला धन?

बगल में छोरागांव में ढिंढोरा.

काले धन के कुछ बड़े रहस्य सरकार की जन धन योजना के पास हो सकते हैं  गरीबों को बैंकिंग से जोडऩे के लिए जिसे शुरू किया गया था.

नोटबंदी के बाद सरकार जन धन पर सन्नाटा खींच गई है लेकिन आंकड़े तो उपलब्ध हैं. 

रिजर्व बैंक ने नोटबंदी के असर पर रिपोर्ट इसी मार्च में जारी की थी. वित्त मंत्री ने 3 फरवरी को संसद में एक सवाल के जवाब में कुछ जानकारी दी थीसरकारी आंकड़ों पर आधारित दूसरे अध्ययन भी उपलब्ध हैं.

इनके आधार पर देखिए कि नोटबंदी के दौरान जन धन क्या हुआ था?

·       नोटबंदी से पहले अप्रैल से जुलाई के बीच लगभग 73,000 खाते प्रति दिन खोले जा रहे थे लेकिन नोटबंदी के दौरान प्रति दिन दो लाख खाते खुले. नोट बदलने की सभी सीमाएं खत्म होने के बाद (मार्च से जुलाई से 2017) के बीच जन धन खाते खुलने का औसत दैनिक घटकर 92,000 पर आ गया.

·       नोटबंदी के ठीक बाद 23.30 करोड़ नए जन धन खाते खोले गए. इनमें से 80 फीसदी सरकारी बैंकों में खुले. लगभग 54 फीसदी शहरों में खुले और शेष गांवों की शाखाओं में. 

·      नोटबंदी के वक्त (9 नवंबर 2016) को इन खातों में कुल 456 अरब रुपए जमा थे जो 7 दिसंबर 2016 को 746 अरब रुपए पर पहुंच गए.

·       नोटबंदी के 53 दिनों में जन धन खातों में 42,187 करोड़ रुपए जमा हुए. इनमें से 18,616 करोड़ रुपए तो 9 नवंबर से 16 नवंबर के बीच शुरुआती आठ दिनों में ही इन खातों में जमा हो गए. ये आंकड़ा नोटबंदी से पहले के 53 दिनों के मुकाबले 1850 फीसदी ज्यादा है.

·      नोटबंदी के पहले जन धन खातों में औसतन 43 करोड़ रुपए का दैनिक जमा होता था. नोटबंदी शुरू हो होते ही पहले हक्रते में प्रति दिन 2,327 करोड़ रुपए जमा होने लगे. नोटबंदी खत्म होते ही एवरेज डेली ट्रांजैक्शन में 95 फीसदी की कमी दर्ज की गई.

·       नोटबंदी के दौरान जन धन की ताकत दिखाने वालों में गुजरात सबसे आगे रहा. 9 नवंबर 2016 से 25 जनवरी 2017 तक राज्य के जन धन खातों के डिपॉजिट में 94 फीसदी का इजाफा हुआ. इसी अवधि में कर्नाटक में जन धन डिपॉजिट 81 फीसदीमध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में 60 फीसदीझारखंड और राजस्थान में 55 फीसदीबिहार में 54 फीसदीहरियाणा में 50 फीसदीउत्तर प्रदेश में 45 फीसदी और दिल्ली में 44 फीसदी बढ़े.

·      जन धन खातों में नोटबंदी के पहले हक्रते में डिपॉजिट में 40 फीसदी की ग्रोथ देखकर 15 नवंबर 2016 को वित्त मंत्रालय ने एक बार में 50 हजार रुपए से ज्यादा राशि जन धन में जमा करने पर रोक लगा दी.

·       नोटबंदी के दौरान जन धन खातों का औसत बैलेंस 180 फीसदी तक बढ़ गया थाजो मार्च में घटकर नोटबंदी के पहले वाले स्तर पर आ गया.

·       गरीबों के जीरो बैलेंस खातों का व्यवहार गहरे सवाल खड़े करता है. नोटबंदी के दौरान इन खातों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी का रहस्य क्या है?  

वित्त मंत्री ने फरवरी में संसद को बताया था कि विभिन्न खाताधारकों (जन धन सहित) को आयकर विभाग ने 5,100 नोटिस भेजे हैंइसके बाद नोटबंदी जन धन इस्तेमाल की जांच कहां खो गई?

नोटबंदी के दौरान अनियमितता को लेकर बैंकों की शुरू हुई जांच भी बीच में क्यों छूट गई?

हम इतनी जल्दी इस निष्कर्ष‍ पर नहीं पहुंचना चाहते कि जन धन खातों का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग में हुआ लेकिन नोटबंदी के दौरान बैंकों के भीतर बहुत कुछ ऐसा हुआ है जो रहस्यमय है और नोटबंदी की विफलता की वजह हो सकता है.

आम लोगों को बैंकिंग से जोडऩे के सबसे बड़े अभियान की बदकिस्मती यह है कि वह सरकार के नीति रोमांच का शिकार हो कर दागी हो गया. बैंकिंग पर आम लोगों के भरोसे को गहरी चोट लगी है.

लोकतंत्र में जनता अजातशत्रु होती है. यह सरकारों की विफलताओं को भी पचा लेती है. नीतियों को पारदर्शी होना चाहिए. पहली बरसी पर क्या सरकारनोटबंदी के दौरान बैंकिंग संचालनों और जन धन की जांच के नतीजे देश से बांटना चाहेगी?


गलतियों से सीखने का नियम केवल मानवों के लिए ही आरक्षित नहीं हैसर्वशक्तिमान सरकारें भी नसीहत लें तो क्या हर्ज है?

Sunday, October 29, 2017

याद हो के न याद हो


राजनेताओं की सबसे बड़ी सुविधा खत्म हो रही है. लोगों की सामूहिक विस्मृति का इलाज जो मिल गया है.

जॉर्ज ऑरवेल (1984) ने लिखा था कि अतीत मिट गया है, मिटाने वाली रबड़ (इरेजर) खो गई है, झूठ ही अब सच है. ऑरवेल के बाद दुनिया बहुत तेजी से बदली. अतीत मिटा नहीं, रबड़ खोई नहीं, झूठ को सच मानने की उम्र लंबी नहीं रही.

लोगों की कमजोर याददाश्त ही नेताओं की सबसे बड़ी नेमत है. लोगों का सामूहिक तौर पर याद करना और भूलना दशकों तक नेताओं के इशारे पर होता था लेकिन अब बाजी पलटने लगी है. अचरज नहीं कि अगले कुछ वर्षों में इंटरनेट राजनीति का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाए. सरकारें सोशल मीडिया सहित इंटरनेट के पूरे परिवार से बुरी तरह खफा होने लगी हैं.

इंटरनेट लोगों का सामूहिक अवचेतन है. यह न केवल करोड़ों लागों की साझी याददाश्त है बल्कि इसकी ताकत पर लोग समूह में सोचने व बोलने लगे हैं.

तकनीकें आम लोगों के लिए बदली हैं, राजनीति के तौर-तरीके तो पुराने ही हैं. झूठ और बड़बोलापन तो जस के तस हैं. दूरदर्शिता और दूर की कौड़ी के बीच विभाजक रेखा और धुंधली हो गई है.

राजनेता चाहते हैं:
·       लोग उन्हें समूह में सुनें लेकिन अकेले में सोचें.

·       अगर समूह में सोचें तो सवाल न करें.

·       अगर सवाल हों तो उन्हें दूसरे समूहों से साझा न करें. 

·       सवाल अगर सामूहिक भी हों तो वे केवल इतिहास से पूछे जाएं, वर्तमान को केवल धन्य भाव से सुना जाए.

दकियानूसी राजनीति और बदले हुए समाज का रिश्ता बड़ा रोमांचक हो चला है. इस चपल, बातूनी, बहसबाज और खोजी समाज पर कभी-कभी नेताओं को बहुत दुलार आता है लेकिन तब क्या होता है जब यही समाज पलट कर नेताओं के पीछे दौड़ पड़ता है. लोगों की सामूहिक डिजिटल याददाश्त अब राजनीति के लिए सुविधा नहीं बल्कि समस्या है.

अकेलों के समूह
राजनैतिक रैलियां अप्रासंगिक हो चली हैं. भारी लाव-लश्कर, खरीद या खदेड़ कर रैलियों में लाए गए लोग जिनमें समर्थकों या विरोधियों की पहचान भी मुश्किल है. तकनीक कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से नेताओं को उनके जिंदाबादियों से जोड़ सकती है. इसके बाद भी रैलियां पूरी दुनिया में होती हैं.

नेता चुपचाप बैठी भीड़ से खि‍ताब करना चाहते हैं. यही उनकी ताकत का पैमाना है. रैली राजनीति के डिजाइन के अनुसार लोगों को सिर्फ सुनना चाहिए. लेकिन अब लोग सुनते ही नहीं, समूह या नेटवर्क में सोचते भी हैं. वे अपनी साझी याददाश्त से किस्म-किस्म के तथ्य निकाल कर सवालों के जुलूस को लंबा करते चले जाते हैं.

आंकड़े बनाम अनुभव
अपनी तरह का पहला, अभी तक का सबसे बड़ा, देश के इतिहास में पहली बारअब, नेताओं के भाषण इनके बिना नहीं होते. पिछली पीढ़ी के राजनेता इतने आंकड़े नहीं उछालते थे. अब तो कच्चे-पक्के, खोखले-पिलपिले आंकड़ों के बिना समां ही नहीं बंधता. शायद इसलिए कि लोग आंकड़े समझने लगे हैं और वे समूह में सोचें तो इनका इस्तेमाल कर सकें.

मुसीबत यह है कि लोगों के अनुभव आंकड़ों से ज्यादा ताकतवर हैं. भोगा हुआ विकास, बतलाए गए विकास पर भारी पड़ता है. इसलिए जब लोगों के निजी और अधिकृत एहसास, सामूहिक चिंतन तंत्र (सोशल नेटवर्क) पर बैठ आगे बढ़ते हैं तो सरकारी आंकड़ों की साख का कचरा बन जाता है.

इतिहास का चुनाव
यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के प्रोफेसर जॉन जे. मियरशीमर, राजनेताओं के झूठ का (पुस्तक: व्हाई लीडर्स लाइ) अध्ययन करते हैं. उनके मुताबिक, इतिहास, राजनैतिक झूठ का सबसे कारगर कारिंदा है. इसके सहारे खुद को महान और अतीत को बुरा बताना आसान है. इतिहास के सहारे एक लक्ष्यनहीन गुस्से को लंबे वक्त तक सिंझाया जा सकता है. इतिहास है तो वर्तमान मुसीबतों पर उठ रहे सवालों के जवाब गुजरे वक्त से मांगे जा सकते हैं.

राजनेता चाहते हैं इतिहास के चयन में उनकी बातें मानी जाएं. अलबत्ता नेता यह भूल जाते हैं कि वे खुद भी तो प्रतिक्षण इतिहास गढ़ रहे हैं. लोग इतिहास अपनी सुविधा से चुनते हैं जिसमें अक्सर नेताओं का ताजा इतिहास सबसे लोकप्रिय पाया जाता है.

राजनीति गहरी मुश्किल में है. लोग नहा-धोकर सियासी झूठ के पीछे पड़े हैं. झूठ पकडऩा अब एक रोमांचक पेशा है. लोगों की उंगलियां प्रति सेकंड की रक्रतार से सवाल उगल रही हैं. लोकतंत्र के लिए इससे अच्छा युग और क्या हो सकता है.

सुनो जिक्र है कई साल का, कोई वादा मुझ से था आप का

वो निभाने का तो जिक्र क्या, तुम्‍हें याद हो के न याद हो