Friday, July 10, 2020

दूसरी ‘महामारी’



बीमारी तो चली जाएगी लेकिनमहामारी’! करीब 80 बसंत देख चुके बाबा ने गांव लौटते मजदूरों को देखकर कपाल पर हाथ मारा तो लोग पूछ बैठे कौन-सी महामारी! बाबा बुदबुदाए, नहिं दरिद्र सम दुख...

अनुभव-पके बाबा ने जो लॉकडाउन के दौरान देखा था वही अब आंकड़ों में उभर रहा है. वर्षों बाद भारत में प्रति व्यक्तिआय में कमी (5.7 फीसद) हुई है जो जीडीपी में गिरावट (3.8 फीसदसे ज्यादा है. गरीबी की वापसी भारत की पूरी ग्रोथ गणि को बिगाड़ सकती है.

पांच ताजा तथ्य बताते हैं कि आत्मनिर्भर पैकेज के बाद सरकार यूं ही मनरेगा का नया मोदी संस्करण (25 स्कीमों को मिलाकर) नई ग्रामीण रोजगार योजना नहीं लाई और मुफ्त अनाज की स्कीम को तीन माह के लिए ऐसी ही नहीं बढ़ा दिया गया.

अर्थव्यवस्था की समग्र आय में खेती का हिस्सा 18.2 फीसद है लेकिन अर्थव्यवस्था में समग्र मजदूरी और वेतन भुगतान में कृषिमजदूरी का हिस्सा केवल 8.2 फीसद है. खेती में 2012 से 17 के बीच बढ़ी हुई आय (जीवीए) का केवल 15.3 फीसद हिस्सा मजदूरी में गया. शेष पूंजी लगाने वालों के पास रह गया. खेती में उपज और कमाई बढ़ने से मजदूरी नहीं बढ़ी.

खेती जो सबसे ज्यादा कामगारों को अपनी छोटी सी पीठ पर लादे (जीडीपी में हिस्सा 14 फीसद, कुल कामगार 28 करोड़) है, वहां श्रम की आपूर्ति बढ़ने से मजदूरी और कम होनी है. सनद रहे कि करीब 5.6 करोड़ (मजदूर और भूमिहीन) किसा परिवारोंपीएम किसानकी सीधी मदद नहीं मिलती.

रोजगार का आंकड़ा देने वाली एजेंसी सीएमआइई और शिकागो यूनिवर्सिटी के सर्वे (5,800 परिवार 27 राज्य) के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान, 88 फीसद ग्रामीण परिवारों की आय में कमी आई. 3,800 रुपए मासिक आय वाले परिवारों की हालत सबसे ज्यादा खराब है. 34 फीसद परिवार बाहरी मदद के बिना केवल एक हफ्ता काम चला सकते हैं और 30 फीसद के पास एक माह से ज्यादा की क्षमता नहीं है.

लॉकडाउन के दौरान (दस करोड़ रोजगारों का नुक्सान) अकुशल श्रमिक, छोटे व्यापारी और दैनिक मजदूरों के काम बंद हुए. पिछले तीन माह में किसानों और कृषिमजदूरों की तादाद बढ़ी जबकि छोटे व्यापारी (पान, चायरेहड़ी) कम हुएसीएमआइई

कोवि से पहले शहरों में काम करने वाले श्रमिकों की औसत मासिक कमाई 11,000 रुपए (5,000 रुपए से 15,000 रुपए) थी. जिसमें करीब 7,000 रुपए वापस गांव पहुंचते थे (मार्ट ग्लोबल सर्वे) जो जीडीपी का करीब दो फीसद है. प्रवासी श्रमिकों की वापसी के साथ यह हस्तांतरण रुक जाएगा. दूसरी तरफ लौट रहे लोगों को मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी, उनकी शहरी पगार की एक-चौथाई होगी.

कोविड के बाद केंद्र की घोषणाओं में भीड़ में अगर सीधी मदद की तलाश की जाए तो 20 करोड़ महिला जनधन खातों में तीन माह में केवल 1,500 रुपए दिखते हैं, जो आठ दिन की मनरेगा मजदूरी के बराबर है. राज्यों की सहायताएं भी ऐसी ही प्रतीकात्मक हैं. अन्य स्कीमें पहले से चल रही हैं.

कंपनियां नाहक ही परेशान नहीं हैं. यह गरीबी साबुन, तेल, मंजन, दोपहिया वाहन, सस्ते कपड़ों, सोना-चांदी, इंटरनेट, भवन निर्माण सामग्री की मांग पर भारी पडे़गी. गांवों में मांग टूटेगी और शहरों की फैक्ट्रियों में रोजगार.

कोवि के बाद उभर रही गरीबी का एक परोक्ष चेहरा भी है. डिजिटल शिक्षा एक बड़ी आबादी को मुख्यधारा से बाहर कर देगी. चिकित्सा महंगी होकर और सीमित होने का खतरा है जबकि एक बड़ी आबादी नई तकनीकों की दहलीज पर ठिठक जाएगी.

नेल्सन मंडेला ठीक कहते थे गरीबी, रंगभेद और गुलामी की तरह प्राकृति नहीं है. यह मानव निर्मित है और इसे खत्म किया जा सकता है. भारत दुनिया का पहला देश है जिसने इतनी बड़ी संख्या में (2005-06 से 2015-16 के बीच करीब 27 करोड़) लोगों को गरीबी से बाहर निकाला. आबादी के प्रतिशत के तौर पर गरीबी करीब आधी यानी 55 फीसद से 28 फीसद (यूनडीपी रिपोर्ट 2018) रह गई. लेकिन यही संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक मान रहे हैं कि कोविड बाद पूरी दुनिया में करीब 70 करोड़ से एक अरब लोग न्यू पुअर या नए गरीब होंगे. सरकार की मुफ्त अनाज स्कीम के 80 करोड़ लाभार्थियों को गिन लिया जाए तो फिर गरीबी का विस्फोट विश्व बैंक के आकलन से कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है.

मौसमी और तात्कालिक गरीबी को हटाने के बाद भी शहरों से आने वाली बचत की समाप्ति और ग्रामीण मजदूरी में कमी के बीच भारत में 10 से 35 करोड़ लोग गरीबी के दलदल में फिर धंस जाएंगे.

यह तादाद छोटी नहीं है. इस विभीषिका को रोकने लिए सीधी नकद सहायता और रोजगार संरक्षण तक सब कुछ किया जाना चाहिए. नहीं तो भारत के पिछले ढाई दशक की मेहनत बेकार हो जाएगी. सनद रहे कि गरीबी आती बहुत तेजी से है लेकिन इससे छुटकारे में पीढि़यां गुजर जाती हैं.

Friday, July 3, 2020

चीन के हमदम


 
चीन के नागरिक और हांगकांग के पूर्व गृह मंत्री पैट्रिक होमार्च 2018 में  उगांडा और चाड में रिश्वत और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में धरे गए थे. वे चाइना एनर्जी ग्रुप (चीन की सरकारी कंपनी) के लिए ठेके हासिल करते थे. इधर यूरोप में बुडापेस्ट-बेलग्रेड रेलवे परियोजना में चीन की कंपनियों की भूमिका को जांच चल ही रही थी कि 2019 की शुरुआत में बेल्ट ऐंड रोड इनिशि‍एटिव के जरिए मलेशि‍या में चीनी कंपनियों के भ्रष्टाचार की कथा खुल गई. उन्हें ऊंची कीमत पर ठेका मिला और कमिशन गया मलेशि‍या के स्टेट डेवलपमेंट फंड (1एमडीबी) कोजिसके तार देश के पूर्व प्रधानमंत्री से जुड़े थे.

हमारे लिए इन संदर्भों को जानना क्यों जरूरी है?

क्योंकि भारत दुनिया का पहला बड़ा लोकतंत्र होगा जहांचीनभाजपा और कांग्रेस यानी दोनों शीर्ष राजनैतिक दलों के भीतर तक पैठ गया है. सियासत में एक दूसरे के विरोधी इन दलों की वैचारिक संस्थाओं और इनकी सरकार से संरक्षि‍त संगठनों से चीन की निकटता और ज्ञान विनि‍मय अब सार्वजनिक हो चुका है.

एक दूसरे को चीन का ज्यादा गहरा दोस्त साबित’ कर रहे पार्टी प्रवक्ता हमें रोमांचि‍त नहीं करते बल्किा बुरी तरह चिंतित करते हैं क्योंकि दोनों दलों के हाथ में सरकारें हैं जि‍नके रिश्ते उस चीन से हैं जहां सरकारकम्युनिस्ट पार्टीसेनाकंपनियां और कारोबार एक ही व्यवस्था के अलग-अलग चेहरे हैं और चीनी कंपनियां दुनिया के सबसे संगठित भ्रष्टाचार की ध्वजावाहक हैं.

2012 के बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन की सरकारी कंपनियों को विराट ताकत देकर पूरी दुनिया में फैलाया और निजी कंपनियों को कम्युनिस्ट पार्टी संगठन से जोड़ा. 2018 तक चीन की 109 कंपनियां ग्लोबल फॉर्च्यून 500 का हिस्सा बन चुकी थीं और इनमें 85 फीसद चीनी कंपनियां सरकारी थीं.

चीन की कंपनियां कूटनीतिक रिश्तों का इस्तेमाल कर (ब्रुकि‍ंग्समैकेंजीमैक्केन के अध्ययन) विकासशील देशों में कारोबार लपकती हैं और सियासी नेतृत्व को प्रभावित करती हैं. वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की ताकत बढ़ाने में चीन टेलीकॉम दिग्गज जेडटीई की भूमिका और इक्वाडोर की सरकार पर चाइना नेशनल इलेक्ट्रानिक इंपोर्ट एक्सपोर्ट काॅर्पोरेशन के असर कुछ ताजा उदाहरण हैं.

चीन ने विकासशील देशों में कमजोर बुनियादी ढांचा और ऊर्जा की कमी को निशाना बनाकर बेल्ट ऐंड रोड इनिशि‍एटिव (बीआरआइ) शुरू किया जिसे पाकिस्तान और मलेशि‍या कॉरिडोर ऑफ करप्शन कहा जाता है. जो देश बीआरआइ से बाहर थे वहां भी चीनी कंपनियां सस्ती तकनीकभारी पूंजी लेकर घुसी हैं. सरकार को संभाल कर बड़े ठेके ले उड़ीं. केन्या और उगांडा में इस तरह की भ्रष्टाचार कथाएं जांच और अभि‍योजन के दायरे में हैं. भारत में सड़कपुलअचल संपत्ति में चीनी कंपनियों की सक्रियता सार्वजनिक है. पिछले साल भारत और चीन ने ऊर्जा व तेल में दोस्ती का करार किया.

हुआवेजेडटीईबायदूअलीबाबाटेनसेंट जैसी निजी कंपनियां पहले चीन के नागरिक निगरानी तंत्र का हिस्सा बनीं फिर विकासशील देशों कें उभरते डि‍जि‍टल बाजार में पूंजी और तकनीक में बड़ा हिस्सा कब्जा लिया. हुआवे और जेडटीई को अमेरिका की सरकार ने खतरा घोषित किया है जबकि भारत के निजी व सरकारी टेलीकॉम नेटवर्क इनके बूते चल रहे हैं. बीते दिसंबर में ही हुआवे को भारत में 5जी के परीक्षण की मंजूरी मिली है.

अफ्रीका मे सक्रिय 87 फीसद चीनी कंपनियां रिश्वत देती हैं. 2019 में अमेरिकी सिक्यूरिटी एक्सचेंज क‌मिशन से विदेशी रिश्वत कानून के तहत सजा पाई कंपनियों में चीन के मामले सबसे ज्यादा हैं. करीब 15 विकासशील देशों के ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का अध्ययन (2013) बताता है कि चीन की कंपनियां सबसे ज्यादा अपारदर्शी हैं. अचरज नहीं कि शी जिनपिंग के अभूतपूर्व भ्रष्टाचार निरोधक अभि‍यान के बावजूद 2018 में चीन की भ्रष्टाचार रैंकिं‍ग 10 अंक नीचे चली गई. चीन की तमाम सरकारी निजी कंपनियां किसी एक देश में घूस और मनीलॉन्ड्रिंग के कारण प्रतिबंधि‍त होती हैं लेकिन दूसरी जगह सरकार से साथ मिलकर काम कर रही होती हैं.

चीन का क्रोनी कैपि‍टलिज्म दुनिया में सबसे संगठित और बहुआयामी है. अन्य देशों के जिन कारोबारों में भ्रष्टाचार करते चीनी कंपनियों को पकड़ा गयाउन्हीं कारोबारों में वे भारत में भी सक्रिय हैं. देश को कभी नहीं बताया गया कि चीनी तकनीक और पूंजी को लाने में क्या एतिहात बरते गए हैं पर हमें पता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा संदिग्ध चीनी कंपनियां भारत में टेलीकॉमस्टार्ट अपफिनटेक क्रांति की अगुआ हैं.

जाहिर है कि हमें कभी नहीं बताया जाएगा कि भारत में चीनी कंपनियों की सक्रियता कितनी साफ-सुथरी है लेकिन हमें इतना पता चल गया है कि सरकारें (केंद्र राज्य) संभाल रहे या संभाल चुके देश के शीर्ष राजनैति‍क दल चीन के गहरे दोस्त हैं और यह रिश्ते राजनैतिक नहीं बल्कि आर्थि‍क भी हैं.

क्या बताऊं छुपा है मुझ में कौन 
कौन मुझ में छुपा रहा है मुझे – अब्दुर्रहमान मोमिन