Thursday, December 16, 2021

आइने में आइना



ज‍िसका डर था बेदर्दी वही बात हो गईवारेन बफे के ओव‍ेर‍ियन लॉटरी वाले स‍िद्धांत को भारतीय नीति आयोग की मदद मिल गई है. यह फर्क अब कीमती है क‍ि आप भारत के किस राज्य में रहते हैं और तरक्‍की के कौन राज्‍य में शरण चाहिए. 

जन्म स्थान का सौभाग्य यानी ओवेरियन लॉटरी (वारेन बफे-जीवनी द स्नोबॉल) का स‍िद्धांत न‍िर्मम मगर व्‍यावहार‍िक है. इसक फलित यह है क‍ि अध‍िकांश लोगों की सफलता में (अपवादों को छोड़कर) बहुत कुछ इस बात पर निर्भर होता है क‍ि वह कहां पैदा हुआ है यानी अमेरिका में या अर्जेंटीना में !

अर्जेंटीना से याद आया क‍ि क‍ि वहां के लोग अब उत्‍तर प्रदेश या बिहार से सहानुभूति रख सकते हैं. मध्‍य प्रदेश झारखंड वाले, लैटिन अमेर‍िका या कैरेब‍ियाई देशों के साथ भी अपना गम बांट सकते हैं. गरीबी की पैमाइश के नए फार्मूले के बाद भारत की सीमा के भीतर आपको स्‍वीडन या जापान तो नहीं लेक‍िन अफ्रीकी गिन‍िया बिसाऊ और केन्‍या (प्रति‍ व्‍यक्‍ति‍ आय) से लेकर पुर्तगाल व अर्जेंटीना तक जरुर मिल जाएंगे.

बफे ने बज़ा फरमाते हैं क‍ि सफलता केवल प्रतिभा या क्षमता से ही तय नहीं होती है, जन्‍म स्‍थान के सौभाग्‍य से तय होती है. जैसे क‍ि  अर्जेंटीना की एक पूरी पीढ़ी दशकों से खुद पूछ रही है क‍ि यद‍ि यहां न पैदा न हुए होते तो क्‍या बेहतर होता?

अर्जेंटीना जो 19 वीं सदी में दुन‍िया के अमीर देशों में शुमार था उसका संकट इतनी बड़ी पहेली बन गया गया कि आर्थ‍िक गैर बराबरी की पैमाइश का फार्मूला (कुजनेत्‍स कर्व) देने वाले, जीडीपी के प‍ितामह सिमोन कुजनेत्‍स ने कहा था क‍ि दुनिया को चार हिस्‍सों - व‍िकस‍ित, अव‍िकस‍ित, जापान और अर्जेंटीना में बांटा जा सकता है.

Image – Kujnets Curve and Simon Kujnets

कुजनेत्‍स होते तो, भारत भी एसा ही पहेलीनुमा दर्जा देते. जहां भारत की उभरती अर्थव्‍यवस्‍था वाली तस्‍वीर भीतरी तस्‍वीर की बिल्‍कुल उलटी है. भारत में गरीबी की नई नापजोख बताती है क‍ि तेज ग्रोथ के ढाई दशकों, अकूत सरकारी खर्च, डबल इंजन की सरकारों के बावजूद अध‍िकांश राज्‍यों 10 में 2.5 से 5 पांच लोग बहुआयामी गरीबी के शिकार हैं. यह हाल तब है कि नीति‍ आयोग की पैमाइश में कई झोल हैं.

गरीबी की बहुआयामी नापजोख नया तरीका है जो संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के जर‍िये दुन‍िया को मिला है. इसमें गरीबी को केवल कमाई के आधार पर नहीं बल्‍क‍ि सामाजिक आर्थ‍िक विकास के 12 पैमानों पर मापा जाता है. इनमें पोषण, बाल और किशोर मृत्यु दर, गर्भावस्‍था के दौरान देखभाल, स्कूली शिक्षा, स्कूल में उपस्थिति और खाना पकाने का साफ ईंधन, स्वच्छता, पीने के पानी की उपलब्धता, बिजली, आवास और बैंक या पोस्ट ऑफ़िस में खाते को शाम‍िल किया गया है

इस नापजोख में पेंच हैं. जैसे क‍ि इसके तहत मोबाइल फ़ोन, रेडियो, टेलीफ़ोन, कम्प्यूटर, बैलगाड़ी, साइकिल, मोटर साइकिल, फ़्रिज  में से कोई दो उपकरण (जैसे साइकिल और रेडियो) रखने वाले परिवार गरीब नहीं है घर मिट्टी, गोबर से नहीं बना है, तो गरीब नहीं. बिजली कनेक्‍शन, केरोस‍िन या एलपीजी के इस्‍तेमाल और परिवार में किसी भी सदस्य के पास बैंक या पोस्ट ऑफ़िस में अकाउंट होने पर उसे गरीब नहीं माना गया है. इसल‍िए अधि‍कांश शहरी गरीब को सरकार के ल‍ि‍ए गरीब नहीं हैं. तभी तो दिल्‍ली में गरीबी 5 फीसदी से कम बताई गई.

सरकारें आमतौर पर गरीबी छि‍पाती हैं, नतीजतन इस रिपोर्ट की राजनीत‍िक चीरफाड़ स्‍वाभाविक हैं, फिर भी हमें इस आधुन‍िक पैमाइश से जो निष्‍कर्ष मिलते हैं वे कोई तमगे नहीं है जिन पर गर्व किया जाए.

-    इस फेहर‍िस्‍त में जो पांच राज्‍य समृद्ध की श्रेणी में है पंजाब श्रीलंका या ग्‍वाटेमाला जैसी और तमि‍लनाडु अर्जेंटीना या पुर्तगाल जैसी अर्थव्‍यवस्‍थायें (उनमें जीडीपी महंगाई सहि‍त और पीपीपी) हैं. इसी कतार में आने वाले  केरल को अधिकतम जॉर्डन या चेक गणराज्‍य, सि‍क्‍क‍िम को बेलारुस और गोवा को एंटीगा के बराबर रख सकते हैं.

-    यद‍ि विश्‍व बैंक के डॉलर क्रय शक्‍ति‍ पैमाने से देखें को उत्‍तर प्रदेश, पश्‍च‍िम अफ्रीकी देश बेन‍िन और बिहार गिन‍िया बिसाऊ होगा. जीडीपी के पैमानों पर उत्‍तर प्रदेश पेरु और बिहार ओमान जैसी अर्थव्‍यवस्‍था हो सकती है. महाराष्‍ट्र, पश्‍च‍िम बंगाल, कर्नाटक, राजस्‍थान, आंध्र, मध्‍य प्रदेश तेलंगाना जैसे मझोले राज्‍य भी सर्बिया, थाइलैंड, ईराक, कजाकस्‍तान या यूक्रेन जैसी अर्थव्‍यवस्‍थायें हैं. इनमें कोई भी किसी विकस‍ित देश जैसा नहीं है.

धीमी पड़ती विकास दर, बढ़ते बजट घाटों और ढांचागत चुनौ‍त‍ियों की रोशनी में यह पैमाइश हमें कुछ बेहद तल्‍ख नतीजों की तरफ ले जाती है जैसे क‍ि

-    बीते दो दशकों में भारत की औसत विकास दर छह फीसदी रही, जो इससे पहले के तीन दशकों के करीब दोगुनी है. अलबत्‍ता सुधारों के 25 सालों में तरक्‍की की सुगंध सभी राज्‍यों तक नहीं पहुंची. सीएमआईई और रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक बीते बीस सालों में सबसे अगड़े और पिछड़े राज्‍यों में आय असमानता करीब 337 फीसदी बढ गई यानी क‍ि उत्‍तर प्रदेश आय के मामले में कभी भी स‍िक्‍कि‍म या पंजाब नहीं हो सकेगा.

-    औसत से बेहतर प्रदर्शन करने वाले ज्‍यादातर राज्‍य व केंद्रशास‍ित प्रदेश छोटे हैं यानी क‍ि उनके पास प्रवासि‍यों को काम देने की बड़ी क्षमता नहीं हैं. उदाहरण के ल‍िए अकेले बिहार या उत्‍तर प्रदेश में गरीबों की तादाद, नीति आयोग की गणना में ऊपर के पायदान पर खड़े नौ राज्‍यों में संयुक्‍त तौर पर कुल गरीबों की संख्‍या से ज्‍यादा है. यानी क‍ि बिहार यूपी के लोग जन्‍म स्‍थान दुर्भाग्‍य का चि‍रंतन सामना करेंगे.   

-    समृद्ध राज्‍यों की तुलना में पि‍छड़े राज्‍य श‍िक्षा स्‍वास्‍थ्‍य पर कम खर्च करते हैं लेक‍िन अगर सभी राज्‍यों पर कुल बकाया कर्ज का पैमाना लगाया जाए तो सबसे आगे और सबसे पीछे के राज्‍यों पर बकायेदारी लगभग बराबर ही है.

आर्थ‍िक राजनीत‍िक और सामाज‍िक तौर पर चुनौती अब शुरु हो रही है. भारत के विकास के सबसे अच्‍छे वर्षों में जब असमानता नहीं भर पाई तो तो आगे इसे भरना और मुश्‍क‍िल होता जाएगा. गरीबी नापने के नए पैमाने और वित्‍त आयोग की सि‍फार‍िशें बेहतर राज्‍यों को ईनाम देने की व्‍यवस्‍था दते हैं है जबक‍ि केंद्रीय सहायता में बड़ा हिस्‍सा गरीब राज्‍यों को जाता है.

अगड़े राज्‍य अपने बेहतर प्रदर्शन के लिए इनाम मांगेगे, संसाधनों में कटौती नहीं. यह झगड़ा जीएसटी पर भी भारी पड़ सकता है क्‍यों क‍ि निवेश को आकर्षि‍त करने ‍के लिए राज्‍यों को टैक्‍स र‍ियायत देने की आजादी चाहिए.

सरकारों को नीतियों का पूरा खाका ही बदलना होगा. स्‍थानीय अर्थव्‍यवस्‍थाओं के क्‍लस्‍टर बनाने होंगे और छोटों के ल‍िए बड़े प्रोत्‍साहन बढ़ाने होंगे, नहीं तो रोजगारों के ल‍िए अंतरदेशीय प्रवास पर राजनीति शुरु होने वाली है. हरियाणा और झारखंड एलान कर चुके हैं क‍ि रोजगार पर पहला हक राज्य के निवासियों का है.

यह असमानतायें भारत को एक दुष्‍चक्र में खींच लाई हैं जिसका खतरा गुन्‍नार मृदाल ने हमें 1944 ( क्‍युम्‍युलेटिव कैजुएशन) में ही बता दिया था.

मृदाल के मुताबिक अगर वक्‍त पर सही संस्‍थायें आगे न आएं तो शुरुआती तेज विकास बाद में बड़ी असमानताओं में बदल जाता  है. भारत में यही हुआ है, सुधारों के शुरुआती सुहाने नतीजे अब गहरी असमानताओं में बदलकर सुधारो के लि‍ए ही खतरा बन रहे हैं. ठीक एसा ही लैटि‍न अमेर‍िका के देशों के साथ हुआ है.  

भारतीय राजनीत‍ि अपनी पूरी ताकत लगाकर भी यह असमानतायें नहीं पाट सकती. वह एक बड़ी आबादी को ओवेर‍ियन लॉटरी की सुवि‍धा नहीं दे सकती. अलबत्‍ता इन अंतराराज्‍यीय असमानताओं बढ़ने से रोक द‍िया जाए क्‍यों क‍ि यह दरार बहुत चौड़ी है. नीति आयोग की रिपोर्ट को घोंटने पर पता चलता है क‍ि 1.31 अरब की कुल आबादी 28.8 करोड़ गरीब गांव में रहते हैं और केवल 3.8 करोड़ शहरों में.

यानी क‍ि गाजीपुर बनाम गाजियाबाद या चंडीगढ़ बनाम मेवात वाली स्‍थानीय असमानताओं की बात तो अभी शुरु भी नहीं हुई है.

 


Monday, December 6, 2021

वाह सुधार, आह सुधार


इतिहास स्‍वयं को हजार तरीकों से दोहराता रह सक‍ता है. लेकि‍न संदेश हमेशा बड़े साफ होते हैं. इतने साफ क‍ि हम माया सभ्‍यता की स्‍मृ‍त‍ियों को भारत में कृषि‍ कानूनों की वापसी के साथ महसूस कर सकते हैं. अब तो पुराने नए सबकों का एक पूरा कुनबा तैयार है जो हमें  इस सच से आंख मिलाने की ताकत देता है क‍ि चरम सफलता व लोकप्र‍िता के बाद भी, शासक और सरकारें हकीकत से कटी पाई जा सकती हैं

स्‍पेनी हमलावर नायकों पेड्रो डी अल्‍वराडो और हरमन कोर्टेस को भले ही माया सभ्‍यता को मिटाने का तमगा या तोहमत म‍िला हो लेक‍िन  अल्‍वराडो 16 वीं सदी की शुरुआत में जब यूटेलटान (आज का ग्‍वाटेमाला) पहुंचा तब तक महान माया साम्राज्‍य दरक चुका था. शासकों और जनता के बीच व‍िश्‍वास ढहने  से इस सभ्‍यता की ताकत छीज गई थी.  माया नगर राज्‍यों में सत्‍ता के ज‍िस केंद्रीकरण ने भाषा, ल‍िप‍ि कैलेंडर, भव्‍य नगर व भवन के साथ यह चमत्‍कारिक सभ्‍यता (200 से 900 ईसवी स्‍वर्ण युग) बनाई थी उसी में केंद्रीकरण के चलते शासकों ने आम लोगों खासतौर पर क‍िसानों कामगारों से जुडे एसे फैसले क‍िये जिससे भरोसे का तानाबाना बिखर गया. इसके बाद माया सम्राट केइश को हराने में अल्‍वराडो और हरमन कोर्टेस को ज्‍यादा वक्‍त नहीं लगा. 

2500 वर्ष में एसा  बार बार होता रहा है क‍ि शासक और सरकारें अपनी पूरी सदाशयता के बावजूद वास्‍तविकतायें समझने में चूक जाती हैं, व्‍यवस्‍था ढह जाती हैं और बने बनाये कानून पलटने पड़ते हैं. एक साल बाद कृषि‍ कानूनों को वापस लेने की चुनावी व्‍याख्‍या तो कामचलाऊ है. इन्‍हें गहराई में जाकर देखने पर सवाल गुर्राता है क‍ि बड़े आर्थि‍क सुधारों से लोग सहमत क्‍यों नहीं हो रहे?

भारत में राजनीतिक खांचे इतने वीभत्‍स हो चुके हैं क‍ि नीत‍ियों की सफलता-व‍िफलता पर न‍िष्‍पक्ष शोध दुर्लभ हैं.  अलबत्‍ता इस  मोहभंग की वजहें तलाशी जा सकती हैं . बीते एक दशक से आईएमएफ यह समझने की कोशिश कर रहा है क‍ि उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं में सुधार पटरी से क्‍यों उतर जाते हैं. 

व‍िश्‍व बैंक और ऑक्‍सफोर्ड यून‍िवर्सिटी का  ताजा अध्‍ययन,  (श्रुति‍ खेमानी 2020 )  भारत में कृषि‍ सुधारों की पालकी लौटने के संदर्भ में बहुत कीमती है. इस अध्‍ययन ने पाया क‍ि दुन‍िया में सुधारों का पूरा फार्मूला केवल तीन उपायों में सि‍मट गया है. एक है न‍िजीकरण, दूसरा और कानूनों का उदारीकरण और  सब्‍सिडी खत्‍म करना. दुनिया के अर्थव‍िद इसे  हर मर्ज की संजीवनी समझ कर चटाते हैं.  मानो सुधारों का मतलब स‍िर्फ इतना ही हो.

राजनीति‍ लोगों की नब्‍ज क्‍यों नहीं समझ पाती ? अर्थव‍िद अपने स‍िद्धांत कोटरों से बाहर क्‍यों नहीं न‍िकल पाते? सुधार उन्‍हीं को क्‍येां डराते हैं जिनको इनका फायदा मिलना चाह‍िए? जवाब के ल‍िए असंगति की  इस गुफा में गहरे पैठना जरुरी है. सुधारों की परिभाषा केवल जिद्दी तौर सीम‍ित ही नहीं हो गई है बल्‍क‍ि इनके केंद्र में आम लोग नजर नहीं आते. भले ही यह फैसले बाद में बडी आबादी को फायदा पहुंचायें   लेक‍िन इनके आयोजन और संवादों के मंच पर में  कं  पनियां‍ और उनके एकाध‍िकार दि‍खते हैं  जैसे क‍ि बैंकों के निजीकरण की चर्चाओं के केंद्र में जमाकर्ता या बैंक उपभोक्‍ता को तलाशना मुश्‍क‍िल है. कृष‍ि सुधारों का  आशय तो किसानों की आय बढाना था लेक‍िन उपायों के पर्चे पर नि‍जीकरण, कारपोरेट वाले चेहरे छपे थे. इसलिए सुधार ज‍िनके ल‍िए बनाये गए थे वही लोग बागी हो गए.

भारत ही नहीं अफ्रीका और एशि‍या के कई देशों में कृषि‍ सुधार सबसे कठ‍िन पाए गए हैं. कृषि‍ दुन‍िया की सबसे पुरानी नि‍जी आर्थ‍िक गति‍वि‍ध‍ि है. सद‍ियों से लोकमानस में यह संप त्‍ति‍ के मूलभूत अध‍िकार और व जीविका के अंति‍म आयोजन के तौर पर उपस्‍थि‍त है. उद्योग, सेवा या तकनीक जैसे किसी दूसरे आर्थ‍िक उत्‍पादन  की तुलना में खेती बेहद व्‍यक्‍त‍िगत, पार‍िवार‍िक और सामुदाय‍िक  आर्थ‍िक उपार्जन है. कृषि‍ सुधारों का सबसे सफल आयोजन चीन में हुआ लेक‍िन वहां भी इसलि‍ए क्‍यों क‍ि देंग श्‍याओ पेंग ने (1981)  कृषि‍ के उत्‍पादन व लाभ पर किसानों का अधिकार सुन‍िश्‍च‍ित कर दि‍या.

 

आर्थ‍िक सुधार  पहले चरण में  बहुत सारी नेमतें बख्शते हैं. जैसे क‍ि 1991 के सुधार से भारत को बहुत कुछ मिला. लेक‍िन प्रत्येक सुधार 1991 वाला नहीं होताआर्थि‍क सुधार दूसरे चरण में  कुर्बान‍ियां मांगते हैं.  इसके ल‍िए  सुधारों के विजेताओं और हारने वालों के ईमानदार मूल्‍यांकन चाह‍िए.   अर्थशास्‍त्री मार्केट सक्‍सेस की दुहाई देते हैं मगर मार्केट फेल्‍योर (बाजार की विफलताओं) पर चर्चा नहीं करते. जिसके गहरे तजुर्बे आम लोगों के पास हैं इसलिए सरकारी नीति‍यो के अर्थशास्‍त्र पर आम लोगों का अनुभवजन्‍य अर्थशास्‍त्र भारी पड़ने लगा है.

सुधारों से च‍िढ़ बढ़ रही है  क्‍यों क‍ि सरकारें इन पर बहसस‍िद्ध सहमत‍ि नहीं बनाना चाहतीं.  जीएसटी हो या कृषि‍ बिल सरकार ने उनके सवाल ही नहीं सुने जिनके ल‍िए इनका अवतार हुआ था. सनद रहे क‍ि लोगों को सवाल पूछने की ताकत देने की ज‍िम्‍मेदारी भी सत्‍ता की है. शासन को ही यह तय करना होता है कि ताकत का केंद्रीकरण किस सीमा तक क‍िया जाए और फैसलों में लोगों की भागीदारी क‍िस तरह सुन‍िश्‍चि‍त की जाए.

दूसरे रोमन सम्राट ट‍िबेर‍ियस (42 ईपू से 37 ई) ने फैसले लेने वाली साझा सभा को समाप्‍त  कर दि‍या और ताकत सीनेट को दे दी. इसके बाद ताकत का केंद्रीकरण इस कदर बढ़ा कि आम रोमवासी अपने संपत्‍ति‍ अध‍िकारो को लेकर आशंक‍ित होने लगे. अंतत: गृह युद्धों व बाहरी युद्धों से गुजरता हुआ रोमन साम्राज्‍य करीब 5वीं सदी में ढह गया ठीक उसी तरह जैसा क‍ि माया सभ्‍यता में हुआ था.

बीते ढाई दशक में लोगों में आर्थिक सुधारों के फायदों और नुक्सानों की समझ बनी हैमंदी से टूटे  लोग कमाई और जीवन स्तर में ठोस बेहतरी के प्रमाण व उपाय चाहते हैं.  यही वजह है क‍ि विराट प्रचार तंत्र के बावजूद सरकार लोगों को सुधारों के फायदे नहीं समझा पाती.  सुधारों की भाषा उनके ल‍िए ही अबूझ हो गई जिनके ल‍िए उन्‍हें  गढ़ा जा रहा  है . सरकारें और उनके अर्थशास्‍त्री जिन्‍हें सुधार बताते  हैं जनता उन्‍हें अब सत्‍ता का अहंकार समझने लगी है.

कृषि कानूनों की दंभजन्‍य घोषणा पर ज‍ितनी चिंता थी उतनी ही फ‍िक्र  इनकी वापसी पर भी होनी चाह‍िए  जो सरकारों से विश्‍वास टूटने का प्रमाण है. भारत को सुधारों का क्रम व संवाद  ठीक करना होगा ताकि ईमानदार व पारदर्शी बाजार में भरोसा बना रहे. सनद रहे क‍ि गुस्साए लोग सरकार तो बदल सकते हैंबाजार नहींमुक्त बाजार पर विश्वास टूटा तो सब बिखर जाएगा क्योंकि कोई सरकार कितनी भी बड़ी होवह बाजार से मिल रहे अवसरों का विकल्प नहीं बन सकती.

 


Tuesday, November 30, 2021

महाक्रांति की हार


मैक्सिको और इजिप्ट और भारत को केवल उनका इत‍िहास ही नहीं  बल्‍क‍ि वर्तमान भी जोड़ता है.. तीनों ही दुनिया की महान प्राचीन सभ्यताओं (सिंधु, मिस्‍त्र, एजटेक, माया) की  लीला भूम‍ि हैं  अलबत्‍ता उनकी ताजी समानता इतनी गर्वीली नहीं है.

अगर महंगी मोबाइल सेवा को बिसूर रहे हैं तो भारत और इन देशों की समानता को समझना बहुत जरुरी है. तीनों ही देश अब दुनिया में बेडौल बाजारों के सबसे नए नमूने हैं. मैक्‍स‍िको का कार्लोस स्‍लिम आविष्कारक नहीं था. कमाई का स्रोत सियासी रसूख और स्टॉक ब्रोकिंग थे. 1990 में निजीकरण में उसने टेलीमैक्स (मैक्सिको की सरकारी टेलीकॉम कंपनी) को खरीद लिया और सरकारी एकाधिकार निजी मोनोपली में बदल गया.

होस्नी मुबारक सरकार ने 1990 में इजिप्ट में सरकारी एकाधिकार खत्म किये तो सरकार के करीबी उद्योगों ने एकाधिकार बना लिये.

भारत में भी दूरसंचार सेवा बेडौल बाजार (इम्‍परफेक्ट मार्केट) का सबसे नया नमूना है. 

ब्रिटेन की अर्थशास्‍त्री जोआन रॉबिनसन (1930) ने इस बाजार के खतरे को समय से पहले देख लिया था.  जोआन ने बताया था कि मोनोपली और मोनोस्पोनी की घातक जोड़ी असंतुलित बाजारों की पहचान है. मोनोपली के तहत चुनिंदा कंपनियां बाजार में आपूर्ति पर नियंत्रण कर लेती हैं. ग्राहक उनके के बंधक हो जाते हैं जबकि मोनोस्पोनी में यही कंपनियां मांग पर एकाधिकार जमा लेती है और रोजगार के अवसरों सीमित कर देती हैं जिससे रोजगार व कमाई में कमी आती है.

भारत के दूरसंचार बाजार में मोनोपली या डुओपोली और मोनोस्पोनी  डुओस्पोनी दोनों ही खुलकर खेल रही हैं.

सस्ता नहीं अब 

प्रतिस्पर्धा सिमटते (कभी 12 कंपनियां) ही दुनिया में सबसे सस्ती मोबाइल सेवा का सूर्य डूबने लगा था. 2018 तक रिलायंस जिओ बाजार में बड़ा हिस्सा लेकर डुओपोली बना चुकी थी. उसे अब सस्ती दरों पर लुभाने की जरुरत नहीं थी.

यद‍ि आपको लगता है कि मोबाइल दरों में महंगाई अभी शुरु हुई तो अपने पुराने बिल निकाल कर फि‍र देखिये.  बीते तीन साल में टेलीफोन की दरें करीब 25 फीसदी बढ़ीं. हालांक‍ि सस्‍ते मोबाइल वाली क्रांति का अंतिम गढ़ इसी जुलाई में टूटा जब वोडाफोन-आइडिया के संकट के बाद बाजार पूरी तरह जिओ और एयरटेल के बीच बंट गया.

जुलाई में ही एयरटेल ने सभी 22 सर्किल में 49 रुपये का सबसे सस्ता शुरुआती प्री पेड प्लान बंद कर दिया था. वोडाफोन आइडिया 13-14 सर्किल में 2 जी सेवा की दरें पहले ही बढ़ा चुका है. जुलाई के अंत तक सभी कंपनियों (जिओ रु. 75) के न्यूनतम प्री पेड प्लान की कीमत  75 से 79 रुपये (28 दिन वैधता) हो गई  थी.

एयरटेल की तरफ से ताजी मोबाइल महंगाई सबसे सस्‍ता प्लान  20 रुपये और सबसे ऊंची दर वाला प्‍लान पर 501 रुपये  महंगा हुआ है.  यानी अब एयरटेल के सबसे सस्‍ते प्‍लान के लिए 79 रुपये की जगह 99 रुपये और सबसे महंगे प्‍लान के लिए 2498 रुपये की जगह अब 2999 रुपये चुकाने होंगे.

इस महंगाई की बुन‍ियाद में दूरसंचार न‍ियामक का योगदान भी कम नहीं है. इसी स‍ितंबर टीआरएआई ने यह फरमान सुनाया था कि अब कंपन‍ियां एक जैसे ग्राहकों (यानी एक जैसे प्‍लान) को अलग अगल दरों पर सेवा नहीं दे सकेंगी. नंबर पोर्ट करने पर सस्‍ती सेवा देने की छूट भी खत्‍म हो गई थी. इसके बाद एक तरफा टेलीकॉम सेवा की एक तरफा महंगाई का रास्‍ता साफ हो गया था. जो अब शुरु हुई है.

एयर टेल  के ताजा फैसले से पहले ही यह तय हो चुका था क‍ि कंपनियों पर स्पेक्ट्रम देनदारी बढ़ने के कारण प्री पेड मोबाइल का न्यूनतम प्लान 100 रुपये/28 दिन तक पहुंच सकता है. (गोल्‍डमैन सैक्‍शे) अब एयर टेल क्‍या पूरे दूरसंचार उद्योग ने ही बता द‍िया है क‍ि इस कारोबार में  एवरेज रेवेन्यू पर यूजर (आरपू)   यानी हर ग्राहक से कमाई औसत (आरपो) 200 रुपये तो कम से कम होनी चाहिएआगे इसे 300 रुपये तक पहुंचना चाहिए ताकि कंपनियों को निवेश की गई पूंजी पर सही रिटर्न मिल सके. 

रोजगारों का अंधेरा

2007 के बाद भारत में सबसे ज्यादा रोजगार इसी एक सेवा ने दिये. जो तकनीक, नेटवर्किंग, हैंडसेट बिक्री से लेकर सेवा की मार्केटिंग तक फैले थे. अलबत्ता 2 जी लाइसेंस रद होने, कंपनियां बंद होने और हैंडसेट बाजार में उथल पुथल से डुओस्पोनी की शुरुआत हुई. 2018 मे अंत तक दूरसंचार कारोबार में करीब एक लाख नौकरियां जा चुकी थीं .कोविड के असर से करीब 70000 रोजगार और गए हैं. इस बाजार में करीब 20 लाख लोगों को काम रोजगार मिला है.( सीआईईएल एच आर 2018 और 2020 ).

दूरसंचार बाजार में रोजगार के अवसर सिमट गए हैं. वेतन टूट रहे हैं. नई तकनीकें रोजगार की संभावनायें और सीमित कर रही हैं

इसी उठापटक में 2 जी लाइसेंस रद होने के बाद प्रमुख सरकारी बैंकों के करीब 6000 करोड़ के बकाया कर्ज डूब गए. बैंकों के खातों में अभी 3 लाख करोड़ के कर्ज हैंभारत की सरकार अजीबोगरीब जंतु है. अभी कुछ महीने पहले तक यह दूरसंचार ‌कंपनियों से पिछली तारीख से लाइसेंस फीस की वसूली के लिए अदालत में लड़ रही थी. अब कंपनियों के चार साल तक इसे चुकाने से मोहलत दे दी गई है. पहले कंपनियों को महंगी कीमत पर स्पेक्ट्रम बेचा गया, अब उनसे वापस लिया जा रहा है. 

1999 से  लेकर  आज  तक  सरकारें  यह  तय  नहीं  कर   पाईं कि वे बाजार व सस्ती सेवा को फलने फूलने देना चाहती है या ‌फिर कंपनियों निचोड़ लेना चाहती है. पहले  मोटी  लाइसेंस  फीस  या  महंगा  स्पेक्ट्रम बेचने की जिद , फिर कंपनियों का डूबना और  फिर  माफी यानी (बेलआउट)  ... बीते 25 सालों में यह इतनी बार हुआ है कि इस क्रांति सभी फायदे खेत रहे. अब बाजार पर दो कंपनियों (एयर टेल-जिओ) का कब्जा इस कदर है कि तीसरी (वोडाफोन आइडिया) को जिलाये रखने के लिए उद्धार पैकेज आया है. जो केवल घिसट पाएगी, प्रतिस्पर्धा के के काबिल नहीं होगी.

क्रांतियों का अवतरण सफलता की चिरंतन गारंटी नहीं होते. प्रतिस्पर्धा की हिफाजत की बड़े जतन से करनी होती है. समग्र आबादी को सस्ती संचार सुविधा के लिए बाजार में प्रतिस्पर्धा के नियम नए सिरे लिखे जाने की जरुरत है. भारतीय बाजार कम से कम पांच बड़ी टेलीकॉम कंपनियों को फलने फूलने का मौका दे सकता है.  सनद रहे क‍ि फिनटेक, ई कामर्स और मोबाइल इंटरनेट  बाजारों में एकाधिकार का रास्‍ता, मोबाइल बाजार से पर एकाधिकार की मोहल्‍ले से जाता है.

कोविड लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन शिक्षा में भारत की डिजिटल खाई का विद्रूप चेहरा दिखा दिया है. भारत में अभी करीब 60-65 फीसदी लोगों के पास इंटरनेट नहीं है. करीब एक अरब लोग  पास स्मार्ट फोन नहीं रखते.  इससे पहले सब तक मोबाइल व इंटरनेट पहुंचे लेक‍िन इस बीच भारत की सबसे बड़ी और महत्‍वाकांक्षी क्रां‍ति महंगाई के कतलखाने में पहुंच गई है. ‍

 

 

 


Tuesday, November 23, 2021

महंगाई का संस्‍कार

 

मेरे शहर के न‍िजी अस्‍पतालों में सरकार घुस गई है. ओपीडी का पर्चा 800 रुपये से 1100 रुपये का हो गया. पूछने पर टका सा जवाब मुंह पर आ ग‍िरता है क‍ि कोव‍िड से सुरक्षा के ल‍िए सैनेटाइजेशन का खर्च बढ़ गया है!  अस्‍पतालों  से कौन पूछे क‍ि सैनेटाइज करना तो उनका सामान्‍य कार्य दाय‍ित्‍व है इसका अलग से पैसा क्‍यों ?    हम सरकार से भी यह कहां  पूछ पाते हैं क‍ि वैक्‍सीन, दवा, सस्‍ता अनाज आद‍ि देना तो उनकी स्‍वाभाव‍िक ज‍िम्‍मेदारी है, इसके ल‍िए ही तो हम गठरी भर टैक्‍स चुकाते हैं, तमाम बजटीय तामझाम का बिल उठाते हैं तो फिर पेट्रोल डीजल पर टैक्‍स बढ़ाने का क्‍या तुक?

बेवजह महंगाई भारत की  कारोबारी असंगति‍यों का हिस्‍सा है  लेक‍िन अब सरकारें टैक्‍स नीतियों में नए पहलू जोड़ कर इसे न‍ियम में बदल रही हैं. महामारी की छाया में महंगाई का नया संस्‍कार, पूरी ज‍िद के साथ सरकारी नी‍ति‍यों के फलक पर उकेरा जा रहा है. बाजार आगे बढ़ इस संस्‍कार को स्‍वीकार रहा है.

चुनावी चोट के बाद पेट्रोल डीजल पर एक्‍साइज ड्यूटी में कटौती पर सरकार को धन्‍यवाद लेक‍िन हमें यह पूछना होगा क‍ि मुफ्त अनाज व वैक्‍सीन वाली दीनदयाल मुद्रा (1.45 लाख करोड़ रुपये खर्च)  के ल‍िए, क्‍या पेट्रोल डीजल महंगा करना जरुरी था?

भोले भारतीय बजट टैक्‍स का पेंचो खम नहीं समझते. वे पश्‍च‍िमी मुल्‍कों के नागर‍िकों की तरह अपनी सरकारों का हलक पकड़ कर उनसे टैक्‍स का ह‍िसाब नहीं मांगते इसलिए उन्‍हें यह महसूस करा द‍िया जाता है क‍ि लोगों को मुफ्त वैक्‍सीन व अनाज देने के ल‍िए आपको तेल की महंगाई के अंगारों पर चलना होगा.

बजट एक दूरगामी व्‍यवस्‍था हैं, वे सभी अप्रत्‍याशि‍त आपदाओं का इंतजाम बना कर चलते हैं.  आकस्‍म‍िक न‍िधियों ( कंटेंजेंसी फंड, आपदा राहत कोष)  में करीब 31000 करोड़ (बजट 2021) का जमा है जो उसी बजट से पैसा पाते हैं जो जिसमें हमारा टैक्‍स जाता है. आपदा राहत कोष के ल‍िए चुन‍िंदा उत्‍पादों पर लगने वाले एक्‍साइज व कस्‍टम ड्यूटी पर  एक नेशनल कैलामिटी कंटेंजेंसी ड्यूटी (एनसीसीडी) लगती है. जो उनकी कीमत में जुड़कर हमारे पास आती है.  प्रधानमंत्री राहत कोष  और पीएम केयर्स भी इन्‍हीं संकटों का इंतजाम हैं.

बजट यह छूट भी देते हैं क‍ि आपदा के मारों पर टैक्‍स का चाबुक चलाने के बजाय बाजार से कर्ज बढ़ाकर राहत का इंतजाम कर ले. एसा हुआ भी. साल 20-21 में सरकार ने 13.71 लाख करोड़ रुपये का रिकार्ड कर्ज ल‍िया (7.1 लाख करोड़ 2019-20)  यह कर्ज हमारी बचत ही है जो बैंकों जर‍िये सरकार के पास पहुंचती है  फ‍िर भी हम पर टैक्‍स का नश्‍तर !

सनद रहे क‍ि व‍ित्‍त आयोग हर साल पांच साल में केंद्र व राज्‍य में आपदा राहत के ल‍िए संसाधनों के बंटवारे न‍ियम और संसाधनों का इंतजाम तय करता है. जिसमें अचानक टैक्‍स थोपना कहीं से शामि‍ल नहीं है. सेस लगाना तो हरगिज नहीं

सेस सबसे घट‍िया टैक्‍स माने जाते हैं जो टैक्‍सों के अलावा थोपे जाते हैं और भारत में वे ज‍िस काम के ल‍िए लगाये जाते हैं उसमें खर्च नहीं होते. वे उस फंड में भी नहीं जाते जो इस टैक्‍स के ल‍िए बने हैं. जैसे क‍ि सीएजी ने 2020 में अपनी रिपोर्ट में बताया क‍ि कच्‍चे तेल पर एक सेस से सरकार ने 2018 तक दस साल में 1.24 लाख करोड़ जुटाये लेक‍िन ऑयल इंडस्‍ट्रीज डेवलपमेंट बोर्ड को नहीं द‍िये गए. इस राशि‍ के इस्‍तेमाल मुफ्त अनाज व वैक्‍सीन का खर्च न‍िकल आता.

जीएसटी के जर‍िये कथि‍त टैक्‍स क्रांत‍ि के बावजूद 2018-19 तक सरकार का करीब 18 फीसदी राजस्‍व सेस व सरचार्ज से आने लगा था, जिन्‍हें टैक्‍स पारदर्शिता की दृष्‍टि‍ से संद‍िग्‍ध माना जाता है. इतने सेस और नाना प्रकार के कर्ज व टैक्‍स से मुफ्त वैक्‍सीन अनाज बांटने या अन्‍य कई खर्च चल सकते थे लेक‍िन बीते एक साल साल में केंद्र सरकार ने पेट्रोल डीजल पर एक्‍साइज ड्यूटी (ताजा कटौती से पहले) करीब 32-33 रुपये प्रति‍ लीटर के र‍िकार्ड स्‍तर पर पहुंचा दी.

 हमें यह नहीं बताया गया क‍ि इस नए टैक्‍स बोझ 3.44 लाख करोड़ रुपये कहां कैसे खर्च होंगे लेक‍िन यह महसूस करने के लिए बजट पढ़ने की जरुरत नहीं है क‍ि अब श‍िक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, पेयजल जैसी सेवायें ज‍िनके ल‍िए सरकार को टैक्‍स दे रहे हैं वह न‍िजी क्षेत्र से खरीद रहे हैं. अब सरकार हमसे न केवल सड़क बनाने के ल‍िए (रोड सेस) बल्‍क‍ि उस पर गाड़ी चलाने (वाहन पंजीकरण) के ल‍िए और उस पर चलने (टोल) के ल‍िए भी टैक्‍स लेती है.

सरकारें अब पुराने टैक्‍स का हि‍साब नहीं देतीं. वे खुद नए खर्च ईजाद करती हैं फिर उनके ल‍िए नए टैक्‍स थोपती हैं.

इसल‍िए अब यह न‍ियम सा हो जाएगा क‍ि पहले वोट के लिए राजनीत‍िक दल लोगों को बिन मांगे कुछ देंगे. बाद में सरकारें  उसका बोझ व अहसान लोगों पर ही थोप देंगी.  

च‍िरंतन भारी टैक्‍स के बीच चुनावी सबक के बाद पेट्रोल डीजल पर एक्‍साइज ड्यूटी में कमी लगभग वैसी ही  है जैसा क‍ि मंदी, लॉकडाउन, बेकारी के बीच कैब कंपनी ओला का पहला मुनाफा दर्ज करना. महामारी के बहाने कहां कहां क‍िसने क‍ितनी बेस‍िर पैर महंगाई हम पर थोपी है इसे या तो हम अपने टूटते बजट से समझ सकते हैं या फिर महामारी के बावजूद कंपन‍ियों के फूलते मुनाफे से.

लेक‍िन बाजार की क्‍या खता ! ऊंची कारोबारी लागतों के कारण भारतीय बाजार  स्‍वाभा‍व‍िक तौर पर महंगाईपरस्‍त  है. वहां मुनाफे तो कीमत बढ़ाकर ही आते हैं. सरकार अर्थव्‍यवस्‍था की महाजन (महाजनो येन गत: स पन्‍थ:) है. वह ज‍िस राह चलती है बाजार उसी को राजपथ मानता है. महंगाई असंतुल‍ित बाजार की डॉन है. मांग व कमाई के बिना आने वाली महंगाई खर्च और बचत दोनों में गरीब बनाती है.

 

महंगाई को थामना सरकारों की ज‍िम्‍मेदारी है. उन्‍हें  बाजार को संतुल‍ित करने के ल‍िए चुना जाता है. अब जब क‍ि सरकारें बेवजह टैक्‍स बढ़ाकर नीतिजन्‍य महंगाई को पैदा करने का श्रेय ले रही हैं तो हमारे मोहल्‍ले के अस्‍पताल या ट्रक वाले गुप्‍ता जी या मॉल के रेस्‍टोरेंट वाले तो आगे क्रीज से आगे बढ़कर क्‍यों न खेलें? अब तो उन्‍हें हमारी जिंदगी महंगी करने की वैक्‍सीन लगा दी गई है .

Sunday, October 31, 2021

आरोग्‍य का बहीखाता

 



भारत सरकार हर साल प्रतिरक्षा पर कितना खर्च करती है जीडीपी के अनुपात में 2.1 फीसदी

और

स्वास्‍थ्य पर ? जीडीपी का केवल 1.1 फीसदी.

तुलना विचारोत्तेजक है.

अलबत्ता महामारी के बाद दुनिया के लोग एसे ही खौलते हुए हिसाब कर रहे हैं. यदि हमें कोराना महामारी के महाश्मशान याद हैं (होंगे ही) तो इतिहास की कांव-कांव छोड़कर हमें सबसे बड़ी उलझनों का मर्म समझना चाहिए.

कोविड ने कायदे से समझाया कि किसी देश की आर्थि‍क प्रगति (जीडीपी) का उस देश के लोगों की स्वास्थ्य से सीधा रिश्ता होता है. सरकारों ने हमें यह सोचने ही नहीं दिया कि लोगों की  सेहत या स्वास्‍थ्य सुविधायें विशुद्घ रुप से एक आर्थिक संसाधन हैं.



इतिहास से क्या सीखा?

पहले विश्व युद्ध, स्पेनिश फ्लू से लेकर दूसरी बड़ी लड़ाई तक दुनिया में औसत आयु करीब 42 साल थी. 20 वीं सदी में दवाओं की खोज हुई, एंटीबायोटिक्स आएपानी, आवासीय स्वच्छता और खान पान बेहतर हुए, जिससे जीवन की प्रत्याशा या औसत आयु 42 से बढ़ कर 75 वर्ष पहुंच गई.  

1900 से 2000 के बीच दुनिया की आबादी 1.6 अरब से 7.5 अरब हो गई. इसमें स्वस्थ लोगों की आबादी काफी बड़ी थी. इन्होंने श्रम बाजार का चेहरा बदल दियाउत्पादकता बढ़ी, नई मांग पैदा हुई और मानव संसाधन को नए अर्थ मिल गए. बीसवीं सदी में विकसित अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर का एक तिहाई हिस्सा अच्छी सेहत से आया है.

अब किसी को शक नहीं है कि अच्छी स्वास्‍थ्य व्यवस्था आर्थि‍क प्रगति बढ़ाने में शि‍क्षा जि‍तना ही योगदान करती हैं. (सुचिता अरोरा 2001 कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी)

बीमारियां तरक्की और समृद्धि को खा जाती हैः मेकेंजी ने अपने एक ताजा अध्ययन में बताया कि 2017 के दौरान बीमारियों और चि‍कित्सा की कमी से करीब 1.7 करोड लोगों की असामयिक मौत हुई. इससे ग्लोबल जीडीपी को 12 खरब डॉलर का नुकसान हुआ जो विश्व के जीडीपी का 15 फीसदी है.

 सेहत की करेंसी

महामारी के बाद समृद्धि के नए पैमाने बन रहे हैं. जिस मुल्क का स्वास्थ्य ढांचा जितना चुस्त है उस पर उतने बड़े दांव लगाये जाएं. दुनिया में बुढ़ापा बढ़ रहा है यानी श्रमिकों संख्या घट रही है. एसे में मौजूदा श्रमिकों से बेहतर और दक्ष (तकनीकी) उत्पादकता की जरुरत है.

स्वास्थ्य सेवाओं को सड़क, बिजली, दूरसंचार की तर्ज पर विकसित करना होगा ताकि कार्यशील आयु बढ़ाई जा सके और 65 की आयु वाले लोग 55 साल वालों के बराबर उत्पादक हो सकें.

स्वास्थ्य में नई तकनीकें लाकर, बेहतर प्राथमि‍क उपचारसाफ पानी और समय पर इलाज देकर बडी आबादी की सेहत 40 फीसदी तक बेहतर की जा सकती है. स्वास्‍थ्य पर प्रति 100 डॉलर अतिरिक्त खर्च हों जीवन में प्रति वर्षएक स्वस्थ वर्ष बढाया जा सकता है. स्वास्थ्य सुविधायें संभाल कर, 2040 तक दुनिया के जीडीपी में 12 ट्रि‍ि‍लयन डॉलर जोडे जा सकते हैं जो ग्लोबल जीडीपी का 8 फीसदी होगा यानी कि करीब 0.4 फीसदी की सालाना बढ़ोत्तरी (मेकेंजी)

अनिवार्य है यह

भारत की नई गरीबी, बीमारी से निकल रही है. यूनिवर्सल हेल्थकेयर अब अनिवार्य है. यूरोप और अफ्रीका तक (इथि‍योपिया) मे सरकारें समग्र स्वास्थ्य सेवायें देने की तरफ बढ़ रही हैं. निजी और सरकारी सेवाओं को जोड़कर  बीमा और कैश ट्रांसफर जैसे प्रयोग किये जा रहे हैं

मार्च 2021 में संसद को बताया गया था कि स्वास्थ्य पर सरकार का प्रति व्यक्ति खर्च 1418 रुपये (अमेरिका 4 लाख और यूके  2.6 लाख रुपये) है. बकौल विश्व बैंक भारत में स्वास्थ्य पर कुल खर्च में सरकार का हिस्सा केवल 27 फीसदी है जबकि लोग अपनी जेब से करीब 72 फीसदी लागत उठाते हैं. ओईसीईडी और स्वयंसेवी संसथाओं के आकलन के अनुसार भारत में निजी यानी अपनी जेब से और सरकारी खर्च मिलाकर चि‍कित्सा इलाज पर कुल प्रति व्यक्ति खर्च जीडीपी का 3.6 फीसदी है.

सबको सरकारी खर्च पर स्वास्थ्य (यूनिवर्सल हेल्थकेयर) के लिए दवाओं का खर्च मिलाकर प्रति व्यक्ति‍ 1700-2000 रुपये खर्च करने होंगे. (शंकर पिरिंजा व अन्य 2012 ). स्वास्‍थ्य पर जीडीपी का 4 से 5 फीसदी तक खर्च करना होगा , जो 2021 में केवल 1.26 फीसदी है.

भारत के भविष्य की राह सेहत सुविधाओं की मंजिलों से ही तय होगी. मेकेंजी का हिसाब है कि भारत में स्वास्‍थ्य पर प्रति एक डॉलर के अतिरिक्त निवेश पर 4 डॉलर का आर्थि‍क रिटर्न संभव है. स्वास्थ्य सेवायें बेहतर करने से हर व्यक्ति के जीवन में हर साल औसतन करीब 24 स्वस्थ दिन बढ़ाये जा सकते हैं और 2040 तक जीडीपी में करीब 598 अरब डॉलर जोड़े जा सकते हैं जो भारत के कोविड पूर्व जीडीपी का करीब 6 फीसदी होगा.

1930 की महामंदी के बाद दुनिया के जान गई थी कि उसे अपनी समस्याओं के हल तलाशने होंगे. हमारे पास भी अब कोई विकल्प नहीं है. हमें सरकारों को अहसास कराते रहना होगा भव‍िष्‍य की समृद्ध‍ि के ल‍िए आरोग्‍य लक्ष्‍मी का आवाहन-आराधन अन‍िवार्य है, उसके चरण पड़ने से ही कल्‍याण होगा.